#ये वृद्धाश्रम, ये अनाथालय
हमारी सभ्यता के वे आईने हैं
जिनमें चेहरा मनुष्य का,
मगर प्रतिबिंब संवेदना-विहीन व्यवस्था का दिखाई देता है।
वृद्धाश्रम में पड़े वे हाथ
कभी घर की नींव थे,
आज उसी घर में उनके लिए
एक कोना भी बचा नहीं।
अनाथालय के बच्चे
उन रिश्तों की कीमत चुका रहे हैं
जो उन्होंने चुने तक नहीं थे।
हमने विज्ञान से चाँद छू लिया,
मगर अपने ही घर के बुज़ुर्गों तक
पहुँचने की दूरी बढ़ा ली।
शायद मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
उसने रहने के लिए घर बहुत बनाए,
पर रहने लायक रिश्ते नहीं।
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— साक्षी (Sakshi) 🌿 #☝ मेरे विचार #📒 मेरी डायरी