#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६४
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
चौरासीवाँ सर्ग
निषादराज गुहका अपने बन्धुओंको नदीकी रक्षा करते हुए युद्धके लिये तैयार रहनेका आदेश दे भेंटकी सामग्री ले भरतके पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोध करना
उधर निषादराज गुहने गङ्गा नदीके तटपर ठहरी हुई भरतकी सेनाको देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओंसे कहा—॥१॥
'भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्रके समान अपार दिखायी देती है; मैं मनसे बहुत सोचनेपर भी इसका पार नहीं पाता हूँ॥२॥
'निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदारके चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसीके रथपर फहरा रही है॥३॥
'मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियोंद्वारा पहले हमलोगोंको पाशोंसे बँधवायगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिताने राज्यसे निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीरामको भी मार डालेगा॥४॥
'कैकेयीका पुत्र भरत राजा दशरथकी सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मीको अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजीको वनमें मार डालनेके लिये जा रहा है॥५॥
'परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हितकी कामना रखकर तुमलोग अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो यहाँ गङ्गाके तटपर मौजूद रहो।
'सभी मल्लाह सेनाके साथ नदीकी रक्षा करते हुए गङ्गाके तटपर ही खड़े रहें और नावपर रखे हुए फल-मूल आदिका आहार करके ही आजकी रात बितावें॥७॥
'हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमेंसे एक-एक नावपर मल्लाहोंके सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्रीसे लैस होकर बैठे रहें।' इस प्रकार गुहने उन सबको आदेश दिया॥८॥
उसने फिर कहा कि 'यदि यहाँ भरतका भाव श्रीरामके प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गाके पार जा सकेगी'॥९॥
यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी (मिश्री), फलके गूदे और मधु आदि भेंटकी सामग्री लेकर भरतके पास गया॥१०॥
उसे आते देख समयोचित कर्तव्यको समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्रने विनीतकी भाँति भरतसे कहा—॥११॥
'ककुत्स्थकुलभूषण! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओंके साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीरामका सखा है। इसे दण्डकारण्यके मार्गकी विशेष जानकारी है। निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो'॥१२-१३॥
सुमन्त्रके मुखसे यह शुभ वचन सुनकर भरतने कहा—'निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें—इसकी व्यवस्था की जाय'॥१४॥
मिलनेकी अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओंके साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरतसे मिलकर बड़ी नम्रताके साथ बोला—॥१५॥
'यह वन-प्रदेश आपके लिये घरमें लगे हुए बगीचेके समान है। आपने अपने आगमनकी सूचना न देकर हमें धोखेमें रख दिया—हम आपके स्वागतकी कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवामें अर्पित है। यह निषादोंका घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें॥१६॥
'यह फल-मूल आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमेंसे कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फलका गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकारके दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें॥१७॥
