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#महाभारत 🙏🌹एक गाय की सत्यनिष्ठा 🌹🙏 (महाभारत का एक प्रसंग) 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 महाभारत में एक प्रसंग है। चंद्रावती पुरी में चंद्रसेन नाम का एक राजा था। उसी राज्य के एक गांव में हरि भक्त ब्राह्मण के घर बहुला नाम की गाय थी। वह हंस के समान श्वेत थी। यमुना तट के निकट एक पर्वत की गुफाओं में अनेक जीव जंतु रहते थे। पर्वत के पास नदी के किनारे गायें घास चरने जाया करती थी। इन्हीं गायों के साथ बहुला गाय भी घास चरने जाती थी। एक दिन बहुला घास चरते चरते पर्वत के निकट आ गई। तभी पास की गुफा से एक भयंकर सिंह निकला और गाय की तरफ तेजी से झपटा और बोला कि, मैं तुझे खा जाऊंगा। वह गाय अपने बछड़े को याद करके रोने लगी तथा सिंह से बोली- ‘मुझे मृत्यु का भय नहीं है, जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है, किंतु मेरा बछड़ा अभी दूध पीता है, मुझे उससे बड़ा प्रेम है, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा, अत: मैं उसको दूध पिला कर वापस आ जाऊंगी, तब तुम मुझे खा लेना।’ मुझे मुर्ख समझती है? इस तरह झूठ बोलकर मरने से बचना चाहती है! घर में जाकर तू अपने बछड़े को छोड़कर क्या पुन: वापस आएगी? बहुला बोली कि ‘यदि मैं वापस ना आऊं तो मुझे गुरु हत्या जैसा घोर पाप लगे और घोर पातक कृत्यों का जो फल मिलता है, वह मुझे मिले यदि मैं वापस ना आऊं! ऐसा कहकर गाय ने वापस आने की शपथ ली। सिंह को गाय की बातों पर विश्वास हो गया और वह आश्वस्त हो गया कि वह वापस आएगी। सिंह की अनुमति से गाय घर आ गई। उसे देखकर बछड़ा दौड़ता हुआ उसके पास आया। गाय ने उसे चूमा तथा दूध पिलाया, किंतु बछड़े को यह आभास हो गया कि उसकी मां बहुत दुखी है। उसने मां से दुखी होने का कारण पूछा, तो बड़े उदास मन से बहुला ने बताया कि उसे सिंह के पास वापस जाना है, ऐसा वचन देकर वह आई है। सिंह उसको मार कर खा जाएगा। यह कहकर मां बोली- बेटा! आज जी भर कर देख लो, कल से हमारी भेंट नहीं होगी। इस पर बछड़ा बोला मैं तुम्हारे बदले में सिंह के पास चला जाऊंगा। माँ ने उसे समझा कर नकार दिया। फिर वह गाय अपनी सहेली गायों के पास गई। उनसे अंतिम भेंट की। सभी गायों के मना करने पर भी बहुला गाय सब से विदा लेकर पर्वत की ओर चल दी और वह सिंह के पास जाकर बोली-‘ मैं आ गई हूं, मुझे खाकर अपनी भूख मिटाओ। वह क्रूरता सिंह गौ माता के सत्य पालन के आगे नतमस्तक हो गया और बोला-‘ हे माता! मैं तुम्हें नहीं खाऊंगा, चाहे भूख से मेरी मृत्यु ही क्यों ना हो जाए। सत्य बोलने वाला कहीं दुख पाता है? सत्य में सर्वधर्म है। सत्य में ज्ञान तथा मुक्ति है। धन्य है वह भूमि जहां तुम रहती हो। धन्य है वह लोग जो तुम्हारा दूध पीते हैं। सिंह ने भविष्य में जीव मात्र की हिंसा छोड़ दी, वह गाय से बोला-हे माता! हमारे अपराधों को क्षमा करो तथा अपने घर जाओ। जीव मात्र की हिंसा के त्याग के प्रभाव से, सिंह को मोक्ष की प्राप्ति हुई। विशेष :: यह कथा महाभारत से ली गई है और "*सत्य*" की महिमा का बखान करती है l 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 इसी कथा को बहुला चतुर्थी व्रत में इस प्रकार कहा गया है l बहुला चतुर्थी व्रत की प्रचलित कथा...। बहुला चतुर्थी व्रत से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप लेकर अवतार लिया। कामधेनु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई। भगवान श्रीकृष्ण का बहुला गाय से बड़ा स्नेह था। एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में चर रही थी तब भगवान सिंह रूप में प्रकट हो गए। मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली, 'हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है। बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी।' सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं, तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा ही रह जाऊंगा। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आऊंगी। बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया। बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई। बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि 'हे बहुला, तुम परीक्षा में सफल हुई। अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ-माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा।' 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 🙏🌹🌺गीता ज्ञान🌺🌹🙏 मूल श्लोकः दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।। ।।16.5।।इन दोनों सम्पत्तियोंका कार्य बतलाया जाता है --, जो दैवी सम्पत्ति है? वह तो संसारबन्धनसे मुक्त करनेके लिये है? तथा आसुरी और राक्षसी सम्पत्ति निःसन्देह बन्धनके लिये मानी गयी है। निश्चित बन्धनका नाम निबन्ध है? उसके लिये मानी गयी है। इतना कहनेके उपरान्त अर्जुनके अन्तःकरणमें यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर? कि क्या मैं आसुरी सम्पत्तिसे युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पत्तिसे भगवान् बोले -- हे पाण्डव शोक मत कर? तू दैवी सम्पत्तिको लेकर उत्पन्न हुआ है। अर्थात् भविष्यमें तेरा कल्याण होनेवाला है। विशेष ::हमेशा याद रखो तामसिक भोजन आसुरी सम्पति का निर्माण करता है अतः सात्विक आहार ही खाये l तामसिक आहार से शने: शने: बुद्धी मंद होती जाती है और अज्ञान, जड़ता एवं मूढमति बनाती है और अंततः अधम योनि में जन्म मिलता है l ये भी ध्यान मे रखना चाहिए कि ईश्वर ने मनुष्य को दुर्लभ योनि इसलिये कहा है कि उसके पास 3 दिव्य कोष है वे है 1. बुद्धी, 2. महतत्त्व यानि मन जहां विचारो का उत्पादन होता है और 3. अहंकार l ईन तीनों दिव्य कोषों को तामसिक आहार मन्द कर देता है /नष्ट कर देता है और अंत में अधम योनि मे प्रवेश होता है l 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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