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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 320) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एवं धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुषम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य विवाहायोपचक्रमे ।। ५९ ।। सत्यवत्या सह मिथः कृत्वा निश्चयमात्मवान् । विवाहं कारयिष्यन्तं भीष्मं काशिपतेः सुता । ज्येष्ठा तासामिदं वाक्यमब्रवीद्धसती तदा ।। ६० ।। धर्मज्ञ एवं जितात्मा भीष्मजी इस प्रकार धर्मपूर्वक अलौकिक पराक्रम करके माता सत्यवतीसे सलाह ले एक निश्चयपर पहुँचकर भाई विचित्रवीर्यके विवाहकी तैयारी करने लगे। काशिराजकी उन कन्याओंमें जो सबसे बड़ी थी, वह बड़ी सती-साध्वी थी। उसने जब सुना कि भीष्मजी मेरा विवाह अपने छोटे भाईके साथ करेंगे, तब वह उनसे हँसती हुई इस प्रकार बोली- ।। ५९-६० ।। मया सौभपतिः पूर्वं मनसा हि वृतः पतिः । तेन चास्मि वृता पूर्वमेष कामश्च मे पितुः ।। ६१ ।। 'धर्मात्मन् ! मैंने पहलेसे ही मन-ही-मन सौभ नामक विमानके अधिपति राजा शाल्वको पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन्होंने भी पूर्वकालमें मेरा वरण किया था। मेरे पिताजीकी भी यही इच्छा थी कि मेरा विवाह शाल्वके साथ हो ।। ६१ ।। मया वरयितव्योऽभूच्छाल्वस्तस्मिन् स्वयंवरे । एतद् विज्ञाय धर्मज्ञ धर्मतत्त्वं समाचर ।। ६२ ।। 'उस स्वयंवरमें मुझे राजा शाल्वका ही वरण करना था। धर्मज्ञ ! इन सब बातोंको सोच-समझकर जो धर्मका सार प्रतीत हो, वही कार्य कीजिये' ।। ६२ ।। एवमुक्तस्तया भीष्मः कन्यया विप्रसंसदि । चिन्तामभ्यगमद् वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ।। ६३ ।। जब उस कन्या ने ब्राह्मणमण्डली के बीच वीरवर भीष्मजी से इस प्रकार कहा, तब वे उस वैवाहिक कर्मके विषयमें युक्तियुक्त विचार करने लगे ।। ६३ ।। विनिश्चित्य स धर्मज्ञो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । अनुजने तदा ज्येष्ठामम्बां काशिपतेः सुताम् ।। ६४ ।। वे स्वयं भी धर्मके ज्ञाता थे, फिर भी वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ भलीभाँति विचार करके उन्होंने काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री अम्बाको उस समय शाल्वके यहाँ जानेकी अनुमति दे दी ।। ६४ ।। अम्बिकाम्बालिके भार्ये प्रादाद् भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ६५ ।। शेष दो कन्याओंका नाम अम्बिका और अम्बालिका था। उन्हें भीष्मजीने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार छोटे भाई विचित्रवीर्यको पत्नीरूपमें प्रदान किया ।। ६५ ।। तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ।। ६६ ।। उन दोनों का पाणिग्रहण करके रूप और यौवनके अभिमानसे भरे हुए धर्मात्मा विचित्रवीर्य कामात्मा बन गये ।। ६६ ।। ते चापि बृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे। रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपयोधरे ।। ६७ ।। उनकी वे दोनों पत्नियाँ सयानी थीं। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी हो चुकी थी। उनके केश नीले और घुँघराले थे; हाथ-पैरोंके नख लाल और ऊँचे थे; नितम्ब और उरोज स्थूल और उभरे हुए थे ।। ६७ ।। आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लब्धः पतिरिति स्थिते । विचित्रवीर्य कल्याण्यौ पूजयामासतुः शुभे ।। ६८ ।। वे यह जानकर संतुष्ट थीं कि हम दोनोंको अपने अनुरूप पति मिले हैं; अतः वे दोनों कल्याणमयी देवियाँ विचित्रवीर्यकी बड़ी सेवा-पूजा करने लगीं ।। ६८ ।। स चाश्विरूपसदृशो देवतुल्यपराक्रमः । सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनो रहः ।। ६९ ।। विचित्रवीर्यका रूप अश्विनीकुमारोंके समान था। वे देवताओंके समान पराक्रमी थे। एकान्तमें वे सभी नारियोंके मनको मोह लेनेकी शक्ति रखते थे ।। ६९ ।। ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन् पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्मणा समगृह्यत ।। ७० ।। राजा विचित्रवीर्यने उन दोनों पत्नियोंके साथ सात वर्षोंतक निरन्तर विहार किया; अतः उस असंयमके परिणामस्वरूप वे युवावस्थामें ही राजयक्ष्माके शिकार हो गये ।। ७० ।। सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः । जगामास्तमिवादित्यः कौरव्यो यमसादनम् ।। ७१ ।। उनके हितैषी सगे-सम्बन्धियोंने नामी और विश्वसनीय चिकित्सकोंके साथ उनके रोग-निवारणकी पूरी चेष्टा की, तो भी जैसे सूर्य अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी प्रकार वे कौरवनरेश यमलोकको चले गये ।। ७१ ।। धर्मात्मा स तु गाङ्गेयश्चिन्ताशोकपरायणः। प्रेतकार्याणि सर्वाणि तस्य सम्यगकारयत् ।। ७२ ।। राज्ञो विचित्रवीर्यस्य सत्यवत्या मते स्थितः । ऋत्विग्भिः सहितो भीष्मः सर्वैश्च कुरुपुङ्गवैः ।। ७३ ।। धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्मजी भाईकी मृत्युसे चिन्ता और शोकमें डूब गये। फिर माता सत्यवतीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले उन भीष्मजीने ऋत्विजों तथा कुरुकुलके समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ राजा विचित्रवीर्यके सभी प्रेतकार्य अच्छी तरह कराये ।। ७२-७३ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि विचित्रवीर्योपरमे द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें विचित्रवीर्यका निधनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतम् श्रीमहाभारतम् - ShareChat
राजाधिराज द्वारकाधीश जी के श्रृंगार आरती दर्शन🙏🏻 #🙏🌹 जय द्वारकाधीश 🌹🙏 श्री द्वारकाधीश मंदिर द्वारका,गुजरात दिनांक :- 22/02/2026 रविवार
🙏🌹 जय द्वारकाधीश 🌹🙏 - ShareChat
. #🌺राधा कृष्ण💞 #🥰मथुरा-वृंदावन की होली 🤗 #😊होली स्पेशल 🤘 #🎨होली की मस्ती 🤣 कोन के पोंछे हें नयन ll ध्रु ll कोनके गेह नेह रस पागे वे गोरी कछु ओर l देहु बताय कान राखति हों ऐसे भये चितचोर ll 1 ll अधरन अंजन लिलाट महावर राजत पिक कपोल l घुमि रहे रजनी जागेसे दुरत न काम कलोल ll 2 ll नखनिशान राजत छतियन पर निरखो नयन निहार l झुम रहीं अलके अलबेली पागके पेंच संवार ll 3 ll हम डरपे जसुदाजुके त्रासन नागर नंदकिशोर l पाय परे फगुवा प्रभु देहो मुरली देहो अकोर ll 4 ll धन्य धन्य गोकुलकी गोपी, जीन हरी लीने हराय l ‘नंददास’ प्रभु कीये कनोड़े छोड़े नाच नचाय ll 5 ll ...
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#🥰मथुरा-वृंदावन की होली 🤗 #🌺राधा कृष्ण💞 #🎨होली की मस्ती 🤣 #😊होली स्पेशल 🤘 . मग आज अचानक भेंट भई दोऊ दैंन चह्यौ एक एक को चुक्का। इत प्रीतम प्यारे ने बांह धरी। उत प्यारी ने मारयौ अबीर को बुक्का।। कर छांडि तबैं दृग मींजे लगे यों लगाय कें आपुनों तीर पै तुक्का। अली गाल मसोस गई मुसकाय जमाय के पीठ पै जोर सों मुक्का ।। .
