जैसे धागों के ताने-बाने में वस्त्र ओतप्रोत रहता है, वैसे ही यह सारा विश्व परमात्मा में ही ओतप्रोत है। जैसे सूत के बिना वस्त्र का अस्तित्व नहीं है; किन्तु सूत वस्त्र के बिना भी रह सकता है, वैसे ही इस जगत् के न रहने पर भी परमात्मा रहता है; किन्तु यह जगत् परमात्मस्वरूप ही है- परमात्मा के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/११/१३/२१
श्रीमद्भागवत-महापुराण/11/13/21
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