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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *इस संपूर्ण सृष्टि में यदि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बनकर उभरा है तो मनुष्य को गलतियों का पुतला भी कहा गया है | भूल हो जाना मनुष्य का स्वभाव है | कोई भी ऐसा मनुष्य ना हुआ होगा जिससे कि अपने जीवन में कभी कोई भूल ना हुई है | कभी - कभी मनुष्य की एक भूल उसके जीवन की दिशा और दशा परिवर्तित कर देती है | प्राचीन काल में जब मनुष्य के ऊपर सामाजिक दबाव होता था तब मनुष्य कुछ भी करने या कुछ भी बोलने से पहले सोचता था कहीं ऐसा ना हो जाए कि हमसे कुछ गलत हो जाए और हमको सामाजिक दंड का भागी बनना पड़े | मनुष्य के अंदर व्याप्त यह भय उसे गलतियां करने से रोकता था और यदि मनुष्य से कोई भूल हो भी जाती थी तो वह समाज के सामने अपनी गलती मान कर के उसका प्रायश्चित करने के लिए भी तैयार हो जाता था | जब मनुष्य प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो जाता है तो वह अपने सबसे बड़े वैरी अपने अहं को मारता है , क्योंकि जब तक मनुष्य में अहंभाव रहेगा तब तक वह अपनी भूल कदापि स्वीकार नहीं कर सकता है , और जब तक मनुष्य भूल नहीं स्वीकार करेगा तब तक प्रायश्चित का प्रश्न ही नहीं उठ़ता है | अनेकों ऐसे उदाहरण इतिहास पढ़ने को मिलते हैं जहां मनुष्य ने अपनी भूल को मान करके समाज व सम्पूर्ण सभ्यता को भी नष्ट होने से बचाया है | जहां मनुष्य अपनी भूल को न स्वीकार करके अपनी गलत बात पर अड़ा रहता है वहाँ आपस में वैमनस्यता तो फैलती ही है और समाज में बिखराव भी आ जाता है |* *आज समाज बदला , लोग बदले हैं और बदल गई है मनुष्य की सोंच | मनुष्य को यह लगता है कि मैं जो कर रहा हूं या मैं जो कह रहा हूं वही सत्य है बाकी सब झूठ है | अपनी बात को सही साबित करने के लिए मनुष्य अनेकों तर्क कुतर्क करते हुए गलत तथ्यों को प्रस्तुत करता रहता है | आज के तथाकथित कुछ विद्वानों एवं राजनैतिक प्रवक्ताओं के व्यवहार को देखकर मुझे "आचार्य अर्जुन तिवारी" को बड़ा आश्चर्य होता है की जिसे हम विद्वान मानते हैं वह भला ऐसा वक्तव्य कैसे दे सकता है जो कि लोगों के हृदय में चुभने वाला हो | क्या यही विद्वता है ?? आज मनुष्य के ऊपर किसी प्रकार का सामाजिक बन्धन नहीं रह गया है और न ही मनुष्य किसी के दबाव को मानना चाहता है यही कारण है कि मनुष्य उचित - अनुचित कार्य व्यवहार कर रहा है | आज परिवारों के विखरने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोग जाने - अन्जाने या फिर क्रोध में आकर कुछ अनचाहे कृत्य कर देते हैं , ऐसे लोगों को यह आभास भी होता है कि उन्होंने गल्ती की है परंतु वे अपनी गल्ती को मानना नहीं चाहते हैं जिसका परिणाम होता है कि परिवार का विखण्डन हो जाता है | कभी - कभी मनुष्य न चाहते हुए भी परिस्थितवश अपने किसी प्रिय को अनचाहे शब्द भी कह देता है परंतु समय रहते उसका प्रायश्चित कर लेने वाला ही महान बनता है | परंतु आज ऐसा करने वाले गिनती के लोग बचे हैं शेष तो सभी अपने ही भाव में रहकर अपनी कही गयी गलत बात को ही सही सिद्ध करने पर अडिग रहते हुए समाज में विघटन का कारण बनते रहते हैं | जबकि मनुष्य को आत्ममंथन करते हुए अपनी भूल को स्वीकार करके प्रायश्चित कर लेना चाहिए इससे मनुष्य का सम्मान बढ़ जाता है |* *भूल हो जाना मानव स्वभाव है परंतु प्रत्येक मनुष्य को समय रहते हुए अपनी भूल को स्वीकार करके प्रायश्चित कर लेना चाहिए | इससे उसका सम्मान तो बढता ही रहेगा साथ ही उसकी अंतरात्मा पर भी कोई बोझ नहीं रहेगा |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी
❤️जीवन की सीख - श्री कृष्ण कहते हैं विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता..!! कमों में जो भी लिखा, वही अटल सत्य है.. श्री कृष्ण कहते हैं विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता..!! कमों में जो भी लिखा, वही अटल सत्य है.. - ShareChat
