धार्मिक अनसुनी कथा सागर
बद्रीनाथ धाम की कथा….. एक समय की बात है,भगवान् विष्णु के मन में तप करने की इच्छा हुई। भगवान् विष्णु अपने तप करने हेतु स्थान खोजने लगे । खोजते-खोजते,भगवान् विष्णु अलकनंदा के समीप की जगह (केदार भूमि) में,पहुंच गये। उन्हें ये जगह बहुत भायी। नील कंठ पर्वत के समीप के स्थान (चरणपादुका ) में,भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। इसके पश्चात,भगवान विष्णु बाल रूप में,गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप में क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का ह्रदय द्रवित हो उठा । माता पार्वती और भगवान् शिव स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पुछा की,हे बालक ! तुम्हे क्या चहिये? बालक ने तप करने हेतु वो जगह मांगी। भगवान् शिव ने तपस्या करने के लिय वह जगह बालक को दे दिया। इसके पश्चात भगवान विष्णु वहाँ तपस्या करने लगे। जब भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे। तब बहुत ही ज्यादा हिमपात होने लगा था। और भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का ह्रदय द्रवित हो गया। उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बद्री) के वृक्ष का रूप ले लिया । समस्त हिमपात को अपने ऊपर सहने लगी। और भगवान विष्णु को धुप,वर्षा और हिमपात से बचाने लगी। कई वर्षों बाद जब भगवान् विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया । तब भगवान् विष्णु ने देखा की माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा की हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है, इसलिए इस धाम पर मेरी तुम्हारे साथ पूजा होगी। क्यूंकि तुमने मेरी रक्षा “बद्री” (बेर के वृक्ष) रूप में किया है। इसलिए आज से मुझे “बद्री के नाथ”,बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। तब से इस धाम का नाम बद्रीनाथ है। कैसे पहुंचे बद्रीनाथ बद्रीनाथ हाईवे पर कई स्लाइडिंग जोन बाधा बनते रहे हैं। इसमें से जहां सिरोहबगड़ नामक स्लाइडिंग जोन का ट्रीटमेंट सरकार करा रही है और इसके बाधित होने पर इसका बाईपास तैयार किया जा रहा है। वहीं लामबगड़ में टनल के जरिए यात्रा का बाईपास बनाने की बात सरकार कर रही है। इस बार सरकार ने इस स्लाइडिंग जोन के दोनों तरफ सप्लाई के लिए मशीनें तैनात करी हैं। पूरे चारधाम यात्रा में 271 संवेदनशील क्षेत्रों पर भी प्रशासन सावधानी बरतने की बात कह रहा है। बद्रीनाथ तक गाड़ियां जाती हैं, इसलिए यहां मौसम अनुकूल होने पर पैदल नहीं जाना पड़ता। बद्रीनाथधाम को बैकुण्ठ धाम भी कहा जाता है। बैकुण्ठधाम जाने के लिए ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, गोविन्दघाट होते हुए पहुंचा जाता है।
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12 महीने पहले
बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आ रही थी, रसोई का नल चल रहा है, माँ रसोई में है.... तीनों बहुऐं अपने-अपने कमरे में सोने जा चुकी, माँ रसोई में है... माँ का काम बकाया रह गया था,पर काम तो सबका था; पर माँ तो अब भी सबका काम अपना ही मानती है.. दूध गर्म करके, ठण्ड़ा करके, जावण देना है, ताकि सुबह बेटों को ताजा दही मिल सके; सिंक में रखे बर्तन माँ को कचोटते हैं, चाहे तारीख बदल जाये,सिंक साफ होना चाहिये.... बर्तनों की आवाज़ से बहू-बेटों की नींद खराब हो रही है; बड़ी बहू ने बड़े बेटे से कहा; "तुम्हारी माँ को नींद नहीं आती क्या? ना खुद सोती है और ना ही हमें सोने देती है" मंझली ने मंझले बेटे से कहा; "अब देखना सुबह चार बजे फिर खटर-पटर चालू हो जायेगी, तुम्हारी माँ को चैन नहीं है क्या?" छोटी ने छोटे बेटे से कहा; "प्लीज़ जाकर ये ढ़ोंग बन्द करवाओ कि रात को सिंक खाली रहना चाहिये" माँ अब तक बर्तन माँज चुकी थी झुकी कमर, कठोर हथेलियां, लटकी