'हम आशा करते हैं कि यह सेना आजकी रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकोंके साथ यहाँसे अन्यत्र जाइयेगा'॥१८॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८४॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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*इस सकल सृष्टि में हर प्राणी प्रसन्न रहना चाहता है , परंतु प्रसन्नता है कहाँ ? लोग सामान्यतः अनुभव करते हैं कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि प्रसन्नता के मुख्य सूचक हैं | यह सत्य है कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि अल्प समय के लिए एक स्तर की संतुष्टि दे सकती है | परन्तु यदि यह कथन पूर्णतयः सत्य था तब वो सभी जिन्होंने उक्त सभी को प्राप्त कर लिया है, उन्हें पूर्ण रूप से प्रसन्न होना चाहिए | हम जानते हैं कि ऐसा नहीं है | हमारे सभी भौतिक एवं मानसिक प्रयत्न हमारा समय तथा धन, हमारे सम्बन्ध प्रसन्नता को प्राप्त करने के इर्द गिर्द होते हैं | हम निरंतर इसके पीछे पड़े रहते हुए प्रतीत होते हैं | हम संसार की अधिकाधिक वस्तुओं को संग्रह करना जारी रखते हैं | ये हमे कुछ समय के लिए संतुष्टि देती है | तब पुनः हम अपनी प्रसन्नता को खो देते हैं, तथा हम दूसरे प्रकार के प्रयत्न उद्धयोग तथा संग्रह के चक्रों को आरम्भ करते हैं | हम कब यह जान पाएंगे कि प्रसन्नता उन चीजों में निहित नहीं हैं | क्या वस्तुएँ हमें प्रसन्नता को देने की अंतर्निहित क्ष्रमता प्रदान करती हैं ? क्या रोटी का टुकड़ा सभी को एक समान खाने का आनन्द देता है ? क्या लोग एक समान आम को चखने तथा खाने के दौरान अन्तर महसूस करते हैं ? क्या रोटी और आम में स्वनिर्मित ऐसे गुण निहित होते हैं, जो सभी को एकसमान प्रसन्नता प्रदान करे | क्या विद्युत रहित गाँव में एक निरक्षर व्यक्ति प्रसन्न होगा यदि उसे अत्याधुनिक लेपटॉप प्रदान किया जाय ? क्या एक गुब्बारे को एक बच्चे तथा वयस्क को पाने की प्रसन्नता एक समान होगी ? नहीं | ऐसा नहीं है |*
*आज हम इस सत्य को जान सकते हैं जब हम इसके बारे में सोंचते हैं | हम में से अधिकांश सत्य से वास्तव में अवगत होते हैं | तब हम लोग क्यों अपने बाहर की प्रसन्नता एवं भौतिक वस्तुओं में निरंतर पड़े रहते हैं ? प्रत्येक धर्म हमें सिखाता है कि हमे अपने अन्दर जाना चाहिए | क्योंकि प्रसन्नता का स्रोत हमारे अन्दर ईश्वर की चिंगारी हमारी आत्मा होती है | ईश्वर आनन्द होता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जहाँ तक जान पाया हूँ कि आत्मा का स्वभाव आनन्द होता है | यह आनन्द जब खुल जाता है, तेज़ी से चमकता है और हमें हर समय प्रसन्न बनाये रखता है | यह तब होता है जहाँ एक परम गुरु खोजकर्ता की सहायता करते हैं | जब हमारे पास एक परमगुरु होता है और हम मंत्र जाप तथा ध्यान का अभ्यास करते हैं, हम अपने अन्दर जाते हैं तथा अपने मस्तिष्क एवं विचारों का अवलोकन करते हैं | हम बाहर से अन्दर की ओर का अवलोकन करते हुए अवस्था बदलते हैं | जब हमारी आंतरिक क्रियाकलापों की समझ बढती है तब अज्ञानता की परतों से छुटकारा पाना जो आत्मा को ढके होती है तथा आत्मा के प्रकाश को देखना एवं अपने अन्दर हर समय आनन्द का अनुभव करना आसान हो जाता है | जिन लोगों के पास गुरु नहीं होता है वे स्वयं से अपने अन्दर देखना तथा अपने विचारों का अनुपालन करना सीखते हैं | तुम उभरते हुए विचारों के नमूनों को देखोगे तथा समझोगे | तुम इस ज्ञान को प्राप्त कर लोगे कि क्या पकड़ कर रखना तथा किससे छुटकारा पाना है | जब तुम्हारी ईश्वर तथा सत्य से इच्छाशक्ति दृढ़ हो जाती है, तुम्हारे गुरु तुम्हारे पास आयेंगे और आगे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे |*
*स्मरण रहे कि केवल आंतरिक प्रसन्नता स्थायी होती है | क्यों की वह आत्मा से सम्बंधित होती है |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख
#🙏 प्रेरणादायक विचार
🌟 || असंतोष से भी बचें || 🌟
