mahabharat
238 Posts • 593K views
sn vyas
596 views
#महाभारत दुर्योधन में कोई अच्छा गुण नहीं था। दुर्योधन असल मे एक डरपोक व्यक्ति था। उसने भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न किया,पांडवों को जला कर मारने का प्रयत्न किया, जुए में धोखा करके पांडवों को वन भेज दिया,द्रौपदी जैसी विदुषी नारी पर झूठा आरोप लगाया कि उसने अंधे का पुत्र अंधा कहा इत्यादि। इन सब मौकों पर उसके पास विकल्प था कि वो ललकार कर पांडवों से युद्ध कर लेता पर उसने नही किया। लोग शकुनि को दोष देते हैं पर अंततः व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार होता है। दुर्योधन को शुरू से पता था कि भीष्म और द्रोण पांडवों को नही मारेंगे और बिना पांडवों का वध किये उसका काम नही होगा। इसलिए उसने कर्ण को बहुत महत्व देना शुरू किया। कर्ण डींगें हांकने में निपुण था। उसने कभी कोई युद्ध नही जीता था। उसने एक दिग्विजय की थी जो हस्तिनापुर के ध्वज के तले थी, मतलब अगर कोई राजा कर्ण को हरा कर पकड़ता या मारता तो फिर भीष्म और द्रोण युद्ध के लिए आते।इनसे लड़ना कौन चाहता? इसलिए ये दिग्विजय अकेले कर्ण की नही कही जा सकती।बाकी सब जगह कर्ण भाग जाता था। खुद दुर्योधन ने कभी कोई युद्ध नही लड़ा था। इनकी शिक्षा समाप्त होने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हराने की बात की थी तब दुर्योधन ,कर्ण,दुशासन को अकेले द्रुपद ने हरा कर भगा दिया था। गन्धर्वों से युद्ध मे भी दुर्योधन बंदी हो गया था,कर्ण भाग गया था। पूरे 18 दिन के महाभारत युद्ध मे दुर्योधन की वीरता का कोई वर्णन नही है। उसने किसी बड़े योद्धा को मारा हो ये भी नही लिखा।यहां तक कि युधिस्ठिर ने भी एक बड़े वीर शल्य को मारा पर दुर्योधन से कुछ न हुआ। " सुई की नोक बराबर भूमि नही दूंगा" की डींगें मारने वाला दुर्योधन युद्ध की हार के बाद सामने से लड़ने के बजाय युद्धभूमि से भागकर छिप गया। पांडवों ने उसको ढूंढकर ललकारा तो उसने कहा कि मुझे नही लड़ना,तुम लोग राज करो 😂 दुर्योधन जैसे लोग विक्टिम कार्ड खेलने में माहिर होते हैं, पूरे जीवन उसने यही किया। उसने पांडवों को उन्ही के धर्म से बांध दिया। अच्छे लोगों की तब और अब भी यही समस्या है कि" किसी ने हमारे साथ बुरा किया और अगर हमने भी उसके साथ बुरा किया तो उसमें और हममें क्या अंतर रह जायेगा"। श्री कृष्ण ने यही समझाया कि ये अंतर होना भी नही चाहिए। जब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो ये नही सोचते बैठे कि अगर मैं लंका में आग लगा दूँ तो इसमे और मुझमें क्या अंतर रह जायेगा। ऐसे ही किसी जाहिल ने किसी समय अयोध्या में मन्दिर गिरकर मस्जिद बना दी थी तो उचित समय पर फिर से मंदिर बने यही न्याय है। इसमे किसी को कोई अपराध बोध नही होना चाहिए। इसी तरह जीवन भर षड्यंत्र रचने वाले दुर्योधन की जांघ तोड़कर मारने में कुछ भी गलत नही था।
15 likes
6 shares