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“रानी लक्ष्मीबाई का पैतृक गाँव धावड़शी”
1857 के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का पैतृक गाँव (मूल मायका) महाराष्ट्र के सातारा जिले का धावड़शी (Dhawadshi) है।
दस साल पहले इस गांव पहुंचने पर मुझे रानी लक्ष्मीबाई का तांबे वाड़ा ढूंढने में दिक्कत हुई क्योंकि वहां न कोई बोर्ड लिखा था,न कोई इतिहास की जानकारी लिखी थी।
गांव के चौराहे पर भविष्य के कीर्तिमान नेताओं के और उनके बच्चों के जन्म दिवस शुभकामना के पोस्टर जरूर लगाए गए थे।
मंदिर के पुजारी ने तांबे वाड़ा पहुंचा दिया। रानी लक्ष्मी बाई के रिश्तेदार वहां अपना जीवन यापन करते है। बहुत गरीब मध्य वर्गीय परिवार। घर का खस्ता हाल था। कहीं दीवारे ढह गई थी कही पुराने ईंटों ने अपना स्थान छोड़कर ज़मीन के साथ शरण ली थी ।
घरवालों ने वह जगह दिखाई जहां रानी लक्ष्मी बाई का बचपन गुजरा था वहां अब गाय भैंस का तबेला था। यह सब देखकर बहुत दुःख हुआ। घरवालों ने जलपान का प्रबंध किया था ।
रानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे और माता भागीरथीबाई तांबे मूल रूप से धावड़शी गाँव के निवासी थे। बाद में व्यावसायिक कारणों से यह परिवार उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) में बस गया, जहाँ 19 नवंबर 1835 को रानी लक्ष्मीबाई (बचपन का नाम: मणिकर्णिका या मनु) का जन्म हुआ।
धावड़शी गाँव और 'तांबे वाड़ा' (तांबे हवेली) का विस्तृत इतिहास इस प्रकार है:
📜 तांबे वाड़ा का ऐतिहासिक महत्व और निर्माण
कोंकण से धावड़शी आगमन: तांबे परिवार मूल रूप से कोंकण (रत्नागिरी) का रहने वाला था। इस परिवार के पूर्वज विष्णुराव तांबे, सातारा के प्रसिद्ध संत श्री ब्रह्मेंद्रस्वामी धावड़शीकर के अनन्य भक्त थे। स्वामी जी की सेवा में रहने के लिए वे कोंकण छोड़कर सातारा के पास धावड़शी आ गए और वहाँ अपना 'तांबे वाडा' (हवेली) बनवाया।
पराक्रमी कृष्णाजी तांबे: विष्णुराव तांबे के पुत्र कृष्णराव (कृष्णाजी) तांबे (जन्म 1719) एक महान विद्वान और शूरवीर योद्धा थे। उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर बाजीराव पेशवा (प्रथम) ने उन्हें पुणे बुलाया। कृष्णाजी ने बाजीराव पेशवा के साथ प्रसिद्ध 'बुंदेलखंड अभियान' में अद्भुत वीरता दिखाई। इसके बाद उन्हें हमीरपुर और बांदा की सूबेदारी सौंपी गई।
पुणे में दूसरा तांबे वाडा: धावड़शी की हवेली के बाद, कृष्णाजी तांबे के पराक्रम से खुश होकर बाजीराव पेशवा ने उन्हें पुणे में भी एक 'तांबे वाडा' उपहार स्वरूप बनवाकर दिया था।
रानी लक्ष्मीबाई का संबंध: इसी पराक्रमी तांबे घराने में आगे चलकर मोरोपंत तांबे का जन्म हुआ, जिनकी सुपुत्री क्रांतिदेवता मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई) बनीं। इसलिए इतिहास प्रेमियों के लिए यह हवेली एक अत्यंत पवित्र 'प्रेरणा स्थल' है।
🏛️ वर्तमान स्थिति और भव्य स्मारक की मांग
सद्यस्थिति: समय के साथ मूल तांबे वाड़ा का काफी हिस्सा ढह चुका है और अब इसके अवशेष ही बचे हैं। लेकिन गाँव का इतिहास आज भी रानी लक्ष्मीबाई की यादों को संजोए हुए है।
राष्ट्रीय स्मारक की मांग: धावड़शी गाँव में रानी लक्ष्मीबाई के इस पैतृक निवास स्थान पर एक भव्य राष्ट्रीय स्मारक बनाने
और इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने की मांग स्थानीय ग्रामीणों और इतिहासकारों द्वारा लगातार की जा रही है।
📍 धावड़शी गाँव की अन्य विशेषताएं
भौगोलिक स्थिति: यह गाँव सातारा शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर मेरुलिंग पर्वत श्रृंखला के बीच बसा एक खूबसूरत और ऐतिहासिक स्थान है।
ऐतिहासिक भार्गवराम (परशुराम) मंदिर: यहाँ काले पत्थरों को तराशकर बनाया गया एक अद्भुत परशुराम मंदिर है, जिसके निर्माण में छत्रपति शाहू महाराज का विशेष योगदान था।
ब्रह्मेंद्रस्वामी समाधी: पेशवा काल की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले परमहंस ब्रह्मेंद्रस्वामी की समाधि भी इसी गाँव में स्थित है।
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जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू ख़ुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
~ सुभद्रा कुमारी चौहान
अप्रतिम शौर्य की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि 🙏
#झांसी की रानी लक्ष्मीबाई #रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि #🌸रानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस 🙏 #💐रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि🙏🕯️