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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#❤️जीवन की सीख अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः । उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् ॥ [ चाणक्यनीतिदर्पणम् ८/१ ] अर्थात् 👉🏻 निम्नकोटि के लोगो को केवल धन की इच्छा रहती है , ऐसे लोगो को सम्मान से सरोकार नहीं होता । एक मध्यमकोटि का व्यक्ति धन एवं सम्मान दोनों की इच्छा करता है वही एक उच्चकोटि के व्यक्ति हेतु सम्मान ही महत्व रखता है । सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है । 🌄🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌄
❤️जीवन की सीख - सन्त महात्मा जवतक उदार नही 6 स्वाधीन नही है॰ प्रेमी नही ऐ॰ तबतक आप महात्मा नही हे॰ चाहे कितना ही बढिया व्याख्यान एम देले। व्याख्यान देनेसे महात्मा नही हो जाते। रातवाणी ४/०३  सन्त महात्मा जवतक उदार नही 6 स्वाधीन नही है॰ प्रेमी नही ऐ॰ तबतक आप महात्मा नही हे॰ चाहे कितना ही बढिया व्याख्यान एम देले। व्याख्यान देनेसे महात्मा नही हो जाते। रातवाणी ४/०३ - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🙏|| श्री हरि: ||🙏 --- :: x :: --- ‼️अपना जीवन दूसरों के हित के लिये हो‼️ --- :: x : : --- 🌍संसार में कोई भी चीज हो उससे शिक्षा लेनी चाहिये | वर्तमान में हममे बुरी आदतें हैं, बुरा भाव है, उसे हटाना चाहिये | जो चीज जिसमे अच्छी हो उससे ग्रहण करनी चाहिये | अच्छे पुरुषों की जीवनी, दर्शन, गुणों से हमे शिक्षा मिलती है, वे तो शिक्षालय ही है | चद्दर से हमे शिक्षा मिल सकती है | जिसकी चद्दर है वह चाहे सिर पर रखे, चाहे पैरों में रखे वह कुछ नहीं कहती | चाहे फाडो, आग में डाल दो कुछ नहीं बोलती, अपने-आपको अपने मालिक को सौंप रखा है | यह शिक्षा दे रही है कि जैसे मैं अपने स्वामी की शरण हूँ, यही शरण का भाव है | जहाँ तक अपना अधिकार है, वह सब कुछ भगवान् के अर्पण कर देना, भगवान् के काम में ही लगा देना है |🌍 🤹कठपुतली ने अपने-आपको सूत्रधार के अर्पण कर रखा है | हमे भी अपने आपको परमात्मा के अर्पण कर देना चाहिये | वे जो कुछ करें, उनकी सारी क्रिया में मौन रहना चाहिये | उनके नाम-गुणों का कीर्तन, भजन, स्मरण, ध्यान भी करना चाहिये | कठपुतली यह नहीं कर सकती | हमे यह विशेष करना चाहिये | गीता में भगवान् ने बताया है –🤹 🛐सब कर्मों को मन से मुझ में अर्पण करके तथा समबुध्दिरूप योग को अवलम्बन करके मेरे परायण और निरन्तर मुझमे चित्त वाला हो (गीता १८/५७) |🛐 ✍️इसी प्रकार हमे अपने शरीर की तरफ देखकर निर्णय करना चाहिये कि यह किस काम की चीज है | दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं जो मनुष्य नहीं कर सके | चादर तो मनुष्य की ही सेवा कर सकती है | मनुष्य, देवता, भूत, पितर, यक्ष, राक्षस, वृक्ष. पशु आदि दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबकी मनुष्य सेवा कर सकता है | मनुष्य के अलावा कोई प्राणी ऐसा नहीं कर सकता | मनुष्य-शरीर तुम्हारे हाथ में है, यह जब तक तुम्हारे पास है सबकी सेवा करो, सबकी सेवा करना ही महायज्ञ है |✍️ --- :: x :: --- --- :: x ::
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#❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी ‼️अपनी बात पर पक्के रहो..*✨‼️ 👩‍❤️‍👩आप अपनी बात पर दृढ़ रहो। एक बार जो अपना विचार कर लिया, उसपर पक्के रहो। यह बहुत मार्मिक बात है। *जो बार-बार बात कह देता है, फिर छोड़ देता है, वह परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर सकता।* उसकी आदत खराब हो गयी है। इसलिये अपनी बात पर पक्के रहो। मर जाओगे, और क्या होगा ? एक बार तो मरना ही पड़ेगा। सदा जी तो सकते नहीं। अतः बात कह दी तो कह दी। अब चाहे सूर्य पूर्व की अपेक्षा पश्चिम में उदय हो जाय, पर प्रतिज्ञा नहीं छोड़ेंगे। ऐसा करने से वचनों में बड़ी शक्ति आती है। इससे दूसरों को भी लाभ होता है, खुद को भी लाभ होता है। इसलिये *अपनी आदत ऐसी बनाओ कि जो फैसला लिया है, उसका हम पालन करेंगे।* 👩‍❤️‍👩 ♦️भीष्मजी महाराज के ऊपर कितनी आफत आयी, गुरुजी (परशुरामजी)-के साथ युद्ध करना पड़ा, पर अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। पहले मुख से वचन मत निकालो, और वचन निकालो तो उसका पालन करो। भीष्मजी महाराज को दुःख कम नहीं आये। उन्होंने सब दुःख सहे, पर न विवाह किया, न राजगद्दी पर बैठे। जब युधिष्ठिरजी महाराज राजगद्दी पर बैठे, तब उन्होंने अपने प्राण छोड़े, अन्यथा इतने दिन शरशय्या पर पड़े रहे!♦️ 🙏*राम ! राम !! राम !!!🙏
