sn vyas
ShareChat
click to see wallet page
@sn7873
sn7873
sn vyas
@sn7873
जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 🙏🏻#भगवान शिव के चरणों में #पतित_भक्त की प्रार्थना। #प्रथम_श्लोकः #पापः_खलः_अहमिति_नाहरसि_मां_विहातुम्। #किं_रक्षया_कृतमतेः_कुतोभयस्य॥ #यस्मात्_साधुः_अधमः_अहं_पुण्यकर्मा। #तस्मात्_त्वस्मि_सुतराम्_अनुकम्पनीयः॥ हिन्दी अर्थ: मैं पापी हूँ, दुष्कर्म करने वाला हूँ - क्या यह समझकर ही आप मेरा परित्याग कर रहे हैं? नहीं, नहीं। ऐसा करना आपको उचित नहीं है, क्योंकि भयरहित, प्राज्ञ (बुद्धिमान) और सुकृतकारी (सत्कर्म करने वाले) को रक्षा से क्या प्रयोजन? रक्षा तो पापियों, भयार्तों एवं खलों की ही की जाती है। जो स्वयं ही (अपने सत्कर्मों से) रक्षित है, उसकी रक्षा नहीं की जाती। रक्षा तो अरक्षितों की ही की जाती है। मुझ महापापी, महाअधम और महासाधु की रक्षा आप न करोगे, तो फिर करेंगे किसकी? मैं ही तो आपकी दया का सबसे अधिक अधिकारी हूँ। आप ही कहिए, हूँ या नहीं? --- #द्वितीय_श्लोकः #स्वैरेव_यद्यपि_गतः_अहम्_अधः_कुकृत्यैः। #अत्रापि_नाथ_न_त्वस्मि_अवलेपपात्रम्॥ #दृप्तः_पशुः_पतति_स्वयम्_अन्धकूपे। #नोपेक्षते_तमपि_कारुणिको_हि_लोकः॥ हिन्दी अर्थ: आप कहेंगे - "तेरा अधःपतन तेरे ही दुष्कर्मों से हुआ है। अपने किए का फल भोग, रक्षा-रक्षा क्यों चिल्लाता है?" आपका यह कहना ठीक है। मैं अपने ही पापों से पतित हुआ हूँ। तथापि, ऐसा होने पर भी मैं आपकी अवज्ञा का पात्र नहीं हूँ। आपको मेरा उद्धार करना ही चाहिए, क्योंकि आप तो सर्वसमर्थ महादेव हैं। साधारण दयाशील लोग भी पतितों की उपेक्षा नहीं करते। यदि कोई विवेकहीन, दृप्त (अहंकारी अथवा मदोन्मत्त) पशु स्वयं ही किसी अन्धकूप में गिर जाता है, तो कारुणिक मनुष्य उसे भी उस कुएँ से निकाल देते हैं। अतएव, अपने ही कुकर्मों से पतित मुझ नर-पशु पर दया करना भी आपका कर्तव्य है। आप अपने इस कर्तव्य से बचना चाहें, तो आप पर पक्षपात का दोष लगेगा, क्योंकि आपने मेरे सदृश और भी अनेक जनों को तारा है। --- 💫 भावार्थ (सारांश) पात्र भाव प्रार्थी (भक्त) मैं पापी हूँ, अतः ही मैं आपकी दया का पात्र हूँ। साधु-पुण्यात्माओं को रक्षा की आवश्यकता नहीं। प्रत्युत्तर (शिव) तेरा पतन तेरे कर्मों से हुआ, स्वयं भोग। पुनः प्रार्थी यद्यपि मैं स्वयं पतित हूँ, फिर भी आपकी अवज्ञा का पात्र नहीं। दयालु लोग भी पशु को कूप से निकालते हैं। --- 🌺 निवेदन #हे_शिव_शंकर_दीनबंधो। #पतितपावन_नाम_तिहारो॥ #जो_पतितन_को_उद्धार_करत_हो। #सो_मोहि_मिलत_न_जात_बिसारो॥ हिन्दी अर्थ: हे शिव शंकर, दीनबंधो! आपका नाम पतितपावन है। जो पतितों का उद्धार करते हो, वह मुझे मिलता नहीं - यह कैसे भुलाया जा सकता है? --- 🔱 अंतिम प्रार्थना #ॐ_त्र्यम्बकं_यजामहे_सुगन्धिं_पुष्टिवर्धनम्। #उर्वारुकमिव_बन्धनान्_मृत्योर्मुक्षीय_मामृतात्॥ हिन्दी अर्थ: हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) शिव की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित एवं पुष्टि बढ़ाने वाले हैं। जैसे ककड़ी अपने बन्धन से मुक्त हो जाती है, वैसे ही हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें और अमृत से जोड़ें। स्रोत: 📜 ऋग्वेद, ७.५९.१२ (महामृत्युंजय मंत्र) --- 🙏🏻 करबद्ध निवेदन हे महादेव! मैं पापी हूँ, अधम हूँ, दुष्कर्मी हूँ - यही मेरी पहचान है, और यही मेरी योग्यता है आपकी दया पाने की। जो स्वयं प्रकाशित हैं, उनके लिए आपके प्रकाश की आवश्यकता नहीं। जो स्वयं सुरक्षित हैं, उनके लिए आपकी रक्षा की आवश्यकता नहीं। मैं हूँ जो अंधकार में डूबा है, मैं हूँ जो भय से व्याकुल है, मैं हूँ जो अपने ही कर्मों से पतित है - अतः मैं ही हूँ आपकी दया का सबसे अधिक अधिकारी। हर हर महादेव! 🔱🙏🏻 #शिवरात्रि_की_शुभामनायें --- कृपया इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें 🔄 ---
🙏शिव पार्वती - US 3 35 US 3 35 - ShareChat
#महाभारत श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 314) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः । प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ।। ९३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकर सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ।। ९३ ।। गाङ्गेय उवाच दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम । (ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च । यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ।। इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः ।) शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ।। ९४ ।। भीष्मने कहा- नरश्रेष्ठ निषादराज ! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है। निषाद ! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुए मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ।। ९४ ।। राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः । अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ।। ९५ ।। राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चय कर रहा हूँ ।। ९५ ।। अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ।। ९६ ।। निषादराज ! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा। मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ।। ९६ ।। (न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् । यावत् प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः ।। तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे । परित्यजाम्बहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः ।। ऊध्वरता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते ।) मैंने जन्मसे लेकर अबतक कोई झूठ बात नहीं कही है। जबतक मेरे शरीरमें प्राण रहेंगे, तबतक मैं संतान नहीं उत्पन्न करूँगा। तुम पिताजीके लिये अपनी कन्या दे दो। दाश ! मैं राज्य तथा मैथुनका सर्वथा परित्याग करूँगा और ऊध्र्वरता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर रहूँगा- यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः । ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ।। ९७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- देवव्रतका यह वचन सुनकर धर्मात्मा निषादराजके रोंगटे खड़े हो गये। उसने तुरंत उत्तर दिया- 'मैं यह कन्या आपके पिताके लिये अवश्य देता हूँ' ।। ९७ ।। ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा । अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। ९८ ।। उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोल उठे-'ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं (अर्थात् भीष्मके नामसे इनकी ख्याति होगी)' ।। ९८ ।। ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम् । अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ।। ९९ ।। तत्पश्चात् भीष्म पिताके मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यशस्विनी निषादकन्यासे बोले - 'माताजी ! इस रथपर बैठिये। अब हमलोग अपने घर चलें' ।। ९९ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम् । आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत् ।। १०० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! ऐसा कहकर भीष्मने उस भामिनीको रथपर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्तनुको सौंप दिया ।। १०० ।। तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः । समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ।। १०१ ।। उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग-अलग भी प्रशंसा करने लगे। सबने एक स्वरसे कहा, 'यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है' ।। १०१ ।। नच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः । स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने ।। १०२ ।। भीष्मके द्वारा किये हुए उस दुष्कर कर्मकी बात सुनकर राजा शान्तनु बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन महात्मा भीष्मको स्वच्छन्द मृत्युका वरदान दिया ।। १०२ ।। न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि । त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ।। १०३ ।। वे बोले- 'मेरे निष्पाप पुत्र ! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है' ।। १०३ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने शततमोऽध्यायः ।। १०० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवतीलाभोपाख्यानविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतमू श्रीमहाभारतमू - ShareChat
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड उन्नासीवाँ सर्ग मन्त्री आदिका भरतसे राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रस्ताव तथा भरतका अभिषेक-सामग्रीकी परिक्रमा करके श्रीरामको ही राज्यका अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लानेके लिये चलनेके निमित्त व्यवस्था करनेकी सबको आज्ञा देना तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातः काल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरतसे इस प्रकार बोले—॥१ 'महायशस्वी राजकुमार! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर स्वयं स्वर्गलोकको चले गये, अब इस राज्यका कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाईको स्वयं महाराजने वनवासकी आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गतिके कारण ही आप राज्यको अपने अधिकारमें लेकर किसीके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं॥२-३॥ 'राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेककी सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं॥४॥ 'भरतजी! आप अपने माता-पितामहोंके इस राज्यको अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगोंकी रक्षा कीजिये'॥५॥ यह सुनकर उत्तम व्रतको धारण करनेवाले भरतने अभिषेकके लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्रीकी प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥६॥ 'सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुलमें सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्यका अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है॥७॥ 'श्रीरामचन्द्रजी हमलोगोंके बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा॥८॥ 'आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकारसे सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीको वनसे लौटा लाऊँगा॥९॥ 'अभिषेकके लिये संचित हुई इस सारी सामग्रीको आगे करके मैं श्रीरामसे मिलनेके लिये वनमें चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीका वहीं अभिषेक करके यज्ञसे लायी जानेवाली अग्निके समान उन्हें आगे करके अयोध्यामें ले आऊँगा॥१०-११॥ 'परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलानेवाली इस कैकेयीको मैं कदापि सफलमनोरथ नहीं होने दूँगा। श्रीराम यहाँके राजा होंगे और मैं दुर्गम वनमें निवास करूँगा॥१२॥ 'कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमिको बराबर करें तथा मार्गमें दुर्गम स्थानोंकी जानकारी रखनेवाले रक्षक भी साथ-साथ चलें'॥१३॥ श्रीरामचन्द्रजीके लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरतसे वहाँ आये हुए सब लोगोंने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही—॥१४॥ 'भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहनेवाले आपके पास कमलवनमें निवास करनेवाली लक्ष्मी अवस्थित हों; क्योंकि आप राजाके ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं'॥१५॥ उन लोगोंका कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कानमें पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरतको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सबकी ओर देखकर भरतके मुखमण्डलमें सुशोभित होनेवाले नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥१६॥ भरतके मुखसे श्रीरामको ले आनेकी बात सुनकर उस सभाके सभी सदस्यों और मन्त्रियोंसहित समस्त राजकर्मचारी हर्षसे खिल उठे। उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरतसे बोले—'नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञाके अनुसार राजपरिवारके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले कारीगरों और रक्षकोंको मार्ग ठीक करनेके लिये भेज दिया गया है'॥१७-१८॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७९॥ ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - 992 ఉంారాల "विनय पत्रिका" हे प्रभु राम! मैं किस प्रकार सुख मानू? मेरी करनी के दिखावटी दांतोके समान है | जैसे हाथीके हाथी दाँत दिखाने के और तथा खानेके ओर होते है, उसी प्रकार मैं भी दिखाता कुछ ओर हूँ और करता कुछ ओर हीं हूँ | हे नाथ! आप कृपा करें ताकि मेरी कथनी और करनी एक सी बन जायें और मैं इस भवसागर को अनायास ही तर जाऊ punitbapuofficial org] WWW. 992 ఉంారాల "विनय पत्रिका" हे प्रभु राम! मैं किस प्रकार सुख मानू? मेरी करनी के दिखावटी दांतोके समान है | जैसे हाथीके हाथी दाँत दिखाने के और तथा खानेके ओर होते है, उसी प्रकार मैं भी दिखाता कुछ ओर हूँ और करता कुछ ओर हीं हूँ | हे नाथ! आप कृपा करें ताकि मेरी कथनी और करनी एक सी बन जायें और मैं इस भवसागर को अनायास ही तर जाऊ punitbapuofficial org] WWW. - ShareChat
#🙏शिव पार्वती #शुभ सोमवार 🔱भगवान शिव ने देवी पार्वती को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं,जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए। 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 भगवान शिव ने पार्वती जी को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं। जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक व वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। 1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप? देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते हैं- ।।नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।। अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना। इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है। 2. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान। ।।आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।। अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है। कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एकभाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करनेसे खुद ही खुदको रोक लेगा। 3.कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा। ।।मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।। अर्थात-आगे शिव कहते हैं कि किसी भी मनुष्य को मन,वाणी व कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है। यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मरने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं। 4. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात। संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है। दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।। अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थिति से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा। 5. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना। नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्। सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।। अर्थात - आगे भगवान शिव मनुष्यों को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है। मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताए। 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
🙏शिव पार्वती - ShivShakti Sangal? एक लाइक महादेव के भक्तों के IH ShivShakti Sangal? एक लाइक महादेव के भक्तों के IH - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🌟 || सुख का आधार || 🌟 हमारा सुख हमारी सोच पर ही निर्भर करता है। परिस्थिति से अधिक मनस्थिति हमारे जीवन में सुख-दुःख का निर्धारण करती है। जिन्दगी से हमारी शिकायतों का कारण अभाव नहीं अपितु हमारा स्वभाव होता है। हम केवल खोने का दुःख मनाना तो जानते हैं, लेकिन पाने की खुशी नहीं। खुशी के लिए काम करोगे तो खुशी ही मिले यह आवश्यक नहीं, लेकिन खुश होकर काम करोगे तो खुशी अवश्य मिलेगी यह निश्चित है। सुख-दु:ख रूपी दो नदियों के संगम का नाम ही तो जीवन है। जिन्दगी से शिकायत करने की अपेक्षा जो प्राप्त है, उसका आनंद लेना सीखो, यही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है। शांति एवं आनंद उसी के जीवन में होता है, जिसकी दृष्टि क्या खो दिया की अपेक्षा क्या पाया, इस बात पर होती है। भीतर से प्रसन्न रहिए क्योंकि मन की प्रसन्नता तन के दुःखों को भी कम कर देती है।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - ShareChat
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ [ पाण्डवगीता - ५५ ] अर्थात् 👉🏻 ( अरुन्धती का वचन ) परमात्मा श्रीकृष्ण , वासुदेव , हरि तथा क्लेशनाशक गोविन्द को मेरा बारंबार नमस्कार है । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ShareChat
