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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र में गौ (गाय) की महिमा (पुनः प्रेषित) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ 1👉 ज्योतिषमें गोधूलिका समय विवाहके लिये सर्वोत्तम माना गया है। 2👉 यदि यात्रा के प्रारम्भ में गाय सामने पड़ जाय अथवा अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने पड़ जाय तो यात्रा सफल होती है। 3👉 जिस घर में गाय होती है, उसमें वास्तुदोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है। 4 👉 जन्मपत्री में यदि शुक्र अपनी नीचराशि कन्या पर हो, शुक्र की दशा चल रही हो या शुक्र अशुभ भाव (6,8,12)-में स्थित हो तो प्रात:काल के भोजन में से एक रोटी सफेद रंग की गाय को खिलाने से शुक्र का नीचत्व एवं शुक्र सम्बन्धी कुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है। 5👉 पितृदोष से मुक्ति👉 सूर्य, चन्द्र, मंगल या शुक्र की युति राहु से हो तो पितृदोष होता है। यह भी मान्यता है कि सूर्य का सम्बन्ध पिता से एवं मंगल का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण सूर्य यदि शनि, राहु या केतु के साथ स्थित हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तथा मंगल की युति राहु या केतु से हो तो पितृदोष होता है। इस दोष से जीवन संघर्षमय बन जाता है। यदि पितृदोष हो तो गाय को प्रतिदिन या अमावास्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाने से पितृदोष समाप्त हो जाता है। 6👉 किसी की जन्मपत्री में सूर्य नीचराशि तुला पर हो या अशुभ स्थिति में हो अथवा केतु के द्वारा परेशानियाँ आ रही हों तो गाय में सूर्य-केतु नाडी में होने के फलस्वरूप गाय की पूजा करनी चाहिये, दोष समाप्त होंगे। 7👉 यदि रास्ते में जाते समय गोमाता आती हुई दिखायी दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने देना चाहिये, यात्रा सफल होगी। 8👉 यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो माताका नाम ले, बुरे स्वप्न दिखने बन्द हो जायेंगे। 9👉 गाय के घी का एक नाम आयु भी है-'आयई घृतम्'। अत: गाय के दूध-घी से व्यक्ति दीर्घायु होता है। हस्तरेखा में आयु रेखा टूटी हुई हो तो गायका घी काम में लें तथा गाय की पूजा करें। 11👉 देशी गाय की पीठ पर जो ककुद् (कूबड़) होता है, वह 'बृहस्पति' है। अत: जन्मपत्रिका में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हों या अशुभ स्थिति हों तो देशी गाय के इस बृहस्पति भाग एवं शिवलिंग रूपी ककुद् के दर्शन करने चाहिये। गुड़ तथा चने की दाल रखकर गाय को रोटी भी दें। 👉 गोमाता के नेत्रों में प्रकाश स्वरूप भगवान् सुर्य तथा ज्योत्स्ना के अधिष्ठाता चन्द्रदेव का निवास होता है। जन्म पत्री में सूर्य-चन्द्र कमजोर हो तो गोनेत्र के दर्शन करें, लाभ होगा। वास्तुदोषों का निवारण भी करती है गाय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जिस स्थान पर भवन, घर का निर्माण करना हो, यदि वहाँ पर बछड़े वाली गाय को लाकर बाँधा जाय तो वहाँ सम्भावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता है, कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएँ नहीं आतीं। गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गोसेवा को एक कर्तव्य के रूप में माना गया है। गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिये निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत प्रसिद्ध हैं। 'समरांगणसूत्रधार'-जैसा प्रसिद्ध बृहद्वास्तुग्रन्थ गोरूप में पृथ्वी-ब्रह्मादि के समागम-संवाद से ही आरम्भ होता है। वास्तुग्रन्थ 'मयमतम्' में कहा गया है कि भवन निर्माणका शुभारम्भ करनेसे पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बाँधना चाहिये, जो सवत्सा (बछड़ेवाली) हो। नवजात बछडे को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमिपर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वो समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि ग्रन्थों में का महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयता पूर्वक सांस लेती है तो उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है। निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम। विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति ।। यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा होती है, वहाँ पुत्र-पौत्र, धन, विद्या