जय श्री राम
572 Posts • 635K views
sn vyas
561 views
#जय श्री राम 🌺 राम से बड़ा राम का नाम: भक्ति, मर्यादा और महामंत्र की अलौकिक गाथा 🌺 भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नाम केवल उच्चारण नहीं, चेतना का द्वार है। जहाँ शक्ति (बल) की सीमा होती है, वहीं भक्ति (नाम) की कोई सीमा नहीं। “राम से बड़ा राम का नाम”—यह कथन केवल भावुक उद्घोष नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का सिद्धांत है। इसी सिद्धांत को सजीव करती है यह दिव्य गाथा, जिसमें मर्यादा, गुरु-आज्ञा, वचन और भक्ति—चारों एक साथ परीक्षा में उतरते हैं। ⸻ 🌸 अयोध्या का दरबार: भव्यता के बीच भक्ति की निश्चलता अयोध्या का राजदरबार—रत्नजटित सिंहासन, मंत्रोच्चार, ऋषि-मुनियों की उपस्थिति और बीचों-बीच मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। पर इस वैभव से निरपेक्ष, प्रभु के चरणों में हनुमान—ऐसे लीन कि देह का भान भी शेष नहीं। यही भक्ति की चरम अवस्था है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई तीसरा नहीं होता। ⸻ 1️⃣ अनजाने में हुआ अपराध—और लीला का आरंभ महर्षि वशिष्ठ का आगमन हुआ। मर्यादा के अनुसार पूरा दरबार उठा, स्वयं श्रीराम भी। किंतु हनुमान समाधि में थे—न देखा, न अभिवादन किया। वशिष्ठ त्रिकालदर्शी थे; वे जानते थे कि यह अपराध अज्ञानजन्य है। फिर भी आज उद्देश्य दंड नहीं, सत्य का प्रकाशन था—इसलिए उन्होंने क्रोध का अभिनय किया। ⸻ 2️⃣ गुरु का प्रश्न और राम का वचन—धर्मसंकट की घड़ी वशिष्ठ का प्रश्न कठोर था—“गुरु-अवमानना का दंड?” राम का उत्तर और भी कठोर—“आप बताइए गुरुदेव।” निर्णय आया—मृत्युदंड। फिर वह शर्त—अपराधी राम को प्राणों से प्रिय है; दंड स्वयं राम देंगे। रघुकुल-रीति ने मोह पर विजय पाई। राम ने संकल्प लिया—सूर्यास्त से पहले दंड होगा। अपराधी का नाम आया—हनुमान। दरबार मौन। राम का हृदय काँपा, पर वचन अडिग रहा। ⸻ 3️⃣ माता अंजनी का रहस्य—नाम की दीक्षा हनुमान निडर थे, पर मन व्यथित—“प्रभु के हाथों मृत्यु?” माता अंजनी ने स्मरण कराया—जन्म की दीक्षा। उन्होंने शिव से पाया राम-नाम और वही घुट्टी बनकर हनुमान को पिलाया था। माता का उपदेश— “पुत्र! रूप सीमित है, नाम असीम। सरयू तट पर बैठ, केवल ‘राम’ का जाप कर। नाम स्वयं राम से भी अधिक शक्तिशाली है।” यहाँ स्पष्ट होता है—नाम कोई शब्द नहीं, स्वयं ईश्वर की सजीव सत्ता है। ⸻ 4️⃣ सरयू तट का महासंग्राम—राम बनाम राम-नाम एक ओर श्रीराम—कोदंड धारण किए, आँखों में करुणा और कर्तव्य की बेड़ियाँ। दूसरी ओर हनुमान—पद्मासन, नेत्र बंद, मुख से अखंड—“राम… राम… राम…” पहला बाण—फूलों-सा बिखर गया। दूसरा—नाम-कवच से टकराकर लौट आया। अमोघ बाण—नतमस्तक होकर गिर पड़े। हनुमान को प्रहार का भान नहीं; वे नाम-रस में डूबे थे। अंततः ब्रह्मास्त्र उठाने का क्षण—और तभी गुरु का हस्तक्षेप। ⸻ 5️⃣ गुरु का रहस्योद्घाटन—नाम की महिमा वशिष्ठ बोले— “हे राघव! तुमने शक्ति का प्रयोग किया, हनुमान ने भक्ति का। रूप सीमित है, नाम अनंत। जो नाम का आश्रय ले, उसे स्वयं राम भी नहीं मार सकते।” यहाँ धर्म का सार उद्घाटित हुआ—ईश्वर की भी सीमा है, पर ईश्वर-नाम की नहीं। ⸻ 🔱 दार्शनिक सार—क्यों बड़ा है राम-नाम? • रूप समय और मर्यादा में बंधा है • नाम कालातीत और सार्वभौमिक है • शक्ति बाह्य है, भक्ति अंतःस्थ • अस्त्र रोक सकते हैं शरीर, नाम शुद्ध करता है चेतना इसलिए— “जहाँ बल थकता है, वहाँ नाम चलता है।” ⸻ 📜 तुलसी का प्रमाण—लोक और वेद का सेतु गोस्वामी तुलसीदास ने इस सत्य को अमर किया— “राम भरोसो राम बल, राम नाम बिस्वास। सुमिरत सुभ मंगल कुसल, मांगत तुलसीदास॥” अर्थात—जिसे राम-नाम पर विश्वास है, उसका मंगल कोई नहीं रोक सकता। ⸻ 🌼 उपसंहार यह गाथा हमें सिखाती है कि— • मर्यादा अनिवार्य है • गुरु-आज्ञा सर्वोपरि है • पर भक्ति सर्वोच्च है और अंततः— राम से बड़ा राम का नाम है।
14 likes
9 shares