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 313) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा । न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ।। ८३ ।। परंतप ! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।। एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।। ८४ ।। पृथ्वीनाथ ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप ! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।। ८५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया - ।। ८५ ।। इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर । नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।। 'सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज ! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।। एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे । योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।। ८७ ।। 'लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा' ।। ८७ ।। इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत । चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ।। ८८ 11 भरतवंशावतंस जनमेजय ! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला। वह राज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ।। ८८ ।। त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते। कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वरः ।। ८९ ।। उसने कहा- 'अमित तेजस्वी युवराज ! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिक बनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन् ! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है। आप जिसे चाहें, इसे दे सकते हैं। आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ।। ८९ ।। इदं तु वचनं सौम्य कार्य चैव निबोध मे । कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ।। ९० ।। 'परंतु सौम्य ! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है; अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये। शत्रुदमन ! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ।। ९० ।। यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण । राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ।। ९१ ।। 'सत्यधर्मपरायण राजकुमार ! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ।। ९१ ।। नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन। तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ।। ९२ ।। 'महाबाहो ! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है' ।। ९२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभाखतमू श्रीमहाभाखतमू - ShareChat
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 शिव और शंकर में भेद 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ आप शिव के उपासक हैं या शंकर के ? चौंक गए ना ये सवाल सुनकर… नोट:-यदि लेख पूरा पढ़ सकते हैं तभी आगे बढ़े अन्यथा यह लेख आपके लिए नहीं है। वैसे भी कौन मानेगा कि शिव और शंकर अलग अलग है. हमें तो बचपन से यही बताया गया है ना कि शिवशंकर एक ही है. यहाँ तक की दोनों नाम हम अक्सर साथ में ही लेते है। अगर हम आपको ये कहे कि शिव और शंकर ना सिर्फ अलग अलग है बल्कि शंकर की उत्त्पति भी शिव से ही हुई है. शिव ही प्रारंभ है और शिव ही अंत है। शिव और शंकर में सबसे बड़ा और समझने में आसान अंतर दोनों की प्रतिमा में है। शंकर की प्रतिमा जहाँ पूर्ण आकार में होती है वही शिव की प्रतिमा लिंगम रूप में होती है या अंडाकार अथवा अंगूठे के आकार की होती है. महादेव शंकर 〰️〰️〰️〰️ शंकर भी ब्रह्मा और विष्णु के तरह देव है और सूक्ष्म शरीरधारी है. ब्रम्हा और विष्णु की तरह शंकर भी सूक्ष्म लोक में रहते है. शंकर भी विष्णु और ब्रम्हा की तरह ही परमात्मा शिव की ही रचना है. शंकर को महादेव भी कहा जाता है परन्तु शंकर को परमात्मा नहीं कहा जाता क्योंकि शंकर का कार्य केवल संहार है. पालन एवं निर्माण शंकर का कर्तव्य नहीं है. शिव 〰️〰️ शंकर से अलग शिव परमात्मा है. शिव का कोई शरीर नहीं कोई रूप नहीं है. शिव, शंकर, ब्रम्हा और विष्णु की तरह सूक्ष्मलोक में नहीं रहते. उनका निवास तो सूक्ष्म लोक से परे है. शिव ही ब्रम्हा विष्णु शंकर त्रिदेवों के रचियेता है. शिव ही विश्व का निर्माण, कल्याण और विनाश करते है जिसका माध्यम ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते है। देखा आपने की कैसे एक दुसरे से भिन्न है शिव और शंकर. अब आपको आसानी होगी ये जानने की कि किसकी उपासना करते है आप बात को आगे बढ़ाते हुए आपको एक और जानकारी देते है। सबका जन्म दिन होता है क्या आपने कभी सोचा है कि शिव ही एक मात्र ऐसे है जिनके जन्मदिन को शिवरात्रि कहा जाता है. इसका भी एक कारण है रात्रि का मतलब शाब्दिक नहीं है यहाँ रात्रि का अर्थ कुछ और है। यहाँ रात्रि से अभिप्राय ये है कि पाप, अन्याय, बुराइयाँ. जब काल के साथ साथ मनुष्य नीचता की और बढ़ता चला गया उस समय की तुलना रात्रि से की गयी है और उस गहरी रात्रि को शिव प्रकट होते है अर्थात जन्म लेते है। शिव के जन्म की रात्रि के बाद रात्रि अर्थात अन्धकार का अंत हो जाता है और मनुष्यता एक बार फिर उन्नत हो जाती है। ये था शिव और शंकर में अंतर और शिव जन्म को शिव रात्रि कहने का भेद। सती और पार्वती के पति भगवान शंकर को सदाशिव के कारण शिव भी कहा जाता है। हम इन्हीं भगवान शंकर की बात करेंगे जिन्हें महादेव भी कहा गया है। भगवान शंकर के बारे में कुछ इस तरह की भ्रंतियां फैली हैं जो कि अपमानजनक है। वे लोग इसके दोषी हैं, जो जाने-अनजाने भगवान शिव का अपमान करते रहते हैं। यदि आप भगवान शंकर के भक्त हैं तो आपको यह जान और सुन कर धक्का लगना चाहिये, क्योंकि भगवान शंकर हिन्दू धर्म का मूल तना है, रीढ़ है। रामचरित मानस में भगवान राम कहते हैं कि 'शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।'