#☝आज का ज्ञान 🌟 || चिंता नहीं, चिंतन करें || 🌟 किसी का चिंतन ही उसके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करता है। जीवन के प्रति हमारा चिंतन जितना नकारात्मक होगा हमारी चिंताएं भी उतनी ही अधिक होंगी। ऐसे ही हमारा चिंतन जितना सकारात्मक होगा, हमारे कार्य करने का स्तर उतना ही श्रेष्ठ एवं जीवन उतना ही प्रसन्नता से भरपूर रहेगा। जीवन में हमें इसलिए पराजय नहीं मिलती कि कार्य बहुत बड़ा था अपितु हम इसलिए परास्त हो जाते हैं कि हमारे प्रयास बहुत छोटे थे। नकारात्मक दृष्टि आसान से आसान कार्य को भी चिंतायुक्त एवं जटिल बना देती है तो जटिल से जटिल कार्य को सकारात्मक चिंतन बड़ा आसान बना देता है। प्रभु में विश्वास से बढ़कर कोई श्रेष्ठ चिंतन नहीं और हमारी चिंताओं का निवारण करने वाला साधन भी नहीं है। जीवन को चिंता में नहीं चिंतन में जिया जाना चाहिए। सकारात्मक चिंतन ही किसी भी चिंता का एकमात्र समाधान है।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
☝आज का ज्ञान - ೩ಋ ತಳಾR &ँर्ग गणपतये नमः सिद्धि @ विनायक नमो नमः अष्ट विनायक नमो नमः घणपति बप्पा मोरयामंगल मर्ति मोरया ೩ಋ ತಳಾR &ँर्ग गणपतये नमः सिद्धि @ विनायक नमो नमः अष्ट विनायक नमो नमः घणपति बप्पा मोरयामंगल मर्ति मोरया - ShareChat
नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् । उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥ [ महाभारत, शान्ति पर्व - १५/५० ] ☝🏻 यह प्रसिद्ध श्लोक गुण एवं दोष के महत्व को दर्शाता है । आइए इसे विस्तार से समझते हैं— नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् - नात्यन्तं गुणवत्— कोई भी वस्तु अत्यधिक गुणवान नहीं होती - किञ्चित् — कोई भी वस्तु - न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् — तथा न ही अत्यधिक दोषपूर्ण होती है उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा - उभयं— दोनों ( गुण एवं दोष ) - सर्वकार्येषु— सभी कार्यों में - दृश्यते— देखे जाते हैं - साध्वसाधु वा— अच्छे अथवा बुरे रूप में - अर्थात् 👉🏻 कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण ही गुण हों । ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणों से वंचित ही हो । सभी कार्यों में अच्छाई तथा बुराई दोनों ही देखने में आती है । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #सुभाषित
सुभाषित - सुप्रभात 0 श्री गणेशाय नमः सुप्रभात 0 श्री गणेशाय नमः - ShareChat
भगवान विष्णु , शिव , ब्रह्मा , सूर्य , गणेश , दुर्गाजी एवं लक्ष्मीजी आदि के मन्दिर बनवाने से दान तथा कीर्ति से भी अधिक फल प्राप्त होता है । नारायण 🪷🌷🪷 #☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩
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किसी और के द्वारा बनवाए जाते हुए देवालय के कार्य का अनुमोदन मात्र ही पापों से मुक्त कर देता है - तदोपरांत स्वयं मन्दिर बनवाने के पुण्य का क्या कहें ! नारायण 🪷🌷🪷 #☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुरधिकशततमोऽध्यायः भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 322) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भीष्म उवाच पुनर्भरतवंशस्य हेतुं संतानवृद्धये । वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १ ।। ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्र्यताम् । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत् प्रजाः ।। २ ।। भीष्मजी कहते हैं- मातः ! भरतवंशकी संतानपरम्पराको बढ़ाने और सुरक्षित रखनेके लिये जो नियत उपाय है, उसे मैं बता रहा हूँ; सुनो। किसी गुणवान् ब्राह्मणको धन देकर बुलाओ, जो विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंके गर्भसे संतान उत्पन्न कर सके ।। १-२ ।। वैशम्पायन उवाच ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत् ।। ३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब सत्यवती कुछ हँसती और साथ ही लजाती हुई भीष्मजीसे इस प्रकार बोली। बोलते समय उसकी वाणी संकोचसे कुछ अस्पष्ट-सी हो जाती थी ।। ३ ।। सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । विश्वासात् ते प्रवक्ष्यामि संतानाय कुलस्य नः ।। ४ ।। उसने कहा- 'महाबाहु भीष्म ! तुम जैसा कहते हो वही ठीक है। तुमपर विश्वास होनेसे अपने कुलकी संततिकी रक्षाके लिये तुम्हें मैं एक बात बतलाती हूँ ।। ४ ।। न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्म तथाविधम् । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः ।। ५ ।। 