सी त्वचा, जोड़ों में तकलीफ, आँख में पका मोतियाबिन्द, माथे पर टपकता पसीना, पैरों में उम्र की लड़खडाहट मगर, दूध का गर्म पतीला वो आज भी अपने पल्लू से उठा लेती है, और... उसकी अंगुलियां जलती नहीं है, क्योंकि वो माँ है । दूध ठण्ड़ा हो चुका, जावण भी लग चुका, घड़ी की सुईयां थक गई, मगर... माँ ने फ्रिज में से भिण्ड़ी निकाल ली और काटने लगी; उसको नींद नहीं आती है, क्योंकि वो माँ है! कभी-कभी सोचता हूं कि माँ जैसे विषय पर लिखना,बोलना,बताना,जताना क़ानूनन बन्द होना चाहिये; क्योंकि यह विषय निर्विवाद है, क्योंकि यह रिश्ता स्वयं कसौटी है! रात के बारह बजे सुबह की भिण्ड़ी कट गई, अचानक याद आया कि गोली तो ली ही नहीं; बिस्तर पर तकिये के नीचे रखी थैली निकाली, मूनलाईट की रोशनी में गोली के रंग के हिसाब से मुंह में रखी और गटक कर पानी पी लिया... बगल में एक नींद ले चुके बाबूजी ने कहा;"आ गई" "हाँ,आज तो कोई काम ही नहीं था" -माँ ने जवाब दिया, और लेट गई,कल की चिन्ता में पता नहीं नींद आती होगी या नहीं पर सुबह वो थकान रहित होती हैं, क्योंकि वो माँ है! सुबह का अलार्म बाद में बजता है, माँ की नींद पहले खुलती है; याद नहीं कि कभी भरी सर्दियों में भी, माँ गर्म पानी से नहायी हो उन्हे सर्दी नहीं लगती, क्योंकि वो माँ है! अखबार पढ़ती नहीं,मगर उठा कर लाती है; चाय पीती नहीं,मगर बना कर लाती है; जल्दी खाना खाती नहीं,मगर बना देती है, क्योंकि वो माँ है! माँ पर बात जीवनभर खत्म ना होगी, शेष अगली बार... और हाँ,अगर पढ़ते पढ़ते आँखों में आँसु आ जाये तो कृपया खुलकर रोइये और आंसू पोछ कर एक बार अपनी माँ को जादू की झप्पी जरूर दीजिये, क्योंकि वो किसी और की नही,आपकी ही माँ है! 🙂 माँ
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1 साल पहले
🔴तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई सचमुच तुम्हें प्रेम करता है? आदमी के व्यक्तित्व के तीन तल हैं: उसका शरीर विज्ञान, उसका शरीर, उसका मनोविज्ञान, उसका मन और उसका अंतरतम या शाश्वत आत्मा। प्रेम इन तीनों तलों पर हो सकता है लेकिन उसकी गुणवत्ताएं अलग होंगी। शरीर के तल पर वह मात्र कामुकता होती है। तुम भले ही उसे प्रेम कहो क्योंकि शब्द प्रेम काव्यात्म लगता है, सुंदर लगता है। लेकिन निन्यानबे प्रतिशत लोग उनके सैक्स को प्रेम कहते हैं। सैक्स जैविक है, शारीरिक है। तुम्हारी केमिस्ट्री, तुम्हारे हार्मोन, सभी भौतिक तत्व उसमें संलग्न हैं। तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है। जरा सोचो, जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सैक्स बदलवा ले और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे? कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ केमिस्ट्री, सिर्फ हार्मोन। फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया? सिर्फ एक प्रतिशत लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं। कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास एक संवेदनशीलता होती है जो शरीर के पार देख सकती है। वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं। इसे एक बुनियादी नियम की तरह याद रखो: तुम जहां भी रहते हो उसके पार नहीं देख सकते। यदि तुम अपने शरीर में जीते हो, स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे। यह प्रेम का शारीरिक तल है। लेकिन संगीतज्ञ , चित्रकार, कवि एक अलग तल पर जीता है। वह सोचता नहीं, वह महसूस करता है। और चूंकि वह हृदय में जीता है वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है। सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं। यह विरल है। मैं कह रहा हूं शायद केवल एक प्रतिशत, कभी-कभार। दूसरे तल पर बहुत लोग क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं जबकि वह अत्यंत सुंदर है? लेकिन