श्री गणेशाय नमः

4K Posts • 6M views
sn vyas
552 views 27 days ago
#शुभ बुधवार #श्री गणेशाय नमः *भाद्रपद मास की शांत और सुहानी रात्रि थी। आकाश में पूर्ण सौंदर्य के साथ चंद्रदेव विराजमान थे। उनका शीतल प्रकाश पूरी पृथ्वी को चांदी की चादर की तरह ढक रहा था। अपने अद्भुत रूप और तेज पर चंद्रदेव को अत्यंत गर्व था। देवता भी उनके सौंदर्य की प्रशंसा करते थे और इसी प्रशंसा ने धीरे-धीरे उनके भीतर अहंकार को जन्म दे दिया था। उन्हें लगता था कि तीनों लोकों में उनसे अधिक सुंदर और तेजस्वी कोई नहीं।* *उसी समय भगवान गणेश अपने भक्तों के घरों से पूजा और भोग ग्रहण करके कैलाश लौट रहे थे। जहां-जहां भक्तों ने प्रेम से उन्हें मोदक, लड्डू और अनेक प्रकार के पकवान अर्पित किए थे, वहां-वहां उन्होंने भक्तों का प्रेम स्वीकार किया था। उनका विशाल उदर भोग से भरा हुआ था और उनके मुख पर संतोष की मधुर मुस्कान थी। वे अपने प्रिय वाहन मूषक पर सवार होकर धीरे-धीरे कैलाश की ओर बढ़ रहे थे।* *रात्रि का मार्ग शांत था, लेकिन अचानक झाड़ियों के बीच से एक लंबा काला सर्प निकलकर रास्ते पर आ गया। सर्प को देखते ही छोटा-सा मूषक भयभीत हो उठा। उसने जोर से छलांग लगा दी। अचानक हुए इस झटके से भगवान गणेश का संतुलन बिगड़ गया और वे भूमि पर गिर पड़े। उनके हाथों से मोदकों की थाली छूट गई। चारों ओर मोदक और लड्डू बिखर गए।* *भगवान गणेश ने तनिक भी क्रोध नहीं किया। वे शांत भाव से उठे, मुस्कुराए और एक-एक करके सभी मोदकों को उठाने लगे। फिर उन्होंने उसी सर्प को पकड़कर अपने उदर के चारों ओर बांध लिया ताकि उनका पेट स्थिर रहे और वे फिर से यात्रा कर सकें। उनके लिए यह एक साधारण घटना थी, लेकिन आकाश में बैठा एक दर्शक इसे देखकर स्वयं को रोक नहीं पाया।* *आकाश में विराजमान चंद्रदेव यह पूरा दृश्य देख रहे थे। जैसे ही उन्होंने भगवान गणेश को गिरते देखा, वे ठहाका लगाकर हंस पड़े। उनका अहंकार इतना बढ़ चुका था कि वे किसी के सम्मान और मर्यादा का विचार ही भूल बैठे। वे हंसते हुए बोले, "कैसे देवता हैं ये? अपने ही वाहन से गिर पड़े। इतना बड़ा शरीर और इतनी हास्यास्पद दशा!"* *चंद्रदेव की वह कटु हंसी भगवान गणेश के कानों तक पहुंची। उन्होंने धीरे से ऊपर देखा। उनके नेत्रों में क्रोध नहीं था, लेकिन गहरा गंभीर भाव अवश्य था। वे बोले, "हे चंद्र! तुम्हें अपने रूप और सौंदर्य का इतना अभिमान हो गया है कि तुम दूसरों का उपहास करने लगे हो। जिसने अहंकार को अपना आभूषण बना लिया, उसका तेज अधिक समय तक नहीं टिकता।"* *भगवान गणेश ने आगे कहा, "आज से तुम्हारा यही रूप तुम्हारे लिए अभिशाप बनेगा। मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो भी मनुष्य तुम्हारा मुख देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा। उसे बिना अपराध के भी अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ेगा।"* *भगवान गणेश के मुख से श्राप निकलते ही चंद्रदेव का तेज क्षीण होने लगा। कुछ ही क्षणों में उनका उज्ज्वल प्रकाश मंद पड़ गया। पूरा आकाश अंधकार से भरने लगा। पृथ्वी पर रातें असामान्य रूप से अंधेरी हो गईं। ऋषि-मुनियों के यज्ञ प्रभावित होने लगे। समुद्र की लहरों का संतुलन बिगड़ने लगा। पर्व-त्योहारों की तिथियां निर्धारित करना कठिन हो गया। देवताओं को समझ आ गया कि यदि यह स्थिति बनी रही तो सृष्टि का संतुलन डगमगा जाएगा।