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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *परमपिता परमात्मा ने इस समस्त सृष्टि में जीवों की रचना की , जीवन देने के बाद जीवात्मा को एक निश्चित समय के लिए इस पृथ्वी लोक पर भेजा | जिस जीवात्मा का समय पूर्ण हो जाता है वह किसी न किसी बहाने से इस धरा धाम का त्याग कर देता है | नश्वर शरीर को छोड़करके आत्मा नई यात्रा पर अग्रसर हो जाती है इसी को हमारे धर्म ग्रंथों में मृत्यु कहा गया है | यह धराधाम जहां पर प्राणी निवास करते हैं इसका नाम ही मृत्युलोक है , अर्थात "मौत का घर" यहां जो भी आया है उसको एक ना एक दिन इस पृथ्वी का त्याग करके अपने कर्मानुसार योनियों में जाना ही पड़ता है | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है यदि मृत्यु की परिभाषा की खोज की जाय तो यही परिणाम निकल कर आएगा कि "जब जीवात्मा की आंतरिक एवं वाहय गतिशीलता समाप्त हो जाती है तब उसका शरीर शांत हो जाता है और जब यह नश्वर शरीर शांत हो जाता है इसकी क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है तब मनुष्य को मृत घोषित कर दिया जाता है" | वैसे तो मृत्यु को जीवन के अंत के रूप में जाना जाता है परंतु मनुष्य के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जो उसे जीवित अवस्था में भी मृतक के समान घोषित कर देते हैं | श्रीरामचरितमानस में बाबा जी ने चौदह प्रकार के मृतक बताए है | जब मनुष्य अपने आचरण एवं अपने मानवोचित कर्म के विपरीत कर्म करने लगता है तो वह मृतकतुल्य हो जाता है ' ऐसे मनुष्य इस पृथ्वी पर भारस्वरूप ही रहते हैं | लोग मृत्युलोक में रहते हुए भी मृत्यु से भयाक्रांत रहते हैं , इस संसार में मनुष्य सब कुछ तो चाहता है परंतु मृत्यु को स्वीकार नहीं करना चाहता , क्योंकि वह मोहमाया में लिप्त होकर के सदैव इस संसार का सुख भोगने की प्रबल इच्छा रखता है | जिसको ईश्वर ने समस्त ऐश्वर्य प्रदान कर रखा है उसकी तो बात छोड़ दीजिए भगवान की माया इतनी प्रबल है कि जो मनुष्य अपने जीवन से विमुख होकर के बार-बार ईश्वर से यही कामना करता है कि हे भगवन ! अब मेरी मृत्यु हो जाय वह भी मृत्यु को समक्ष देख कर के भयाक्रांत हो जाता है | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है इससे न कोई बचा है और ना ही बच पाएगा |* *आज के इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया है , इस धरती के रहस्यों को सुलझाने में वैज्ञानिक दिन रात लगे रहते हैं परंतु कुछ विधान ऐसे हैं जिनकी बागडोर ईश्वर ने स्वयं अपने हाथ में ले रखी है | इन्हीं विधानों मे से एक है मृत्यु का विधान | इतना विकास कर लेने के बाद भी मनुष्य आज तक मृत्यु के रहस्य को नहीं जान पाया | वैज्ञानिकों का मानना है कि जब मनुष्य की आंतरिक मशीनरी कार्य करना बंद कर देती है तब मनुष्य नि:चेष्ट हो करके मृत्यु को प्राप्त हो जाता है , परंतु मृत्यु के वास्तविक रहस्य को आज भी वैज्ञानिक नहीं जान पाए है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सद्गुरुओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर यही कह सकता हूं कि मृत्यु कोई भयभीत करने वाली वस्तु नहीं है , यह मात्र एक शब्द नहीं है बल्कि महाभारत के अनुसार मृत्यु को एक देवी के रूप में स्थापित किया गया है | मृत्यु को स्वीकार करने के लिए मनुष्य को आत्मसंयमी होने के साथ-साथ इस संसार के चकाचौंध भरे जीवन से विमुख हो करके इस सत्य को जानना एवं समझना चाहिए | जब मनुष्य इस संसार में अपने जन्म लेने का प्रयोजन एवं स्वयं के रहस्य को जान जाता है तब उसे मृत्यु से भय कदापि नहीं लगता है | जीव को जब जन्म लेना होता है तब संसार के लोगों को पूर्वाभास हो जाता है परंतु उस जीव का इस धरती से गमन कब होगा इसका आभास नहीं हो पाता ऐसा इसलिए क्योंकि जीवात्मा अपने कर्मानुसार इस संसार से गमन करता है | जीवात्मा का इस संसार में आने का मार्ग निश्चित है परंतु जीवात्मा को इस संसार का त्याग करने के लिए अनेक मार्ग है जीवात्मा किसी भी मार्ग का चुनाव करके इस संसार का त्याग करेगा तो उसे मृत्यु का ही नाम दिया जाएगा | जब जीवात्मा इस नश्वर शरीर का त्याग करके आगे की यात्रा प्रारंभ करता है तो संसार के प्राणी उसे मृतक मानकर के नश्वर शरीर का अंतिम संस्कार कर देते हैं | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है परंतु मनुष्य इसे स्वीकार नहीं कर पाता है | मनुष्य जब अपने आचरण से पतित हो जाता है तब वह जीवित तो रहता है परंतु उसे जीवित नहीं माना जाता है | किसी सम्मानित व्यक्ति का किसी मानव समुदाय में यदि अपमान हो जाता है तो वह मृतक के समान हो जाता है | इस प्रकार शरीर को त्याग देना ही मृत्यु नहीं है बल्कि मनुष्य की मृत्यु कई प्रकार से होती है इसको समझने व जानने की आवश्यकता है | सदाचरण का पालन करते हुए जीवन यापन करने वालों की मृत्यु कभी नहीं होती वह इस संसार का त्याग देने के बाद भी युगों युगों तक लोगों के मानस पटल पर जीवित रहते हैं , अतः मनुष्य को अपने कर्मों का चुनाव करते हुए यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि उसके कर्म ऐसे हों कि संसार को त्याग देने के बाद भी वह संसार मे स्मृति के रुप मे जीवित रहे |* *मनुष्य इस संसार से तो चला जाता है परंतु उसके कर्म उसको युगो युगो तक जीवित रखते है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को मृत्योपरांत भी जीवित रहने का प्रयास करते रहना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #☝आज का ज्ञान
