हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

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हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

💫🇮🇳Chanakya Barve 🇮🇳💫
#हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि *Harivansh Rai Bachhan's poem on FRIENDSHIP :* _________________________________ ....मै यादों का किस्सा खोलूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.... ...मै गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.... _...अब जाने कौन सी नगरी में,_ _...आबाद हैं जाकर मुद्दत से....😔_ ....मै देर रात तक जागूँ तो , कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.... ....कुछ बातें थीं फूलों जैसी, ....कुछ लहजे खुशबू जैसे थे, ....मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो, ....कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं. _...सबकी जिंदगी बदल गयी,_ _...एक नए सिरे में ढल गयी,_😔 _...किसी को नौकरी से फुरसत नही..._ _...किसी को दोस्तों की जरुरत नही...._😔 _...सारे यार गुम हो गये हैं..._ ...."तू" से "तुम" और "आप" हो गये है.... ....मै गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.... _...धीरे धीरे उम्र कट जाती है..._ _...जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,_😔 _...कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है..._ _और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है ..._😔 ....किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते, ....फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते... _....जी लो इन पलों को हस के दोस्त,_😁 _फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ...._ *....हरिवंशराय बच्चन* _Dedicated to all freinds._ _Share it with your freinds too._
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5 महीने पहले
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हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

गुलाब तू बदरंग हो गया है बदरूप हो गया है झुक गया है तेरा मुंह चुचुक गया है तू चुक गया है । ऐसा तुझे देख कर मेरा मन डरता है फूल इतना डरावाना हो कर मरता है! खुशनुमा गुलदस्ते में सजे हुए कमरे में तू जब ऋतु-राज राजदूत बन आया था कितना मन भाया था- रंग-रूप, रस-गंध टटका क्षण भर को पंखुरी की परतो में जैसे हो अमरत्व अटका! कृत्रिमता देती है कितना बडा झटका! तू आसमान के नीचे सोता तो ओस से मुंह धोता हवा के झोंके से झरता पंखुरी पंखुरी बिखरता धरती पर संवरता प्रकृति में भी है सुंदरता
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1 साल पहले
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हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

#kavi_ki_vasna_ कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 1 सृष्टि के प्रारम्भ में मैने उषा के गाल चूमे, बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के अरुण दृग चूम कर मैने सुलाए, तारिका-कलि से सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे, वायु के रसमय अधर पहले सके छू हॉठ मेरे मृत्तिका की पुतलियॉ से आज क्या अभिसार मेरा? कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 2 विगत-बाल्य वसुन्धरा के उच्च तुंग-उरोज उभरे, तरु उगे हरिताभ पट धर काम के ध्वज मत्त फहरे, चपल उच्छृखल करों ने जो किया उत्पात उस दिन, है हथेली पर लिखा वह, पढ़ भले ही विश्व हहरे; प्यास वारिधि से बुझाकर भी रहा अतृप्त हूँ मैं, कामिनी के कुच-कलश से आज कैसा प्यार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 3 इन्द्रधनु पर शीश धरकर बादलों की सेज सुखकर सो चुका हूँ नींद भर मैं चंचला को बाहु में भर, दीप रवि-शशि-तारकों ने बाहरी कुछ केलि देखी, देख, पर, पाया न कोई स्वप्न वे सुकुमार सुन्दर जो पलक पर कर निछावर थी गई मधु यामिनी वह; यह समाधि बनी हुई है यह न शयनागार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 4 आज मिट्टी से घिरा हूँ पर उमंगें हैं पुरानी, सोमरस जो पी चुका है आज उसके हाथ पानी, होठ प्यालों पर झुके तो थे विवश इसके लिए वे, प्यास का व्रत धार बैठा; आज है मन, किन्तु मानी; मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से बँधा, जग, जान ले तू, तन विकृत हो जाए लेकिन मन सदा अविकार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 5 निष्परिश्रम छोड़ जिनको मोह लेता विश्न भर को, मानवों को, सुर-असुर को, वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को, भंग कर देता तपस्या सिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों की वे सुमन के बाण मैंने, ही दिए थे पंचशर को; शक्ति रख कुछ पास अपने ही दिया यह दान मैंने, जीत पाएगा इन्हीं से आज क्या मन मार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 6 प्राण प्राणों से सकें मिल किस तरह, दीवार है तन काल है घड़ियाँ न गिनता, बेड़ियों का शब्द झन-झन, वेद-लोकाचार प्रहरी ताकते हर चाल मेरी, बद्ध इस वातावरण में क्या करे अभिलाष यौवन! अल्पतम इच्छा यहाँ मेरी बनी बन्दी पड़ी है, विश्व क्रीड़ास्थल नहीं रे विश्व कारागार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 7 थी तृषा जब शीत जल की खा लिए अंगार मैंने, चीथड़ों से उस दिवस था कर लिया श्रृंगार मैंने राजसी पट पहनने को जब हुई इच्छा प्रबल थी, चाह-संचय में लुटाया था भरा भंडार मैंने; वासना जब तीव्रतम थी बन गया था संयमी मैं, है रही मेरी क्षुधा ही सर्वदा आहार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 8 कल छिड़ी, होगी ख़तम कल प्रेम की मेरी कहानी, कौन हूँ मैं, जो रहेगी विश्व में मेरी निशानी? क्या किया मैंने नही जो कर चुका संसार अबतक? वृद्ध जग को क्यों अखरती है क्षणिक मेरी जवानी? मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता, शत्रु मेरा बन गया है छल-रहित व्यवहार मेरा! कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! Harivansh Rai Bachchan
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1 साल पहले
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हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

