#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 312)
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(सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ।। सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया । तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ।।
उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा।
भीष्म उवाच
त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः । अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ।।
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।
भीष्म बोले-सारथे ! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो। क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा।
सूत उवाच
दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः । वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ।।
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् । नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ।।
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा । एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ।।)
सूत बोला- नरश्रेष्ठ ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि 'इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।
ततो देवव्रतो वृद्धेः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वने पितुः स्वयम् ।। ७५ ।।
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ।। ७५ ।।
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ।। ७६ ।।
भारत ! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ।। ७६ ।।
दाश उवाच
(राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर । अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ।।)
दाशराज बोला- याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है। इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो।
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।
पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ।। ७७ ।।
भरतर्षभ ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं। शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा ।। ७७ ।।
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ।। ७८ ।।
ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह-सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ।। ७८ ।।
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः।
यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ।। ७९ ।।
यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ।। ७९ ।।
तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।
अर्हः सत्यवतीं बोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ।। ८० ।।
तात ! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी। वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ।। ८० ।।
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया । स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ।। ८१ ।।
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ।। ८२ ।।
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज ! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही। आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान्के साथ शत्रुता ।। ८१-८२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🛐*॥ श्रीहरि: ॥*🛐
*⚜️ परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति का बढ़िया साधन क्या है⁉️ इस संबंध में एक बात बताई जाती है। संसार से विमुखता पूर्वक परमात्मा की तरफ चलने को हम बढ़िया समझते हैं, लेकिन बात थोड़ी अलग है, परमात्मा से हमने जो दूरी मान रखी है, इस दूरी की मान्यता को हटाने की आवश्यकता है। मानो परमात्मा की प्राप्ति नहीं करना है, परमात्मा के अप्राप्ति की जो मान्यता की हुई है, इस मान्यता को हटाना है। जैसे किसी को सत्यका पालन करना हो, तो उसे सत्य बोलने की अपेक्षा झूठ नहीं बोलने की सावधानी रखने की ज्यादा आवश्यकता है। असाधन के त्याग से स्वत: साध्य तत्त्व का अनुभव होता है।*
*⚜️ अवगुणों की स्वतंन्त्र सत्ता नहीं है, किसी में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि अवगुण दिखते हैं, तो गुणों की कमी का नाम ही अवगुण है। परमात्मा का और हमारा नित्य संबंध है, इस तरफ प्रायः दृष्टि कम है, इस कमी की पूर्ति करना साधन है। परमात्मप्राप्ति के लिए साधन करने की अपेक्षा परमात्मा को जो अप्राप्त मान रखा है, इस अप्राप्ति की मान्यता को हटाना बढ़िया है।**⚜️ परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है, ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ परमात्मा नहीं हो। परमात्मा सर्वव्यापक है, सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थों में, घटनाओं में मौजूद है। हमने परमात्मा की सर्व व्यापकता में जो कमी मान रखी है, संसार को जो सत्ता और महत्ता दी हुई है, इसको हटाना है। संसार की सत्ता और महत्ता के हटते ही सर्व व्यापक परमात्मा प्रकट हो जाएंगे। जिसका भाव विद्यमान ही नहीं है, उन शरीर-संसार को प्राप्त मान लिया और नित्य प्राप्त, सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा को अप्राप्त मान लिया, इस अप्राप्ति की मान्यता को हटाना है।*
*⚜️ 'सब जग ईश्वर रूप है, भलो बुरो नहिं कोय। जैसी जाकी भावना, तैसो ही फल होय॥' वास्तव में परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है, संसार का ज्ञान होता है; संसार का ज्ञान होते ही संसार की सत्ता और महत्ता मिट जाती है। इसलिए विध्यात्मक और निषेधात्मक साधन में निषेधात्मक साधन तेज है, क्योंकि संसार का निषेध ही करना है। आप नित्य हैं, शरीर-संसार अनित्य हैं, आपका और शरीर-संसार का संबंध हो ही नहीं सकता। इनके संबंध की जो मान्यता बनी हुई है, इस मान्यता का त्याग करना है। शरीर-संसार नित्य है अथवा अनित्य है, लेकिन शरीर-संसार का और हमारा (स्वरूप का) संबंध अनित्य है। नित्य को कहीं से लाना नहीं है, अनित्य का त्याग करना है, अनित्य का त्याग होते ही नित्य तत्त्व का अनुभव हो जाएगा।*
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#महाभारत
महाभारत की कथा में जब कर्ण ने श्रीकृष्ण से भावुक होकर पूछा—
“मेरा क्या दोष था?”