... अपराधियों का साथी या उसे नजरअंदाज करने वाला भी अपराधी होता है। शिव के मंदिर में जाने और वहां पूजा, प्रार्थना करने के कुछ नियम होते है। यह सही है कि भगवान शंकर भोलेनाथ है। वे बड़े दयालु हैं, आपको क्षमा कर देंगे। लेकिन आपने उनके मंदिर में जाकर किसी भी तरह से नियम विरूद्ध कार्य किया या अपमान किया है तो आपको माता कालिका देख रही है। भगवान भैरव और शनिदेव भी देख रहे हैं। शैव पंथ पर चलाना या शिव की पूजा करना कठिन है। यह अग्निपथ है। आओ हम आपको बताते हैं कि भगवान शिव के बारे में समाज में किस तरह की भ्रांतियां फैला रखी और उस भ्रांति को अभी तक बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या शिवलिंग का अर्थ शिव का शिश्न है? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह दुख की बात है कि बहुत से लोगों ने कालांतर में योनि और शिश्न की तरह शिवलिंग की आकृति को गढ़ा और वे उसके चित्र भी फेसबुक और व्हाट्सऐप पर पोस्ट करते रहते हैं। वे इसके लिए कुतर्क भी देते रहते हैं। उक्त सभी लोगों को मरने के बाद इसका जवाब देना होगा, क्योंकि शिव का अपमान करने वाला किसी भी परिस्थिति में बच नहीं सकता। शिव से ही सभी धर्म है और शिव से ही प्रलय भी। दरअसल, शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्मांड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। जिस तरह भगवान विष्णु का प्रतीक चिन्ह शालिग्राम है उसी तरह भगवान शंकर का प्रतीक चिन्ह शिवलिंग है। इस पींड की आकृति हमारी आत्मा की ज्योति की तरह होती है। वायुपुराण👉 के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना की जाती है। स्कन्दपुराण👉 में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्मांड (ब्रह्मांड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्धकाल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है। ब्रह्मांड का प्रतीक ज्योतिर्लिंग 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है, कुछ लोग इसे यौनांगों के अर्थ में लेते हैं और उन लोगों ने शिव की इसी रूप में पूजा की और उनके बड़े-बड़े पंथ भी बन गए हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने धर्म को सही अर्थों में नहीं समझा और अपने स्वार्थ के अनुसार धर्म को अपने सांचे में ढाला। शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्धकाल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है। शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न। ज्योतिर्लिंग : 〰️〰️〰️〰️ ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है। क्या भांग और गांजा पीते हैं भगवान शंकर? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इसका जवाब है नहीं। शिव पुराण सहित किसी भी ग्रंथ में ऐसा नहीं लिखा है कि भगवान शिव या शंकर भांग, गांजा आदि का सेवन करते थे। बहुत से लोगों ने भगवान शिव के ऐसे ‍भी चित्र बना लिए हैं जिसमें वे चिलम पीते हुए नजर आते हैं। यह दोनों की कृत्य भगवान शंकर का अपमान करने जैसा है। यह भगवान शंकर की छवि खराब किए जाने की साजिश है। यदि आपके घर, मंदिर या अन्य किसी भी स्थान पर भगवान शंकर का ऐसा चित्र या मूर्ति लगा है जिसमें वे चिलम पीते या भांग का सेवन करते हुए नजर आ रहे हैं तो उसे आप तुरंत ही हटा दें तो अच्‍छा है। यह भगवान शंकर का घोर अपमान है। यह भी कितना दुखभरा है कि कई लोगों ने भगवान शंकर पर ऐसे गीत और गाने बनाएं हैं जिसमें उन्हें भांग का सेवन करने का उल्लेख किया गया है। कोई गीतकार या गायक यह जानने का प्रयास नहीं करता है कि इस बारे में सच क्या है। मैं जो गाना गा रहा हूं या गीत लिख रहा हूं उसका आधार क्या है? यह तो छोड़िये बड़े बड़े पंडित भी शिव के मंदिरों में जब भांग का अभिषेक करते हैं तो फिर अन्य किसी पर दोष देने का कोई मतलब नहीं। ये सभी पंडित नर्क की आग में जलने वाले हैं। यह तो अब आम हो चला है कि शिवरात्रि या महाशिवरात्रि के दिन लोग भांग घोटकर पीते हैं। किसी को भांग पीने की मनाही नहीं हैं लेकिन शिव के नाम पर पीना उनका अपमान ही है। प्रश्न :👉 क्या भगवान शंकर को नहीं मालूम था कि गणेशजी पार्वती के पुत्र हैं? फिर उन्होंने अनजाने में उनकी गर्दन काट दी और फिर जब उन्हें मालूम पड़ा तो उन्होंने उस पर हाथी की गर्दन जोड़ दी? जब शिव यह नहीं जान सके कि यह मेरा पुत्र है तो फिर वह कैसे भगवान? उत्तर :👉 भगवान शिव के संपूर्ण चरित्र को पढ़ना जरूरी है। उनके जीवन को लीला क्यों कहा जाता है? लीला उसे कहते हैं जिसमें उन्हें सबकुछ मालूम रहता है फिर भी वे अनजान बनकर जीवन के इस खेल को सामान्य मानव की तरह खेलते हैं। लीला का अर्थ नाटक या कहानी नहीं। एक ऐसा घटनाक्रम जिसकी रचना स्वयं प्रभु ही करते हैं और फिर उसमें इन्वॉल्व होते हैं। वे अपने भविष्य के घटनाक्रमों को खुद ही संचालित करते हैं। दरअसल, भविष्य में होने वाली घटनाओं को अपने तरह से घटाने की कला ही लीला है। यदि भगवान शिव ऐसा नहीं करते तो आज गणेश प्रथम पूज्जनीय देव न होते और न उनकी गणना देवों में होती। विशेष दार्शनिक क्षेत्रों में माना जाता है कि लीला ऐसी वृत्ति है जिसका आनन्द प्राप्ति के सिवा और कोई अभिप्राय नहीं। इसीलिए कहते हैं सृष्टि और प्रलय सब ईश्वर की लीला ही है। अवतार धारण करने पर इस लोक में आकर भगवान् जो कृत्य करते हैं, उन सब की गिनती भी लीलाओं में ही होती है। लोक व्यवहार में वे सब कृत्य जो भगवान् के किसी अवतार के कार्यों के अनुकरण पर अभिनय या नाटक के रूप में लोगों को दिखाए जाते हैं। भगवान राम को सभी कुछ मालूम था कि क्या घटनाक्रम होने वाला है। उन्हें मालूम था कि मृग के रूप में आया यह राक्षस कौन है। लेकिन सीता ने उनकी नहीं मानी और तब उन्होंने लक्ष्मण को सीता के पहरे के लिए छोड़ कर मृग के पीछे चले गए। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू किसी को नहीं मार रहा है। यह सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। अब तो यह बस खेल है। बर्बरिक से जब महाभारत का वर्णन पूछा गया तो उसने कहा कि मुझे तो दोनों ही ओर से श्रीकृष्ण ही यौद्धाओं को मारते हुए नजर आ रहे थे। इसी तरह कहा जाता है क सहदेव को महाभारत का परिणाम मालूम था लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें चुप रहने के लिए कहा था। यही तो लीला है। क्या शिव-पार्वती हैं 'आदम और ईव'? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान शंकर को आदिदेव भी कहा जाता है। शंकर के दो पुत्र थे, गणेश और कार्तिकेय। जैसा कि कहा गया है कि आदम के दो पुत्र कैन और हाबिल थे। कैन बुरा और हाबिल अच्छा। पार्वती ही क्या ईव है। कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वायंभुव मनु और शतरूपा ही आदम और हव्वा थे। शिव का पहला विवाह राजा दक्ष की पुत्री सती से हुआ था जो आग में कूद कर भस्म हो गई थी। उनका दूसरा विवाह पर्वतराज हिमालय की पुत्री उमा से हुआ जिन्हें पार्वती कहा जाता है। पार्वती से उनको एक पुत्र मिला। प्रमुख रूप से शिव के दो पुत्र थे, गणेश और कार्तिकेय। गणेशजी की उत्पत्ति कैसे हुई यह सभी जानते हैं। यह शिव और पर्वती के मिलन से नहीं जन्में। शिव के दूसरे पुत्र कार्तिकेय का जन्म शिव-पार्वती मिलन से हुआ। शिव का एक तीसरा पुत्र था जिसका नाम विद्युत्केश था। विद्युत्केश अनाथ बालक था जिसे शिव और पार्वती ने पालपोस कर बड़ा किया था। इसका नाम उन्होंने सुकेश रखा था। शिवजी का एक चौथा पुत्र था जिसका नाम था जलंधर। भगवान शिव ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया इससे जलंधर उत्पन्न हुआ। जलंधर शिव का सबसे बड़ा दुश्मन बना। इस तरह शिव के और भी कई पुत्र थे। जैसे अंधक, सास्तव, भूमा और खुजा। शिव की कथा और आदम की कथा में जरा भी मेल नहीं है। शिव और पार्वती को आदम और हव्वा सिद्ध करने वाले मानते हैं कि ईडन गार्डन श्रीलंका में था। श्रीलंका आज जैसा द्वीप नजर आता है यह पहले ऐसा नहीं था। यह इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा और भारत से जुड़ा हुआ था। वे कहते हैं कि शिव और पार्वती भी कैलाश पर्वत से श्रीलंका रहने चले गए थे जबकि कुबेर ने उन्हें सोने की लंका बनवाकर दी थी। हजरत आदम जब आसमान की जन्नत (ईडन उद्यान) से निकाले गए तो सबसे पहले 'हिंदुस्तान की जमीं' पर ही उतारे गए, जहां उन्होंने सबसे पहले कदम रखे उसे आदम चोटी कहते हैं। माना जाता है कि ह. आदम अलै. का 'तनूर' हिंद में था। माना जाता है कि कश्मीर ही उस दौर का स्वर्ग (जन्नत) था। वहां आज भी सेबफल की खेती होती है। शोध से बता चला कि सेब फल को मनुष्य ने 8 हजार वर्ष पहले ही खाना शुरू किया था। इससे पहले मनुष्य सेबफल के बारे में जानता तक नहीं था। माना जाता है कि सेबफल की उत्पत्ति मध्य एशिया के देश कजाखिस्ता के जंगलों में हुई थी और वहीं से सेब बाकी की दुनिया में पहुंचे। प्रश्न : 👉 क्या भगवान शिव ही शंकर, महेष, रुद्र, महाकाल, भैरव आदि हैं? उत्तर👉 पहली बात को यह कि हिन्दू धर्म का संबंध वेदों से है पुराणों से नहीं। त्रिदेवों में से एक महेष को ही भगवान शिव या शंकर भी कहा जाता है। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। उक्त सभी की कहानियों को पुराणों में विस्तार मिला और सभी को एक ही शिव से जोड़ देने से भ्रांतियों का भी विस्तार हुआ। औघड़ या तंत्रिकों के मत में जो शिव या शंकर का वर्णन किया गया है वह दरअसल, शिव के भैरव रूप का वर्णन है। यह भी हो सकता है कि यह उनके मन की व्याख्या हो या यह कि वे तंत्र के घोर मार्ग को अपनाने के लिए शिव की आड़ लेते हों। उक्त मत को रामचरित मानस में कोल मत का कहा गया है जो कि वेद विरुद्ध है। वर्तमान में कुछ लोग साई बाबा को ही शिव का अवतार घोषित करने में लगे हैं तो अब क्या करें ऐसे लोगों का। इसी तरह कालांतर में ऐसे कई लोग, संत या ऋषि हुए हैं जिनको शिव से जोड़ कर देखा गया और उनकी कथाएं लिखकर कर समाज में भ्रम फैलाया गया। माना जाता है कि प्रत्येक काल में अलग-अलग रुद्र हुए हैं। इस तरह 12 रुद्र हुए। शिव निकारार सत्य है तो शंकर साकार। पुराणों में ऐसी कई बातों का उल्लेख है जिसको शंकर से जोड़ दिया गया है। जैसे भैरव पीते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि शंकर भी पीते हैं। शिव, शंकर, महादेव : शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं– शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विलय के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है। 12 रुद्र :👉 पहले महाकाल, दूसरे तारा, तीसरे बाल भुवनेश, चौथे षोडश श्रीविद्येश, पांचवें भैरव, छठें छिन्नमस्तक, सातवें द्यूमवान, आठवें बगलामुख, नौवें मातंग, दसवें कमल। अन्य जगह पर रुद्रों के नाम:- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव का उल्लेख मिलता है। अन्य रुद्र या शंकर के अंशावतार- इन अवतारों के अतिरिक्त शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है। हनुमान ग्यारहवें रुद्रावतार माने जाते हैं। भैरव :👉 भैरव भी कई हुए हैं जिसमें से काल भैरव और बटुक भैरव दो प्रमुख हैं। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शिव की पंचायत के सदस्य हैं। वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। शिव के द्वारपाल:-👉 नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल। शिव पंचायत के देवता:- 1.सूर्य, 2.गणपति, 3.देवी, 4.रुद्र और 5.विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं। शिव पार्षद:-👉 जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी। शिव गण:-👉 भगवान शिव के गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से ‘वीरभद्र’ नामक गण उत्पन्न किया। इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे-👉 भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं। सप्तऋषि गण शिव के शिष्य हैं:-👉 शिव ने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। अब यदि उक्त ऋषियों या उनके परंपरा के किसी महान ऋषि को हम शिव या उनका अवतार ही मानने लगे और उनका गुणगान करने लगे तो यह उचित नहीं होगा। इस तरह भ्रम का विस्तार ही होता है। अंगिरा ऋषि को शिव का सक्षात् रूप माना जाता है। उसी तरह हम यदि भैरव को भी शिव माने तो यह पुराणिक विस्तार ही है। देवों के देव महादेव :👉 देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। ~ संकलित🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 - शिव और शंकर मे भेद. ? शिव और शंकर मे भेद. ? - ShareChat