एक समस्या है: जो बहुत सुंदर है वह बहुत नाजुक भी है। वह हार्डवेयर नहीं है, वह अति नाजुक शीशे से बना है। और एक बार शीशा गिरा और टूटा तो इसे वापिस जोड़ने का कोई उपाय नहीं होता। लोग इतने गहरे जुड़ना नहीं चाहते कि वे प्रेम की नाजुक पर्तों तक पहुंचें, क्योंकि उस तल पर प्रेम अपरिसीम सुंदर होता है लेकिन उतना ही तेजी से बदलता भी है। भावनाएं पत्थर नहीं होतीं, वे गुलाब के फूलों की भांति होती हैं। इससे तो प्लास्टिक का फूल लाना बेहतर है क्योंकि वह हमेशा रहेगा, और रोज तुम उसे नहला सकते हो और वह ताजा रहेगा। तुम उस पर जरा सी फ्रेंच सुगंध छिड़क सकते हो। यदि उसका रंग उड़ जाए तो तुम उसे पुन: रंग सकते हो। प्लास्टिक दुनिया की सबसे अविनाशी चीजों में एक है। वह स्थिर है, स्थायी है; इसीलिए लोग शारीरिक तल पर रुक जाते हैं। वह सतही है लेकिन स्थिर है। कवि, कलाकार लगभग हर दिन प्रेम में पड़ते रहते हैं। उनका प्रेम गुलाब के फूल की तरह होता है। जब तक होता है तब तक इतना सुगंधित होता है, इतना जीवंत, हवाओं में, बारिश में सूरज की रोशनी में नाचता हुआ, अपने सौंदर्य की घोषणा करता हुआ, लेकिन शाम होते-होते वह मुरझा जाएगा, और उसे रोकने के लिए तुम कुछ नहीं कर सकते। हृदय का गहरा प्रेम हवा की तरह होता है जो तुम्हारे कमरे में आती है; वह अपनी ताज़गी, अपनी शीतलता लाती है, और बाद में विदा हो जाती है। तुम उसे अपनी मुट्ठी में बांध नहीं सकते। बहुत कम लोग इतने साहसिक होते हैं कि क्षण-क्षण जीएं, जीवन को बदलते रहें। इसलिए उन्होंने ऐसा प्रेम करने का सोचा है जिस पर वे निर्भर रह सकते हैं। मैं नहीं जानता तुम किस प्रकार का प्रेम जानते हो, शायद पहले किस्म का, शायद दूसरे किस्म का। और तुम भयभीत हो कि अगर तुम अपने अंतरतम में पहुंचो तो तुम्हारे प्रेम का क्या होगा? निश्चय ही वह खो जाएगा लेकिन तुम कुछ नहीं खोओगे। एक नए किस्म का प्रेम उभरेगा जो कि लाखों में एकाध व्यक्ति के भीतर उभरता है। उस प्रेम को केवल प्रेमपूर्णता कहा जा सकता है। पहले प्रकार के प्रेम को सैक्स कहना चाहिए। दूसरे प्रेम को प्रेम कहना चाहिए, तीसरे प्रेम को प्रेमपूर्णता कहना चाहिए: एक गुणावत्ता, असंबोधित; न खुद अधिकार जताता है, न किसी को जताने देता है। यह प्रेमपूर्ण गुणवत्ता ऐसी मूलभूत क्रांति है कि उसकी कल्पना करना भी अति कठिन है।♣️
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1 साल पहले
(((( अनोखी दवाई )))) . काफी समय से दादी की तबियत खराब थी . घर पर ही दो नर्स उन की देखभाल करतीं थीं . . डाक्टरों ने भी अपने हाथ उठा दिए थे और कहा था कि जो भी सेवा करनी है कर लीजिये . दवाइयां अपना काम नहीं कर रहीं हैं . . उसने घर में बच्चों को होस्टल से बुला लिया . काम के कारण दोनों मियां बीबी काम पर चले जाते . . दोनों बच्चे बार-बार अपनी दादी को देखने जाते . दादी ने आँखें खोलीं तो बच्चे दादी से लिपट गए . . 'दादी ! पापा कहते हैं कि आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं . हमें होस्टल का खाना अच्छा नहीं लगता . क्या आप हमारे लिए खाना बनाओगी ?' . नर्स ने बच्चों को डांटा और बाहर जाने को कहा . अचानक से दादी उठी और नर्स पर बरस पड़ीं . . 'आप जाओ यहाँ से . मेरे बच्चों को डांटने का हक़ किसने दिया है ? खबरदार अगर बच्चों को डांटने की कोशिश की !' . 'कमाल करती हो आप . आपके लिए ही तो हम बच्चों को मना किया . बार-बार आता है तुमको देखने और डिस्टर्ब करता है . आराम भी नहीं करने देता .' . 'अरे ! इनको देखकर मेरी आँखों और दिल को कितना आराम मिलता है तू क्या जाने ! ऐसा कर मुझे जरा नहाना है . मुझे बाथरूम तक ले चल .' . नर्स हैरान थी . . कल तक तो दवाई काम नहीं कर रहीं थी और आज ये चेंज . . सब समझ के बाहर था जैसे . नहाने के बाद दादी ने नर्स को खाना बनाने में मदद को कहा . पहले तो मना किया फिर कुछ सोचकर वह मदद करने लगी . . खाना बनने पर बच्चों को बुलाया और रसोई में ही खाने को कहा . . 