महाभारत की कहानी

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sn vyas
581 views 6 days ago
#महाभारत की कथा द्यूत क्रीड़ा महाभारत के सबसे दारुण घटनाओं में से एक है। इसी सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया था और यही वो घटना थी जिसने महाभारत के युद्ध को निश्चित कर दिया था। जब भी द्यूत क्रीड़ा की बात होती है तो शकुनि का नाम सबसे पहले आता है। ये बात जनमानस में प्रसिद्ध है कि उस खेल को जीतने के लिए शकुनि ने छल किया था। किन्तु क्या ये बात सही है? आइये जानते हैं। वास्तव में शकुनि ने द्यूत के खेल में कोई छल नहीं किया था। उस खेल के शुरू होने से पहले ही ये तय था कि शकुनि उस खेल में विजयी होने वाले हैं क्यूंकि उस समय पूरे संसार में कोई भी द्यूत के खेल की कुशलता में शकुनि के आस पास भी नहीं था। इसका वर्णन हमें महाभारत के सभा पर्व के अंतर्गत द्यूत पर्व के दुर्योधनसंतापविषयक अध्याय के श्लोक २० में मिलता है। यहाँ पर जब दुर्योधन युधिष्ठिर के इंद्रप्रस्थ की उन्नति देख कर दुखी होता है तब शकुनि उसे समझाता है कि सीधे युद्ध में पांडवों पर विजय पाना असंभव है। आगे शकुनि जो कहता है वो उसकी द्यूत के खेल पर पकड़ को दर्शाता है। शकुनि ने कहा - "मैं वो उपाय बताता हूँ जिससे पांडव स्वयं ही अपना सब कुछ हार जाएंगे। युधिष्ठिर को जुए का खेल बहुत पसंद है और यदि उसे इस खेल के लिए बुलाया जाये तो वो मना नहीं कर सकता। मैं जुआ खेलने में निपुण हूँ और इसमें मेरी समानता करने वाला इस पृथ्वी पर और कोई नहीं है। केवल यही नहीं, तीनों लोकों में मेरे जाइये द्यूत विद्या का जानकर और कोई नहीं है।" तो महाभारत में स्पष्ट रूप से ये लिखा है कि शकुनि की भांति द्यूत क्रीड़ा का खिलाडी इस पृथ्वी पर तो क्या तीनों लोकों में और कोई नहीं था। इससे आगे जब विदुर महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा से युधिष्ठिर को द्यूत का निमंत्रण देने गए तो उन्होंने भी उनसे कहा - "राजन! गांधार राज शकुनि जुए का बहुत सिद्धहस्त खिलाडी है और वह अपनी इच्छा अनुसार पांसे फेंकने में निपुण है।" इसपर युधिष्ठिर भी विदुर से कहते हैं कि वो शकुनि की जुए में कुशलता के विषय में जानते हैं और यदि उन्हें राजा धृतराष्ट्र स्वयं ना बुलाते तो वे कभी भी शकुनि के साथ जुआ ना खेलते। यही नहीं जब युधिष्ठिर द्यूत सभा पहुंचे तो वहां पर भी उन्होंने शकुनि को द्यूत की बुराई के बारे में बताया था। इसके बाद द्यूत सभा में शकुनि और युधिष्ठिर के बीच जो बातें हुई, उससे ये साफ़ पता चलता है कि युधिष्ठिर शकुनि के साथ जुआ नहीं खेलना चाहते थे। किन्तु जब द्यूत का खेल आरम्भ हुआ तो दुर्योधन ने दांव लगाया किन्तु पांसा फेकने के लिए उसने शकुनि को ही चुना। इससे युधिष्ठिर सहमत तो नहीं थे लेकिन फिर भी उन्होंने उसकी बात मान ली। महाभारत में ये स्पष्ट लिखा हुआ है कि दांव लगने के बाद शकुनि पांसों को हाथ में लेते ही बोल देता था कि ये दांव मैंने जीत लिया। मतलब कि वो द्यूत कला में इतना माहिर था कि उसे ये साफ़ तौर पर पता होता था कि उसे पांसों में कौन सी संख्या लानी है। अंततः परिणाम वही हुआ जो सभी को पता था। शकुनि ने बड़ी ही सरलता से सारे दांव जीत लिए और युधिष्ठिर अपना सब कुछ हार गए। तो लोगों की ये जो मान्यता है कि शकुनि ने जुए में किसी माया या छल का प्रयोग किया ये गलत है। वो जुए के खेल में इतना सिद्धहस्त था कि उसे किसी माया या छल की आवश्यकता ही नहीं थी। इसके अतिरिक्त एक और कथा हमें सुनने को मिलती है कि शकुनि के पिता सुबल ने अपनी मृत्यु की बाद उससे अपनी रीढ़ की हड्डी से अपने पांसों को बनाने की आज्ञा दी थी। शकुनि ने ऐसा ही किया और इसी कारण उसके पिता की हड्डी से बनें वे पांसे हमेशा