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#❤️जीवन की सीख 🌟 || सीखें और सिखायें || 🌟 बिना प्रेरणा लिए हमारा जीवन प्रेरणादायक नहीं बन सकता है। जिसमें कुछ सीखने की ललक होती है, वही कुछ सिखाने की काबिलियत भी रखता है। यदि हम लेना चाहें तो संपूर्ण प्रकृति प्रेरणा से भरी हुई है। प्रेरणा पर्वत से लेनी चाहिए जिसके मार्ग में अनेक आंधी और तूफान आते हैं पर उसके स्वाभिमान एवं मस्तक को नहीं झुका पाते। प्रेरणा लहरों से लेनी चाहिए जो गिरकर फिर उठ जाती हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचे बगैर रुकती नहीं। प्रेरणा बादलों से लेनी चाहिये जो समुद्र से जल लेते हैं और रेगिस्तान में बरसा देते हैं। प्रेरणा हमें वृक्षों से लेनी चाहिए, फल लग जाने के बाद जिनकी डालियाँ स्वतः झुक जाया करती हैं। प्रेरणा उन फूलों से लेनी चाहिए जो खिलते भी दूसरों के लिए और टूटते भी दूसरों के लिए हैं। जो व्यक्ति प्रेरणा लेना जानता है उसका जीवन एक दिन स्वतः प्रेरणा दायक भी बन जाता है। 🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - सुप्रभात सुविचार जाने वो कैसे मुकद्दर की किताब लिख देता है  सांसें गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है . ! सुप्रभात @SHARMAUS - 8:19 सुप्रभात सुविचार जाने वो कैसे मुकद्दर की किताब लिख देता है  सांसें गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है . ! सुप्रभात @SHARMAUS - 8:19 - ShareChat
अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत !। तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥ [ महाभारत अनुशासनपर्व ५८/२६। ] अर्थात् 👉🏻 भरतनन्दन! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने मरे हुए पूर्वजों एवं भविष्य में होनेवाली संतानों का तथा पितृकुल का भी उद्धार कर देता है , इसलिए वृक्षों को अवश्य लगाना चाहिए । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - ~~` ramnk भरतनन्दन। वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपन मरे हुएं पूर्वजों एवं भविष्य में हनिवाली संतानों को तथा पितृकुल काभी उद्धा कारत है, इसलिए वक्षों को अवण्य लपाना चाहिए ~~` ramnk भरतनन्दन। वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपन मरे हुएं पूर्वजों एवं भविष्य में हनिवाली संतानों को तथा पितृकुल काभी उद्धा कारत है, इसलिए वक्षों को अवण्य लपाना चाहिए - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गीता ज्ञान🛕 🙏।।श्रीहरिः।।🙏 ‼️त्याग से भगवत्-प्राप्ति‼️ ---------------------------------------- त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥ 👩‍❤️‍👩गृहस्थाश्रम में रहता हुआ भी मनुष्य त्याग के द्वारा परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। परमात्मा को प्राप्त करने के लिये 'त्याग' ही मुख्य साधन है। अतएव सात श्रेणियों में विभक्त करके त्याग के लक्षण संक्षेप में लिखे जाते हैं।👩‍❤️‍👩 🚩(१) निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग। चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट, छल,जबरदस्ती,हिंसा, अभक्ष्य भोजन और प्रमाद आदि शास्त्र विरुद्ध नीच कर्मों को मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी न करना, यह पहली श्रेणी का त्याग है। 🚩(२) काम्य कर्मों का त्याग। स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के उद्देश्य से एवं रोग-संकटादि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले यज्ञ, दान, तप और उपासनादि सकाम कर्मो को अपने स्वार्थ के लिये न करना, यह दूसरी श्रेणी का त्याग है। यदि कोई लौकिक अथवा शास्त्रीय ऐसा कर्म संयोगवश प्राप्त हो जाय ,जो कि स्वरूप से तो सकाम हो, परन्तु उसके न करने से किसी को कष्ट पहुँचता हो या कर्म-उपासना की परम्परा में किसी प्रकार की बाधा आती हो। तो स्वार्थ का त्याग करके केवल लोकसंग्रह के लिये उसका कर लेना सकाम कर्म नहीं है। 🚩(३) तृष्णा का सर्वथा त्याग। मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्री, पुत्र और धनादि जो कुछ भी अनित्य पदार्थ प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त हुए हों, उनके बढ़ने की इच्छा को भगवत्प्राप्ति में बाधक समझ कर उसका त्याग करना, यह तीसरी श्रेणी का त्याग है। 🚩(४) स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने का त्याग। अपने सुख के लिये किसी से भी धनादि पदार्थों की अथवा सेवा कराने की याचना करना एवं बिना याचना के दिये हुए पदार्थों को या की हुई सेवा को स्वीकार करना तथा किसी प्रकार भी किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना इत्यादि जो स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने के भाव हैं, उन सबका त्याग करना, यह चौथी श्रेणी का त्याग है। यदि कोई ऐसा अवसर योग्यता से प्राप्त हो जाय कि शरीर सम्बन्धी सेवा अथवा भोजनादि पदार्थों के स्वीकार न करने से किसी को कष्ट पहुँचता हो या लोक शिक्षा में किसी प्रकार की बाधा आती हो तो उस अवसर पर स्वार्थ का त्याग करके केवल उनकी प्रीति के लिये सेवादि का स्वीकार करना दोष युक्त नहीं है; क्योंकि स्त्री, पुत्र और नौकर आदि से की हुई सेवा एवं बन्धु बान्धव और मित्र आदि द्वारा दिये हुए भोजनादि पदार्थ स्वीकार न करने से उनको कष्ट होना एवं लोक-मर्यादा में बाधा पड़ना सम्भव है। 🚩(५) सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों में आलस्य और फल की इच्छा का सर्वथा त्याग। ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान, तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर-सम्बन्धी खान- पान इत्यादि जितने कर्तव्य कर्म हैं, उन सबमें आलस्य का और सब प्रकार की कामना का त्याग करना।
