यह घटना 1950 के अक्टूबर महीने की है। कर्नाटक के दक्षिणी तट पर मंगलुरु से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर एक सुनसान पहाड़ी तटरेखा थी। मैसूर वन्यजीव अनुसंधान संस्थान के दो कर्मचारी — वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. बसवराज और उनके सहायक शंकर — उस अक्टूबर में तटीय वनस्पति और जीव विविधता का दस्तावेज़ीकरण कर रहे थे। शंकर के पास संस्थान का एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। उस दिन वे एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर थे जहाँ से नीचे का पूरा तट साफ़ दिखता था। #lostfootage1950
सुबह के करीब साढ़े सात बज रहे थे।
शंकर ने नीचे तट की तरफ देखा — और रुक गया।
"डॉक्टर साहब।"
डॉ. बसवराज ने अपनी नोटबुक से नज़र उठाई। नीचे देखा।
समुद्र के किनारे कुछ था। चार टाँगों पर। बड़ा।
डॉ. बसवराज ने दूरबीन निकाली। लगाई। और फिर एक लंबी साँस ली।
"कैमरा निकालो।" #oceangoat1950
वह एक बकरी थी। लेकिन यह कहना उसके साथ अन्याय था। जैसे किसी पहाड़ को "एक पत्थर" कहना।
उसका शरीर किसी भी जंगली या पालतू बकरी से कई गुना बड़ा था। उसका धड़ भारी और गहरा था। उसकी खाल पर लंबे, घने, गहरे बाल थे — जो समुद्री नमक और पानी से भीगे और जमे हुए थे, मटमैले और भारी। वह रंग किसी भी जानी-पहचानी बकरी का नहीं था — एक गहरा भूरा-काला।
और उसके सींग।
डॉ. बसवराज ने बाद में अपनी डायरी में लिखा — "मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत से जानवर देखे हैं। बहुत से सींग देखे हैं। लेकिन उस बकरी के सींग — वे किसी और दुनिया के थे। वे उसके सिर से बाहर की तरफ और ऊपर की तरफ इतने बड़े फैले हुए थे कि उसके पूरे शरीर की चौड़ाई से भी ज़्यादा चौड़े थे। और उन पर गहरी-गहरी लकीरें थीं — जैसे सालों की छाप।" #samudribakri
वह प्राणी समुद्र के किनारे इत्मीनान से टहल रही थी। इधर जाती, रुकती, उधर जाती। समुद्र की लहरें उसके बड़े खुरों को छूती थीं — वह परवाह नहीं करती थी। जैसे वह किनारा उसका अपना था।
एक बार वह रुकी। समुद्र की तरफ मुँह किया। लहरों को देखती रही।
शंकर ने ज़ूम किया।
उस बकरी की आँखें — बड़ी, आयताकार पुतलियों वाली, शांत — समुद्र को देख रही थीं। जैसे कोई पुराना इंसान किसी जानी-पहचानी जगह को देखता है।
डॉ. बसवराज ने लिखा — "उस पल मुझे लगा — यह बकरी यहाँ पहले भी आई है। कई बार। शायद बहुत पहले से।" #ancientcreature1950
उसकी ठुड्डी से एक लंबी मोटी दाढ़ी लटकी थी — हवा में बहुत धीरे हिलती हुई। उसके खुर गहरे और चौड़े थे — गीली रेत पर गहरे निशान छोड़ रहे थे।
वह करीब एक घंटे तक किनारे पर टहलती रही।
फिर — बिना किसी जल्दबाज़ी के — वह समुद्र की तरफ चली। धीरे-धीरे। उसके बड़े खुर पानी में उतरे। उसका भारी शरीर पानी में समाया। उसके लंबे बाल पानी की सतह पर फैले — फिर डूब गए। आखिर में उसके विशाल सींगों की नोकें दिखीं — पानी की सतह के ऊपर — और फिर वे भी गायब हो गईं।
समुद्र वैसा ही था। #unexplainedIndia
शंकर ने कैमरा नीचे किया।
रेत पर खुरों के निशान थे — बड़े, गहरे — जो पानी तक जाते थे और खत्म हो जाते थे।
डॉ. बसवराज नीचे उतरे। उन निशानों के पास गए। घुटनों के बल बैठे। एक निशान को ध्यान से देखा।
उन्होंने डायरी में लिखा — "वह निशान किसी भी ज्ञात जानवर के खुर का नहीं था। और उसके किनारों पर — रेत पर — एक अजीब चमक थी। जैसे उस जगह कुछ पुराना छूट गया हो।"
वह फ़िल्म रील संस्थान को कभी नहीं मिली।
डॉ. बसवराज की डायरी के उस पन्ने पर एक आखिरी वाक्य था —
"समुद्र के अपने जानवर हैं। और वे हमसे बहुत पुराने हैं।"
— मैसूर वन्यजीव एवं तटीय प्रकृति अनुसंधान संस्थान, अप्रकाशित क्षेत्र अभिलेख, October 1950 #news