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#जय श्री राम 🙏राजतिलक की घोषणा🙏 कैकेय पहुँच कर भरत अपने भाई शत्रुघ्न के साथ आनन्दपूर्वक अपने दिन व्यतीत करने लगे। भरत के मामा अश्वपति उनसे उतना ही प्रेम करते थे जितना कि उनके पिता राजा दशरथ। मामा के इस स्नेह के कारण उन्हें यही लगता था मानो वे ननिहाल में न होकर अयोध्या में हों। इतने पर भी उन्हें समय-समय पर अपने पिता का स्मरण हो आता था और वे उनके दर्शनों के लिये आतुर हो उठते थे। राजा दशरथ की भी यही दशा थी। यद्यपि राम और लक्ष्मण उनके पास रहते हुये सदैव उनकी सेवा में संलग्न रहते थे, फिर भी वे भरत और शत्रुघ्न से मिलने के लिये अनेक बार व्याकुल हो उठते थे। समय व्यतीत होने के साथ राम के सद्बुणों का निरन्तर विस्तार होते जा रहा था। राजकाज से समय निकाल कर आध्यात्मिक स्वाध्याय करते थे। वेदों का सांगोपांग अध्ययन करना और सूत्रों के रहस्यों का समझ कर उन पर मनन करना उनका स्वभाव बन गया था। दुखियों पर दया और दुष्टों का दमन करने के लिये सदैव तत्पर रहते थे। वे जितने दयालु थे, उससे भी कई गुना कठोर वे दुष्टों को दण्ड देने में थे। वे न केवल मन्त्रियों की नीतियुक्त बातें ही सुनते थे बल्कि अपनी ओर से भी उन्हें तर्क सम्मत अकाट्य युक्तियाँ प्रस्तुत करके परामर्श भी दिया करते थे। अनेक युद्धों में उन्होंने सेनापति का दायित्व संभालकर दुर्द्धुर्ष शत्रुओं को अपने पराक्रम से परास्त किया था। जिस स्थान में भी वे भ्रमण और देशाटन के लिये गये वहाँ के प्रचलित रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक धारणाओं का अध्ययन किया, उन्हें समझा और उनको यथोचित सम्मान दिया। उनके क्रिया कलापों ऐसे थे कि लोगों को विश्वास हो गया कि रामचन्द्र क्षमा में पृथ्वी के समान, बुद्धि-विवेक में बृहस्पति के समान और शक्ति में साक्षात् देवताओं के अधिपति इन्द्र के समान हैं। न केवल प्रजा वरन स्वयं राजा दशरथ के मस्तिष्क में यह बात स्थापित हो गई थी कि जब भी राम अयोध्या के सिंहासन को सुशोभित करेंगे, उनका राज्य अपूर्व सुखदायक होगा और वे अपने समय के सर्वाधिक योग्य एवं आदर्श नरेश सिद्ध होंगे। राजा दशरथ अब शीघ्रातिशीघ्र राम का राज्याभिषेक कर देना चाहते थे। उन्होंने मन्त्रियों को बुला कर कहा, हे मन्त्रिगण! अब मैं वृद्ध हो चला हूँ और रामचन्द्र राजसिंहासन पर बैठने के योग्य हो गये हैं। मेरी प्रबल इच्छा है कि शीघ्रातिशीघ्र राम का अभिषेक कर दूँ। अपने इस विचार पर आप लोगों की सम्मति लेने के लिये ही मैंने आप लोगों को यहाँ पर बुलाया है, कृपया आप सभी अपनी सम्मति दीजिये। राजा दशरथ के इस प्रस्ताव को सभी मन्त्रियों ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। शीघ्र ही राज्य भर में राजतिलक की तिथि की घोषणा कर दी गई और देश-देशान्तर के राजाओं को इस शुभ उत्सव में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण पत्र भिजवा दिये गये। थोड़े ही दिनों में देश-देश के राजा महाराजा, वनवासी ऋषि-मुनि, अनेक प्रदेश के विद्वान तथा दर्शगण इस अनुपम उत्सव में भाग लेने के लिये अयोध्या में आकर एकत्रित हो गये। आये हुये सभी अतिथियों का यथोचित स्वागत सत्कार हुआ तथा समस्त सुविधाओं के साथ उनके ठहरने की व्यस्था कर दी गई। निमन्त्रण भेजने का कार्य की उतावली में मन्त्रीगण मिथिला पुरी और महाराज कैकेय के पास निमन्त्रण भेजना ही भूल गये। राजतिलक के केवल दो दिवस पूर्व ही मन्त्रियों को इसका ध्यान आया। वे अत्यन्त चिन्तित हो गये और डरते-डरते अपनी भूल के विषय में महाराज दशरथ को बताया। यह सुनकर महाराज को बहुत दुःख हुआ किन्तु अब कर ही क्या सकते थे? सभी अतिथि आ चुके थे इसलिये राजतिलक की तिथि को टाला भी नहीं जा सकता था। अतएव वे बोले, अब जो हुआ सो हुआ, परन्तु बात बड़ी अनुचित हुई है। अस्तु वे लोग घर के ही आदमी हैं, उन्हें बाद में सारी स्थिति समझाकर मना लिया जायेगा।.
