ज़िन्दगी की तलाश

ज़िन्दगी की तलाश

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ज़िन्दगी की तलाश

"जिंदगी की असली कड़वी सच्चाई - .....8 मकान जले तो बीमा ले सकते है, सपने जले तो क्या किया जाये। आसमान बरसे तो छाता ले सकते है, आँखे बरसे तो क्या किया जाए। शेर दहाड़े तो भाग सकते है, अहंकार दहाड़े तो क्या किया जाए। काँटा चुभे तो निकाल सकते हैं। कोई बात चुभे तो क्या किया जाए, दर्द हो तो गोली ले सकते है, वेदना हो तो या किया जाये। एक अच्छा मित्र एक दवा जैसा ही होता है परखता तो वक्त है, कभी हालात के रूप में, कभी मजबूरियों के रूप में। भाग्य तो बस आपकी काबिलियत देखता है। जीवन में कभी किसी से अपनी तुलना मत करें, आप जैसे हैं, सर्वश्रेष्ठ है। उलझनें हैं बहुत, सुलझा लिया करती हूँ फोटो खिचवाते वक्त मैं अक्सर, मुस्कुरा लिया करती हूँ, क्यों नुमाइश करू मैं अपने माथे पर शिकन की। मैं अक्सर मुस्कुरा के इन्हें मिटा दिया करती हूँ। जब लड़ना है खुद को खुद ही से, इसलिए हार और जीत में कोई फर्क नहीं रखती हूँ। हरु या जीतू कोई रंज नहीं है। कभी खुद को जिता देती हूँ। कभी खुद ही जीत जाती हूँ। इसलिए मुस्कुरा लिया करती हूँ। बोझ कितना भी हो लेकिन, कभी उफ तक नहीं करता, कंधा बाप का साहब बड़ा मजबूत होता है। औरतों की इज्जत किसान की जिंदगी, और सैनिक की जान इनको छोड़कर, इस देश में सब कुछ महँगा है। कभी- कभी हम ग़लत नहीं होते, लेकिन हमारे पास वो शब्द ही नही होते, जो हमें सही साबित कर सकें। राधे राधे।
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1 months ago
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ज़िन्दगी की तलाश

मैं उम्र बताना नहीं चाहती हूँ, जब भी यह सवाल कोई पूछता है, मैं सोच में पड़ जाती हूँ, बात यह नहीं, कि मैं, उम्र बताना नहीं चाहती हूँ, बात तो यह है, की, मैं हर उम्र के पड़ाव को, फिर से जीना चाहती हूँ, इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ, मेरे हिसाब से तो उम्र, बस एक संख्या ही है, जब मैं बच्चो के साथ बैठ, कार्टून फिल्म देखती हूँ, उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ, उन्ही की तरह खुश होती हूँ, मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ, और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ, तब मैं किशोरी बन जाती हूँ, जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ, उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ, दरअसल मैं एकसाथ, हर उम्र को जीना चाहती हूँ, इसमें गलत ही क्या है? क्या कभी किसी ने, सूरज की रौशनी, या, चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी? या फिर खल खल करती, बहती नदी की धारा से उम्र पूछी? फिर मुझसे ही क्यों? बदलते रहना प्रकृति का नियम है, मैं भी अपने आप को, समय के साथ बदल रही हूँ, आज के हिसाब से, ढलने की कोशिश कर रही हूँ, कितने साल की हो गयी मैं, यह सोच कर क्या करना? कितनी उम्र और बची है, उसको जी भर जीना चाहती हूँ, एकदिन सब को यहाँ से विदा लेना है, वह पल, किसी के भी जीवन में, कभी भी आ सकता है, फिर क्यों न हम, हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ले, हर उम्र को फिर से, एक बार जी ले…
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4 months ago
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