उसका कहा मानते थे। ये लोक कथा भी बिलकुल गलत है। मूल महाभारत में हमें ऐसा कोई वर्णन नहीं मिलता। महाभारत में तो महाराज सुबल का केवल एक-आध जगह ही वर्णन है। अपने पिता की हड्डी से पांसे बनाने की लोक कथा महाभारत के कुछ दक्षिण भारतीय संस्करणों से आरम्भ हुई किन्तु मूल महाभारत में ऐसा कोई भी वर्णन नहीं मिलता। तो द्यूत के खेल में शकुनि ने कभी भी कोई छल नहीं किया था, किन्तु वो इस खेल में इतना निपुण था कि खेल के शुरू होने से पहले ही सबको, यहाँ तक कि युधिष्ठिर को भी ये पता था कि वे इस खेल में हारने वाले हैं।
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sn vyas
681 views 21 days ago
#महाभारत की कथा #महाभारत भीम और हिडिंबा की कथा — प्रेम, शक्ति और त्याग की अद्भुत गाथा महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि उसमें प्रेम, त्याग, धर्म, करुणा और मानव भावनाओं की अनगिनत कहानियाँ छिपी हुई हैं। उन्हीं में से एक अत्यंत भावपूर्ण और रहस्यमयी कथा है — भीम और हिडिंबा की। यह कहानी उस समय की है जब पांडवों के जीवन में संकट, भय और संघर्ष का दौर चल रहा था। लाक्षागृह से बचने के बाद Mahabharata में जब कौरवों ने पांडवों को समाप्त करने की योजना बनाई, तब उन्होंने वाराणावत में एक भव्य महल बनवाया जिसे लाक्षागृह कहा गया। वह महल लाख, घी और ज्वलनशील पदार्थों से बनाया गया था ताकि उसमें आग लगाकर पांडवों को जिंदा जलाया जा सके। लेकिन विदुर पहले ही इस षड्यंत्र को समझ चुके थे। उन्होंने गुप्त संकेतों में युधिष्ठिर को सावधान कर दिया। एक रात अवसर देखकर पांडव अपनी माता कुंती के साथ उस जलते हुए महल से बच निकले और अंधेरी रात में घने जंगलों की ओर चले गए। कई दिनों तक भूखे-प्यासे भटकने के बाद वे एक विशाल और भयावह वन में पहुंचे। वह स्थान अत्यंत शांत, रहस्यमयी और राक्षसों से भरा हुआ था। थके हुए पांडव एक बड़े वृक्ष के नीचे सो गए। माता कुंती और चारों भाई विश्राम करने लगे, लेकिन भीम पहरा देने के लिए जागते रहे। राक्षस हिडिंब का आतंक उसी वन में एक भयानक राक्षस रहता था — हिडिंब। वह अत्यंत शक्तिशाली, क्रूर और नरभक्षी था। उसकी बहन थी — हिडिंबा। एक रात हिडिंब को मनुष्यों की गंध आई। उसने समझ लिया कि कोई यात्री जंगल में आया है। उसके मुंह में पानी भर आया। उसने अपनी बहन हिडिंबा से कहा— “जाओ, उन मनुष्यों को पकड़कर लाओ। आज हम उनका मांस खाएँगे।” हिडिंबा अपने भाई की आज्ञा मानकर जंगल में आगे बढ़ी। पहली बार भीम को देखना जब हिडिंबा वहां पहुंची, तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। चाँदनी रात थी। वृक्षों के बीच हल्की हवा बह रही थी। पांडव गहरी नींद में सो रहे थे और उनके पास विशालकाय, बलशाली भीम हाथ में गदा लिए पहरा दे रहे थे। भीम का तेज, उनका साहस, उनकी विशाल भुजाएँ और निर्भीक चेहरा देखकर हिडिंबा मोहित हो गई। उसके भीतर पहली बार प्रेम जाग उठा। वह भूल गई कि वह मनुष्यों को मारने आई थी। हिडिंबा का रूप परिवर्तन हिडिंबा राक्षसी थी, लेकिन उसके पास मायावी शक्तियाँ थीं। उसने तुरंत अपना भयानक रूप त्याग दिया और एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया। उसने सफेद वस्त्र पहने, सुंदर आभूषण धारण किए और धीरे-धीरे भीम के पास पहुँची। भीम ने सतर्क होकर पूछा— “तुम कौन हो? इस घने वन में रात के समय क्या कर रही हो?” हिडिंबा ने विनम्र स्वर में कहा— “मैं राक्षस हिडिंब की बहन हूँ। मेरा भाई तुम्हें मारकर खाना चाहता है। लेकिन मैं तुम्हें देखकर तुमसे प्रेम करने लगी हूँ। कृपया यहां से चले जाइए, नहीं तो वह कभी भी आ सकता है।” भीम मुस्कुराए। उन्होंने उत्तर दिया— “मैं अपने परिवार को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। जब