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#महाभारत अहंकार का बीज महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की विजय पताका लहरा रही थी। इस विजय और श्री कृष्ण के निरंतर सानिध्य ने अर्जुन के मन में एक सूक्ष्म अहंकार का बीज बो दिया था। अर्जुन को लगने लगा था, "मेरे रथ के सारथी स्वयं त्रिभुवन के स्वामी हैं। वे हर पल मेरी रक्षा करते हैं, मेरी हर बात मानते हैं। निश्चय ही मैं ही श्री कृष्ण का सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रिय भक्त हूँ।" श्री कृष्ण तो अंतर्यामी हैं, वे अर्जुन के मन में पनप रहे इस अहंकार को भांप गए। वे जानते थे कि अहंकार भक्ति के मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। अपने प्रिय सखा का कल्याण करने और उसका भ्रम तोड़ने के लिए, लीलाधर ने एक विचित्र लीला रची। एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, "पार्थ! चलो आज भ्रमण के लिए चलते हैं।" लेकिन इस बार रूप अलग था। दोनों ने जोगियों (साधुओं) का वेश धारण किया। श्री कृष्ण ने अपनी माया से वन से एक खूंखार शेर (सिंह) को पकड़ा और उसे अपने साथ ले लिया। अर्जुन हैरान थे कि आखिर माधव करना क्या चाहते हैं? चलते-चलते वे भगवान विष्णु के परम भक्त, राजा मोरध्वज की नगरी 'रत्नपुरी' पहुंचे। राजा मोरध्वज अपनी दानवीरता, धर्म-पालन और अतिथि सत्कार के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उनके द्वार से कोई भी याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटा था। द्वारपालों ने जब राजा को सूचना दी कि दो तेजस्वी साधु एक सिंह के साथ द्वार पर पधारे हैं, तो राजा मोरध्वज नंगे पाँव दौड़ते हुए आए। साधुओं के तेज को देखकर वे नतमस्तक हो गए और हाथ जोड़कर बोले, "हे महात्माओं! मेरा अहोभाग्य जो आप मेरे द्वार पधारे। कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें और मुझे सेवा का अवसर दें।" साधु वेश में श्री कृष्ण बोले, "राजन! हम तुम्हारा आतिथ्य तब ही स्वीकार करेंगे जब तुम हमारी एक शर्त पूरी करोगे। सोच लो, यह आसान नहीं होगा।" राजा मोरध्वज ने बिना संकोच कहा, "महाराज! रघुकुल रीति की तरह ही मेरे कुल की भी मर्यादा है। प्राण जा सकते हैं, पर वचन नहीं। आप आज्ञा दें।" श्री कृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा, "राजन, हम तो ब्राह्मण हैं, जो मिलेगा खा लेंगे। लेकिन हमारा यह सिंह नरभक्षी है। यह तब ही भोजन करेगा जब तुम अपने इकलौते पुत्र का मांस इसे खिलाओगे। और शर्त यह है कि तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को अपने ही हाथों से आरी (karvat) से अपने पुत्र के दो टुकड़े करने होंगे। यदि इस दौरान तुम्हारी आँखों से एक भी आंसू गिरा, तो यह सिंह भोजन ग्रहण नहीं करेगा और हम चले जायेंगे।" यह शर्त किसी वज्रपात से कम नहीं थी। एक पिता के लिए इससे बड़ा धर्म-संकट और क्या हो सकता था? अर्जुन का कलेजा कांप उठा, उन्हें लगा राजा अभी मना कर देंगे। लेकिन राजा मोरध्वज तो भक्ति की उस अवस्था में थे जहाँ मोह का कोई स्थान नहीं था। राजा ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर! मुझे शर्त स्वीकार है। बस एक बार अपनी अर्धांगिनी से अनुमति ले लूं।" राजा भारी मन से रनिवास पहुंचे। रानी ने जब राजा का उतरा हुआ चेहरा देखा तो कारण पूछा। राजा ने सारी बात बताई। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, लेकिन अगले ही पल रानी की आँखों में आंसू और मुख पर तेज था। वे बोलीं, "स्वामी! यह नश्वर शरीर तो एक दिन नष्ट होना ही है। यदि हमारे पुत्र का बलिदान संतों की सेवा में काम आए, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा? आप उन महात्माओं को आदर सहित भीतर लाइए। मैं अपनी कोख धन्य करूँगी।" राजा, रानी और उनका छोटा सा पुत्र रतन कंवर—तीनों दरबार में उपस्थित हुए। बालक रतन अभी मात्र कुछ ही वर्षों का था, लेकिन संस्कारों में अपने माता-पिता से कम न था। उसने हंसते-हंसते बलिदान के लिए सहमति दे दी। भोजन की तैयारी शुरू हुई। एक तरफ छप्पन भोग रखे थे, दूसरी तरफ मृत्यु का सन्नाटा। राजा और रानी ने अपने ही हाथों में वह आरी थामी। अर्जुन यह दृश्य देख नहीं पा रहे थे, उनका गला सूख रहा था, हृदय बैठा जा रहा था। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भक्ति में इतना कठोर भी हो सकता है। आरी चली। न राजा का हाथ कांपा, न रानी का। बालक के मुख पर भी हरि का नाम था। उसने उफ़ तक न की। जैसे ही बालक का शरीर आधा कटा, रानी की बायीं आँख से एक आंसू टपक पड़ा। यह देखते ही श्री कृष्ण (साधु वेश में) क्रोधित होकर खड़े हो गए। "रुको राजन! हमने पहले ही कहा था कि यदि यह कार्य दुखी मन से किया गया तो हम स्वीकार नहीं करेंगे। देखो, तुम्हारी रानी रो रही है। यह भोजन अशुद्ध हो गया। हम जा रहे हैं।" राजा और रानी भगवान के चरणों में गिर पड़े। रानी ने रोते हुए कहा, "हे महात्मा! यह आंसू पुत्र मोह में नहीं गिरा। यह तो मेरे शरीर के बाएं हिस्से (वाम अंग) का दुःख है। मेरी बायीं आँख इसलिए रो रही है क्योंकि आपने पुत्र के दाहिने अंग को तो भोजन के लिए स्वीकार कर लिया, लेकिन बायां अंग व्यर्थ जा रहा है। यह आंसू दुःख का नहीं, उस हिस्से के दुर्भाग्य का है जो आपकी सेवा में नहीं आ सका।" यह सुनते ही वहां खड़े अर्जुन का धैर्य टूट गया। जिस भक्ति पर उन्हें गर्व था, वह राजा मोरध्वज और उनकी रानी के इस त्याग के आगे तिनके के समान थी। अर्जुन को अपनी तुच्छता का अहसास हो गया। वे दौड़कर श्री कृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बिलखने लगे। "माधव! बस करो प्रभु। अब और परीक्षा न लो। मेरे अहंकार को तोड़ने के लिए आपने इन परम भक्तों को इतना कष्ट दिया। मैंने मान लिया केशव, इनसे बड़ा भक्त तीनों लोकों में कोई नहीं है। अब अपनी लीला समाप्त करें।" अर्जुन का अहंकार चूर-चूर हो चुका था। श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने रानी से कहा, "देवी! अपने पुत्र को आवाज दो।" रानी ने चकित होकर सोचा कि पुत्र तो अब रहा नहीं, पर साधु की आज्ञा मानकर उन्होंने पुकारा, "रतन! बेटा बाहर आओ।" और तभी चमत्कार हुआ। वही रतन कंवर, जिसका शरीर कुछ क्षण पहले तक कटा हुआ था, वह दौड़ता हुआ, खेलता-हंसता हुआ अपनी माँ के गले लग गया। शेर और साधु का वेश ओझल हो गया और साक्षात् शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी भगवान विष्णु के रूप में श्री कृष्ण प्रकट हुए। राजा मोरध्वज, रानी और रतन भगवान के चरणों में लोट गए। उनकी भक्ति सफल हो गई थी। भगवान ने उन्हें गले लगाया और कहा, "मांगो राजन! आज तुम जो मांगोगे, मैं दूंगा।" राजा मोरध्वज और रानी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! हमें मोक्ष या धन नहीं चाहिए। बस एक ही वरदान दीजिये कि भविष्य में आप अपने किसी भी भक्त की इतनी कठिन परीक्षा न लें। हर कोई इस कठोरता को सहन नहीं कर पाएगा।" भगवान ने 'तथास्तु' कहा।
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' इस आधे श्लोक में सब शास्त्रों का सार आ गया है, सब शास्त्रों में इस आधे श्लोक की व्याख्या है। असत् वस्तु की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् वस्तु (तत्त्व)-का अभाव विद्यमान नहीं है। धनवान में धन के सिवाय कुछ विशेषता नहीं है, ऐसे ही नाशवान् में नाश के सिवाय कोई सार नहीं है; वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियाँ सभी नाश की तरफ जा रहे हैं; नाश की तरफ जो निरन्तर प्रवाह है, वही विद्यमान की तरह दिख रहा है। नाशवान् के नाशपने का अनुभव हो जाय तो अविनाशी तत्त्व का अनुभव हो जाय; और अविनाशी के सदा रहने का ज्ञान हो जाय तो नाशवान् का नाशपना समझ में आ जाय। दोनों में से किसी एक का ज्ञान होने पर दोनों का ज्ञान हो जाता है।