ब्राह्मण को सभी प्रायश्चित्त पूरी अवधि के , क्षत्रिय को तीन-चौथाई , वैश्य को आधी तथा शूद्र को एक चौथाई अवधि के ही करने चाहिए ।
जयतु धर्म सनातनः🚩
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
राजा विधवा , दुःखी , अनाथ , पतिव्रता या छोटे पुत्र वाली स्त्रियों की रक्षा करे- यदि उनका धन चोरी हो जाए तो स्वयं उन्हें धन प्रदान करे ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
राजा को राज्य में बिकने वाली वस्तुओं पर किसी भी दशा में ५% से अधिक कर नहीं लेना चाहिए ।
तथा
स्त्रियों एवं संन्यासियों से कर नहीं लेना चाहिये ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
#🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल
🔱बद्रीनाथ धाम की दिव्य उत्पत्ति: नारायण की लीला और महादेव का महात्याग 🔱
📕यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि'हर'(शिव) और 'हरि' (विष्णु) के बीच के अद्भुत संबंधों की है। यह वह गाथा है जहाँ एक देवता ने स्थान पाने के लिए बाल-लीला रची, तो दूसरे ने स्थान देने के लिए सर्वस्व त्याग दिया।📕
🚩1. देवर्षि नारद का व्यंग्य और नारायण का संकल्प🚩
🛐कथा का आरंभ वैकुण्ठ लोक से होता है। एक बार देवर्षि नारद, अपनी वीणा बजाते हुए श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे। नारायण शेषशय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी ने प्रणाम किया, किन्तु उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। उन्होंने कहा, "नारायण! नारायण! प्रभु, आप त्रिलोक के पालनहार हैं, संतों को तप और त्याग का उपदेश देते हैं। किन्तु स्वयं? स्वयं आप यहाँ क्षीरसागर में सुख-सुविधाओं के बीच, लक्ष्मी जी की सेवा का आनंद ले रहे हैं। पृथ्वी का सामान्य मनुष्य आपको देखकर विलासिता तो सीख सकता है, पर तपस्या की प्रेरणा कैसे ले?" नारद जी का यह व्यंग्य तीखा था, परंतु सत्य के निकट था। भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ गए कि नारद उन्हें एक नई लीला का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब एकांत में कठोर तप करेंगे और जगत के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे।🛐
🚩2. हिमालय की खोज और शिव का सुंदर धाम🚩
🧘तपस्या के लिए स्थान खोजने भगवान विष्णु हिमालय की ओर निकले। अलकनंदा नदी के तट पर, नर और नारायण पर्वतों के बीच उन्हें एक अत्यंत रमणीय, शांत और दिव्य स्थान दिखाई दिया। वहां का वातावरण इतना पवित्र था कि मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाए। किन्तु एक समस्या थी। वह स्थान रिक्त नहीं था। वहां एक सुंदर कुटिया थी, जिसके द्वार पर त्रिशूल गड़ा था। यह स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का प्रिय निवास स्थान था। विष्णु जी धर्मसंकट में पड़ गए। शिव जी को वहां से हटाना न तो उचित था और न ही संभव। यदि वे सीधे मांगते, तो शिव मना नहीं करते, लेकिन विष्णु जी इसे 'लीला' के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे।🧘
🚩3. नारायण बने रोता हुआ बालक🚩
🤹भगवान विष्णु ने तत्काल एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। एक ऐसा बालक जिसकी आभा सूर्य के समान थी, पर जो
भूख और प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से रो रहा था। वे उसी कुटिया के द्वार पर लेट गए और क्रंदन करने लगे। संयोगवश, शिव और पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। तभी माता पार्वती के कानों में एक नन्हे बालक के रोने की आवाज पड़ी। "स्वामी! सुनिए, इस निर्जन वन में किसी नवजात शिशु के रोने की ध्वनि आ रही है," पार्वती जी व्याकुल हो उठीं।
