महाभारत युद्ध

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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 450) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच सा तानेवापतत् तूर्ण भगिनी तस्य रक्षसः । अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ।। अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् । अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हिडिम्बा सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेन से बोली। हिडिम्बोवाच अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ।। राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ।।) हिडिम्बाने कहा- (आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ। भीमसेन उवाच स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ।। १ ।। भीमसेन बोले-हिडिम्बे ! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ।। १ ।। युधिष्ठिर उवाच क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्म गोपाय पाण्डव ।। २ ।। यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा- पुरुषसिंह भीम ! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन ! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ।। २ ।। वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् । रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ।। ३ ।। महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ।। ३ वैशम्पायन उवाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ।। ४ ।। आयें जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् । तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ।। ५ ।। 'आयें! स्त्रियोंको इस जगत्‌में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे ! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ।। ५ ।। सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया । सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ।। ६ ।। 'मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ।। ६ ।। मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ।। ७ ।। 'शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्म का परित्याग करके आपके पुत्र पुरुष सिंह भीमसेन को अपना पति चुना है ।। ७ ।। वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ८ ।। 'यशस्विनि ! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थना को ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ।। ८ ।। तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ।। ९ ।। अतः वरवर्णिनि ! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ।। ९ ।। भर्भानेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ।। १० ।। 'महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ।। १० ।। अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ।। पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ।। अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् ।) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ।। ११ ।। पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ।। १२ ।। 'आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ।। ११-१२ ।। आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ।। १३ ।। 'जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ।। १३ ।। आपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तमः व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ।। १४ ।। 'जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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