आदि सुख जो भी चाहिये, मिल जाता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आयी है। महर्षि अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे होगा? गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। इससे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णुपुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गये तो नन्द-दम्पती ने गाय की पूँछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भयका निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन लेकर यात्रा में जाने से कार्य सिद्ध होता है। पद्मपुराण और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लाँघकर नहीं जाना चाहिये। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिये जाते समय गाय के रँभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान-लाभ के लिये गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है। शिवपुराण एवं स्कन्दपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पाँवकी धूलिका भी अपना महत्त्व है। यह पापविनाशक है, ऐसा गरुडपुराण और पद्मपुराण का मत है। ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि गोधूलि वेला विवाहादि मंगलकार्यों के लिये सर्वोत्तम मुहूर्त है। जब गायें जंगल से चरकर वापस घर को आती हैं, उस समयको गोधूलि वेला कहा जाता है। गायके खुरों से उठने वाली धूलराशि। समस्त पाप-तापों को दूर करनेवाली है। पंचगव्य एवं पंचामृत की महिमा तो सर्वविदित है ही। गोदान की महिमा से कौन अपरिचित है ! ग्रहों के अरिष्ट-निवारण के लिये गोग्रास देने तथा गौ के दान की विधि ज्योतिष-ग्रन्थों में विस्तार से निरूपित है। इस प्रकार गाय सर्वविध कल्याणकारी ही है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#🕉️सनातन धर्म🚩 अखाड़ों के संत नाम के आगे गिरि,पुरी आदि उपनाम क्यों रखते हैं ? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिन्दू संतों के 13 अखाड़े हैं इनमे से शिव (संन्यासी) संप्रदाय के 7 अखाड़े, बैरागी (वैष्णव) संप्रदाय के 3 अखाड़े और उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं। इन्हीं में नाथ, दशनामी आदि होते हैं। आओ जानते हैं कि संत अपने नाम के आगे गिरि, पुरी, भारती, दास, नाथ आदि उपनाम क्यों लगाते हैं। 1. इस उपनाम से ही यह पता चलता हैं कि वे किस अखाड़े, मठ, मड़ी और किस संत समाज से संबंध रखते हैं। 2. शिव संन्यासी संप्रदाय के अंतर्गत ही दशनामी संप्रदाय जुड़ा हुआ है। ये दशनामी संप्रदाय के नाम :- गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती,वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम। सन्यासी समाज के लोग इसी दशनामी संप्रदाय से संबंधित हैं। इन 7 अखाड़ों में से जूना अखाड़ा इनका खास अखाड़ा है। 3. दशनामी संप्रदाय में शंकराचार्य, महंत, आचार्य और महामंडलेश्वर आदि पद होते हैं। किसी भी अखाड़े में आचार्यमहामंडलेश्वर का पद सबसे ऊंचा होता है। 4. शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे जो 10 क्षेत्रों में बंटें थे जिनके एक-एक मठाधीश थे। 5. कौन किस कुल से संबंधित है जानिए... 1.गिरी, 2.पर्वत और 3.सागर। इनके ऋषि हैं भ्रुगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती। इनके ऋषि हैं शांडिल्य। 7.वन और 8.अरण्य के ऋषि हैं कश्यप। 6. नागा क्या है 👉 चार जगहों पर होने वाले कुंभ में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं। इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को राजराजेश्वरी नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा तथा नासिक में उपाधि पाने वाले को खिचडिया नागा कहा जाता है। इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है। शैव पंथ के 7 अखाड़े में ही नागा साधु बनते हैं। नागाओं के अखाड़ा पद 👉 नागा में दीक्षा लेने के बाद साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं। कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत, श्रीमहंत और सचिव उनके पद होते हैं। सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद श्रीमहंत का होता है। 8. बैरागी वैष्णव संप्रदाय के अखाड़े में आचार्य, स्वामी, नारायण, दास आदि उपनाम रखते हैं। जैसे रामदास, रामानंद आचार्य, स्वामी नारायण आदि। 9. नाथ संप्रदाय के सभी साधुओं के नाम के आगे नाथ लगता है। जैसे गोरखनाथ, मछिंदरनाथ आदि। 