#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍
**गुरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की 16 नगरों की यात्रा.......
हिंदू धर्म में मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गरुड़ पुराण में इस यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें आत्मा को 16 विभिन्न नगरों (शहरों) से गुजरना पड़ता है। यह नगर आत्मा के कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करते हैं और इसे मोक्ष या पुनर्जन्म की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं इन 16 नगरों के बारे में:
### **1. सौम्यपुर**
यह पहला नगर है, जहां आत्मा को यमराज के दूतों द्वारा ले जाया जाता है। यहां आत्मा को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का स्मरण कराया जाता है।
### **2. सौरिपुर**
इस नगर में उन आत्माओं को दंड दिया जाता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में अधर्म का आचरण किया होता है।
### **3. नागेन्द्रभवन**
यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अन्य लोगों को अत्यधिक कष्ट दिया हो। उन्हें यहां दंड भोगना पड़ता है।
### **4. गोरमुख**
इस नगर में वे आत्माएँ जाती हैं जिन्होंने अपने जीवन में पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों को कष्ट पहुँचाया हो।
### **5. क्रूरपुर**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जो लोभ, कपट और अन्य दुष्कर्मों में लिप्त रहे हैं। उन्हें यहाँ तीव्र यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
### **6. विचित्रभवन**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्म किए हैं। उन्हें यहाँ मिश्रित अनुभव होते हैं।
### **7. वह्निपुर**
इस स्थान में आत्माओं को अग्नि के दंड से गुजरना पड़ता है। यह नगर मुख्य रूप से उन लोगों के लिए होता है जिन्होंने अपने जीवन में अनैतिक कार्य किए हैं।
### **8. सन्निहितालय**
यहाँ आत्मा को उसकी जीवन की सभी घटनाओं का अनुभव कराया जाता है, जिससे वह अपने कर्मों की सच्चाई समझ सके।
### **9. रौद्रपुर**
इस नगर में वे लोग आते हैं जो क्रोधी स्वभाव के थे और जिन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक क्रूरता दिखाई हो।
### **10. प्रेतपुर**
जो लोग अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों का पालन नहीं करते, वे इस नगर में प्रेत योनि में रहते हैं।
### **11. पिशाचपुर**
जो व्यक्ति लोभी, छल-कपट में लिप्त रहते हैं, वे इस नगर में पिशाच रूप में रहते हैं।
### **12. शैलग्राम**
यह नगर उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने परोपकार किए हैं और जिनका पुण्य कर्म अधिक होता है।
### **13. नगर नरक**
यह स्थान पूर्णतः नरक के समान है, जहाँ आत्माओं को उनके पापों का कठोर दंड दिया जाता है।
### **14. विष्टिपुर**
जो व्यक्ति दूसरों को धोखा देते हैं, झूठ बोलते हैं, और छल-कपट करते हैं, वे इस नगर में यातना भोगते हैं।
### **15. ललाटपुर**
यह स्थान उन आत्माओं के लिए होता है जिन्होंने अपने पूर्व जन्म में साधना की थी लेकिन मोह-माया में फंस गए थे।
### **16. यमपुरी**
यह अंतिम नगर है, जहाँ यमराज आत्मा के कर्मों के अनुसार उसे पुनर्जन्म देने या मोक्ष प्रदान करने का निर्णय लेते हैं।
### **निष्कर्ष**
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को इन 16 नगरों से गुजरना पड़ता है। यह यात्रा आत्मा के कर्मों के अनुसार सुखद या कष्टदायक हो सकती है। अतः जीवन में सत्कर्म करना और धर्म का पालन करना आवश्यक है ताकि आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर किया जा सके।
**"सत्कर्म ही मोक्ष की कुंजी है।"**
हज़ारों वर्ष बाद मीरा ने अधिकार जता कर .. कहा कि तुम हो, यहीं हो और मैं तुम्हारी हूँ..!
और सचमुच श्री कृष्ण जितने मीरा के हुए उतने किसी के नही हुए .. प्रेम में डूबे सामान्य लोग अपने प्रिय पर दावा करते हैं कि तुम मेरे हो .. मीरा ने इसके उलट जाकर कहा कि मैं तुम्हारी हूँ...
मीरा ने मांगा नहीं. दिया.! और फिर बिन मांगें सब कुछ पा लिया..! जिस कृष्ण को स्वयं राधारानी अपना पति नहीं कह सकीं .. उनको मीरा ने साधिकार अपना पति कहा, माना और सिद्ध किया कि सचमुच ' ही थे ..
मीरा को पढ़कर लगता है कि सचमुच प्रेम समर्पण की पराकाष्ठा का नाम है..! मनुष्य सामान्यतः किसी एक के भरोसे नही रह पाता उसके मन में भरोसे का द्वंद चलता ही रहता है ..
इसपर करूँ या उसपर .. पर किसी एक के भरोसे रहने का आंनद अद्वितीय होता है .. बस कृष्ण सा निभाने वाला मिलना चाहिए..! पत्नियो को छोड़ दें तो श्री कृष्ण के जीवन में दो स्त्रियाँ आयी .. जिन्होंने अपना सर्वस्व उनके भरोसे छोड़ दिया..
पहली द्रोपदी चीरहरण के .. समय वो सबको भूलकर उन्होंने केवल और केवल श्री कृष्ण पर भरोसा किया .. फिर श्री कृष्ण ने जो भयविधि निभाई.. वह इतिहास है..! और दूसरी हुई मीरा .. श्री कृष्ण के आगे सब को भूल गयी
किसी ने कहा घर छोड़ दो तो छोड़ दिया, किसी ने कहा विष पी लो तो पी लिया, न किसी से भय, न किसी से मोह, भरोसा केवल श्री कृष्ण पर फिर श्री कृष्ण कैसे न होते मीरा के .. सच पूछिए.! तो स्वयंबर में श्री कृष्ण मीरा ने ही जीता था..!
