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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🌺राधा कृष्ण💞 #🎨होली की मस्ती 🤣 #🌺फूलों वाली होली 🌼 गोद में विराजे नटखट, मन के राजा कान्हा, सारे जग से प्यारा लगे, तेरा मुस्कुराना। नीली साड़ी की छाँव में, जैसे यमुना का तीर, तू ही हर ले सबकी पीड़ा, तू ही बंधाए धीर। ​कभी सखा, कभी पुत्र बन, मन आंगन में डोले, भक्त की मौन पुकार पर, तू ही आकर बोले। ये तिलक, ये माला, ये समर्पण है तेरे नाम, तुझमें ही बसता है मेरा, सारा चारो धाम। ​हाथों में लेकर तुझे, मिला सुकूँ का वास, तू पास है तो लगता है, ईश्वर है मेरे पास। न चाहत कोई और अब, न कोई दूजा सपना, बस जनम-जनम साथ रहे, ये कान्हा मेरा अपना। राधे राधे…. .
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. #जय श्री #जय श्री कृष्ण भगवान श्रीकृष्ण, जिन्हें अक्सर मनमोहक, मानवीय हाव-भाव के साथ चित्रित किया जाता है, मिट्टी का घड़ा पकड़े हुए राधा रानी की चाल की नकल करते हैं, यह दृश्य राधा रानी और उनकी सखियों (सहेलियों) के चेहरे पर मुस्कान और आनंद भर देता है। इस विशेष दृश्य में, कृष्ण प्रेमपूर्ण, उपहासपूर्ण नृत्य या चाल में संलग्न होते हैं, और राधा रानी के हाव-भाव की नकल करते हैं, जब वह पानी के लिए एक घड़ा ले जा रही होती हैं..... राधारानी और उनकी सहेलियाँ (गोपियाँ) कृष्ण की हरकतों से मंत्रमुग्ध और प्रसन्न होकर मुस्कुरा रही हैं। यह उनके बीच के घनिष्ठ और आनंदमय संबंध को दर्शाता है, जहाँ कृष्ण अक्सर अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए भूमिकाएँ निभाते हैं या उनकी नकल करते हैं। राधे राधे…. जय श्रीकृष्ण…. .
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. #राधे कृष्ण फूलों की होली खेले श्याम, राधा संग बरसे प्रेम रसधाम। वृंदावन महके रंग अपार, श्याम-राधा का दिव्य श्रृंगार॥ केसर, गुलाब, चंपा, बेला, बरसे फूल, सजे रंग मेला। मोर मुकुट पर खिलती मुस्कान, राधा देखे श्याम को हर बार॥ राधा हँसकर फूल उछाले, श्याम जी प्रेम से नैन मिला लें। बंसी बोले मीठी तान, हर मन बोले राधे-श्याम॥ रंग नहीं ये, प्रेम पुकारे, जीवन के सब दुख बिसारे। नाम जपो तो मिटे अज्ञान, राधा-कृष्ण में बसे भगवान॥ जो भी मन से दर्शन पावे, श्याम कृपा से भव तर जावे। भक्त कहे बस इतना काम, जन्म-जन्म राधे-श्याम॥ ...
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. #राधे राधे राधा खिला रही श्याम को, प्रेम भरे हर ग्रास, नयनों में भक्ति छलक रही, होठों पर मधुर हास। माखन मिश्री हाथ में, श्याम करे स्वीकार, राधा के इस प्रेम बिना, सूना है संसार। हर निवाला बन जाए पूजा, हर पल बन जाए ध्यान, राधा के हाथों भोजन में, बसे ब्रज का मान। कान्हा मुस्कुराए प्रेम से, राधा देख निहाल, ऐसा प्रेम जगत में विरला, ऐसा भाव विशाल। राधा की सेवा में छिपा, सारा वेद पुराण, प्रेम भक्ति का यही है मार्ग, यही सच्चा ज्ञान। .
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. #जय श्री राधे कृष्ण आधे चाँद की गोद में बैठी प्रेम की मूरत, बंसी की मधुर तान में बसी सृष्टि की सूरत। कृष्ण की धुन में राधा का मन खो जाए, तारों भरी रात भी इनके प्रेम पर मुस्कुराए। जहाँ चाँदनी भी ठहर जाए निहारने को, वहीं राधा-कृष्ण का प्रेम अमर कहलाए। .