त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! उधर मत जाओ। वह कोई साधारण बालक नहीं है। यह सब माया है। उसे वहीं रहने दो।" परंतु जगत जननी माँ पार्वती का हृदय तो ममता से भरा था। उन्होंने शिव की चेतावनी अनसुनी कर दी और बोलीं, "नाथ! आप कितने कठोर हैं? एक नन्हा सा जीव द्वार पर रो रहा है और आप उसे छोड़ने को कह रहे हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकती।" पार्वती जी दौड़ी-दौड़ी गईं और उस सुंदर बालक को गोद में उठा लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक (विष्णु जी) चुप हो गया और मंद-मंद मुस्कुराने लगा। पार्वती जी उस पर मोहित हो
गईं।🤹
🚩4. चतुराई: द्वार बंद और गृह-प्रवेश🚩
🤱पार्वती जी ने बालक को कुटिया के भीतर सुलाया और उसे दुलारने लगीं। कुछ समय पश्चात, उन्होंने शिवजी से कहा, "स्वामी, हम स्नान के लिए तप्तकुंड (गर्म पानी का झरना) चलते हैं, तब तक बालक सो रहा है।" शिवजी ने एक बार फिर समझाया, "देवी, विचार कर लो। हम बाहर जा रहे हैं, कहीं लौटने पर यह हमारा घर ही न रहे?" पार्वती जी ने इसे मजाक समझा। दोनों स्नान के लिए चले गए। इधर, जैसे ही शिव-पार्वती आँखों से ओझल हुए, बाल रूपी विष्णु ने उठकर कुटिया का मुख्य द्वार भीतर से बंद कर लिया। जब शिव और पार्वती स्नान करके लौटे, तो देखा द्वार बंद है। पार्वती जी ने पुकारा, दरवाजा खटखटाया, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। पार्वती जी घबरा गईं, "अरे! बालक ने द्वार बंद कर लिया है, अब हम भीतर कैसे जाएंगे?"🤱
🚩5. महादेव का महात्याग🚩
🕉️शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। उन्होंने कहा, "उमा! मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था। वह बालक कोई और नहीं, स्वयं नारायण हैं। उन्हें यह स्थान भा गया है और वे अब यहाँ तपस्या करना चाहते हैं।" पार्वती जी अवाक रह गईं। उन्होंने पूछा, "तो अब हम क्या करेंगे? क्या हम बलपूर्वक भीतर जाएं?" तब महादेव ने जो कहा, वह उनके 'भोलेनाथ' होने का प्रमाण है।
उन्होंने कहा, "नहीं प्रिये! यदि मेरे आराध्य ने छल से ही सही, मेरा स्थान माँगा है, तो मैं उन्हें यह दे देता हूँ। अब यह स्थान 'बद्रीनाथ' कहलाएगा। हम यहाँ से चलते हैं।"
पार्वती जी ने पूछा, "किन्तु हम रहेंगे कहाँ?" शिवजी ने केदारखंड की ओर संकेत करते हुए कहा, "हम उस ऊँचे और दुर्गम शिखर पर अपना वास बनाएंगे, जहाँ एकांत और भी गहरा है।"और इस प्रकार, भगवान शिव ने अपना बसा-बसाया घर, अपनी प्रिय कुटिया विष्णु जी के लिए छोड़ दी और स्वयं केदारनाथ चले गए।🕉️
🌺 कथा का आध्यात्मिक सार 🌺
📕यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं—📕
🚩* विष्णु का मार्ग (लीला): जहाँ लक्ष्य प्राप्ति के लिए युक्ति और चतुराई का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उद्देश्य लोक- कल्याण होता है।
🚩* शिव का मार्ग (त्याग): जहाँ अपनी प्रिय वस्तु भी यदि कोई मांग ले, तो बिना द्वेष के उसे सौंप दिया जाता है। इसीलिए आज भी मान्यता है कि बद्रीनाथ (विष्णु धाम) की यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाती, जब तक भक्त केदारनाथ (शिव धाम) के दर्शन न कर ले। क्योंकि जहाँ नारायण का निवास है, वह भूमि महादेव के त्याग की नींव पर ही टिकी है।🚩
🙏।। जय बद्रीविशाल ।।🙏
🙏।। जय बाबा केदार ।।🙏
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