मीरा के विषपान की बड़ी चर्चा हुई.. शायद प्रेम करना विष पीने जैसा ही होता है .. कृष्ण जैसा कोई मिल गया तो उस विष को अमृत बना देता है .. और प्रेम की प्रतिष्ठा रह जाती है..! कुछ मूर्ख कवियों ने कहा कि प्रेम किया नहीं जाता.?
हो जाता है.! इस सृष्टि में यूँ ही नहीं कुछ होता और प्रेम तो सजीवों का सबसे पवित्र भाव है उसे बिना जाँचे- परखे किसी को कैसे दे देंगे आप प्रेम के लिए तो सुपात्र का ही चयन होना चाहिए मीरा ने सुपात्र का चयन किया तो अमर हुई ..
खैर ! श्रीकृष्ण अकेले थे जिन्होंने सिद्ध किया कि जिसका कोई नही उसका मैं.. जिसने जिस रूप में चाहा उसे उस रूप में मिले .. नन्द बाबा और यशोदा मैया ने पुत्र रूप में चाहा तो न होते हुए भी उनके पुत्र हो गए..
गोपियों ने वात्सल्य भाव से देखा तो उनकी गोद में खेले..! राधा ने प्रेम किया तो उन्हें प्रेमी के रूप में मिले, और क्या खूब मिले .. उद्धव और अर्जुन ने मित्र रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में मिले ..
सुदामा ने ईश्वर के रूप में पूजा की तो उनका घर भर दिया .. जामवंत को लड़ने की चाह थी तो उनकी वह इच्छा भी पूरी की.. ! रुक्मिणी, सत्यभामा को तो छोड़िए, नरकासुर की बंदिनी, सोलह हजार राजकुमारियों ने पति रूप में चाहा तो उन्हें उस रूप में भी मिले ..
किसी को निराश नही किया फिर मीरा को कैसे निराश करते..? मीरा ने कृष्ण से मांगा नही कि मेरे हो जाओ बल्कि मान लिया कि श्री कृष्ण ही मेरे है .. आगे सब श्री कृष्ण के ऊपर था..
जिस दिन उन्होंने पहली बार श्री कृष्ण का नाम लिया उस दिन से अंतिम दिन तक श्री कृष्ण उन्हीं के रहे, उनके साथ रहे..!
श्री कृष्ण की प्रेमिकाओं ने दिखाया कि प्रेम करते कैसे हैं .. तो श्री कृष्ण ने बताया कि निभाते कैसे हैं .. संबंधों को निभाने में श्री कृष्ण अद्भुत हैं..! अच्छा सुनो.! श्री कृष्ण इतने आसानी से भी नही मिल जाते .. उसके लिए मीरा होना पड़ता है.. विष पीना पड़ता है....
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा ना कोये..
मेरे कृष्ण .. 🌹🙏
जय श्री राधे राधे 🌹🙏 #मीराबाई
#👫 हमारी ज़िन्दगी #🙏 प्रेरणादायक विचार
एक बार एक साधू घूमता
हुआ सा कहीं जा रहा था।
तो,रास्ते में उन्हें एक
मंदिर दिखाई दिया।
मंदिर दिखते ही वो अपनी
उस फटी हुई सी धोती को
पहने ही मंदिर में चला गया
और भगवान को प्रणाम कर
कहने लगा-
हे प्रभु,आप बड़े दयालु हैं...!
करुणामयी हैं...
जो आपने मुझे
इतना कुछ दिया।
आपका
बहुत-बहुत धन्यवाद है।
उसी समय एक नास्तिक
वहाँ बैठा हुआ यह सब
देख रहा था।
साधु को देखकर वो हंसते
हुए कहने लगा-अरे पागल....!
तेरे पास तो सिर्फ एक फटी
पुरानी सी धोती है और उसमें
भी कई छेद हैं।
जबकि,तू कह रहा है कि
तुमने मुझे इतना कुछ दिया है।
आपका धन्यवाद है ???
इस पर साधू ने मुस्करा कर
बहुत ही सुंदर उत्तर दिया कहा :
पागल मैं नहीं तू है।
अरे,
मैं जब पैदा हुआ था तो उस
समय तो मेरे तन पर यह धोती
भी नहीं थी।
परमात्मा के प्रति उस
साधू की कृतज्ञता देखकर
वह नास्तिक अवाक रह गया...!
जयभवानी👏
जयश्रीराम👏
⁉️ हमारे अंदर से "मैं" वाली भावना पूर्णतः कैसे निकले ?⁉️
✍️जैसे काम शुरू करने से पहले मन में समर्पण भाव तो रहता है की गुरु भगवान के चरणों में समर्पित करके ये कार्य करना है, पर end में आते आते वो "मैं" वाली भावना आ ही जाती है की प्रशंसा हो या कोई attention
दे।✍️
🙏🙏यही "मैं" ही तो जीवों के सभी समस्याओं का मूलभूत कारण है । यह भाव कि यह मैंने किया है , मैं पन लाता है । हम जब स्वयं को सब कुछ मान लेते हैं , कर्ता मान लेते हैं , तभी यह मैं पने की भावना और स्वयं को प्रसंशित होने की भावना का जन्म होता है । इसका अर्थ है हम स्वयं को हर कार्य के लिए कर्ता मान रहे हैं और जब स्वयं को कर्ता मानेंगे तो यश , स्वयं के सम्मान की चाह रहेगी ही रहेगी । जिस समय हम स्वयं को कर्ता न मानकर , सब कुछ भगवान को अर्पण करते हुए और स्वयं को भगवान का निमित्त मानकर चलेंगे तो कभी भी यह अहम भावना आड़े नहीं आएगी ।
देखिये हम जो कुछ भी करते हैं , वह सदा सदा के लिए तब तक रहेगा जब तक वह अपना फल नहीं दे देता ।🙏🙏
Its kind of energy , which can never be destroyed but can be tranformed into one form to another.