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#☝आज का ज्ञान #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ काशी में एक जगह पर तुलसीदास रोज रामचरित मानस का पाठ करते थे । उनकी कथा को बहुत सारे भक्त सुनने आते थे तुलसीदास जी रोज जंगल में शौच के लिए जाते थे एवं शौच के पश्चात् वापिस नगर की ओर लौटते हुए शौच से बचा हुआ लोटे का पानी एक पेड़ की जड़ में डाल दिया करते थे जिससे उस पेड़ पर रहने वाले एक पेड़ की प्यास बुझती थी। एक दिन वह प्रेत तुलसीदास के सामने प्रकट हो गया और बोला कि आपने शौच के बचे हुए जल से जो सींचन किया है मैं उससे तृप्त हुआ हूँ और मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ। तुलसीदास बोले – मेरी केवल एक ही इच्छा है , प्रभु श्री राम के दर्शन। राम जी की कथा तो मैंने लिखी भी और गायी भी है परन्तु साक्षात् दर्शन अभी तक नहीं हुए। यदि दर्शन हो जाए तो बड़ी कृपा होगी उस प्रेत ने कहा कि महाराज! आपको प्रभु श्री राम के दर्शन करवा सकूँ ऐसी मेरी सामर्थ्य नहीं हैं और यदि मैं दर्शन करवा सकता तो मैं अब तक स्वयं इस प्रेत योनि से मुक्त हो चुका होता। प्रेत की बात सुनकर तुलसीदास जी बोले – परन्तु इसके अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिए। तब उस प्रेत ने कहा – सुनिए श्रीमान ! मैं आपको दर्शन तो नहीं करवा सकता लेकिन दर्शन कैसे होंगे उसका मार्ग आपको अवश्य बता सकता हूँ। तुलसीदास जी ने कोतुहल वश वह मार्ग पूछा। प्रेत बोला आप जहाँ पर कथा सुनाते हो, बहुत सारे भक्त सुनने आते हैं। आपको तो मालूम नहीं लेकिन मैं जानता हूँ आपकी कथा में रोज हनुमानजी भी सुनने आते हैं। वे आपको अवश्य ही श्री राम जी से मिलवा सकते हैं। तब तुलसीदास जी ने पूछा "पर मैं उनको कैसे पहचानूँगा ?" तब प्रेत ने उन्हें बताया कि हनुमान जी कथा में सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं तथा वे सबसे पीछे कम्बल ओढ़कर, एक दीन हीन एक कोढ़ी के रूप में बैठते हैं । उनके पैर पकड़ लेना वो हनुमान जी ही हैं। तुलसीदास जी बड़े प्रसन्न हुए हैं। आज जब कथा हुई है गोस्वामीजी की नजर उसी व्यक्ति पर थी और कथा के अंत में सबसे आखिर में जैसे ही वो व्यक्ति जाने लगा, तो तुलसीदास जी अपने आसन से कूद पड़े और दौड़ पड़े। जाकर उस व्यक्ति के चरणों में गिर गए। तुलसीदास जी बोले कि प्रभु आप सबसे छुप सकते हो मुझसे नहीं छुप सकते हो। अब आपके चरण मैं तब तक नहीं छोडूंगा जब तक आप प्रभु राम जी से नहीं मिलवाओगे। कृपा करके मुझे प्रभु राम जी के दर्शन करा दीजिए । राम जी के साक्षात्कार के सिवाय अब और कोई जीवन की अभिलाषा शेष नहीं बची। । हनुमानजी, आप तो राम जी से मिलवा सकते हो। अगर आप नहीं मिलवाओगे तो कौन मिलवायेगा? तुलसीदास जी का अनुनय विनय सुनकर हनुमानजी अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। हनुमानजी बोले कि आपको रामजी अवश्य मिलेंगे और मैं मिलवाऊँगा लेकिन उसके लिए आपको चित्रकूट जाना पड़ेगा, वहाँ आपको श्री राम जी के साक्षात् दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँचे । मन्दाकिनी जी में स्नान कर , कामदगिरि की परिक्रमा लगा रहे थे , तभी सामने से घोड़े पर सवार होकर दो सुकुमार राजकुमार आते हुए दिखाई दिए । एक गौर वर्ण और एक श्याम वर्ण। उनका रूप और तेज देखते ही बनता था , अद्भुत सौन्दर्य था उनका। तुलसीदास जी उनकी छवि देख कर मंत्रमुग्ध होकर उनको देखते रहे और सोचने लगे कि ये राजकुमार यहाँ क्या कर रहे हैं। वे यह समझ ही नहीं पाए की वही श्री राम और लक्ष्मण हैं। उन दिव्य राजकुमारों के जाने के बाद हनुमानजी प्रकट हुए और तुलसीदास जी पूछा कि क्या उनको श्री राम जी के दर्शन हुए। तुलसीदास जी ने कहा – नहीं ? तब हनुमान जी ने बताया कि अभी अभी घोड़े पर जो राजकुमार गए है , वे श्री राम और लक्षमण ही थे। तुलसीदास जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने हनुमान जी से एक बार फिर से दर्शन कराने की प्रार्थना की जिसे हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया। अगले ही दिन सुबह तुलसीदास जी मन्दाकिनी नदी में स्नान करने के पश्चात् घाट पर बैठ कर राम नाम का जप कर रहे थे और चन्दन घिस रहे थे और भगवान किस रूप में दुबारा दर्शन देंगे यह सोच रहे थे। तभी भगवान राम एक बालक के रूप में उनके समक्ष आये और कहा बाबा.. बाबा… चन्दन तो आपने बहुत प्यारा घिसा है। थोड़ा सा चन्दन हमें दे दो… लगा दो। गोस्वामीजी को लगा कि कोई बालक होगा। चन्दन घिसते देखा तो आ गया। तो तुरंत लेकर चन्दन बालक को देने लगे। हनुमानजी समझ गए कि आज फिर तुलसीदास जी से चूक हो सकती है। हनुमानजी तुरंत तोता बनकर आ गए शुक रूप में और कहा कि : हनुमानजी ने अत्यंत करुणरस में इशारा किया कि अब मत चूक जाना। आज जो आपसे चन्दन ग्रहण कर रहे हैं ये साक्षात् रघुनाथ हैं। तुलसीदास जी ने सिर उठाकर देखा तो सामने दिव्य रूप में श्री राम जी खड़े थे। तुलसीदास जी उनको देखते ही रह गए। प्रभु श्री राम ने फिर से उनसे चन्दन माँगा पर तुलसीदास जी तो प्रभु श्रीराम जी का रूप देखकर पूरी तरह स्थिर हो चुके थे , उनको तो जैसे कुछ सुनाई ही ना दिया हो। वे तो बस प्रभु श्री राम जी को निहारते ही रहे। यह देखकर श्री राम ने स्वयं ही चन्दन लिया और तुलसीदास जी के माथे पर लगाकर अंतर्ध्यान हो गए।
