#जय श्री कृष्ण
⁉️जब यादवों का नाश हुआ तो उद्धव जी कैसे बच गए थे?⁉️
👩❤️👩एक बार द्वारकापुरी में खेलते हुए यदुवंशी और भोजवंशी बालकों को खेल-खेल में कुछ मुनीश्वरों को चिढ़ा दिया। तब यादव कुल का नाश ही भगवान को अभीष्ट है—यह समझकर उन ऋषियों ने बालकों को शाप दे दिया ॥ 👩❤️👩
🤹इसके कुछ ही महीने बाद भावीवश वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी यादव बड़े हर्ष से रथों पर चढ़कर प्रभास क्षेत्र को गये ॥
वहाँ स्नान करके उन्होंने उस तीर्थ के जल से पितर, देवता और ऋषियों का तर्पण किया तथा ब्राह्मणों को श्रेष्ठ गौएँ दीं। उन्होंने सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, पालकी, रथ, हाथी, कन्याएँ और ऐसी भूमि जिससे जीविका चल सके तथा नाना प्रकार के सरस अन्न भी भगवत अर्पण करके ब्राह्मणों को दिये। इसके पश्चात् गौ और ब्राह्मणों के लिये ही प्राण धारण करने वाले उन वीरों ने पृथ्वी पर सिर टेककर उन्हें प्रणाम किया।🤹
🛐उद्धवजी ने कहा—फिर ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर यादवों ने भोजन और वारुणी मदिरा पी ।उससे उनका ज्ञान नष्ट हो गया और वे दुर्बचनों से एक-दूसरे के हृदय को चोट पहुँचाने लगे ।
मदिरा के नशे से उनकी बुद्धि बिगड़ गयी और जैसे आपस की रगड़ से बाँसों में आग लग जाती है, उसी प्रकार सूर्यास्त होते-होते उनमें मार-काट होने लगी ॥🛐
🕉️भगवान् अपनी माया की उन विचित्र गतियों को देखकर सरस्वती के जल से आचमन करके एक वृक्ष के नीचे बैठ गये ।
इससे पहले ही शरणगतों के दुःख दूर करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने कुल का संहार करने की इच्छा होने पर मुझसे कह दिया था कि तुम बदरिकाश्रम चले जाओ ।
विदुरजी! इससे यद्यपि मैं उनका आशय समझ गया था, तो भी स्वामी के चरणों का वियोग न सह सकने के कारण मैं पीछे-पीछे प्रभासक्षेत्र में पहुँच गया । वहाँ मैंने देखा कि जो सबके आश्रय हैं किन्तु जिनका कोई और आश्रय नहीं है, वे प्रियतम प्रभु शोभाधाम श्याम सुन्दर सरस्वती के तट पर अकेले ही बैठे हैं ॥ दिव्य विशुद्ध- सत्त्वमय अत्यन्त सुन्दर शरीर है, शान्ति से भरी रतनाऱी आँखें हैं। उनको चार भुजाएँ और रेशमी पीताम्बर देखकर मैंने उनको दूर से ही पहचान लिया ॥ वे एक पीपल के छोटे-से वृक्ष का सहारा लिये बायीं जाँघ पर दायाँ चरण कमल रखे बैठे थे। भोजन-पान का त्याग कर देने पर भी वे आनन्द से प्रफुल्लित हो रहे थे ॥
इसी समय व्यासजी के प्रिय मित्र परम भागवत सिद्ध मैत्रेयजी लोगों में स्वच्छन्द विचरते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ मैत्रेय मुनि भगवान् के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभाव से उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरि ने प्रेम एवं मुस्कान युक्त चितवन से मुझे आनन्दित हुए कहा ॥🕉️
❣️श्रीभगवान् कहने लगे—मैं तुम्हारी आन्तरिक अभिलाषा जानता हूँ; इसलिये मैं तुम्हें वह ज्ञान देता हूँ, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है। उद्धव! तुम पूर्वजन्म में वसु थे। विश्व की रचना करने वाले प्रजापतियों और वसुओं के यज्ञ में मुझे पाने की इच्छा से ही तुमने मेरी आराधना की थी । साधु स्वभाव उद्धव! संसार में तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है । क्योंकि इसमें तुमने मेरा अनूपम पद प्राप्त कर लिया है। अब मैं मर्त्यलोक को छोड़कर अपने धाम में जाना चाहता हूँ। इस समय यहाँ एकान्त में तुमसे अपनी अनन्य भक्ति के कारण ही मेरा दर्शन पाया है, यह बड़े सौभाग्य की बात है। पूर्वकाल (पाद्मकल्प)-के आरम्भ में मैंने अपने नाभिकमल पर बैठे हुए ब्रह्मा को अपनी महिमा के प्रकट करने वाले जिस श्रेष्ठ ज्ञान का उपदेश किया था और जिसे विवेकी लोग 'भागवत' कहते हैं, वही मैं तुम्हें देता हूँ ॥ विदुरजी! मुझ पर तो प्रतिक्षण उन परम पुरुष की कृपा बरस रही थी। इस समय उनके इस प्रकार आदर पूर्वक कहने से स्नेहवश मुझे रोमांच हो आया, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उस समय मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा—'स्वामिन्! आपके चरण कमलों के सेवक के लिये इस संसार में अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों में से कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है; तथापि मुझ में किसी की इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरण कमलों की सेवा के लिये ही लालायित रहता हूँ ॥ ❣️
🙏 प्रभो! आप निःस्पृह होकर भी कर्म करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, कालस्वरूप होकर भी शत्रु के डर से भागते हैं और द्वारका के किले में जाकर छिप रहते हैं तथा स्वात्माराम होकर भी सोलह हजार स्त्रियों के साथ रमण करते हैं—इन विचित्र चरित्रों को देखकर विद्वानों की बुद्धि भी चक्कर में पड़ जाती है । देव! आपका स्वरूपज्ञान सर्वथा अबाध और अखण्ड है। फिर भी आप सलाह लेने के लिये मुझे बुलाकर जो भोले मनुष्यों की तरह बड़ी सावधानी से मेरी सन्मति पूछा करते थे, प्रभो! आपकी वह लीला मेरे मन को मोहित-सा कर देती है। स्वामिन्! आपने जो अपने स्वरूप का गुह्य रहस्य प्रकट करने वाला जो परम ज्ञान ब्रह्माजी को बतलाया था, वह यदि मेरे समझने योग्य हो तो मुझे भी सुनाइये, जिससे मैं भी इस संसार-दुःख को सुगमता से पार कर जाऊँ' ॥ 🙏
🛐जब मैंने इस प्रकार अपने हृदय का भाव निवेदित किया, तब परमपुरुष कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे अपने स्वरूप को परम स्थिति का उपदेश दिया ॥
इस प्रकार पूज्यपाद गुरु श्रीकृष्ण से आत्मतत्त्व की उपलब्धि की साधना सुनकर तथा उन प्रभु के चरणोंकी वन्दना और परिक्रमा करके मैं यहीं आया हूँ। इस समय उनके विरह से मेरा चित्त अत्यन्त व्याकुल हो रहा है ॥🛐
🧘विदुरजी! पहले तो उनके दर्शन पाकर मुझे आनन्द हुआ था, किन्तु अब तो मैं हृदय की उनकी विरह व्यथा से अत्यन्त पीड़ित हूँ। अब मैं उनके प्रिय क्षेत्र बदरिकाश्रम को जा रहा हूँ, जहाँ भगवान् श्रीनारायणदेव और नर—ये दोनों ऋषि लोगों पर अनुग्रह करने के लिये दीर्घकालीन सौम्य, दूसरों को सुख पहुँचाने वाली एवं कठिन तपस्या कर रहे हैं ॥ 🧘
🛐श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजी के मुख से अपने प्रिय बन्धु-बान्धवों के विनाश का असह्य समाचार सुनकर तथा स्नेहवश विदुरजी को जो शोक उत्पन्न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञान द्वारा शान्त कर दिया ॥🛐
👩❤️👩जब भगवान् श्रीकृष्ण के परिकरों में प्रधान महाभागवत उद्धव जी बदरिकाश्रम की ओर जाने लगे, तब कुरुश्रेष्ठ विदुर जी ने श्रद्धा पूर्वक उनसे पूछा ॥ 👩❤️👩
🧘विदुरजी ने कहा—उद्धवजी! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप के गुह्य रहस्य को प्रकट करनेवाला जो परमज्ञान आपसे कहा था, वह आप हमें भी सुनाइये क्योंकि सेवक को तो अपने सेवकों का कार्य सिद्ध करने के लिये ही विचरना करते हैं ॥ 🧘
🛐उद्धवजी ने कहा - उस तत्त्वज्ञान के लिये आपको मुनिवर मैत्रेयजी की सेवा करनी चाहिए। इस मृत्युलोक को छोड़ते समय मेरे सामने स्वयं भगवान् ने ही आपको उपदेश करने के लिये आज्ञा दी थी।🛐
🙏 !!जय श्री कृष्ण !!🙏
#जय श्री कृष्ण
शीर्षक: 🚩 मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का असली कारण क्या है? 🚩
एक बार द्वारकाधीश श्री कृष्ण महल में दातुन कर रहे थे और देवी रुक्मिणी सेवा में खड़ी थीं। अचानक प्रभु जोर से हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने संकोच में पूछा- "प्रभु, क्या मुझसे कोई भूल हुई? आप अचानक क्यों हंसे?"
