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और पूरे शरीर में भयंकर जलन होने लगी।
शीतला माता इधर-उधर भागते हुए चिल्लाने लगीं—
“हाय! मैं जल गई, मेरा शरीर तप रहा है। कोई मेरी सहायता करो।”❤️
परंतु उस गाँव में किसी ने उनकी सहायता नहीं की।
उसी समय अपने घर के बाहर एक कुम्हारन बैठी हुई थी। उसने देखा कि एक बूढ़ी माई बहुत बुरी तरह जल गई है। उसके पूरे शरीर पर छाले पड़ गए हैं और वह जलन सहन नहीं कर पा रही है।❤️
कुम्हारन ने करुणा से कहा—
“माँ, आप यहाँ आकर बैठ जाइए। मैं आपके ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ।”❤️
उस कुम्हारन ने बूढ़ी माई के शरीर पर खूब ठंडा पानी डाला और फिर बोली—❤️
“माँ, मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी और थोड़ा दही रखा है। आप दही-राबड़ी खा लीजिए।”
जब बूढ़ी माई ने ठंडी ज्वार के आटे की राबड़ी और दही खाया, तो उनके शरीर को ठंडक मिली।❤️
फिर कुम्हारन बोली—
“माँ, आपके बाल बिखरे हुए हैं। आइए, मैं आपकी चोटी गूँथ देती हूँ।”❤️
जब वह कंघी कर रही थी, तभी उसकी दृष्टि बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी। उसने देखा कि वहाँ एक आँख छिपी हुई है। यह देखकर वह डर के मारे भागने लगी।
तभी बूढ़ी माई ने कहा—
“रुक जा बेटी, मत डर। मैं कोई भूत-प्रेत नहीं हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो धरती पर यह देखने आई थी कि कौन मुझे मानता है और कौन मेरी पूजा करता है।”
इतना कहते ही माता अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गईं—चार भुजाओं वाली, हीरे-जवाहरात के आभूषण धारण किए हुए और सिर पर स्वर्ण मुकुट लगाए हुए।
माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब वह इस माता को कहाँ बैठाए, क्योंकि वह बहुत गरीब थी। माता ने उसके मन की बात जान ली और बोलीं—
“बेटी, तू किस सोच में पड़ गई है?”
कुम्हारन ने हाथ जोड़कर, आँखों में आँसू भरते हुए कहा—
“माँ, मेरे घर में चारों ओर दरिद्रता फैली हुई है। न मेरे पास चौकी है, न बैठने का आसन। मैं आपको कहाँ बैठाऊँ?”
यह सुनकर शीतला माता प्रसन्न हुईं। उन्होंने कुम्हारन के घर के बाहर खड़े गधे पर बैठकर, एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में डलिया ली। माता ने झाड़ू से उस कुम्हारन के घर की सारी दरिद्रता समेटकर डलिया में भर दी और उसे दूर फेंक दिया।🙏
फिर माता ने कहा—🙏
“बेटी, मैं तेरी सच्ची भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। अब तू मुझसे कोई भी वरदान माँग ले।”
कुम्हारन ने हाथ जोड़कर कहा—🙏
“माँ, मेरी इच्छा है कि आप इसी डुंगरी गाँव में स्थापित होकर यहीं निवास करें। जैसे आपने मेरे घर की दरिद्रता झाड़ू से दूर की है, वैसे ही जो भी व्यक्ति होली के बाद आने वाली सप्तमी को श्रद्धा-भाव से आपकी पूजा करे, आपको ठंडा जल, दही और बासी ठंडा भोजन अर्पित करे—आप उसके घर की दरिद्रता भी दूर करना। आपकी पूजा करने वाली स्त्रियों का अखंड सुहाग बनाए रखना और उनकी गोद सदैव भरी रखना।🙏
साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी के दिन नाई के यहाँ बाल न कटवाए, धोबी को कपड़े न दे, ठंडा जल, नारियल और फूल अर्पित कर परिवार सहित ठंडा-बासी भोजन करे—उसके व्यापार और काम-धंधे में कभी दरिद्रता न आए।”
माता ने कहा🙏
“तथास्तु बेटी। तूने जो भी वरदान माँगे हैं, मैं सब देती हूँ। साथ ही मैं तुझे यह आशीर्वाद देती हूँ कि धरती पर मेरी पूजा का मुख्य अधिकार केवल कुम्हार जाति को ही होगा।”
उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता की स्थापना हुई और उस गाँव का नाम पड़ा शील की डुंगरी।
शील की डुंगरी भारत का एकमात्र मुख्य शीतला माता मंदिर माना जाता है। वहाँ शीतला सप्तमी के अवसर पर विशाल मेला भरता है।🙏
कहा जाता है कि इस कथा का पाठ करने से घर की दरिद्रता का नाश होता है और सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।❤️🙏
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