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुरधिकशततमोऽध्यायः भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 323) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तव ह्यनुमते भीष्म नियतं स महातपाः । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति ।। १९ ।। भीष्म ! तुम्हारी अनुमति मिल जाय, तो महा-तपस्वी व्यास निश्चय ही विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंसे पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे' ।। १९ ।। वैशम्पायन उवाच महर्षेः कीर्तने तस्य भीष्मः प्राञ्जलिरब्रवीत् । धर्ममर्थ च कामं च त्रीनेतान् योऽनुपश्यति ।। २० ।। अर्थमर्थानुबन्धं च धर्म धर्मानुबन्धनम् । कामं कामानुबन्धं च विपरीतान् पृथक् पृथक् ।। २१ ।। यो विचिन्त्य धिया धीरो व्यवस्यति स बुद्धिमान् । तदिदं धर्मयुक्तं च हितं चैव कुलस्य नः ।। २२ ।। उक्तं भवत्या यच्छ्रेयस्तन्मह्यं रोचते भृशम् । वैशम्पायनजी कहते हैं- महर्षि व्यासका नाम लेते ही भीष्मजी हाथ जोड़कर बोले- 'माताजी ! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम- इन तीनोंका बारंबार विचार करता है तथा यह भी जानता है कि किस प्रकार अर्थसे अर्थ, धर्मसे धर्म और कामसे कामरूप फलकी प्राप्ति होती है और वह परिणाममें कैसे सुखद होता है तथा किस प्रकार अर्थादिके सेवनसे विपरीत फल (अर्थनाश आदि) प्रकट होते हैं, इन बातोंपर पृथक् पृथक् भलीभाँति विचार करके जो धीर पुरुष अपनी बुद्धिके द्वारा कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करता है, वही बुद्धिमान् है। तुमने जो बात कही है, वह धर्मयुक्त तो है ही, हमारे कुलके लिये भी हितकर और कल्याणकारी है; इसलिये मुझे बहुत अच्छी लगी है' ।। २०-२२३ ।। वैशम्पायन उवाच ततस्तस्मिन् प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन ।। २३ ।। कृष्णद्वैपायनं काली चिन्तयामास वै मुनिम् । स वेदान् विब्रुवन् धीमान् मातुर्विज्ञाय चिन्तितम् ।। २४ ।। प्रादुर्बभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन । तस्मै पूजां ततः कृत्वा सुताय विधिपूर्वकम् ।। २५ ।। परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रस्रवैरभ्यषिञ्चत । मुमोच बाष्पं दाशेयी पुत्रं दृष्ट्वा चिरस्य तु ।। २६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- कुरुनन्दन ! उस समय भीष्मजीके इस प्रकार अपनी सम्मति देनेपर काली (सत्यवती) ने मुनिवर कृष्णद्वैपायनका चिन्तन किया। जनमेजय ! माताने मेरा स्मरण किया है, यह जानकर परम बुद्धिमान् व्यासजी वेदमन्त्रोंका पाठ करते हुए क्षणभरमें वहाँ प्रकट हो गये। वे कब किधरसे आ गये, इसका पता किसीको न चला। सत्यवती ने अपने पुत्र का भलीभाँति सत्कार किया और दोनों भुजाओंसे उनका आलिंगन करके अपने स्तनोंके झरते हुए दूधसे उनका अभिषेक किया। अपने पुत्रको दीर्घकालके बाद देखकर सत्यवतीकी आँखोंसे स्नेह और आनन्दके आँसू बहने लगे ।। २३-२६ ।। तामद्भिः परिषिच्यार्ता महर्षिरभिवाद्य च। मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमब्रवीत् ।। २७ ।। तदनन्तर सत्यवतीके प्रथम पुत्र महर्षि व्यासने अपने कमण्डलुके पवित्र जलसे दुःखिनी माताका अभिषेक किया और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ।। २७ ।। भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः । शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रियं तव ।। २८ ।। 'धर्मके तत्त्वको जाननेवाली माताजी ! आपकी जो हार्दिक इच्छा हो, उसके अनुसार कार्य करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। आज्ञा दीजिये, मैं आपकी कौन-सी प्रिय सेवा करूँ' ।। २८ ।। तस्मै पूजां ततोऽकार्षीत् पुरोधाः परमर्षये । स च तां प्रतिजग्राह विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ।। २९ ।। तत्पश्चात् पुरोहितने महर्षिका विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारणके साथ पूजन किया और महर्षि ने उसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण किया ।। २९ ।। पूजितो मन्त्रपूर्व तु विधिवत् प्रीतिमाप सः । तमासनगतं माता पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् ।। ३० ।। सत्यवत्यथ वीक्ष्यैनमुवाचेदमनन्तरम् । विधि और मन्त्रोच्चारणपूर्वक की हुई उस पूजासे व्यासजी बहुत प्रसन्न हुए। जब वे आसनपर बैठ गये, तब माता सत्यवतीने उनका कुशल-क्षेम पूछा और उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा- ।। ३०३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहृभाखतमु श्रीमहृभाखतमु - ShareChat