तो श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया, उसका सार बहुत गहरा और कर्म-प्रधान है।
श्रीकृष्ण का उत्तर (भावार्थ)
“कर्ण, तुम्हारा जन्म नहीं, तुम्हारे कर्म तुम्हारे बंधन बने।
तुमने सत्य को पहचाना, फिर भी अधर्म का साथ चुना।
सामर्थ्य होते हुए भी अन्याय के विरुद्ध खड़े नहीं हुए—
यही तुम्हारा दोष है।”
श्रीकृष्ण ने कर्ण को क्या समझाया?
जन्म नहीं, कर्म निर्णायक होते हैं — सूतपुत्र कहलाना दोष नहीं था।
दुर्योधन का साथ — मित्रता के नाम पर अधर्म का समर्थन किया।
द्रौपदी का अपमान — सभा में मौन (और समर्थन) सबसे बड़ा पाप बना।
शक्ति होते हुए भी विवेक का त्याग — सत्य जानते हुए गलत का साथ।
“धर्म का ज्ञान होते हुए भी अधर्म चुनना—
यही मनुष्य का वास्तविक पतन है।”
यह संवाद हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ नहीं, हमारे चुनाव हमारा भाग्य तय करते हैं।
#🏠घर-परिवार
👩❤️👩संबंध👩❤️👩
🎇इस जीवन में जो भी संबंध हमें मिलते हैं, जिन लोगों से हमारा सामना होता है, वे अचानक या संयोग मात्र नहीं होते। ये सब पहले से बनी हुई एक सूक्ष्म व्यवस्था का परिणाम होते हैं। हर आत्मा अपने साथ पूर्व कर्मों का संस्कार लेकर आती है और वही संस्कार तय करते हैं कि हमें किससे मिलना है, किससे जुड़ना है, और किस रूप में जुड़ना है। हम अक्सर सोचते हैं कि हम स्वतंत्र रूप से जीवन जी रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हम उसी जीवन को जी रहे होते हैं जिसे हम स्वयं अपने कर्मों से लगातार गढ़ रहे हैं।
आज जिन लोगों के प्रति हमारे मन में ईर्ष्या है, द्वेष है, छल है, उनसे भी हम अनजाने में एक संबंध बना रहे होते हैं। वह संबंध कटु हो सकता है, संघर्षपूर्ण हो सकता है, पर वह भी उतना ही वास्तविक है जितना प्रेम या करुणा से बना हुआ संबंध। कर्म केवल क्रिया नहीं है, कर्म एक बंधन है—जो हमें दूसरे जीवों से जोड़ देता है। जिस भाव से किया गया कर्म होता है, वही भाव उस बंधन का स्वरूप तय करता है।🎇
🌷इसी प्रकार जिनसे हम प्रेम करते हैं, जिनके लिए निस्वार्थ भाव से अच्छा करते हैं, जिनके दुःख में सहभागी बनते हैं, उनके साथ भी एक गहरा ऋण–अनुबंध बनता है। वह संबंध हल्का नहीं होता, वह आत्मा के स्तर पर अंकित हो जाता है। समय बीत जाता है, शरीर बदल जाते हैं, नाम और रूप बदल जाते हैं, लेकिन वह संबंध संस्कार बनकर आगे की यात्रा में साथ चलता है।🌷
🧑🍼हम जो आज बो रहे हैं, वही भविष्य में संबंधों के रूप में हमें वापस मिलता है। कोई माता बनकर आता है, कोई पुत्र, कोई मित्र, कोई शत्रु—सब हमारे ही कर्मों की प्रतिध्वनि होते हैं। जो आज हमें पीड़ा देता है, वह भी कहीं न कहीं हमारे ही अतीत का विस्तार होता है और जो आज हमें सहारा देता है, वह भी हमारे ही किसी शुभ कर्म का फल होता है।🧑🍼
🛐इसलिए जीवन केवल वर्तमान का खेल नहीं है, यह अनेक जन्मों में फैली हुई एक निरंतर यात्रा है। हर भाव, हर विचार, हर व्यवहार अगले जीवन की नींव रख रहा होता है। हम चाहे इसे समझें या न समझें, लेकिन प्रत्येक क्षण हम अपने आने वाले संबंधों की रचना कर रहे होते हैं। यही कारण है कि सजग व्यक्ति कर्म करते समय केवल आज नहीं देखता, वह उस अदृश्य कल को भी ध्यान में रखता है जो अवश्य आने वाला है।🛐
