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Yogesh Rajput
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भोजन, भाव और भगवान: आखिर महारानी कौशल्या स्वयं क्यों पकाती थीं भोजन? रामायण में एक बहुत ही गूढ़ प्रसंग आता है। अयोध्या के राजा दशरथ 'चक्रवर्ती सम्राट' थे। उनके महल में दास-दासियों की कोई गिनती नहीं थी। एक इशारे पर छप्पन भोग तैयार हो सकते थे। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि महारानी कौशल्या स्वयं अपने हाथों से रसोड़े में जाकर भोजन बनाती थीं। आखिर क्यों? क्या सेवकों की कमी थी? नहीं! इसके पीछे एक बहुत गहरा आध्यात्मिक विज्ञान छिपा है— "जैसा खाए अन्न, वैसा होवे मन।" 🌾 अन्न का विज्ञान: शास्त्र कहते हैं कि हम जो अन्न ग्रहण करते हैं, पेट में जाकर उसके तीन भाग होते हैं: * स्थूल भाग (Waste): जिससे शरीर का मल बनता है। * मध्यम भाग (Body): जिससे शरीर में रक्त और मांस बनता है। * सूक्ष्म भाग (Mind): यह सबसे महत्वपूर्ण है। भोजन का सूक्ष्म हिस्सा हमारे 'मन और बुद्धि' का निर्माण करता है। इसीलिए, महारानी कौशल्या जानती थीं कि यदि रसोइए का मन दूषित हुआ, तो वह भोजन दूषित हो जाएगा और उसे खाने वाले (राम और दशरथ) के विचार भी प्रभावित होंगे। इसलिए अन्न को कभी भी अपवित्र या क्रोधित हाथों से नहीं पकाना चाहिए। अब चलते हैं द्वापर युग में, गोकुल की ओर। प्रातःकाल का समय है। मैया यशोदा ने स्नान किया है, शुद्ध रेशमी वस्त्र धारण किए हैं और दधि-मंथन (दही बिलोने) में लीन हैं। उनके पास भी हज़ारों गोपिकाएं हैं, लेकिन आज वे स्वयं कन्हैया के लिए माखन निकाल रही हैं। यहाँ एक बहुत बड़ा सूत्र है: * जब हम घर-परिवार के लिए काम करते हैं, तो वह 'व्यवहार' (Duty) है। * लेकिन जब वही काम हम परमात्मा की प्रसन्नता के लिए करते हैं, तो वह 'भक्ति' बन जाता है। यशोदा जी का हर एक खिंचाव, मथनी की हर आवाज़ में बस एक ही भाव है— "मेरे लल्ला को माखन अच्छा लगता है।" यह पुष्टि भक्ति है। यशोदा जी के दर्शन साक्षात 'मुक्ति' के दर्शन हैं। यह दधि-मंथन केवल दही बिलोना नहीं है, यह एक प्रतीक है: * मटका: हमारा हृदय है। * दही: हमारे सांसारिक विषय-भोग हैं (जो शुरू में मीठे लगते हैं, पर बाद में खट्टे हो जाते हैं)। * मंथन: विवेक और वैराग्य है। जब जीव संसार रूपी दही को विवेक की मथनी से मथता है, तभी उसमें से 'प्रेम रूपी माखन' निकलता है। भगवान को वह खट्टा दही (संसार) नहीं चाहिए, उन्हें तो वह सार तत्व (प्रेम/माखन) चाहिए। 👶 जब कन्हैया जागे... आज कन्हैया को किसी ने जगाया नहीं। आज मैया के हृदय का प्रेम इतना उफान पर था कि उस प्रेम की तरंगों ने बालकृष्ण को जगा दिया। कन्हैया आँख मलते हुए आए। उन्होंने देखा, माँ अपने काम में इतनी लीन हैं कि उन्हें बेटे की सुध ही नहीं। कन्हैया पीछे से आए और माँ की साड़ी का आँचल पकड़कर खींच लिया। "मैया! ओ मैया! भूख लगी है, पहले मुझे दूध पिला दे।" यहाँ साधना की पराकाष्ठा देखिए: * यशोदा (साधक) हैं। * दधि-मंथन (साधन) है। * कृष्ण (साध्य/लक्ष्य) हैं। साधक (यशोदा) अपने साधन (मंथन) में इतनी तन्मय हो गईं, इतनी डूब गईं कि साध्य (ईश्वर) को खुद चलकर आना पड़ा। श्रीकृष्ण का अर्थ है— आनंद। वह आनंद हमारे हृदय में ही सोया हुआ है (सुषुप्त अवस्था)। हम उसे बाहर संसार की जड़ वस्तुओं में ढूंढ रहे हैं, इसलिए मिल नहीं रहा। जिस दिन हम यशोदा की तरह निष्काम होकर, प्रेम से उसे पुकारेंगे, या अपने कर्म को ही पूजा बना लेंगे, उस दिन वह सोता हुआ 'आनंद' (ईश्वर) जाग उठेगा। अगर तुम कन्हैया के पीछे पड़ जाओ, तो वह भाग सकता है। लेकिन अगर तुम उसकी भक्ति में, उसके कार्य में डूब जाओ, तो उसे विवश होकर तुम्हारे पास आना ही पड़ेगा। 🙏🏻जय श्री कृष्ण🙏 #✍️🌺༺꧁ आज का दिन ꧂༻🌺✍️ #❤༺꧁ My Love ꧂༻❤ #🚩༺꧁ सनातन धर्म ꧂༻🚩 #😍स्टेटस की दुनिया🌍 #😏 रोचक तथ्य
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