🌷 #आमलकी एकादशी 🌷 🌷 *एकादशी व्रत के लाभ* 🌷 ➡ *26 फरवरी 2026 गुरुवार को रात्रि 12:33 से 27 फरवरी, शुक्रवार को रात्रि 10:32 तक एकादशी है।* 💥 *विशेष - 27 फरवरी, शुक्रवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखें ।* 🙏🏻 *युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा : श्रीकृष्ण ! मुझे फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम और माहात्म्य बताने की कृपा कीजिये ।* 🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण बोले: महाभाग धर्मनन्दन ! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘आमलकी’ है । इसका पवित्र व्रत विष्णुलोक की प्राप्ति करानेवाला है । राजा मान्धाता ने भी महात्मा वशिष्ठजी से इसी प्रकार का प्रश्न पूछा था, जिसके जवाब में वशिष्ठजी ने कहा था :* 🙏🏻 *‘महाभाग ! भगवान विष्णु के थूकने पर उनके मुख से चन्द्रमा के समान कान्तिमान एक बिन्दु प्रकट होकर पृथ्वी पर गिरा । उसीसे आमलक (आँवले) का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है । इसी समय प्रजा की सृष्टि करने के लिए भगवान ने ब्रह्माजी को उत्पन्न किया और ब्रह्माजी ने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अंतःकरण वाले महर्षियों को जन्म दिया । उनमें से देवता और ॠषि उस स्थान पर आये, जहाँ विष्णुप्रिय आमलक का वृक्ष था । महाभाग ! उसे देखकर देवताओं को बड़ा विस्मय हुआ क्योंकि उस वृक्ष के बारे में वे नहीं जानते थे । उन्हें इस प्रकार विस्मित देख आकाशवाणी हुई: ‘महर्षियो ! यह सर्वश्रेष्ठ आमलक का वृक्ष है, जो विष्णु को प्रिय है । इसके स्मरणमात्र से गोदान का फल मिलता है । स्पर्श करने से इससे दुगना और फल भक्षण करने से तिगुना पुण्य प्राप्त होता है । यह सब पापों को हरनेवाला वैष्णव वृक्ष है । इसके मूल में विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्ध में परमेश्वर भगवान रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण तथा फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं । आमलक सर्वदेवमय है । अत: विष्णुभक्त पुरुषों के लिए यह परम पूज्य है । इसलिए सदा प्रयत्नपूर्वक आमलक का सेवन करना चाहिए ।’* 🙏🏻 *ॠषि बोले : आप कौन हैं ? देवता हैं या कोई और ? हमें ठीक ठीक बताइये ।* 🙏🏻 *पुन : आकाशवाणी हुई : जो सम्पूर्ण भूतों के कर्त्ता और समस्त भुवनों के स्रष्टा हैं, जिन्हें विद्वान पुरुष भी कठिनता से देख पाते हैं, मैं वही सनातन विष्णु हूँ।* 🙏🏻 *देवाधिदेव भगवान विष्णु का यह कथन सुनकर वे ॠषिगण भगवान की स्तुति करने लगे । इससे भगवान श्रीहरि संतुष्ट हुए और बोले : ‘महर्षियो ! तुम्हें कौन सा अभीष्ट वरदान दूँ ?* 🙏🏻 *ॠषि बोले : भगवन् ! यदि आप संतुष्ट हैं तो हम लोगों के हित के लिए कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरुपी फल प्रदान करनेवाला हो ।* 🙏🏻 *श्रीविष्णुजी बोले : महर्षियो ! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त एकादशी हो तो वह महान पुण्य देनेवाली और बड़े बड़े पातकों का नाश करनेवाली होती है । इस दिन आँवले के वृक्ष के पास जाकर वहाँ रात्रि में जागरण करना चाहिए । इससे मनुष्य सब पापों से छुट जाता है और सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है । विप्रगण ! यह व्रत सभी व्रतों में उत्तम है, जिसे मैंने तुम लोगों को बताया है ।* 🙏🏻 *ॠषि बोले : भगवन् ! इस व्रत की विधि बताइये । इसके देवता और मंत्र क्या हैं ? पूजन कैसे करें? उस समय स्नान और दान कैसे किया जाता है?* 🙏🏻 *भगवान श्रीविष्णुजी ने कहा : द्विजवरो ! इस एकादशी को व्रती प्रात:काल दन्तधावन करके यह संकल्प करे कि ‘ हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! मैं एकादशी को निराहार रहकर दुसरे दिन भोजन करुँगा । आप मुझे शरण में रखें ।’ ऐसा नियम लेने के बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, गुरुपत्नीगामी तथा मर्यादा भंग करनेवाले मनुष्यों से वह वार्तालाप न करे । अपने मन को वश में रखते हुए नदी में, पोखरे में, कुएँ पर अथवा घर में ही स्नान करे । स्नान के पहले शरीर में मिट्टी लगाये ।* 🌷 *मृत्तिका लगाने का मंत्र* *अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे ।* *मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोटयां समर्जितम् ॥* 🙏🏻 *वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतार के समय भगवान विष्णु ने भी तुम्हें अपने पैरों से नापा था । मृत्तिके ! मैंने करोड़ों जन्मों में जो पाप किये हैं, मेरे उन सब पापों को हर लो ।’* 🙏🏻 *स्नान का मंत्र* *त्वं मात: सर्वभूतानां जीवनं तत्तु रक्षकम्।* *स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसानां पतये नम:॥* *स्नातोSहं सर्वतीर्थेषु ह्रदप्रस्रवणेषु च्।* *नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत्॥* 🙏🏻 *‘जल की अधिष्ठात्री देवी ! मातः ! तुम सम्पूर्ण भूतों के लिए जीवन हो । वही जीवन, जो स्वेदज और उद्भिज्ज जाति के जीवों का भी रक्षक है । तुम रसों की स्वामिनी हो । तुम्हें नमस्कार है । आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरों में स्नान कर चुका । मेरा यह स्नान उक्त सभी स्नानों का फल देनेवाला हो ।’