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गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ अर्थ: गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य घड़े (कुंभ) की तरह। गुरु शिष्य की कमियों को दूर करता है। वह अंदर से सहारा देकर (प्यार देकर) बाहर से चोट मारता है (अनुशासन सिखाता है)। . . . #trueguru_santrampaljimaharaj #kabirisgod #🙏गुरु महिमा😇

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3 दिन पहले