🥰मथुरा-वृंदावन की होली 🤗 - ShareChat
. #राधे #राधे कृष्ण #🌺राधा कृष्ण💞 #📝होली कोट्स 😊 नित आयौ कर लाला तोते सब राजी। सास हु राजी तोते ससुर हु राजी, कहा करे बलमा पाजी ॥ उड़द की दार गेंहुन के फुलका, बैंगन साग चना भाजी । पुरुषोत्तम प्रभू की छवि निरखें, या रसिया सो मेरो मन राजी ॥ ... #🥰मथुरा-वृंदावन की होली 🤗
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#जय श्री कृष्ण ⁉️जब यादवों का नाश हुआ तो उद्धव जी कैसे बच गए थे?⁉️ 👩‍❤️‍👩एक बार द्वारकापुरी में खेलते हुए यदुवंशी और भोजवंशी बालकों को खेल-खेल में कुछ मुनीश्वरों को चिढ़ा दिया। तब यादव कुल का नाश ही भगवान को अभीष्ट है—यह समझकर उन ऋषियों ने बालकों को शाप दे दिया ॥ 👩‍❤️‍👩 🤹इसके कुछ ही महीने बाद भावीवश वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी यादव बड़े हर्ष से रथों पर चढ़कर प्रभास क्षेत्र को गये ॥ वहाँ स्नान करके उन्होंने उस तीर्थ के जल से पितर, देवता और ऋषियों का तर्पण किया तथा ब्राह्मणों को श्रेष्ठ गौएँ दीं। उन्होंने सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, पालकी, रथ, हाथी, कन्याएँ और ऐसी भूमि जिससे जीविका चल सके तथा नाना प्रकार के सरस अन्न भी भगवत अर्पण करके ब्राह्मणों को दिये। इसके पश्चात् गौ और ब्राह्मणों के लिये ही प्राण धारण करने वाले उन वीरों ने पृथ्वी पर सिर टेककर उन्हें प्रणाम किया।🤹 🛐उद्धवजी ने कहा—फिर ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर यादवों ने भोजन और वारुणी मदिरा पी ।उससे उनका ज्ञान नष्ट हो गया और वे दुर्बचनों से एक-दूसरे के हृदय को चोट पहुँचाने लगे । मदिरा के नशे से उनकी बुद्धि बिगड़ गयी और जैसे आपस की रगड़ से बाँसों में आग लग जाती है, उसी प्रकार सूर्यास्त होते-होते उनमें मार-काट होने लगी ॥🛐 🕉️भगवान् अपनी माया की उन विचित्र गतियों को देखकर सरस्वती के जल से आचमन करके एक वृक्ष के नीचे बैठ गये । इससे पहले ही शरणगतों के दुःख दूर करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने कुल का संहार करने की इच्छा होने पर मुझसे कह दिया था कि तुम बदरिकाश्रम चले जाओ । विदुरजी! इससे यद्यपि मैं उनका आशय समझ गया था, तो भी स्वामी के चरणों का वियोग न सह सकने के कारण मैं पीछे-पीछे प्रभासक्षेत्र में पहुँच गया । वहाँ मैंने देखा कि जो सबके आश्रय हैं किन्तु जिनका कोई और आश्रय नहीं है, वे प्रियतम प्रभु शोभाधाम श्याम सुन्दर सरस्वती के तट पर अकेले ही बैठे हैं ॥ दिव्य विशुद्ध- सत्त्वमय अत्यन्त सुन्दर शरीर है, शान्ति से भरी रतनाऱी आँखें हैं। उनको चार भुजाएँ और रेशमी पीताम्बर देखकर मैंने उनको दूर से ही पहचान लिया ॥ वे एक पीपल के छोटे-से वृक्ष का सहारा लिये बायीं जाँघ पर दायाँ चरण कमल रखे बैठे थे। भोजन-पान का त्याग कर देने पर भी वे आनन्द से प्रफुल्लित हो रहे थे ॥ इसी समय व्यासजी के प्रिय मित्र परम भागवत सिद्ध मैत्रेयजी लोगों में स्वच्छन्द विचरते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ मैत्रेय मुनि भगवान् के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभाव से उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरि ने प्रेम एवं मुस्कान युक्त चितवन से मुझे आनन्दित हुए कहा ॥