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुरधिकशततमोऽध्यायः भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 324) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मातापित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे ।। ३१ ।। तेषां पिता यथा स्वामी तथा माता न संशयः । विधानविहितः सत्यं यथा मे प्रथमः सुतः ।। ३२ ।। विचित्रवीर्यो ब्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः । यथैव पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः ।। ३३ ।। भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे। अयं शान्तनवः सत्यं पालयन् सत्यविक्रमः ।। ३४ ।। 'विद्वन्! माता और पिता दोनोंसे पुत्रोंका जन्म होता है, अतः उनपर दोनोंका समान अधिकार है। जैसे पिता पुत्रोंका स्वामी है, उसी प्रकार माता भी है। इसमें संदेह नहीं है। ब्रह्मर्षे! विधाताके विधान या मेरे पूर्वजन्मोंके पुण्यसे जिस प्रकार तुम मेरे प्रथम पुत्र हो, उसी प्रकार विचित्रवीर्य मेरा सबसे छोटा पुत्र था। जैसे एक पिताके नाते भीष्म उसके भाई हैं, उसी प्रकार एक माताके नाते तुम भी विचित्रवीर्यके भाई ही हो। बेटा! मेरी तो ऐसी ही मान्यता है; फिर तुम जैसा समझो। ये सत्यपराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म सत्यका पालन कर रहे हैं ।। ३१-३४ ।। बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने । स त्वं व्यपेक्षया भ्रातुः संतानाय कुलस्य च ।। ३५ ।। भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ । अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च ।। ३६ ।। आनृशंस्याच्च यद् ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि । यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे ।। ३७ ।। रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च धर्मतः । तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक ।। ३८ ।। अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य च । 'अनघ ! संतानोत्पादन तथा राज्य शासन करनेका इनका विचार नहीं है; अतः तुम अपने भाईके पारलौकिक हितका विचार करके तथा कुलकी संतानपरम्पराकी रक्षाके लिये भीष्मके अनुरोध और मेरी आज्ञासे सब प्राणियोंपर दया करके उनकी रक्षा करनेके उद्देश्यसे और अपने अन्तःकरणकी कोमल वृत्तिको देखते हुए मैं जो कुछ कहूँ, उसे सुनकर उसका पालन करो। तुम्हारे छोटे भाईकी पत्नियाँ देवकन्याओंके समान सुन्दर रूप तथा युवावस्थासे सम्पन्न हैं। उनके मनमें धर्मतः पुत्र पानेकी कामना है। पुत्र ! तुम इसके लिये समर्थ हो, अतः उन दोनोंके गर्भसे ऐसी संतानोंको जन्म दो, जो इस कुलपरम्पराकी रक्षा तथा वृद्धिके लिये सर्वथा सुयोग्य हों' ।। ३५-३८३ ।। व्यास उवाच वेत्थ धर्म सत्यवति परं चापरमेव च ।। ३९ ।। तथा तव महाप्राज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः । तस्मादहं त्वन्नियोगाद् धर्ममुद्दिश्य कारणम् ।। ४० ।। ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्योतत् सनातनम् । भ्रातुः पुत्रान् प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान् ।। ४१ ।। व्यासजीने कहा-माता सत्यवती! आप पर और अपर दोनों प्रकारके धर्मोंको जानती हैं। महाप्राज्ञे! आपकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। अतः मैं आपकी आज्ञा से धर्म को ही दृष्टि में रखकर (कामके वश न होकर ही) आपकी इच्छाके अनुरूप कार्य करूँगा। यह सनातन मार्ग शास्त्रोंमें देखा गया है। मैं अपने भाईके लिये मित्र और वरुणके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न करूँगा ।। ३९ -४१ ।। व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया । संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः ।। ४२ ।। न हि मामव्रतोपेता उपेयात् काचिदङ्गना । विचित्रवीर्य की स्त्रियों को मेरे बताये अनुसार एक वर्षतक विधिपूर्वक व्रत (जितेन्द्रिय होकर केवल संतानार्थ साधन) करना होगा, तभी वे शुद्ध होंगी। जिसने व्रतका पालन नहीं किया है, ऐसी कोई भी स्त्री मेरे समीप नहीं