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती अर्धनारीश्वर अवतार की कथा 〰〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शीश गंग अर्धंग पार्वती नंदी भृंगी नृत्य करत है” शिव स्तुति में आये इस भृंगी नाम को आप सब ने जरुर ही सुना होगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार ये एक ऋषि थे जो महादेव के परम भक्त थे किन्तु इनकी भक्ति कुछ ज्यादा ही कट्टर किस्म की थी। कट्टर से तात्पर्य है कि ये भगवान शिव की तो आराधना करते थे किन्तु बाकि भक्तो की भांति माता पार्वती को नहीं पूजते थे। उनकी भक्ति पवित्र और अदम्य थी लेकिन वो माता पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या फिर ऐसा भी कह सकते है कि वो माता को कुछ समझते ही नही थे। वैसे ये कोई उनका घमंड नही अपितु शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और नजर ही नही आता था। एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे। ऋषि के इस कृत्य पर माता पार्वती ने ऐतराज प्रकट किया और कहा कि हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते। पर शिव भक्ति की कट्टरता देखिये भृंगी ऋषि ने पार्वती जी को अनसुना कर दिया और भगवान शिव की परिक्रमा लगाने बढे। किन्तु ऐसा देखकर माता पार्वती शिव से सट कर बैठ गई। इस किस्से में और नया मोड़ तब आता है जब भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही। तब भगवान शिव ने माता पार्वती का साथ दिया और संसार में महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का जन्म हुआ। अब भृंगी ऋषि क्या करते किन्तु गुस्से में आकर उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे। ऋषि के इस कृत्य पर आदिशक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी ऋषि को श्राप दिया कि जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तत्काल प्रभाव से तुम्हारी देह छोड़ देगा। हमारी तंत्र साधना कहती है कि मनुष्य को अपने शरीर में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की देन होती है जबकि खून और मांस माता की देन होते है l श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया। भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े भी होने की भी क्षमता खो चुके थे l तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। हालाँकि तब पार्वती ने द्रवित होकर अपना श्राप वापस लेना चाहा किन्तु अपराध बोध से भृंगी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया l ऋषि को खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके तो भक्त भृंगी के कारण ऐसे हुआ था महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का उदय। जय शिव शक्ति महादेव साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 - अर्ध नारिश्वर अवतार की कथा Mvl2 अर्ध नारिश्वर अवतार की कथा Mvl2 - ShareChat
#सत्यं शिवम् सुंदरम सत्यम, शिवम और सुंदरम का रहस्य ! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सत्यम, शिवम और सुंदरम के बारे में सभी ने सुना और पढ़ा होगा लेकिन अधिकतर लोग इसका अर्थ या इसका भावार्थ नहीं जानते होंगे। वे सत्य का अर्थ ईश्वर, शिवम का अर्थ भगवान शिव से और सुंदरम का अर्थ कला आदि सुंदरता से लगाते होंगे, लेकिन अब हम आपको बताएंगे कि आखिर में हिन्दू धर्म और दर्शन का इस बारे में मत क्या है। हालांकि वेद, उपनिषद और पुराणों में इस संबंध में अलग अलग मत मिलते हैं, लेकिन सभी उसके एक मूल अर्थ पर एकमत हैं। धर्म और दर्शन की धारणा इस संबंध में क्या हो सकती है यह भी बहुत गहन गंभीर मामला है। दर्शन में भी विचारधाएं भिन्न-भिन्न मिल जाएगी, लेकिन आखिर सत्य क्या है इस पर सभी के मत भिन्न हो सकते हैं। सत्यम👉 योग में यम का दूसरा अंग है सत्य। हिन्दू धर्म में ब्रह्म को ही सत्य माना गया है। जो ब्रह्म (परमेश्वर) को छोड़कर सबकुछ जाने का प्रयास करता है वह व्यक्ति जीवन पर्यन्त भ्रम में ही अपना जीवन गुजार देता है। यह ब्रह्म निराकार, निर्विकार और निर्गुण है। उसे जानने का विकल्प है स्वयं को जानना। अर्थात आत्मा ही सत्य है, जो अजर अमर, निर्विकार और निर्गुण है। शरीर में रहकर वह खुद को जन्मा हुआ मानती है जो कि एक भ्रम है। इस भ्रम को जानना ही सत्य है। 'सत (ईश्वर) एक ही है। कवि उसे इंद्र, वरुण व अग्नि आदि भिन्न नामों से पुकारते हैं।'-ऋग्वेद 'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।'-कठोपनिषद-।।10।। सत्य का अलौकिक अर्थ👉 सत्य को समझना मुश्किल है, लेकिन उनके लिए नहीं जो धर्म और दर्शन को भलिभांति जानते हैं। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन यह सही नहीं है। सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। परमात्मा से परिपूर्ण यह जगत आत्माओं का जाल है। जीवन, संसार और मन यह सभी विरोधाभासी है। इसी विरोधाभास में ही छुपा है वह जो स्थितप्रज्ञ आत्मा और ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक और बोधपूर्ण दोनों ही बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। शास्त्रों में आत्मा, परमात्मा, प्रेम और धर्म को सत्य माना गया है। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। सत्य के साथ रहने से मन हल्का और प्रसन्न चित्त रहता है। मन के हल्का और प्रसंन्न चित्त रहने से शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। सत्य की उपयोगिता और क्षमता को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं। सत्य बोलने से व्यक्ति को सद्गति मिलती है। गति का अर्थ सभी जानते हैं। ‘सत चित आनन्द’👉 सत् अर्थात मूल कण या तत्व, चित्त अर्थात आत्मा और आनंद अर्थात प्रकृति और आत्मा के मिलन से उत्पन्न अनुभूति और इसके विपरित शुद्ध आत्म अनुभव करना।... परामात्मा और आत्मा का होना ही सत्य है बाकी सभी उसी के होने से है। आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है। यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है। सत्य का लौकिक अर्थ👉 सत्य को जानना कठिन है। ईश्वर ही सत्य है। सत्य बोलना भी सत्य है। सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है। जब व्यक्ति सत्य की राह से दूर रहता है तो वह अपने जीवन में संकट खड़े कर लेता है। असत्यभाषी व्यक्ति के मन में भ्रम और द्वंद्व रहता है, जिसके कारण मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोगों का शरीर पर घातक असर पड़ता है। ऐसे में सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। रस्सी को देखकर सर्प मान लेना सत्य नहीं है, किंतु उसे देखकर जो प्रतीति और भय उत्पन हुआ, वह सत्य है। अर्थात रस्सी सर्प नहीं है, लेकिन भय का होना सत्य है। दरअसल हमने कोई झूठ नहीं देखा, लेकिन हम गफलत में एक झूठ को सत्य मान बैठे और उससे हमने स्वयं को रोगग्रस्त कर लिया। तो सत्य को समझने के लिए जरूरी है तार्किक बुद्धि, सत्य वचन बोलना और होशो-हवास में जीना। जीवन के दुख और सुख सत्य नहीं है, लेकिन उनकी प्रतीति होना सत्य है। उनकी प्रतीति अर्थात अनुभव भी तभी तक होता है जब तक कि आप दुख और सुख को सत्य मानकर जी रहे हैं। सत्य के लाभ👉 सत्य बोलने और हमेशा सत्य आचरण करते रहने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है। मन स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस करता है। डिप्रेशन और टेंडन भरे जीवन से मुक्ति मिलती है। शरीर में किसी भी प्रकार के रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। सुख और दुख में व्यक्ति सम भाव रहकर निश्चिंत और खुशहाल जीवन को आमंत्रित कर लेता है। सभी तरह के रोग और शोक का निदान होता है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। सुंदरम् : - यह संपूर्ण प्रकृति सुंदरम कही गई है। इस दिखाई देने वाले जगत को प्रकृति का रूप कहा गया है। प्रकृति हमारे स्वभाव और गुण को प्रकट करती है। पंच कोष वाली यह प्रकृति आठ तत्वों में विभाजित है। त्रिगुणी प्रकृति👉 परम तत्व से प्रकृति में तीन गुणों की उत्पत्ति हुई सत्व, रज और तम। ये गुण सूक्ष्म तथा अतिंद्रिय हैं, इसलिए इनका प्रत्यक्ष नहीं होता। इन तीन गुणों के भी गुण हैं- प्रकाशत्व, चलत्व, लघुत्व, गुरुत्व आदि इन गुणों के भी गुण हैं, अत: स्पष्ट है कि यह गुण द्रव्यरूप हैं। द्रव्य अर्थात पदार्थ। पदार्थ अर्थात जो दिखाई दे रहा है और जिसे किसी भी प्रकार के सूक्ष्म यंत्र से देखा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है या अनुभूत किया जा सकता है। ये ब्रहांड या प्रकृति के निर्माणक तत्व हैं। प्रकृति से ही महत् उत्पन्न हुआ जिसमें उक्त गुणों की साम्यता और प्रधानता थी। सत्व शांत और स्थिर है। रज क्रियाशील है और तम विस्फोटक है। उस एक परमतत्व के प्रकृति तत्व में ही उक्त तीनों के टकराव से सृष्टि होती गई। सर्वप्रथम महत् उत्पन्न हुआ, जिसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि प्रकृति का अचेतन या सूक्ष्म तत्व है। महत् या बुद्ध‍ि से अहंकार। अहंकार के भी कई उप भाग है। यह व्यक्ति का तत्व है। व्यक्ति अर्थात जो व्यक्त हो रहा है सत्व, रज और तम में। सत्व से मनस, पाँच इंद्रियाँ, पाँच कार्मेंद्रियाँ जन्मीं। तम से पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत (आकाश, अग्न‍ि, वायु, जल और ग्रह-नक्षत्र) जन्मे। पंचकोष👉 जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस ही अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कहते हैं। दरअसल, आप एक शरीर में रहते हैं जो कि जड़ जगत का हिस्सा है। आपके शरीर के भीतर प्राणमय अर्थात प्राण है जो कि वायुतत्व से भरा है। यह तत्व आपके जिंदा रहने को संचालित करता है। यदि आप देखे और सुने गए अनुसार संचालित होते हैं तो आपम प्राणों में जीते हैं अर्थात आप एक प्राणी से ज्यादा कुछ नहीं। मनोमय का अर्थ आपके शरीर में प्राण के अलावा मन भी है जिसे चित्त कहते हैं। पांचों इंद्रियों का जिस पर प्रभाव पड़ता है और समझने की क्षमता भी रखता है। इस मन के अलावा आपके ‍भीतर विज्ञानमन अर्थात एक ऐसी बुद्धि भी है जो विश्लेषण और विभाजन करना जानती है। इसके गहरे होने से मन का लोप हो जाता है और व्यक्ति बोध में जीता है। इस बोध के गहरे होने जाने पर ही व्यक्ति खुद के स्वरूप अर्थात आनंदमय स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। अर्थात जो आत्मा पांचों इंद्रियों के बगैर खुद के होने के भलिभांति जानती है। आठ तत्व👉 अनंत-महत्-अंधकार-आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी। अनंत जिसे आत्मा कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। अत: हम एक सुंदर प्रकृति और जगत के घेरे से घिरे हुए हैं। इस घेरे से अलग होकर जो व्यक्ति खुद को प्राप्त कर लेता है वही सत्य को प्राप्त कर लेता है। संसार में तीन ही तत्व है सत्य, शिव और सुंदरम। ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इसे ही सत्य, चित्त और आनंद कहते हैं। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
सत्यं शिवम् सुंदरम - शशिवम 9 सत्यम सत्यम  शिवम् gsH का रहस्य शशिवम 9 सत्यम सत्यम  शिवम् gsH का रहस्य - ShareChat