महाभारत

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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का कुन्ती को समझाना और कुन्ती का पति की आज्ञा से पुत्रोत्पत्ति के लिये धर्मदेवता का आवाहन करने के लिये उद्यत होना...(दिन 355) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् । धर्मविद् धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर धर्मज्ञ राजा पाण्डुने देवी कुन्तीसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही ।। १ ।। पाण्डुरुवाच एवमेतत् पुरा कुन्ति व्युषिताश्वश्चकार ह । यथा त्वयोक्तं कल्याणि स ह्यासीदमरोपमः ।। २ ।। पाण्डु बोले-कुन्ती ! तुम्हारा कहना ठीक है। पूर्वकाल में राजा व्युषिताश्व ने जैसा तुमने कहा है, वैसा ही किया था। कल्याणी! वे देवताओं के समान तेजस्वी थे ।। २ ।। अथ त्विदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे । पुराणमृषिभिर्दृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ।। ३ ।। अब मैं तुम्हें यह धर्मका तत्त्व बतलाता हूँ, सुनो। यह पुरातन धर्मतत्त्व धर्मज्ञ महात्मा ऋषियोंने प्रत्यक्ष किया है ।। ३ ।। धर्ममेवं जनाः सन्तः पुराणं परिचक्षते । भर्ता भार्या राजपुत्रि धर्म्य वाधर्म्यमेव वा ।। ४ ।। यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः । विशेषतः पुत्रगृध्यी हीनः प्रजननात् स्वयम् ।। ५ ।। यथाहमनवद्याङ्गि पुत्रदर्शनलालसः । तथा रक्ताङ्गुलितलः पद्मपत्रनिभः शुभे ।। ६ ।। प्रसादार्थ मया तेऽयं शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः । मन्नियोगात् सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात् ।। ७ ।। पुत्रान् गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि । त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम् ।। ८ ।। साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये- ऐसा वेदज्ञ पुरुषों का कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे ! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है ।। ४-८ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डु परपुरंजयम् । प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रियहिते रता ।। ९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार कही जानेपर पतिके प्रिय और हितमें लगी रहनेवाली सुन्दरांगी कुन्ती शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज पाण्डुसे इस प्रकार बोली- ।। ९ ।। (अधर्मः सुमहानेष स्त्रीणां भरतसत्तम । यत् प्रसादयते भर्ता प्रसाद्यः क्षत्रियर्षभ ।। भृणु चेदं महाबाहो मम प्रीतिकरं वचः ।।) 'भरतश्रेष्ठ ! क्षत्रियशिरोमणे ! स्त्रियोंके लिये यह बड़े अधर्मकी बात है कि पति ही उनसे प्रसन्न होनेके लिये बार-बार अनुरोध करे; क्योंकि नारीका ही यह कर्तव्य है कि वह पतिको प्रसन्न रखे। महाबाहो ! आप मेरी यह बात सुनिये। इससे आपको बड़ी प्रसन्नता होगी। पितृवेश्मन्यहं बाला नियुक्तातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।। १० ।। निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयम् ।। ११ ।। 