#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣3️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
नवाधिकशततमोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्र का विवाह...(दिन 333)
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भीष्म उवाच
गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् । अत्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक् ।। १ ।।
भीष्मजीने कहा- बेटा विदुर ! हमारा यह कुल अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न होकर इस जगत्में विख्यात हो रहा है। यह अन्य भूपालों को जीतकर इस भूमण्डल के साम्राज्य का अधिकारी हुआ है ।। १ ।।
रक्षितं राजभिः पूर्व धर्मविद्भिर्महात्मभिः । नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ।। २ ।।
पहलेके धर्मज्ञ एवं महात्मा राजाओंने इसकी रक्षा की थी; अतः हमारा यह कुल इस भूतलपर कभी उच्छिन्न नहीं हुआ ।। २ ।।
मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना । समवस्थापितं भूयो युष्मासु कुलतन्तुषु ।। ३ ।।
(बीचमें संकटकाल उपस्थित हुआ था किंतु) मैंने, माता सत्यवतीने तथा महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने मिलकर पुनः इस कुलको स्थापित किया है। तुम तीनों भाई इस कुलके तंतु हो और तुम्हींपर अब इसकी प्रतिष्ठा है ।। ३ ।।
तच्चैतद् वर्धते भूयः कुलं सागरवद् यथा । तथा मया विधातव्यं त्वया चैव न संशयः ।। ४ ।।
वत्स ! यह हमारा वही कुल आगे भी जिस प्रकार समुद्रकी भाँति बढ़ता रहे, निःसंदेह वही उपाय मुझे और तुम्हें भी करना चाहिये ।। ४ ।।
श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः । सुबलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ।। ५ ।।
सुना जाता है, यदुवंशी शूरसेन की कन्या पृथा (जो अब राजा कुन्तिभोज की गोद ली हुई पुत्री है) भलीभाँति हमारे कुलके अनुरूप है। इसी प्रकार गान्धारराज सुबल और मद्रनरेशके यहाँ भी एक-एक कन्या सुनी जाती है ।। ५ ।।
कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः । उचिताश्चैव सम्बन्धे तेऽस्माकं क्षत्रियर्षभाः ।। ६ ।।
बेटा! वे सब कन्याएँ बड़ी सुन्दरी तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हैं। वे श्रेष्ठ क्षत्रियगण हमारे साथ विवाह-सम्बन्ध करने के सर्वथा योग्य हैं ।। ६ ।।
मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर ।
संतानार्थं कुलस्यास्य यद् वा विदुर मन्यसे ।। ७ ।।
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुर ! मेरी राय है कि इस कुलकी संतानपरम्पराको बढ़ानेके लिये उक्त कन्याओंका वरण करना चाहिये अथवा जैसी तुम्हारी सम्मति हो, वैसा किया जाय ।। ७ ।।
विदुर उवाच
भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः । तस्मात् स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ।। ८ ।।
विदुर बोले- प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही माता हैं और आप ही परम गुरु हैं; अतः स्वयं विचार करके जिस बातमें इस कुलका हित हो, वह कीजिये ।। ८ ।।
वैशम्पायन उवाच
अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारीं सुबलात्मजाम् । आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहरं हरम् ।। ९ ।।
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा । इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ।। १० ।।
ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत । अचक्षुरिति तत्रासीत् सुबलस्य विचारणा ।। ११ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद भीष्मजीने ब्राह्मणोंसे गान्धारराज सुबलकी पुत्री शुभलक्षणा गान्धारीके विषयमें सुना कि वह भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले वरदायक भगवान् शंकरकी आराधना करके अपने लिये सौ पुत्र होनेका वरदान प्राप्त कर चुकी है। भारत ! जब इस बातका ठीक-ठीक पता लग गया, तब कुरुपितामह भीष्मने गान्धारराजके पास अपना दूत भेजा। धृतराष्ट्र अंधे हैं, इस बातको लेकर सुबलके मनमें बड़ा विचार हुआ ।। ९-११ ।।
कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्धया तु प्रसमीक्ष्य सः ।
ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारीं धर्मचारिणीम् ।। १२ ।।
परंतु उनके कुल, प्रसिद्धि और आचार आदिके विषयमें बुद्धिपूर्वक विचार करके उसने धर्मपरायणा गान्धारीका धृतराष्ट्रके लिये वाग्दान कर दिया ।। १२ ।।
गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् ।
आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ।। १३ ।।
ततः सा पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा ।
बबन्ध नेत्रे स्वे राजन् पतिव्रतपरायणा ।। १४ ।।
नाभ्यसूयां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चया ।
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् ।। १५ ।।
स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ।
स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ।
तां तदा धृतराष्ट्राय ददौ परमसत्कृताम् ।
भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ।। १६ ।।
जनमेजय! गान्धारीने जब सुना कि धृतराष्ट्र अंधे हैं और पिता-माता मेरा विवाह उन्हींके साथ करना चाहते हैं, तब उन्होंने रेशमी वस्त्र लेकर उसके कई तह करके उसीसे अपनी आँखें बाँध लीं। राजन् ! गान्धारी बड़ी पतिव्रता थीं। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं (सदा पतिके अनुकूल रहूँगी,) उनके दोष नहीं देखूँगी। तदनन्तर एक दिन गान्धारराजकुमार शकुनि युवावस्था तथा लक्ष्मीके समान मनोहर शोभासे युक्त अपनी बहिन गान्धारीको साथ लेकर कौरवोंके यहाँ गये और उन्होंने बड़े आदर-सत्कारके साथ धृतराष्ट्रको अपनी बहिन सौंप दी। शकुनिने भीष्मजीकी सम्मतिके अनुसार विवाह-कार्य सम्पन्न किया ।। १३-१६ ।।
दत्त्वा स भगिनीं वीरो यथार्ह च परिच्छदम् । पुनरायात् स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ।। १७ ।।
वीरवर शकुनिने अपनी बहिनका विवाह करके यथायोग्य दहेज दिया। बदलेमें भीष्मजीने भी उनका बड़ा सम्मान किया। तत्पश्चात् वे अपनी राजधानीको लौट आये ।। १७ ।।
गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः ।
तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ।। १८ ।।
भारत ! सुन्दर शरीरवाली गान्धारीने अपने उत्तम स्वभाव, सदाचार तथा सद्व्यवहारों से समस्त कौरवों को प्रसन्न कर लिया ।। १८ ।।
वृत्तेनाराध्य तान् सर्वान् गुरून् पतिपरायणा ।
वाचापि पुरुषानन्यान् सुव्रता नान्यकीर्तयत् ।। १९ ।।
इस प्रकार सुन्दर बर्तावसे समस्त गुरुजनोंकी प्रसन्नता प्राप्त करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिपरायणा गान्धारीने कभी दूसरे पुरुषोंका नामतक नहीं लिया ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रविवाहे नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रविवाहविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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