10. उदासीन संप्रदाय के संत निरंकारी होते हैं। इनके अखाड़ों की स्थापना गुरु नानकदेव जी के पुत्र श्रीचंद ने की थी। इनके संतों में दास, निरंकारी और सिंह अधिक होते हैं। नोट : संत नाम विशेषण और प्रत्यय : - परमहंस, महर्षि, ऋषि, स्वामी, आचार्य, महंत, नागा, संन्यासी, नाथ और आनंद आदि। साधुओं के प्रमुख अखाड़े 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 13 अखाड़े - 7 शैव, 3 वैष्णव और 3 उदासीन अखाड़े ये 13 अखाड़े हैं- नागा साधुओं के प्रमुख अखाड़े भारतीय धार्मिकता के महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं और इनका प्राचीन इतिहास है। भारत में कुल 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिन्हें तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है। 👉 पहली श्रेणी में शैव अखाड़े आते हैं, जिनकी संख्या कुल 7 है और जिनका संबंध शिव भक्त धारा से है। ये शैव अखाड़े हिन्दू धर्म के शिव संप्रदाय का अनुसरण करते हैं और इनका मुख्य उद्देश्य शिव की आराधना और उनके सिद्धांतों का पालन करना होता है। 👉 दूसरी श्रेणी वैष्णव अखाड़ों की है, जिनमें 3 प्रमुख अखाड़े शामिल हैं। वैष्णव अखाड़े विष्णु भगवान की पूजा करते हैं और उनके अनुयायी वैष्णव परंपराओं का पालन करते हैं, जो भक्ति योग और ध्यान पर विशेष जोर देते हैं। 👉 तीसरी श्रेणी उदासीन अखाड़ों की है, जिनमें भी 3 प्रमुख अखाड़े आते हैं। उदासीन अखाड़े सिख गुरुओं की परंपरा और उनके सिद्धांतों का पालन करते हैं और ये साधुगण ठहराव और निर्वाण की खोज पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इन सभी अखाड़ों के साधु महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह में भाग लेते हैं, विशेषकर कुंभ मेले में, जहाँ ये अपने अनुष्ठान और प्रथाओं को पूरे जोश के साथ संपन्न करते हैं। 1.निरंजनी अखाड़ा 2.जूना अखाड़ा 3.महानिर्वाण अखाड़ा 4.अटल अखाड़ा 5.आह्वान अखाड़ा 6.आनंद अखाड़ा 7.पंचाग्नि अखाड़ा 8.नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा 9.वैष्णव अखाड़ा 10.उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा 11.उदासीन नया अखाड़ा 12.निर्मल पंचायती अखाड़ा 13.निर्मोही अखाडा । साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#वृंदावन 🌺 वृन्दावन में कुम्भ क्यों नहीं? एक अद्भुत प्रसंग 🌺 एक बार प्रयागराज में कुम्भ का महायोग था। चारों ओर उत्साह था। श्रीनन्द बाबा और गोष्ठ के अन्य बड़े-बुजुर्गों ने विचार किया कि हम भी प्रयागराज चलकर स्नान-दान और पुण्य कमा कर आते हैं। किंतु, हमारे कन्हैया को यह कैसे स्वीकार होता? प्रातः काल नन्द बाबा अपनी बैठक में वृद्ध गोपों के साथ चर्चा कर रहे थे, तभी सामने से एक भयानक काला घोड़ा सरपट भागता हुआ आया। सभी डर गए कि कहीं यह कंस का भेजा कोई असुर तो नहीं? लेकिन वह घोड़ा आया और 'ज्ञान-गुदड़ी' स्थल की कोमल ब्रज-रज (धूल) में लोट-पोट होने लगा। देखते ही देखते चमत्कार हुआ! ✨ उसका रंग काले से बदलकर गोरा और अति मनोहर हो गया! ✨ नन्द बाबा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, "कौन है भाई तू? और यह कायाकल्प कैसे हुआ?" घोड़ा एक दिव्य महापुरुष के रूप में प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर बोला: "हे व्रजराज! मैं साक्षात् प्रयागराज हूँ। संसार के सभी अच्छे-बुरे लोग मुझमें अपने पाप त्याग जाते हैं, जिससे मैं काला पड़ जाता हूँ। अपनी शुद्धि के लिए मैं हर कुम्भ से पहले श्रीधाम वृन्दावन की इस पावन रज में लोटने आता हूँ। यहाँ की धूलि से मेरे समस्त पाप धुल जाते हैं और मैं निर्मल होकर लौटता हूँ।" यह सुनकर कान्हा मुस्कुराए और बोले, "बाबा! अब कब चलना है प्रयाग?" नन्द बाबा और समस्त ब्रजवासियों ने एक स्वर में कहा- "जब स्वयं तीर्थराज प्रयाग हमारी ब्रज की रज में पवित्र होने आते हैं, तो हमें कहीं और जाने की क्या आवश्यकता?" और उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी। ऐसी है श्री वृन्दावन धाम और ब्रज रज की महिमा! 🙏 🌿 दोहा 🌿 धनि धनि श्रीवृन्दावन धाम, जाकी महिमा बेद बखानत। सब बिधि पूरण काम, आश करत हैं जाकी रज की, ब्रह्मादिक सुर ग्राम॥ ।। जय जय श्री राधे ।।
वृंदावन - वृन्दावन में कुंभ क्यों ??? नंदा बाबा में कुंभ क्यों वो बच्ह भी थन,  ज्ञान गुदड़ी हांगी क्यों है समझे तुक क्यों ??? वृन्दावन वो उगन परफ्े लारूल प्रम्यागराज | भाही जानें में बड़बना II में कुंभ ' चा कृपन बाबा ভয তয ৪ী যাধ वृन्दावन में कुंभ क्यों ??? नंदा बाबा में कुंभ क्यों वो बच्ह भी थन,  ज्ञान गुदड़ी हांगी क्यों है समझे तुक क्यों ??? वृन्दावन वो उगन परफ्े लारूल प्रम्यागराज | भाही जानें में बड़बना II में कुंभ ' चा कृपन बाबा ভয তয ৪ী যাধ - ShareChat
