#❤️जीवन की सीख
प्रसंशक बने
अपने मन का अवलोकन करते हुए श्रेष्ठ के लिए सदैव संकल्पित रहें। पीठ पीछे होने वाली बातों पर ज्यादा ध्यान मत दीजिए, क्योंकि जब लोग बराबरी नहीं कर सकते तो बुराई करने लग जाते हैं।
पीठ पीछे आपकी बातें होने लगे तो व्यर्थ की बातों में विचलित होने की अपेक्षा ये समझ जाना कि आप उनसे दो कदम आगे हैं , क्योंकि बातें भी उसी की होती है, जिसमें कोई बात होती है।
प्रशंसा आपको अहमता से भर देगी और बुराई आपको सावधान करते हुए स्वयं के जीवन को निहारने का अवसर प्रदान करेगी।
छोटी-छोटी बातों को अनदेखा करके ही बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकता है। पीठ पीछे बोलने वालों की परवाह कभी मत करो,
लेकिन अपने कर्म की पवित्रता और लक्ष्य की श्रेष्ठता का ध्यान सदैव रखो। आपके प्रयास बुराई करने वालों को चुप कराने के लिए नहीं अपितु स्वयं के जीवन से बुराई मिटाने की दिशा में होने चाहिए। निर्णय आपका स्वयं विचार करें।
जय जय श्री राधे
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*इस सकल सृष्टि में समस्त जड़ चेतन के मध्य मनुष्य सिरमौर बना हुआ है | जन्म लेने के बाद मनुष्य को अपने माता - पिता एवं सद्गुरु के द्वारा सत्य की शिक्षा दी जाती है | यह सत्या आखिर है क्या ? तीनो लोक चौदहों भुवन में एक ही सत्य बताया गया है वह है परमात्मा | जिसके लिए लिखा भी गया है :-- "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या" अर्थात ब्रह्म ही सत्य है बाकी सब संसार झूठा है | सत्य को परिभाषित करते हुए परमात्मा का महिमामण्डन किया गया है :-- "सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये ! सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना: !!" अर्थात :--- जिनका व्रत (संकल्प) सत्य है , सत्य ही जिनकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है , जो तीनों कालों में , सृष्टि के पूर्व में , प्रलय के बाद एवं स्थिति में सत्यरूप से रहते हैं , जो सत्य अर्थात पृथ्वी , जल , तेज , वायु एवं आकाश के कारण हैं | उक्त पाँच महाभूतों में सत्य (अंतर्यामी) रूप से विराजमान हैं और जो इन पाँच महाभूतों के पारमार्थिक रूप हैं क्योंकि इनका नाश होने पर शेष रह जाते हैं | जो सूनृता (मधुर) वाणी और सत्य के प्रवर्तक हैं- हे भगवान्! इस प्रकार सब तरह से सत्यरूप आपकी शरण में हम प्राप्त हुए हैं | इस प्रकार परमात्मा को सत्य बताया गया है | पारलौकिक शक्तियों में यदि ब्रह्म सत्य है तो इस धरा धाम पर अटल सत्य है मृत्यु | जिसका प्राकट्य हुआ है उसका विनाश एक दिन निश्चित है | मृत्यु के लिए लिखा गया है :- "जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य च " अर्थात जो भी प्राणी जन्म ग्रहण करता है उसे समय आने पर मरना ही पड़ता है और जो मरता है उसे जन्म लेना ही पड़ता है | पुनर्जन्म सनातन धर्म की अपनी विशेषता | जीवन की समाप्ति मृत्यु से होती है इसको सभी जानते हैं परंतु मानना कोई नहीं चाहता है | संसार में मृत्यु स्पष्ट दिखाई पड़ती है लोग नित्य किसी न किसी के अंतिम संस्कार में जाते रहते हैं परंतु मृत्यु को कोई भी स्वीकार नहीं कर पाता | जिसने इस सत्य को स्वीकार कर लिया उसके मन की अशांति लुप्त हो जाती और वह मृत्यु की सत्यता को जानकर मान भी लेता है और सुखी रहता है | अनेक सुखभोग के साधन एकत्र कर लेने के बाद भी मनुष्य मृत्युरूपी परम सत्य से स्वयं को बचा नहीं सकता है क्योंकि सत्य सत्य होता है | जो सत्य होता है वह कभी परिवर्तित नहीं हो सकता |*