'ऐसे आपद्धर्मको देखकर वह बात तुम्हें बताये बिना मैं नहीं रह सकती। तुम्हीं हमारे कुलमें मूर्तिमान् धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो और तुम्हीं परम गति हो ।। ५ ।। तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । (यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ । तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृता कुक्षौ पुरा किल ।। मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित् । मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् ।।) धर्मयुक्तस्य धर्मार्थ पितुरासीत् तरी मम ।। ६ ।। 'अतः मेरी सच्ची बात सुनकर उसके बाद जो कर्तव्य हो, उसे करो। 'भरतश्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा। पूर्वकालमें मैं उन्हींके वीर्यसे उत्पन्न हुई थी। मुझे एक मछलीने अपने पेटमें धारण किया था। एक परम धर्मज्ञ मल्लाहने जलमेंसे मेरी माताको पकड़ा, उसके पेटसे मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा। मेरे उन धर्मपरायण पिताके पास एक नौका थी, जो (धनके लिये नहीं) धर्मार्थ चलायी जाती थी ।। ६ ।। सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् । अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः ।। ७ ।। आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन् यमुनां नदीम् । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत् तदा ।। ८ ।। सान्त्वपूर्व मुनिश्रेष्ठः कामार्तों मधुरं वचः । उक्तं जन्म कुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ।। ९ ।। 'एक दिन मैं उसी नावपर गयी हुई थी। उन दिनों मेरे यौवनका प्रारम्भ था। उसी समय धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् महर्षि पराशर यमुना नदी पार करनेके लिये मेरी नावपर आये। मैं उन्हें पार ले जा रही थी, तबतक वे मुनिश्रेष्ठ काम-पीड़ित हो मेरे पास आ मुझे समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले और उन्होंने मुझसे अपने जन्म और कुलका परिचय दिया। इसपर मैंने कहा- 'भगवन्! मैं तो निषाद की पुत्री हूँ' ।। ७-९ ।। तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत । वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे ।। १० ।। 'भारत! एक ओर में पिताजीसे डरती थी और दूसरी ओर मुझे मुनिके शापका भी डर था। उस समय महर्षिने मुझे दुर्लभ वर देकर उत्साहित किया, जिससे मैं उनके अनुरोधको टाल न सकी ।। १० ।। अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ।। ११ ।। मत्स्यगन्धो महानासीत् पुरा मम जुगुप्सितः । तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात् स मे मुनिः ।। १२ ।। 'यद्यपि मैं चाहती नहीं थी, तो भी उन्होंने मुझ अबलाको अपने तेजसे तिरस्कृत करके नौकापर ही मुझे अपने वशमें कर लिया। उस समय उन्होंने कुहरा उत्पन्न करके सम्पूर्ण लोकको अन्धकारसे आवृत कर दिया था। भारत ! पहले मेरे शरीरसे अत्यन्त घृणित मछलीकी-सी बड़ी तीव्र दुर्गन्ध आती थी। उसको मिटाकर मुनिने मुझे यह उत्तम गन्ध प्रदान की थी ।। ११-१२ ।। ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् । द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ।। १३ ।। 'तदनन्तर मुनिने मुझसे कहा- 'तुम इस यमुनाके ही द्वीपमें मेरे द्वारा स्थापित इस गर्भको त्यागकर फिर कन्या ही हो जाओगी' ।। १३ ।। पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ।। १४ ।। 'उस गर्भसे पराशरजीके पुत्र महान् योगी महर्षि व्यास प्रकट हुए। वे ही द्वैपायन नामसे विख्यात हैं। वे मेरे कन्यावस्थाके पुत्र हैं ।। १४ ।। यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः । लोके व्यासत्वमापेदे कार्य्यात् कृष्णत्वमेव च ।। १५ ।। 'वे भगवान् द्वैपायन मुनि अपने तपोबलसे चारों वेदोंका पृथक् पृथक् विस्तार करके लोकमें 'व्यास' पदवीको प्राप्त हुए हैं। शरीरका रंग साँवला होनेसे उन्हें लोग 'कृष्ण' भी कहते हैं ।। १५ ।। सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः। समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः ।। १६ ।। 'वे सत्यवादी, शान्त, तपस्वी और पापशून्य हैं। वे उत्पन्न होते ही बड़े होकर उस द्वीपसे अपने पिताके साथ चले गये थे ।। १६ ।। स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः । भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ।। १७ ।। 'मेरे और तुम्हारे आग्रह करने पर वे अनुपम तेजस्वी व्यास अवश्य ही अपने भाई के क्षेत्र में कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेंगे ।। १७ ।। स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति । तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि ।। १८ ।। 'उन्होंने जाते समय मुझसे कहा था कि संकटके समय मुझे याद करना। महाबाहु भीष्म ! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं उन्हींका स्मरण करूँ ।। १८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमह्भाखतमू श्रीमह्भाखतमू - ShareChat