🌷तो ऐसे ही हम जो भी कार्य करते हैं , चाहे दान हो , या कोई भी कार्य , उसका फल हमें इस ब्रह्मांड में मिलकर रहेगा , कोई माई का लाल क्या स्वयं भगवान भी इसमें कुछ नहीं कर सकते ।
तो मान लिया हमने दान किया ।
अब उसका फल मिलेगा ही मिलेगा । या तो सबसे बताकर उसे यश में परिवर्तित कर ले लीजिए या तो फिर उसे bank में FD करवा दीजिये , समय आने पर वह अपना फल देगा ही देगा और जितना अधिक देर से देगा , वह उतना ही अधिक प्रचुर मात्रा में मिलेगा ।🌷
✍️जैसे आपने काम किया ।
आपको salary मिली । अब उस salary के पैसे से चाहे आप कुछ भी खरीद कर burger pizza से लेकर दारू से लेकर सब समाप्त कर दें या तो फिर उसको जमा कर दें FD में । तो समय आने पर उसका आपको कई गुना प्राप्त होगा और अगर उसको निष्काम भाव से कर रहे हैं तो फिर वह भागवदिक लाभ देगा । तो कर्ता भाव समाप्त करने से और सब भगवान को अर्पण करते हुए , स्वयं को मात्र निमित्त मानकर चलने से यह भावना या लोकरंजन की भावना स्वतः ही समाप्त हो जाएगी ।✍️ #❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
शिव जी की पत्नियां - सती और पार्वती!
बचपन में मां से सुनी थी यह कहानी। यहां शब्द मेरे हैं।
शिव पुराण में माता पार्वती के तप की गहन कथा है। वह तप इतना कठोर था कि देवता भी हैरान रह गए।
...लेकिन इसके पहले सती की कहानी।
प्रजापति दक्ष ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे – बहुत शक्तिशाली, नियम-कायदों के पक्के और सृष्टि के निर्माण में बड़े योगदान देने वाले। उनकी पत्नी के दो नाम थे प्रसूति और वीरणी। उनकी कई पुत्रियाँ हुईं , 24 या उससे ज्यादा, जो बाद में देवताओं, ऋषियों और ग्रहों की पत्नियाँ बनीं। लेकिन दक्ष के मन में एक खास इच्छा थी – एक ऐसी बेटी चाहिए जो सर्वशक्तिमान, विजयी और अलौकिक हो!
उन्होंने भगवती आदिशक्ति की घोर तपस्या की। माँ प्रसन्न हुईं और वरदान दिया - "मैं तुम्हारे घर पुत्री रूप में जन्म लूँगी। मेरा नाम होगा सती (सत्य पर चलने वाली)।"
और हुआ भी वही! सती का जन्म हुआ तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। बचपन से ही सती अलग थीं , अलौकिक तेज, दिव्य गुण। वे छोटी उम्र में ही चमत्कार दिखातीं – फूल हँसते, पक्षी उनके चारों ओर नाचते। दक्ष को गर्व होता, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें डर भी लगता था कि यह बेटी साधारण नहीं है।
सती बचपन से ही भगवान शिव की भक्ति में लीन रहतीं। नारद मुनि या अन्य ऋषियों से शिव की कथाएँ सुनकर उनका मन मोहित हो जाता। वे सोचतीं – "मुझे सिर्फ महादेव चाहिए। कोई और नहीं!"
जब विवाह की उम्र आई, तो दक्ष ने सोचा – मेरी बेटी के लिए कोई राजकुमार, कोई देवता या कोई बड़ा योद्धा ढूँढूँ। लेकिन सती का मन तो पहले से ही कैलाश पर बस चुका था!
दक्ष शुरू में शिव के पक्ष में नहीं थे क्योंकि शिव को वे औघड़, श्मशानवासी, भस्म लगाने वाले समझते थे. शिव मेरी राजकुमारी के योग्य नहीं! लेकिन ब्रह्मा जी ने समझाया "सती आदिशक्ति का अवतार हैं, और शिव आदि पुरुष हैं। इनका मिलन सृष्टि का आधार है।"
आखिरकार दक्ष मान गए। सती और शिव का विवाह हुआ – एक दिव्य, अनोखा विवाह! शिव की बारात में भूत-प्रेत, गण, योगी – सब नाचते-गाते आए। सती खुशी से झूम उठीं। वे कैलाश पर महादेव की अर्धांगिनी बनकर रहने लगीं। दोनों का प्रेम इतना गहरा था कि सृष्टि में संतुलन बना रहा। सती शिव की हर बात मानतीं, और शिव भी सती की भक्ति से पिघल जाते।
सती के पिता राजा दक्ष का अहंकार बढ़ता गया। उन्होंने एक विशाल यज्ञ किया। सारे देवता आए, लेकिन जानबूझकर शिव और सती को न्योता नहीं दिया। सती को जब पता चला, तो वे बिना बुलाए यज्ञ में गईं। वहाँ दक्ष ने शिव का अपमान किया – "वो योगी मेरे जामाता? कभी नहीं!"
सती का हृदय टूट गया। पिता का अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर देह त्याग दी – ''मैं ऐसे पिता की बेटी नहीं रह सकती जिसने मेरे स्वामी का अपमान किया!"
