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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🥶विंटर हेल्थ टिप्स 🌿 #🌿आयुर्वेदिक नुस्खों पर चर्चा #हरड़ के स्वास्थ्य लाभ 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 हरड़ के नाम से तो हम सब बचपन से ही परिचित हैं। इसके पेड़ पूरे भारत में पाये जाते हैं। इसका रंग काला व पीला होता है तथा इसका स्वाद खट्टा,मीठा और कसैला होता है। आयुर्वेदिक मतानुसार हरड़ में पाँचों रस -मधुर ,तीखा ,कड़ुवा,कसैला और अम्ल पाये जाते हैं। वैज्ञानिक मतानुसार हरड़ की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसके फल में चेब्यूलिनिक एसिड ३०%,टैनिन एसिड ३०-४५%,गैलिक एसिड,ग्लाइकोसाइड्स,राल और रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। ग्लाइकोसाइड्स कब्ज़ दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये तत्व शरीर के सभी अंगों से अनावश्यक पदार्थों को निकालकर प्राकृतिक दशा में नियमित करते हैं, यह अति उपयोगी है। हरड़ के लाभ 🔹🔹🔹🔹 १- हरड़ के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है। २- छोटी हरड़ को पानी में घिसकर छालों पर प्रतिदिन ३ बार लगाने से मुहं के छाले नष्ट हो जाते हैं, इसको आप रात को भोजन के बाद भी चूंस सकते हैं। ३- छोटी हरड़ को पानी में भिगो दें, रात को खाना खाने के बाद चबा चबा कर खाने से पेट साफ़ हो जाता है और गैस कम हो जाती है। ४- कच्चे हरड़ के फलों को पीसकर चटनी बना लें। एक -एक चम्मच की मात्रा में तीन बार इस चटनी के सेवन से पतले दस्त बंद हो जाते हैं। ५- हरड़ का चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में दो किशमिश के साथ लेने से अम्लपित्त (एसिडिटी ) ठीक हो जाती है। ६- हरीतकी चूर्ण सुबह शाम काले नमक के साथ खाने से कफ ख़त्म हो जाता है। ७- हरड़ को पीसकर उसमे शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आनी बंद हो जाती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
🥶विंटर हेल्थ टिप्स 🌿 - हरड़ के फायदे हरड़ के फायदे - ShareChat
#भारत #जम्बूद्विप के भक्त और उसके 9 खण्डो की जानकारी 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सब द्विपो के मध्य का जो जम्बूद्वीप है, उसके 9 खण्डो है।उसमें जो निवास करते है, वे हमारे राजा है,और हम उनकी प्रजा है। 1👉 इलावर्तखण्ड :- स्वामी भगवान संकर्षण है। और उनके मुख्य सेवक शंकर जी है। 2👉 रमणकखण्ड:- के अधिश्वर श्री मत्स्य भगवान है उनके सेवक मनूजी है। 3👉 हिरण्यखण्ड:- मे भगवान श्री कूर्मजी आराध्य है और अर्यमा उनके पुजारी है। 4👉 कुरूखण्ड के अधीश श्री वाराहा भगवान है और उनकी सेवा करने वाली पृथ्वी देवी है। 5👉 हरिवर्षखण्ड में श्रीनृसिह भगवान विराजते है और उनके सेवक प्रहलाद जी है। 6👉 किम्पुरूषखण्ड:- के स्वामी श्री रामचंद्र जी है, और उनकी सेवामे हनुमानजी तत्पर रहते है। 7👉 भरतगण्ड:- मे भगवान श्री नरनारायण आराध्य देव है,अनकी पूजा करने वाले नारदजी है। 8👉 भद्राश्वखण्ड:- मे हयग्रीव भगवान आराध्य है, और भद्रश्रवाजी उनके पुजारी है। 9👉 केतुमालखण्ड:- के अधिपति भगवान कामदेव है, और कमला देवी उनकी सेविका है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
भारत - -== 7= 3> 09 षःक्ष द्वी पः E 1 10ా +11 ೨0 -== 7= 3> 09 षःक्ष द्वी पः E 1 10ా +11 ೨0 - ShareChat
