पौराणिक कथा
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sn vyas
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#पौराणिक कथा #☝आज का ज्ञान नरसिंह भगवान और प्रह्लाद के बीच ज्ञान की बात!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा, लेकिन उसके उपरांत भी भगवान क्रोध में थे। अब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद सब देवता लोग आ गए, ब्रह्मा, शंकर भी आये। तब नारद मुनि सब ने कहा कि "भाई भगवान नरसिंह अवतार लिए है उनकी स्तुति करे, अभिनंदन करें, उनका धन्यवाद करना चाहिए, उन्होंने इतना बड़ा काम किया, इस लिए आप सब जाये उनके पास।" देवताओं ने पहले ही मना कर दिया। देवताओं ने कहा कि "अभी तो भगवान नरसिंह बड़े क्रोध में है, हमसे उनका यह स्वरूप देखा नहीं जा रहा है। हम सब देवता उनके इस स्वरूप से भयभीत है। अतएव हम नहीं जाएगे।" तो कौन जाएगा? यह प्रश्न हुआ। तो सबने शंकर जी को कहा की महाराज आप जाइये, आप तो प्रलय करने वाले है। तब शंकर जी ने कहा "नहीं-नहीं मेरी हिम्मत नहीं है, मैं नहीं जा सकता" तब ब्रह्मा से कहा गया, "आप तो सृष्टि करता है, आपकी दुनिया हैं, आपके लिए ही तो आए हैं।" ब्रह्मा जी कहते हैं "वह सब तो ठीक है। लेकिन मैं तो नहीं जाऊंगा।" तो फिर सब ने परामर्श किया की अब लक्ष्मी जी को बुलाया जाए और उनको बोला जाए। क्योंकि नरसिंह भगवान विष्णु जी के अवतार है और विष्णु जी की अर्धांगिनी लक्ष्मी जी है, इनको देख करके हो सकता है नरसिंह भगवान का क्रोध उतर जाए, जो विराट रूप इनका है वह विराट रूप शांत हो जाएगा और मुस्कुराहट वाला रूप आ जाएगा। इसलिए लक्ष्मी जी से कहा गया जाने को। तो लक्ष्मी जी ने कहा "मैं इस समय कोई अर्धांगिनी नहीं बनना चाहती हूँ। मैं अभी आप लोगों की बात नहीं मान सकती। मेरी हिम्मत नहीं है जाने की। नरसिंह भगवान का वह स्वरूप देखा नहीं जा रहा मुझसे, वो अनंत कोटि सूर्य के समान प्रकाश है व क्रोध भी है।" फिर सब लोग हार गए कोई भी तैयार नहीं हुआ जाने को। तब नारद जी ने तरकीब (सुझाव) दिया और उन्होंने कहा कि "देखो भाई! यह घपड़-सपड़ करना ठीक नहीं है। बड़ी बदनामी की बात है की मृत्यु लोक में इतना बड़ा काम किया भगवान ने और कोई उनकी स्तुति ना करे! अभिनंदन ना करें।" इसलिए नारद जी ने कहा कि "प्रह्लाद को भेजो!" प्रह्लाद के पास सब लोग गए और कहा कि "बेटा तुम्हारे पिता को मार कर के नरसिंह भगवान खड़े हैं। उनके पास जाओ ना!" प्रह्लाद जी को डर नहीं लगा, वो आराम से लेफ्ट राइट करते हुए पहुंच गए नरसिंह भगवान के पास। उस वक्त प्रह्लाद जी ५-६ वर्ष के थे ही। जब वह गए नरसिंह भगवान के पास तो भगवान का जो विराट स्वरूप, आंतों की माला पहने हुए, खून से लतपत नाख़ून था। तो प्रह्लाद को देख कर मुस्कुराने लगे। फिर समस्त देवी-देवता, ब्रह्मा, शंकर आदि नरसिंह भगवान के पास जाकर उनकी स्तुति व अभिनंदन करने लगे। तब नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद से कहा (भागवत ७.९.५२) "वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्" भावार्थ: बेटा वर मांगों। जो कुछ मांगोंगे वह सब मैं देने को तैयार हूँ। सब मांगते हैं तुम भी मांगों बेटा। तब प्रह्लाद ने मन ही मन कहा अच्छा! बेवकूफ बनाना शुरु हो गया, कहते हैं वर मांगो! तब प्रह्लाद ने कहा (भागवत ७.१०.४) "यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्" भावार्थ: हे प्रभु! जो दास कुछ भी कामना लेकर जाता है स्वामी के पास। तो वह दास नहीं है, वह तो बनिया (व्यापारी) है। ऐसा व्यापार तो हमारे संसार में रोज होता है। हमने ₹10 दिया तो उसने ₹10 की मिठाई दे दिया। यह तो व्यापार है। दास तो केवल दासता करता है। यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ। कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ भावार्थ: प्रह्लाद जी कहते हैं कि अगर प्रभु आप देना ही चाहते हैं और अगर आपकी आज्ञा है कि मेरी आज्ञा है मानना ही पड़ेगा। तो ऐसा कोई आपका आदेश हो, तो प्रभु! यह वर दीजिए कि मैं आपसे कुछ न मांगू, ऐसा मेरा अंतःकरण कर दीजिए की कभी मांगने की बुद्धि पैदा ही ना हो, वर्तमान में तो नहीं है प्रभु! लेकिन आगे भी ना हो ऐसा वर दे दीजिए। क्योंकि मैं तो अकाम हूँ। मैं तो सेवा चाहता हुँ। मैं कुछ मांगने नहीं आया हुँ और वास्तविकता यह है कि आपको भी हमसे कुछ नहीं चाहिए। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि वर मांग? (भागवत ७.१०.८) इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः। ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ भावार्थ: प्रभु! यह कामना ऐसी बुरी चीज है की अगर कामना पैदा हो गई, तो इंद्रियां, मन, प्राण, आत्मा, धर्म, धैर्य, लज्जा, श्री, तेज, सत्य, सब नष्ट हो जाते हैं। यह कामना की बीमारी मुझको नहीं है इसलिए आप देना ही चाहते है तो मुझे ऐसा वर दीजिए कि कामना कभी पैदा ही ना हो। नरसिंह भगवान मुस्कुराने लगे उन्होंने कहा कि ठीक है, जैसा तू कहता है वैसा ही होगा। अब मेरी आज्ञा सुन, (भागवत ७.१०.११) "तथापि मन्वन्तरमेतदत्र दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्" भावार्थ: एक मन्वन्तर राज्य करो। (४३२०००० मानव वर्ष का चार युग, ७१ बार चार युग बीत जाये तो १ मन्वन्तर होता है जो ३०६७२०००० मानव वर्ष के बराबर है।) लगभग ३० करोड़ वर्ष तक राज्य करो, यह आज्ञा नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को दिया। ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए और सब लोगों ने कहा कि बोलिए नरसिंह भगवान की जय।
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sn vyas
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#पौराणिक कथा सम्राट #परीक्षित दादाजी के ज्ञान की गहनता से सभी बच्चे बड़े आश्चर्य चकित हो रहे थे । इतना विशद ज्ञान कैसे हुआ उन्हें ? सभी के मन में यह जिज्ञासा थी लेकिन कोई कहने का साहस नहीं कर सका । तब रिद्धिमा ने पूछा "दादाजी , आपने ये तो बताया था कि राजा परीक्षित को शुकदेव मुनि ने सबसे पहले श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई थी । पर पहले यह तो बताइए कि राजा परीक्षित और शुकदेव मुनि कौन थे" ? बच्चों की उत्सुकता देखकर दादाजी बड़े प्रसन्न हुए । जब श्रोता वक्ता से वक्तव्य के विषय में प्रश्न करने लगे तो यह समझना चाहिए कि श्रोताओं को उनका वक्तव्य बहुत पसंद आ रहा है । जो बात वक्ता कहना चाह रहा है वह श्रोताओं को समझ में आ रही है, वे उसमें रुचि ले रहे हैं और अपने प्रश्नों के उत्तर भी चाहते हैं । इससे वक्ता को अपना वक्तव्य सारगर्भित लगने लगता है । दादाजी अभिभूत होते हुए कहने लगे "इसका मतलब है कि इस विषय पर बात करना आप सबको अच्छा लग रहा है । बहुत अच्छा । चलिए, मैं पहले आपको राजा परीक्षित के बारे में बताता हूं । महाभारत के युद्ध में जब दुर्योधन की जांघ भीम ने अपनी गंदा से तोड़ दी थी और दुर्योधन अपंग होकर वहीं पर गिर पड़ा था । तब एक तरह से युद्ध का निर्णय हो गया था । सारे कौरव मारे जा चुके थे । दुर्योधन भी लगभग मृत हो चुका था । ऐसे में पांडवों की विजय निश्चित हो गई थी । तब तक कौरव सेना में केवल द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, कौरवों के पुरोहित और गुरू कृपाचार्य तथा कृष्ण भगवान की नारायणी सेना के सेनापति कृतवर्मा ये केवल तीन महारथी ही जिन्दा बचे थे बाकी सब लोग मारे जा चुके थे । जबकि पांडव सेना में अनेक महारथी जिन्दा थे । ये तीनों महारथी रात्रि में दुर्योधन से मिले तब दुर्योधन ने अश्वत्थामा को अपना सेनापति बनाया और युद्ध जारी रखने को कहा । अश्वत्थामा ने रात्रि में सोती हुई पांडव सेना को मारने का निश्चय कर लिया और अपनी योजना कृपाचार्य और कृतवर्मा को समझा दी । कहते हैं कि दुष्ट आदमी का साथ हो तो सद्गुणी व्यक्ति भी पापकर्म में सम्मिलित हो जाता है । कृपाचार्य जैसे मनीषी और कृतवर्मा जैसे भगवान