यह सुनकर शिव का क्रोध फूट पड़ा। उन्होंने तांडव किया, वीरभद्र को उत्पन्न किया और यज्ञ को तहस-नहस कर दिया। लेकिन सती का त्याग अमर हो गया ।
◾◾◾
सती के देह त्याग के बाद पार्वती हिमालय राज की पुत्री के रूप में जन्मीं। बचपन से ही उनका मन शिव में रमा था। देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि शिव को पाने के लिए घोर तप जरूरी है।
पार्वती ने माता-पिता से आज्ञा ली, सारे आभूषण, रेशमी वस्त्र, सौंदर्य के साधन त्याग दिए। वे जंगल के तपोवन में चली गईं। स्नान कर, तपस्वी वेष धारण किया – सादा वस्त्र, जटा बाँधे, कोई सजावट नहीं।
उन्होंने "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप शुरू किया – मन, वाणी और कर्म से सिर्फ शिव का चिंतन।
शुरुआत में वे फल-फूल खातीं। जंगल के फल, पत्ते, जड़ें – जो मिले, वही। तीनों समय शिवलिंग (या ध्यान में शिव) की पूजा करतीं – फूल चढ़ातीं, जल अर्पित करतीं।
फिर पत्ते भी त्याग दिये । सिर्फ जल पीकर रहने लगीं।
बाद में जल भी छोड़ दिया। सिर्फ हवा और ध्यान।
शरीर कंकाल-सा हो गया – हड्डियाँ दिखने लगीं, त्वचा झुर्रीदार, लेकिन आँखों में शिव की ज्योति चमकती रही।
कई वर्षों तक बिना अन्न-जल। वे एक पैर पर खड़ी रहतीं, आँखें बंद, सिर्फ ॐ नमः शिवाय का जप। वर्षा में भीगतीं, सर्दी में बर्फ में लेटतीं, गर्मी में धूप में खड़ी रहतीं। जंगली जानवर आते, लेकिन उनकी भक्ति से वे शांत हो जाते। एक बार एक व्याघ्र (शेर) आया, लेकिन पार्वती की करुणा से वह उनका रक्षक बन गया!
उनकी तपस्या इतनी तेज हो गई कि तीनों लोक संतप्त हो उठे। देवता, असुर, ऋषि – सब कष्ट में पड़ गए। तप की अग्नि से ब्रह्मांड गर्म होने लगा।
कामदेव का प्रयास – देवताओं ने कामदेव को भेजा। उन्होंने फूलों की बौछार, सुंदर दृश्य से शिव को मोहित करने की कोशिश की। लेकिन शिव ने तीसरी आँख खोलकर उन्हें भस्म कर दिया। पार्वती नहीं डरीं – वे और गहराई में उतर गईं।
शिव की परीक्षा – शिव ने कई बार ब्राह्मण के रूप में आकर उनकी परीक्षा ली। एक बार पूछा – "तुम इतनी सुंदर हो, फिर यहाँ क्यों?" पार्वती ने जवाब दिया – "मेरा पति सिर्फ शिव हैं।"
एक बार उन्होंने शिव को बदनाम करने की कोशिश की (जैसे वे भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं), लेकिन पार्वती ने क्रोध में कहा – "मेरे स्वामी की निंदा मत करो!" शिव प्रसन्न हुए, लेकिन अभी प्रकट नहीं हुए।
देवताओं की प्रार्थना – ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र सब शिव के पास गए। बोले – "त्रिलोकी जल रही है। पार्वती की तपस्या से सृष्टि खतरे में है।" शिव मुस्कुराए और बोले – "उसकी भक्ति सच्ची है। मैं प्रसन्न हूँ।"
आखिरकार शिव प्रकट हुए – भस्म लगाए, जटा बिखरी, लेकिन आँखों में अपार करुणा।
वे बोले – "उमा... तुम्हारी भक्ति ने मुझे जीत लिया। तुम मेरी अर्धांगिनी बनो।"
पार्वती की आँखें आँसुओं से भर गईं। सालों का इंतज़ार, त्याग, कष्ट – सब फल दिया। शिव ने उन्हें उमा, गौरी, अंबिका जैसे नाम दिए।
पुराणों में कहा गया है कि पार्वती ने हजारों वर्ष तक तप किया। लेकिन समय से ज्यादा महत्वपूर्ण था उनका एकनिष्ठ प्रेम।
यह तपस्या सिखाती है:
- सच्चा प्रेम त्याग और धैर्य माँगता है।
- भक्ति में कोई बाधा नहीं – चाहे शरीर टूट जाए, मन नहीं टूटता।
- शक्ति बिना शिव के अधूरी, और शिव बिना शक्ति के शांत।
हर हर महादेव!
जय माता पार्वती!
#सीताराम
🌷जय जय सीताराम🌷
🍀“अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति !
नेक जो होती राम से, तो काहे भव-भीत”
अर्थात यह मेरा शरीर तो चमड़े से बना हुआ है जो की नश्वर है फिर भी इस चमड़ी के प्रति इतनी मोह, अगर मेरा ध्यान छोड़कर राम नाम में ध्यान लगाते तो आप भवसागर से पार हो जाते.