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 317) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ।। १४ ।। 'कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ।। १४ ।। आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ।। १५ ।। 'कुछ लोग आर्ष विधि (यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं। इस प्रकार विवाहित होनेवाले (दैव विवाहकी रीतिसे) पत्नी प्राप्त करते हैं। इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका आठवाँ प्रकार माना है। इन सबको तुमलोग समझो ।। १५ ।। स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च। प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ।। १६ ।। 'क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।। १६ ।। ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः । ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ।। १७ ।। 'अतः भूमिपालो ! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ। तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ।। १७ ।। स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः । एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ।। १८ ।। सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् । आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ।। १९ ।। 'राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ।' परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ।। १८-१९ ।। ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः । संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ।। २० ।। फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते (ताल ठोकते) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ।। २० ।। तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् । आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ।। २१ ।। सब लोग जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे। उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २१ ।। ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय । भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ।। २२ ।। सवर्मभिर्भूणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः । सक्रोधामर्षजिह्म भूकषायीकृतलोचनाः ।। २३ ।। सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्वरुपकल्पितान् । रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ।। २४ ।। प्रयान्तमथ कौरव्यमनुससुरुदायुधाः । ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत । एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २५ ।। जनमेजय ! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय ! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत । उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ।। २२-२५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
महाभारत - श्रीमहाभारतम् श्रीमहाभारतम् - ShareChat
#खेलें मसाने में होली दिगंबर काशी विश्वनाथ #🙏🌷👌👌घाट पर चिताभस्म की होली 🙏🌷🙏खेले मसाने मे होली दिगम्बर 👌👌🙏 🛐प्रस्तुत है ब्रज की होरी साथ में इस होरी गीत का आध्यात्मिक विवेचना।*🛐 *खेलैं मसाने में होरी दिगंबर* खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी। चिता, भस्म भर झोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी। गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना, कौनऊ बाधा। ना साजन ना गोरी, दिगंबर, खेले मसाने में होरी। नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी। भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज की गोरी धन-धन नाथ अघोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी। खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी ... 