#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣7️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
नवतितमोऽध्यायः
अष्टक और ययाति का संवाद...(दिन 279)
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घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च त्वचा स्पर्श मनसा वेद भावम् ।
इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनां प्राणभृतां शरीरे ।। १६ ।।
नासिकासे सुगन्ध लेता है। जिह्वासे रसका आस्वादन करता है। त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महात्मा प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है ।। १६ ।।
अष्टक उवाच
यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा निखन्यते वापि निकृष्यते वा । अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मना चेतयते परस्तात् ।। १७ ।।
अष्टकने पूछा-जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है? ।। १७ ।।
ययातिरुवाच
हित्वा सोऽसून् सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा । अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह ।। १८ ।।
ययाति बोले- राजसिंह ! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर वायुके समान वेगसे चलता हुआ अन्य योनिको प्राप्त होता है ।। १८ ।।
पुण्यां योनिं पुण्यकृतो व्रजन्ति पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति । कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा न मे विवक्षास्ति महानुभाव ।। १९ ।।
चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति । आख्यातमेतन्निखिलेन सर्व भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ।। २० ।।
पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनियोंमें जाते हैं और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतंग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैर, छः पैर और दो पैरवाले प्राणियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बता दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो? ।। १९-२० ।।
अष्टक उवाच
किंस्वित् कृत्वा लभते तात लोकान् मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा । तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-च्छुभाँल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण ।। २१ ।।
अष्टकने पूछा-तात ! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम लोक प्राप्त करता है? वे लोक तपसे प्राप्त होते हैं या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थरूपसे बताइये ।। २१ ।।
ययातिरुवाच
तपश्च दानं च शमो दमश्च हीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा । स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम् । नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः ।। २२ ।।
ययाति बोले- राजन् ! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं- तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है ।। २२ ।।
अधीयानः पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् । तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद् ब्रह्म फलं ददाति ।। २३ ।।
जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता ।। २३ ।।
चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि
भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ।। २४ ।।
अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ- ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायें, अभिमानपूर्वक उनका अनुष्ठान किया जाय तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं ।। २४ ।।
न मानमान्यो मुदमाददीत न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात् । सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते ।। २५ ।।
विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो और अपमानित होनेपर संतप्त न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती ।। २५ ।।
इति दद्यामिति यज इत्यधीय इति व्रतम् । इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वर्ज्यानि सर्वशः ।। २६ ।।
मैं यह दे सकता हूँ, इस प्रकार यजन करता हूँ, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहता हूँ और यह मेरा व्रत है; इस प्रकार जो अहंकारपूर्वक वचन हैं, उन्हें भयरूप कहा गया है। ऐसे वचनोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये ।। २६ ।।
ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम् । तद्वः श्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह ।। २७ ।।
जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं, वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते नवतितमोऽध्यायः ।। ९०
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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