🍃काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान,
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान,
जब तक किसी भी व्यक्ति के मन में कामवासना की भावना, गुस्सा, अंहकार, लालच से भरा रहता है तबतक ज्ञानी और मुर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नही होता है दोनों एक ही समान के होते है।
🌴तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर,
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर,
मीठी वाणी बोलने से चारो ओर सुख का प्रकाश फैलता है और मीठी बोली से किसी को भी अपनी ओर सम्मोहित किया जा सकता है इसलिए सभी सभी मनुष्यों को कठोर और तीखी वाणी छोडकर सदैव मीठे वाणी ही बोलना चाहिए।
🍂आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई,
जाकर चित अहिगत सम भाई, अस कुमित्र परिहरेहि भलाई,
तुलसी जी कहते है की ऐसे मित्र जो की आपके सामने बना बनाकर मीठा बोलता है और मन ही मन आपके लिए बुराई का भाव रखता है जिसका मन साँप के चाल के समान टेढ़ा हो ऐसे खराब मित्र का त्याग कर देने में ही भलाई है।
🌺दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण,
तुलसीदास जी कहते है की मनुष्य को कभी भी दया का साथ नही छोड़ना चाहिए क्योकि दया ही धर्म का मूल है और उसके विपरीत अहंकार समस्त पापो की जड़ है।
🌲तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग,
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग,
तुलसी जी कहते है की इस संसार में तरह तरह के लोग है हमे सभी से प्यार के साथ मिलना जुलना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे एक नौका नदी में प्यार के साथ सफर करते हुए दुसरे किनारे तक पहुच जाती है वैसे मनुष्य भी अपने इस सौम्य व्यवहार से भवसागर के उस पार अवश्य ही पहुच जायेगा
🍃तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए,
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए,
तुलसीदास जी कहते है की हमे भगवान की ओर भरोसे करते हुए बिना किसी डर के साथ निर्भय होकर रहना चाहिए और कुछ भी अनर्थ नही होगा और अगर कुछ होना रहेगा तो वो होकर रहेगा इसलिए व्यर्थ चिंता किये बिना हमे ख़ुशी से जीवन व्यतीत करना चाहिए।
🌴काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पन्थ
सब परिहरि रघुवीरहि भजहु भजहि जेहि संत,
तुलसी जी कहते है की काम, क्रोध, लालच सब नर्क के रास्ते है इसलिए हमे इनको छोडकर ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए जैसा की संत लोग करते है।
🍀एक अच्छी ज्ञान की बात:-
इस संसार किसी आवश्यकता में हमें किसी का सहारा मिल जाना अच्छी बात है, किन्तु किसी का सहारा बन जाना उससे भी अच्छी बात है। संसार में हर कोई दूसरों से तो सहारा चाहता है मगर दूसरों को सहारा देना नहीं चाहता। सच्ची शान्ति के लिए किसी बेसहारे का सहारा बन जाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। आप आश्चर्य करेंगे कि जिस आनंद और शांति के लिए हम दर-दर भटके है, जिसके लिए हमने तीर्थों के इतने चक्कर काटे है, आखिर वह आत्मसुख बहुत सस्ते में और आसानी से मिल जाता है।
जो व्यक्ति दूसरों को सहारा देता है, उसे अपने लिए सहारा माँगना नहीं पड़ता, परमात्मा स्वतः ही दे देता है। किसी प्यासे को पानी पिलाने का, किसी गिरे हुए को उठाने का और किसी भूले को राह दिखाने का अवसर मिल जाये तो चूकना मत, क्योंकि ऐसा करने से हम बहुत ऋणों से मुक्त हो सकते है।
"नेकी कर, कुँए विच डाल"
"तेरे कर्म तेरे नाल"
🌿 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल। केशव माधव गोविंद बोल🌿
#☝आज का ज्ञान
विद्यार्थियों और बच्चों के लिए परीक्षा में सफलता, एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए माता सरस्वती के निम्नलिखित मंत्रों का जाप अत्यंत लाभकारी माना जाता है:
1. सरस्वती एकाक्षर बीज मंत्र (सबसे सरल और प्रभावशाली)
छोटे बच्चों के लिए यह मंत्र सबसे उत्तम है क्योंकि यह बहुत छोटा और जपने में आसान है।
> "ॐ ऐं" (Om Aim)
>
2. विद्या प्राप्ति मंत्र
विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र विशेष रूप से लाभदायक है। इसका जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है।
> "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वत्यै नमः"
>
3. सरस्वती गायत्री मंत्र
ज्ञान और विवेक की वृद्धि के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
> "ॐ सरस्वती देव्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्"
>
4. सफलता के लिए प्रार्थना (श्लोक)
सुबह पढ़ाई शुरू करने से पहले इस श्लोक का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है:
> "सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी ।
> विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥"