भगवान ने मुस्कुराते हुए सामने दीवार पर दौड़ रहे एक चींटे की ओर इशारा किया और कहा— "प्रिये, मैं इस चींटे को अब तक 14 बार 'इंद्र' बना चुका हूँ, लेकिन इसकी भोग की इच्छा (वासना) अब भी शांत नहीं हुई है। आज यह एक चींटी के पीछे पागल होकर दौड़ रहा है। अपनी माया की इसी प्रबलता को देखकर मुझे हंसी आ गई।"
इस कहानी का सार:
वासना ही पुनर्जन्म का कारण है: हम चाहे कितनी भी ऊंची पदवी पा लें, यदि मन इंद्रियों का गुलाम है, तो जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा।
तृष्णा का कोई अंत नहीं: जैसे अग्नि में घी डालने से वह और भड़कती है, वैसे ही भोगों से कामनाएं और बढ़ती हैं।
सुख का मार्ग: "नास्ति त्यागसमं सुखम्" अर्थात त्याग के समान कोई सुख नहीं है।
जब तक वासना क्षीण नहीं होती, मुक्ति संभव नहीं। मन को विषयों से हटाकर केवल प्रभु के चरणों में लगाना ही शांति का एकमात्र मार्ग है। 🙏
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख
‼️अगर मनुष्य अपनी चीज (परमात्मा)-को अपनी मान ले, परायी चीज (शरीर-संसार)-को अपनी न माने तो बस, एकदम मुक्त हो जाय‒इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । गीता में जहाँ गुणातीत महापुरुष के लक्षण लिखे हैं, वहाँ ‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (१४ । २४) लिखा है, जो अपने-आपमें, अपनी जगह स्थित हो जाता है वह सुख-दुःख में सम हो जाता है, मुक्त हो जाता है, यह जो दूसरे से आशा रखना है, यह महान् कायरता है, बड़ी भारी निर्बलता है । यह कायरता, निर्बलता अपनी बनायी हुई है, मूल में है नहीं । आप अपनी जगह बैठें, अपनी चीज को अपनी मानें, परायी चीज को अपनी न मानें‒इसमें निर्बलता, कठिनता क्या है ?‼️
👩❤️👩दूसरे लोग मेरे को क्या कहेंगे, क्या समझेंगे‒यह भय महान् अनर्थ करनेवाला है । इस भय को छोड़ कर निधड़क हो जाना चाहिये । दूसरे खराब कहते हैं तो हम डरते हैं, तो क्या दूसरे खराब नहीं कहेंगे ? वे तो जैसी मरजी होगी, वैसा कहेंगे । हम भयभीत हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे और भयभीत न हों तो भी वे वैसा ही कहेंगे । उनके मन में जैसी बात आयेगी, वैसा कहेंगे वे । क्या हमारे भयभीत होने से वे हमारे को अच्छा कहने लग जायँगे ? यह सम्भव ही नहीं है । दूसरे क्या कहते हैं‒इसको न देखकर अपनी बात पर डटे रहो, अपने काम पर ठीक रहो, यह बहुत बड़े लाभ की बात है ।👩❤️👩
🛐आपके निःशंक, निर्भय होने में एक ही बात है कि अगर आपको कोई खराब कहे तो आप अपनी दृष्टि से अपने को देखो कि मैंने तो कोई गलती नहीं की, न्यायविरुद्ध कोई काम नहीं किया । इस तरह अपने पर जितना विश्वास कर सकें, दृढता से जितना रह सकें उतना रह जाओ तो आपके सब भय मिट जायँगे । हमने जब कोई गलती नहीं की तो डर किस बात का ? अपने आचरण पर, अपने भाव पर आप दृढ़ रहो । इससे बड़ा भारी बल मिलता है । हम जब ठीक हैं, सच्चे हैं, तो फिर भय किस बात का ? अपने पर अपना विश्वास न होने से ही अनर्थ होते हैं । हम जब अपनी जगह बहुत ठीक हैं, हमारी नीयत ठीक है, कार्य ठीक है, विचार ठीक है, भाव ठीक है, तो फिर दूसरे से कभी किंचिन्मात्र भी आशा मत रखो, इच्छा मत करो कि दूसरा हमें अच्छा समझे । दूसरे के बुरा समझने से भय मत करो । दूसरा कितना ही बुरा समझे, हम तो जैसे हैं, वैसा ही रहेंगे । अगर हम अच्छे नहीं हैं और सब लोग हमें अच्छा समझते हैं, तो क्या हमारा अच्छापन सिद्ध हो जायगा ?🛐
⁉️यदि अपनी गलती अपने को नजर नहीं आये तो ?⁉️
🙏अपनी गलती अपने को नजर नहीं आने का कारण है‒स्वार्थ और अभिमान । स्वार्थ और अभिमान से ऐसा ढक्कन लग जाता है कि अपनी गलती अपने को नहीं दीखती । अतः स्वार्थ और अभिमान न करें । स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से बहुत प्रकाश मिलेगा और अपनी गलती दीखने लग जायगी ।🙏
#🕉️सनातन धर्म🚩
महर्षि याज्ञवल्क्य जयन्ती विशेष
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जीवन का परिचय
