ओडिशा में जीतू मुंडा को अपनी बहन के बैंक खाते से मात्र ₹19,300 निकालने के लिए उसकी कब्र खोदकर कंकाल कंधे पर ढोकर बैंक जाना पड़ा। सोचिए, एक इंसान को अपने ही हक के लिए इस हद तक जाना पड़े, इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है? बैंकिंग व्यवस्था और सरकारी प्रक्रियाएं इतनी जटिल और अमानवीय हो चुकी हैं कि गरीब, खासकर आदिवासी समाज, अपने अधिकार तक पाने में असहाय हो जाता है।
एक तरफ ललित मोदी, नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ लेकर भी कानून की पकड़ से बाहर हैं, और दूसरी तरफ एक गरीब भाई को अपनी बहन की कब्र तक खोदनी पड़ती है। यह “विकास” नहीं, यह गहरी असमानता और संवेदनहीनता का प्रमाण है। यह वह भारत है जिसे देखने से अक्सर हम नजरें चुरा लेते हैं। #बैंक