श्रीकृष्ण के योद्धा भी अश्वत्थामा की दुष्टता और उसके पापकर्म में शामिल हो गये, यह आश्चर्यजनक है । इसलिए हमें कभी भी दुष्ट लोगों का संग नहीं करना चाहिए । जो कृतवर्मा भगवान श्रीकृष्ण की सेना का सेनापति था वह अश्वत्थामा की नीच योजना में शामिल हो गया । इससे सिद्ध होता है कि दुष्ट लोगों के साथ से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है । अश्वत्थामा ने योजना बनाई थी कि पांडव सेना जब सो जायेगी तब उनके शिविर में आग लगा दी जायेगी जिससे वे लोग सोते सोते ही आग में जलकर मर जायेंगे । जो कोई सैनिक या योद्धा भागने की कोशिश करेगा उसे ये तीनों महारथी नंगी तलवार से मार देंगे । इस योजना के अनुसार अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में चुपके से आग लगा दी । शिविर के द्वारों पर कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा अपने अपने हाथों में नंगी तलवार लेकर खड़े हो गए और जो कोई वहां से बचकर भागना चाहता था, उसे नंगी तलवार से काट कर इन्होंने मार डाला । उस रात पांचों पांडवों और सात्यकि को भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पास बुला लिया था इसलिए वे बच गए, बाकी सब योद्धा मारे गये । सुबह होने पर जब इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो अर्जुन बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अश्वत्थामा को पकड़ लिया । तब अश्वत्थामा ने अपने बचाव के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । ब्रह्मास्त्र एक ऐसा अस्त्र था जो अचूक था और उससे समूची सृष्टि का विनाश होना तय था । अर्जुन ने भी अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र की काट के लिए अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया । दोनों ब्रह्मास्त्र आकाश में एक दूसरे के सामने डट गये । इससे पूरे विश्व में हाहाकार मच गया । तब भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों से कहा कि वे अपने अपने ब्रह्मास्त्र को वापस ले लें । अर्जुन तो वापस लेना जानता था इसलिए उसने वह ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्वत्थामा ऐसा करना नहीं जानता था । इसलिए उसने इसे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा पर छोड़ दिया जो कि नियम विरुद्ध था क्योंकि पहली बात तो यह थी कि उत्तरा गर्भवती थी । दूसरे वह एक महिला थी । एक गर्भवती महिला पर ब्रह्मास्त्र छोड़ना बहुत ही अधम स्तर का कार्य था लेकिन जब बुद्धि पर अज्ञान और मोह का परदा पड़ा जाये तो मनुष्य धर्म और अधर्म में भेद करने की शक्ति खो देता है । अब उत्तरा और पांडवों का भावी उत्तराधिकारी का जीवन संकट में था । तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर उसमें स्थित शिशु की रक्षा की और अपनी गदा से ब्रह्मास्त्र को लौटा दिया । इस प्रकार उत्तरा का गर्भ बच गया । उत्तरा ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया जो परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसके पश्चात अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया और उसका वध करने वाला था कि उसे ध्यान आया कि अश्वत्थामा उसके गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है । तब अर्जुन ने अश्वत्थामा की मणि काटकर उससे छीन ली और उसके घाव को खुला छोड़ दिया । अश्वत्थामा आज भी जीवित है क्योंकि वह बाल ब्रह्मचारी है और उसका घाव आज भी भरा नहीं है । उसके पाप का यही दंड था । इस प्रकार परीक्षित अर्जुन का पौत्र था जो कुरू वंश का एकमात्र उत्तराधिकारी था । सम्राट युधिष्ठिर के द्वारा राज पाट छोड़ने के पश्चात महाराज परीक्षित हस्तिनापुर का सम्राट बन गया । परीक्षित का विवाह विराटनगर के महाराज उत्तर की पुत्री इरावती से हुआ था और इनके पुत्र का नाम जनमेजय था जो परीक्षित के पश्चात भारत का सम्राट बना था । श्री हरि
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