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महर्षि याज्ञवल्क्य जी का नाम एक महान अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा, श्रीरामकथा के प्रवक्ता के रूप में सबने सुना है। इनका नाम ऋषि परम्परा में बड़े आदर के साथ लिया जाता हैं। पुराणों में इन्हें ब्रह्मा जी का अवतार बताया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य वेदाचार्य महर्षि वैशम्पायन के शिष्य थे। इन्होंने अपने गुरु वैशम्पायन जी से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। एक मान्यता के अनुसार एक बार गुरु से कुछ विवाद हो जाने के कारण गुरु वैशम्पायन जी इनसे रुष्ट हो गये और कहने लगे कि तुम मेरे द्वारा पढ़ाई गई यजुर्वेद को वमन कर दो। गुरुजी की आज्ञा पाकर याज्ञवल्क्य जी ने अन्नरूप में वे सब ऋचाएं वमन कर दी जिन्हें वैशम्पायन जी के दूसरे शिष्यों ने तीतर, बनकर ग्रहण कर लिया। यजुर्वेद की वही शाखा जो तीतर बनकर ग्रहण की गयी तैतरीय शाखा के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इसके पश्चात् याज्ञवल्क्य जी एक अन्य गुरुकुल में गये वहां पर विद्याध्ययन करने लगे। इनकी सीखने की प्रवृत्ति भी तीव्र थी। ये स्वाभिमानी स्वभाव के थे। यहां भी किसी बात को लेकर गुरु के साथ इनका विवाद हो गया और इन्होंने सोचा मैं इस लोक में किसी को अपना गुरु नहीं बनाऊंगा। अब उन्होंने वेद ज्ञान व अध्यात्म के विद्या को प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया व इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इन्होंने भगवान सूर्य की उपासना की।
याज्ञवल्क्य की स्तुति प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य प्रकट हुए व कहा कि मैं आपकी जिह्वा पर साक्षात् सरस्वती को विराजमान करता हूं। इसके पश्चात् सूर्य से प्राप्त ज्ञान के आधार पर 'सरस्वती' की कृपा से इन्होंने 'शुक्ल यजुर्वेद की रचना की जो पहले से विद्यमान नहीं थी । ज्ञानार्जन में ये अपने समय के ऋषियों में अग्रणी रहे। दिनोंदिन इनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी, इनके शिष्यों की संख्या बढ़ती गयी। कहा जाता है इनके पूर्व के गुरुओं ने भी इनका शिष्यत्व ग्रहण कर अध्यात्म क्षेत्र की उच्च अवस्थाओं को इनसे जाना ।
अध्ययन के बाद इन्होंने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। इनकी पहली पत्नी का नाम कात्यायनी था। इनका एक राजपरिवार में आना जाना था। वहां के सेनापति के साथ इनके पारिवारिक संबंध थे। उसकी पुत्री मैत्रेयी इनके तेजस्वी रूप पर और उच्चतम ब्रह्मविद्या के फलस्वरूप इनके प्रति आसक्त हो गयी। जब इस बात का पता इनकी पहली पत्नी कात्यायनी को चला तो उसने याज्ञवल्क्य जी को सहर्ष मैत्रेयी से विवाह के लिए तैयार किया। इस प्रकार इनकी दूसरी शादी सम्पन्न हुई। कात्यायनी और मैत्रेयी भी अपने समय की विदुषी महिलाएं थीं। याज्ञवल्क्य मिथिला नरेश जनक के पुरोहित थे। राजा जनक सच्चे जिज्ञासु थे। वे किसी ब्रह्मनिष्ठ को अपना गुरु बनाना चाहते थे। जनक जी ने इस प्रकार उनके पांडित्य की परीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु बनाया। और उनके द्वारा ब्रह्म ज्ञान का सम्पादन किया।
याज्ञवल्क्य जी के तीन पुत्र और अनेकानेक शिष्य हुए। इनकी पत्नी पुत्र सभी उच्च कोटि के विद्वान थे ये उच्च कोटि के विद्वान् के साथ साथ एक सच्चे ब्रह्मवेत्ता योगी थे। इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें याज्ञवल्क्य स्मृति इनका प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह स्मृति ग्रंथ आचाराध्याय व्यवहाराध्याय तथा प्रयासचित्ताध्याय इन तीन भागों में विभक्त है। आचाराध्याय में वर्णक्रम धर्म-अधर्म विषयक तथा व्यवहाराध्याय में प्रायश्चित विषयक, उपदेश और आवश्यक बातें बतायी गयी हैं। इस ग्रंथ पर विज्ञानेश्वर पंडित की मिताक्षरा नामक टीका है। मिताक्षरा अति प्रसिद्ध है। ब्रिटिश काल में न्यायालयों में हिन्दुओं के धार्मिक प्रश्नों को हल करने के लिए इसका संदर्भ लिया जाता था।
