भंडि जमीऐ भंडि निमीऐ भंडि मंगणु वीआहु ॥
अर्थ: स्त्री (भंड) से ही जन्म होता है, स्त्री के गर्भ में ही जीव का विकास होता है, और स्त्री से ही सगाई और विवाह का संबंध जुड़ता है।
भंडहु होवै दोसती भंडहु चलै राहु ॥
अर्थ: स्त्री के माध्यम से ही मित्रता और नए रिश्ते बनते हैं और उसी से संसार का मार्ग (वंश) चलता है।
सो किउ मंदा आखीऐ जितु जंमहि राजान ॥
अर्थ: फिर उस स्त्री को बुरा या नीचा क्यों कहा जाए, जिससे बड़े-बड़े राजा और महापुरुष जन्म लेते हैं?
मुख्य संदेश
इस शबद के जरिए गुरु नानक देव जी ने उस समय के समाज में फैली महिलाओं के प्रति भेदभाव वाली सोच को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि यदि मनुष्य का पूरा अस्तित्व—जन्म से लेकर मृत्यु तक और रिश्तों से लेकर वंश बढ़ाने तक—एक स्त्री पर निर्भर है, तो वह 'अशुद्ध' या 'कमतर' कैसे हो सकती है?
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