क्या मंदिर की मूर्ति में ही भगवान हैं, इस असहाय माँ में नहीं?❤️🙏
रामायण में प्रभु श्री राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर यह साबित किया था कि ईश्वर भाव और प्रेम के भूखे हैं, आडंबर के नहीं।
एक तरफ मंदिर में मूर्तियों पर फूल, फल और दूध चढ़ाया जा रहा है, जो बहकर व्यर्थ चला जाता है... और दूसरी तरफ वही भगवान एक बुजुर्ग असहाय माँ के रूप में मदद की उम्मीद में हाथ फैलाए खड़े हैं।
यदि वही दान या प्रसाद किसी ज़रूरतमंद के काम आ जाए, तो वो दुआ बनकर जीवन सँवार देता है।
"मानस में लिखा है: परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।" (अर्थातः दूसरों की भलाई करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है।)
आइए सोच बदलें-मंदिर जाने से पहले अपने आसपास के इंसान में छिपे भगवान को पहचानें!🙏
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