आ सकती ।। ४२ ।। सत्यवत्युवाच सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भ तथा कुरु ।। ४३ ।। सत्यवतीने कहा- बेटा! ये दोनों रानियाँ जिस प्रकार शीघ्र गर्भ धारण करें, वह उपाय करो ।। ४३ ।। अराजकेषु राष्ट्रेषु प्रजानाथा विनश्यति । नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता ।। ४४ ।। राज्य में इस समय कोई राजा नहीं है। बिना राजाके राज्यकी प्रजा अनाथ होकर नष्ट हो जाती है। यज्ञ-दान आदि क्रियाएँ भी लुप्त हो जाती हैं। उस राज्यमें न वर्षा होती है, न देवता वास करते हैं ।। ४४ ।। कथं चाराजंक राष्ट्र शक्यं धारयितुं प्रभो । तस्माद् गर्भ समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति ।। ४५ ।। प्रभो! तुम्हीं सोचो, बिना राजाका राज्य कैसे सुरक्षित और अनुशासित रह सकता है। इसलिये शीघ्र गर्भाधान करो। भीष्म बालकको पाल-पोसकर बड़ा कर लेंगे ।। ४५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतमू కీ శ్తీ श्रीमहाभारतमू కీ శ్తీ - ShareChat
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६७ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड सतासीवाँ सर्ग भरतकी मूर्च्छासे गुह, शत्रुघ्न और माताओंका दुःखी होना, होशमें आनेपर भरतका गुहसे श्रीराम आदिके भोजन और शयन आदिके विषयमें पूछना और गुहका उन्हें सब बातें बताना गुहका श्रीरामके जटाधारण आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीरामके विषयमें उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीरामने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)॥१॥ भरत सुकुमार होनेके साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंहके समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखनेमें बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुहकी बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुशसे विद्ध हुए हाथीके समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःखसे शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये॥२-३॥ भरतको मूर्च्छित हुआ देख गुहके चेहरेका रंग उड़ गया। वह भूकम्पके समय मथित हुए वृक्षकी भाँति वहाँ व्यथित हो उठा॥४॥ शत्रुघ्न भरतके पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदयसे लगाकर जोर-जोरसे रोने लगे और शोकसे पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे॥५॥ तदनन्तर भरतकी सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पतिवियोगके दुःखसे दुःखी, उपवास करनेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं॥६॥ भूमिपर पड़े हुए भरतको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं। कौसल्याका हृदय तो दुःखसे और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरतके पास जाकर उन्हें अपनी गोदमें चिपका लिया॥७॥ जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेको गलेसे लगाकर चाटती है, उसी तरह शोकसे व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्याने भरतको गोदमें लेकर रोते-रोते पूछा—॥८॥ 'बेटा! तुम्हारे शरीरको कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंशका जीवन तुम्हारे ही अधीन है॥९॥ 'वत्स! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ। श्रीराम लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके रक्षक हो॥१०॥ 'बेटा! सच बताओ, तुमने लक्ष्मणके सम्बन्धमें अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली माँके बेटे वनमें सीतासहित गये हुए श्रीरामके विषयमें कोई अप्रिय आत तो नहीं सुनी है?'॥११॥ दो ही घड़ीमें जब महायशस्वी भरतका चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौसल्याको सान्त्वना दी (और कहा-'माँ! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है')। फिर निषादराज गुहसे इस प्रकार पूछा—॥१२॥ 'गुह! उस दिन रातमें मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौनेपर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ'॥१३॥ ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीरामके आनेपर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरतसे कहा—॥१४॥ 'मैंने भाँति-भाँतिके अन्न, अनेक प्रकारके खाद्य-पदार्थ और कई तरहके फल श्रीरामचन्द्रजीके पास भोजनके लिये प्रचुर मात्रामें पहुँचाये॥१५॥ 'सत्यपराक्रमी श्रीरामने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्मका स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया—मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया॥१६॥ 'फिर उन महात्माने हम सब लोगोंको समझाते हुए कहा—'सखे! हम जैसे क्षत्रियोंको किसीसे कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये'॥१७॥ 'सीतासहित श्रीरामने उस रातमें उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसीको उन महात्माने पीया॥१८॥ 'उनके पीनेसे बचा हुआ जल लक्ष्मणने ग्रहण किया। (जलपानके पहले) उन तीनोंने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी॥१९॥ 'तदनन्तर लक्ष्मणने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजीके लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया॥२०॥ 'उस सुन्दर बिस्तरपर जब सीताके साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनोंके चरण पखारकर वहाँसे दूर हट आये॥२१॥ 'यही वह इङ्गुदी-वृक्षकी जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता—दोनोंने रात्रिमें शयन किया था॥२२॥ 'शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठपर बाणोंसे भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीरामके चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रातभर खड़े रहे॥२३॥ 'तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ, जो निद्रा और आलस्यका त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीरामकी रक्षा करता रहा'॥२४॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८७॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - हरि शरणं नितही , ওনি ত্রীতা মলীতা दुःखी जिन्ह के पद पंकज प्रीत नही ]] जिन्हें आपके चरण कमलों में प्रीति भावार्थ नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास ) और दुःखी रहते हैं ।l हरि शरणं नितही , ওনি ত্রীতা মলীতা दुःखी जिन्ह के पद पंकज प्रीत नही ]] जिन्हें आपके चरण कमलों में प्रीति भावार्थ नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास ) और दुःखी रहते हैं ।l - ShareChat
#जय श्री कृष्ण ॰ भगवदीय किसे कहते है …!!! ॰ 1) जो श्री ठाकुर जी की सेवा के लिये ही देह को धारण किये हुये है वे है भगवदीय... 2) जो श्री ठाकुर जी के सुख में ही अपना सुख माने वे है भगवदीय... 3) जो अनन्य भाव से केवल श्री ठाकुर जी का ही भजन-चिंतन करे वे है भगवदीय... 4) जो जन श्री ठाकुर जी को अति अति प्रिय है वे है भगवदीय... 5) जिनको श्री ठाकुर जी की सेवा के लिये देहादि और लौकिक मर्यादा का विस्मरण हो गया है वे है भगवदीय... 6) जिनको मानसी सिद्ध हो गयी है वे है भगवदीय... 7) जिनको अपने सेव्य स्वरुप से एक क्षण का भी वियोग सहन न हो वे है भगवदीय... 8) जिनके ह्रदय में साक्षात् श्री महाप्रभु जी बिराजमान हो वे है भगवदीय... 9) जो श्री ठाकुर जी और श्री वल्लभ के सिवा अन्य किसी को नहीं जानते है वे है भगवदीय... 10) श्री ठाकुर जी ने, श्री महाप्रभु जी ने, श्री गुसाई जी ने बार बार जिनके गुणगान किये है वे है भगवदीय... 11) " दमला, ये मारग तेरे लिये प्रकट कियो है..." ऐसे श्री दमला जी, श्री मेघन जी, श्री पद्मनाभदास जी जैसे अति अति कृपापात्र जन है भगवदीय... 12) श्री महाप्रभु जी जिनके लिये "भक्त परायण, भक्तमात्रासक्त " स्वरुप धारण कर मनोरथ पूर्ण करते है वे है भगवदीय... 13) श्री यमुना जी में जिसकी अति आसक्ति है वे है भगवदीय... 14) जिनके लिये श्री गुसाई जी भक्ति हंस ग्रन्थ में आज्ञा करते है की "अस्पृष्टो रमते निज भक्तेषु" वे है भगवदीय... 15) जिनके चक्षु दिव्य (कृष्णमय)है , जिनके रोम रोम में भगवद् रस व्याप्त है वे है भगवदीय... 16) जिनको संसार के भोग आकर्षित नहीं कर पाते, जो दैन्य भाव की साक्षात् मूर्ति है वे है भगवदीय... 17) जो श्री ठाकुर जी की अंतरंग श्रुष्टि के है वे है भगवदीय..