#Jo_beet_gayi_so_bat_gayi जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई [ads-post] जीवन में वह था एक कुसुम थे उसपर नित्य निछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया मधुवन की छाती को देखो सूखी कितनी इसकी कलियाँ मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में मधु का प्याला था तुमने तन मन दे डाला था वह टूट गया तो टूट गया मदिरालय का आँगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठतें हैं पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है जो बीत गई सो बात गई मृदु मिटटी के हैं बने हुए मधु घट फूटा ही करते हैं लघु जीवन लेकर आए हैं प्याले टूटा ही करते हैं फिर भी मदिरालय के अन्दर मधु के घट हैं मधु प्याले हैं जो मादकता के मारे हैं वे मधु लूटा ही करते हैं वह कच्चा पीने वाला है जिसकी ममता घट प्यालों पर जो सच्चे मधु से जला हुआ कब रोता है चिल्लाता है जो बीत गई सो बात गई।। ~ हरिवंश राय बच्चन
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1 साल पहले
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हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि

मधुबाला » 1. मैं मधुबाला मधुशाला की, मैं मधुशाला की मधुबाला! मैं मधु-विक्रेता को प्यारी, मधु के धट मुझ पर बलिहारी, प्यालों की मैं सुषमा सारी, मेरा रुख देखा करती है मधु-प्यासे नयनों की माला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 2. इस नीले अंचल की छाया में जग-ज्वाला का झुलसाया आकर शीतल करता काया, मधु-मरहम का मैं लेपन कर अच्छा करती उर का छाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 3. मधुघट ले जब करती नर्तन, मेरे नुपुर की छम-छनन में लय होता जग का क्रंदन, झूमा करता मानव जीवन का क्षण-क्षण बनकर मतवाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 4. मैं इस आंगन की आकर्षण, मधु से सिंचित मेरी चितवन, मेरी वाणी में मधु के कण, मदमत्त बनाया मैं करती, यश लूटा करती मधुशाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 5. था एक समय, थी मधुशाला, था मिट्टी का घट, था प्याला, थी, किन्तु, नहीं साकीबाला, था बैठा ठाला विक्रेता दे बंद कपाटों पर ताला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 6. तब इस घर में था तम छाया, था भय छाया, था भ्रम छाया, था मातम छाया, गम छाया, ऊषा का दीप लिये सर पर, मैं आई करती उजियाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 7. सोने सी मधुशाला चमकी, माणिक द्युति से मदिरा दमकी, मधुगंध दिशाओं में चमकी, चल पड़ा लिये कर में प्याला प्रत्येक सुरा पीनेवाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 8. थे मदिरा के मृत-मूक घड़े, थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े, थे जड़वत प्याले भूमि पड़े, जादू के हाथों से छूकर मैंने इनमें जीवन डाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 9. मझको छूकर मधुघट छलके, प्याले मधु पीने को ललके , मालिक जागा मलकर पलकें, अंगड़ाई लेकर उठ बैठी चिर सुप्त विमूर्छित मधुशाला। मैं मधुशाला की मधुबाला! 10. प्यासे आए, मैंने आँका, वातायन से मैंने झाँका, पीनेवालों का दल बाँका, उत्कंठित स्वर से बोल उठा ‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’ मैं मधुशाला की मधुबाला! 11. खुल द्वार गए मदिरालय के, नारे लगते मेरी जय के, मिटे चिन्ह चिंता भय के, हर ओर मचा है शोर यही, ‘ला-ला मदिरा ला-ला’!, मैं मधुशाला की मधुबाला! 12. हर एक तृप्ति का दास यहां, पर एक बात है खास यहां, पीने से बढ़ती प्यास यहां, सौभाग्य मगर मेरा देखो, देने से बढ़ती है हाला! मैं मधुशाला की मधुबाला! 13. चाहे जितना मैं दूं हाला, चाहे जितना तू पी प्याला, चाहे जितना बन मतवाला, सुन, भेद बताती हूँ अंतिम, यह शांत नहीं होगी ज्वाला. मैं मधुशाला की मधुबाला!
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1 साल पहले
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