महाभारत

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sn vyas
593 views 7 days ago
#महाभारत समय… समय अत्यंत बलवान होता है। वह शिखंडी से भीष्म को परास्त करा सकता है, कर्ण के अजेय रथ को भूमि में फँसा सकता है, द्रौपदी का चीरहरण करा सकता है। यदि किसी से भय करना हो—तो वह समय है। महाभारत में एक अद्भुत प्रसंग आता है। अज्ञातवास के समय धर्मराज युधिष्ठिर विराट के दरबार में उपस्थित होकर कहते हैं— “हे राजन! मैं व्याघ्रपाद गोत्र में उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा नाम कंक है। मैं द्यूत विद्या में निपुण हूँ और आपकी सेवा की अभिलाषा लेकर आया हूँ।” द्यूत… जुआ… वही खेल, जिसमें धर्मराज ने कभी अपना सर्वस्व गंवा दिया था। आज वही युधिष्ठिर ‘कंक’ बनकर राजा विराट को वही विद्या सिखा रहे थे। जिस बाहुबली के लिए रसोइये दिन–रात भोजन परोसते थे, वही भीम अब बल्लभ बनकर स्वयं रसोई में पकवान बनाने लगा। नकुल और सहदेव पशुओं की देखरेख करने लगे। दासियों से घिरी रहने वाली महारानी द्रौपदी स्वयं एक दासी—सैरंध्री—बनकर सेवा में लग गईं। और वह धनुर्धर… उस युग का सबसे तेजस्वी युवक, महाबली योद्धा, द्रोणाचार्य का प्रियतम शिष्य, जिसके धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ते ही युद्ध का परिणाम निश्चित हो जाता था— वही अर्जुन… पौरुष का प्रतीक अर्जुन… नायकों का महानायक अर्जुन… अपने पौरुष का त्याग कर, होठों पर लाली, आँखों में काजल लगाकर, एक नपुंसक “बृह्नला” बन गया। युधिष्ठिर अपमान सहते रहे। अर्जुन मौन साधे बृह्नला बने रहे। नकुल–सहदेव पशुओं के बीच रहे। भीम रसोई में पकाते रहे। और द्रौपदी—एक दासी की भाँति सेवा करती रहीं। यह केवल अज्ञातवास नहीं था। यह अपने परिवार के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा थी। यह त्याग किसी स्वार्थ के लिए नहीं था। यह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की असाधारण क्षमता थी। आज भी इस धरती पर न जाने कितने महायोद्धा अज्ञातवास जी रहे हैं। कोई धन्ना सेठ की नौकरी करते हुए अपमान सह रहा है—क्योंकि बेटी की स्कूल फीस भरनी है। कोई पिता सेल्समैन बनकर दर–दर भटक रहा है—क्योंकि बेटी का विवाह करना है। असंख्य पुरुष–स्त्रियाँ प्रतिदिन अपने सुख–दुःख त्यागकर, केवल परिवार के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि जीवन में किसी संघर्षशील व्यक्ति से सामना हो— तो उसका उपहास मत कीजिए। उसका सम्मान कीजिए। फैक्ट्री के बाहर खड़ा गार्ड, होटल में रोटी परोसता वेटर, सेठ की गालियाँ सहता मुनीम— वास्तव में कंक, बल्लभ और बृह्नला ही हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से पीड़ा नहीं चुनता। वे कर्म कर रहे हैं। वे अपना अज्ञातवास जी रहे हैं। वे कमजोर नहीं हैं— उनके हालात कमजोर हैं। उनका समय कमजोर है। याद रखिए— जब अज्ञातवास समाप्त हुआ, तो बृह्नला पुनः अर्जुन बने। और कौरवों का नाश कर, अपना यश और कीर्ति पूरे विश्व में फैला दी। समय बदलते देर नहीं लगती। इसलिए जिसका समय खराब चल रहा हो— उसका अनादर मत कीजिए। उसका साथ दीजिए। उसका सम्मान कीजिए। क्योंकि एक दिन हर संघर्षशील, कर्मठ और ईमानदार व्यक्ति का अज्ञातवास समाप्त होगा। समय का चक्र घूमेगा। बृह्नला का छद्म रूप मिट जाएगा। और अर्जुन अमर हो जाएगा— इतना कि पीढ़ियाँ अपने बच्चों के नाम उसके नाम पर रखेंगी। इतिहास बृह्नला को भूल जाएगा। इतिहास अर्जुन को याद रखेगा। इसलिए हर संघर्षशील व्यक्ति में बृह्नला मत देखिए… कंक मत देखिए… बल्लभ मत देखिए… उसमें धनुर्धर अर्जुन देखिए। धर्मराज युधिष्ठिर देखिए। महाबली भीम देखिए। उसका सहयोग कीजिए। उसके प्रयासों को सराहिए। क्योंकि— हर अज्ञातवास का अंत निश्चित है। यही नियति है। यही समय का चक्र है। यही महाभारत की शाश्वत सीख है।
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