*।।ओ३म्।।* 🙏 सादर नमस्ते जी। *_∆∆• अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेऽहं०॥(यजु० २-२७)_* *भावार्थ:-* *संसार रूपी घर का निरंतर रक्षा करने वाला जगदीश्वर और विद्वान है॥२७॥* *_∆∆• अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं०॥(यजु० २-२८)_* *भावार्थ:-* *मनुष्य को यही निश्चय करना चाहिए कि मैं अब जैसा कर्म करता हूं वैसा ही परमेश्वर की व्यवस्था से फल भोगता हूं और भोगूंगा। सब प्राणी अपने कर्म से विरुद्ध फल को कभी नहीं प्राप्त होते इससे सुख भोगने के लिए धर्मयुक्त कर्म ही करना चाहिए कि जिससे कभी दुःख नहीं हो॥२८॥* *(महर्षिदयानंदकृत वेदभाष्य से उदधृत)* प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #☝ मेरे विचार #❤️जीवन की सीख

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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇

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