* 🙏🏻 *विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह परशुरामजी की सोने की प्रतिमा बनवाये । प्रतिमा अपनी शक्ति और धन के अनुसार एक या आधे माशे सुवर्ण की होनी चाहिए । स्नान के पश्चात् घर आकर पूजा और हवन करे । इसके बाद सब प्रकार की सामग्री लेकर आँवले के वृक्ष के पास जाय । वहाँ वृक्ष के चारों ओर की जमीन झाड़ बुहार, लीप पोतकर शुद्ध करे । शुद्ध की हुई भूमि में मंत्रपाठपूर्वक जल से भरे हुए नवीन कलश की स्थापना करे । कलश में पंचरत्न और दिव्य गन्ध आदि छोड़ दे । श्वेत चन्दन से उसका लेपन करे । उसके कण्ठ में फूल की माला पहनाये । सब प्रकार के धूप की सुगन्ध फैलाये । जलते हुए दीपकों की श्रेणी सजाकर रखे । तात्पर्य यह है कि सब ओर से सुन्दर और मनोहर दृश्य उपस्थित करे । पूजा के लिए नवीन छाता, जूता और वस्त्र भी मँगाकर रखे । कलश के ऊपर एक पात्र रखकर उसे श्रेष्ठ लाजों(खीलों) से भर दे । फिर उसके ऊपर परशुरामजी की मूर्ति (सुवर्ण की) स्थापित करे।* 🌷 *‘विशोकाय नम:’ कहकर उनके चरणों की,* *‘विश्वरुपिणे नम:’ से दोनों घुटनों की,* *‘उग्राय नम:’ से जाँघो की,* *‘दामोदराय नम:’ से कटिभाग की,* *‘पधनाभाय नम:’ से उदर की,* *‘श्रीवत्सधारिणे नम:’ से वक्ष: स्थल की,* *‘चक्रिणे नम:’ से बायीं बाँह की,* *‘गदिने नम:’ से दाहिनी बाँह की,* *‘वैकुण्ठाय नम:’ से कण्ठ की,* *‘यज्ञमुखाय नम:’ से मुख की,* *‘विशोकनिधये नम:’ से नासिका की,* *‘वासुदेवाय नम:’ से नेत्रों की,* *‘वामनाय नम:’ से ललाट की,* *‘सर्वात्मने नम:’ से संपूर्ण अंगो तथा *मस्तक की पूजा करे ।* 🙏🏻 *ये ही पूजा के मंत्र हैं। तदनन्तर भक्तियुक्त चित्त से शुद्ध फल के द्वारा देवाधिदेव परशुरामजी को अर्ध्य प्रदान करे । अर्ध्य का मंत्र इस प्रकार है :* 🌷 *नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोSस्तु ते ।* *गृहाणार्ध्यमिमं दत्तमामलक्या युतं हरे ॥* 🙏🏻 *‘देवदेवेश्वर ! जमदग्निनन्दन ! श्री विष्णुस्वरुप परशुरामजी ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । आँवले के फल के साथ दिया हुआ मेरा यह अर्ध्य ग्रहण कीजिये ।’* 🙏🏻 *तदनन्तर भक्तियुक्त चित्त से जागरण करे । नृत्य, संगीत, वाघ, धार्मिक उपाख्यान तथा श्रीविष्णु संबंधी कथा वार्ता आदि के द्वारा वह रात्रि व्यतीत करे । उसके बाद भगवान विष्णु के नाम ले लेकर आमलक वृक्ष की परिक्रमा एक सौ आठ या अट्ठाईस बार करे । फिर सवेरा होने पर श्रीहरि की आरती करे । ब्राह्मण की पूजा करके वहाँ की सब सामग्री उसे निवेदित कर दे । परशुरामजी का कलश, दो वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएँ दान कर दे और यह भावना करे कि : ‘परशुरामजी के स्वरुप में भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ।’ तत्पश्चात् आमलक का स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करे और स्नान करने के बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराये । तदनन्तर कुटुम्बियों के साथ बैठकर स्वयं भी भोजन करे ।* 🙏🏻 *सम्पूर्ण तीर्थों के सेवन से जो पुण्य प्राप्त होता है तथा सब प्रकार के दान देने दे जो फल मिलता है, वह सब उपर्युक्त विधि के पालन से सुलभ होता है । समस्त यज्ञों की अपेक्षा भी अधिक फल मिलता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है ।’* 🙏🏻 *वशिष्ठजी कहते हैं : महाराज ! इतना कहकर देवेश्वर भगवान विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये । तत्पश्चात् उन समस्त महर्षियों ने उक्त व्रत का पूर्णरुप से पालन किया । नृपश्रेष्ठ ! इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ।* 🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह दुर्धर्ष व्रत मनुष्य को सब पापों से मुक्त करनेवाला है ।* *🌞ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌞* 🙏🏻🌷💐🌼🌻🌹🌸🌺🙏🏻 फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी या रंगभरी एकादशी कहते हैं, इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। आमलकी या रंगभरी एकादशी के पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, इस दिन को मनाने के कुछ अनूठे और रोचक पहलू निम्नलिखित हैं: - आंवले का महत्व: इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है और भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करते हैं।। - पौराणिक कथा: माना जाता है कि भगवान शिव इस दिन माता पार्वती का गौना कराने के बाद काशी पहुंचे थे, और वहां उनके आगमन का उत्सव मनाया गया था। - रंगों का समावेश: इस दिन काशी में बाबा विश्वनाथ और माँ पार्वती को रंग अर्पित करने की परंपरा है, जो होली के आगमन की शुरुआत का प्रतीक है। - आमलकी एकादशी का व्रत पाप नाश, मोक्ष प्राप्ति और स्वास्थ्य लाभ देने वाला माना जाता है। इस विशेष दिन पर भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा करने से सुख-समृद्धि और जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय…. . #🙏 आमलकी एकादशी 🙏 #आमलकी एकादशी व्रत #आमलकी एकादशी 🌷🙏 #आमलकी एकादशी