🕉️ ❣️श्रीभगवान् कहने लगे—मैं तुम्हारी आन्तरिक अभिलाषा जानता हूँ; इसलिये मैं तुम्हें वह ज्ञान देता हूँ, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है। उद्धव! तुम पूर्वजन्म में वसु थे। विश्व की रचना करने वाले प्रजापतियों और वसुओं के यज्ञ में मुझे पाने की इच्छा से ही तुमने मेरी आराधना की थी । साधु स्वभाव उद्धव! संसार में तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है । क्योंकि इसमें तुमने मेरा अनूपम पद प्राप्त कर लिया है। अब मैं मर्त्यलोक को छोड़कर अपने धाम में जाना चाहता हूँ। इस समय यहाँ एकान्त में तुमसे अपनी अनन्य भक्ति के कारण ही मेरा दर्शन पाया है, यह बड़े सौभाग्य की बात है। पूर्वकाल (पाद्मकल्प)-के आरम्भ में मैंने अपने नाभिकमल पर बैठे हुए ब्रह्मा को अपनी महिमा के प्रकट करने वाले जिस श्रेष्ठ ज्ञान का उपदेश किया था और जिसे विवेकी लोग 'भागवत' कहते हैं, वही मैं तुम्हें देता हूँ ॥ विदुरजी! मुझ पर तो प्रतिक्षण उन परम पुरुष की कृपा बरस रही थी। इस समय उनके इस प्रकार आदर पूर्वक कहने से स्नेहवश मुझे रोमांच हो आया, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उस समय मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा—'स्वामिन्! आपके चरण कमलों के सेवक के लिये इस संसार में अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों में से कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है; तथापि मुझ में किसी की इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरण कमलों की सेवा के लिये ही लालायित रहता हूँ ॥ ❣️ 🙏 प्रभो! आप निःस्पृह होकर भी कर्म करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, कालस्वरूप होकर भी शत्रु के डर से भागते हैं और द्वारका के किले में जाकर छिप रहते हैं तथा स्वात्माराम होकर भी सोलह हजार स्त्रियों के साथ रमण करते हैं—इन विचित्र चरित्रों को देखकर विद्वानों की बुद्धि भी चक्कर में पड़ जाती है । देव! आपका स्वरूपज्ञान सर्वथा अबाध और अखण्ड है। फिर भी आप सलाह लेने के लिये मुझे बुलाकर जो भोले मनुष्यों की तरह बड़ी सावधानी से मेरी सन्मति पूछा करते थे, प्रभो! आपकी वह लीला मेरे मन को मोहित-सा कर देती है। स्वामिन्! आपने जो अपने स्वरूप का गुह्य रहस्य प्रकट करने वाला जो परम ज्ञान ब्रह्माजी को बतलाया था, वह यदि मेरे समझने योग्य हो तो मुझे भी सुनाइये, जिससे मैं भी इस संसार-दुःख को सुगमता से पार कर जाऊँ' ॥ 🙏 🛐जब मैंने इस प्रकार अपने हृदय का भाव निवेदित किया, तब परमपुरुष कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे अपने स्वरूप को परम स्थिति का उपदेश दिया ॥ इस प्रकार पूज्यपाद गुरु श्रीकृष्ण से आत्मतत्त्व की उपलब्धि की साधना सुनकर तथा उन प्रभु के चरणोंकी वन्दना और परिक्रमा करके मैं यहीं आया हूँ। इस समय उनके विरह से मेरा चित्त अत्यन्त व्याकुल हो रहा है ॥🛐 🧘विदुरजी! पहले तो उनके दर्शन पाकर मुझे आनन्द हुआ था, किन्तु अब तो मैं हृदय की उनकी विरह व्यथा से अत्यन्त पीड़ित हूँ। अब मैं उनके प्रिय क्षेत्र बदरिकाश्रम को जा रहा हूँ, जहाँ भगवान् श्रीनारायणदेव और नर—ये दोनों ऋषि लोगों पर अनुग्रह करने के लिये दीर्घकालीन सौम्य, दूसरों को सुख पहुँचाने वाली एवं कठिन तपस्या कर रहे हैं ॥ 🧘 🛐श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजी के मुख से अपने प्रिय बन्धु-बान्धवों के विनाश का असह्य समाचार सुनकर तथा स्नेहवश विदुरजी को जो शोक उत्पन्न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञान द्वारा शान्त कर दिया ॥🛐 👩‍❤️‍👩जब भगवान् श्रीकृष्ण के परिकरों में प्रधान महाभागवत उद्धव जी बदरिकाश्रम की ओर जाने लगे, तब कुरुश्रेष्ठ विदुर जी ने श्रद्धा पूर्वक उनसे पूछा ॥ 👩‍❤️‍👩 🧘विदुरजी ने कहा—उद्धवजी! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप के गुह्य रहस्य को प्रकट करनेवाला जो परमज्ञान आपसे कहा था, वह आप हमें भी सुनाइये क्योंकि सेवक को तो अपने सेवकों का कार्य सिद्ध करने के लिये ही विचरना करते हैं ॥ 🧘 🛐उद्धवजी ने कहा - उस तत्त्वज्ञान के लिये आपको मुनिवर मैत्रेयजी की सेवा करनी चाहिए। इस मृत्युलोक को छोड़ते समय मेरे सामने स्वयं भगवान् ने ही आपको उपदेश करने के लिये आज्ञा दी थी।🛐 🙏 !!जय श्री कृष्ण !!🙏