#गजेंद्र मोक्ष गजेंद्र मोक्ष के रहस्य 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ हम सभी बचपन से हाथी और मगर की लड़ाई की कहानी सुनते आ रहे हैं जिसमे भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से मगर यानी ग्राह का वध करते हैं ,,, ऐसी बहुत सी पौराणिक कथाएं है जिन्हें हम सुनते रहे है। ये साधारण कहानियां नहीं है। बस इनमे छुपे महान संकेतों को समझने की आवश्यकता है । इनके मर्म यदि मन में आ गए तो जीवन की बहुत सी उलझनों का समाधान हो जाता है । गज ग्राह की यह कहानी मुझे भी कुछ नये अर्थ बताती है ,,,आपके लिए,,, गज यानी हाथी जब अपने परिजनों और कुटुंबजनो के साथ जल विहार करता रहता है तब ग्राह यानी मगर उसका पैर पकड़ लेता है और गहरे जल में ले जाने लगता है, हाथी उससे संघर्ष करता है तब उसके परिजन भी उसे छुड़ाने में उसकी बहुत मदद करते हैं, पर उसे कोई नहीं छुड़ा पाता ,और फिर सारे परिजन उसे उसी हाल में छोड़कर अपनी दुनिया में लौट जाते हैं , पहली सीख 👇 कोई आपके साथ मरने वाला नहीं है एक समय तक ही हमदर्दी रहती है जब तक अपना नुकसान नहीं हो रहा है ,स्वार्थी दुनिया अंततः साथ छोड़ देती है। फिर लड़ते लड़ते हाथी थक जाता है और उसे अपनी ताकत और इस निस्सार संसार से जब कोई सहायता नहीं मिलती तब वो प्रार्थना का सहारा लेता है ,उसी सरोवर से कमल का फूल उखाड़ कर भगवान विष्णु को आर्त भाव से पुकारता है । दूसरी सीख 👇 अपने पुरुषार्थ और अपनी हैसियत का अभिमान न् करें । कोई और ऐसी सत्ता है , जिसकी हम सब पर नजर है , जिसके हाथों में वक्त की और हालात बनाने बिगाड़ने की डोर है वही सबका नियंता है। अंत में उसकी प्रार्थना से भगवान आकर के उस ग्राह का वध कर उसे उस भीषण कष्ट और मृत्यु भय से मुक्त करते है। तीसरी सीख👇 संसार में रहो , सब काम करो पर अंत को न् भूलो ,,, और विश्वास ,प्रेम और श्रद्धा रखो की बुरे वक्त में वही एक परमशक्ति है जो संबल देती है और भयानक कष्ट से उबारती है। उसके प्रति विश्वास इतना प्रबल हो कि मौत के मुँह में जाकर भी भय व्याप्त न् हो । साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गजेंद्र मोक्ष - धर्जैद्रघ्चीक्षके रहस्थ धर्जैद्रघ्चीक्षके रहस्थ - ShareChat
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 311) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु । अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत ।। ६३ ।। बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ। वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ, सुनो। भारत ! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ।। ६३ ।। शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः । अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ।। ६४ ।। 'तुम भी सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यत रहते हो। बेटा! मैं इस जगत्‌की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहता हूँ ।। ६४ ।। कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् । असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ।। ६५ ।। 'गंगानन्दन ! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर हो ।। ६५ ।। न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे । संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ।। ६६ ।। 'मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो, इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है। तुम्हारा कल्याण हो ।। ६६ ।। अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । (चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत । चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।।) अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।। ६७ ।। सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । 'धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है। भारत ! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है। नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है। अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा- ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ।। ६७३ ।। एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ।। ६८ ।। 'इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमें भी है ।। ६८ ।। यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः । एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ।। ६९ ।। (अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत । यदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ।।) 'भारत ! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या - ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है। यही वेदत्रयी पुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है। तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सब तुम्हें स्पष्ट बता दिया ।। ६९ ।। त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत । नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ।। ७० ।। 'भारत ! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।। ७० ।। सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् । इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ।। ७१ ।। 'इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराका निर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब-का-सब तुम्हें बता दिया' ।। ७१ ।। वैशम्पायन उवाच ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः । देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ।। ७२ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ।। ७२ ।। अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् । तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ।। ७३ ।। तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताके शोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ।। ७३ ।। तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते। वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ।। ७४ ।। भरतश्रेष्ठ ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।। ७४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमह्ाभखतमू श्रीमह्ाभखतमू - ShareChat
*थोरी थोरी बैस की अहीरनि की छोरी संग,,भोरी भोरी बातनि उचारति गुमान की।।* #राधे राधे *कहै रतनाकर बजावति मृदंग चंग,,अंगनि उमंग भरी जोबन उठान की।।* *घाघरे की घूमनि समेटि के कछोटी किए,,कटि-तट फेंटि कोछी कलित पिधान की।।* *झोरी भरे रोरी धोरि केसरि कमोरी भरे,,होरी चली खेलन किसोरी बृषभान की ।।*
राधे राधे - ShareChat
शीर्षक: 🌿 "अब जटा #जय श्री कृष्ण क्या सुलझाते हो प्रभु, अब तो जीवन ही सुलझा दो..." एक अद्भुत भक्त कथा 🌿 वृंदावन के एक बाबा की यह कथा आपकी आँखों में आँसू ला देगी। एक बाबा थे, जो दिन-रात युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की उपासना में लीन रहते थे। एक दिन कुञ्जवन के रास्ते में उनकी जटा एक वटवृक्ष में बुरी तरह उलझ गई। बाबा ने प्रयास किया, पर जटा सुलझी नहीं। संतों की हठ भी अद्भुत होती है! बाबा वहीं आसन जमाकर बैठ गए और ठान लिया—"जिसने यह जटा उलझाई है, वही सुलझाने आएगा, अन्यथा मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा।" तीन दिन बीत गए। बाबा भूखे-प्यासे बैठे रहे। तीसरे दिन एक 5-7 वर्ष का सांवला-सलोना ग्वाल आया और बड़े दुलार से बोला—"बाबा! तुम्हारी जटा उलझ गयी, लाओ मैं सुलझा दूँ?" जैसे ही बालक बढ़ा, बाबा बोले—"रुक जा! हाथ मत लगाना। जिसने उलझाई है, वही सुलझाएगा। तू जा यहाँ से।" बालक ने बहुत समझाया, पर बाबा नहीं माने। अंततः उस ग्वाल के रूप से साक्षात् मुरलीधर भगवान बांके बिहारी प्रकट हो गए। 