🙏 आमलकी एकादशी 🙏 - a 1 27-02-26 रंगभरी ' आमलकी' एकादशी शुक़्रवार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी आमलकी या रंगभरनी कहते हैं, इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा " की जाती है। इस दिन विधि-विधान से संयुक्त रूप से महादेव और की पूजा ` विष्णु 7 करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवान a 1 27-02-26 रंगभरी ' आमलकी' एकादशी शुक़्रवार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी आमलकी या रंगभरनी कहते हैं, इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा " की जाती है। इस दिन विधि-विधान से संयुक्त रूप से महादेव और की पूजा ` विष्णु 7 करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवान - ShareChat
#महाभारत 🙏द्रोण गुरु के पद पर🙏 गुरु द्रोणाचार्य ब्राह्मण थे, धनुर्विद्या के महान आचार्य थे, पर बड़े गरीब थे| इतने गरीब थे कि जीवन का निर्वाह होना कठिन था| घर में कुल तीन प्राणी थे - द्रोणाचार्य स्वयं, उनकी पत्नी और उनका पुत्र अश्वत्थामा| पुत्र की अवस्था पांच-छ: वर्ष की थी| एक दिन पुत्र ने अपने एक साथी को दूध पीते हुए देख लिया| उसके मन में भी दूध पीने की अभिलाषा जाग उठी| उसने अपनी मां के पास जाकर कहा, "मां, मैं दूध पीऊंगा|" पर मां दूध पाती तो कहां पाती? जिस मां को खाने के लिए अन्न न मिल रहा हो, वह अपने बालक को दूध कैसे पिलाती? मां का हृदय विदीर्ण हो गया| पर बालक को तो सांत्वना प्रदान करनी ही थी| मां ने आटे का पानी बालक को देते हुए कहा, "लो, दूध पी लो|" बालक को तो दूध के स्वाद का पता ही नहीं था| उसने आटे के पानी को पीकर समझा कि उसकी मां उसे दूध पिला रहे है| गुरु द्रोणाचार्य का हृदय यह सब देख-सुन कर कांप उठा| उन्होंने प्रतिज्ञा की कि या तो धन और यश पैदा करके रहूंगा या मर जाऊंगा| गुरु द्रोणाचार्य मन ही मन सोचने लगे...क्या करना चाहिए? धन और यश के लिए किस ओर जाना चाहिए? द्रोणाचार्य को पांचाल नरेश द्रुपद याद आया| विद्यार्थी अवस्था में द्रुपद और उन्होंने एक ही गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की थी| द्रोणाचार्य आशाओं के रथ पर सवार होकर पांचाल देश की राजधानी की ओर चल पड़े| मार्ग में बड़े-बड़े कष्ट उठाए, पर धन मिलने की आशा में वे कष्ट भी उन्हें सुखदायी मालूम हुए| कई दिनों तक बराबर पैदल चलने के पश्चात द्रोणाचार्य पांचाल की राजधानी में पहुंचे| उन्होंने सोचा था, राजधानी में पहुंचते ही द्रुपद से भेंट हो जाएगी, वह उनका स्वागत करेगा, उन्हें बड़े आदर से ठहराएगा और उनकी सहायता करेगा| किंतु उन्हें क्या पता था कि द्रुपद अब गुरुकुल का विद्यार्थी नहीं है| अब वह एक बहुत बड़े राज्य का नृपति है| सिपाहियों, सैनिकों और मंत्रियों से घिरा रहता है| दूसरों की तो बात ही क्या, अपने लोगों से भी उसकी भेंट बड़ी कठिनाई से हो पाती थी| कई दिनों तक प्रयत्न करने के पश्चात द्रोणाचार्य द्रुपद के सामने जा पाए| किंतु यह क्या? द्रुपद ने तो उन्हें देखते ही मुंह फेर लिया| सहायता करने की कौन कहे, उसने तो उन्हें पहचानने से भी इनकार कर दिया| द्रोणाचार्य का मन-मानस जैसे मथ सा गया| उनके मन में जगत से ही नहीं, मानव मात्र से घृणा उत्पन्न हो गई| उन्होंने निश्चय किया, अब वे संन्यासी हो जाएंगे और वन की गोद में बैठकर अपना जीवन व्यतीत करेंगे| द्रोणाचार्य संन्यासी बनने के उद्देश्य से पैदल ही हरिद्वार की ओर चल पड़े| संध्या के पूर्व का समय था| थके-मांदे द्रोणाचार्य हस्तिनापुर में एक कुएं के पास जा पहुंचे| वे कुएं पर ही रात्रि व्यतीत करना चाहते थे, पर वहां पांडव और कौरव राजकुमारों को देखकर विस्मित हो गए| यद्यपि वे उन्हें पहचानते नहीं थे, पर उनके रंग-ढंग और उनके वार्तालाप से उन्होंने यह जान लिया कि यह पांडव और कौरव राजकुमार हैं| पांडव और कौरव राजकुमार कुएं के पास गेंद खेल रहे थे| उनकी गेंद कुएं में जा गिरी थी| वे अपनी गेंद कुएं से बाहर निकालने के लिए बड़ा प्रयत्न कर रहे थे, किंतु निकाल नहीं पा रहे थे| द्रोणाचार्य राजकुमारों की व्याकुलता का कारण जानकर द्रवित हो उठे| उन्होंने राजकुमारों से कहा, "तुम लोग चिंता मत करो| मैं अभी तुम्हारी गेंद कुएं से बाहर निकाले देता हूं|" द्रोणाचार्य धनुर्विद्या के महान पंडित थे| दूसरे विद्वान ब्राह्मण तो अपने पास शास्त्र रखते हैं, पर द्रोणाचार्य अपने पास धनुष-बाण रखते थे| वे जहां भी जाते थे, धनुष-बाण लिए रहते थे| द्रोणाचार्य ने कुएं के मुख पर खड़े होकर भीतर गिरी हुई गेंद को लक्ष्य करके एक बाण चलाया| बाण का फलक गेंद में चुभ गया| बाण सीधा खड़ा हो गया| द्रोणाचार्य ने दूसरा बाण प्रथम बाण के ऊपर चलाया, दूसरा बाण प्रथम बाण में चुभकर खड़ा हो गया| इसी प्रकार द्रोणाचार्य ने तीन-चार बाण और चलाए| सभी बाण एक दूसरे पर खड़े हो गए| अंतिम बाण द्रोणाचार्य के हाथ में था| उन्होंने उसे खींचकर सभी बाणों के साथ गेंद बाहर निकाल ली| गेंद पाकर राजकुमारों का मन प्रसन्नता से खिल उठा| साथ ही वे द्रोणाचार्य की बाण विद्या और उनके चातुर्य पर विमुग्ध हो उठे| वे उन्हें देवव्रत के पास ले गए, क्योंकि उन दिनों देवव्रत ही उनकी देख-रेख किया करते थे| राजकुमारों ने देवव्रत से द्रोणाचार्य की बाण विद्या की बड़ी प्रशंसा की| स्वयं देवव्रत भी द्रोणाचार्य से वार्तालाप करके बड़े प्रसन्न हुए| उन्होंने राजकुमारों को बाण विद्या सिखाने के लिए द्रोणाचार्य को गुरु पद पर प्रतिष्ठित कर दिया| द्रोणाचार्य का अभीष्ट पूर्ण हो गया| उन्हें गुरु-पद पर रहते हुए धन तो मिला ही, बहुत बड़ा यश भी मिला| इतना बड़ा यश मिला कि यदि द्रोणाचार्य को निकाल दिया जाए, तो महाभारत का युद्ध एक खेल-सा लगने लगता है| मनुष्य का भाग्य जब चमकता है, तो इसी प्रकार चमकता है| पुत्र को दूध के स्थान पर आटे का पानी पिलाने वाले द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के पूज्य बन गए| दुर्योधन तो उन्हें शीश झुकाता ही था, अर्जुन भी शीश झुकाया करता था|.