तक भीम जीवित है, कोई भी मेरे परिवार को छू नहीं सकता।” हिडिंब का क्रोध जब हिडिंबा बहुत देर तक वापस नहीं लौटी, तो हिडिंब स्वयं वहां पहुंच गया। उसने अपनी बहन को सुंदर स्त्री के रूप में भीम से बात करते देखा। वह क्रोध से पागल हो उठा। उसने गरजकर कहा— “तू अपने शिकार से प्रेम करने लगी? पहले इन्हें मार, वरना मैं तुझे भी नहीं छोड़ूँगा!” लेकिन हिडिंबा अब बदल चुकी थी। उसने अपने भाई का विरोध किया। भीम और हिडिंब का भीषण युद्ध इसके बाद भीम और हिडिंब के बीच भयंकर युद्ध शुरू हुआ। धरती कांपने लगी। वृक्ष टूटने लगे। दोनों महाबली योद्धा घंटों तक लड़ते रहे। हिडिंब कभी अपने विशाल नाखूनों से हमला करता, कभी पहाड़ जैसे पत्थर उठाकर फेंकता। लेकिन भीम उससे कहीं अधिक शक्तिशाली थे। अंततः भीम ने उसे पकड़कर जोर से जमीन पर पटक दिया और उसका वध कर दिया। राक्षस हिडिंब का अंत हो गया। हिडिंबा का विवाह प्रस्ताव अपने भाई की मृत्यु के बाद भी हिडिंबा दुखी होने के बजाय शांत थी, क्योंकि वह जानती थी कि उसका भाई अधर्म के मार्ग पर था। अब उसने माता कुंती और युधिष्ठिर के सामने विनती की— “मैं भीम से प्रेम करती हूँ। कृपया मुझे इनके साथ रहने की अनुमति दें।” युधिष्ठिर धर्मप्रिय थे। उन्होंने हिडिंबा की सच्चाई और प्रेम को समझा। माता कुंती ने भी अनुमति दे दी, लेकिन एक शर्त रखी— “भीम कुछ समय तक तुम्हारे साथ रह सकते हैं, लेकिन अंततः उन्हें अपने भाइयों के पास लौटना होगा।” हिडिंबा ने यह शर्त स्वीकार कर ली। भीम और हिडिंबा का विवाह जंगल के शांत वातावरण में दोनों का विवाह हुआ। यह विवाह किसी राजमहल में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में हुआ था। कुछ समय तक भीम और हिडिंबा साथ रहे। हिडिंबा अत्यंत समर्पित पत्नी सिद्ध हुई। जल्द ही उनके यहाँ एक पुत्र जन्मा। घटोत्कच का जन्म उस बालक का सिर घट (घड़े) के समान गोल और विशाल था, इसलिए उसका नाम रखा गया — घटोत्कच। घटोत्कच बचपन से ही अत्यंत शक्तिशाली था। उसे अपनी माता से मायावी शक्तियाँ और पिता भीम से अपार बल मिला था। वह कुछ ही समय में युवा हो गया। जब पांडव आगे बढ़ने लगे, तब हिडिंबा और घटोत्कच ने उनसे विदा ली। जाते समय घटोत्कच ने कहा— “जब भी आपको मेरी आवश्यकता होगी, मैं तुरंत उपस्थित हो जाऊँगा।” कुरुक्षेत्र युद्ध में घटोत्कच बाद में Kurukshetra War के दौरान घटोत्कच ने पांडवों की ओर से युद्ध किया। रात्रि युद्ध में उसकी मायावी शक्तियों के सामने कौरव सेना भयभीत हो उठी। अंततः कर्ण को अपनी दिव्य शक्ति वासवी शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करना पड़ा। वही शक्ति वह अर्जुन के लिए बचाकर रखना चाहता था। घटोत्कच की मृत्यु के बाद श्रीकृष्ण मुस्कुराए, क्योंकि अब अर्जुन उस घातक अस्त्र से सुरक्षित हो चुके थे। इस प्रकार घटोत्कच ने अपने प्राण देकर पांडवों की रक्षा की। हिडिंबा का तपस्विनी रूप भीम के जाने के बाद हिडिंबा ने अपना जीवन तपस्या और भक्ति में लगा दिया। समय के साथ वह एक पूजनीय देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। आज भी Hidimba Devi Temple अत्यंत प्रसिद्ध है। यह मंदिर देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित है और लाखों श्रद्धालु वहां दर्शन करने जाते हैं। इस कथा से मिलने वाली सीख सच्चा प्रेम जाति, रूप और जन्म नहीं देखता। अधर्म का अंत निश्चित है। शक्ति के साथ करुणा भी आवश्यक है। घटोत्कच की तरह त्याग ही सच्चे वीर की पहचान है। महाभारत में केवल युद्ध नहीं, गहरे मानवीय भाव भी हैं। यह कथा महाभारत की सबसे सुंदर प्रेम कथाओं में से एक मानी जाती है, जहाँ एक राक्षसी का हृदय प्रेम और भक्ति से बदल जाता है।
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