याज्ञवल्क्य जी ने आयु के चौथे प्रहर में सन्यास ग्रहण किया और वन में जाकर योग साधना की। इनके सन्यास धारण की घटना भी बड़ी रोचक है। घटना इस प्रकार घटी - एक बार राजा जनक ने पूछा भगवन् वैराग्य किसे कहते हैं? आप कहते हैं कि वैराग्य के बिना मुक्ति संभव नहीं है। मुझे सत्य सुबूत जानने की बड़ी उत्कंठा है। जनक का यह प्रश्न सुनकर याज्ञवल्क्य विचार करने लगे कि जनक ने ऐसा प्रश्न क्यों किया। मूढ़ को तो वैराग्य की व्याख्या करके समझाया जा सकता है। परन्तु जनक तो तत्वज्ञानी हैं। शायद जनक वैराग्य को प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, क्योंकि वैराग्य को तो हम दोनों ही जानते हैं किन्तु उसका आचरण नहीं करते। इस प्रकार विचार कर याज्ञवल्क्य ने कहा कि राजन इस प्रश्न का उत्तर कल दूंगा।' और याज्ञवल्क्य घर जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का बंटवारा दोनों पत्नियों में बराबर करना चाहा। जिस पर मैत्रेयी ने कहा कि हे प्राणानाथ! मुझे लोक सम्पदा नहीं चाहिए। मुझे तो आप आध्यात्मिक उपदेश दीजिए जिससे मेरा कल्याण हो सके इस पर याज्ञवल्क्य ने सारी सम्पत्ति कात्यायनी को देकर मैत्रेयी को आध्यात्मिक उपदेश देते हुए मत्यु के रहस्य को समझाया।
प्रातः काल मैत्रेयी के साथ सन्यास धारण किया । यथासमय कौपीन धारण कर राजा जनक की सभा में जाकर उन्हें प्रणाम किया। राजा जनक ने विस्मित होकर पूछा कि यह क्या है? याज्ञवल्क्य ने कहा जनक यह तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। यही वैराग्य का सत्य स्वरूप है। जनक ने क्षमा मांगते हुए कहा कि मैं सत्यस्वरूप समझ गया हूं। अब आप शीघ्र ही इस वेश का त्याग करें। याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे राजन! जिस प्रकार मलमूत्र का त्यागकर पुनः उसकी ओर कोई भी दृष्टिपात की इच्छा नहीं करता। सरिता का जल पुनः पर्वत पर नहीं चढ़ता। इसी प्रकार की अनेक बातें समझाते हुए कहा कि मैं तो परमात्मा को धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने अनायास ही मुझे सांसारिक मोहमाया के बंधन से मुक्त किया है। अब पुनः इस संसार चक्र में नहीं फंसना चाहता। इस प्रकार जनक को उपदेश करते हुए राजर्षि पद को त्यागकर वे वन में गये और योग साधना में निरत हो गये।
याज्ञवल्क्य एक ब्रह्मनिष्ठ योगी थे। उन्होंने अभ्यास, वैराग्य के माध्यम से ज्ञानयोग की साधना करते हुए ब्रह्म को जाना और लोक में उसी का प्रचार किया। महर्षि अपने याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखते हैं-
इत्याचारदमाहिंसा दान स्वाध्याय कर्मणाम् । अयतु परमो धर्मों योगेनात्म दर्शनम् ॥
अर्थात् अन्य धर्मों का समादर करते हुए
योग के आचरण से परमात्मा का दर्शन करना चाहिए यही परम धर्म है।
महायोगी याज्ञवल्क्य द्वारा रचित ग्रंथ
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शिक्षा के ग्रंथों में उनके द्वारा रचित याज्ञवल्क्य शिक्षा अत्यन्त प्रसिद्ध है। उन्होंने ही लोकोपकार की दृष्टि से अपने योग ज्ञान से तीन स्मृतियों की रचना की -
1. बृहद्योगियाज्ञवल्क्य स्मृति
2. याज्ञवल्क्य स्मृति तथा
3. ब्रह्मोक्त योगि याज्ञवल्क्य संहिता।
आचार्य की मान्यता है कि अन्य सभी धर्म दोषयुक्त एवं पुनर्जन्म आदि को देने वाले है। किन्तु योग थोड़ा भी अभ्यस्त होने पर परब्रह्म क साक्षात्कारपूर्वक मोक्ष को प्रदान करने वाला है। जिस व्यक्ति ने योग का अभ्यास नहीं किया, वह चाहे जितना भी अध्ययन अध्यापन करता रहे और अहर्निश प्रवचन भी करता रहे, उससे उसे आत्मतुष्टि या परमात्म प्राप्ति की सम्भावना नहीं है वह उसका प्रलापमात्र है। इसलिए मुख्य योगशास्त्रों का अध्ययन कर बुद्धिमान मनुष्य को योग परायण होना चाहिए। अन्यथा जैसे पंख होने पर पक्षी अपने घोंसले को छोड़ देते हैं उसी प्रकार अयोगी ब्रह्मसाक्षात्कार रहित व्यक्ति का मरते समय देह भी छोड़कर किनारे हो जाते हैं।
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#जय श्री #जय श्री कृष्ण
🛐 राजज्योतिसी ने घोषणा की थी कि भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा,और कर्ण जैसे अजय वीरों के होते हुए कौरव सेना को कोई नहीं हरा सकता। ग्रह नक्षत्र पूरी तरह कौरवों के पक्ष में है। मगर दस दिन बाद हालात बदलते दिखे तब धृतराष्ट्र में फिर से ज्योतिष को बुलाया और पूछा कि सब उल्टा क्यों हो रहा है। आधी सेना समाप्त हो चुकी है। भीष्म शैय्या पर लेट चुके है।🛐
‼️तब जानते हो राज ज्योतिष ने क्या कहा " कि वहां कोई है जिसने ग्रह नक्षत्रों की दिशाएं बदल डाली है। कोई है जो समय और परिधि से परे है।" तब विदुर ने कहा " ... कृष्ण है..!""‼️
#❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
मित्रों, भागवत में लिखा है-
नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भुक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।।
अर्थात:- अपने किए कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है, फिर चाहे आज या फिर कल।
आइये जानते हैं इसका सम्पूर्ण अर्थ इस कहानी के माध्यम से
एक बड़ा ही धर्मात्मा, न्यायप्रिय और भगवद्भक्त राजा था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण भी बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।।
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उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।।
जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी एवं डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी।।
उस राजकन्या ने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं। परंतु सभा में मैं सत्य नहीं कह सकूँगी। क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर सभी को कलंक लगेगा। साथ ही इस बात पर कोई विश्वास भी नहीं करेगा।।'
प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?" कन्या ने कहा - "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा।।
फिर क्या था, पुजारी को पकड़ लिया गया और पूछा गया, कि "आपने राजकुमार को क्यों मारा?" ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।" ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा विचार करने लगा।।
बहुत देर विचार करने के बाद राजा ने ब्राह्मण से कहाः- "मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं दे सकता, लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।" ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।।
किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी! आपके पति ज्योतिषीजी महाराज कहाँ गये हैं?" तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।।"
इतने में ज्योतिषी जी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषीजी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। कुछ देर बाद वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता! कैसे आना हुआ?"
ब्राह्मण ने कहा- आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका क्या कारण है? ज्योतिषी जी ने कहा- यह मेरी पत्नी नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी- जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है । यह पत्नी नहीं, मेरा किया हुआ पूर्व का कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।।
अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े। महाराज! आपने क्या कर्म किया था?।।
ज्योतिषी जी ने कहा- सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी पत्नी गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी और कमजोर भी हो गयी थी। फोड़े में कीड़े पड़ गये जिन्हें खाने के लिये मैं इसके फोड़े में चोंच मारता और कीड़ों को खाता था। इससे जब दर्द के कारण यह कूदती थी आखिर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ भी इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी।।
मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। फिर यह गंगाजी मे प्रवेश कर गयी ऐसा सोंचकर कि पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ देगा। परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी पत्नी बनी है।।
जो कुछ दिनों और अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी, लेकिन मैंने चोंच इसको दर्द पहुंचाने के लिये नहीं मारी थी। अतः इसकी समझ भी ठीक होगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा। इसका दोष नहीं मानता क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ और प्रतिक्षा में हूँ कि कभी तो इसका स्वभाव अच्छा होगा। अब अपना प्रश्न पूछो?।।
ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः- अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया? ज्योतिषी जी ने कहा- राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है। ब्राह्मण ने पूछ किस प्रकार का कौन सा कर्म? ज्योतिषी जी ने कहा- पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गई है?"