सत्यवती का भीष्म से राज्य ग्रहण और संतानोत्पादन के लिये आग्रह तथा भीष्म के द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति...(दिन 321)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती दीना कृपणा पुत्रगृद्धिनी । पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि स्नुषाभ्यां सह भारत ।। १ ।।
समाश्वास्य स्नुषे ते च भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् । धर्म च पितृवंशं च मातृवंशं च भाविनी । प्रसमीक्ष्य महाभागा गाङ्गेयं वाक्यमब्रवीत् ।। २ ।।
शान्तनोर्धर्मनित्यस्य कौरव्यस्य यशस्विनः । त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं च प्रतिष्ठितम् ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली सत्यवती अपने पुत्रके वियोगसे अत्यन्त दीन और कृपण हो गयी। उसने पुत्रवधुओंके साथ पुत्रके प्रेतकार्य करके अपनी दोनों बहुओं तथा शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको धीरज बँधाया। फिर उस महाभागा मंगलमयी देवीने धर्म, पितृकुल तथा मातृकुलकी ओर देखकर गंगानन्दन भीष्मसे कहा- 'बेटा! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले परम यशस्वी कुरुनन्दन महाराज शान्तनुके पिण्ड, कीर्ति और वंश ये सब अब तुम्हींपर अवलम्बित हैं ।। १-३ ।।
यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् । यथा चायुध्रुवं सत्ये त्वयि धर्मस्तथा ध्रुवः ।। ४ ।।
'जैसे शुभ कर्म करके स्वर्गलोकमें जाना निश्चित है, जैसे सत्य बोलनेसे आयुका बढ़ना अवश्यम्भावी है, वैसे ही तुममें धर्मका होना भी निश्चित है ।। ४ ।।
वेत्थ धर्मांश्च धर्मज्ञ समासेनेतरेण च । विविधास्त्वं श्रुतीर्वेत्थ वेदाङ्गानि च सर्वशः ।। ५ ।।
'धर्मज्ञ ! तुम सब धर्मोको संक्षेप और विस्तारसे जानते हो। नाना प्रकारकी श्रुतियों और समस्त वेदांगोंका भी तुम्हें पूर्ण ज्ञान है ।। ५ ।।
व्यवस्थानं च ते धर्मे कुलाचारं च लक्षये ।
प्रतिपत्तिं च कृच्छ्रेषु शुक्राङ्गिरसयोरिव ।। ६ ।।
'मैं तुम्हारी धर्मनिष्ठा और कुलोचित सदाचारको भी देखती हूँ। संकटके समय शुक्राचार्य और बृहस्पतिकी भाँति तुम्हारी बुद्धि उपयुक्त कर्तव्यका निर्णय करनेमें समर्थ है ।। ६ ।।
तस्मात् सुभृशमाश्वस्य त्वयि धर्मभृतां वर । कार्ये त्वां विनियोक्ष्यामि तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ।। ७ ।।
'अतः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्म ! तुमपर अत्यन्त विश्वास रखकर ही मैं तुम्हें एक आवश्यक कार्यमें लगाना चाहती हूँ। तुम पहले उसे सुन लो; फिर उसका पालन करनेकी चेष्टा करो ।। ७ ।।
मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान् सुप्रियश्च ते । बाल एव गतः स्वर्गमपुत्रः पुरुषर्षभ ।। ८ ।।
इमे महिष्यौ भ्रातुस्ते काशिराजसुते शुभे । रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च भारत ।। ९ ।।
तयोरुत्पादयापत्यं संतानाय कुलस्य नः । मन्नियोगान्महाबाहो धर्म कर्तुमिहार्हसि ।। १० ।।
'मेरा पुत्र और तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य जो पराक्रमी होनेके साथ ही तुम्हें अत्यन्त प्रिय था, छोटी अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गया। नरश्रेष्ठ ! उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। तुम्हारे भाईकी ये दोनों सुन्दरी रानियाँ, जो काशिराजकी कन्याएँ हैं, मनोहर रूप और युवावस्थासे सम्पन्न हैं। इनके हृदयमें पुत्र पानेकी अभिलाषा है। भारत ! तुम हमारे कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये स्वयं ही इन दोनोंके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करो। महाबाहो ! मेरी आज्ञासे यह धर्मकार्य तुम अवश्य करो ।। ८-१० ।।
राज्ये चैवाभिषिच्यस्व भारताननुशाधि च ।
दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ।। ११ ।।
'राज्यपर अपना अभिषेक करो और भारतीय प्रजाका पालन करते रहो। धर्मके अनुसार विवाह कर लो; पितरोंको नरकमें न गिरने दो' ।। ११ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथोच्यमानो मात्रा स सुहृद्भिश्च परंतपः । इत्युवाचाथ धर्मात्मा धर्म्यमेवोत्तरं वचः ।। १२ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! माता और सुहृदोंके ऐसा कहनेपर शत्रुदमन धर्मात्मा भीष्मने यह धर्मानुकूल उत्तर दिया ।। १२ ।।
असंशयं परो धर्मस्त्वया मातरुदाहृतः । राज्यार्थे नाभिषिञ्चेयं नोपेयां जातु मैथुनम् । त्वमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञां वेत्थ वै पराम् ।। १३ ।।
जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे । स सत्यवति सत्यं ते प्रतिजानाम्यहं पुनः ।। १४ ।।
'माता! तुमने जो कुछ कहा है, वह धर्मयुक्त है, इसमें संशय नहीं; परंतु मैं राज्यके लोभसे न तो अपना अभिषेक कराऊँगा और न स्त्रीसहवास ही करूँगा। संतानोत्पादन और राज्य ग्रहण न करनेके विषयमें जो मेरी कठोर प्रतिज्ञा है, उसे तो तुम जानती ही हो। सत्यवती ! तुम्हारे लिये शुल्क देनेके हेतु जो-जो बातें हुई थीं, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं। उन प्रतिज्ञाओंको पुनः सच्ची करनेके लिये मैं अपना दृढ़ निश्चय बताता हूँ ।। १३-१४ ।।
परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः । यद् वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन ।। १५ ।।
'मैं तीनों लोकोंका राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी एकदम त्याग सकता हूँ, परंतु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता ।। १५ ।।
त्यजेच्च पृथ्वी गन्धमापश्च रसमात्मनः ।
ज्योतिस्तथा त्यजेद् रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ।। १६ ।।
'पृथ्वी अपनी गंध छोड़ दे, जल अपने रसका परित्याग कर दे, तेज रूपका और वायु स्पर्श नामक स्वाभाविक गुणका त्याग कर दे ।। १६ ।।
प्रभां समुत्सृजेदों धूमकेतुस्तथोष्मताम् । त्यजेच्छब्दं तथाऽऽकाशं सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ।। १७ ।।
'सूर्य प्रभा और अग्नि अपनी उष्णताको छोड़ दे, आकाश शब्दका और चन्द्रमा अपनी शीतलताका परित्याग कर दे ।। १७ ।।
विक्रमं वृत्रहा जह्याद् धर्म जह्याच्च धर्मराट् ।
न त्वहं सत्यमुत्स्रष्टुं व्यवसेयं कथंचन ।। १८ ।।
'इन्द्र पराक्रमको छोड़ दें और धर्मराज धर्मकी उपेक्षा कर दें; परंतु मैं किसी प्रकार सत्यको छोडनेका विचार भी नहीं कर सकता ।। १८ ।।
(तन्न जात्वन्यथा कुर्या लोकानामपि संक्षये । अमरत्वस्य वा हेतोस्त्रैलोक्यसदनस्य वा ।। एवमुक्ता तु पुत्रेण भूरिद्रविणतेजसा ।) माता सत्यवती भीष्ममुवाच तदनन्तरम् ।। १९ ।।
जानामि ते स्थितिं सत्ये परां सत्यपराक्रम । इच्छन् सृजेथास्त्रींल्लोकानन्यांस्त्वं स्वेन तेजसा ।। २० ।।
जानामि चैवं सत्यं तन्मदर्थे यच्च भाषितम् । आपद्धर्म त्वमावेक्ष्य वह पैतामहीं धुरम् ।। २१ ।।
'सारे संसारका नाश हो जाय, मुझे अमरत्व मिलता हो या त्रिलोकीका राज्य प्राप्त हो, तो भी मैं अपने किये हुए प्रणको नहीं तोड़ सकता।' महान् तेजोरूप धनसे सम्पन्न अपने पुत्र भीष्मके ऐसा कहनेपर माता सत्यवती इस प्रकार बोली- 'बेटा! तुम सत्यपराक्रमी हो। मैं जानती हूँ, सत्यमें तुम्हारी दृढ़ निष्ठा है। तुम चाहो तो अपने ही तेजसे नयी त्रिलोकीकी रचना कर सकते हो। मैं उस सत्यको भी नहीं भूल सकी हूँ, जिसकी तुमने मेरे लिये घोषणा की थी। फिर भी मेरा आग्रह है कि तुम आपद्धर्मका विचार करके बाप-दादोंके दिये हुए इस राज्यभारको वहन करो ।। १९-२१ ।।
यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् । सुहृदश्च प्रहृष्येरंस्तथा कुरु परंतप ।। २२ ।।
'परंतप ! जिस उपायसे तुम्हारे वंशकी परम्परा नष्ट न हो, धर्मकी भी अवहेलना न होने पावे और प्रेमी सुहृद् भी संतुष्ट हो जायें, वही करो' ।। २२ ।।
लालप्यमानां तामेवं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । धर्मादपेतं ब्रुवतीं भीष्मो भूयोऽब्रवीदिदम् ।। २३ ।।
पुत्रकी कामनासे दीन वचन बोलनेवाली और मुखसे धर्मरहित बात कहनेवाली सत्यवतीसे भीष्मने फिर यह बात कही- ।। २३ ।।
राज्ञि धर्मानवेक्षस्व मा नः सर्वान् व्यनीनशः । सत्याच्च्युतिः क्षत्रियस्य न धर्मेषु प्रशस्यते ।। २४ ।।
'राजमाता! धर्मकी ओर दृष्टि डालो, हम सबका नाश न करो। क्षत्रियका सत्यसे विचलित होना किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं माना गया है ।। २४ ।।
शान्तनोरपि संतानं यथा स्यादक्षयं भुवि ।
तत् ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम् ।। २५ ।।
'राजमाता! महाराज शान्तनुकी संतानपरम्परा भी जिस उपायसे इस भूतलपर अक्षय बनी रहे, वह धर्मयुक्त उपाय मैं तुम्हें बतलाऊँगा। वह सनातन क्षत्रियधर्म है ।। २५ ।।
श्रुत्वा तं प्रतिपद्यस्व प्राज्ञैः सह पुरोहितैः ।
आपद्धर्मार्थकुशलैर्लोकतन्त्रमवेक्ष्य च ।। २६ ।।
उसे आपद्धर्मके निर्णयमें कुशल विद्वान् पुरोहितोंसे सुनकर और लोकतन्त्रकी ओर भी देखकर निश्चय करो ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मसत्यवतीसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-सत्यवती-संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#😊होली स्पेशल 🤘 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌷होलाष्टक🌷 #होलाष्टक पर जानकारी #होलाष्टक
. “होलाष्टक”
वर्ष 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी को लगेगा, और यह 03 मार्च 2026 तक रहेगा। यह 8 दिनों का होता है, तथा इस काल में किसी भी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है, तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी से भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है, अर्थात् ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो।
इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है, जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं।
इस वर्ष होलाष्टक 24 फरवरी मंगलवार से प्रारम्भ हो रहा है, जो 03 मार्च होलिका दहन (फाल्गुन पूर्णिमा) के साथ ही समाप्त हो जाएगा, अर्थात् आठ दिनों का यह होलाष्टक दोष रहेगा। जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित है।
इस समय विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरम्भ नहीं करना चाहिए। ऐसा ज्योतिष शास्त्र का कथन है। अर्थात् इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है, तथा विवाह आदि सम्बन्ध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं, या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।
होलाष्टक से तात्पर्य है कि होली के 8 दिन पूर्व से है अर्थात धुलण्डी से आठ दिन पहले होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। इन दिनों शुभ कार्य करने की मनाही होती हैं। हिन्दू धर्मो के 16 संस्कारों को न करने की सलाह दी जाती है।
क्या करते हैं होलाष्टक में
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं। होलाष्टक आरम्भ होते ही दो डण्डों को स्थापित किया जाता है, इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से सम्बन्धित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