🙏शमशान में होली खेलने का अर्थ समझते हैं? मनुष्य सबसे अधिक मृत्यु से भयभीत होता है। उसके हर भय का अंतिम कारण अपनी या अपनों की मृत्यु ही होती है। शमशान में होली खेलने का अर्थ है उस भय से मुक्ति पा लेना। शिव किसी शरीर मात्र का नाम नहीं है, शिव वैराग्य की उस चरम अवस्था का नाम है, जब व्यक्ति मृत्यु की पीड़ा,भय या अवसाद से मुक्त हो जाता है। शिव होने का अर्थ है वैराग्य की उस ऊँचाई पर पहुँच जाना जब किसी की मृत्यु कष्ट न दे, बल्कि उसे भी जीवन का एक आवश्यक हिस्सा मान कर उसे पर्व की तरह खुशी खुशी मनाया जाय। शिव जब शरीर में भभूत लपेट कर नाच उठते हैं, तो समस्त भौतिक गुणों-अवगुणों से मुक्त दिखते हैं। यही शिवत्व है।🙏 ❣️मान्यता है कि काशी की मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के शव की दाहक्रिया की थी। तब से वह महा शमशान है, जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। एक चिता के बुझने से पूर्व ही दूसरी चिता में आग लगा दी जाती है। वह मृत्यु की लौ है जो कभी नहीं बुझती, जीवन की हर ज्योति अंततः उसी लौ में परम ज्योति में समाहित हो जाती है। शिव जब अपने कंधे पर देवी सती का शव ले कर नाच रहे थे, तब वे मोह के चरम पर थे। वे शिव थे, फिर भी शव के मोह में बंध गए थे। मोह बड़ा प्रबल होता है, किसी को नहीं छोड़ता।सामान्य जन भी विपरीत परिस्थितियों में, या अपनों की मृत्यु के समय यूँ ही शव के मोह में तड़पते हैं। शिव शिव थे, वे रुके तो उसी प्रिय पत्नी की चिता भष्म से होली खेल कर युगों युगों के लिए वैरागी हो गए। मोह के चरम पर ही वैराग्य उभरता है न। पर मनुष्य इस मोह से नहीं निकल पाता, वह एक मोह से छूटता है तो दूसरे के फंदे में फंस जाता है। शायद यही मोह मनुष्य को शिवत्व प्राप्त नहीं होने देता।❣️ 🕉️कहते हैं काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है। शिव की अपनी नगरी है काशी, कैलाश के बाद उन्हें सबसे अधिक काशी ही प्रिय है। शायद इसी कारण काशी एक अलग प्रकार की वैरागी ठसक के साथ जीती है। मणिकर्णिकाघाट, हरिश्चंदघाट, युगों युगों से गङ्गा के इस पावन तट पर मुक्ति की आशा ले कर देश विदेश से आने वाले लोग वस्तुतः शिव की अखण्ड ज्योति में समाहित होने ही आते हैं। होली आ रही है। फागुन में काशी का कण कण फ़ाग गाता है-“खेले मशाने में होली दिगम्बर खेले मशाने में होली” सच यही है कि शिव के साथ साथ हर जीव संसार के इस महाश्मशान में होली ही खेल रहा है। तबतक, तबतक उस मणिकर्णिका की ज्योति में समाहित नहीं हो जाता। संसार शमशान ही तो हैं।🕉️
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#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ शास्त्र कहते हैं मनुष्य को अपने जीवन में चार पुरुषार्थों के संतुलन से चलना चाहिए ... 1. धर्म — कर्तव्य, नैतिकता, सत्य और मर्यादा के साथ यह विवेक कि क्या करना उचित है। 2. अर्थ — जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक धन; कितना पर्याप्त है, इसका बोध अधिकतम संग्रह का आग्रह नहीं। 3. काम इच्छाएँ, सुख, सौंदर्य और प्रेम परंतु धर्म की सीमाओं के भीतर। 4. मोक्ष बंधन से मुक्ति, आत्मबोध और यही अंतिम लक्ष्य। शास्त्रों में अर्थ (धन) को कभी भी धर्म और मोक्ष से ऊपर नहीं रखा गया। लक्ष्मी जी और उल्लू से जुड़ी पौराणिक कथाएँ भी इसी संतुलन का आध्यात्मिक संकेत देती हैं । धन, चेतना और विवेक का संतुलन। उल्लू, जो अँधेरे में भी देख सकता है, यह सिखाता है कि अज्ञान, लोभ और भ्रम के अँधेरे में भी जो सत्य देख सके वही लक्ष्मी का पात्र है। धन तभी कल्याणकारी होता है जब उसके साथ दृष्टि (बुद्धि) हो। उल्लू यह भी चेतावनी देता है कि यदि धन विवेक के बिना आए,तो वही धन अहंकार, पतन और दुःख का कारण बन जाता है।इसीलिए लक्ष्मी जी का वाहन सिंह या हाथी नहीं, उल्लू है— मानो वह कह रही हों: “मैं वहीं ठहरती हूँ जहाँ बुद्धि मेरी सवारी करती है।” उल्लू रात्रिचर है— यह संकेत है कि जो व्यक्ति केवल दिन के दिखावे में जीता है, वह अंततः लक्ष्मी को खो देता है। कुछ परंपराओं में उल्लू को मूर्खता का प्रतीक भी माना गया है। यह दोहरा अर्थ जानबूझकर रखा गया है— यदि लक्ष्मी का सही उपयोग न हो, तो मनुष्य “धनवान मूर्ख” बन जाता है। आज अपने आसपास हम ऐसी अनेक घटनाएँ देखते हैं जो शास्त्रसम्मत तो बिल्कुल नहीं हैं। फिर भी हर सत्य अंततः प्रकाश में आता है। धर्म को ताक पर रखकर जो धनवान हुए हैं, उन्हें देखकर कई बार हमारा उस अदृश्य सत्ता में विश्वास का सिंहासन डोलने लगता है, पर सच यह है कि अधर्म से आया धन धूप में रखी बर्फ़ है जो दिखता बहुत है, पर टिकता नहीं। अंत में न धन साथ जाता है, न सत्ता, न नाम। साथ रह जाता है केवल वही जो धर्म के साथ जिया जाएगा....