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#गरूड़ पुराण✍ #गरूड़ पुराण सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) {पहला अध्याय} 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ (भगवान विष्णु तथा गरुड़ के संवाद में गरुड़ पुराण – पापी मनुष्यों की इस लोक तथा परलोक में होने वाली दुर्गति का वर्णन, दश गात्र के पिण्डदान से यातना देह का निर्माण।) धर्म ही जिसका सुदृढ़ मूल है, वेद जिसका स्कन्ध(तना) है, पुराण रूपी शाखाओं से जो समृद्ध है, यज्ञ जिसका पुष्प है और मोक्ष जिसका फल है, ऎसे भगवान मधुसूदन रूपी पादप – (जैसे वृक्ष सबको आश्रय देता है, वैसे ही भगवान भी अपने चरणारविन्द में आश्रय देकर सबकी रक्षा करते हैं इसीलिए भगवान मधूसूदन को यहां पादप – वृक्ष की उपमा दी गई है) कल्पवृक्ष की जय हो। देव – क्षेत्र नैमिषारण्य में स्वर्ग लोक की प्राप्ति की कामना से शौनकादि ऋषियों ने एक बार सहस्त्रवर्ष में पूर्ण होने वाला यज्ञ प्रारम्भ किया। एक समय प्रात:काल के हवनादि कृत्यों का सम्पादन कर के उन सभी मुनियों ने सत्कार किए गये आसनासीन सूत जी महाराज से आदरपूर्वक यह पूछा – ऋषय ऊचु: ऋषियों ने कहा – हे सूत जी महाराज्! आपने सुख देने वाले देवमार्ग का सम्यक निरूपण किया है। इस समय हम लोग भयावह यममार्ग के विषय में सुनना चाहते हैं। आप सांसारिक दुखों को और उस क्लेश के विनाशक साधन को तथा इस लोक और परलोक के क्लेशों को यथावत वर्णन करने में समर्थ है, अत: उसका वर्णन कीजिए। सूत उवाच सूतजी बोले – हे मुनियों! आप लोग सुनें! मैं अत्यन्त दुर्गम यममार्ग के विषय में कहता हूँ, जो पुण्यात्मा जनों के लिए सुखद और पापियों के लिए दु:खद है। गरुड़ जी के पूछने पर भगवान विष्णु ने उनसे जैसा कुछ कहा था, मैं उसी प्रकार आप लोगों के संदेह की निवृत्ति के लिए कहूँगा। किसी समय वैकुण्ठ में सुखपूर्वक विराजमान परम गुरु श्रीहरि से विनतापुत्र गरुड़ जी ने विनय से झुककर पूछा – गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे देव! आपने भक्ति मार्ग का अनेक प्रकार से मेरे समक्ष वर्णन किया है और भक्तों को प्राप्त होने वाली उत्तम गति के विषय में भी कहा है। अब हम भयंकर यम मार्ग के विषय में सुनना चाहते हैं। हमने सुना है कि आपकी भक्ति से विमुख प्राणी वहीं नरक में जाते हैं। भगवान का नाम सुगमतापूर्वक लिया जा सकता है, जिह्वा प्राणी के अपने वश में है तो भी लोग नरक में जाते हैं, ऎसे अधम मनुष्यों को बार-बार धिक्कार है। इसलिए हे भगवान! पापियों को जो गति प्राप्त होती है तथा यम मार्ग में जैसे वे अनेक प्रकार के दु:ख प्राप्त करते हैं, उसे आप मुझसे कहें। श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले – हे पक्षीन्द्र! सुनो, मैं उस यममार्ग के विषय में कहता हूँ, जिस मार्ग से पापीजन नरक की यात्रा करते हैं और जो सुनने वालों के लिये भी भयावह है। हे तार्क्ष्य! जो प्राणी सदा पाप परायण है, दया और धर्म से रहित हैं, जो दुष्ट लोगों की संगति में रहते हैं, सत्-शास्त्र और सत्संगति से विमुख है, जो अपने को स्वयं प्रतिष्ठित मानते हैं, अहंकारी हैं तथा धन और मान के मद से चूर हैं, आसुरी शक्ति को प्राप्त हैं तथा दैवी सम्पत्ति से रहित हैं, जिनका चित्त अनेक विषयों में आसक्त होने से भ्रान्त हैं, जो मोह के जाल में फंसे हैं और कामनाओं के भोग में ही लगे हैं, ऎसे व्यक्ति अपवित्र नरक में गिरते हैं. जो लोग ज्ञानशील हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं। पापी मनुष्य दु:खपूर्वक यम यातना प्राप्त करते हैं। पापियों को इस लोक में जैसे दु:ख की प्राप्ति होती है और मृत्यु के पश्चात वे जैसी यम यातना को प्राप्त होते हैं, उसे सुनो। यथोपार्जित पुण्य और पाप के फलों को पूर्व में भोगकर कर्म के सम्बन्ध से उसे कोई शारीरिक रोग हो जाता है। आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग) – से युक्त