'दादी ! हम जमीन पर बैठकर खायेंगे आप के हाथ से, मम्मी तो टेबल पर खाना देती है और खिलाती भी नहीं कभी .' . दादी के चेहरे पर ख़ुशी थी . वह बच्चों के पास बैठकर उन्हें खिलाने लगी . . बच्चों ने भी दादी के मुंह में निबाले दिए . दादी की आँखों से आंसू बहने लगे . . 'दादी ! तुम रो क्यों रही हो ? दर्द हो रहा है क्या ? मैं आपके पैर दबा दूं .' . 'अरे! नहीं, ये तो बस तेरे बाप को याद कर आ गए आंसू, वो भी ऐसे ही खाता था मेरे हाथ से . . पर अब कामयाबी का भूत ऐसा चढ़ा है कि खाना खाने का भी वक्त नहीं है उसके पास और न ही माँ से मिलने का टैम . 'दादी ! तुम ठीक हो जाओ, हम दोनों आपके ही हाथ से खाना खायेंगे .' . 'और पढने कौन जाएगा ? तेरी माँ रहने देगी क्या तुमको ? ' . 'दादी ! अब हम नहीं जायेंगे यहीं रहकर पढेंगे .' दादी ने बच्चों को सीने से लगा लिया . . नर्स ने इस इलाज को कभी पढ़ा ही नहीं था जीवन में . . अनोखी दवाई थी अपनों का साथ हिल मिल कर रहने की. . दादी ने नर्स को कहा:- . आज के डॉक्टर और नर्स क्या जाने की भारत के लोग 100 साल तक निरोगी कैसे रहते थे। . छोटा सा गांव सुविधा कोई नही, हर घर मे गाय, खेत के काम, कुंए से पानी लाना, मसाले कूटना, अनाज दलना, दही बिलोना मख्खन निकलना.. . एक घर मे कम से कम 20 से 25 लोगों का खाना बनाना कपड़े धोना, कोई मिक्सी नही, नाही वॉशिंग मशीन या कुकर.. . फिर भी जीवन मे कोई रोग नही मरते दिन तक चश्मे नही और दांत भी सलामत . ये सभी केवल परिवार का प्यार मिलने से होता था। . नर्स तो यह सुनकर हैरान रह गई और दादी दूसरे दिन ठीक हो गई। . आईये बने हम भी दवा ऐसे ही अपनो की.. साभार :- KUNTALESH ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (((((((( जय जय श्री राधे )))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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1 साल पहले
मृत्‍यु के ठीक उतने ही महीने पहले हारा में , नाभि चक्र में कुछ होने लगता है ! हारा सेंटर को क्‍लिक होना ही पड़ता है ! क्‍योंकि गर्भ में आने और जन्‍म के बीच नौ महीने का अंतराल था ; जन्‍म लेने में नौ महीने का समय लगा , ठीक उतना ही समय मृत्‍यु के लिए लगेगा ! जैसे जन्‍म लेने के पूर्व नौ महीने मां के गर्भ में रहकर तैयार होते हो , ठीक ऐसे ही मृत्‍यु की तैयारी में भी नौ महीने लगेंगे , फिर वर्तुल पूरा हो जायेगा ! तो मृत्‍यु के नौ महीने पहले नाभि चक्र में कुछ होने लगता है ! जो लोग जागरूक है , सजग है , वे तुरंत जान लेंगे कि नाभि चक्र में कुछ टूट गया है , और अब मृत्‍यु निकट ही है ! इस पूरी प्रक्रिया में लगभग नौ महीने लगते है ......
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1 साल पहले
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🕉💮🔯💥🍓🎪🏵🎯🌈🌹 *।।ॐ आनन्दमय🙏🏿🌻 ॐ शान्तिमय।।* 📢🎧🌈🎀📍🍥🙏🏿🌹‼💢 १. सांसारिक मोह के कारण ही मनुष्य 'मैं क्या करूँ और क्या नहीं करूँ -- इस दुविधा में फँसकर कर्तव्यच्युत हो जाता है '। अतः मोह या सुखासक्ति के वशीभूत नहीं होना चाहिये। २. *शरीर नाशवान है और उसे जानने वाला शरीरी अविनाशी है --- इस विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना --- इन दोनों में से किसी एक उपाय को काम में लाने से चिन्ता-शोक मिट जाते हैं।* ३. निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरों के हित के लिए अपने कर्तव्य का तत्परतासे पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है। ४. *कर्मबन्धन से छूटने के दो उपाय हैं --- कर्मो के तत्व को जानकर निःस्वार्थभाव से कर्म करना और तत्वज्ञान का अनुभव करना।