क्या शंकराचार्य हिंदू धर्म के एकमात्र रक्षक हैं❔
#🕉️सनातन धर्म🚩
बहुत-से हिंदू मानते हैं कि शंकराचार्य हिंदू धर्म, अर्थात् सनातन धर्म, के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता हैं और उन्हें लगभग भगवान के समान सम्मान दिया जाता है। आज शंकराचार्य पद के एक से अधिक धारक हैं। मूल शंकराचार्य को आदि शंकराचार्य कहा जाता है, और उन्हीं से चार प्रतिनिधि परंपरा में आए, जो चार अलग-अलग मठों (मठ संस्थानों) के अधिष्ठाता हैं। ये प्रतिनिधि भी शंकराचार्य कहलाते हैं।
हिंदू धर्म, अर्थात् सनातन धर्म, का संरक्षण या प्रचार कभी किसी एक व्यक्ति या संस्था के द्वारा ही नहीं हुआ। इसकी शक्ति इसकी बहुलता में है—अनेक परंपराएँ, दर्शन और आध्यात्मिक मार्ग एक साथ रहते हुए भी उन्हीं शाश्वत सत्यों को मानते और स्थापित करते हैं। यद्यपि आदि शंकराचार्य का हिंदू इतिहास में अत्यंत ऊँचा स्थान है, फिर भी उन्हें हिंदू धर्म का सर्वोच्च और एकमात्र संरक्षक मानना ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से सही नहीं है। उनके साथ-साथ चार अधिकृत संप्रदायों के चार महान वैष्णव आचार्य भी हैं, जिनका योगदान उतना ही मूलभूत और स्थायी रहा है।
अद्वैत वेदांत के समानांतर, चार वैष्णव परंपराओं ने भक्ति, धर्मशास्त्रीय विवेचन, मंदिर-संस्कृति और जीवन में आचरण के माध्यम से हिंदू धर्म का संरक्षण, प्रतिरक्षण और विस्तार किया।
*आदि शंकराचार्य की भूमिका: पुनर्जागरण, एकाधिकार नहीं*
आदि शंकराचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से भगवान शिव का अवतार माना जाता है, ने बौद्धिक पतन के समय में वैदिक प्रामाण्य को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अद्वैत वेदांत, मठ संस्थाएँ (चार मठ), तथा उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर सशक्त भाष्यों के माध्यम से उन्होंने वेदों की केंद्रीयता को पुनः स्थापित किया। उनका योगदान अत्यंत महान था—पर वह अनेक योगदानों में से एक था, हिंदू धर्म पर उनका कोई एकाधिकार या विशिष्ट आदेश नहीं था।
हिंदू परंपरा ने कभी भी आध्यात्मिक अधिकार को किसी एक दार्शनिक मत-प्रणाली में सीमित नहीं किया। स्वयं अद्वैत वेदांत भी शंकर के पहले और बाद में अन्य वेदांतिक व्याख्याओं के साथ सह-अस्तित्व में रहा है।
श्री आदि शंकराचार्य ने वेदों की सत्ता को पुनः स्थापित करके प्रारंभिक कार्य किया और शुद्ध भक्ति—सर्वोच्च भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा—को स्थापित करने का कार्य आगे चलकर वैष्णव आचार्यों जैसे विष्णुस्वामी, निम्बार्क, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य के द्वारा विशेष रूप से प्रकट हुआ। आगे की शताब्दियों में रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे महान आचार्यों ने वेदों को उनके मूल, निर्मल रूप में पुनः प्रस्तुत किया।
उन्होंने द्वैत दर्शन का प्रचार किया: कि जीव भगवान से सदा भिन्न है, कि भगवान का एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वरूप है, और मुक्ति की सर्वोच्च अवस्था उस परमेश्वर की सेवा में है। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों जैसे वैदिक ग्रंथों पर प्रभावशाली भाष्य भी लिखे और वेदों में वर्णित अनुसार सर्वकारण-कारण भगवान हरि की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित किया:
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥
“समस्त वैदिक शास्त्रों का बार-बार सूक्ष्म परीक्षण और विवेचन करने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि भगवान नारायण परम परब्रह्म हैं, अतः उनकी ही उपासना करनी चाहिए।” (पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, लिंग पुराण)
वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा
आदौ अन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते
“वैदिक साहित्य में—जिसमें रामायण, पुराण और महाभारत भी सम्मिलित हैं—आरम्भ से अंत तक तथा मध्य में भी सर्वत्र केवल हरि, परम पुरुषोत्तम भगवान, का ही वर्णन और गुणगान है।” (हरिवंश पुराण)
*चार वैष्णव आचार्य*
*1. निम्बार्काचार्य – कुमार संप्रदाय के आचार्य*
कहा जाता है कि श्री निम्बार्काचार्य 5,000 वर्ष से भी अधिक पहले, 3096 ईसा-पूर्व में, अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के राज्यकाल में प्रकट हुए। निम्बार्क ने द्वैताद्वैत (द्वैत-अद्वैत) का उपदेश दिया, जो राधा-कृष्ण भक्ति में निहित संतुलित तत्त्व-दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनके संप्रदाय ने वैदिक धर्मशास्त्र की रक्षा की और उन्मत्त/उत्कट भक्ति-परंपरा को पोषित किया।
*2. आदि विष्णुस्वामी – रुद्र संप्रदाय के आचार्य*
कहा जाता है कि श्री आदि विष्णुस्वामी लगभग 3री शताब्दी ईसा-पूर्व में, कलियुग के प्रारंभ के निकट, राजा जनमेजय के यज्ञ के पूर्ण होने के बाद प्रकट हुए। उन्होंने शुद्धाद्वैत वेदांत की स्थापना की। आगे चलकर उनकी परंपरा में वल्लभाचार्य प्रकट हुए और पुष्टिमार्ग परंपरा की स्थापना की। इस दर्शन ने भगवान की कृपा, आनंदमय भक्ति और गृहस्थ-जीवन की आध्यात्मिकता पर बल दिया, जिससे हिंदू धर्म केवल संन्यास तक सीमित न रहकर दैनिक जीवन में भी जीवंत रहा।
*3. रामानुजाचार्य – श्री संप्रदाय के आचार्य*
श्री रामानुजाचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से अनंत शेष का अवतार माना जाता है, 1188 ईस्वी (12वीं शताब्दी) में प्रकट हुए। उन्होंने विशिष्टाद्वैत वेदांत को व्यवस्थित रूप से स्थापित किया, जिसमें भक्ति और तर्कसंगत दर्शन का सुंदर समन्वय है। उन्होंने मंदिर-उपासना को पुनः सुदृढ़ किया, भक्ति की पहुँच को जातिगत सीमाओं से परे विस्तृत किया, और नारायण के प्रति शरणागति पर विशेष बल दिया। उनकी परंपरा आज भी हिंदू धर्म की सबसे सशक्त जीवंत परंपराओं में से एक है।
*4. मध्वाचार्य – ब्रह्मा संप्रदाय के आचार्य*
श्री मध्वाचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से वायुदेव का अवतार माना जाता है, 1238 ईस्वी (13वीं शताब्दी) में प्रकट हुए। उन्होंने द्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया और जीव तथा भगवान के बीच शाश्वत भेद को दृढ़ता से स्थापित किया। उनकी दृढ़ ईश्वरवादी दृष्टि ने निर्गुण/निराकारवादी व्याख्याओं के विरुद्ध व्यक्तिगत भक्ति का समर्थन किया और उत्तर भारत सहित अनेक भक्ति आंदोलनों पर गहरा प्रभाव डाला। आगे चलकर उनकी परंपरा में कृष्ण स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए और संकीर्तन आंदोलन का शुभारंभ किया।