यह मृत्यु का सूचक है। इस दुःख के कारण होली के पूर्व 8 दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नही होता है। जब प्रह्लाद बच जाता है, उसी खुशी में होली का त्योहार मनाते हैं।
ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुनः जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।
॥जय जय श्री राधे॥
#❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
🙏॥ श्री हरिः॥🙏
🛐इंद्रियां-मन-बुद्धि-भगवान के हैं🛐
🍀एक मार्मिक बात है कि हमारे केवल भगवान ही हो सकते हैं। जड़ चीजें हमारी कैसे हो सकती हैं ? हम भगवान के अंश हैं, शरीर प्रकृति का अंश है । उस शरीर की सहायता से हमें भगवान की प्राप्ति कैसे होगी ? नहीं हो सकती । यह मूल बात है । ये शरीर- इंद्रियां- मन- बुद्धि भगवान के हैं, यह तो ठीक है, पर ये हमारी सहायता करेंगे, यह ठीक नहीं है । इनको अपना मानना बहुत बड़ी गलती है, मामूली गलती नहीं है। यह गलती भी नहीं सुधरेगी तो भगवान की प्राप्ति कैसे होगी ?
नाम जप में संख्या देखना उचित नहीं है । जिन भगवान ने हमें अनगिनत चीजें दी है, उनका नाम हम गिन कर ले । गिनती इसलिए रखो कि हमारा नाम जप कम न हो जाय। भगवान गिनती से नहीं मिलते, प्रेम से मिलते हैं।भगवान प्यारे लगने चाहिये। भगवान के साथ संबंध होने से ही गंगाजी आदि श्रेष्ठ है। कहीं भी विशेषता दिखे तो हमारी वृत्ति भगवान की तरफ जानी चाहिये, न कि जड़ की तरफ । 🍀
‼️इसीलिए शरीर से संसार की सेवा करो। नौकरी, व्यवसाय आदि, खूब पुरूषार्थ करो, परंतु मन केवल भगवान् मे लगा दो। फिर जीवन मे आनंद ही आनंद होगा।‼️
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍
**गुरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की 16 नगरों की यात्रा.......
हिंदू धर्म में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गरुड़ पुराण में इस यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें आत्मा को 16 विभिन्न नगरों (शहरों) से गुजरना पड़ता है। यह नगर आत्मा के कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करते हैं और इसे मोक्ष या पुनर्जन्म की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं इन 16 नगरों के बारे में:
### **1. सौम्यपुर**
यह पहला नगर है, जहां आत्मा को यमराज के दूतों द्वारा ले जाया जाता है। यहां आत्मा को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का स्मरण कराया जाता है।
### **2. सौरिपुर**
इस नगर में उन आत्माओं को दंड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में अधर्म का आचरण किया होता है।
### **3. नागेन्द्रभवन**
यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अन्य लोगों को अत्यधिक कष्ट दिया हो। उन्हें यहां दंड भोगना पड़ता है।
### **4. गोरमुख**
इस नगर में वे आत्माएँ जाती हैं जिन्होंने अपने जीवन में पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाया हो।
### **5. क्रूरपुर**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जो लोभ, कपट और अन्य दुष्कर्मों में लिप्त रहे हैं। उन्हें यहाँ तीव्र यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
### **6. विचित्रभवन**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्म किए हैं। उन्हें यहाँ मिश्रित अनुभव होते हैं।
### **7. वह्निपुर**
इस स्थान में आत्माओं को अग्नि के दंड से गुजरना पड़ता है। यह नगर मुख्य रूप से उन लोगों के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अनैतिक कार्य किए हैं।