जय श्री कृष्ण - !! எுளிதா !! !! எுளிதா !! - ShareChat
#जय श्री कृष्ण शीर्षक: 🚩 मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का असली कारण क्या है? 🚩 एक बार द्वारकाधीश श्री कृष्ण महल में दातुन कर रहे थे और देवी रुक्मिणी सेवा में खड़ी थीं। अचानक प्रभु जोर से हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने संकोच में पूछा- "प्रभु, क्या मुझसे कोई भूल हुई? आप अचानक क्यों हंसे?" भगवान ने मुस्कुराते हुए सामने दीवार पर दौड़ रहे एक चींटे की ओर इशारा किया और कहा— "प्रिये, मैं इस चींटे को अब तक 14 बार 'इंद्र' बना चुका हूँ, लेकिन इसकी भोग की इच्छा (वासना) अब भी शांत नहीं हुई है। आज यह एक चींटी के पीछे पागल होकर दौड़ रहा है। अपनी माया की इसी प्रबलता को देखकर मुझे हंसी आ गई।" इस कहानी का सार: वासना ही पुनर्जन्म का कारण है: हम चाहे कितनी भी ऊंची पदवी पा लें, यदि मन इंद्रियों का गुलाम है, तो जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा। तृष्णा का कोई अंत नहीं: जैसे अग्नि में घी डालने से वह और भड़कती है, वैसे ही भोगों से कामनाएं और बढ़ती हैं। सुख का मार्ग: "नास्ति त्यागसमं सुखम्" अर्थात त्याग के समान कोई सुख नहीं है। जब तक वासना क्षीण नहीं होती, मुक्ति संभव नहीं। मन को विषयों से हटाकर केवल प्रभु के चरणों में लगाना ही शांति का एकमात्र मार्ग है। 🙏
जय श्री कृष्ण - वासना ही पुनर्जन्म কা কাতো द्वारकानाथ श्रीकृष्ण और चीँटें का रहस्य त्याग ही परम सुख है। वासना ही पुनर्जन्म কা কাতো द्वारकानाथ श्रीकृष्ण और चीँटें का रहस्य त्याग ही परम सुख है। - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख ‼️अगर मनुष्य अपनी चीज (परमात्मा)-को अपनी मान ले, परायी चीज (शरीर-संसार)-को अपनी न माने तो बस, एकदम मुक्त हो जाय‒इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । गीता में जहाँ गुणातीत महापुरुष के लक्षण लिखे हैं, वहाँ ‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (१४ । २४) लिखा है, जो अपने-आपमें, अपनी जगह स्थित हो जाता है वह सुख-दुःख में सम हो जाता है, मुक्त हो जाता है, यह जो दूसरे से आशा रखना है, यह महान् कायरता है, बड़ी भारी निर्बलता है । यह कायरता, निर्बलता अपनी बनायी हुई है, मूल में है नहीं । आप अपनी जगह बैठें, अपनी चीज को अपनी मानें, परायी चीज को अपनी न मानें‒इसमें निर्बलता, कठिनता क्या है ?‼️ 👩‍❤️‍👩दूसरे लोग मेरे को क्या कहेंगे, क्या समझेंगे‒यह भय महान् अनर्थ करनेवाला है । इस भय को छोड़ कर निधड़क हो जाना चाहिये । दूसरे खराब कहते हैं तो हम डरते हैं, तो क्या दूसरे खराब नहीं कहेंगे ? वे तो जैसी मरजी होगी, वैसा कहेंगे । हम भयभीत हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे और भयभीत न हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे । उनके मन में जैसी बात आयेगी, वैसा कहेंगे वे । क्या हमारे भयभीत होने से वे हमारे को अच्छा कहने लग जायँगे ? यह सम्भव ही नहीं है । दूसरे क्या कहते हैं‒इसको न देखकर अपनी बात पर डटे रहो, अपने काम पर ठीक रहो, यह बहुत बड़े लाभ की बात है ।