🌸 ठाकुरजी बोले: "महात्मन! लो मैं आ गया। अब जटा सुलझा दूँ?" बाबा ने फिर रोका—"ठहरो! पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो? द्वारिकाधीश हो, मथुराधीश हो, या यशोदानंदन हो?" भगवान ने पूछा—"तुम्हें कौन सा चाहिए?" बाबा बोले—"मैं तो नित्य निकुञ्ज बिहारी का उपासक हूँ।" ठाकुरजी बोले—"मैं वही तो हूँ।" बाबा ने फिर टोका—"नहीं! मेरे नित्य निकुञ्ज बिहारी तो मेरी स्वामिनी श्रीराधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते। तुम तो अकेले हो।" ⚡ इतना कहते ही बिजली सी चमकी और ठाकुरजी के वाम भाग में साक्षात् वृषभानु नंदिनी श्री राधिकारानी प्रकट हो गईं। युगल सरकार का यह अद्भुत दर्शन पाकर बाबा का धैर्य टूट गया। वे फूट-फूट कर रोने लगे और चरणों में गिर पड़े। जब युगल सरकार उनकी जटा सुलझाने आगे बढ़े, तो बाबा ने जो कहा, वह भक्ति की पराकाष्ठा थी: 😭 "प्रभु! अब जटा क्या सुलझाते हो... अब तो जीवन ही सुलझा दो।" इतनी प्रार्थना करते ही बाबा का शरीर शांत हो गया और प्रिया-प्रियतम ने उन्हें अपनी नित्य लीला में स्थान दे दिया। ऐसी अनन्य निष्ठा को कोटि-कोटि नमन। 🙏 ।। जय जय श्री राधे ।।
जय श्री कृष्ण - अब तो जीवन ही सुलझा दो राधे- कृष्ण ।। जय श्री I अब तो जीवन ही सुलझा दो राधे- कृष्ण ।। जय श्री I - ShareChat
#शिव पार्वती #🔱महाशिवरात्रि Coming Soon 🪔 #🙏शिव पार्वती शीर्षक: 🕉️🔥 जब प्रेम की अग्नि में सती हुई 'सती': शिव और शक्ति के अमर प्रेम की गाथा 🔥🕉️ यह कथा है उस प्रेम की, जिसने सृष्टि को हिला दिया, जिसने त्याग की पराकाष्ठा को छुआ। दक्ष प्रजापति ने कठोर तप से माँ आद्या शक्ति को पुत्री 'सती' के रूप में प्राप्त किया। ब्रह्मा जी के परामर्श पर सती का विवाह आदि पुरुष भगवान शिव से हुआ। किंतु, एक सभा में शिव द्वारा खड़े होकर सम्मान न दिए जाने पर अहंकारी दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा और शिव से बैर पाल लिया। दक्ष का महायज्ञ और सती का हठ: एक बार दक्ष ने कनखल में एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। आकाश मार्ग से जाते देवताओं को देख सती ने शिव से वहां जाने का हठ किया। शिव ने बहुत समझाया कि "बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए", पर सती नहीं मानीं। शिव ने उन्हें वीरभद्र के साथ भेज दिया। अपमान की अग्नि: दक्ष के घर पहुँचकर सती को घोर अपमान का सामना करना पड़ा। दक्ष ने शिव के लिए कटु शब्द कहे: "तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है।" सती ने यज्ञमंडप में देखा कि सभी देवताओं का भाग है, पर उनके स्वामी शिव का नहीं। सती का आत्मदाह: पति का यह अपमान सती से सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधित होकर कहा: "जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्द सुनती है, उसे नरक मिलता है। मैं अब एक क्षण भी जीवित नहीं रहना चाहती।" और सती ने योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया। 🔥 शिव का तांडव और शक्तिपीठों का निर्माण: समाचार मिलते ही शिव प्रलयंकार रूप में वहां पहुंचे। वीरभद्र ने दक्ष का वध किया। सती के जले हुए शरीर को देखकर शिव अपनी सुध-बुध खो बैठे। वे सती के शव को कंधे पर उठाकर उन्मत्त होकर तीनों लोकों में घूमने लगे। सृष्टि थम गई। अंततः, भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के अंगों को काटा। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहां 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए। धन्य है शिव और सती का यह अलौकिक प्रेम, जिसने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया। हर हर महादेव! 🙏🌹
शिव पार्वती - शिव और सती का अमर प्रेम प्रेम, त्याग और शक्तिपीठों की गाथा शिव और सती का अमर प्रेम प्रेम, त्याग और शक्तिपीठों की गाथा - ShareChat