पद्म पुराण से शास्त्रीय साक्ष्य
चार वैष्णव आचार्यों की महिमा पद्म-पुराण में इस प्रकार वर्णित है:
सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः ।
अतः कलौ भविष्यन्ति चत्वारः सम्प्रदायिनः ॥
श्री-ब्रह्म-रुद्र-सनकाः वैष्णवाः क्षितिपावनाः ।
चत्वारस्ते कलौ भाव्या ह्युत्कले पुरुषोत्तमात् ॥
रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्यं चतुर्मुखः ।
श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः ॥
“यदि किसी को किसी मान्य, प्रामाणिक संप्रदाय (शिष्य-परंपरा) के गुरु द्वारा दीक्षा नहीं मिलती, तो जो मंत्र वह प्राप्त करेगा उसमें शक्ति नहीं होगी और उसका फल निष्फल होगा। अतः कलियुग में चार संप्रदायों के चार संस्थापक/प्रवर्तक (आचार्य) प्रकट होंगे। वे चारों वैष्णव होंगे—श्री, ब्रह्मा, रुद्र और सनक संप्रदाय से सम्बद्ध—और पृथ्वी को पवित्र करने वाले होंगे। कलियुग में वे चारों अवश्य प्रकट होंगे और उत्कल (जगन्नाथ पुरी) में पुरुषोत्तम भगवान से उद्भूत होंगे। श्री (लक्ष्मी देवी) रामानुजाचार्य को स्वीकार करेंगी, चतुर्मुख ब्रह्मा मध्वाचार्य को स्वीकार करेंगे। रुद्र (शिवजी) श्री विष्णुस्वामी को स्वीकार करेंगे, और चतु:सन (चार कुमार) निम्बादित्य (निम्बार्काचार्य) को स्वीकार करेंगे।”
*धर्म विविधता के माध्यम से फलता-फूलता है*
सनातन धर्म किसी केंद्रीकृत धर्म की तरह कार्य नहीं करता, जहाँ एक ही “पोप” जैसी सर्वोच्च सत्ता हो। किसी एक आचार्य को हिंदू धर्म का एकमात्र संरक्षक मानना हिंदू इतिहास को न समझना है।
चार वैष्णव आचार्यों के प्रतिनिधि भी शंकराचार्यों के समान स्तर पर हैं और उनका सदैव सम्मान किया जाना चाहिए। मिलकर, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हिंदू धर्म आक्रमणों, बौद्धिक चुनौतियों और सामाजिक उथल-पुथल के बावजूद सुरक्षित और जीवंत बना रहे।
वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रणाली निगमनात्मक है और मान्य प्राधिकारों से शिष्य-परंपरा के माध्यम से प्राप्त होती है। ऐसा ज्ञान कभी भी डॉग्मैटिक नहीं होता—जैसा कि कभी-कभी गलत समझ लिया जाता है। जैसे पिता की पहचान बताने में माता प्राधिकारी होती है, वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करने में प्रामाणिक प्राधिकारी आवश्यक है। यह सिद्धांत भगवद्गीता 4.2 में भी प्रमाणित है, जहाँ अधिकृत परंपरा के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने पर बल दिया गया है।
आदि शंकराचार्य एक महान व्यक्तित्व हैं, किंतु उनके प्रतिनिधि हिंदू धर्म के एकमात्र संरक्षक नहीं हैं। चार वैष्णव आचार्य—रामानुज, मध्व, निम्बार्क और विष्णुस्वामी—और उनके प्रतिनिधि भी समान रूप से सर्वोच्च नेता हैं, जिनकी जीवंत परंपराएँ आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन करती हैं। हिंदू धर्म एक स्तंभ के कारण नहीं, बल्कि अनेक स्तंभों के कारण स्थिर है—और हर स्तंभ सनातन धर्म की शाश्वत संरचना को संभाले हुए है।