* *घबराकर सभी देवता पहले ब्रह्माजी के पास पहुंचे। ब्रह्माजी ने कहा, "यह श्राप भगवान गणेश ने दिया है। इसका समाधान भी वही कर सकते हैं।" इसके बाद सभी देवता भगवान विष्णु के साथ मिलकर भगवान गणेश के चरणों में पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना की, "हे विघ्नहर्ता! चंद्रदेव से भूल अवश्य हुई है, लेकिन यदि उनका प्रकाश सदा के लिए समाप्त हो गया तो संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ जाएगी। कृपा करके कोई उपाय बताइए।"* *भगवान गणेश का क्रोध अब शांत हो चुका था। वे करुणा के सागर थे। उन्होंने कहा, "मेरा श्राप पूर्ण रूप से वापस नहीं होगा, क्योंकि अहंकार का फल अवश्य मिलना चाहिए। लेकिन मैं उसका प्रभाव कम अवश्य कर देता हूं।"* *उन्होंने चंद्रदेव की ओर देखकर कहा, "आज से तुम एक पक्ष में धीरे-धीरे क्षीण होगे और दूसरे पक्ष में फिर से पूर्ण तेज प्राप्त करोगे। इस प्रकार संसार तुम्हारे घटना और बढ़ना दोनों देखेगा और प्रत्येक व्यक्ति यह समझेगा कि अभिमान कभी स्थायी नहीं होता।"* *इसके बाद भगवान गणेश ने आगे कहा, "मेरा श्राप केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन प्रभावी रहेगा। उस दिन जो व्यक्ति भूलवश भी तुम्हारा दर्शन करेगा, उसे झूठे कलंक का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यदि वह श्रद्धा से मेरी पूजा करेगा, मेरे नाम का स्मरण करेगा और मेरी कथा सुनेगा, तो उस कलंक का दोष समाप्त हो जाएगा।"* *यह सुनते ही चंद्रदेव भगवान गणेश के चरणों में गिर पड़े। उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। वे बोले, "प्रभु, मेरे अहंकार ने मेरी बुद्धि हर ली थी। मुझे क्षमा कर दीजिए। आज मैं समझ गया हूं कि रूप और सौंदर्य कभी किसी को महान नहीं बनाते। सच्ची महानता विनम्रता में होती है।"* *भगवान गणेश ने उन्हें क्षमा करते हुए आशीर्वाद दिया। उसी क्षण चंद्रदेव का प्रकाश फिर से लौटने लगा। धीरे-धीरे आकाश उज्ज्वल हो गया। देवताओं ने राहत की सांस ली और पूरे ब्रह्मांड में आनंद छा गया।* *तभी से चंद्रमा के घटना और बढ़ना आरंभ हुआ, जिसे आज हम कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के रूप में जानते हैं। और इसी दिव्य घटना की स्मृति में आज भी गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा निभाई जाती है। यदि भूलवश किसी से उस दिन चंद्रमा का दर्शन हो जाए तो भगवान गणेश की पूजा, उनका स्मरण और उनकी इस पवित्र कथा का श्रवण करने का विधान बताया गया है।* *यह कथा केवल एक श्राप की नहीं, बल्कि अहंकार और विनम्रता का गहरा संदेश देती है। यह सिखाती है कि रूप, वैभव और शक्ति क्षणभंगुर हैं, लेकिन विनम्रता, करुणा और सच्चा सम्मान ही मनुष्य को वास्तव में महान बनाते हैं। यही कारण है कि आज भी करोड़ों भक्त श्रद्धा से कहते हैं— "जय श्री गणेश! विघ्नहर्ता मंगलकर्ता, हमारी बुद्धि को सदैव विनम्र बनाए रखें।"*
20 shares