#धर्म कर्म #🕉️सनातन धर्म🚩 🐏 धर्म और अधर्म का भेद 🐏 🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏 #महर्षिपतंजलि के अनुसार #धर्म का आधार यम नियम अर्थात सामाजिक एवं व्यक्तिगत नैतिकता एवं आत्म अनुशासन है l सनातन धर्म के शास्त्रों के अध्ययन से पता चलता है कि धर्म की स्थापना आत्मकल्याण के लिये की गयी थी l धर्म जीवन को सही दिशा में ले जाता है जबकि अधर्म उससे भटकाता है l धर्म उचित-अनुचित, नैतिक अनैतिक, मर्यादित अमर्यादित के भेद को समझकर सत्य और न्यायसंगत मार्ग पर चलते हुए आत्म कल्याण करना है l इसके विपरीत अधर्म का आधार अनुचित, अनैतिकता, स्वार्थ, हिंसा और कुकृत्य है, जो अशांति व दुख का कारण बनता है। इस प्रकार धर्म जीवन को सही मार्गदर्शन करता है जबकि अधर्म सही मार्ग से भटकाकर धर्म विरुद्ध आचरण के लिए प्रेरित करना ही अधर्म है* l 🐏 *धर्म और अधर्म में मुख्य अंतर*: 🐏 🐏 *धर्म* : *यह सत्य, अहिंसा, त्याग, दया, संतोष, आत्म-नियंत्रण, नैतिकता, कर्तव्यपरायणता और मन की पवित्रता को दर्शाता है। यह आत्मा को ऊपर उठाता है*। 🦀 *अधर्म* : *यह झूठ, छल, लालच, क्रोध, स्वार्थ और दूसरों को दुख पहुँचाना है। यह प्रकृति के विरुद्ध और विनाशकारी है*। 🌹संदेश:: *प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कोई भी कर्म करते समय यह विचार अवश्य करना चाहिये की वह किन विचारों के साथ जीवन जी रहा है और उसके कर्म पाप का संचय कर रहे हैं अथवा पुण्यों का अर्थात वह धर्म अधर्म में से किस मार्ग पर चल रहा है l हमेशा ध्यान रखिये* 🐏 *धर्म के अनुसरण से दिव्य शक्तियों की एवं दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है साथ ही मान सम्मान, यश और मानसिक शांति मिलती है वहीं अधर्म से अज्ञान, जड़ता, मूढमति और पापों का संचय होता है* l *अतः धर्म के मूलभूत सिद्धांतो का अनुसरण करना चाहिए* l 🦀 *अधर्म के अनुसरण से अधोगति प्राप्त होती है* 🦀 *और* 🌹 *धर्म के अनुसरण से दिव्य लोकों की प्राप्ति* 🌹 🦀 *गुरु द्रोण द्वारा अधर्म के पक्ष का परिणाम* 🦀 🐏 *गुरु द्रोणाचार्य द्वारा महाभारत युद्ध में कौरवों (अधर्म) का पक्ष लेने का परिणाम उनके लिए अत्यंत विनाशकारी रहा। क्षत्रीय वीरों को शस्त्र विद्या का ज्ञान देने वाले पूज्यनीय गुरु द्रोणाचार्य को न केवल अपनी यश-कीर्ति खोनी पड़ी, बल्कि अंत में उन्हें युद्ध के नियमों के विरुद्ध छल (युधिष्ठिर के अश्वत्थामा हतो हतः के अर्धसत्य) के बाद धृष्टद्युम्न द्वारा निहत्था अवस्था में मार दिया गया, जो उनके अधर्म का पक्ष लेने के कर्मों की परिणति थी* । 🦀 *अधर्म के पक्ष के कारण द्रोण के जीवन पर प्रभाव*: 🦀 🪾 *अपमानजनक मृत्यु*: *धर्म का साथ न देने के कारण, द्रोणाचार्य को युद्ध के 15वें दिन अपने ही शिष्य धृष्टद्युम्न के हाथों मृत्यु प्राप्त हुई, जिनका जन्म ही द्रोण का वध करने के लिए हुआ था* । 🪾 *ऋषियों द्वारा चेतावनी*: *जब वे पाण्डवों की ओर से* ( धर्म के लिये) *लड़ रहे योद्धाओं का विनाश कर रहे थे, तब अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप आदि ऋषियों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि उनका युद्ध अधर्म पर आधारित है, जिससे उनका* 🌹*यश नष्ट* 🦀 *हो रहा है* । 🦀 *मानसिक और नैतिक पतन*: *पुत्र मोह* *और हस्तिनापुर के प्रति नमक का ऋण के कारण, उन्हें द्रोपदी के चीरहरण जैसे घिनौने कृत्य और अभिमन्यु की मृत्यु जैसी घटनाओं में मूकदर्शक या सहायक बनना पड़ा, जो उनके लिए नैतिक रूप से पतनकारी था* । 🦀 *अल्पकालिक नरक* : *युधिष्ठिर द्वारा बोले गए अर्धसत्य (*अश्वत्थामा की मृत्यु*) *को सुनकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए थे, जो उनके अंत का कारण बना और कहा जाता है कि इस अधर्म के पक्ष के कारण उन्हें अल्प समय के लिए नरक भोगना पड़ा*। 