मैंने अनेक लोगों की पोस्ट देखीं, पढ़ी, जिनमें आकर्षण, पसंद, चाहत और अंततः प्रेम की चर्चा होती है। पर अक्सर इन सभी भावनाओं को एक ही मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में इनमें गहरा अंतर है।
आकर्षण आँखों से शुरू होता है,
पसंद स्वभाव से जुड़ती है,
चाहत पाने की इच्छा जगाती है,
लेकिन
प्रेम इन सबसे आगे जाकर स्वीकार, विश्वास, सम्मान और समर्पण बन जाता है। प्रेम केवल इन भावनाओं का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि उनसे कहीं अधिक व्यापक और गहरा अनुभव है। प्रेम करने की क्षमता मनुष्य को जन्मजात प्राप्त होती है।
आकर्षण कहता है—"तुम अच्छे लगते हो।"
पसंद कहती है—"तुम्हारा साथ अच्छा लगता है।"
चाहत कहती हैं _"तुम मिल जाओ बस" लेकिन
प्रेम कहता है—"तुम जैसे भी हो,
तुम्हारी खुशी और सम्मान ही
मेरे अपने होने का सबसे बड़ा कारण है।"
आकर्षण पल भर की चमक है,
पसंद कुछ लम्हों की मुस्कान।
चाहत एक मुलाकात की खुशी। मगर
प्रेम वह दीप है जो हर अँधेरे में भी जलता रहता है,
न रूप से बँधता है, न समय से बदलता है।
जो आत्मा से जुड़ जाए, वही सच्चा प्रेम कहलाता है।
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