👩‍❤️‍👩 🛐आपके निःशंक, निर्भय होने में एक ही बात है कि अगर आपको कोई खराब कहे तो आप अपनी दृष्टि से अपने को देखो कि मैंने तो कोई गलती नहीं की, न्यायविरुद्ध कोई काम नहीं किया । इस तरह अपने पर जितना विश्वास कर सकें, दृढता से जितना रह सकें उतना रह जाओ तो आपके सब भय मिट जायँगे । हमने जब कोई गलती नहीं की तो डर किस बात का ? अपने आचरण पर, अपने भाव पर आप दृढ़ रहो । इससे बड़ा भारी बल मिलता है । हम जब ठीक हैं, सच्चे हैं, तो फिर भय किस बात का ? अपने पर अपना विश्वास न होने से ही अनर्थ होते हैं । हम जब अपनी जगह बहुत ठीक हैं, हमारी नीयत ठीक है, कार्य ठीक है, विचार ठीक है, भाव ठीक है, तो फिर दूसरे से कभी किंचिन्मात्र भी आशा मत रखो, इच्छा मत करो कि दूसरा हमें अच्छा समझे । दूसरे के बुरा समझने से भय मत करो । दूसरा कितना ही बुरा समझे, हम तो जैसे हैं, वैसा ही रहेंगे । अगर हम अच्छे नहीं हैं और सब लोग हमें अच्छा समझते हैं, तो क्या हमारा अच्छापन सिद्ध हो जायगा ?🛐 ⁉️यदि अपनी गलती अपने को नजर नहीं आये तो ?⁉️ 🙏अपनी गलती अपने को नजर नहीं आने का कारण है‒स्वार्थ और अभिमान । स्वार्थ और अभिमान से ऐसा ढक्कन लग जाता है कि अपनी गलती अपने को नहीं दीखती । अतः स्वार्थ और अभिमान न करें । स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से बहुत प्रकाश मिलेगा और अपनी गलती दीखने लग जायगी ।🙏
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#🕉️सनातन धर्म🚩 महर्षि याज्ञवल्क्य जयन्ती विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जीवन का परिचय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ महर्षि याज्ञवल्क्य जी का नाम एक महान अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा, श्रीरामकथा के प्रवक्ता के रूप में सबने सुना है। इनका नाम ऋषि परम्परा में बड़े आदर के साथ लिया जाता हैं। पुराणों में इन्हें ब्रह्मा जी का अवतार बताया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य वेदाचार्य महर्षि वैशम्पायन के शिष्य थे। इन्होंने अपने गुरु वैशम्पायन जी से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। एक मान्यता के अनुसार एक बार गुरु से कुछ विवाद हो जाने के कारण गुरु वैशम्पायन जी इनसे रुष्ट हो गये और कहने लगे कि तुम मेरे द्वारा पढ़ाई गई यजुर्वेद को वमन कर दो। गुरुजी की आज्ञा पाकर याज्ञवल्क्य जी ने अन्नरूप में वे सब ऋचाएं वमन कर दी जिन्हें वैशम्पायन जी के दूसरे शिष्यों ने तीतर, बनकर ग्रहण कर लिया। यजुर्वेद की वही शाखा जो तीतर बनकर ग्रहण की गयी तैतरीय शाखा के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके पश्चात् याज्ञवल्क्य जी एक अन्य गुरुकुल में गये वहां पर विद्याध्ययन करने लगे। इनकी सीखने की प्रवृत्ति भी तीव्र थी। ये स्वाभिमानी स्वभाव के थे। यहां भी किसी बात को लेकर गुरु के साथ इनका विवाद हो गया और इन्होंने सोचा मैं इस लोक में किसी को अपना गुरु नहीं बनाऊंगा। अब उन्होंने वेद ज्ञान व अध्यात्म के विद्या को प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया व इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इन्होंने भगवान सूर्य की उपासना की। याज्ञवल्क्य की स्तुति प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य प्रकट हुए व कहा कि मैं आपकी जिह्वा पर साक्षात् सरस्वती को विराजमान करता हूं। इसके