> (अर्थ: हे ज्ञान की देवी सरस्वती, मैं आपको नमन करता हूँ। मैं अपनी शिक्षा शुरू करने जा रहा हूँ, मुझे इसमें हमेशा सफलता मिले।)
>
जाप करने की विधि:
* समय: सुबह जल्दी (ब्रह्म मुहूर्त) या नहाने के बाद पूजा के समय।
* संख्या: कम से कम 11, 21, 51 या 108 बार जाप करें।
* एकाग्रता: जाप करते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें। माता सरस्वती की तस्वीर के सामने घी का दीपक या धूप जलाना और भी उत्तम रहता है।
नियमित जाप के साथ-साथ कठिन परिश्रम और आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है।
#☝आज का ज्ञान #🙏गीता ज्ञान🛕
🛐भक्ति का प्रचार भक्तों का काम है -🛐
🌍संसार में भक्ति का प्रचार करना भक्तों का काम है । भगवान् उसमें सहायता देते हैं, किन्तु काम यह भक्तों का है । भगवान् की भक्ति का प्रचार भगवान् का कर्तव्य नहीं है । भगवान् ने कहा है-🌍
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
( गीता १८ । ६८ )
👩❤️👩जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ हम किसी को शारीरिक आराम पहुँचायें यह तो सेवा है और यह परम सेवा है । 👩❤️👩
‼️हरेक आदमी जो दलाली करके सौदा पटाता है, यह सौदा पटाये । हरेक व्यक्ति को पुस्तक देकर, सत्संग में लाकर भगवान् में लगाये । सदाचार और ईश्वर दो बातों का विस्तार करे । ईश्वर का सच्चा भक्त वही है जो इसे अपना कर्तव्य माने । एक-दूसरे से मिले तब खूब मुग्ध होवे, मानो भगवान् ही मिल गये । एक बात बड़ी महत्त्व की है-परमात्मा को प्राप्त महापुरुष से हम मिलें और भगवान् के मिलन के समान खूब प्रसन्न होवें तो भगवान् के मिलने में विलम्ब नहीं है । ‼️
🙏जय श्री कृष्ण 🙏
#महाभारत
|| उत्थान और पतनके कारण ||
जब धर्मराज युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ कि भगवान् कृष्ण गोलोक चले गये तब उन्होंने अर्जुन से कहा कि 'अब हमें भी यहाँ से चल देना चाहिये।' सबने राजसी वस्त्र उतार कर वल्कल वसन पहन कर भारत की परिक्रमा प्रारम्भ की। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी नीचे दृष्टि किये परिक्रमा करते हुए हरिद्वार पहुँचे तो चार सींग, सात हाथ और तीन पैर वाले एक देवता ने आकर रास्ता रोक दिया। जब उससे पूछा कि ऐसा क्यों ? तब उसने उत्तर दिया कि कर्ज मार कर जाने वाले को रास्ता नहीं मिलता। भाई ! क्या कर्जा है तेरा ? उसने कहा कि मेरा गाण्डीव मुझे दे दो। अन्ततोगत्वा पाँचों पाण्डव द्रौपदी-सहित स्वर्गारोहण के लिये हिमालय पर पहुँच गये। वहाँ उन्होंने चारों ओर बर्फ-ही- बर्फ देखी कि एक दम धड़ाम से किसी के गिरने की आवाज आयी। भीम बोले कि 'कौन गिरा ?' देखा तो द्रौपदी गिर पड़ी थी। युधिष्ठिर बोले 'गिरनेवाले को गिरने दो। पीछे मत देखो। किसी ओर से किसी की प्रतीक्षा मत करो। यदि इस धर्ममार्ग में कोई तुम्हारे साथ नहीं आना चाहता, तो कोई बात नहीं।' यह पूछने पर कि द्रौपदी क्यों गिरी ? उन्होंने बताया कि द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डवों का एक ही साथ पाणिग्रहण हुआ था और उसे कन्या होने की शक्ति प्राप्त थी। वह जब चाहे उन पाण्डव पतियों के लिये कन्या हो जाती थी। उसने पूर्वजन्म में बड़ी तपस्या की थी। भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उसने पाँच बार 'पतिं देहि' कहा-तो शिवजी ने उसे पाँच पतियों की प्राप्ति का वरदान दे दिया। द्रौपदी मूर्च्छा खाकर गिर पड़ी। फिर शंकरजी बोले अच्छा, मैं तुझे ऐसी शक्ति देता हूँ कि तू जब चाहे कन्या बन सकती है।
एक बार युधिष्ठिर उसके पास थे— तो भीम ने देखा कि वे द्रौपदी के पैर दबा रहे थे। भीम ने कहा अरे ! यह धर्मराजजी तो नपुंसक हैं, स्त्री के पैर दबा रहे थे। उसने भगवान् कृष्ण को बताया तो वे बोले—अरे ! तू भी तो ऐसा ही करता है। भीम बोले—नहीं महाराज, तब श्रीकृष्णजी उन्हें रात्रि में घोर जंगल में ले गये और उनको एक पीपल के पेड़ पर बैठा कर बोले— भीम ! यहाँ से सब देखते रहना, डरना नहीं। वहाँ श्मशान में रात्रि में बड़ी विशाल सभा लगी, सब देवता आये। सब अपने-अपने सिंहासन पर बैठ गये। केवल एक सिंहासन खाली था। भीम ने देखा कि द्रौपदी सभा में आयी तो सब खड़े हो गये और प्रार्थना करने लगे द्रौपदी की। महाभारत का युद्ध चल रहा था, उसने बताया कि इस युद्ध में कोई जीवित नहीं बचेगा। भीम की घिग्घी बँध गयी, बोले मेरा तो हृदय बैठा जा रहा है। नीचे आकर बोले— मैं तो ऐसा नहीं समझता था। श्रीकृष्ण ने कहा कि चिन्ता न करो, मैं युद्ध में बचने का उपाय बताऊँगा। उन्होंने कहा कि इससे वरदान माँग लो कि हम पाँचों भाई युद्ध में जीवित बच जायँ—ऐसा ही हुआ। भगवान् कृष्णजी ने भी अपने लिये ऐसा ही वरदान माँगा। कहने का तात्पर्य यह है कि द्रौपदी कोई साधारण स्त्री नहीं थी, वह तो महाकाली—कालिका शक्ति थी, जो सारे महाभारत के युद्ध में खप्पर लिये घूमती रहती थी। परंतु फिर वह स्वर्ग जाते समय बीच में ही क्यों गिर पड़ी ? बताया कि वह अपने पाँचों पतियों में समान भाव से अनुरक्त न होकर अर्जुन से अधिक अनुरक्त थी, इसी पाप के कारण उसका पतन हुआ।