नारायण
🪷🌷🪷
निषाद पुरुष यदि ५ पीढ़ियों तक निषाद स्त्री से विवाह करके पुत्र उत्पन्न करे तो ५वीं पीढ़ी उपनयन योग्य होती है , छठी यज्ञ योग्य तथा ७वीं पीढ़ी दोषमुक्त ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
नारायण
🪷🌷🪷
#श्री हरि
मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥
पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।
दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।
गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ॥
कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानवः ।
अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ॥
सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातःकाले तथैव च ।
मध्याह्ने च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
अर्थ = हे पार्थ ! मत्स्य , कूर्म , वराह , वामन , जनार्दन , गोविन्द , पुण्डरीकाक्ष , माधव , मधुसूदन , पद्मनाभ , सहस्त्राक्ष , वनमाली , हलायुध , गोवर्धन , हृषीकेश , वैकुण्ठ , पुरुषोत्तम , विश्वरूप , वासुदेव , राम , नारायण , हरि , दामोदर , श्रीधर , वेदाङ्ग , गरुडध्वज , अनन्त और कृष्णगोपाल इन नामोंका जप करनेवाले मनुष्यके भीतर पाप नहीं रहता । वह एक करोड गो - दान , एक सौ अश्वमेधयज्ञ और एक हजार कन्यादानका फल प्राप्त करता है । अमावस्या , पूर्णिमा तथा एकादशी तिथिको और प्रतिदिन सायं प्रातः एवं मध्याह्नके समय इन नामोंका स्मरणपूर्वक जप करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥
नारायण
🪷🌷🪷
#जय श्री कृष्ण
गोलोक और किम्वर्ष का रहस्य
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गोलोक
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कहा जाता है कि गोलोक हमारी धरती और अन्य लोकों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से बहुत ही दूर है गोलोक के बारे में एक कथा है कि एक बार नारद को अपनी भक्ति पर अभिमान हो गया और वो विचरते विचरते गोलोक जा रहे थे, परन्तु कुछ समय बाद उन्हें अनुभव हुआ कि गोलोक का मार्ग अत्यधिक ज्यादा लंबा हो गया है वो चकित विचलित हो उठे, क्योंकि उन्हें इतना चलने के बाद भी गोलोक का ना ओर मिल रहा था ना छोर, उन्होंने अथक प्रयत्न किया किन्तु वहीं के वहीं पहुँच जाते थे जहां से चले थे परन्तु मंजिल का कोई अता-पता ही नहीं था ! वो निराश हो कर भगवान श्री कृष्ण और श्री हरी नारायण को भजने लगे तब भगवान प्रकट हुए, अब तक नारद को अनुभव हो चुका था कि उनके अभिमान का ही ये दंड है वो प्रभु से क्षमा मांगने लगे ! भगवान ने भी क्षमा कर दिया वो अपने भक्तों के अवगुण हर कर उसे निश्छल मन करने में कहाँ पीछे रहते ! गोलोक में आज भी भगवान श्री कृष्ण समस्त गोपिकाओं और राधा जी के साथ आज भी निवास करते हैं !
गोलोक वास्तव में 51वें डायमेंशन में है, पुराणों और वेदों के अनुसार, और आधुनिक साइंस के अनुसार भी सृष्टि में 31 डायमेंशन संभावित हैं, परन्तु वहां तक पहुंचना दुष्कर और असंभव कार्य है तो गोलोक तो 51वें डायमेंशन में है, जहां का पता तो स्वयं इंद्र और अन्य देवताओं को भी नहीं है ! बस भगवान की इच्छा से ही वहां पहुंचा जा सकता है !