महाभारत - ShareChat
#पौराणिक कथा एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूँढ रहे थे। एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया। तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा-“दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है?” राजा बलि बोले-“देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं। आप स्वयं पूछ लें।” इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकारते हैं। जैसे-श्री, लक्ष्मी आदि।” इन्द्र बोले-“देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?” लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूँ। अर्थात मैं समयानुसार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूँ।” इन्द्र बोले-“देवी! आप असुरों के यहाँ निवास क्यों नहीं करतीं?” लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहाँ सत्य हो, धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों। लेकिन असुर भ्रष्ट हो रहे हैं। ये पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पर अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं।ये तप-उपवास नहीं करते; यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है। पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है। ये लोग पशु तो पाल लेते हैं लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं। ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया। देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसलिए अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूँगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, जया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियाँ भी निवास करेंगी। देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा।” तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए। यह कहानी भक्ति और भगवान की शेयर जरूर करें जिससे उन लोगों को भी विश्वास हो जिन्हें भगवान पर विश्वास नहीं है और हमारा सोया हुआ हिंदू जाग सके... जय मां लक्ष्मी...जय श्री कृष्ण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
पौराणिक कथा - ShareChat
लक्ष्मी नारायण #जय लक्ष्मी नारायण लक्ष्मी और नारायण की संयुक्त रूप से पूजा करना ब्रह्मांड की पालनकर्ता और ऐश्वर्य प्रदाता शक्तियों को एक साथ साधने जैसा है। इनकी कृपा से न केवल भौतिक बल्कि आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दोषों का भी निवारण होता है। लक्ष्मी नारायण के आशीर्वाद से मुख्य रूप से निम्नलिखित दोष दूर होते हैं: 1. दरिद्रता और आर्थिक दोष लक्ष्मी जी धन की देवी हैं और नारायण उसके संरक्षक। जब इनकी संयुक्त कृपा होती है, तो घर से 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता) का वास समाप्त होता है। यदि कुंडली में 'धन योग' बाधित हो या आय के स्रोतों में निरंतर रुकावट आ रही हो, तो वह दोष दूर होता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। 2. पितृ दोष का प्रभाव कम होना भगवान विष्णु को पितरों का अधिपति माना जाता है। लक्ष्मी नारायण की भक्ति करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। यदि परिवार में वंश वृद्धि में बाधा आ रही हो या बिना कारण के कलह रहता हो, तो इनकी आराधना से पितृ दोष की शांति होती है और कुल की उन्नति होती है। 3. दांपत्य जीवन के दोष लक्ष्मी नारायण को आदर्श युगल माना जाता है। इनकी पूजा से वैवाहिक जीवन के तनाव, मनमुटाव और मांगलिक दोष जैसे ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। यह आशीर्वाद पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और प्रेम को बढ़ाकर पारिवारिक कलह को समाप्त करता है। 4. वास्तु दोष का निवारण जिस घर में नियमित रूप से लक्ष्मी नारायण की पूजा और 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ होता है, वहां की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या मुख्य स्थान पर इनकी उपस्थिति से वास्तु जनित दोष स्वतः शांत होने लगते हैं और घर में सकारात्मकता का संचार होता है। 5. ग्रहों के अशुभ प्रभाव (विशेषकर शनि और राहु) भगवान विष्णु 'जगन्नाथ' हैं, जो सभी ग्रहों को नियंत्रित करते हैं। लक्ष्मी नारायण की शरण में जाने से शनि की साढ़ेसाती या राहु-केतु के अशुभ गोचर से होने वाली मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर होती हैं। यह भक्त के भीतर संकल्प शक्ति पैदा करता है, जिससे वह बुरे समय के दोषों को पार कर लेता है। > विशेष: "ॐ लक्ष्मी नारायणाय नमः" मंत्र का नियमित जाप 'भय' और 'असुरक्षा' जैसे मानसिक दोषों को दूर कर व्यक्ति को निर्भय और संतुष्ट बनाता है। >
जय लक्ष्मी नारायण - ShareChat