हमारे जीवन के बहुत सारे दुःखों के मूल में असंतोष ही कारण होता है। असंतोषी व्यक्ति को जीवन में कभी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं। सुख अथवा प्रसन्नता किसी व्यक्ति की स्वयं की मानसिकता पर निर्भर करता है। सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है, उसमें संतोष कर लेना है।
जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं अपितु तब आता है, जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है।सोने के महल में भी आदमी दुःखी रह सकता है यदि पाने की इच्छा समाप्त न हुई हो और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो। सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है एवं यह संपदा धन से नहीं, धैर्य से प्राप्त होती है।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏 प्रेरणादायक विचार
मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥
[ कैवल्योपनिषद् १९ ]
अर्थात 👉🏻 मुझ ( ब्रह्म ) में ही सबकुछ उत्पन्न हुआ है , मुझ( ब्रह्म ) में ही सबकुछ प्रतिष्ठित है , मुझ ( ब्रह्म ) में ही सबकुछ विलीन हो जाता है , वह अद्वय ब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ ।
🌄🌄 प्रभातवंदन 🌄🌄
ब्राह्मण को सभी प्रायश्चित्त पूरी अवधि के , क्षत्रिय को तीन-चौथाई , वैश्य को आधी तथा शूद्र को एक चौथाई अवधि के ही करने चाहिए ।
जयतु धर्म सनातनः🚩
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
राजा विधवा , दुःखी , अनाथ , पतिव्रता या छोटे पुत्र वाली स्त्रियों की रक्षा करे- यदि उनका धन चोरी हो जाए तो स्वयं उन्हें धन प्रदान करे ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
राजा को राज्य में बिकने वाली वस्तुओं पर किसी भी दशा में ५% से अधिक कर नहीं लेना चाहिए ।
तथा
स्त्रियों एवं संन्यासियों से कर नहीं लेना चाहिये ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
#🚩🌺जय बद्री विशाल जय देव भूमि उत्तराखंड 🚩🙏🏻🌺 #जय बद्री विशाल
🔱बद्रीनाथ धाम की दिव्य उत्पत्ति: नारायण की लीला और महादेव का महात्याग 🔱
📕यह कथा केवल एक मंदिर के निर्माण की नहीं, बल्कि'हर'(शिव) और 'हरि' (विष्णु) के बीच के अद्भुत संबंधों की है। यह वह गाथा है जहाँ एक देवता ने स्थान पाने के लिए बाल-लीला रची, तो दूसरे ने स्थान देने के लिए सर्वस्व त्याग दिया।📕
🚩1. देवर्षि नारद का व्यंग्य और नारायण का संकल्प🚩
🛐कथा का आरंभ वैकुण्ठ लोक से होता है। एक बार देवर्षि नारद, अपनी वीणा बजाते हुए श्रीहरि विष्णु के पास पहुँचे। नारायण शेषशय्या पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी ने प्रणाम किया, किन्तु उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। उन्होंने कहा, "नारायण! नारायण! प्रभु, आप त्रिलोक के पालनहार हैं, संतों को तप और त्याग का उपदेश देते हैं। किन्तु स्वयं? स्वयं आप यहाँ क्षीरसागर में सुख-सुविधाओं के बीच, लक्ष्मी जी की सेवा का आनंद ले रहे हैं। पृथ्वी का सामान्य मनुष्य आपको देखकर विलासिता तो सीख सकता है, पर तपस्या की प्रेरणा कैसे ले?" नारद जी का यह व्यंग्य तीखा था, परंतु सत्य के निकट था। भगवान विष्णु मुस्कुराए। वे समझ गए कि नारद उन्हें एक नई लीला का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब एकांत में कठोर तप करेंगे और जगत के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे।🛐
🚩2. हिमालय की खोज और शिव का सुंदर धाम🚩
🧘तपस्या के लिए स्थान खोजने भगवान विष्णु हिमालय की ओर निकले। अलकनंदा नदी के तट पर, नर और नारायण पर्वतों के बीच उन्हें एक अत्यंत रमणीय, शांत और दिव्य स्थान दिखाई दिया। वहां का वातावरण इतना पवित्र था कि मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाए। किन्तु एक समस्या थी। वह स्थान रिक्त नहीं था। वहां एक सुंदर कुटिया थी, जिसके द्वार पर त्रिशूल गड़ा था। यह स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का प्रिय निवास स्थान था। विष्णु जी धर्मसंकट में पड़ गए। शिव जी को वहां से हटाना न तो उचित था और न ही संभव। यदि वे सीधे मांगते, तो शिव मना नहीं करते, लेकिन विष्णु जी इसे 'लीला' के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे।🧘
