maa durga
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sn vyas
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#मां दुर्गा
यह देवी आदिशक्ति का एक अत्यंत दुर्लभ और दिव्य स्वरूप मानी जाती हैं। उनका वर्ण शुद्ध सोने के समान तेजस्वी है, जो चंद्रमा की शीतलता, जल की पवित्रता और आत्मज्ञान के प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। तीन मुखों वाली यह देवी त्रिकालदर्शिनी हैं, अर्थात् भूत, वर्तमान और भविष्य को समान रूप से जानने वाली। उनका दिव्य वाहन रजत मत्स्य है, जो जलतत्त्व, जीवन, समृद्धि और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का प्रतीक है।
प्राचीन कथा के अनुसार सतयुग के अंत में “तिमिरोदक” नामक एक दैत्य समुद्र की गहराइयों में निवास करता था। उसने तपस्या कर ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली कि वह नदियों, झीलों और समुद्रों के जल को दूषित कर सकता था। उसके प्रभाव से धरती पर अकाल, रोग और भय फैलने लगा। नदियों का जल काला पड़ गया और जलचर प्राणियों का विनाश होने लगा।
जब देवताओं ने भगवान विष्णु और भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की, तब दोनों ने आदिशक्ति का स्मरण किया। उसी समय क्षीरसागर की दिव्य तरंगों से एक अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ। वह प्रकाश हजारों चंद्रमाओं के समान उज्ज्वल था। उस तेज से रजतमत्स्येश्वरी त्रिलोचना प्रकट हुईं।
उनका प्रथम मुख करुणा का, द्वितीय मुख ज्ञान का और तृतीय मुख दिव्य शक्ति का प्रतीक था। उनके पीछे दिव्य प्रभामंडल चमक रहा था और वे विशाल रजत मत्स्य पर आरूढ़ थीं। जैसे ही देवी समुद्र में उतरीं, उनके चरणों के स्पर्श से जल पुनः पवित्र होने लगा।
तिमिरोदक ने देवी को देखकर समुद्र में भयंकर तूफान उत्पन्न किया। विशाल लहरें उठीं और आकाश अंधकार से भर गया। तब देवी के तीनों मुखों से तीन दिव्य प्रकाशधाराएँ निकलीं। पहली धारा ने अंधकार को नष्ट किया, दूसरी ने विषैले जल को अमृततुल्य बना दिया और तीसरी ने दैत्य की समस्त मायाशक्ति को समाप्त कर दिया।
अंततः देवी ने अपने दिव्य त्रिशूल से तिमिरोदक का अभिमान भंग कर उसे परास्त किया। उसी क्षण समुद्र पुनः शांत हो गया और देवताओं ने पुष्पवर्षा कर देवी की स्तुति की।
तब ऋषियों ने यह स्तोत्र गाया—
रजताभां त्रिमुखीं देवीं मत्स्यारूढां मनोहराम्।
त्रैलोक्यपालिनीं वन्दे सर्वमङ्गलकारिणीम्॥
शङ्खचक्रत्रिशूलाढ्यां चन्द्रकोटिसमप्रभाम्।
भक्तानुग्रहदात्रीं तां मत्स्येश्वरीं नमाम्यहम्॥
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