### **8. सन्निहितालय**
यहाँ आत्मा को उसकी जीवन की सभी घटनाओं का अनुभव कराया जाता है, जिससे वह अपने कर्मों की सच्चाई समझ सके।
### **9. रौद्रपुर**
इस नगर में वे लोग आते हैं जो क्रोधी स्वभाव के थे और जिन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक क्रूरता दिखाई हो।
### **10. प्रेतपुर**
जो लोग अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों का पालन नहीं करते, वे इस नगर में प्रेत योनि में रहते हैं।
### **11. पिशाचपुर**
जो व्यक्ति लोभी, छल-कपट में लिप्त रहते हैं, वे इस नगर में पिशाच रूप में रहते हैं।
### **12. शैलग्राम**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने परोपकार किए हैं और जिनका पुण्य कर्म अधिक होता है।
### **13. नगर नरक**
यह स्थान पूर्णतः नरक के समान है, जहाँ आत्माओं को उनके पापों का कठोर दंड दिया जाता है।
### **14. विष्टिपुर**
जो व्यक्ति दूसरों को धोखा देते हैं, झूठ बोलते हैं, और छल-कपट करते हैं, वे इस नगर में यातना भोगते हैं।
### **15. ललाटपुर**
यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने पूर्व जन्म में साधना की थी लेकिन मोह-माया में फंस गए थे।
### **16. यमपुरी**
यह अंतिम नगर है, जहाँ यमराज आत्मा के कर्मों के अनुसार उसे पुनर्जन्म देने या मोक्ष प्रदान करने का निर्णय लेते हैं।
### **निष्कर्ष**
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को इन 16 नगरों से गुजरना पड़ता है। यह यात्रा आत्मा के कर्मों के अनुसार सुखद या कष्टदायक हो सकती है। अतः जीवन में सत्कर्म करना और धर्म का पालन करना आवश्यक है ताकि आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर किया जा सके।
**"सत्कर्म ही मोक्ष की कुंजी है।"**
हज़ारों वर्ष बाद मीरा ने अधिकार जता कर .. कहा कि तुम हो, यहीं हो और मैं तुम्हारी हूँ..!
और सचमुच श्री कृष्ण जितने मीरा के हुए उतने किसी के नही हुए .. प्रेम में डूबे सामान्य लोग अपने प्रिय पर दावा करते हैं कि तुम मेरे हो .. मीरा ने इसके उलट जाकर कहा कि मैं तुम्हारी हूँ...
मीरा ने मांगा नहीं. दिया.! और फिर बिन मांगें सब कुछ पा लिया..! जिस कृष्ण को स्वयं राधारानी अपना पति नहीं कह सकीं .. उनको मीरा ने साधिकार अपना पति कहा, माना और सिद्ध किया कि सचमुच ' ही थे ..
मीरा को पढ़कर लगता है कि सचमुच प्रेम समर्पण की पराकाष्ठा का नाम है..! मनुष्य सामान्यतः किसी एक के भरोसे नही रह पाता उसके मन में भरोसे का द्वंद चलता ही रहता है ..
इसपर करूँ या उसपर .. पर किसी एक के भरोसे रहने का आंनद अद्वितीय होता है .. बस कृष्ण सा निभाने वाला मिलना चाहिए..! पत्नियो को छोड़ दें तो श्री कृष्ण के जीवन में दो स्त्रियाँ आयी .. जिन्होंने अपना सर्वस्व उनके भरोसे छोड़ दिया..
पहली द्रोपदी चीरहरण के .. समय वो सबको भूलकर उन्होंने केवल और केवल श्री कृष्ण पर भरोसा किया .. फिर श्री कृष्ण ने जो भयविधि निभाई.. वह इतिहास है..! और दूसरी हुई मीरा .. श्री कृष्ण के आगे सब को भूल गयी
किसी ने कहा घर छोड़ दो तो छोड़ दिया, किसी ने कहा विष पी लो तो पी लिया, न किसी से भय, न किसी से मोह, भरोसा केवल श्री कृष्ण पर फिर श्री कृष्ण कैसे न होते मीरा के .. सच पूछिए.! तो स्वयंबर में श्री कृष्ण मीरा ने ही जीता था..!
मीरा के विषपान की बड़ी चर्चा हुई.. शायद प्रेम करना विष पीने जैसा ही होता है .. कृष्ण जैसा कोई मिल गया तो उस विष को अमृत बना देता है .. और प्रेम की प्रतिष्ठा रह जाती है..! कुछ मूर्ख कवियों ने कहा कि प्रेम किया नहीं जाता.?