अब दूसरी बार गिरने की आवाज हुई तो इस बार सहदेव थे। यह क्यों गिरे ? उसे अपनी बुद्धि का बड़ा अभिमान था। वह अपने से ज्यादा किसी को भी बुद्धिमान् नहीं समझता था— इसी के कारण वह गिरा।
युधिष्ठिर सब पर बराबर निगाह रख कर सबकी कमी को जानते थे। इसके बाद नकुल धड़ाम-शब्द के साथ गिर पड़े। यह क्यों गिरे ? इन्हें अपने रूप का बड़ा घमण्ड था। वह कहते थे कि मुझे विधाता ने ऐसा रूप दिया है कि मुझे इसमें कोई नहीं हरा सकता। इसी घमण्ड के कारण वह गिरे।
इसके बाद अर्जुन गिर पड़ा—पूछा, 'वह क्यों गिरा ?' बताया कि वह कहा करता था कि वह अकेला सारे संसार को एक दिन में जीत सकता है। परंतु महाभारत के युद्ध को जीतने में उसने अठारह दिन लगा दिये। उस सत्यवादी अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर मिथ्या-भाषण एवं दर्पोक्ति की और गाण्डीव का भी अपमान हुआ। जब भीम गिर पड़े, तो बताया कि वह खाता बहुत था, कभी व्रत-उपवास नहीं रखता था। देवता एक बार भोजन करते हैं, मनुष्य दो बार, दैत्य तीन बार जबकि चार या इससे भी अधिक बार तो कुत्ता खाता है। भीम बड़ा पेटू था, भोजनभट्ट था और उसे अपने बल का, शक्ति का बड़ा घमण्ड था, अतः वह भी स्वर्गारोहण नहीं कर सका, बीच रास्ते में ही गिर गया।
अब अंत में धर्मराज और कुत्ता बाकी रह गये। सब साथ छोड़ गये। इसी प्रकार अंतकाल में सब साथ छोड़ जायँगे, केवल धर्म ही साथ जायगा। चारों ओर बर्फ- ही- बर्फ थी, हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर भारत सम्राट् धर्मराज युधिष्ठिर खड़े थे अपने कुत्ते के साथ कि उन्हें लेने स्वर्ग का विमान आया, कहा चलिये महाराज ! स्वर्ग चलिये ! धर्मराजने कहा कि पहले इस कुत्ते को विमान पर चढ़ाओ। देवताने उत्तर दिया कि यह नहीं जा सकता, आप विराजें विमान पर। तो धर्मराज ने उस कुत्ते के बिना स्वर्ग जाने से स्पष्ट मना कर दिया। जिसने अंत तक उनका मार्ग में साथ दिया, जबकि उनके भाई एवं पत्नी-तक साथ छोड़ गये। यदि धर्म में कुत्ता भी साथ दे, तो उसका भी परित्याग नहीं करना चाहिये। धर्मराज के मना करने पर तथा उनके द्वारा अपने पुण्यफल का आधा भाग प्रदान करते ही वह कुत्ता झट यमराज बन गया, और धर्मराज स्वर्गलोक को गये।
इस प्रकार यह दृष्टान्त हमें यह बोध कराता है कि भेदभाव, मिथ्या-भाषण और अहंकार से पतन होता है, जबकि धर्म मार्ग पर दृढ़ रहने से उत्थान होता है।
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❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀
#दुर्गा_मन्दिर_शक्ति_पीठ_वाटिका
#जय श्री कृष्ण
⁉️धन्य_कौन⁉️
🕉️एक बार भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के दुर्योधन के यज्ञ से निवृत्त होकर द्वारका लौटे थे। यदुकुल की लक्ष्मी उस समय ऐन्द्री लक्ष्मी को भी मात कर रही थी। सागर के मध्य स्थित श्रीद्वारका पुरी की छटा अमरावती की शोभा को भी तिरस्कृत कर रही थी। इन्द्र इससे मन-ही-मन लज्जित तथा अपनी राज्यलक्ष्मी से द्वेष-सा करने लग गये थे। हृषीकेश नन्दनन्दन की अद्भुत राज्यश्री की बात सुनकर उसे देखने को उसी समय बहुत-से राजा द्वारका पधारे। इनमें कौरव-पाण्डवों के साथ पाण्ड्य, चोल, कलिङ्ग, बाह्लीक, द्रविड़, खश आदि अनेक देशोंके राजा-महाराजा भी सम्मिलित थे।
‼️एक बार इन सभी राजा- महाराजाओं के साथ भगवान् श्रीकृष्ण सुधर्मा सभा में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे।
अन्य राजा-महाराजा गण भी चित्र-विचित्र आसनों पर यथा स्थान चारों ओर से उन्हें घेरे बैठे थे। उस समय वहाँ की शोभा बडी विलक्षण थी। ऐसा लगता था मानो देवताओं तथा असुरों के बीच साक्षात् प्रजापति ब्रह्माजी विराज रहे हों।‼️
🪴 इसी समय मेघनाद के समान तीव्र वायु का नाद हुआ और बड़े जोरों की हवा चली। ऐसा लगता था कि अब भारी वर्षा होगी और दुर्दिन-सा दीखने लग गया। पर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ जब कि इस तुमुल दुर्दिन का भेदन करके उसमें से साक्षात् देवर्षि नारद निकल पड़े। वे ठीक अग्निशिखा के सदृश नरेन्द्रों के बीच सीधे उतर पड़े। नारदजी के पृथ्वी पर उतरते ही वह दुर्दिन ( वायु-मेघादि का आडम्बर ) समाप्त हो गया। समुद्र-सदृश नृपमण्डली के बीच उतर-कर देवर्षि ने सिंहासनासीन श्रीकृष्ण की ओर मुख करके कहा— 'पुरुषोत्तम ! देवताओं के बीच आप ही परम आश्चर्य तथा धन्य हैं।' इसे सुनकर प्रभु ने कहा— 'हाँ, मैं दक्षिणाओं के साथ आश्चर्य और धन्य हूँ।' इस पर देवर्षि ने कहा— 'प्रभो ! मेरी बात का उत्तर मिल गया, अब मैं जाता हूँ।' श्रीनारद को चलते देख राजाओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कुछ भी समझ न सके कि बात क्या है। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा— 'प्रभो ! हमलोग इस दिव्य तत्त्व को कुछ जान न पाये; यदि गोप्य न हो तो इसका रहस्य हमें समझाने की कृपा करें।' इस पर भगवान् ने कहा— 'आपलोग धैर्य रखें, इसे स्वयं नारदजी ही सुना रहे हैं।' यों कहकर उन्होंने देवर्षि को इसे राजाओं के सामने स्पष्ट करने के लिये कहा।🪴