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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती एक बार की बात है, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती अपने दोनों पुत्रों, गणेश और कार्तिकेय, के साथ आनंदपूर्वक रह रहे थे। दोनों पुत्रों में शिव और पार्वती के प्रति बहुत प्रेम था, लेकिन एक दिन दोनों में यह सवाल उठा कि माँ-पिता के प्रति सबसे बड़ा भक्त और प्रिय कौन है। माता पार्वती ने उनकी इस उत्सुकता को देखते हुए एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, "हम दोनों में से जो भी इस पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके सबसे पहले वापस आएगा, उसे हम सबसे प्रिय मानेंगे।" यह सुनकर कार्तिकेय अपने तेज़ मयूर पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। उन्हें विश्वास था कि अपनी गति के कारण वे यह प्रतियोगिता जीत जाएंगे। दूसरी ओर, गणेश जी ने इस पर सोचा और फिर शांतिपूर्वक माता-पिता के पास आए। उन्होंने शिव और पार्वती की तीन बार परिक्रमा की और कहा, "आप दोनों ही मेरे लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। आप ही मेरी पृथ्वी, आकाश, और समस्त लोक हैं।" जब भगवान शिव और माता पार्वती ने यह देखा, तो वे गणेश जी के इस ज्ञान और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश को अपनी गोद में बिठाया और आशीर्वाद दिया कि वह ज्ञान और बुद्धि के देवता के रूप में पूजे जाएंगे। उनकी बुद्धि और प्रेम के कारण ही उन्हें सबसे पहले पूजा जाने का वरदान मिला। कुछ समय बाद कार्तिकेय भी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे, लेकिन उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले ही विजेता बन चुके हैं। पहले तो वे निराश हुए, लेकिन फिर उन्हें समझ में आ गया कि सच्ची भक्ति ज्ञान और प्रेम में होती है। तब से, गणेश जी को सभी पूजा-पाठ में सबसे पहले पूजा जाता है, और कार्तिकेय को युद्ध और शक्ति का देवता मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि बुद्धि और सच्चे प्रेम से हम किसी भी प्रतियोगिता को जीत सकते हैं और ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति का प्रमाण दे सकते हैं
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कैसे आते हैं श्रीराम! #जय श्री राम अपने युग की सबसे सुन्दर स्त्री थीं वे! जितनी सुन्दर, उतनी ही विदुषी! आस पड़ोस की स्त्रियां कहतीं, "इसे ब्रह्मा ने अपने हाथों से बनाया है। ये ब्रह्मा की पुत्री हैं।" वे सब ठीक ही कहती थीं। उन्होंने जिस ऋषि का वरण किया वे अपने युग के श्रेष्ठ विद्वानों में एक थे। दोनों में बहुत प्रेम था। न्योछावर थे एक दूसरे पर... जीवन के हर पथ पर संग चलने का वचन निभाते लोग, तपस्या के लिए बैठते तब भी संग ही बैठते थे। प्रेम का चरम छू लेने पर या तो वैराग्य मिलता है, या वियोग! नियति की ओर से उन्हें वियोग मिलना था। ऋषि एक दिन भोर में गङ्गास्नान को गए थे। देवी को एकांत में पा कर एक महापुरुष अनैतिक याचना लिए आये। यहाँ तक कि वेश बदल कर ऋषि का ही रूप ले लिया। काम पुरुष का प्राथमिक दुर्गुण है, वह किसी को नहीं छोड़ता। बड़े बड़े महापुरुषों की मति हर लेने वाला काम तब इंद्र की मति हर चुका था। देवी पहचान गयीं पति के रूप में आये छली को। स्वर्ग के अधिपति को तिरस्कार के साथ वापस तो लौटा दिया, पर उतने महान व्यक्ति को भी अनैतिक प्रयत्न करते देख वैराग्य भाव से मुस्कुरा दिया। दुर्भाग्य! कि बस उसी क्षण पति लौट आये। राह में उन्होंने देखा था अपने ही भेष में आश्रम से निकलते इंद्र को... प्रेम या तो अति विश्वासी बना देता है, या अति भयभीत! महर्षि गौतम के हिस्से में भय आया था। इसमें होता यह है कि प्रेम जितना ही गहरा हो, उतना ही भयभीत कर देता है। हर समय यही भय, कि कहीं मेरा साथी मुझे त्याग तो नहीं देगा? उसे कोई और प्रिय तो नहीं...? ऋषि का भय क्रोध में बदल गया। क्रोध सबसे पहले हर लेता है बुद्धि। क्रोध के वश में उस महाज्ञानी ऋषि ने एक क्षण में ही इंद्र को शाप दिया और अगले ही क्षण पत्नी को त्याग देने का प्रण ले लिया। पर ज्ञानियों का क्रोध