किम्वर्ष
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राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन
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किम्वर्ष कहाँ है यह वास्तव में अज्ञात है ये सृष्टि के सभी डायमेंशन से पार है इस राम-लोक का पता हनुमान जी, विभीषण और जामवंत जी के अतिरिक्त किसी को भी नहीं है, नारद भी अभी तक वहां नहीं पहुँच सके हैं मन से पूर्ण समर्पित राम भक्त ही वहां जाने का अधिकारी हो सकता है ! किम्वर्ष भी गोलोक जैसा है किन्तु इसका आकार और प्रकार अज्ञात है ! धरती पर अयोध्या नगरी, ओरछा नगरी और साकते धाम को ही राम धाम माना और जाना जाता है परन्तु सृष्टि के पार राम का मुख्य धाम किम्वर्ष है जहां हनुमान जी, विभीषण जी और जामवंत जी सतत उनकी सेवा में रहते हैं, हनुमान जी से भी पहले माता शबरी को इस लोक में निवास मिला था !
राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन
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श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मण जी के बड़े भाई, आदिपुरुष सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परमभागवत श्रीहनुमान जी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं। वहाँ अन्य गन्धर्वों के सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं-
‘हम ॐकारस्वरूप पवित्र कीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधन तत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मण भक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः-पुनः प्रणाम है’। ‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परमशान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जाने योग्य, नाम-रूप से रहित और अहंकार शून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ।
प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है। अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीता जी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था। आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीता जी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मण जी का त्याग ही कर सकते हैं।
आपके ये व्यापार केवल लोक शिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाकचातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि-इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य-कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नर रूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं।
आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तर कोसलवासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे’। भारतवर्ष में भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये अव्यक्त रूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। हाँ भगवान् नारद जी स्वयं श्रीभगवान् के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्र के सहित भगवन्महिमा को प्रकट करने वाले पांचरात्र दर्शन का सावर्णी मुनि को उपदेश करने के लिये भारतवर्ष की वर्णाश्रम-धर्मावलम्बिनी प्रजा के सहित अत्यन्त भक्तिभाव से भगवान् श्रीनर-नारायण की उपासना करते और इस मन्त्र का जप तथा स्तोत्र को गाकर उनकी स्तुति करते हैं।
( टिप्पणी 👉 यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभी के आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् (धीर) पुरुषों के ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूप से अनुभव करते हैं-अन्य पुरुष नहीं। श्रुति में जहाँ-कहीं आत्मसाक्षात्कार की बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ता के लिये ‘धीर’ शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत’ इति ‘नः शुश्रुम धीराणाम्’ इत्यादि। इसीलिये यहाँ भी भगवान् को आत्मवान् या धीर पुरुष का आत्मा बताया है। ऊपर जायें एक बार भगवान् श्रीराम एकान्त में देवदूत से बात कर रहे थे। उस समय