पश्चात् सूर्य से प्राप्त ज्ञान के आधार पर 'सरस्वती' की कृपा से इन्होंने 'शुक्ल यजुर्वेद की रचना की जो पहले से विद्यमान नहीं थी । ज्ञानार्जन में ये अपने समय के ऋषियों में अग्रणी रहे। दिनोंदिन इनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी, इनके शिष्यों की संख्या बढ़ती गयी। कहा जाता है इनके पूर्व के गुरुओं ने भी इनका शिष्यत्व ग्रहण कर अध्यात्म क्षेत्र की उच्च अवस्थाओं को इनसे जाना । अध्ययन के बाद इन्होंने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। इनकी पहली पत्नी का नाम कात्यायनी था। इनका एक राजपरिवार में आना जाना था। वहां के सेनापति के साथ इनके पारिवारिक संबंध थे। उसकी पुत्री मैत्रेयी इनके तेजस्वी रूप पर और उच्चतम ब्रह्मविद्या के फलस्वरूप इनके प्रति आसक्त हो गयी। जब इस बात का पता इनकी पहली पत्नी कात्यायनी को चला तो उसने याज्ञवल्क्य जी को सहर्ष मैत्रेयी से विवाह के लिए तैयार किया। इस प्रकार इनकी दूसरी शादी सम्पन्न हुई। कात्यायनी और मैत्रेयी भी अपने समय की विदुषी महिलाएं थीं। याज्ञवल्क्य मिथिला नरेश जनक के पुरोहित थे। राजा जनक सच्चे जिज्ञासु थे। वे किसी ब्रह्मनिष्ठ को अपना गुरु बनाना चाहते थे। जनक जी ने इस प्रकार उनके पांडित्य की परीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु बनाया। और उनके द्वारा ब्रह्म ज्ञान का सम्पादन किया। याज्ञवल्क्य जी के तीन पुत्र और अनेकानेक शिष्य हुए। इनकी पत्नी पुत्र सभी उच्च कोटि के विद्वान थे ये उच्च कोटि के विद्वान् के साथ साथ एक सच्चे ब्रह्मवेत्ता योगी थे। इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें याज्ञवल्क्य स्मृति इनका प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह स्मृति ग्रंथ आचाराध्याय व्यवहाराध्याय तथा प्रयासचित्ताध्याय इन तीन भागों में विभक्त है। आचाराध्याय में वर्णक्रम धर्म-अधर्म विषयक तथा व्यवहाराध्याय में प्रायश्चित विषयक, उपदेश और आवश्यक बातें बतायी गयी हैं। इस ग्रंथ पर विज्ञानेश्वर पंडित की मिताक्षरा नामक टीका है। मिताक्षरा अति प्रसिद्ध है। ब्रिटिश काल में न्यायालयों में हिन्दुओं के धार्मिक प्रश्नों को हल करने के लिए इसका संदर्भ लिया जाता था। याज्ञवल्क्य जी ने आयु के चौथे प्रहर में सन्यास ग्रहण किया और वन में जाकर योग साधना की। इनके सन्यास धारण की घटना भी बड़ी रोचक है। घटना इस प्रकार घटी - एक बार राजा जनक ने पूछा भगवन् वैराग्य किसे कहते हैं? आप कहते हैं कि वैराग्य के बिना मुक्ति संभव नहीं है। मुझे सत्य सुबूत जानने की बड़ी उत्कंठा है। जनक का यह प्रश्न सुनकर याज्ञवल्क्य विचार करने लगे कि जनक ने ऐसा प्रश्न क्यों किया। मूढ़ को तो वैराग्य की व्याख्या करके समझाया जा सकता है। परन्तु जनक तो तत्वज्ञानी हैं। शायद जनक वैराग्य को प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, क्योंकि वैराग्य को तो हम दोनों ही जानते हैं किन्तु उसका आचरण नहीं करते। इस प्रकार विचार कर याज्ञवल्क्य ने कहा कि राजन इस प्रश्न का उत्तर कल दूंगा।' और याज्ञवल्क्य घर जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का बंटवारा दोनों पत्नियों में बराबर करना चाहा। जिस पर मैत्रेयी ने कहा कि हे प्राणानाथ! मुझे लोक सम्पदा नहीं चाहिए। मुझे तो आप आध्यात्मिक उपदेश दीजिए जिससे मेरा कल्याण हो सके इस पर याज्ञवल्क्य ने सारी सम्पत्ति कात्यायनी को देकर मैत्रेयी को आध्यात्मिक उपदेश देते हुए मत्यु के रहस्य को समझाया। प्रातः काल मैत्रेयी के साथ सन्यास