तथा जीवन धारण करने की आशा से उत्कण्ठित उस व्यक्ति की जानकारी के बिना ही सर्प की भाँति बलवान काल उसके समीप आ पहुँचता है। उस मृत्यु की सम्प्राप्ति की स्थिति में भी उसे वैराग्य नहीं होता. उसने जिनका भरण-पोषण किया था, उन्हीं के द्वारा उसका भरण-पोषण होता है, वृद्धावस्था के कारण विकृत रूप वाला और मरणाभिमुख वह व्यक्ति घर में अवमाननापूर्वक दी हुई वस्तुओं को कुत्ते की भाँति खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वह रोगी हो जाता है, उसे मन्दाग्नि हो जाती है और उसका आहार तथा उसकी सभी चेष्टाएँ कम हो जाती हैं। प्राण वायु के बाहर निकलते समय आँखें उलट जाती हैं, नाड़ियाँ कफ से रुक जाती हैं, उसे खाँसी और श्वास लेने में प्रयत्न करना पड़ता है तथा कण्ठ से घुर-घुर से शब्द निकलने लगते हैं। चिन्तामग्न स्वजनों से घिरा हुआ तथा सोया हुआ वह व्यक्ति कालपाश के वशीभूत होने के कारण बुलाने पर भी नहीं बोलता। इस प्रकार कुटुम्ब के भरण-पोषण में ही निरन्तर लगा रहने वाला, अजितेन्द्रिय व्यक्ति अन्त में रोते बिलखते बन्धु-बान्धवों के बीच उत्कट वेदना से संज्ञाशून्य होकर मर जाता है। हे गरुड़ ! उस अन्तिम क्षण में प्राणी को व्यापक दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिससे वह लोक-परलोक को एकत्र देखने लगता है। अत: चकित होकर वह कुछ भी नहीं कहना चाहता। यमदूतों के समीप आने पर भी सभी इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं, चेतना जड़ीभूत हो जाती है और प्राण चलायमान हो जाते हैं। आतुरकाल में प्राण वायु के अपने स्थान से चल देने पर एक क्षण भी एक कल्प के समान प्रतीत होता है और सौ बिच्छुओं के डंक मारने जैसी पीड़ा होती है, वैसी पीड़ा का उस समय उसे अनुभव होने लगता है। वह मरणासन व्यक्ति फेन उगलने लगता है और उसका मुख लार से भर जाता है। पापीजनों के प्राणवायु अधोद्वार (गुदामार्ग) से निकलते हैं। उस समय दोनों हाथों में पाश और दण्ड धारण किये, नग्न, दाँतों को कटकटाते हुए क्रोधपूर्ण नेत्र वाले यम के दो भयंकर दूत समीप में आते हैं। उनके केश ऊपर की ओर उठे होते हैं, वे कौए के समान काले होते हैं और टेढ़े मुख वाले होते हैं तथा उनके नख आयुध की भाँति होते हैं। उन्हें देखकर भयभीत हृदयवाला वह मरणासन्न प्राणी मल-मूत्र का विसर्जन करने लगता है। अपने पाँच भौतिक शरीर से हाय-हाय करते हुए निकलता हुआ तथा यमदूतों के द्वारा पकड़ा हुआ वह अंगुष्ठमात्र प्रमाण का पुरुष अपने घर को देखता हुआ यमदूतों के द्वारा यातना देह से ढक कर के गले में बलपूर्वक पाशों से बाँधकर सुदूर यममार्ग यातना के लिए उसी प्रकार ले जाया जाता है, जिस प्रकार राजपुरुष दण्डनीय अपराधी को ले जाते हैं। इस प्रकार ले जाये जाते हुए उस जीव को यम के दूत गर्जना कर के डराते हैं और नरकों के तीव्र भय का पुन: – पुन: वर्णन करते हैं – (सुनाते हैं)। यमदूत कहते हैं – रे दुष्ट ! शीघ्र चल, तुम यमलोक जाओगे। आज तुम्हें हम सब कुम्भीपाक आदि नरकों में शीघ्र ही ले जाएँगे। इस प्रकार यमदूतों की वाणी तथा बन्धु-बान्धवों का रुदन सुनता हुआ वह जीव जोर से हाहाकार करके विलाप करता है और यमदूतों के द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। यमदूतों की तर्जनाओं से उसका हृदय विदीर्ण हो जाता है, वह काँपने लगता है, रास्ते में कुत्ते काटते हैं और अपने पापों का स्मरण करता हुआ वह पीड़ित जीव यममार्ग में चलता है। भूख और प्यास से पीड़ित होकर सूर्य, दावाग्नि एवं वायु के झोंको से संतृप्त होते हुए और यमदूतों के द्वारा पीठ पर कोड़े से पीटे जाते हुए उस जीव को तपी हुई बालुका से पूर्ण तथा विश्राम रहित और जल रहित मार्ग पर असमर्थ होते हुए भी बड़ी कठिनाई से चलना पड़ता है। थककर जगह-जगह गिरता और मूर्च्छित होता हुआ वह पुन: उठकर पापीजनों की भाँति अन्धकारपूर्ण यमलोक में ले जाया जाता है। दो अथवा तीन मुहूर्त्त में वह मनुष्य वहाँ पहुँचाया जाता है और यमदूत उसे घोर नरक यातनाओं को दिखाते हैं। मुहूर्त मात्र में यम को और नारकीय यातनाओं के भय को देखकर वह व्यक्ति यम की आज्ञा से