* *⚜️ वहम यह होता है कि हम जी रहे हैं, लेकिन जिसकी जितनी उम्र हो गई, उतने तो मर ही गये! जन्म के समय जितनी उम्र थी, उतनी उम्र अब किसी की भी नहीं रही; और अब आगे कितनी उम्र है, उसका पता नहीं है; उम्र समाप्त होते ही यहाँ से जाना पड़ेगा। निरन्तर मर रहे हैं, लेकिन काम इस तरह कर रहे हैं, जैसे यहाँ स्थायी रहना हो! 'शरीर-संसार नाशवान् हैं, सदा रहने वाले नहीं हैं',— ऐसी जाग्रति हर समय रहनी चाहिए। जैसे हम अभी जहां हैं, इसको याद नहीं रखना पड़ता है, लेकिन ऐसी जाग्रति हर समय है कि हम संसार में हैं। 'कहा माँगूँ कछु थिर न रहाई। देखत नयन चल्यो जग जाई॥'* *⚜️ अभाव-रूप के अभाव का अनुभव होते ही भाव-रूप परमात्मा का ज्ञान हो जाता है। ज्ञानमार्ग नाशवान् का अभाव करता है और भक्तिमार्ग भाव (परमात्मा)-को स्वीकार करता है। दृश्य मात्र नाशवान् है, निरन्तर नष्ट हो रहा है, यह सार बात है। तत्त्वदर्शियों ने दोनों के तत्त्व को देखा है, विनाशी, विनाशी ही है और अविनाशी, अविनाशी ही है।* *है सो सुन्दर है सदा, नहीं सो सुन्दर नाहिं।* *नहीं सो परगट देखिए, है सो दीखे नाहिं॥* *⚜️ असत्, नाशवान् का सदुपयोग करना है, इसको स्थायी मानना, संचय करना, इसका भरोसा रखना मुर्खता है। नाशवान् शरीर-संसार का आश्रय लेंगे, इसको सदा बनाये रखना चाहेंगे तो रोना पड़ेगा, पश्चात्ताप करना पड़ेगा। भोग भोगने की रुचि रहेगी तो भोगना कभी खत्म होगा ही नहीं। जन्म गये तो मरना बाकी रहेगा; और मर गये तो जन्म लेना बाकी रहेगा। मनुष्य शरीर में दो ही काम खास करने के हैं— भगवान् को याद करना और संसार की सेवा करना।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 देखिए जब भगवान किसी भी रूप में लीला करते हैं तो वे बिल्कुल उस जीव के स्तर तक आकर लीला करते हैं, श्री राम ने मनुष्य का रूप लिया। तो एक मनुष्य के जीवन में जो भी सुख दुःख आते हैं, उन सबका अनुभव किया.. वर्ना भगवान को कुछ करने की जरूरत ही क्या है, वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सब कुछ उनके पास पहले ही है.. लेकिन जब लीला करते हैं तो फिर बिल्कुल प्रॉपर जीवन जीते हैं। ऐसा थोड़ी है कि भगवान ऊपर अपनी दुनिया में मजे करें और उनके द्वारा बनाए गए इंसान, पशु पक्षी इत्यादि दुखी रहें.. तो भगवान जब आते हैं तो ऐसा नहीं कि बस ऐसे ही मजे के लिए घूमने आते हैं, वे कष्ट भी सहते हैं जबकि सब कुछ उन्हीं की इच्छा से होता है पर फिर भी वे चुनौतियों का सामना करते हैं। किसी राक्षस से युद्ध करेंगे तो उसके स्तर पर आकर युद्ध करेंगे या उसको अपने स्तर तक ले आयेंगे फिर हराएंगे। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान का राक्षस से कई दिनों या कई सालों तक युद्ध चला तब जाकर सत्य की जीत हुई और राक्षस मारा गया। वर्ना राक्षस की भगवान के सामने क्या औकात, भगवान को तो युद्ध करने की भी जरूरत नहीं.. बस उनके चाहने मात्र से राक्षस मार सकता है, फिर भी वे संघर्ष करते हैं.. कई बार राक्षस भी हावी हो जाता और तब जाकर के भगवान समाधान निकालकर उसका वध करते हैं। इसी प्रकार और भी दुख सहन करते हैं भगवान.. तो इसी प्रकार से श्री राम ने भी लीला करी, धर्म की स्थापना भी करी, दुष्ट लोगों का विनाश भी किया और दुःख भी सहे। जय श्री राम 🙏