* ५. मनुष्य को अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों केआने पर सुखी -दुःखी नहीं होना चाहिये; क्योंकि इसमें सुखी-दुःखी होनेवाला मनुष्य संसार से उठकर परम् आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता। ६. *किसी भी साधन से अन्तःकरण में समता आनी चाहिए।समता आये बिना मनुष्य निर्विकार नहीं हो सकता।* ७. सबकुछ भगवान ही हैं --- ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है। ८. *अन्तकालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है।अतः मनुष्य को हरदम भगवान का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, जिससे अन्तकाल में भगवान की स्मृति बनी रहे।* ९. सभी मनुष्य भगवत्प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय, देश, वेश आदि के क्यों न हों ! १०. *संसार में जहां भी विलक्षणता, विशेषता, महत्ता, विद्वता, बलवत्ता आदि दीखे उसको भगवान का ही मानकर भगवान का ही चिन्तन करना चाहिए!* ११. इस जगत को भगवान का ही स्वरूप मानकर प्रत्येक मनुष्य भगवान के विराटरूप का दर्शन कर सकता है । १२. *जो भक्त शरीर-इन्द्रियाँ-मन बुद्धि -- सहित अपने-आपको भगवान के अर्पण कर देता है, वह भगवान को प्रिय होता है!* १३. संसार में एक परमात्मतत्व ही जानने योग्य है। उसको जानने पर अमरता की प्राप्ति हो जाती है। १४. *संसार-बन्धन से छुटने के लिए सत्व, रज,और तम ---इन तीनों गुणों से अतीत होना जरूरी है। अनन्यभक्ति से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत हो जाता है!* १५. इस संसार का मूल आधार और अत्यंत श्रेष्ठ परमपुरुष एक परमात्मा ही है ---ऐसा मानकर अनन्यभाव से उनका भजन करना चाहिए। १६. *दुर्गुण--दुराचारों से ही मनुष्य चौरासी योनियों एवं नरकों में जाता है और दुःख पाता है।अतः जन्म--मरण के चक्र से छुटने के लिए दुर्गुण--दुराचारों का त्याग करना आवश्यक है।* १७. मनुष्य श्रद्धापूर्वक जो भी शुभ कार्य करे, उसको भगवान का स्मरण करके, उनके नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ करना चाहिए । १८. *सब ग्रन्थों का सार वेद हैं, वेदों का सार उपनिषद हैं, उपनिषदों का सार गीता है और गीता का सार भगवान की शरणागति है। जो अनन्यभाव से भगवान की शरण हो जाता है, उसे भगवान सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं।* 🌼💫🎊‼🍥📍🎀🌈🎧📢
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1 साल पहले
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🔴😀 _*उस शांति को खोजना, जिसमें कोई विघ्‍न न डाल सके*_ इसका यह अर्थ हुआ कि विघ्‍न से बच कर मत खोजना, विघ्‍न के बीच ही खोजना। बच्चा शोर न भी मचा रहा हो, तो और मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर लेना और कहना कि तुम सब शोर मचाओ, मैं ध्यान करता हूं। और जिस दिन तुम पाओ कि बच्चे शोर कर रहे हैं और तुम्हारा ध्यान चल रहा है, उस दिन तुम समझना कि यह तुम्हारा है। पहाड़, हिमालय मत खोजना, ठीक बीच बाजार में बैठ कर ध्यान करना। क्योंकि पहाड़ धोखा दे सकता है। पहाड़ शांति देता है, इसलिए धोखा दे सकता है। पहाड़ से बचना, बाजार में ही शांति खोजना। जिस दिन बाजार में ही तुम शांति को पा लोगे, उस दिन अब तुमसे कोई भी छीन न सकेगा। क्योंकि जो छीन सकता था, उसी के बीच तुमने पा लिया है। इसलिए घर छोड़ कर मत भागना गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो गए अगर तुम, तो ही संन्यास सच्चा है। अगर घर छोड़ा, पत्नी छोड़ी, बच्चे छोड़े, धन छोड़ा, और फिर तुम संन्यासी हुए, तो संन्यास जो है, आरोपित है, झूठा है, कंडीशनल है। अगर पत्नी फिर वापस दे दी जाए, तो वह एक रात में तुम से तुम्हारे संन्यास को छीन लेगी। और जल्दी छीन लेगी। देर न लगेगी। इसीलिए तथाकथित संन्यासी बड़ा ड़रा रहता है। कहीं स्त्री न छू जाए, ड़रा हुआ है। क्यों ड़रा हुआ है इतना? इतना भयभीत संन्यास कहां ले जाएगा? इतना निर्बल संन्यास क्या परिणाम लाएगा? इससे आत्मा