आकाश मार्ग से यमदूतों के साथ पुन: इस लोक (मनुष्यलोक) में चला आता है। मनुष्य लोक में आकर अबादि वासना से बद्ध वह जीव देह में प्रविष्ट होने की इच्छा रखता है, किंतु यमदूतों द्वारा पकड़कर पाश में बाँध दिये जाने से भूख और प्यास से अत्यन्त पीड़ित होकर रोता है। हे तार्क्ष्य ! वह पातकी प्राणि पुत्रों से दिए हुए पिण्ड तथा आतुर काल में दिए हुए दान को प्राप्त करता है तो भी उस नास्तिक को तृप्ति नहीं होती। पुत्रादि के द्वारा पापियों के उद्देश्य से किए गये श्राद्ध, दान तथा जलांजलि उनके पास ठहरती नहीं। अत: पिण्डदान का भोग करने पर भी वे क्षुधा से व्याकुल होकर यममार्ग में जाते हैं। जिनका पिण्डदान नहीं होता, वे प्रेतरूप में होकर कल्पपर्यन्त निर्जन वन में दु:खी होकर भ्रमण करते रहते हैं। सैकड़ो करोड़ कल्प बीत जाने पर भी बिना भोग किए कर्म फल का नाश नहीं होता और जब तक वह पापी जीव यातनाओं का भोग नहीं कर लेता, तब तक उसे मनुष्य शरीर भी प्राप्त नहीं होता। हे पक्षी! इसलिए पुत्र को चाहिए कि वह दस दिनों तक प्रतिदिन पिण्डदान करे। हे पक्षिश्रेष्ठ! वे पिण्ड प्रतिदिन चार भागों में विभक्त होते हैं। उनमें दो भाग तो प्रेत के देह के पंचभूतों की पुष्टि के लिए होते हैं, तीसरा भाग यमदूतों को प्राप्त होता है और चौथे भाग से उस जीव को आहार प्राप्त होता है। नौ रात-दिनों में पिण्ड को प्राप्त करके प्रेत का शरीर बन जाता है और दसवें दिन उसमें बल की प्राप्ति होती है। हे खग! मृत व्यक्ति के देह के जल जाने पर पिण्ड के द्वारा पुन: एक हाथ लंबा शरीर प्राप्त होता है, जिसके द्वारा वह प्राणी यमलोक के रास्ते में शुभ और अशुभ कर्मों के फल को भोगता है। पहले दिन जो पिण्ड दिया जाता है, उससे उसका सिर बनता है, दूसरे दिन के पिण्ड से ग्रीवा – गरदन और स्कन्ध(कन्धे) तथा तीसरे पिण्ङ से हृदय बनता है। चौथे पिण्ड से पृष्ठभाग (पीठ), पाँचवें से नाभि, छठे तथा सातवें पिण्ङ से क्रमश: कटि (कमर) और गुह्यांग उत्पन्न होते हैं। आठवें पिण्ङ से ऊरु (जाँघें) और नवें पिण्ड से जानु (घुटने) तथा पेर बनते हैं। इस प्रकार नौ पिण्डों से देह को प्राप्त कर के दसवें पिण्ङ से उसकी क्षुधा और तृषा – (भूख-प्यास) ये दोनों जाग्रत होती हैं। इस पिण्डज शरीर को प्राप्त कर के भूख और प्यास से पीड़ित जीव ग्यारहवें तथा बारहवें – दो दिन भोजन करता है। तेरहवें दिन यमदूतों के द्वारा बन्दर की तरह बँधा हुआ वह प्राणी अकेला उस यममार्ग में जाता है। हे खग! मार्ग में मिलने वाली वैतरणी को छोड़कर यमलोक के मार्ग की दूरी का प्रमाण छियासी हजार योजन है। वह प्रेत प्रतिदिन रात-दिन में दो सौ सैंतालीस योजन चलता है। मार्ग में आये हुए इन सोलह पुरों (नगर) को पार कर के पातकी व्यक्ति धर्मराज के भवन में जाता है। 1👉 सौम्यपुर, 2👉 सौरिपुर, 3👉 नगेन्द्र भवन, 4👉 गन्धर्वपुर, 5👉 शैलागम, 6👉 क्रौंचपुर, 7👉 क्रूरपुर, 8👉 विचित्रभवन, 9👉 बह्वापदपुर, 10👉 दु:खदपुर, 11👉 नानाक्रन्दपुर, 12👉 सुतप्तभवन, 13👉 रौद्रपुर, 14👉 पयोवर्षणपुर, 15👉 शीताढ्यपुर तथा 16👉 बहुभीतिपुर को पार करके इनके आगे यमपुरी में धर्मराज का भवन स्थित है। यमराज के दूतों के पाशों से बँधा हुआ पापी जीव रास्ते भर हाहाकार करता – रोता हुआ अपने घर को छोड़ करके यमपुरी को जाता है। ।।इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापियों के इस लोक तथा परलोक के दु:ख का निरुपण” नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ।। क्रमश... अगले लेख में श्री गरुड़ पुराण का द्वितीय अध्याय साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गरूड़ पुराण✍ - सम्पूर्णीपख्डपुराण (हिन्दीघे) {पहळा अथ्योय} सम्पूर्णीपख्डपुराण (हिन्दीघे) {पहळा अथ्योय} - ShareChat
