. “अमर प्रेम”
वृन्दावन की सांझ थी। यमुना का जल चाँदी-सा चमक रहा था, कदम्ब की डालियाँ मन्द हवा में झूम रही थीं, और कहीं दूर बाँसुरी की धुन मन को खींच रही थी…......
राधा उस शिला पर बैठी थीं, दृष्टि आकाश में, पर मन कहीं और........ उसी धुन में, उसी प्रियतम में।
वो धुन कोई साधारण स्वर नहीं थी, वह स्वयं श्याम का आह्वान था।
तभी पीछे से एक कोमल स्वर आया......... “राधे”.....
राधा ने मुड़कर देखा....... श्रीकृष्ण खड़े थे, अधरों पर मुस्कान, आँखों में अनन्त प्रेम।
राधा ने कहा—‘श्याम ! तुम हर बार बाँसुरी बजाकर मुझे बुलाते हो....… पर क्या तुम जानते हो, मैं तुम्हें बिना बुलावे भी हर क्षण तुम्हारी बाँसुरी की मधुर तान सुनती हूँ ?’
कृष्ण मुस्कुराए और पास आकर बोले–‘राधे ! बाँसुरी तो बहाना है…... तुम्हें बुलाने का। सच तो यह है कि तुम तो मेरे हृदय में ही बसती हो, तुम्हें कहाँ से बुलाऊँ ?’
राधा की आँखें नम हो गईं–‘तो फिर यह विरह क्यों, श्याम ? जब तुम पास होते हो, समय तीव्र गति से दौड़ जाता है…... और जब दूर जाते हो, हर पल युग बन जाता है।’
कृष्ण ने धीरे से राधा का हाथ थामा–‘यह विरह ही तो हमारे प्रेम की गहराई है, राधे! मिलन तो क्षणिक है, पर विरह….. वही प्रेम को अनन्त बनाता है।’
कुछ पल दोनों मौन रहे। यमुना भी जैसे ठहर गई हो। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। फिर कृष्ण ने बाँसुरी राधा के हाथ में दे दी–‘आज तुम बजाओ.......’
राधा ने मुस्कुराकर कहा–‘मैं कैसे बजाऊँ, श्याम ? इसमें तो तुम्हारी प्राण-धारा बहती है।’
कृष्ण ने उत्तर दिया–‘राधे, तुम ही तो मेरी प्राण हो…....’
और उस क्षण, न राधा रही, न कृष्ण..... बस प्रेम रह गया…... जो न शब्दों में बंधा, न समय में।
कहते हैं उस दिन से वृन्दावन में जब भी बाँसुरी बजती है, उसमें केवल कृष्ण का स्वर नहीं, राधा का हृदय भी गूँजता है....
– चन्द्र प्रकाश शर्मा
० ० ०
॥जय जय श्री राधे॥
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#🤗जया किशोरी जी🕉️