रामायण महाभारत

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chandan kumar
683 views 28 days ago
“दानवीर कर्ण” जिसने अपने जीवन भर अपमान सहा, फिर भी दान और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। माता कुंती के सामने भी महारथी कर्ण ने अपना दिव्य कवच और कुंडल बिना संकोच दान कर दिए। “सम्मान से बड़ा उसके लिए वचन था, और शक्ति से बड़ा उसका त्याग।”Karna के बारे में 20 बातें: 1. कर्ण महाभारत के सबसे महान योद्धाओं में से एक थे। 2. उन्हें “महारथी” कहा जाता था क्योंकि वे अकेले हजारों योद्धाओं का सामना कर सकते थे। 3. कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे। 4. उनकी माता का नाम कुंती था। 5. जन्म से ही उनके शरीर पर कवच और कुंडल थे। 6. कर्ण को दानवीर के नाम से भी जाना जाता है। 7. उन्होंने कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। 8. कर्ण के पालक माता-पिता अधिरथ और राधा थे। 9. इसलिए उन्हें “राधेय” भी कहा जाता था। 10. कर्ण धनुर्विद्या में बहुत निपुण थे। 11. उन्होंने Parashurama से शिक्षा प्राप्त की। 12. कर्ण और Arjuna के बीच गहरी प्रतिद्वंद्विता थी। 13. Duryodhana ने कर्ण को अंग देश का राजा बनाया था। 14. कर्ण अपने मित्र दुर्योधन के प्रति हमेशा वफादार रहे। 15. उन्होंने युद्ध में कई महान योद्धाओं को हराया। 16. इंद्र ने ब्राह्मण का रूप लेकर उनसे कवच-कुंडल दान में मांगे थे। 17. कर्ण ने बिना हिचकिचाए अपना कवच-कुंडल दान कर दिया। 18. महाभारत युद्ध में कर्ण कौरव पक्ष से लड़े थे। 19. उनका जीवन संघर्ष, सम्मान और त्याग का प्रतीक माना जाता है। 20. आज भी कर्ण को वीरता, दान और मित्रता के लिए याद किया जाता है। #mahabharat #karan Mahabharat #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #माहाभरत #mahabharat katha
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sn vyas
926 views 28 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 390) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारकाः । पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयापि च ।। ५४ ।। ननर्वोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहितः । तं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु बालैः परिवृतं सुतम् ।। ५५ ।। हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत् । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति ।। ५६ ।। मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि 'मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन ! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता ।। ५४-५६ ।। पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यति स्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाप्युत ।। ५७ ।। इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् । आत्मानं चात्मना गर्छन् मनसेदं व्यचिन्तयम् ।। ५८ ।। अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्यां धनेप्सया ।। ५९ ।। 'जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि 'मैंने भी दूध पी लिया।' इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा- 'मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता' ।। ५७-५९ ।। इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम् । भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा द्रुपदके यहाँ गया ।। ६० ।। पूर्वस्नेहानुरागित्वात् सदारः सौमकिं गतः ।। ६० ।। अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् ।। ६१ ।। मैंने सुन रखा था कि द्रुपदका राज्याभिषेक हो चुका है, अतः मैं मन-ही-मन अपनेको कृतार्थ मानने लगा और बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए अपने प्रिय सखाके समीप गया ।। ६१ ।। संस्मरन् संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत् । ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो ।। ६२ ।। अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति। उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगतः ।। ६३ ।। उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा- 'नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं द्रुपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला ।। ६२-६३ ।। स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् । अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा ।। ६४ ।। परंतु द्रुपदने मुझे नीच मनुष्यके समान समझकर उपहास करते हुए इस प्रकार कहा -'ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त असंगत एवं अशुद्ध है ।। ६४ ।। यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः ।। ६५ ।। 'तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि 'राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ!' समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है ।। ६५ ।। सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् । नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ।। ६६ ।। 'पहले तुम्हारे साथ मेरी जो मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी उस समय हम दोनोंकी शक्ति समान थी (किंतु अब वैसी बात नहीं है)। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का, जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता ।। ६६ ।। साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यान्नोपपद्यते। सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित् ।। ६७ ।। न 'सब बातोंमें समानता होनेसे ही मित्रता होती है। विषमता होनेपर मैत्रीका होना असम्भव है। फिर लोकमें कभी किसीकी मैत्री अजर-अमर नहीं होती ।। ६७ ।। कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि ।। ६८ ।। 'समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीकी उपासना (भरोसा) न करो। हम दोनों एक-दूसरे के मित्र थे, इस भाव को हृदय से निकाल दो' ।। ६८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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