सबल हुई कि निर्बल हो गई? यह हम कभी सोचते ही नहीं! एक आदमी स्त्री को छूने से ड़रता है। हम सोचते हैं, बड़ा आत्मवान है। और स्त्री को छूने से ड़र रहा है! स्त्री छू जाए तो उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है! यह तो हद की निर्बल आत्मा हो गई। इस निर्बल आत्मा की क्या उपलब्धि है? ऐसे कहता रहता है कि स्त्री तो हड्डी—मांस का ढेर है। और छूने से ड़रता भी है! तो यह जो ऊपर ऊपर कह रहा है, यह केवल आयोजन है अपने को समझाने का, भीतर रस मौजूद है। छू ले तो रस का जन्म हो जाए। रस का जन्म हो जाए तो उसे लगेगा कि भीतर पतन हो गया है। लेकिन कोई स्त्री किसी पुरुष में रस पैदा नहीं करती और न कोई पुरुष किसी स्त्री में रस पैदा करता है। रस होता है, तो उसे बाहर खींच लेती है। यह सहारा है आत्‍मदर्शन का। अगर आपके भीतर वासना है, तो स्त्री की मौजूदगी उस वासना को बाहर ले आती है। तो स्त्री सिर्फ दर्पण का काम कर रही है, स्त्री सिर्फ निदान कर रही है, वह एक डायग्नोसिस कर रही है कि आपके भीतर क्या छिपा है। उससे भागना क्या! उसे सदा पास रखना अच्छा है, क्योंकि पता चलता रहे कि भीतर क्या है। और उसके पास रहते अगर वासना खो जाए, तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हुआ, तो शक्ति उपलब्ध हुई, जो आंतरिक है......... ओशो ♣️
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1 साल पहले
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हमेशा की तरह सिमरन करते हुए अपने कार्य में तल्लीन रहने वाले भक्त रैदास जी आज भी अपने जूती गांठने के कार्य में तल्लीन थे! "अरे,,मेरी जूती थोड़ी टूट गई है,,इसे गाँठ दो,"--,राह गुजरते एक पंडित ने भगत रैदास जी से थोड़ा दूर खड़े हो कर कहा। "आप कहाँ जा रहे हैं श्रीमान? "भगत जी ने पंडित से पूछा। "मैं माँ गंगा स्नान करने जा रहा हूँ,,तुम क्या जानो गंगा जी के दर्शन और स्नान का महातम,,," "सत्य कहा श्रीमान,,आप भाग्यशाली हैं जो तीर्थ स्नान को जा रहे हैं,,"- -भगत जी ने कहा "सही कहा,,तीर्थ स्नान और दान का बहुत महातम है,,ये लो अपनी मेहनत की कीमत एक कोड़ी,, और मेरी जूती मेरी तरफ फेंको "पंडित बोला "आप मेरी तरफ कौड़ी को न फेंकिए,, ये कौड़ी आप गंगा माँ को गरीब रैदास की भेंट कह कर अर्पित कर देना"!! रैदासजी बोले पंडित अपने राह चला गया,,रैदास पुनः अपने कार्य में लग गए। अपने स्नान ध्यान के बाद जब पंडित गंगा दर्शन कर घर वापिस चलने लगा तो उसे ध्यान आया- - अरे उस रैदास की कौड़ी तो गंगा जी के अर्पण की नही,,नाहक उसका भार मेरे सिर पर रह जाता; ऐसा कह कर उसने कौड़ी निकाली और गंगा जी के तट पर खड़ा हो कर कहा- - - "हे माँ गंगा,,रैदास की ये भेंट स्वीकार करो" तभी गंगा जी से एक हाथ प्रगट हुआ और आवाज आई "लाओ भगत रैदास जी की भेंट मेरे हाथ पर रख दो!" हक्के बक्के से खड़े पंडित ने वो कौड़ी उस हाथ पर रख दी हैरान पंडित अभी वापिस चलने को था कि पुनः उसे वही स्वर सुनाई दिया "पंडित,,ये भेंट मेरी तरफ से भगत रैदास जी को देना" गंगा जी के हाथ में एक रत्न जड़ित कंगन था,, हैरान पंडित वो कंगन ले कर अपने गंतव्य को चलना शुरू किया। उसके मन में ख्याल आया- - रैदास को क्या मालूम,,कि माँ गंगा ने उसके लिए कोई भेंट दी है,,अगर मैं ये बेशकीमती कंगन यहाँ रानी को भेंट दूँ तो राजा मुझे धन दौलत से मालामाल कर देगा! ऐसा सोच उसने राजदरबार में जा कर वो कंगन रानी को भेंट कर दिया,,रानी वो कंगन देख कर बहुत खुश हुई,,अभी वो अपने को मिलने वाले इनाम की बात सोच ही रहा था कि रानी ने अपने दूसरे हाथ के लिए भी एक समान दूसरे कंगन की फरमाइश राजा से कर दी! "पंडित,,हमे इसी तरह का दूसरा कंगन चाहिए,"-,राजा बोला। "आप अपने राज जौहरी से ऐसा ही दूसरा कंगन बनवा लें,,"- - पंडित बोला। "पर इस में जड़े रत्न बहुत दुर्लभ हैं,,ये हमारे राजकोष में नहीं हैं,,अगर