🦀 *संक्षेप में*, *गुरु द्रोण का अधर्म के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए एक उच्च श्रेणी के आचार्य से एक साधारण सिपाही की तरह मृत्यु प्राप्त करने का कारण बना* । 🌹 *धर्म के अनुसरण की परिणति की पौराणिक कथा* 🌹 🐏 *मार्कण्डेय ऋषि की कथा धर्म के पालन और शिवभक्ति से अकाल मृत्यु पर विजय और अमरता (दीर्घायु) की प्राप्ति का सर्वोत्तम पौराणिक उदाहरण है*। *शिवभक्त मृकण्डु ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय को अल्पायु योग का वरदान था और आयु केवल 16 वर्ष थी, लेकिन उन्होंने शिव की निरंतर भक्ति और धर्मपरायणता से यमराज को भी विवश कर दिया और चिरंजीवी होने का वरदान पाया*। 🐏 *मार्कण्डेय की पौराणिक कथा* (*धर्म की शक्ति*): *नियति और धर्म*: *मार्कण्डेय को पता था कि उनकी मृत्यु निकट है, फिर भी उन्होंने भयभीत होने के बजाय शिव की आराधना और धर्म के मार्ग को चुना* । *अंतिम समय*: *जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तब मार्कण्डेय शिवलिंग को कसकर पकड़कर महामृत्युंजय मंत्र का पाठ कर रहे थे*। *परिणाम*: *मार्कण्डेय की सच्ची भक्ति और धर्म-अनुसरण को देखकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और यमराज को वापस जाने का आदेश दिया। शिव ने मार्कण्डेय को 16 वर्ष की आयु में ही अमर रहने का वरदान दिया* । *निष्कर्ष*: *यह कथा सिखाती है कि धर्म* (*कर्तव्य और ईश्वर भक्ति*) *का पालन करने वालों की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं और वे विपत्ति में भी विजयी होते हैं* । *अन्य उदाहरण*: 🐏 *मनु और प्रलय*: *धर्म और सत्य का आचरण करने वाले मनु ने प्रलय काल में भगवान विष्णु* (*मत्स्य अवतार*) *की कृपा प्राप्त की और मानवता के नए अध्याय के रचयिता बने* । 🐏 *राजा हरिश्चंद्र*: *सत्य और धर्म पर टिके रहने के कारण ही उन्हें अंत में स्वर्ग और अमर कीर्ति प्राप्त हुई* । *ये कथाएं बताती हैं कि धर्म ही सर्वोच्च शक्ति है, जिससे सुख, समृद्धि और अमरत्व प्राप्त होता है* । 🐏 *शास्त्रों में नंदी को धर्म का स्वरुप कहा है जबकि गाय को पृथ्वी कहा गया है l आपके जीवन में धर्म बना रहे इसके लिए नन्दी ( सांड ) को शुद्ध आहार खिलाएं और आपके आहार में सात्विकता हो इसके लिये गौमाता की रक्षा, सेवा करें* l 🙏🌹 *आपको सुविचारित करना ही मेरा ध्येय है, आपमें आध्यात्मिक रुचि उत्पन्न करना मेरा दूसरा ध्येय है एवं ऋषि, मुनियों के ज्ञान से समृद्ध लेख लिखकर आपकी आत्मिक उन्नति मेरा अंतिम ध्येय है* l🌹🙏 🐏 *आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान fallow करें l महर्षि पतंजलि एवं महर्षि वेदव्यास जी को आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिये एवं प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी को शब्दों का ज्ञान ( ब्रह्म ज्ञान) देने के लिये हार्दिक आभार एवं कोटि कोटि नमन* l 🙏 🌹 🌹 🙏 🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹
धर्म कर्म - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 यह कथा उस गूढ़ रहस्य को खोलती है, जो केवल शिशुपाल के वध तक सीमित नहीं, बल्कि सृष्टि के तीन युगों—सत्य, त्रेता और द्वापर—में फैली हुई एक दिव्य योजना का हिस्सा है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, भगवान के हाथों प्राप्त मृत्यु मोक्ष का द्वार खोल देती है। शिशुपाल के साथ भी यही हुआ, पर इसके पीछे का कारण एक अत्यंत प्राचीन प्रसंग से जुड़ा है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण और महाभारत दोनों में मिलता है। आइए, इस रहस्यपूर्ण इतिहास को क्रम से समझते हैं। वैकुंठ का द्वार और श्राप की शुरुआत भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ में जय और विजय नामक दो द्वारपाल सदैव