*आज मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया है असम्भव कार्य को सम्भव कर लेने में मनुष्य सिद्धहस्त हो गया है | आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य ने जीवन को सुचारुरूप से चालित रखने के लिए अनेकों मशीनों का आविष्कार भी कर लिया है | अस्वस्थ होकर मृत्यु के मुंह में जाने वाले प्राणी को भी इन आधुनिक मशीनों पर रखकर चिकित्सक उनके प्राणों की रक्षा करने का दम भरते हैं परन्तु उनको यह नहीं पता है कि जब जिसकी मृत्यु का समय आ जायेगा तब उसको कोई भी मशीन कोई भी उपचार बचा नहीं पायेगा | सारे प्रयास कर लेने के बाद इस सत्यता को अन्तत: स्वीकार करना ही पड़ता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इस संसार के नियम की अलौकिकता देखकर यह कह सकता हूँ कि आज तक इस मृत्युरूपी सत्य से कोई भी न तो बच पाया है और न ही बच पायेगा | अनेकों चिकित्सक , स्नेही परिजन घेरे रहते हुए प्राण बचाने का सतत् प्रयास करते रहते हैं परंतु जीव शरीर को छोड़कर चला ही जाता है | "पद्मपुराण" में बताया गया है :--- "नौषधं न तपो दानं न माता न च बान्धवा: ! शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडि़तम् !! अर्थात :- कालमृत्यु से आक्रान्त मनुष्य की रक्षा करने में औषधि , तपश्चर्या , दान और माता - पिता एवं बन्धु - बान्धव भी समर्थ नहीं नहीं हैं | क्योंकि जीवात्मा इतना सूक्ष्म है कि उसे शरीर का त्याग करते हुए कोई भी अपने चर्मचक्षुओं से नहीं देख सकता है | परंतु आज असत्य का इतना विस्तार है कि मनुष्य सृष्टि के दोनों सत्य (परमात्मा एवं मृत्यु) को भुलाये बैठा है | मृत्यु को सत्य मानकर जो भी परमात्मा की शरण में रहता है उसका लोक एवं परलोक दोनों ही संवर जाता है | क्योंकि जो सत्य है वह सत्य ही रहेगा इस सत्य को सहर्ष स्वीकार भी करना चाहिए |*
*जिस प्रकार सत्य परेशान हो सकता है परन्तु पराजित नहीं उसी प्रकार मृत्यु से बचने का प्रयास तो किया जा सकता है परंतु बचा नहीं जा सकता है क्योंकि मृत्यु ध्रुव सत्य है |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#☝आज का ज्ञान
#राधे राधे
।। आई ऋतु बसंत की गोपीन किये सिंगार।।
कुमकुम बरनी राधिका सो निरखति नंदकुमार।।1।।
आई ऋतु बसंत की मौरे सब बनराई।।
एकु न फूलै केतकी औ फूली बनजाई।।2।।
श्रीगिरिराजधरनधीर लाड़िलौ ललन - बर गाइए।।
श्रीनवनीत प्रिय लाडिलौ ललन - बर गाइए।।
श्री मदन मोहन पिय लाडिलौ ललन बर गाइए।।3।।
कुंज कुंज क्रीड़ा करैं , राजत रूप - नरेस।।
रसिक , रसिलौ , रसभर्यो , राजत श्रीमथुरेस।।4।।
श्रीगिरिराजधरनधीर लाड़िलौ ललन बर गाइए।।
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#🙏 प्रेरणादायक विचार
🪷 सुप्रभातम्🪷
जो आपकी विकट परिस्थिति में भी आपके साथ है सिर्फ उन्हीं का ख्याल करें बाकी सब तो भीड़ होती है।
जो आपके सफल होने पर आती हैं।
💐🌷🪷 जय श्री कृष्ण 🪷🌷💐
#🥶विंटर हेल्थ टिप्स 🌿 #🌿आयुर्वेदिक नुस्खों पर चर्चा
#हरड़ के स्वास्थ्य लाभ
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हरड़ के नाम से तो हम सब बचपन से ही परिचित हैं। इसके पेड़ पूरे भारत में पाये जाते हैं। इसका रंग काला व पीला होता है तथा इसका स्वाद खट्टा,मीठा और कसैला होता है। आयुर्वेदिक मतानुसार हरड़ में पाँचों रस -मधुर ,तीखा ,कड़ुवा,कसैला और अम्ल पाये जाते हैं। वैज्ञानिक मतानुसार हरड़ की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसके फल में चेब्यूलिनिक एसिड ३०%,टैनिन एसिड ३०-४५%,गैलिक एसिड,ग्लाइकोसाइड्स,राल और रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। ग्लाइकोसाइड्स कब्ज़ दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये तत्व शरीर के सभी अंगों से अनावश्यक पदार्थों को निकालकर प्राकृतिक दशा में नियमित करते हैं, यह अति उपयोगी है।
हरड़ के लाभ