#महाभारत कृष्णभक्तों में से एक है-- दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय : महाभारत के अलावा और कंही कृष्णभक्त संजय जी के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। स्वभाव से बेहद विनम्र और धर्म- परायण होने के नाते वे पुत्रमोहान्ध महाराज धृतराष्ट्र और उनके दुष्ट पुत्रों को सही रास्ता दिखाने के लिए कभी- कभी खरी- खोटी बात सुनाते थे। उनके बात पर महाराज धृतराष्ट्र भी क्षुब्ध हो जाते थे। फिर भी यह निष्पक्ष- निर्भीक- धर्मप्राण- आदर्श चरित्र को काव्य- साहित्यकार और पुराण- वाचकों के द्वारा ज्यादा गुरुत्व नहीं दिया गया है।। महाभारत युद्ध के समय उस युद्ध का सजीव- वर्णन सुनाने के लिए महर्षि वेदव्यास ने ही संजय को 'दिव्यदृष्टि' प्रदान की थी। असल में संजय तो पेशे से 'बुनकर' किन्तु अपनी विद्वत्ता से धृतराष्ट्र के मंत्री बने थे। किन्तु आश्चर्य की बात है-- कुरु- पांडवों की युद्ध के बाद उनके बारे में और कंही चर्चा होना आमतौर पर खत्म हो गई थी।। विशेष तथ्य ये है कि-- संजय थे महर्षि वेदव्यास के गुरुकुल की शिष्य- मंडली में से एक होनहार छात्र। शिक्षा- समाप्ति के बाद संजय ने मंत्री विदुर जी के नीचे सहयोगी 'मंत्री' बनने से पहले, अपनी विद्वत्ता और सूझबूझ गुणों से ही वे धृतराष्ट्र की राजसभा में एक सम्मानित सभासद की हैसियत से दाखिला पाया था। मूलतः संजय थे 'बुनकर' कुल से और उनके विद्वान पिताश्री थे 'गावाल्गण' नामक एक सम्माननीय 'सूत'।। बुद्धिमान मंत्री संजय को धृतराष्ट्र ने महाभारत युद्ध से ठीक पहले ही पांडवों के पास बातचीत करने के लिए भेजा था। वहां से आकर संजय जी ने धृतराष्ट्र को युधिष्ठिर का संदेश भी सुनाया था। कोरवों के राजसत्ता में एक मंत्री होने से भी संजय जी धर्मप्राण पाण्डवों के प्रति सहानुभुति रखते थे। इसलिए, निष्फल होने से भी धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों को अधर्म से रोकने के लिये वे कड़ी से कड़ी वचन कहने में कभी हिचकते नहीं थे। संजय जी अत्यंत कर्त्तव्य परायण मंत्री थे। इसलिए मंत्री- धर्म पालन कर हमेशा समय- समय पर धृतराष्ट्र को सही सलाह देते रहते थे।। समय क्रम में शकुनि की चाल से जब दूसरी बार पांडवों ने जुआ में हारकर 13 सालों के लिए वनवास लेकर गए, तब संजय जी ने धृतराष्ट्र को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि-- ''ये क्या किया राजन ! इस कारण से कुरुवंश का समूल विनाश तो पक्का है, लेकिन साथ में निरीह प्रजा भी नाहक मारी जाएगी।" हालांकि धृतराष्ट्र तो उनकी स्पष्टवादिता पर अक्सर क्षुब्ध होना उनके अभ्यास बन गया था, इस बार भी असंतोष व्यक्त करके बैठ गए थे।। तेरह सालों के बाद पांडवों ने प्रकट हो गए थे। इस समय भगवान कृष्ण भी दोनों पक्ष के विबाद का मीमांशा करने के लिए वंहा पधारे थे। किंतु शकुनि के प्रपंच से अहंकारी दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध के बिना सूच्यग्र भूमि भी देने से इनकार कर दिया, तो महायुद्ध की नौबत आ गयी थी। जब ये पक्का हो गया कि युद्ध को टाला नहीं जा सकता और दोनों पक्ष कुरुक्षेत्र में आमने- सामने होने की समय आ गया, तब महर्षि वेदव्यास ने पधार कर संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, ताकि वो युद्ध- क्षेत्र की सारी घटनाओं को महल में बैठकर ही देख लें और उसका हाल धृतराष्ट्र को सुनाएं। इसके बाद सायद विश्व के प्रथम धारावाहिक विबरणी देने वाला संजय जी ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र को महाभारत- युद्ध का हर अंश की दृश्यों की जीवंत- विवरण को लगातर सुनाया था।। संजय जी ने युद्ध के धारा- विबरणी देते समय कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप, जो केवल अर्जुन को ही दिखाई दे रहा था, वे भी उसे दिव्यदृष्टि से देखा था। किन्तु युद्ध के बाद उनकी दिव्यदृष्टि नष्ट हो गयी थी।। महाभारत युद्ध के बाद कई सालों तक संजय जी ने युधिष्ठर के राज्य में रहे थे। इसके बाद वो धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती के साथ संन्यास लेकर चले गए थे। परन्तु कुछ पौराणिक ग्रंथो के अनुसार वो धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद हिमालय चले गए थे। बस, संजय जी के बारे में इतनी ही विबरणी उपलब्ध है।। RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI
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