🚩3. नारायण बने रोता हुआ बालक🚩
🤹भगवान विष्णु ने तत्काल एक नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। एक ऐसा बालक जिसकी आभा सूर्य के समान थी, पर जो
भूख और प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से रो रहा था। वे उसी कुटिया के द्वार पर लेट गए और क्रंदन करने लगे। संयोगवश, शिव और पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। तभी माता पार्वती के कानों में एक नन्हे बालक के रोने की आवाज पड़ी। "स्वामी! सुनिए, इस निर्जन वन में किसी नवजात शिशु के रोने की ध्वनि आ रही है," पार्वती जी व्याकुल हो उठीं।
त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! उधर मत जाओ। वह कोई साधारण बालक नहीं है। यह सब माया है। उसे वहीं रहने दो।" परंतु जगत जननी माँ पार्वती का हृदय तो ममता से भरा था। उन्होंने शिव की चेतावनी अनसुनी कर दी और बोलीं, "नाथ! आप कितने कठोर हैं? एक नन्हा सा जीव द्वार पर रो रहा है और आप उसे छोड़ने को कह रहे हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकती।" पार्वती जी दौड़ी-दौड़ी गईं और उस सुंदर बालक को गोद में उठा लिया। उनके स्पर्श मात्र से बालक (विष्णु जी) चुप हो गया और मंद-मंद मुस्कुराने लगा। पार्वती जी उस पर मोहित हो
गईं।🤹
🚩4. चतुराई: द्वार बंद और गृह-प्रवेश🚩
🤱पार्वती जी ने बालक को कुटिया के भीतर सुलाया और उसे दुलारने लगीं। कुछ समय पश्चात, उन्होंने शिवजी से कहा, "स्वामी, हम स्नान के लिए तप्तकुंड (गर्म पानी का झरना) चलते हैं, तब तक बालक सो रहा है।" शिवजी ने एक बार फिर समझाया, "देवी, विचार कर लो। हम बाहर जा रहे हैं, कहीं लौटने पर यह हमारा घर ही न रहे?" पार्वती जी ने इसे मजाक समझा। दोनों स्नान के लिए चले गए। इधर, जैसे ही शिव-पार्वती आँखों से ओझल हुए, बाल रूपी विष्णु ने उठकर कुटिया का मुख्य द्वार भीतर से बंद कर लिया। जब शिव और पार्वती स्नान करके लौटे, तो देखा द्वार बंद है। पार्वती जी ने पुकारा, दरवाजा खटखटाया, पर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। पार्वती जी घबरा गईं, "अरे! बालक ने द्वार बंद कर लिया है, अब हम भीतर कैसे जाएंगे?"🤱
🚩5. महादेव का महात्याग🚩
🕉️शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। उन्होंने कहा, "उमा! मैंने तुम्हें पहले ही चेताया था। वह बालक कोई और नहीं, स्वयं नारायण हैं। उन्हें यह स्थान भा गया है और वे अब यहाँ तपस्या करना चाहते हैं।" पार्वती जी अवाक रह गईं। उन्होंने पूछा, "तो अब हम क्या करेंगे? क्या हम बलपूर्वक भीतर जाएं?" तब महादेव ने जो कहा, वह उनके 'भोलेनाथ' होने का प्रमाण है।
उन्होंने कहा, "नहीं प्रिये! यदि मेरे आराध्य ने छल से ही सही, मेरा स्थान माँगा है, तो मैं उन्हें यह दे देता हूँ। अब यह स्थान 'बद्रीनाथ' कहलाएगा। हम यहाँ से चलते हैं।"
पार्वती जी ने पूछा, "किन्तु हम रहेंगे कहाँ?" शिवजी ने केदारखंड की ओर संकेत करते हुए कहा, "हम उस ऊँचे और दुर्गम शिखर पर अपना वास बनाएंगे, जहाँ एकांत और भी गहरा है।"और इस प्रकार, भगवान शिव ने अपना बसा-बसाया घर, अपनी प्रिय कुटिया विष्णु जी के लिए छोड़ दी और स्वयं केदारनाथ चले गए।🕉️
🌺 कथा का आध्यात्मिक सार 🌺
📕यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर प्राप्ति के दो मार्ग हैं—📕
🚩* विष्णु का मार्ग (लीला): जहाँ लक्ष्य प्राप्ति के लिए युक्ति और चतुराई का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उद्देश्य लोक- कल्याण होता है।
🚩* शिव का मार्ग (त्याग): जहाँ अपनी प्रिय वस्तु भी यदि कोई मांग ले, तो बिना द्वेष के उसे सौंप दिया जाता है। इसीलिए आज भी मान्यता है कि बद्रीनाथ (विष्णु धाम) की यात्रा तब तक सफल नहीं मानी जाती, जब तक भक्त केदारनाथ (शिव धाम) के दर्शन न कर ले। क्योंकि जहाँ नारायण का निवास है, वह भूमि महादेव के त्याग की नींव पर ही टिकी है।🚩