'बाल्यावस्थामें जब मैं पिताके घर थी, मुझे अतिथियोंके सत्कारका काम सौंपा गया था। वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले एक उग्रस्वभावके ब्राह्मणकी, जिनका धर्मके विषयमें निश्चय दूसरोंको अज्ञात है तथा जिन्हें लोग दुर्वासा कहते हैं, मैंने बड़ी सेवा-शुश्रूषा की। अपने मनको संयममें रखनेवाले उन महात्माको मैंने सब प्रकारके यत्नोंद्वारा संतुष्ट किया ।। १०-११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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"महाभारत की कथा लाक्षाग्रह षड्यंत्र" #महाभारत "दैवयोग तथा शकुनि के छल कपट से कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था। उसने शकुनि के कहने पर पाण्ड्वो को बचपन मे कई बार मारने का प्रयत्न किया। युवावस्था मे आकर जब गुणों मे उससे अधिक श्रेष्ठ युधिष्ठर को युवराज बना दिया गया तो शकुनि ने लाक्ष के बने हुए घर में पाण्डवों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया किन्तु विदुर की सहायता से पाँचों पाण्डव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये। अपने उत्तम गुणों के कारण युधिष्ठिर हस्तिनापुर के प्रजाजनों में अत्यन्त लोकप्रिय हो गये। उनके गुणों तथा लोकप्रियता को देखते हुये भीष्म पितामह ने धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर के राज्याभिषेक कर देने के लिये कहा। दुर्योधन नहीं चाहता था कि युधिष्ठिर राजा बने अतः उसने अपने पिता धृतराष्ट्र से कहा, “पिताजी! यदि एक बार युधिष्ठिर को राजसिंहासन प्राप्त हो गया तो यह राज्य सदा के लिये पाण्डवों के वंश का हो जायेगा और हम कौरवों को उनका सेवक बन कर रहना पड़ेगा।” इस पर धृतराष्ट्र बोले, “वत्स दुर्योधन! युधिष्ठिर हमारे कुल के सन्तानों में सबसे बड़ा है इसलिये इस राज्य पर उसी का अधिकार है। फिर भीष्म तथा प्रजाजन भी उसी को राजा बनाना चाहते हैं। हम इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते।” धृतराष्ट्र के वचनों को सुन कर दुर्योधन ने कहा, “पिताजी! मैंने इसका प्रबन्ध कर लिया है। बस आप किसी तरह पाण्डवों को वारणावत भेज दें।” दुर्योधन ने वारणावत में पाण्डवों के निवास के लिये पुरोचन नामक शिल्पी से एक भवन का निर्माण करवाया था जो कि लाख, चर्बी, सूखी घास, मूंज जैसे अत्यन्त ज्वलनशील पदार्थों से बना था। दुर्योधन ने पाण्डवों को उस भवन में जला डालने का षड़यन्त्र रचा था। धृतराष्ट्र के कहने पर युधिष्ठिर अपनी माता तथा भाइयों के साथ वारणावत जाने के लिये निकल पड़े। दुर्योधन के षड़यन्त्र के विषय में विदुर को पता चल गया। अतः वे वारणावत जाते हुये पाण्डवों से मार्ग मे मिले तथा उनसे बोले, “देखो, दुर्योधन ने तुम लोगों के रहने के लिये वारणावत नगर में एक ज्वलनशील पदार्थों एक भवन बनवाया है जो आग लगते ही भड़क उठेगा। इसलिये तुम लोग भवन के अन्दर से वन तक पहुँचने के लिये एक सुरंग अवश्य बनवा लेना जिससे कि आग लगने पर तुम लोग अपनी रक्षा कर सको। मैं सुरंग बनाने वाला कारीगर चुपके से तुम लोगों के पास भेज दूँगा। तुम लोग उस लाक्षागृह में अत्यन्त सावधानी के साथ रहना।” वारणावत में युधिष्ठिर ने अपने चाचा विदुर के भेजे गये कारीगर की सहायता से गुप्त सुरंग बनवा ली। पांडव नित्य आखेट के लिये वन जाने के बहाने अपने छिपने के लिये स्थान की खोज करने लगे। कुछ दिन इसी तरह बिताने के बाद एक दिन यधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा, “भीम! अब दुष्ट पुरोचन को इसी लाक्षागृह में जला कर हमें भाग निकलना चाहिये।” भीम ने उसी रात्रि पुरोचन को किसी बहाने बुलवाया और उसे उस भवन के एक कक्ष में बन्दी बना दिया। उसके पश्चात् भवन में आग लगा दिया और अपनी माता कुन्ती एवं भाइयों के साथ सुरंग के रास्ते वन में भाग निकले। लाक्षागृह के भस्म होने का समाचार जब हस्तिनापुर पहुँचा तो पाण्डवों को मरा समझ कर वहाँ की प्रजा अत्यन्त दुःखी हुई। दुर्योधन और धृतराष्ट्र सहित सभी कौरवों ने भी शोक मनाने का दिखावा किया और अन्त में उन्होंने पाण्डवों की अन्त्येष्टि करवा दी।"
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