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१- हरड़ के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है।
२- छोटी हरड़ को पानी में घिसकर छालों पर प्रतिदिन ३ बार लगाने से मुहं के छाले नष्ट हो जाते हैं, इसको आप रात को भोजन के बाद भी चूंस सकते हैं।
३- छोटी हरड़ को पानी में भिगो दें, रात को खाना खाने के बाद चबा चबा कर खाने से पेट साफ़ हो जाता है और गैस कम हो जाती है।
४- कच्चे हरड़ के फलों को पीसकर चटनी बना लें। एक -एक चम्मच की मात्रा में तीन बार इस चटनी के सेवन से पतले दस्त बंद हो जाते हैं।
५- हरड़ का चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में दो किशमिश के साथ लेने से अम्लपित्त (एसिडिटी ) ठीक हो जाती है।
६- हरीतकी चूर्ण सुबह शाम काले नमक के साथ खाने से कफ ख़त्म हो जाता है।
७- हरड़ को पीसकर उसमे शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आनी बंद हो जाती है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#भारत
#जम्बूद्विप के भक्त और उसके 9 खण्डो की जानकारी
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सब द्विपो के मध्य का जो जम्बूद्वीप है, उसके 9 खण्डो है।उसमें जो निवास करते है, वे हमारे राजा है,और हम उनकी प्रजा है।
1👉 इलावर्तखण्ड :- स्वामी भगवान संकर्षण है। और उनके मुख्य सेवक शंकर जी है।
2👉 रमणकखण्ड:- के अधिश्वर श्री मत्स्य भगवान है उनके सेवक मनूजी है।
3👉 हिरण्यखण्ड:- मे भगवान श्री कूर्मजी आराध्य है और अर्यमा उनके पुजारी है।
4👉 कुरूखण्ड के अधीश श्री वाराहा भगवान है और उनकी सेवा करने वाली पृथ्वी देवी है।
5👉 हरिवर्षखण्ड में श्रीनृसिह भगवान विराजते है और उनके सेवक प्रहलाद जी है।
6👉 किम्पुरूषखण्ड:- के स्वामी श्री रामचंद्र जी है, और उनकी सेवामे हनुमानजी तत्पर रहते है।
7👉 भरतगण्ड:- मे भगवान श्री नरनारायण आराध्य देव है,अनकी पूजा करने वाले नारदजी है।
8👉 भद्राश्वखण्ड:- मे हयग्रीव भगवान आराध्य है, और भद्रश्रवाजी उनके पुजारी है।
9👉 केतुमालखण्ड:- के अधिपति भगवान कामदेव है, और कमला देवी उनकी सेविका है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#गजेंद्र मोक्ष
गजेंद्र मोक्ष के रहस्य
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हम सभी बचपन से हाथी और मगर की लड़ाई की कहानी सुनते आ रहे हैं जिसमे भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से मगर यानी ग्राह का वध करते हैं ,,,
ऐसी बहुत सी पौराणिक कथाएं है जिन्हें हम सुनते रहे है। ये साधारण कहानियां नहीं है। बस इनमे छुपे महान संकेतों को समझने की आवश्यकता है ।
इनके मर्म यदि मन में आ गए तो जीवन की बहुत सी उलझनों का समाधान हो जाता है ।
गज ग्राह की यह कहानी मुझे भी कुछ नये अर्थ बताती है ,,,आपके लिए,,,
गज यानी हाथी जब अपने परिजनों और कुटुंबजनो के साथ जल विहार करता रहता है तब ग्राह यानी मगर उसका पैर पकड़ लेता है और गहरे जल में ले जाने लगता है, हाथी उससे संघर्ष करता है तब उसके परिजन भी उसे छुड़ाने में उसकी बहुत मदद करते हैं, पर उसे कोई नहीं छुड़ा पाता ,और फिर सारे परिजन उसे उसी हाल में छोड़कर अपनी दुनिया में लौट जाते हैं ,
पहली सीख 👇
कोई आपके साथ मरने वाला नहीं है एक समय तक ही हमदर्दी रहती है जब तक अपना नुकसान नहीं हो रहा है ,स्वार्थी दुनिया अंततः साथ छोड़ देती है।
फिर लड़ते लड़ते हाथी थक जाता है और उसे अपनी ताकत और इस निस्सार संसार से जब कोई सहायता नहीं मिलती तब वो प्रार्थना का सहारा लेता है ,उसी सरोवर से कमल का फूल उखाड़ कर भगवान विष्णु को आर्त भाव से पुकारता है ।
दूसरी सीख 👇
अपने पुरुषार्थ और अपनी हैसियत का अभिमान न् करें । कोई और ऐसी सत्ता है , जिसकी हम सब पर नजर है , जिसके हाथों में वक्त की और हालात बनाने बिगाड़ने की डोर है वही सबका नियंता है।