#श्रीरामचरितमानस चोपाई राम नाम की महिमा: #रामायण #🙏रामायण🕉 रामचरितमानस से 25 दोहे राम नाम नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ अर्थ: कलियुग में यह राम नाम कल्पवृक्ष के समान है, जो मनवांछित फल देने वाला है, और सभी प्रकार के कल्याणों का निवास स्थान है। इसी नाम का स्मरण करने से ही भाँग के समान नीच (निकृष्ट) तुलसीदास, पवित्र तुलसी के समान हो गए। यह नाम इतना परम पवित्र और मंगलकारी है कि इसके स्मरण से निकृष्ट जीव भी श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेता है, और भवसागर से पार हो जाता है। नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ अर्थ: यह राम नाम इस भयानक कलियुग के काल में कल्पवृक्ष के समान है, जिसके स्मरण मात्र से ही संसार के सारे जंजाल (माया-मोह के बंधन और दुःख) शांत हो जाते हैं। यह राम नाम कलियुग में सभी मनोवांछित फल देने वाला है और परलोक में हितैषी (परम धाम देने वाला) तथा इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करने वाला है। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥ अर्थ: जिस राम नाम को महादेव (शिवजी) निरंतर जपते रहते हैं और काशी में मुत्यु को प्राप्त होने वाले जीवों को मुक्ति के लिए उपदेश देते हैं, उस नाम की महिमा को गणेशजी भी जानते हैं, जिनकी सर्वप्रथम पूजा भी इसी नाम के प्रभाव से होती है। यह नाम ही समस्त सिद्धियों का मूल और परम पावन है, और शिवजी का तारक मंत्र है। कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम नाम गुन गाना॥ राम नाम जपिए सदा हियँ धरि दृढ़ बिस्वास। भवसागर तरि जाइहौ प्रभु करि हैं उर बास॥ अर्थ: कलियुग में न तो योग का, न यज्ञ का और न ही ज्ञान का वह महत्व है। केवल एक ही आधार है, और वह है राम नाम के गुणों का गान करना। अतः, हृदय में दृढ़ विश्वास धारण करके सदा राम नाम का जप करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य सहज ही भवसागर को पार कर जाता है और प्रभु स्वयं उसके हृदय में वास करते हैं, जिससे परम शांति मिलती है। कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥ राम नाम जपि सफल भए, जे सकल सिद्धि पावहिं। करम धरम नहिं साधना, नामहिं ते पार जावहिं॥ अर्थ: हे तात! संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो आपसे न हो सके? (यहाँ नाम की महिमा कही गई है कि नाम सब कुछ कर सकता है)। जिस राम नाम का जप करके सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हुईं और सभी कार्य सिद्ध हुए। कलियुग में कर्म, धर्म, और अन्य साधनाओं के बिना भी केवल राम नाम के आश्रय से ही मनुष्य भवसागर के पार चला जाता है। भायँ कुभायँ अनख आलस हू। नाम जपत मंगल दिसि दस हूँ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥ अर्थ: अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से— किसी भी तरह से राम नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण ही कल्याण होता है। उसी परम कल्याणकारी राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ। नाम जप का महत्व भाव पर निर्भर नहीं करता, वह हर हाल में मंगलकारी है। जान आदि कबि नाम प्रतापू। भएउ सुद्ध करि उलटा जापू॥ सहस नाम सम सुनि शिव बानी। जपि जेईं सँग गिरिजा भवानी॥ अर्थ: आदिकवि श्री वाल्मीकिजी राम नाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। इस प्रकार राम नाम का प्रभाव जान लेने के कारण, श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम एक हजार नामों के समान है, पार्वतीजी (भवानी) सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं। राम नाम कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥ सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥ अर्थ: राम नाम कलियुग में सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु गौ है और सज्जनों के लिए सुंदर संजीवनी जड़ी है। पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है, जो जन्म-मरणरूपी भय का नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेंढकों को खाने के लिए सर्पिणी के समान है। यह नाम ही परम कल्याणकारी और जीवन का आधार है। अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥ सोइ नाम राम कहँ जपहिं संत, तजि सकल काम अरु रोप॥ अर्थ: निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं, जो दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। संतजन समस्त कामनाओं और क्रोध को त्यागकर उसी राम नाम का जप करते हैं, क्योंकि यह नाम ही दोनों स्वरूपों का मूल है। नाम के माध्यम से ही निर्गुण और सगुण दोनों की प्राप्ति सहज हो जाती है। राम नाम नृसिंह तनु भयऊ। कलिजुग हिरनकसिपु सोइ रयऊ॥ जापक जन प्रहलाद जिमि पाल ही। दलि सुरसाल राम नाम रखवाल ही॥ अर्थ: राम नाम नृसिंह भगवान के शरीर जैसा है, कलियुग ही वह हिरण्यकशिपु है। राम नाम जपने वाले मनुष्य प्रहलाद के समान हैं। यह राम नाम ही देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी असुर) को मारकर जप करने वालों की सदैव रक्षा करता है। राम नाम की शक्ति भक्तों के लिए परम रक्षक है। राम नाम मनि दीप धरू जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥ अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तुम भीतर (हृदय) और बाहर (संसार) दोनों ओर उजाला (ज्ञान का प्रकाश और मंगल) चाहते हो, तो राम नाम रूपी मणि दीपक को अपनी जीभ रूपी देहरी के द्वार पर धर लो। यह नाम ही ज्ञान का प्रकाश देने वाला और समस्त अंधकार को दूर करने वाला है। दोउ अक्षर मधुर मनोहर जान। लोचन जगत जीव के प्रान॥ सुगम सुसाहिब सुमिरत सुखदाता। हितकारी, राम नाम जगत्राता॥ अर्थ: राम नाम के दोनों अक्षर ('रा' और 'म') मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं। यह नाम ही परम हितकारी है और समस्त जगत का उद्धार करने वाला है। यह नाम जपने में अत्यंत सरल और सहज है। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥ जिन्ह कछु कीन्ह जान तिन्ह जाना। राम नाम सब साधन माना॥ अर्थ: राम नाम और रूप की गति (महिमा) अकथनीय और अनूठी है। उसे समझने पर सुख मिलता है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन्होंने कुछ भी साधन किया है, उन्होंने यही जाना है कि राम नाम ही समस्त साधनों में श्रेष्ठ है। यह नाम सभी रहस्यों का सार और अनुभव का विषय है। गिरिजा जाहि सहस मुख गावहिं। सोइ नाम तुम कहुँ सुनावाहिं॥ सहस नाम सम राम नाम। यह जानहिं शिव, भवानी धाम॥ अर्थ: हे पार्वती! जिसका सहस्र मुख वाले (शेषनाग) भी गान करते हैं, वही परम पवित्र राम नाम मैंने तुमको सुनाया है। एक राम नाम सहस्र (हजारों) नामों के समान है, यह रहस्य श्री शिवजी जानते हैं, क्योंकि उनके हृदय में भवानी (पार्वती) वास करती हैं और वे दोनों इस नाम का नित्य जप करते हैं। सुमिरि पवनसुत पावन नामू। आपु सहित बस कीन्हे रामू॥ नाम प्रताप सिंधु सुकाइ। सहजहि कपि दल पार गइ॥ अर्थ: पवनसुत हनुमानजी ने इसी राम नाम का स्मरण करके स्वयं को तो पवित्र किया ही, साथ ही श्री रामजी को भी अपने वश में कर लिया (उनके परम प्रिय बन गए)। इसी नाम के प्रताप से समुद्र सूख गया और वानरों की सेना सहज ही पार चली गई। नाम की शक्ति भगवान की शक्ति से भी बढ़कर मानी गई है। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥ राम नाम जपि ते सुख लहहिं। जे जन काहू भाँति न चहहिं॥ अर्थ: जब अतिशय दुःखी और संकटग्रस्त मनुष्य राम नाम का जप करते हैं, तो उनके सभी बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जो मनुष्य किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं रखते, वे भी राम नाम का जप करके ही परम सुख को प्राप्त होते हैं। यह नाम आर्त और अर्थार्थी दोनों को ही सुख प्रदान करता है। हरन अमंगल अखिल कल्यान। राम नाम जप सब जग जान॥ सोइ नाम जेहि कर सुमिरन कीन्हा। पार भयो सब जगत अतीन्हा॥ अर्थ: समस्त अमंगलों को हरने वाला और संपूर्ण कल्याणों को करने वाला राम नाम का जप है, यह बात सारा संसार जानता है। यह वही नाम है जिसका स्मरण करके, जिसने भी इसे जपा है, वह इस अपार संसार सागर से पार हो गया है। यह नाम ही समस्त पापों का नाशक और मंगल का दाता है। नाम प्रभाउ बिचित्र अति, कहउँ कछुक समुझाई। राम नाम बिनु जे नर करहीं, ते भव न तरहिं जाई॥ अर्थ: राम नाम का प्रभाव अत्यंत ही विचित्र है, मैं उसे कुछ समझाकर कहता हूँ। जो मनुष्य राम नाम का आश्रय लिए बिना अन्य साधन करते हैं, वे इस संसार रूपी भवसागर को पार करके नहीं जा सकते। नाम ही एक मात्र सरल और सुगम मार्ग है, जो पार लगाता है। कलि केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥ राम नाम ते पाप सबै जरि। भवसागर में मन नहिं डरि॥ अर्थ: कलियुग में केवल राम नाम ही एक मात्र आधार है। मनुष्य उसी नाम का बार-बार स्मरण करके भवसागर के पार उतर जाते हैं। राम नाम के प्रभाव से सारे पाप जलकर भस्म हो जाते हैं, और मनुष्य के मन में संसार रूपी सागर से डर नहीं लगता। नाम प्रताप महा बल भारी। पाप पुंज जाहिं छन हारी॥ राम नाम सोई जानहिं, जा पर कृपा करहिं। करम धरम नहिं साधना, नामहिं ते भव तरहिं॥ अर्थ: राम नाम का प्रताप बहुत बड़ा और महान बलशाली है, जिसके प्रभाव से पापों के समूह भी एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं। उस राम नाम की महिमा को वही जानता है जिस पर श्री रामजी की विशेष कृपा होती है। इस कलियुग में कर्म, धर्म और अन्य साधनाओं की आवश्यकता नहीं, केवल नाम के बल पर ही जीव संसार सागर से पार हो जाता है। अगुन सगुन कहँ नहिं भेदू, राम नाम दुइ रूपु। नाम रूप दुइ एक सम, यहि विधि सहज अनूपु॥ अर्थ: निर्गुण और सगुण ब्रह्म में कोई भेद नहीं है, राम नाम ही उनके दो स्वरूप हैं। नाम और रूप दोनों ही एक समान हैं, इस प्रकार यह नाम सहज ही अनुपम है। यह नाम दोनों ही ब्रह्म स्वरूपों को अपने में समाहित किए हुए है, और नाम का जप करने वाला दोनों को प्राप्त करता है। मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी॥ राम नाम महिमा अमित, तुलसी सोइ गावहिं। जेहि कर कृपा राम की, ते भवसिंधु पावहिं॥ अर्थ: जो मंगल के धाम और अमंगल को हरने वाले हैं, दशरथ के आँगन में विहार करने वाले उन श्री राम पर मेरी भक्ति से द्रवित हों। राम नाम की महिमा अपार है, तुलसीदास तो केवल वही गाते हैं। जिस पर राम नाम की कृपा होती है, वे ही इस संसार रूपी सागर को पार कर पाते हैं। राम नामु सब कोउ कहै, दसरथ सुत कोउ कोउ। जनम जनम के पाप कटै, राम नाम कहि लोउ॥ अर्थ: राम नाम तो सभी कहते हैं, परन्तु दशरथ के पुत्र (सगुण स्वरूप) को कोई-कोई ही जान पाता है। अतः तुम अपने जन्म-जन्म के पापों को काटने के लिए केवल राम नाम को लेकर जपो। नाम की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह नाम लेने वाले के समस्त संचित पापों का नाश कर देती है। जो सुमिरत सिधि होइ, गनि सकल कल्यान। राम नाम जपिए सदा, हियँ धरि दृढ़ ग्यान॥ अर्थ: जिस राम नाम का स्मरण करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और समस्त कल्याणों की गिनती हो जाती है, ऐसे राम नाम को सदा हृदय में दृढ़ ज्ञान धारण करके जपना चाहिए। यह नाम ही सफलता का दाता, कल्याण का मूल और समस्त ज्ञानों का सार है। राम नाम की महिमा, अगम निगम कहुँ गान। तुलसीदास आस करहिं, बस राम नाम हियँ जान॥ अर्थ: राम नाम की महिमा तो अगम्य है, जिसका वर्णन वेद और शास्त्र भी करते हैं। तुलसीदास तो बस यही आशा करते हैं कि उनके हृदय में केवल राम नाम ही वास करे। यह नाम ही जीवन की अंतिम सत्य और परम आश्रय है, जिससे बढ़कर कोई और सत्य नहीं है।
श्रीरामचरितमानस चोपाई - ೫- ! ೫- ! - ShareChat
#☝आज का ज्ञान 🙏🌹ज्ञान दान सर्वश्रेष्ठ दान 🌹🙏 तीन भाईयों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गयी कि सर्वश्रेष्ठ दान कौन सा है? पहले ने कहा कि धन का दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है, दूसरे ने कहा कि गौ-दान सर्वश्रेष्ठ दान है, तीसरे ने कहा कि भूमि-दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है। निर्णय न हो पाने के कारण वे तीनों अपने पिता के पास पहुंचे। पिता ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सबसे बड़े पुत्र को धन देकर रवाना कर दिया। वह पुत्र गली में पहुंचा और एक भिखारी को वह धन दान में दे दिया। इसी तरह उन्होंने दूसरे पुत्र को गाय दी। दूसरे पुत्र ने भी उसी भिखारी को गाय दान में दे दी । फिर तीसरा पुत्र भी उसी भिखारी को भूमि दान देकर लौट आया। कुछ दिनों बाद पिता अपने तीनों पुत्रों के साथ उसी गली में टहल रहे थे जहां वह भिखारी प्रायः मिलता था । उन लोगों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह अब भी भीख मांग रहा था। उस भिखारी ने गाय और भूमि बेचने के पश्चात प्राप्त हुआ पूरा पैसा मौजमस्ती में उड़ा दिया था। पिता ने समझाया – “वही दान 🥀 सर्वश्रेष्ठ दान🥀 है जिसका सदुपयोग किया जा सके। ज्ञानदान ही सर्वश्रेष्ठ दान है ।” 🌹ॐ भरताग्रजाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात् 🌹 🌹ॐ रामदूताय विद्मिहे कपिराजाय धीमहि |तन्नो: मारुति: प्रचोदयात🌹