सेवा में तत्पर रहते थे। एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र—सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार—भगवान के दर्शन हेतु वैकुंठ पधारे। महान तपस्वी और ब्रह्मपुत्र होने के कारण उनका कहीं भी निर्बाध गमन स्वाभाविक था। किन्तु उनके तेज और महिमा से अनभिज्ञ जय–विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। बार-बार आग्रह के बावजूद जब प्रवेश न मिला, तो क्रोधित होकर सनतकुमारों ने दोनों को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया। नारायण का आगमन और दो मार्ग उसी क्षण स्वयं नारायण द्वार पर प्रकट हुए और अतिथियों का सम्मान किया। जय–विजय ने हृदय से क्षमा याचना की और श्राप निवृत्ति की प्रार्थना की। सनतकुमारों ने कहा कि श्राप टल नहीं सकता, पर भगवान चाहें तो मुक्ति का मार्ग दे सकते हैं। तब नारायण ने कहा— “श्राप का सम्मान बना रहना चाहिए, किन्तु मैं तुम्हें यह वर देता हूँ कि अंततः तुम दोनों पुनः मेरे पास लौट आओगे।” जय–विजय ने पूछा, “प्रभु, इसमें कितना समय लगेगा?” नारायण ने उत्तर दिया कि इसके दो मार्ग हैं— 1. भक्ति का मार्ग: सात जन्मों तक मेरे भक्त बनकर साधना करो, तब वैकुंठ लौटोगे। 2. वैर का मार्ग: मुझसे घोर शत्रुता रखो और मेरे ही हाथों मारे जाओ—तो केवल तीन जन्मों में मुक्ति मिलेगी। जब सनतकुमारों ने इस रहस्य का कारण पूछा, तो नारायण बोले— “भक्त कभी-कभी प्रभु का स्मरण छोड़ सकता है, पर शत्रु शत्रुता में भी निरंतर मेरा ही चिंतन करता है। इस निरंतर स्मरण से वह शीघ्र मुक्त हो जाता है।” तीन जन्मों की लीला वैकुंठ वापसी में विलंब न हो—इस भाव से जय–विजय ने तीन जन्मों का मार्ग चुना। परिणामस्वरूप— सतयुग में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने और वराह तथा नृसिंह अवतार के हाथों मारे गए। त्रेतायुग में रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लेकर श्रीराम के द्वारा मुक्त हुए। द्वापर में शिशुपाल और दंतवक्र बने और भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मृत्यु पाकर अंततः वैकुंठ लौटे। यही कारण है कि शिशुपाल का वध केवल दंड नहीं, बल्कि मोक्ष का अंतिम द्वार था—एक पूर्वनियोजित दिव्य लीला का पूर्ण होना। आशा है यह प्रस्तुति आपको रुचिकर लगी होगी। जय श्रीहरि 🚩
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#महाभारत भीष्म पितामह के पांच तीर🏹 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जब कौरवों की सेना पांडवों से युद्ध हार रही थी तब दुर्योधन भीष्म पितामह के पास गया और उन्हें कहने लगा कि आप अपनी पूरी शक्ति से यह युद्ध नहीं लड़ रहे हैं।* *भीष्म पितामह को काफी गुस्सा आया और उन्होंने तुरंत पांच सोने के तीर लिए और कुछ मंत्र पढ़े।* *मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने दुर्योधन से कहा कि कल इन पांच तीरों से वे पांडवों को मार देंगे।* *मगर दुर्योधन को भीष्म पितामह के ऊपर विश्वास नहीं हुआ और उसने तीर ले लिए और कहा कि वह कल सुबह इन तीरों को वापस करेगा।* *इन तीरों के पीछे की कहानी भी बहुत मजेदार है।* *भगवान श्रीकृष्ण को जब तीरों के बारे में पता चला तो उन्होंने अर्जुन को बुलाया और कहा कि तुम दुर्योधन के पास जाओ और पांचो तीर मांग लो। दुर्योधन की जान तुमने एक बार गंधर्व से बचायी थी। इसके बदले उसने कहा था कि कोई एक चीज जान बचाने के लिए मांग लो। समय आ गया है कि अभी तुम उन पांच सोने के तीर मांग लो। अर्जुन दुर्योधन के पास गया और उसने तीर मांगे। क्षत्रिय होने के नाते दुर्योधन ने अपने वचन को पूरा किया और तीर अर्जुन को दे दिए। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - भीष्मपितामाह के पांच तीर 730Sures भीष्मपितामाह के पांच तीर 730Sures - ShareChat