🙏।। जय बद्रीविशाल ।।🙏
🙏।। जय बाबा केदार ।।🙏
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
सत्यवती का भीष्म से राज्य ग्रहण और संतानोत्पादन के लिये आग्रह तथा भीष्म के द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति...(दिन 321)
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वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती दीना कृपणा पुत्रगृद्धिनी । पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि स्नुषाभ्यां सह भारत ।। १ ।।
समाश्वास्य स्नुषे ते च भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् । धर्म च पितृवंशं च मातृवंशं च भाविनी । प्रसमीक्ष्य महाभागा गाङ्गेयं वाक्यमब्रवीत् ।। २ ।।
शान्तनोर्धर्मनित्यस्य कौरव्यस्य यशस्विनः । त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं च प्रतिष्ठितम् ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली सत्यवती अपने पुत्रके वियोगसे अत्यन्त दीन और कृपण हो गयी। उसने पुत्रवधुओंके साथ पुत्रके प्रेतकार्य करके अपनी दोनों बहुओं तथा शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको धीरज बँधाया। फिर उस महाभागा मंगलमयी देवीने धर्म, पितृकुल तथा मातृकुलकी ओर देखकर गंगानन्दन भीष्मसे कहा- 'बेटा! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले परम यशस्वी कुरुनन्दन महाराज शान्तनुके पिण्ड, कीर्ति और वंश ये सब अब तुम्हींपर अवलम्बित हैं ।। १-३ ।।
यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् । यथा चायुध्रुवं सत्ये त्वयि धर्मस्तथा ध्रुवः ।। ४ ।।
'जैसे शुभ कर्म करके स्वर्गलोकमें जाना निश्चित है, जैसे सत्य बोलनेसे आयुका बढ़ना अवश्यम्भावी है, वैसे ही तुममें धर्मका होना भी निश्चित है ।। ४ ।।
वेत्थ धर्मांश्च धर्मज्ञ समासेनेतरेण च । विविधास्त्वं श्रुतीर्वेत्थ वेदाङ्गानि च सर्वशः ।। ५ ।।
'धर्मज्ञ ! तुम सब धर्मोको संक्षेप और विस्तारसे जानते हो। नाना प्रकारकी श्रुतियों और समस्त वेदांगोंका भी तुम्हें पूर्ण ज्ञान है ।। ५ ।।
व्यवस्थानं च ते धर्मे कुलाचारं च लक्षये ।
प्रतिपत्तिं च कृच्छ्रेषु शुक्राङ्गिरसयोरिव ।। ६ ।।
'मैं तुम्हारी धर्मनिष्ठा और कुलोचित सदाचारको भी देखती हूँ। संकटके समय शुक्राचार्य और बृहस्पतिकी भाँति तुम्हारी बुद्धि उपयुक्त कर्तव्यका निर्णय करनेमें समर्थ है ।। ६ ।।
तस्मात् सुभृशमाश्वस्य त्वयि धर्मभृतां वर । कार्ये त्वां विनियोक्ष्यामि तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ।। ७ ।।
'अतः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्म ! तुमपर अत्यन्त विश्वास रखकर ही मैं तुम्हें एक आवश्यक कार्यमें लगाना चाहती हूँ। तुम पहले उसे सुन लो; फिर उसका पालन करनेकी चेष्टा करो ।। ७ ।।
मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान् सुप्रियश्च ते । बाल एव गतः स्वर्गमपुत्रः पुरुषर्षभ ।। ८ ।।
इमे महिष्यौ भ्रातुस्ते काशिराजसुते शुभे । रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च भारत ।। ९ ।।
तयोरुत्पादयापत्यं संतानाय कुलस्य नः । मन्नियोगान्महाबाहो धर्म कर्तुमिहार्हसि ।। १० ।।
'मेरा पुत्र और तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य जो पराक्रमी होनेके साथ ही तुम्हें अत्यन्त प्रिय था, छोटी अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गया। नरश्रेष्ठ ! उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। तुम्हारे भाईकी ये दोनों सुन्दरी रानियाँ, जो काशिराजकी कन्याएँ हैं, मनोहर रूप और युवावस्थासे सम्पन्न हैं। इनके हृदयमें पुत्र पानेकी अभिलाषा है। भारत ! तुम हमारे कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये स्वयं ही इन दोनोंके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करो। महाबाहो ! मेरी आज्ञासे यह धर्मकार्य तुम अवश्य करो ।। ८-१० ।।