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#🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।। 'राम' नाम भारतीय अध्यात्म की ऊर्जा ।। भगवान राम को जहाँ महाभारतकार वेदव्यास ने गीता में वीरता के विग्रह के रूप में देखा है, वहीं तुलसी ने उन्हें परब्रह्म के अवतार के रूप में पहचाना है। लोकमानस उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में जानता है। जो परब्रह्म के अवतार को स्वीकार नहीं करते वे उन्हें एक महापुरुष के रूप में उद्धृत करते हैं। राम नाम भगवान दाशरथि राम के अवतरण के पूर्व भी श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता था। कारण, राम शब्द की व्युत्पत्ति है। 'राम' अर्थात सबमें रमा हुआ। भारतीय मनीषा ने इसी हेतु से 'राम' नाम को परब्रह्मवाची स्वीकारा है। अध्यात्मवादी जानते हैं कि यह पञ्चभूता प्रकृति तब तक निष्क्रिय है जब तक इसका संस्पर्श उस एकमेव परमचेतन सत्ता में नहीं होता है। यह सृष्टि आण्विक है। प्रत्येक अणु, परमाणु अपने भीतर सत्, रज, तम् नाम के तीन तत्व धारण किए हुए है, जिसे स्थूल भौतिकता के स्तर पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश शास्त्रकारों ने कहकर, त्रि-देवों की भारतीय सांस्कृतिक एकता का ऐतिहासिक पक्ष प्रस्तुत किया है। जब प्रकृति पराशक्ति के संसर्ग में आती है तब उसका अणु-परमाणु चालित हो उठता है। इन्हीं त्रि-देवों में एक सर्जक तत्व है, दूसरा पालक तथा तीसरा विध्वंसक है। प्रकृति की इसी त्रि-गुणात्मक शक्ति को देख चार्वाक चेतन सत्ता की उपस्थिति अनावश्यक मान उसे नकारते हैं। पटरी पर इंजन दौड़ता है तो यह लोहे का गुण नहीं है। उस ऊर्जा शक्ति का गुण है जो उसे चालित रखता है। राम नाम भारतीय अध्यात्म की ऊर्जा है, जो दृश्यमान जगत को चालित रखने वाली शक्ति के रूप में स्वीकृत है। हम भारतीय अध्यात्म का इतिहास उठाकर देख लें। आशुतोष शिव ने जिस नाम का जप किया वह 'राम' नाम ही है। सिद्धों ने जिसे “अलख निरञ्जन” कहा, वह 'राम' नाम ही है। गोरखनाथ का पूरा पंथ 'राम' नाम ही जपता रहता है। संतों की वाणी ने तो राम-राम जपते भारतीय भक्ति साहित्य को एक नया आयाम दिया है। संत साहित्य चाहे निर्गुण हो चाहे सगुण हो, दोनों ने 'राम' नाम को ही अपनी शक्ति का आधार बनाया है। जुलाहे कबीर तक ने राम' नाम को ही प्रचारित किया है। अपने राम की बहुरिया कहकर उस परम चेतन सत्ता को स्मरण किया है। राम ही ॐ है, प्रणव है, राम ही विष्णु है, कृष्ण है। रामानन्द ने 'राम' नाम का ही मन्त्र ही विश्व को दिया है। इस तरह 'राम' भारतीय आत्मा का परमात्मा हैं, जिसे पाने के लिए ही सारी यौगिक साधनाएं हैं। यह परम तत्व प्रकृति से संसर्गित होकर भी प्रकृति से पृथक है, प्रकृति नहीं है। इस आध्यात्मिक खोज को भारतीय दर्शन का एक चमत्कार कह सकते हैं। राम कब प्रभु राम हो गए, कब मर्यादापुरुषोत्तम परब्रह्म हो गए, महापुरुष राम परम चेतन सत्ता के अवतरण हो गए, यह स्पष्ट तो नहीं कहा जा सकता पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि महाभारतकार जिन राम को वीरता का विग्रह कहता है वही अध्यात्म रामायण लिखकर राम के प्रतीक से अध्यात्म का निरुपण करता है। इसे संयोग कहें या कुछ और, दाशरथि राम ने अपने चरित्र से विश्व के सम्मुख एक समग्र भारतीय संस्कृति का एक विराट रूप ही प्रस्तुत कर दिया है। तुलसी के शब्दों में वे करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले हैं। शरीर से बलिष्ठ हैं, प्रकृति से उदार, क्षमाशील तथा शरणागत वत्सल हैं। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में मानव मर्यादा का अतिक्रमण या उल्लंघन नहीं किया है। वे आदर्श आज्ञापालक पुत्र हैं, विनीत शिष्य हैं, भ्रातृत्व के जीवंत रूप हैं, वे माताओं को सुख देने वाले हैं। ऋषियों के यज्ञ के रक्षक हैं, सनातन मर्यादाओं के पोषक हैं तथा आदर्श मानवीय गुणों के धारक ही नहीं, शौर्य-साहस एवं अदम्य जिजीविषा के अनन्य उदाहरण हैं। उन्होंने कर्मभूमि से जीवन में कभी पीठ नहीं दिखाई। वे अतुलनीय पराक्रम, अवर्णनीय तेजस्विता, अपरिमित शील, दुर्दम्य शक्ति के धनी ही नहीं थे, सौन्दर्य में साक्षात कामदेव थे। दाशरथि राम के ऐसे उज्जवल चरित्र से 'राम' नाम परब्रह्म का पर्याय ही न रहकर, मर्यादा