आपने जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ अपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। इतने में जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खा गया। कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को गड़ासे से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।।
इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो। कितना सहज है ज्ञान संयुक्त जीवन! यदि हम इस कर्म सिद्धान्त को मान और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे। बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे।
#महाभारत
अश्वत्थामा की उत्पत्ति 👈
युद्ध से बहुत पहले, जब आचार्य द्रोण और माता कृपी हिमालय की शांति में तपस्या कर रहे थे, तब वे ऋषिकेश के समीप तमसा नदी के किनारे एक शांत, दिव्य गुफा में पहुँचे। वहाँ तपेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग था, जिसके समक्ष उन्होंने संतान-प्राप्ति के लिए कठोर साधना की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने आशीर्वाद दिया—और कुछ समय बाद कृपी ने तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जन्म के क्षण ही उसके कंठ से अश्व की सी ध्वनि निकली, जिससे उसका नाम अश्वत्थामा पड़ा।
जन्म से ही उसके मस्तक में एक दिव्य मणि विद्यमान थी—
एक ऐसी शक्ति जो उसे भय, भूख, थकान और यहाँ तक कि मृत्यु के कई रूपों से भी सुरक्षित रखती थी। समय के साथ यह मणि उसके गर्व और असाधारण सामर्थ्य का प्रतीक बन गई।
लेकिन जब उसने धर्म-विरुद्ध कर्म किए, तो वही मणि उसका सबसे बड़ा बोझ बन गई—और अर्जुन द्वारा उसका हटाया जाना उसके अहंकार का अंत था, ना कि उसके अस्तित्व का।महाभारत के अंतिम चरणों में जब अश्वत्थामा ने अत्यन्त अन्यायपूर्ण कार्य किया, तब स्थिति अत्यन्त संवेदनशील हो गई। श्रीकृष्ण यह भली-भाँति समझते थे कि अर्जुन के सामने केवल युद्ध का प्रश्न नहीं था—यह धर्म, क्षमा और न्याय के संतुलन की कठिन परीक्षा थी। वे अर्जुन के मन की दृढ़ता को परखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कठोर वचन कहे, ताकि स्पष्ट हो सके कि अर्जुन परिस्थिति को कैसे समझता है।
परंतु अर्जुन का स्वभाव शांत और धैर्यपूर्ण था। वह जानता था कि शीघ्र क्रोध में लिया गया निर्णय कभी धर्म की रक्षा नहीं कर सकता। इसलिए उसने अश्वत्थामा को जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के सामने प्रस्तुत किया।
गुरुपुत्र को बँधा देखकर द्रौपदी का हृदय पिघल गया। उसके मन में द्वेष का स्थान कभी नहीं था। उसने अर्जुन से कहा—
“हे अर्जुन, ये गुरुपुत्र हैं, ब्राह्मण हैं, और ब्राह्मण का अनादर भी पाप माना गया है। आचार्य द्रोण से जो ज्ञान तुम्हें मिला, वही आज तुम्हारी पहचान है। यदि अश्वत्थामा का अंत कर दिया गया, तो उनकी माता कृपी उसी प्रकार शोक में टूट जाएँगी, जैसे मैं अपने पुत्रों के लिए टूटी हूँ। मेरे पुत्र तो लौट नहीं सकते, पर किसी और माँ का दुःख मैं क्यों बढ़ाऊँ? अतः इन्हें छोड़ दिया जाए।”
द्रौपदी के इन सहृदय शब्दों से पूरा सभागृह शांत हो गया, किन्तु भीम का क्रोध अभी भी शांत नहीं था। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया—
“धर्म सरल रेखा नहीं है, अर्जुन। पतित ब्राह्मण को दण्ड देना भी कठिन है और निर्दोषों पर अत्याचार करने वाले को छोड़ देना भी। तुम्हें वह मार्ग चुनना होगा जिसमें न्याय और दया दोनों का संतुलन हो।”
अर्जुन ने वही किया—उसने न तो अश्वत्थामा को पूरी छूट दी, न कठोर दण्ड। उसने प्रतीकात्मक रूप से उसका अभिमान और दैवी शक्ति दोनों छीन लीं, ताकि वह आगे कोई अन्याय न कर सके। उसके केश काटे गए और मस्तक में स्थित दिव्य मणि निकाल ली गई, जो उसे अदम्य शक्ति प्रदान करती थी।
उस शक्ति-विहीन अवस्था में वह न तो किसी को क्षति पहुँचा सकता था, न ही अपने अहंकार के बल पर कुछ कर सकता था। अर्जुन ने उसे शिविर से बाहर भेज दिया—दण्ड भी मिला, और अनावश्यक हिंसा से बचाव भी हुआ। यही धर्म का संतुलन था।
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श्रीहरि के मत्स्य अवतार
मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया।
एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया।
एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया।
कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई।
सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।
सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा।
दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया।
यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।
तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया।
आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए।
अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं?
मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है।
मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी।
आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा।
समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए।
नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े।
सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए।
भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏 प्रेरणादायक विचार
यज्ञ में मंत्रों का ऊंचे स्वर में उच्चारण क्यो?