क्षणिक होता है। ऋषि को सत्य का भान हुआ तो उपजा अपराधबोध... पत्नी से क्षमा याचना की। पर पत्नी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार के लिए स्वयं को भी दंडित करना था न! तो स्वयं के लिए दण्ड निश्चित किया कि प्रेयसी से दूर रहेंगे। तबतक, कि जबतक राम न आ जाएं... राम का आना ही क्यों? महापुरुषों के आगमन से युग के पाप धुल जाते हैं मित्र! वे तो राम थे। मर्यादापुरुषोत्तम! करुणासिंधु! उधर पति से तिरस्कार पा कर जड़ हो गयी थीं अहिल्या! विश्वास ही नहीं होता था कि इतने अविश्वासी हो जाएंगे पति! एक निर्दोष को ऐसा दण्ड? एकाएक जैसे पत्थर हो गईं। दोनों के तप का स्वरूप बदल गया। ऋषि अपने आश्रम को छोड़ कर सुदूर वन में तप कर के प्रायश्चित कर रहे थे, और पत्नी उसी आश्रम में एकांत वास कर अपने प्रेम का साथ निभा रही थीं। दोनों की साझी प्रार्थना बस इतनी ही थी कि राम आएं... राम आएं कि उनके आने से मुक्त हो जाएं हम... उनका रोम रोम राम के लिए रो रहा था जैसे... जाने कितने बरस बीत गए। जाने कितने युग बीत गए। राम को ढूंढते ढूंढते गौतम और अहिल्या बृद्ध हो गए थे। और एक दिन... उन दो राजकुमारों को लेकर अनायास ही उस परित्यक्त कुटिया की ओर मुड़ गए महर्षि विश्वामित्र! जैसे कह रहे हों, "मुक्त होवो देवी! तुम्हारी तपस्या अंततः खींच लाई उस युगपुरुष को..." राम यूँ ही नहीं आते मित्र! उनके पीछे किसी अहिल्या की लंबी तपस्या होती है। 🙏🙏
जय श्री राम - ShareChat
#श्रीरामचरितमानस राजा दशरथ की आज्ञा से जब श्री राम को चौदह वर्षों का वनवास मिला, तब सीता ने राजमहल का सुख त्याग कर कहा, “जहाँ आप, वहीं मेरा संसार।” काँटों भरे पथ, घने वन और कठिनाइयाँ—सब सीता ने मुस्कान के साथ स्वीकार कीं, क्योंकि उनके लिए राम ही धर्म थे। वन में दोनों ने साधु-संतों की सेवा की, राक्षसों के अत्याचार से रक्षा की और प्रेम के साथ कर्तव्य निभाया। पंचवटी की शांत छाया में उनका प्रेम और भी पवित्र हुआ। पर विधि ने परीक्षा ली—रावण द्वारा सीता का हरण। यह केवल अपहरण नहीं, अधर्म की चुनौती थी। श्री राम ने धैर्य और साहस से वानर सेना संगठित की, समुद्र पर सेतु बाँधा और लंका में अधर्म का अंत किया। युद्ध के बाद सीता की पवित्रता सत्य की अग्नि-सी उज्ज्वल हुई, और धर्म की विजय हुई। अंततः अयोध्या लौटकर राम-सीता का राज्याभिषेक हुआ। रामराज्य में न्याय, करुणा और समता का प्रकाश फैला। यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग माँगता है, धर्म साहस देता है और सत्य अंततः विजयी होता है।
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#👫 हमारी ज़िन्दगी ⁉️प्रश्न: जब भगवान ने ही क्रोध काम मोह लोभ बनाए है तो हम क्यों न करे ?⁉️ ✍️उत्तर: हमने तो चाकू भी बनाया है तो क्या हम उससे अपना गला काट लेते हैं कि हमने बनाया है तो हम क्यों न काटें ??? हम तो मल मूत्र भी बनाते हैं , उसको तो नहीं खाया जा सकता न । सरकार ही बंदूक बनाकर देती है , तोप और Missiles बना कर देती है । तो इसका मतलब थोड़ी है कि अपने ही देश के नागरिकों को भूनना शुरू कर दो , या अपने ही देश पर missile छोड़ दो । एक जगह वही बंदूक चलाकर असंख्य लोगों को मारने पर सरकार परमवीर चक्र से शुशोभित करती है और वहीं उसी बंदूक को चलाकर बस एक हत्या मात्र करने पर वह जेल में बन्दकर पिछवाड़ा लाल कर मृत्यु दंड भी देती है । यह हमारे बुद्धि पर और सरकार द्वारा आदेशित Manual पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे , कब और क्यों करना है !! ✍️ 🤹एक मुख्यमंत्री का Sign से विकास की बहुत बहुत बड़ी योजनाओं को गति मिल जाती है और वहीं दूसरे paper पर उसी मुख्यमंत्री के sign करने से वह केजरीवाल और लालू की तरह जेल में भी जा सकता है । यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने Sign का प्रयोग कहाँ कर रहे हैं । अधिकार सब मिला है , सब जनता जनार्दन का ही है लेकिन उसको कैसे प्रयोग करना है , यह आपके विवेक पर निर्भर करता है ।