लक्ष्मण जी पहरे पर थे और भगवान् की आज्ञा थी कि कि यदि इस समय कोई भीतर आवेगा तो वह मेरे हाथ से मारा जायेगा। इतने में ही दुर्वासा मुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मण जी को अपने आने की सूचना देने के लिये भीतर जाने को विवश किया। इससे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भगवान् बड़े असमंजन में पड़ गये। तब वसिष्ठ जी ने कहा कि लक्ष्मण जी के प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजन का त्याग मृत्युदण्ड के समान ही है। इसी से भगवान् ने उन्हें त्याग दिया। गोलोक धाम की तरह ही श्री राम का परम धाम वैकुण्ठ के साथ किम्पुरुष वर्ष भी है )
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🕉️सनातन धर्म🚩
शिखा सभी वर्णों और अन्त्यजों के लिए है - हिन्दुत्व की पहचान है ।
ईसाई स्कूलों में मिलने वाले विधर्मी संस्कारों के कारण हिन्दुओं ने चोटी त्याग दी है ।
नारायण
🪷🌷🪷
#महाभारत
🧘कृपाचार्य — एक अमर साक्षी की मौन पीड़ा🧘
🛐महाभारत के विराट और हृदय विदारक इतिहास में जहाँ भीष्म की प्रतिज्ञा गूँजती है, अर्जुन का गांडीव चमकता है और श्रीकृष्ण का गीता उपदेश अमर हो जाता है—वहीं एक मौन छाया भी है।
वह छाया है — कृपाचार्य। न वे सर्वाधिक प्रशंसित थे, न वे सर्वाधिक निंदित। वे केवल साक्षी थे — एक ऐसे युग के, जो स्वयं अपने ही हाथों नष्ट हो गया।🛐
🧍जन्म से ही विरक्त, नियति से बँधे कृपाचार्य का जन्म साधारण नहीं था। वे महर्षि शरद्वान के पुत्र थे, जिन्हें राजा शंतनु ने आश्रय दिया। राजमहल में पले-बढ़े, पर मन में सदैव ऋषित्व की गंभीरता थी। वे कुरुवंश के राजगुरु बने।
उन्होंने कौरवों और पांडवों — दोनों को धनुर्विद्या और शस्त्रविद्या का ज्ञान दिया। सोचिए उस गुरु का हृदय कैसा रहा होगा, जो जानता था कि उसके शिष्य एक दिन एक-दूसरे का रक्त बहाएँगे।
गुरु, जो किसी एक का नहीं था
कृपाचार्य ने अर्जुन की एकाग्रता देखी, भीम की शक्ति को दिशा दी,
दुर्योधन की महत्वाकांक्षा को भी प्रशिक्षित किया। उनके लिए सभी शिष्य थे। पर जब अधर्म और अहंकार की ज्वाला बढ़ी, तो वे राजधर्म से बँध गए।🧍
👩❤️👩उन्होंने कौरवों की ओर से युद्ध किया। क्या वे अधर्म के पक्षधर थे? नहीं। वे केवल अपने कर्तव्य से बँधे थे। और कभी-कभी कर्तव्य भी मनुष्य को भीतर से तोड़ देता है।👩❤️👩
🌍कुरुक्षेत्र — जहाँ शिष्य शत्रु बने। जब कुरुक्षेत्र में शंखनाद हुआ, कृपाचार्य ने भी शस्त्र उठाया। उन्होंने देखा—भीष्म पितामह का पतन। द्रोणाचार्य का छलपूर्वक वध। कर्ण का सूर्यास्त।
अपने ही शिष्यों का एक-दूसरे के हाथों अंत। हर दिन युद्धभूमि में रक्त बहता था, और हर रात एक गुरु का हृदय रोता था। वे जीवित रहे। और कभी-कभी जीवित रह जाना ही सबसे बड़ा दंड होता है।
तीन बचे हुए योद्धाओं में एक
महायुद्ध के पश्चात कौरव पक्ष से केवल तीन योद्धा जीवित बचे—
अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य।🌍
⁉️पर क्या यह विजय थी? नहीं।
यह केवल शेष रह गई शून्यता थी। बाद में उन्होंने पांडवों के वंशज परीक्षित को शिक्षा दी।⁉️
🎇कल्पना कीजिए—जिस गुरु ने पांडवों के विरुद्ध युद्ध किया, वही उनके वंश का आचार्य बना। समय ने मानो उन्हें यह सिखाया कि युद्ध किसी का स्थायी नहीं होता।🎇
⁉️अमरता — वरदान या अभिशाप?⁉️
🕉️कहा जाता है कि कृपाचार्य चिरंजीवी हैं। पर क्या अमर रहना सुख है, जब स्मृतियाँ ही घाव बन जाएँ? उन्होंने देखा— भाई-भाई का वध, धर्म का भ्रम, राज्य का पतन। वे इतिहास के अमर साक्षी हैं —पर उनके हृदय की पीड़ा भी अमर है।🕉️
🍀मौन में छिपा हुआ करुण राग
कृपाचार्य की कथा में न अत्यधिक वीर रस है, न स्पष्ट खलनायक का अंधकार। उनकी कथा करुणा की है। एक गुरु की, जो अपने ही शिक्षित शिष्यों को मरते देखता रहा। एक योद्धा की, जो कर्तव्य और अंतर्मन के बीच झूलता रहा।
एक अमर की, जो युगों से इतिहास का भार उठाए चल रहा है। यदि कभी कुरुक्षेत्र की मिट्टी को हाथ में लेकर आप आँखें बंद करें, तो शायद आपको तलवारों की टकराहट नहीं— बल्कि कृपाचार्य की मौन आह सुनाई दे।













