ShareChat
click to see wallet page

'मोहब्बत वाली चाय' "मैं जो आज हूँ, पहले ऐसा तन्हा तन्हा सा नहीं था, मेरे भी कुछ दोस्त थे, उस दौर में मैं बंजर नहीं था। मसला मन का था, ये हर किसी से लगता नहीं था, आज मन की किसी कोने में बडा अकेलापन था, चस्का चाय पीने का नहीं, दोस्तों के साथ का था, बातों-बातों में चाय का प्याला अधूरा ही रहता था। चाय की तलब थी और ये दिल किस्सों का तलबगार था, बिना चीनी के पीते, तो हमें खाक स्वाद का पता होता था? अब वो लोग साथ नहीं रहे, जेब भरी मन खाली रह गए कमाने के चक्कर में हम वो 'मोहय' भूल गए।" अमोल हरिदास. #दोस्ती की चाय

593 जणांनी पाहिले
3 दिवसांपूर्वी