बोलना, हाथों से काम करना, पैरों से चलना, मूत्रेन्द्रिय तथा गुदा से मल-मूत्र त्यागना, सूँघना, चखना, देखना, छूना, सुनना, मन से संकल्प-विकल्प करना, बुद्धि से समझना, अहंकार के द्वारा अभिमान करना, महत्तत्त्व के रूप में सबका ताना-बाना बुनना तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के सारे विकार; कहाँ तक कहूँ- समस्त कर्ता, करण और कर्म मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/११/१२/१९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/11/12/19
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