रामायण महाभारत

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Sangram Jadhav
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🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता | अध्याय 1 | श्लोक 11 इस श्लोक में दुर्योधन अपनी सेना को आदेश देता है कि सभी योद्धा अपने-अपने मोर्चों पर दृढ़ता से डटे रहें और चारों ओर से भीष्म पितामह की रक्षा करें। भीष्म पितामह कौरव सेना के प्रधान सेनापति थे, इसलिए उनकी सुरक्षा पूरे युद्ध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह श्लोक हमें अनुशासन, एकता, नेतृत्व और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण का संदेश देता है। 🙏 यदि यह वीडियो आपको पसंद आए, तो Like करें, Share करें और चैनल को Subscribe करें। 🕉️ जय श्री कृष्ण #BhagavadGita #Mahabharat #Krishna #SanatanDharma #Dharmakshetra108 #BhagavadGita #Mahabharat #Krishna #LordKrishna #SanatanDharma #Gita #Spirituality #Hinduism #BhagavadGitaQuotes #IndianCulture #DailyWisdom #ReelsIndia #InstaReels #ExplorePage #Dharmakshetra108 #🙏🦚जय श्री कृष्णा🙏🦚 #mahabharat
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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 468) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम् । जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तरम् ।। २४ ।। धनकी इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करनेमें तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धनमें आसक्ति हो गयी है, उसे उस धनका वियोग होनेपर इतना महान् दुःख होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है ।। २४ ।। न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः । पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम् ।। २५ ।। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इस विपत्तिसे छुटकारा पा सकूँ अथवा पुत्र और स्त्रीके साथ किसी निरापद स्थानमें भाग चलूँ ।। २५ ।। यतितं वै मया पूर्व वेत्थ ब्राह्मणि तत् तथा । क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ।। २६ ।। ब्राह्मणी! तुम इस बातको ठीक-ठीक जानती हो कि पहले तुम्हारे साथ किसी ऐसे स्थानमें चलनेके लिये जहाँ सब प्रकारसे अपना भला हो, मैंने प्रयत्न किया था; परंतु उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी ।। २६ ।। इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै । उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयासकृत् ।। २७ ।। मूढमते ! मैं बार-बार तुमसे अन्यत्र चलनेके लिये अनुरोध करता। उस समय तुम कहने लगती थीं- 'यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं बड़ी हुई तथा मेरे पिता भी यहीं रहते थे' ।। २७ ।। स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव । बान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ।। २८ ।। अरी! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता और पहलेके भाई-बन्धु जिसे छोड़कर बहुत दिन हुए स्वर्गलोकको चले गये, वहीं निवास करनेके लिये यह आसक्ति कैसी? ।। २८ ।। सोऽयं ते बन्धुकामाया अशृण्वत्या वचो मम । बन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ।। २९ ।। तुमने बंधु-बान्धवोंके साथ रहनेकी इच्छा रखकर जो मेरी बात नहीं सुनी, उसीका यह फल है कि आज समस्त भाई-बंधुओंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है, जो मेरे लिये अत्यन्त दुःखका कारण है ।। २९ ।। अथवा मद्विनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन । परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत् ।। ३० ।। अथवा यह मेरे ही विनाशका समय है; क्योंकि मैं स्वयं जीवित रहकर क्रूर मनुष्यकी भाँति दूसरे किसी भाई-बंधुका त्याग नहीं कर सकूँगा ।। ३० ।। सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम । सखायं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ।। ३१ ।। प्रिये ! तुम मेरी सहधर्मिणी और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली हो। सदा सावधान रहकर माताके समान मेरा पालन-पोषण करती हो। देवताओंने तुम्हें मेरी सखी (सहायिका) बनाया है। तुम सदा मेरी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हो ।। ३१ ।। पित्रा मात्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् । वरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत् परिणीय च ।। ३२ ।। तुम्हारे पिता-माताने तुम्हें सदाके लिये मेरे गृहस्थाश्रमकी अधिकारिणी बनाया है। मैंने विधिपूर्वक तुम्हारा वरण करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक तुम्हारे साथ विवाह किया है ।। ३२ ।। कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि । त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् ।। ३३ ।। परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्या नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ।। ३४ ।। बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् । भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ।। ३५ ।। यया दौहित्रजॉल्लोकानाशंसे पितृभिः सह । स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३६ ।। तुम कुलीन, सुशीला और संतानवती हो, सती-साध्वी हो। तुमने कभी मेरा अपकार नहीं किया है। तुम नित्य मेरे अनुकूल चलनेवाली धर्मपत्नी हो। अतः मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये तुम्हें नहीं त्याग सकूँगा। फिर स्वयं ही अपने उस पुत्रका त्याग तो कैसे कर सकूँगा, जो अभी निरा बच्चा है, जिसने युवावस्थामें प्रवेश नहीं किया है तथा जिसके शरीरमें अभी जवानीके लक्षणतक नहीं प्रकट हुए हैं। साथ ही अपनी इस कन्याको कैसे त्याग दूँ, जिसे महात्मा ब्रह्माजीने उसके भावी पतिके लिये धरोहरके रूपमें मेरे यहाँ रख छोड़ा है? जिसके होनेसे में पितरों के साथ दौहित्रजनित पुण्यलोकों को पाने की आशा रखता हूँ, उसी अपनी बालिकाको स्वयं ही जन्म देकर मैं मौतके मुखमें कैसे छोड़ सकता हूँ? ।। ३३-३६ ।। मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः । कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ।। ३७ ।। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पिताका अधिक स्नेह पुत्रपर होता है तथा कुछ दूसरे लोग पुत्रीपर ही अधिक स्नेह बताते हैं; किंतु मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं ।। ३७ ।। यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३८ ।। जिसपर पुण्यलोक, वंशपरम्परा और नित्य सुख- सब कुछ सदा निर्भर रहते हैं, उस निष्पाप बालिका का परित्याग में कैसे कर सकता हूँ ।। ३८ ।। आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः । त्यक्ता होते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ।। ३९ ।। अपनेको भी त्यागकर परलोकमें जानेपर मैं सदा इस बातके लिये संतप्त होता रहूँगा कि मेरे द्वारा त्यागे हुए ये बच्चे अवश्य ही यहाँ जीवित नहीं रह सकेंगे ।। ३९ ।। एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः । आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मया विना ।। ४० ।। इनमेंसे किसीका भी त्याग विद्वानोंने निर्दयतापूर्ण तथा निन्दनीय बताया है और मेरे मर जानेपर ये सभी मेरे बिना मर जायेंगे ।। ४० ।। स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम् । अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धवः । सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ।। ४१ ।। अहो ! मैं बड़ी कठिन विपत्तिमें फँस गया हूँ। इससे पार होनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवनको। हाय! मैं बन्धु-बान्धवोंके साथ आज किस गतिको प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना कदापि उचित नहीं है ।। ४१ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
600 views 16 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 449) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो रोषाज्ज्वलन्निव । बलमाहारयामास यद् वायोर्जगतः क्षये ।। २४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- अर्जुनके यों कहनेपर भीम रोषसे जल उठे और प्रलयकालमें वायुका जो बल प्रकट होता है, उसे उन्होंने अपने भीतर धारण कर लिया ।। २४ ।। ततस्तस्याम्बुदाभस्य भीमो रोषात् तु रक्षसः । उत्क्षिप्याभ्रामयद् देहं तूर्ण शतगुणं तदा ।। २५ ।। तत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ।। २५ ।। भीम उवाच वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ।। २६ ।। इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले- अरे निशाचर ! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है। इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है। इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा (बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ।। २६ ।। क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ।। २७ ।। राक्षस ! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ।। २७ ।। अर्जुन उवाच यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ।। २८ ।। अर्जुन बोले- भैया ! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ। तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ।। २८ ।। अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर । कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ।। २९ ।। वृकोदर ! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा। तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो। अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ।। २९ ।। वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः । निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ।। ३० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये। उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ।। ३० ।। स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ।। ३१ ।। इस प्रकार भीमसेनकी मार पड़नेपर वह राक्षस जलसे भीगे हुए नगारेकी-सी ध्वनिसे सम्पूर्ण वनको गुँजाता हुआ जोर-जोरसे चीखने लगा ।। ३१ ।। बाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान् पाण्डुनन्दनः । मध्ये भङ्क्त्वा महाबाहुर्हर्षयामास पाण्डवान् ।। ३२ ।। तब महाबाहु बलवान् पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसे दोनों भुजाओंसे बाँधकर उलटा मोड़ दिया और उसकी कमर तोड़कर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाया ।। ३२ ।। हिडिम्बं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः । अपूजयन् नरव्याघ्रं भीमसेनमरिंदमम् ।। ३३ ।। हिडिम्बको मारा गया देख वे महान् वेगशाली पाण्डव अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठे और उन्होंने शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ३३ ।। अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् । पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ।। ३४ ।। इस प्रकार भयंकर पराक्रमी महात्मा भीमकी प्रशंसा करके अर्जुनने पुनः उनसे यह बात कही- ।। ३४ ।। न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो । शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात् सुयोधनः ।। ३५ ।। 'प्रभो! मैं समझता हूँ, इस वनसे नगर अब दूर नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। अब हमलोग शीघ्र चलें, जिससे दुर्योधनको हमारा पता न लग सके' ।। ३५ ।। ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा सह मात्रा महारथाः । प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ।। ३६ ।। तब सभी पुरुषसिंह महारथी पाण्डव (ठीक है,) ऐसा ही करें' यों कहकर माताके साथ वहाँसे चल दिये। हिडिम्बा राक्षसी भी उनके साथ हो ली ।। ३६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बवधे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्बासुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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