परुषोत्तम का साक्षात प्रतीक बन गया। दाशरथि राम पिता की आज्ञा मान राज्य छोड़ चौदह वर्ष के लिए दृढ़ता पूर्वक वनगमन कर जाते हैं। ऐसा आज्ञापालक पुत्र दूसरा हो सकता है ? राजपुत्र होकर भी निषादराज गुह को गले से लगाते हैं। केवट को उतराई देते हैं। उन्हें सीता का पता देने वाले जटायु का वे आभार ही नहीं मानते, उसका वैदिक संस्कार स्वयं करते हैं। शबरी के जूठे बेर खाते हैं। बंदर व भालुओं के साथ आत्मीयता प्रकट करते हैं। सीता को ले आने के बाद लोकमत की चिंता कर उनका परित्याग कर देते हैं। अश्वमेघ में पत्नी की अनिवार्यता रहते दूसरा विवाह ना कर स्वर्ण मोती बनवाकर रखते हैं, ऐसा आदर्श व्यक्तित्व दुर्लभ है। आज कोटि-कोटि जन दाशरथि राम को ही परम ब्रह्म मानकर उनका उसी रूप में नाम जप कर रहा है। उनके आदर्श चरित्र को अपनी संस्कृति का विशिष्ट उपादान मान, उसपर आचरण कर रहा है। अपने को राम का प्रतिरूप बनाना चाह रहा है l राम ने अपने व्यक्तित्व से सुदूर उत्तर के कैकय प्रदेश से लंका को जोड़ा, मिथिला से अयोध्या को जोड़ा। उत्तर की संस्कृति को दक्षिण से, नेपाल की संस्कृति से, अवध की संस्कृति से जोड़ा। हजारों साल हो जाने के बाद भी दाशरथि राम आज लोकमानस में परब्रह्म के रूप में विराजमान हैं। वे नहीं भुलाए जा सकते। वे अधर्मियों के अद्धारक, संतों के प्रतिपालक तथा दुष्टों के विनाशक के रूप में सदा जाने ही नहीं जाते रहेंगे, आराधे भी जाते रहेंगे। उनका नाम उस परब्रह्म के नाम के साथ ऐसा घुलमिल गया है कि उसे अब पृथक नहीं किया जा सकता। वे व्यक्ति भी हैं, परब्रह्म भी हैं। वे लौकिक भी हैं अलौकिक भी। किसी भी रूप में हम आराधें, वे हमारे अपने हैं। ।। जय जय रघुनन्दन भगवान श्री राम ।।
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#🕉️सनातन धर्म🚩 ज्येष्ठा और दुःसह: जब सृष्टि में हुआ दरिद्रता का आगमन! समुद्र-मंथन का वह दृश्य अत्यंत अद्भुत था। देव और दानव अमृत की लालसा में क्षीर सागर को मथ रहे थे। लेकिन अमृत से पहले निकला नीला, भयावह हलाहल विष। इसके ठीक बाद, समुद्र की लहरों से एक ऐसी स्त्री प्रकट हुई जिसका रंग गहरा था और नैन-नक्श उदास थे। यह 'दरिद्रा' थी। चूँकि वह माता लक्ष्मी से पहले प्रकट हुई थीं, इसलिए उन्हें लक्ष्मी की बड़ी बहन यानी 'ज्येष्ठा' कहा गया। समय बीतने पर ज्येष्ठ का विवाह दुःसह नामक एक तपस्वी ब्राह्मण से हुआ। विवाह तो हो गया, लेकिन इस मिलन ने ब्रह्मांड में एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी। विवाह के बाद मुनि दुःसह अपनी पत्नी ज्येष्ठा को लेकर लोकों के भ्रमण पर निकले। वे जहाँ भी जाते, एक अजीब नज़ारा देखने को मिलता। जैसे ही कहीं से शंख की ध्वनि आती, या वेदों के मंत्र गूँजते, ज्येष्ठा थर-थर कांपने लगती। * जहाँ भगवान का नाम लिया जाता, ज्येष्ठा अपने दोनों कान बंद कर लेती। * जहाँ यज्ञ का धुआं उठता या भस्मधारी भक्त दिखते, वह वहाँ से मीलों दूर भाग जाती। अपनी पत्नी की यह हालत देख मुनि दुःसह गहरे संकट में पड़ गए। उस समय संसार में धर्म का बोलबाला था, हर जगह पूजा-पाठ होते थे। बेचारी दरिद्रा थककर चूर हो गई क्योंकि उसे कहीं चैन नहीं मिल रहा था। अंत में, मुनि उन्हें एक निर्जन वन में ले आए। ज्येष्ठा की आँखों में आंसू थे, उन्हें डर था कि कहीं मुनि उन्हें त्याग न दें। तब दुःसह ने प्रतिज्ञा की, "प्रिय! डरो मत, मैं जीवन भर तुम्हारे सिवा किसी और को अपनी पत्नी नहीं बनाऊंगा।" तभी मार्ग में उन्हें त्रिकालदर्शी महर्षि मार्कण्डेय के दर्शन हुए। मुनि दुःसह ने उनके चरणों में झुककर अपनी व्यथा सुनाई: > "हे ऋषिवर! मेरी पत्नी दिव्य स्थानों और मंत्रों को सहन नहीं कर पाती। कृपा कर बताएं कि हम जैसे लोगों के लिए इस संसार में कौन सी जगह सुरक्षित है? हमें कहाँ रहना चाहिए और कहाँ से दूर रहना चाहिए?" > मार्कण्डेय