धारण किया । यथासमय कौपीन धारण कर राजा जनक की सभा में जाकर उन्हें प्रणाम किया। राजा जनक ने विस्मित होकर पूछा कि यह क्या है? याज्ञवल्क्य ने कहा जनक यह तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। यही वैराग्य का सत्य स्वरूप है। जनक ने क्षमा मांगते हुए कहा कि मैं सत्यस्वरूप समझ गया हूं। अब आप शीघ्र ही इस वेश का त्याग करें। याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे राजन! जिस प्रकार मलमूत्र का त्यागकर पुनः उसकी ओर कोई भी दृष्टिपात की इच्छा नहीं करता। सरिता का जल पुनः पर्वत पर नहीं चढ़ता। इसी प्रकार की अनेक बातें समझाते हुए कहा कि मैं तो परमात्मा को धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने अनायास ही मुझे सांसारिक मोहमाया के बंधन से मुक्त किया है। अब पुनः इस संसार चक्र में नहीं फंसना चाहता। इस प्रकार जनक को उपदेश करते हुए राजर्षि पद को त्यागकर वे वन में गये और योग साधना में निरत हो गये। याज्ञवल्क्य एक ब्रह्मनिष्ठ योगी थे। उन्होंने अभ्यास, वैराग्य के माध्यम से ज्ञानयोग की साधना करते हुए ब्रह्म को जाना और लोक में उसी का प्रचार किया। महर्षि अपने याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखते हैं- इत्याचारदमाहिंसा दान स्वाध्याय कर्मणाम् । अयतु परमो धर्मों योगेनात्म दर्शनम् ॥ अर्थात् अन्य धर्मों का समादर करते हुए योग के आचरण से परमात्मा का दर्शन करना चाहिए यही परम धर्म है। महायोगी याज्ञवल्क्य द्वारा रचित ग्रंथ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिक्षा के ग्रंथों में उनके द्वारा रचित याज्ञवल्क्य शिक्षा अत्यन्त प्रसिद्ध है। उन्होंने ही लोकोपकार की दृष्टि से अपने योग ज्ञान से तीन स्मृतियों की रचना की - 1. बृहद्योगियाज्ञवल्क्य स्मृति 2. याज्ञवल्क्य स्मृति तथा 3. ब्रह्मोक्त योगि याज्ञवल्क्य संहिता। आचार्य की मान्यता है कि अन्य सभी धर्म दोषयुक्त एवं पुनर्जन्म आदि को देने वाले है। किन्तु योग थोड़ा भी अभ्यस्त होने पर परब्रह्म क साक्षात्कारपूर्वक मोक्ष को प्रदान करने वाला है। जिस व्यक्ति ने योग का अभ्यास नहीं किया, वह चाहे जितना भी अध्ययन अध्यापन करता रहे और अहर्निश प्रवचन भी करता रहे, उससे उसे आत्मतुष्टि या परमात्म प्राप्ति की सम्भावना नहीं है वह उसका प्रलापमात्र है। इसलिए मुख्य योगशास्त्रों का अध्ययन कर बुद्धिमान मनुष्य को योग परायण होना चाहिए। अन्यथा जैसे पंख होने पर पक्षी अपने घोंसले को छोड़ देते हैं उसी प्रकार अयोगी ब्रह्मसाक्षात्कार रहित व्यक्ति का मरते समय देह भी छोड़कर किनारे हो जाते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🕉️सनातन धर्म🚩 - महुर्षियाज्ञवल्क्य जियन्ती२फखरी विशेष महुर्षियाज्ञवल्क्य जियन्ती२फखरी विशेष - ShareChat
#जय श्री #जय श्री कृष्ण 🛐 राजज्योतिसी ने घोषणा की थी कि भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा,और कर्ण जैसे अजय वीरों के होते हुए कौरव सेना को कोई नहीं हरा सकता। ग्रह नक्षत्र पूरी तरह कौरवों के पक्ष में है। मगर दस दिन बाद हालात बदलते दिखे तब धृतराष्ट्र में फिर से ज्योतिष को बुलाया और पूछा कि सब उल्टा क्यों हो रहा है। आधी सेना समाप्त हो चुकी है। भीष्म शैय्या पर लेट चुके है।🛐 ‼️तब जानते हो राज ज्योतिष ने क्या कहा " कि वहां कोई है जिसने ग्रह नक्षत्रों की दिशाएं बदल डाली है। कोई है जो समय और परिधि से परे है।" तब विदुर ने कहा " ... कृष्ण है..!""‼️
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