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कहा जाता है कि यज्ञ के जरिए देवता प्रकट होकर मनोवांछित वर देते हैं। वेद मंत्रों, यज्ञीय मंत्रों की शक्ति ऐसी होती है, जिसके द्वारा देवराज इंद्र सरीखे शक्तिशाली देवता को भी आने को विवश किया जा सकता है। यज्ञ में मंत्रों का विधिवत् उच्चारण एवं जाप, द्वारा आहुतियां देने से आकाश में जो अदृश्य आध्यात्मिक विद्युत् तरंगें फैलती हैं, वे उपस्थित लोगों के मनों से बुराइयों, पाप, द्वेष, वासना, कुटिलता, अनीति, स्वार्थपरता आदि को हटाती हैं। परिणाम यह होता है कि अनेक समस्याएं, चिंताएं, आशंकाएं, भय, आदि समूल नष्ट हो जाते हैं। मंत्रों से आच्छादित दिव्य आध्यात्मिक वातावरण में जो संतानें पैदा होती हैं, वे सद्गुणी और उच्च विचारधाराओं से परिपूर्ण होती हैं। दिव्य प्रभाव से महापुरुषों का निर्माण होता है और लोगों के अंतःकरण में प्रेम, सद्भाव, ईमानदारी, आस्तिकता, संयम आदि सद्विचार स्वयं ही प्रकट होने लगते हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में यज्ञ के अनेक प्रकार बताए गए हैं। दैनिक यज्ञों के अलावा विशिष्ट प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ कराने का विधान है। हजार, लाख और करोड़ की संख्या में मंत्रोच्चार करके यज्ञ में आहुतियां दी जाती हैं और इच्छित फल प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार मंत्र जप से उत्पन्न प्रचंड शब्द शक्ति तथा साधक के संकल्प बल से अंतरिक्ष में व्याप्त दैवी चेतना संघीभूत होकर साधक के लिए सिद्धियों के अवसर प्रदान करती है।
एक बार महाराज पृथु ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया। विधि विधानानुसार वे जब 99 यज्ञ करके अत्यंत प्रभावशाली होने लगे, तो स्वर्ग का राज छिन जाने की आशंका से इंद्र का मन विचलित होने लगा। अतः सौवें अश्वमेध यज्ञ में विघ्न डालने के लिए इंद्र ने वेष बदलकर प्रपंच द्वारा घोड़े का अपहरण कर लिया, किंतु पृथु के पुत्र ने बलपूर्वक घोड़ा छुड़ा लिया। दूसरी बार इंद्र की नीच वृत्ति से पृथु को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाकर इंद्र का नाश कर देने की घोषणा की इस पर ऋषियों ने राजा पृथु से कहा-हे नृपेन्द्र! आपके इस भयंकर बाण से तो इंद्र सहित सारे देवलोक का ही नाश हो जाएगा। आपकी इच्छा इंद्र को मारने की ही है, तो हम लोग आपके मनोरथ के नाश में लगे, अभिमानी इंद्र को सारपूर्ण मंत्रों द्वारा खींचकर इसी यज्ञ अग्नि में होम कर देंगे।
ऋषियों की वाणी सुनकर राजा पृथु ने कहा-'इस दुष्ट ने अकारण ही मेरे यज्ञ में विघ्न डाला है। अतः जब तक आप लोगों के द्वारा यज्ञीय मंत्रों से खिंचकर अधर्मी इंद्र मेरे सामने अग्निकुंड में जल नहीं जाता, मैं हाथ से धनुष नहीं त्यागूंगा।" पृथु की इच्छा पूर्ण करने के लिए ऋषि अपने हाथ में खुवा उठाकर इंद्र को उद्देश्य बनाकर यज्ञ कुंड में आहुति देने लगे। जब यज्ञीय मंत्रों से खिंचकर इंद्र अग्नि कुंड में गिरने ही वाले थे कि स्वयं ब्रह्माजी ने उपस्थित हो ऋषियों से निवेदन कर इंद्र को जलने से बचा लिया। सभी के अनुरोध और इंद्र के क्षमा मांगने पर पृथु ने उसे क्षमादान दे दिया। इस तरह देवशक्तियों पर श्रेष्ठता की विजय हुई। इस कथा से यज्ञ प्रक्रिया में मंत्रों की शक्ति का पता चलता है। 'मंत्र' संतुलित ध्वनि के द्वारा मानसिक रोगोपचार करने में भूमिका निवाहते हैं।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #ज्योतिष
हिन्दू धर्म में 7 का अंक
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👉🏿 सप्तऋषि :कष्यप, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, वशिष्ट।
👉🏿 सात छंद :गायत्री, वृहत्ती, उष्ठिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति।
👉🏿 सात योग :ज्ञान, कर्म, भक्ति, ध्यान, राज, हठ, सहज।
👉🏿 सात भूत :भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल।
👉🏿 सात वायु :प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवह, परिवह, परावह।
👉🏿 सात द्वीप :जम्बूद्वीप, पलक्ष द्वीप, कुश द्वीप, शालमाली द्वीप, क्रौंच द्वीप, शंकर द्वीप, पुष्कर द्वीप।
👉🏿 सात पाताल :अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल।
👉🏿 सात लोक :भूर्लोक, भूवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक। सत्यलोक को ही ब्रह्मलोक कहते हैं।
👉🏿 सात समुद्र :क्षीरसागर, दुधीसागर, घृत सागर, पयान, मधु, मदिरा, लहू।
👉🏿 सात पर्वत :सुमेरु, कैलाश, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सपेल? माना जाता है कि गंधमादन भी है।
👉🏿 सप्त पुरी :अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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