कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥
(भागवत 12.3.52)
सतयुग में ध्यान, त्रेतायुग में यज्ञ, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता था, कलियुग में वही हरि-कीर्तन से मिलता है। कलियुग में नाम संकीर्तन का बहुत महत्व है, इसीलिए नाम संकीर्तन पर जोर डालें ।
श्रीजी महाराज
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