राज्ये चैवाभिषिच्यस्व भारताननुशाधि च ।
दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ।। ११ ।।
'राज्यपर अपना अभिषेक करो और भारतीय प्रजाका पालन करते रहो। धर्मके अनुसार विवाह कर लो; पितरोंको नरकमें न गिरने दो' ।। ११ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथोच्यमानो मात्रा स सुहृद्भिश्च परंतपः । इत्युवाचाथ धर्मात्मा धर्म्यमेवोत्तरं वचः ।। १२ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! माता और सुहृदोंके ऐसा कहनेपर शत्रुदमन धर्मात्मा भीष्मने यह धर्मानुकूल उत्तर दिया ।। १२ ।।
असंशयं परो धर्मस्त्वया मातरुदाहृतः । राज्यार्थे नाभिषिञ्चेयं नोपेयां जातु मैथुनम् । त्वमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञां वेत्थ वै पराम् ।। १३ ।।
जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे । स सत्यवति सत्यं ते प्रतिजानाम्यहं पुनः ।। १४ ।।
'माता! तुमने जो कुछ कहा है, वह धर्मयुक्त है, इसमें संशय नहीं; परंतु मैं राज्यके लोभसे न तो अपना अभिषेक कराऊँगा और न स्त्रीसहवास ही करूँगा। संतानोत्पादन और राज्य ग्रहण न करनेके विषयमें जो मेरी कठोर प्रतिज्ञा है, उसे तो तुम जानती ही हो। सत्यवती ! तुम्हारे लिये शुल्क देनेके हेतु जो-जो बातें हुई थीं, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं। उन प्रतिज्ञाओंको पुनः सच्ची करनेके लिये मैं अपना दृढ़ निश्चय बताता हूँ ।। १३-१४ ।।
परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः । यद् वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन ।। १५ ।।
'मैं तीनों लोकोंका राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी एकदम त्याग सकता हूँ, परंतु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता ।। १५ ।।
त्यजेच्च पृथ्वी गन्धमापश्च रसमात्मनः ।
ज्योतिस्तथा त्यजेद् रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ।। १६ ।।
'पृथ्वी अपनी गंध छोड़ दे, जल अपने रसका परित्याग कर दे, तेज रूपका और वायु स्पर्श नामक स्वाभाविक गुणका त्याग कर दे ।। १६ ।।
प्रभां समुत्सृजेदों धूमकेतुस्तथोष्मताम् । त्यजेच्छब्दं तथाऽऽकाशं सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ।। १७ ।।
'सूर्य प्रभा और अग्नि अपनी उष्णताको छोड़ दे, आकाश शब्दका और चन्द्रमा अपनी शीतलताका परित्याग कर दे ।। १७ ।।
विक्रमं वृत्रहा जह्याद् धर्म जह्याच्च धर्मराट् ।
न त्वहं सत्यमुत्स्रष्टुं व्यवसेयं कथंचन ।। १८ ।।
'इन्द्र पराक्रमको छोड़ दें और धर्मराज धर्मकी उपेक्षा कर दें; परंतु मैं किसी प्रकार सत्यको छोडनेका विचार भी नहीं कर सकता ।। १८ ।।
(तन्न जात्वन्यथा कुर्या लोकानामपि संक्षये । अमरत्वस्य वा हेतोस्त्रैलोक्यसदनस्य वा ।। एवमुक्ता तु पुत्रेण भूरिद्रविणतेजसा ।) माता सत्यवती भीष्ममुवाच तदनन्तरम् ।। १९ ।।
जानामि ते स्थितिं सत्ये परां सत्यपराक्रम । इच्छन् सृजेथास्त्रींल्लोकानन्यांस्त्वं स्वेन तेजसा ।। २० ।।
जानामि चैवं सत्यं तन्मदर्थे यच्च भाषितम् । आपद्धर्म त्वमावेक्ष्य वह पैतामहीं धुरम् ।। २१ ।।
'सारे संसारका नाश हो जाय, मुझे अमरत्व मिलता हो या त्रिलोकीका राज्य प्राप्त हो, तो भी मैं अपने किये हुए प्रणको नहीं तोड़ सकता।' महान् तेजोरूप धनसे सम्पन्न अपने पुत्र भीष्मके ऐसा कहनेपर माता सत्यवती इस प्रकार बोली- 'बेटा! तुम सत्यपराक्रमी हो। मैं जानती हूँ, सत्यमें तुम्हारी दृढ़ निष्ठा है। तुम चाहो तो अपने ही तेजसे नयी त्रिलोकीकी रचना कर सकते हो। मैं उस सत्यको भी नहीं भूल सकी हूँ, जिसकी तुमने मेरे लिये घोषणा की थी। फिर भी मेरा आग्रह है कि तुम आपद्धर्मका विचार करके बाप-दादोंके दिये हुए इस राज्यभारको वहन करो ।। १९-२१ ।।
यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् । सुहृदश्च प्रहृष्येरंस्तथा कुरु परंतप ।। २२ ।।