🤹नारदजी कहने लगे— "राजाओ ! सुनो — जिस प्रकार मैं इन श्रीकृष्ण के माहात्म्य को जान सका हूँ, वह तुम्हें बतलाता हूँ। एक बार मैं सूर्योदय के समय एकान्त में गङ्गा-किनारे घूम रहा था। इतने में ही वहाँ एक पर्वताकार कछुआ आया। मैं उसे देखकर चकित रह गया। मैंने उसे हाथ से स्पर्श करते हुए कहा— 'कूर्म ! तुम्हारा शरीर परम आश्चर्यमय है। वस्तुतः तुम धन्य हो। क्योंकि तुम निःशङ्क और निश्चिन्त होकर इस गङ्गा में सर्वत्र विचरते हो, फिर तुमसे अधिक धन्य कौन होगा ?' मेरी बात पूरी भी न हो पायी थी कि बिना ही कुछ सोचे वह कछुआ बोल उठा— 'मुने ! भला मुझमें आश्चर्य क्या है तथा प्रभो ! मैं धन्य भी कैसे हो सकता हूँ ? धन्य तो हैं ये देवनदी गङ्गा, जो मुझ जैसे हजारों कछुए तथा मकर, नक्र, झषादि संकुल जीवों की आश्रयभूता शरण दायिनी हैं। मेरे-जैसे असंख्य जीव इनमें भरे हैं—विचरते रहते हैं, भला इनसे अधिक आश्चर्य तथा धन्य और कौन है ?'🤹
🌍"नारदजी ने कहा, 'राजाओ ! कछुए की बात सुन कर मुझे बड़ा कुतूहल हुआ और मैं गङ्गादेवी के सामने जाकर बोला— 'सरित् श्रेष्ठे गङ्गे ! तुम धन्य हो। क्योंकि तुम तपस्वियों के आश्रमों की रक्षा करती हो, समुद्र में मिलती हो, विशालकाय श्वापदों से सुशोभित हो और सभी आश्चर्यों से विभूषित हो।' इस पर गङ्गा तुरंत बोल उठीं— 'नहीं, नहीं, देवगन्धर्व प्रिय देवर्षे ! कलहप्रिय नारद ! मैं क्या आश्चर्यविभूषित या धन्य हूँ। इस लोक में सर्वाश्चर्यकर परमधन्य तो समुद्र ही है, जिसमें मुझ-जैसी सैकड़ों बड़ी-बड़ी नदियाँ मिलती हैं।' इस पर मैंने जब समुद्र के पास जाकर उसकी ऐसी प्रशंसा की तो वह जलतल को फाड़ता हुआ ऊपर उठा और बोला— 'मुने ! मैं कोई धन्य नहीं हूँ; धन्य तो है यह वसुन्धरा, जिसने मुझ जैसे कई समुद्रों को धारण कर रखा है और वस्तुतः सभी आश्चर्यों की निवास भूमि भी यह भूमि ही है।'🌍
💦 "समुद्र के वचनों को सुनकर मैंने पृथ्वी से कहा, 'देहधारियों की योनि पृथ्वी ! तुम धन्य हो। शोभने ! तुम समस्त आश्चर्यो की निवास भूमि भी हो।' इसपर वसुन्धरा चमक उठी और बड़ी तेजी से बोल गयी— 'अरे ! ओ संग्रामकलहप्रिय नारद ! मैं धन्य-वन्य कुछ नहीं हूँ, धन्य तो हैं ये पर्वत जो मुझे भी धारण करने के कारण 'भूधर' कहे जाते हैं और सभी प्रकार के आश्चर्यों के निवास स्थल भी ये ही हैं।' मैं पृथ्वी के वचनों से पर्वतों के पास उपस्थित हुआ और कहा कि 'वास्तव में आपलोग बड़े आश्चर्यमय दीख पड़ते हैं। सभी श्रेष्ठ रत्न तथा सुवर्ण आदि धातुओं के शाश्वत आकर भी आप ही हैं, अतएव आपलोग धन्य हैं।' पर पर्वतों ने भी कहा— 'ब्रह्मर्षे ! हमलोग धन्य नहीं हैं। धन्य हैं प्रजापति ब्रह्मा और वे सर्वाश्चर्यमय जगत् के निर्माता होने के कारण आश्चर्यभूत भी हैं।'💦
🌷 “अब मैं ब्रह्माजी के पास पहुँचा और उनकी स्तुति करने लगा— 'भगवन् ! एकमात्र आप ही धन्य हैं, आप ही आश्चर्यमय हैं। सभी देव, दानव आपकी ही उपासना करते हैं। आपसे ही सृष्टि उत्पन्न होती है, अतएव आपके तुल्य अन्य कौन हो सकता है ?' इसपर ब्रह्माजी बोले— 'नारद ! इन धन्य, आश्चर्य आदि शब्दों से तुम मेरी क्यों स्तुति कर रहे हो ? धन्य और आश्चर्य तो ये वेद हैं, जिनसे यज्ञों का अनुष्ठान तथा विश्व का संरक्षण होता है।' अब मैं वेदों के पास जाकर उनकी प्रशंसा करने लगा तो उन्होंने यज्ञों को धन्य कहा। तब मैं यज्ञों की स्तुति करने लगा। इसपर यज्ञों ने मुझे बतलाया कि— 'हम धन्य नहीं, विष्णु धन्य हैं, वे ही हमलोगों की अन्तिम गति हैं। सभी यज्ञों के द्वारा वे ही आराध्य हैं।'🌷
🕉️ "तदनन्तर मैं विष्णु की गति की खोज में यहाँ आया और आप राजाओं के मध्य श्रीकृष्ण के रूप में इन्हें देखा। जब मैंने इन्हें धन्य कहा, तब इन्होंने अपने को दक्षिणाओं के साथ धन्य बतलाया। दक्षिणाओं के साथ भगवान् विष्णु ही समस्त यज्ञों की गति हैं। यहीं मेरा प्रश्न समाहित हुआ और इतने से ही मेरा कुतूहल भी निवृत्त हो गया। अतएव मैं अब जा रहा हूँ।" यों कह कर देवर्षि नारद चले गये। इस रहस्य तथा संवाद को सुन कर राजा लोग भी बड़े विस्मित हुए और सबने एकमात्र प्रभु को ही धन्यवाद, आश्चर्य एवं सर्वोत्तम प्रशंसा का पात्र माना।🕉️
➖ हरिवंश, विष्णुपर्व, अध्याय ११०, धन्योपाख्यान से
🙏ॐ_नमो_नारायणाय 🙏
🙏ॐ_नमो_भगवते_वासुदेवाय
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यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि
नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।
ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा
संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये 💞🙏💞
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