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‼️श्री रामचरितमानस के अनुसार नामजप की महिमा‼️ 🛐कलियुग में जितने भी साधना मार्ग है उसमें सबसे सहज मार्ग है भक्तियोग, और भक्तियोग अंतर्गत नाम संकीर्तन योग अनुसार साधना करना इस युग की सर्वश्रेष्ट साधना मार्ग है। संत तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में नाम के महिमा का गुणगान किया है। संत जिस देवी या देवता के स्वरूप की आराधना कर आध्यात्मिक प्रगति कर आत्मज्ञानी बनते हैं उसी आराध्य के नाम की गुणगान कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।🛐 📕अध्यात्म शास्त्र के अनुसार हमारे सूक्ष्म पिंड में जिस सूक्ष्म तत्त्व की कमी होती है, जब हम उस तत्त्व की पूर्ति हेतु उस आराध्य के नाम का जप करते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक प्रगति द्रुत गति से होती है | जब तक हमने गुरुमंत्र नहीं मिला हो, हमें अपने कुल देवता का जप करना चाहिए और यदि कुलदेवता का नाम नहीं पता हो तो या तो ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ का जप करना चाहिए या अपने इष्टदेवता का जप करना चाहिए।📕 🤹 यदि घर में पितृ दोष हो तो एक घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करना चाहिए और शेष समय अपने कुलदेवता का या इष्टदेवता का मंत्र जपना चाहिए। ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तर के साधक उच्च कोटि के देवता जैसे राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, दुर्गा, गणपति या हनुमान का जप कर सकते हैं।🤹 🛐संत तुलसीदास जी ने अत्यधिक शृंगार युक्त एवं भावपूर्ण शब्दों में अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के नाम की महिमा का वर्णन किया है | उनके द्वारा की गयी नाम की महिमा का वर्णन ‘नाम’ रूपी तत्त्व का वर्णन समझ सकते हैं। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है बालकांड से उद्धृत कुछ दोहे🛐 🙏श्री नाम वंदना और नाम महिमा!!!!!!!!🙏 *नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥ सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥ ✍️भावार्थ:-नाम ही के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेष वाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगी गण नाम के ही प्रसाद से ब्रह्मानन्द को भोगते हैं॥✍️ *नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥ नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥ ✍️भावार्थ:-नारदजी ने नाम के प्रताप को जाना है। हरि सारे संसार को प्यारे हैं, (हरि को हर प्यारे हैं) और आप (श्री नारदजी) हरि और हर दोनों को प्रिय हैं। नाम के जपने से प्रभु ने कृपा की, जिससे प्रह्लाद, भक्त शिरोमणि हो गए॥✍️ *ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥ ✍️भावार्थ:-ध्रुवजी ने ग्लानि से (विमाता के वचनों से दुःखी होकर सकाम भाव से) हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है॥✍️ *अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥ कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥ ✍️भावार्थ:-नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्री हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुणों का पार नहीं गा सकते॥✍️ *नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ ✍️भावार्थ:-कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥✍️ *चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥ बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥ ✍️भावार्थ:-(केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में (या राम नाम में) प्रेम होना है॥✍️ *ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥ कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥ ✍️भावार्थ:-पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग में पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥✍️ *नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ ✍️भावार्थ:-ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता- पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥✍️ *नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥ ✍️भावार्थ:-कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌ जी हैं॥✍️ *राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ ✍️भावार्थ:-राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥✍️ *भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥ ✍️भावार्थ:-अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ॥✍️ 🙏।। राम सिया राम सिया राम जय जय राम।।🙏 #जय श्री राम