'परंतप ! जिस उपायसे तुम्हारे वंशकी परम्परा नष्ट न हो, धर्मकी भी अवहेलना न होने पावे और प्रेमी सुहृद् भी संतुष्ट हो जायें, वही करो' ।। २२ ।।
लालप्यमानां तामेवं कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । धर्मादपेतं ब्रुवतीं भीष्मो भूयोऽब्रवीदिदम् ।। २३ ।।
पुत्रकी कामनासे दीन वचन बोलनेवाली और मुखसे धर्मरहित बात कहनेवाली सत्यवतीसे भीष्मने फिर यह बात कही- ।। २३ ।।
राज्ञि धर्मानवेक्षस्व मा नः सर्वान् व्यनीनशः । सत्याच्च्युतिः क्षत्रियस्य न धर्मेषु प्रशस्यते ।। २४ ।।
'राजमाता! धर्मकी ओर दृष्टि डालो, हम सबका नाश न करो। क्षत्रियका सत्यसे विचलित होना किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं माना गया है ।। २४ ।।
शान्तनोरपि संतानं यथा स्यादक्षयं भुवि ।
तत् ते धर्मं प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम् ।। २५ ।।
'राजमाता! महाराज शान्तनुकी संतानपरम्परा भी जिस उपायसे इस भूतलपर अक्षय बनी रहे, वह धर्मयुक्त उपाय मैं तुम्हें बतलाऊँगा। वह सनातन क्षत्रियधर्म है ।। २५ ।।
श्रुत्वा तं प्रतिपद्यस्व प्राज्ञैः सह पुरोहितैः ।
आपद्धर्मार्थकुशलैर्लोकतन्त्रमवेक्ष्य च ।। २६ ।।
उसे आपद्धर्मके निर्णयमें कुशल विद्वान् पुरोहितोंसे सुनकर और लोकतन्त्रकी ओर भी देखकर निश्चय करो ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मसत्यवतीसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-सत्यवती-संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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. “होलाष्टक”
वर्ष 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी को लगेगा, और यह 03 मार्च 2026 तक रहेगा। यह 8 दिनों का होता है, तथा इस काल में किसी भी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है, तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी से भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है, अर्थात् ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो।
इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है, जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं।
इस वर्ष होलाष्टक 24 फरवरी मंगलवार से प्रारम्भ हो रहा है, जो 03 मार्च होलिका दहन (फाल्गुन पूर्णिमा) के साथ ही समाप्त हो जाएगा, अर्थात् आठ दिनों का यह होलाष्टक दोष रहेगा। जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित है।
इस समय विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरम्भ नहीं करना चाहिए। ऐसा ज्योतिष शास्त्र का कथन है। अर्थात् इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है, तथा विवाह आदि सम्बन्ध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं, या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।
होलाष्टक से तात्पर्य है कि होली के 8 दिन पूर्व से है अर्थात धुलण्डी से आठ दिन पहले होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। इन दिनों शुभ कार्य करने की मनाही होती हैं। हिन्दू धर्मो के 16 संस्कारों को न करने की सलाह दी जाती है।
क्या करते हैं होलाष्टक में
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं। होलाष्टक आरम्भ होते ही दो डण्डों को स्थापित किया जाता है, इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से सम्बन्धित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
यह मृत्यु का सूचक है। इस दुःख के कारण होली के पूर्व 8 दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नही होता है। जब प्रह्लाद बच जाता है, उसी खुशी में होली का त्योहार मनाते हैं।
ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुनः जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।
॥जय जय श्री राधे॥