🤹 💢वही दारू आप किसी Bar में जाकर पीते हैं , तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन वही दारू आप मन्दिर या संसद भवन में पीएंगे तो क्या हश्र होगा , यह मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है । Sex का अधिकार सबको है । वह अगर आप अपनी धर्मपत्नी या धर्मपति से करते हैं तो सब ढोल नगाड़े , बड़ी बड़ी दावत देकर , लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर सबको बुलाकर बताते हैं कि अमुक दिन यह दोनों यह करने जा रहे हैं और बकायदा लोग Gift और आशीर्वाद से आपको लाद देते हैं । सब प्रसन्न रहते हैं , जिसे आप लोग विवाह कहते हैं । लेकिन इसी का प्रयोग अगर आप पर पुरुष और पर नारी से करते हैं या बलात करते हैं तो कोई भी ताली नहीं बजाता बल्कि थू थू हर जगह होकर जेल में ठूस दिया जाता है । तब यह कहने से काम नहीं चलेगा कि यह तो सबका प्राकृतिक अधिकार है ।💢 ‼️तो हमें कब क्या और क्यों प्रयोग करना है , यह हमें भली भांति आना चाहिए । किसी ने नहीं कहा कि यह काम , क्रोध , लोभ , मोह का प्रयोग करना नहीं चाहिए ।‼️ 🛐यह कहा गया है कि सब कार्य धर्मानुकूल करो । उससे अंतःकरण न खराब हो , उसके गुलाम न बन जाओ । उस पर अधिकार कर उसका निर्लिप्त भाव से प्रयोग करो । उसमें आसक्ति नहीं । संसार को चलाने के लिए यह सब आवश्यक है लेकिन ऐसा प्रयोग हो कि उससे हमें किसी भी प्रकार की हानि न हो । वह हमें अपनी ओर से न चलाये बल्कि हम उस पर नियंत्रण कर उसे अपने अनुसार चलायें ।। और इनका प्रयोग भगवद क्षेत्र में करेंगे तो बहुत तेजी से स्वविकास होगा । मान लीजिये यह तोप के समान है । बस हमने तोप की दिशा पाकिस्तान की ओर न कर अपने ही देश पर किया हुआ है । बस इसकी दिशा दुश्मन देश की ओर जो हमें नुकसान पहुँचाते हैं , उनकी तरफ मोड़ना है । ऐसे ही बस इनकी भी दिशा सही जगह मोड़नी है । और संसार में इनका उपयोग बस व्यवहार मात्र । और अब मूल सिद्धांत पर आईये । भगवान ने यह सब नहीं बनाया है । यह सब हमारे अज्ञान ने बनाया है । और हम अपनी अज्ञानता का नाम भगवान पर डालकर बचना चाहते हैं । अज्ञान से ही कामनायें पैदा होती है । कामनाओं से यह काम क्रोध लोभ मोह इत्यादि पैदा होते हैं । काम - कामना अज्ञान से पैदा होती है कि अमुक तत्त्व में सुख है । यह कामनायें पाँच प्रकार की होती हैं ।🛐 💢इन्हीं पाँचों इन्द्रियों से सम्बंधित । रस , रूप , शब्द , गन्ध और स्पर्श । इन्हीं Five sensory organs से सम्बंधित ही कामनाएं पैदा होती हैं । इन पांचों के अलावा कोई कामनायें नहीं पैदा हो सकती हैं । इन्हीं कामनाओं की जब पूर्ति नहीं होती तो क्रोध पैदा होता है , क्रोध से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से जीव का पतन हो जाता है । इसे ही पँचक्लेश कहते हैं । 💢 🚩1. अविद्या - इसके 4 प्रकार होते हैं । अनित्य , अशुचि , दुःख में सुख बुद्धि जिसे विपर्यय भी कहते हैं , और अनात्मा । 🚩2. अस्मिता 🚩3. राग 🚩4. द्वेष 🚩5. अभिनिवेश इन सभी क्लेशों की पाँच अवस्थायें हैं । 🍀1. प्रसुप्त - कई जन्मों के संस्कार जो सोए हैं । 🍀2. तनु - जो सत्संग और तत्त्वज्ञान से कमजोर पड़ गए हैं । 🍀3. विछिन्न - द्वेष की स्थिति में प्रेम उभरना 🍀4. उदार - प्रकट होना अपने समय पर , जैसे युवास्था के प्रेम 🍀5. दग्धबीजभाव - जो चित्तवृत्ति निरोध से जल गए हैं । 🌷तो यह सभी क्लेश इन पाँच अवस्थाओं में जीव में रहते हैं और अज्ञानता के वशीभूत होकर जीव इनसे ही कार्य करता है । चित्त की पाँच वृत्तियों ( प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा और स्मृति ) से वशीभूत रहने के कारण जीव इस अज्ञान से ग्रसित होकर कार्य करता है । तो यह सब मात्र हमारी अज्ञानता ही जन्म देती है लेकिन हम नाम भगवान का लगा देते हैं ताकि हम साफ साफ बच जाएं और भोग भोगने का एक मौका मिल जाये या भगवद मार्ग पर जाने से छुट्टी मिल जाये । तो चलिए कोई बात नहीं यही मान लीजिए कि यह सब भगवान ने दिया है , चलिए आपकी ही बात मान ली । लेकिन अब उसको कैसे उपयोग करना है और कहाँ किस तरह करना है , यह विवेक हम लोगों के पास होना चाहिए । उसमें आसक्ति न हो और न ही वह हमारे अंतःकरण को दूषित करे या हमारा विनाश करे , अगर इस तरह करेंगे तो समझिये फिर तो हमारा कल्याण करने से कोई नहीं रोक सकता ।🌷
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