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड चौरासीवाँ सर्ग निषादराज गुहका अपने बन्धुओंको नदीकी रक्षा करते हुए युद्धके लिये तैयार रहनेका आदेश दे भेंटकी सामग्री ले भरतके पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोध करना उधर निषादराज गुहने गङ्गा नदीके तटपर ठहरी हुई भरतकी सेनाको देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओंसे कहा—॥१॥ 'भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्रके समान अपार दिखायी देती है; मैं मनसे बहुत सोचनेपर भी इसका पार नहीं पाता हूँ॥२॥ 'निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदारके चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसीके रथपर फहरा रही है॥३॥ 'मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियोंद्वारा पहले हमलोगोंको पाशोंसे बँधवायगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिताने राज्यसे निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीरामको भी मार डालेगा॥४॥ 'कैकेयीका पुत्र भरत राजा दशरथकी सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मीको अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजीको वनमें मार डालनेके लिये जा रहा है॥५॥ 'परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हितकी कामना रखकर तुमलोग अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो यहाँ गङ्गाके तटपर मौजूद रहो। 'सभी मल्लाह सेनाके साथ नदीकी रक्षा करते हुए गङ्गाके तटपर ही खड़े रहें और नावपर रखे हुए फल-मूल आदिका आहार करके ही आजकी रात बितावें॥७॥ 'हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमेंसे एक-एक नावपर मल्लाहोंके सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्रीसे लैस होकर बैठे रहें।' इस प्रकार गुहने उन सबको आदेश दिया॥८॥ उसने फिर कहा कि 'यदि यहाँ भरतका भाव श्रीरामके प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गाके पार जा सकेगी'॥९॥ यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी (मिश्री), फलके गूदे और मधु आदि भेंटकी सामग्री लेकर भरतके पास गया॥१०॥ उसे आते देख समयोचित कर्तव्यको समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्रने विनीतकी भाँति भरतसे कहा—॥११॥ 'ककुत्स्थकुलभूषण! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओंके साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीरामका सखा है। इसे दण्डकारण्यके मार्गकी विशेष जानकारी है। निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो'॥१२-१३॥ सुमन्त्रके मुखसे यह शुभ वचन सुनकर भरतने कहा—'निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें—इसकी व्यवस्था की जाय'॥१४॥ मिलनेकी अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओंके साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरतसे मिलकर बड़ी नम्रताके साथ बोला—॥१५॥ 'यह वन-प्रदेश आपके लिये घरमें लगे हुए बगीचेके समान है। आपने अपने आगमनकी सूचना न देकर हमें धोखेमें रख दिया—हम आपके स्वागतकी कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवामें अर्पित है। यह निषादोंका घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें॥१६॥ 'यह फल-मूल आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमेंसे कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फलका गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकारके दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें॥१७॥ 'हम आशा करते हैं कि यह सेना आजकी रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकोंके साथ यहाँसे अन्यत्र जाइयेगा'॥१८॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८४॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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