पंडित इस एक कंगन का निर्माता है तो दूसरा भी बना सकता है",,,,राजजोहरी ने राजा से कहा। "पंडित अगर तुम ने हमें दूसरा कंगन ला कर नहीं दिया तो हम तुम्हे मृत्युदण्ड देंगे"- -,,राजा गुर्राया! पंडित की आँखों से आंसू बहने लगे! भगत रैदास से किया गया छल उसके प्राण लेने वाला था! पंडित ने सारा सत्य राजा को कह सुनाया और राजा से कहा केवल एक भगत रैदास जी ही हैं जो गंगा माँ से दूसरा कंगन ले कर राजा को दे सकते हैं! राजा पंडित के साथ भगत रैदास जी के पास आया। भगत जी सदा की तरह सिमरन करते हुए अपने दैनिक कार्य में तल्लीन थे! पंडित ने दौड़ कर उनके चरण पकड़ लिए और उनसे अपने जीवन रक्षण की प्रार्थना की! भगत रैदास जी ने राजा को निकट बुलाया और पंडित को जीवनदान देने की विनती की। राजा ने जब पंडित के जीवन के बदले में दूसरा कंगन माँगा तो भगत रैदास जी ने अपनी नीचे बिछाई चटाई को हटा कर राजा से कहा- - - "आओ और अपना दूसरा कंगन पहचान लो!!" राजा जब निकट गया तो क्या देखता है- - - भगत जी के निकट जमीन पारदर्शी हो गई है और उस में बेशकीमती रत्न जड़ित असंख्य ही कंगन की धारा अविरल बह रही है! पंडित और राजा भगत रैदास जी के चरणों में गिर गए और उनसे क्षमा याचना की! प्रभु के रंग में रंगे महात्मा लोग,,जो अपने दैनिक कार्य करते हुए भी प्रभु का नाम सिमरन करते हैं उन से पवित्र और बड़ा कोई तीर्थ नही,,,!!!! उन्हें तीर्थ वेद शास्त्र क्या व्यख्यान करेंगे उनका जीवन ही वेद है उनके दर्शन ही तीर्थ हैं!! गुरबाणी में कथन है- - - साध की महिमा बेद न जानै जेता सुनह,, तेता बख्यान्ही। 🔹 सुमिरन से सुख होत है! सुमिरन से दूख जाए! कहे कबीर, सुमिरन किए साँई माँहि समाए!!!
368 ने देखा
1 साल पहले
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धार्मिक अनसुनी कथा सागर

जीसस का प्रसिद्ध वचन है: जिसके पास है, उसे और दिया जाएगा। और जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है। बड़ा बेबूझ वचन है! अन्याय मालूम पड़ता है कि जिसको है, उसको और दिया जाएगा। और जिसके पास नहीं है, उससे और ले लिया जाएगा। यह तो हद्द हो गई! गरीब को और गरीब बना दोगे, अमीर को और अमीर बना दोगे! मगर यह वचन बड़ा अदभुत है, बड़ा बहुमूल्य है! इस क्षण का सुख भोगो। इस भोगने में ही तुम पाओगे—और सुख बरसने लगा। सुख सुख को खींचता है। दुख दुख को खींचता है। एक दुख तुम बनाओ, दस दुख और चले आते हैं। दुख अकेला नहीं आता। सुख भी अकेला नहीं आता। एक कांटा तुम बुलाओ, दस उसके पीछे चले आते हैं। एक सुख तुम उतरने दो, और तुम पाओगे—पंक्तिबद्ध सुख चले आ रहे हैं! सब द्वार—दरवाजों से चले आ रहे हैं। सब दिशाओं से उतरने लगे। वर्तमान में होना संसार के बाहर हो जाना है। भविष्य में होना संसार में होना है। तुमने पूछा: "आपने कहा कि संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है।' एक ही बात है। संसार से विमुख हुए यानी तृष्णा गई; यानी संतोष आया। अब और क्या देरी रही? संतोष में ही तो झलक आ जाती है परमात्मा की, सत्य की। शांति में ही तो उसके स्वर उतरने लगते हैं। उतर ही रहे थे। ऐसा ही समझो कि तुम्हारे घर में आग लगी है। तुम रो रहे हो, चिल्ला रहे हो। और पास में कोई बांसुरी बजा रहा है। तुम्हें बांसुरी सुनाई पड़ेगी? जिसके घर में आग लगी है, उसे बांसुरी सुनाई पड़ेगी? जिसका घर धूं—धूं करके जल रहा है, उसे बांसुरी सुनाई पड़ेगी? लेकिन तभी कोई आया और उसने कहा कि क्यों परेशान होते हो? तुम्हारे बेटे ने तो घर का इंश्योरेंस कर रखा था। बस ये दो शब्द शास्त्र बन गए, आप्त—वचन हो गए। ये दो शब्द...