अंत में उसकी प्रार्थना से भगवान आकर के उस ग्राह का वध कर उसे उस भीषण कष्ट और मृत्यु भय से मुक्त करते है।
तीसरी सीख👇
संसार में रहो , सब काम करो पर अंत को न् भूलो ,,, और विश्वास ,प्रेम और श्रद्धा रखो की बुरे वक्त में वही एक परमशक्ति है जो संबल देती है और भयानक कष्ट से उबारती है। उसके प्रति विश्वास इतना प्रबल हो कि मौत के मुँह में जाकर भी भय व्याप्त न् हो ।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 311)
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असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु ।
अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत ।। ६३ ।।
बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ। वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ, सुनो। भारत ! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ।। ६३ ।।
शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः । अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ।। ६४ ।।
'तुम भी सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यत रहते हो। बेटा! मैं इस जगत्की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहता हूँ ।। ६४ ।।
कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् । असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ।। ६५ ।।
'गंगानन्दन ! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर हो ।। ६५ ।।
न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे । संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ।। ६६ ।।
'मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो, इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है। तुम्हारा कल्याण हो ।। ६६ ।।
अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । (चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत ।
चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।।) अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।। ६७ ।।
सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
'धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है। भारत ! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है। नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है। अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा- ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ।। ६७३ ।।
एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ।। ६८ ।।
'इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमें भी है ।। ६८ ।।
यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः । एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ।। ६९ ।।
(अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत ।
यदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ।।)
'भारत ! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या - ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है। यही वेदत्रयी पुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है। तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सब तुम्हें स्पष्ट बता दिया ।। ६९ ।।
त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत ।
नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ।। ७० ।।
'भारत ! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।। ७० ।।
सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् ।
इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ।। ७१ ।।
'इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराका निर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब-का-सब तुम्हें बता दिया' ।। ७१ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः ।
देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ।। ७२ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ।। ७२ ।।
अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् ।
तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ।। ७३ ।।
तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताके शोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ।। ७३ ।।
तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते।
वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ।। ७४ ।।
भरतश्रेष्ठ ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।। ७४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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*थोरी थोरी बैस की अहीरनि की छोरी संग,,भोरी भोरी बातनि उचारति गुमान की।।*
#राधे राधे
*कहै रतनाकर बजावति मृदंग चंग,,अंगनि उमंग भरी जोबन उठान की।।*
*घाघरे की घूमनि समेटि के कछोटी किए,,कटि-तट फेंटि कोछी कलित पिधान की।।*
*झोरी भरे रोरी धोरि केसरि कमोरी भरे,,होरी चली खेलन किसोरी बृषभान की ।।*
शीर्षक: 🌿 "अब जटा #जय श्री कृष्ण क्या सुलझाते हो प्रभु, अब तो जीवन ही सुलझा दो..." एक अद्भुत भक्त कथा 🌿
वृंदावन के एक बाबा की यह कथा आपकी आँखों में आँसू ला देगी।
एक बाबा थे, जो दिन-रात युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की उपासना में लीन रहते थे। एक दिन कुञ्जवन के रास्ते में उनकी जटा एक वटवृक्ष में बुरी तरह उलझ गई।
बाबा ने प्रयास किया, पर जटा सुलझी नहीं। संतों की हठ भी अद्भुत होती है! बाबा वहीं आसन जमाकर बैठ गए और ठान लिया—"जिसने यह जटा उलझाई है, वही सुलझाने आएगा, अन्यथा मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा।"
तीन दिन बीत गए। बाबा भूखे-प्यासे बैठे रहे।
तीसरे दिन एक 5-7 वर्ष का सांवला-सलोना ग्वाल आया और बड़े दुलार से बोला—"बाबा! तुम्हारी जटा उलझ गयी, लाओ मैं सुलझा दूँ?"
जैसे ही बालक बढ़ा, बाबा बोले—"रुक जा! हाथ मत लगाना। जिसने उलझाई है, वही सुलझाएगा। तू जा यहाँ से।"
बालक ने बहुत समझाया, पर बाबा नहीं माने। अंततः उस ग्वाल के रूप से साक्षात् मुरलीधर भगवान बांके बिहारी प्रकट हो गए।
🌸 ठाकुरजी बोले: "महात्मन! लो मैं आ गया। अब जटा सुलझा दूँ?"
बाबा ने फिर रोका—"ठहरो! पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो? द्वारिकाधीश हो, मथुराधीश हो, या यशोदानंदन हो?"
भगवान ने पूछा—"तुम्हें कौन सा चाहिए?"
बाबा बोले—"मैं तो नित्य निकुञ्ज बिहारी का उपासक हूँ।"
ठाकुरजी बोले—"मैं वही तो हूँ।"
बाबा ने फिर टोका—"नहीं! मेरे नित्य निकुञ्ज बिहारी तो मेरी स्वामिनी श्रीराधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते। तुम तो अकेले हो।"
⚡ इतना कहते ही बिजली सी चमकी और ठाकुरजी के वाम भाग में साक्षात् वृषभानु नंदिनी श्री राधिकारानी प्रकट हो गईं।
युगल सरकार का यह अद्भुत दर्शन पाकर बाबा का धैर्य टूट गया। वे फूट-फूट कर रोने लगे और चरणों में गिर पड़े।
जब युगल सरकार उनकी जटा सुलझाने आगे बढ़े, तो बाबा ने जो कहा, वह भक्ति की पराकाष्ठा थी:
😭 "प्रभु! अब जटा क्या सुलझाते हो... अब तो जीवन ही सुलझा दो।"
इतनी प्रार्थना करते ही बाबा का शरीर शांत हो गया और प्रिया-प्रियतम ने उन्हें अपनी नित्य लीला में स्थान दे दिया।
ऐसी अनन्य निष्ठा को कोटि-कोटि नमन। 🙏
।। जय जय श्री राधे ।।