हो जाता है.! इस सृष्टि में यूँ ही नहीं कुछ होता और प्रेम तो सजीवों का सबसे पवित्र भाव है उसे बिना जाँचे- परखे किसी को कैसे दे देंगे आप प्रेम के लिए तो सुपात्र का ही चयन होना चाहिए मीरा ने सुपात्र का चयन किया तो अमर हुई ..
खैर ! श्रीकृष्ण अकेले थे जिन्होंने सिद्ध किया कि जिसका कोई नही उसका मैं.. जिसने जिस रूप में चाहा उसे उस रूप में मिले .. नन्द बाबा और यशोदा मैया ने पुत्र रूप में चाहा तो न होते हुए भी उनके पुत्र हो गए..
गोपियों ने वात्सल्य भाव से देखा तो उनकी गोद में खेले..! राधा ने प्रेम किया तो उन्हें प्रेमी के रूप में मिले, और क्या खूब मिले .. उद्धव और अर्जुन ने मित्र रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में मिले ..
सुदामा ने ईश्वर के रूप में पूजा की तो उनका घर भर दिया .. जामवंत को लड़ने की चाह थी तो उनकी वह इच्छा भी पूरी की.. ! रुक्मिणी, सत्यभामा को तो छोड़िए, नरकासुर की बंदिनी, सोलह हजार राजकुमारियों ने पति रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में भी मिले ..
किसी को निराश नही किया फिर मीरा को कैसे निराश करते..? मीरा ने कृष्ण से मांगा नही कि मेरे हो जाओ बल्कि मान लिया कि श्री कृष्ण ही मेरे है .. आगे सब श्री कृष्ण के ऊपर था..
जिस दिन उन्होंने पहली बार श्री कृष्ण का नाम लिया उस दिन से अंतिम दिन तक श्री कृष्ण उन्हीं के रहे, उनके साथ रहे..!
श्री कृष्ण की प्रेमिकाओं ने दिखाया कि प्रेम करते कैसे हैं .. तो श्री कृष्ण ने बताया कि निभाते कैसे हैं .. संबंधों को निभाने में श्री कृष्ण अद्भुत हैं..! अच्छा सुनो.! श्री कृष्ण इतने आसानी से भी नही मिल जाते .. उसके लिए मीरा होना पड़ता है.. विष पीना पड़ता है....
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोये..
मेरे कृष्ण .. 🌹🙏
जय श्री राधे राधे 🌹🙏 #मीराबाई
#👫 हमारी ज़िन्दगी #🙏 प्रेरणादायक विचार
एक बार एक साधू घूमता
हुआ सा कहीं जा रहा था।
तो,रास्ते में उन्हें एक
मंदिर दिखाई दिया।
मंदिर दिखते ही वो अपनी
उस फटी हुई सी धोती को
पहने ही मंदिर में चला गया
और भगवान को प्रणाम कर
कहने लगा-
हे प्रभु,आप बड़े दयालु हैं...!
करुणामयी हैं...
जो आपने मुझे
इतना कुछ दिया।
आपका
बहुत-बहुत धन्यवाद है।
उसी समय एक नास्तिक
वहाँ बैठा हुआ यह सब
देख रहा था।
साधु को देखकर वो हंसते
हुए कहने लगा-अरे पागल....!
तेरे पास तो सिर्फ एक फटी
पुरानी सी धोती है और उसमें
भी कई छेद हैं।
जबकि,तू कह रहा है कि
तुमने मुझे इतना कुछ दिया है।
आपका धन्यवाद है ???
इस पर साधू ने मुस्करा कर
बहुत ही सुंदर उत्तर दिया कहा :
पागल मैं नहीं तू है।
अरे,
मैं जब पैदा हुआ था तो उस
समय तो मेरे तन पर यह धोती
भी नहीं थी।
परमात्मा के प्रति उस
साधू की कृतज्ञता देखकर
वह नास्तिक अवाक रह गया...!
जयभवानी👏
जयश्रीराम👏