आंसू उड़ गए। घर अब भी जल रहा है, लेकिन अब चिंता न रही और अचानक तुम पाओगे कि बांसुरी के स्वर सुनाई पड़ने लगे। बांसुरी पहले भी बज रही थी, मगर तुम उद्विग्न थे। तुम छाती पीट रहे थे। जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल गई। अब क्या होगा! अब कैसे होगा! अब कहां जाऊंगा! तुम्हारे भीतर इतना हाहाकार था! यह आग जो जलती थी, बाहर ही नहीं जलती थी; तुम्हारे भीतर भी जल रही थी, धू—धू करके जल रही थी। कहां बांसुरी! लेकिन किसी ने कहा कि क्यों घबड़ा रहे हो, बेटे ने इंश्योरेंस कर रखा है। कल ही तो किस्त भरी है, पैसे सब मिल जाएंगे। तो शायद जलने का दुख तो दूर हुआ, अब मन में योजना उठने लगेगी कि नया मकान बना लेंगे, पुराने से बेहतर बना लेंगे। इसके द्वार—दरवाजे भी सड़ गए थे, अच्छा ही हुआ कि जल गया। चलो, परमात्मा की कृपा है। एक शांति आई। अब भीतर कोई आपाधापी नहीं है, चिंताओं का शोरगुल नहीं है। बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ने लगी। बांसुरी पहले भी बज रही थी। बांसुरी बजती ही रही है। अनहत बाजत बांसुरी! कृष्ण की बांसुरी बज ही रही है। वह कभी रुकी नहीं। वह रुकती ही नहीं। वह रुक सकती नहीं। वह शाश्वत है। लेकिन तुम्हारे कान कैसे उसे पकड़ें? तुम्हारे भीतर इतना शोरगुल है! तुम्हारे भीतर बाजार है। बाहर बाजार है, उससे चिंता मत लो। बाहर कुछ भी नहीं है। तुम्हारे भीतर बाजार है। तुम्हारे भीतर हजार वासनाओं का तुमुल नाद है। तुम्हारे भीतर महाभारत छिड़ा है: यहां जाऊं, वहां जाऊं; यह करूं, वह करूं? इसमें धन लगाऊं, उसमें धन लगाऊं? जिस दिन तुम्हारे भीतर यह तुमुल नाद शांत हो जाएगा, परमात्मा कभी भी कहीं गया नहीं—घेरे तुम्हें खड़ा है। बाहर—भीतर वही है; उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है। इसलिए मैं कहता हूं: जहां संसार खत्म हुआ वहीं परमात्मा शुरू हो जाता है। बाहर से भीतर की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। भविष्य से वर्तमान की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। तृष्णा से, वीतत्तृष्णा में आ गए। असंतोष से संतोष में आ गए। समझो। करने का बहुत कुछ नहीं है। समझ लेने की बात है। समझ आ जाए तो करना अपने आप इसके पीछे उतर आता है। जब भी अवसर मिले, तभी संतुष्ट होकर बैठ जाओ। संतुष्ट होकर यानी स्वयं में समाहित होकर। समाधान में! न कहीं जाना, न कहीं आना। न कुछ पाने को, न कुछ खोने को। बस वहीं ध्यान, वहीं बज उठेगी बांसुरी। और जितनी तुम बांसुरी सुनने लगोगे, उतनी ही साफ होने लगेगी; उतने ही स्वर स्पष्ट होने लगेंगे। सुनते—सुनते एक दिन तुम पाओगे कि यह बांसुरी बाहर नहीं बज रही है—यह बांसुरी तुम ही हो। तत्त्वमसि! यह तुम ही हो। परमात्मा तुम्हारे ही प्राणों में नाद उठा रहा है। समझ की बात है। नासमझी में कुछ कर लोगे तो कुछ भी न होगा। नासमझी में तुम धन छोड़ दो, मकान छोड़ दो, पत्नी छोड़ दो, हिमालय भाग जाओ—करोगे क्या हिमालय में बैठ कर? तुम्हारा मन वहां भी वासनाओं में ही रचा—पचा रहेगा। बैठ कर हिमालय की गुफा में तुम सोचोगे कि अहा, सब छोड़ आया! अब स्वर्ग आने ही वाला है! अब थोड़े ही दिन की बात और है। आते ही होंगे रामजी, पुष्पक विमान पर ले जाएंगे! अप्सराएं तैयार ही हो रही होंगी। स्वर्ग में बंदनवार बांधे जा रहे होंगे कि महात्मा आ रहे हैं! यही बैठे—बैठे सोचोगे कि कौन सी अप्सरा चुननी है—उर्वशी ठीक रहेगी कि कोई और ठीक रहेगी? और फिर बैठे—बैठे थोड़ी देर में नाराजगी भी आएगी कि रामजी अभी तक नहीं आए; पुष्पक विमान का कुछ पता भी नहीं चल रहा है। कम से कम हनुमानजी को तो भेज ही देते! कोई संदेशवाहक तो आ जाता। इधर हम बैठे—बैठे परेशान हो रहे हैं। और सब छोड़ कर आ गए हैं। घर—द्वार छोड़ा; धन, पत्नी, बच्चे छोड़े—अब और क्या चाहिए! ऐसे गुस्सा बढ़ेगा। क्रोध भभकेगा। शिकायत उठेगी, प्रार्थना नहीं। जहां वासना है, वहां शिकायत है। जहां वासना है, वहां प्रार्थना हो भी तो झूठी है। धार्मिक अनसुनी कथा सागर
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1 साल पहले
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