जी ने गंभीरता से उत्तर दिया: > "हे मुनि, ध्यान से सुनो। जहाँ महादेव के भक्त हों, जो शरीर पर भस्म मलते हों, वहाँ कभी कदम मत रखना। जहाँ नारायण और गोविंद के नामों का संकीर्तन होता हो, वहाँ से दूर रहना, क्योंकि वहां भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र अधर्म का नाश करने के लिए सदैव घूमता रहता है। जिस घर में गौ-सेवा होती है और रोज पूजा-आरती होती है, वह घर तुम्हारे लिए वर्जित है।" > दुःसह मुनि ने उत्सुकता से पूछा, "फिर हमारे योग्य स्थान कौन से हैं, भगवन?" ऋषि ने मुस्कुराकर कहा: > "जहाँ पति-पत्नी हर समय लड़ते-झगड़ते हों, जहाँ ईश्वर की निंदा होती हो, जहाँ लोग स्नान नहीं करते और गंदे रहते हैं—वहाँ तुम निर्भय होकर रहो। जो माता-पिता अपने बच्चों को भूखा रखकर खुद पहले खाते हैं, जो जुआ खेलते हैं, पराई स्त्री पर नज़र रखते हैं और शाम के समय सोते या भोजन करते हैं—उन घरों के द्वार तुम्हारे लिए हमेशा खुले हैं।" > ऋषि के जाने के बाद, दुःसह मुनि ज्येष्ठा को एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे ले गए। उन्होंने कहा, "ज्येष्ठे! तुम यहीं विश्राम करो। मैं पाताल लोक (रसातल) जाकर तुम्हारे रहने का स्थाई प्रबंध करता हूँ।" ज्येष्ठा घबरा गईं, "स्वामी! मैं यहाँ अकेली अपना पेट कैसे भरूँगी?" दुःसह ने जाते-जाते कहा, "तुम्हें तुम्हारे योग्य स्थान पता चल गए हैं। अधर्मी और कलह करने वालों के घर जाओ और अपना निर्वाह करो। बस याद रखना—जो स्त्री पुष्प और धूप से तुम्हारा सम्मान करे, उसके घर में कभी दुख मत फैलाना।" इतना कहकर मुनि रसातल चले गए और कभी वापस नहीं लौटे। ज्येष्ठा उस पीपल के नीचे अकेली विलाप कर रही थीं। तभी अचानक वहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी प्रकट हुए। अपनी बड़ी बहन को इस हाल में देख लक्ष्मी जी का हृदय पसीज गया। ज्येष्ठा ने रोते हुए प्रभु से कहा, "प्रभो! मेरे पति मुझे छोड़ गए हैं, मैं अनाथ हूँ। मेरी जीविका का क्या होगा?" भगवान विष्णु ने दया भाव से कहा: > "हे ज्येष्ठे! निराश मत हो। जो लोग महादेव और मेरे भक्तों का अपमान करते हैं, उनका सारा धन तुम्हारा होगा। जो लोग शिव की निंदा करके मेरी पूजा का ढोंग करते हैं, वे अभागे हैं—उनकी संपत्ति पर भी तुम्हारा अधिकार रहेगा। तुम पीपल के इस वृक्ष में निवास करो, और शनिवार के दिन जो तुम्हारी पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।" > इस तरह ज्येष्ठा को उनका स्थान मिला। यही कारण है कि आज भी शनिवार को पीपल की पूजा की जाती है, ताकि घर से दरिद्रता दूर रहे और सुख-समृद्धि का वास हो।
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#❤️जीवन की सीख एक ऋषि लोटा रोज मांजते थे,तभी जल पीते थे। एक शिष्य ने उनसे कहा कि गुरुवर लोटे को रोज माँजने की क्या जरूरत है सप्ताह में एक बार माँज लिया करें ऋषि ने कहा बात तो सही है और फिर उसके बाद उन्होंने उसे नहीं माँजा उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी सप्ताह बाद ऋषि ने शिष्य से कहा कि लोटे को साफ कर दो शिष्य लोटे को काफी देर माँजने के बाद भी पहले वाली चमक नही ला सका तब और काफी देर माँजा तब वह कुछ चमका ऋषि ने कहा- लोटे से सीखो "जब तक इसे रोज माँजा जाता रहा यह रोज चमकता रहा इसी तरह भक्त होता है यदि वह रोज सुमिरन न करे तो सांसारिक विकारों से अपनी चमक खो देता है ,इसलिए भक्त को रोज अपने प्रभु को सुमिरन करना होता है अगर एक दिन भी सिमरन छूटा तो भक्ति की चमक फीकी पड़ जाएगी । सदगुरू वही होते हैं जो अपने ईष्ट प्रभु के समीप जाने के लिए किसी भी वस्तु ,स्थान, अथवा किसी व्यक्ति के संगत से कोई न कोई ऐसा प्रसंग ढूंढ ही लेते हैं जो भक्ति के लिए प्रेरणदायी बन जाती है। उनका प्रत्येक रास्ता ईश्वर के पास जाने के लिए ही होता है। राधे राधे 🙏🙏🙏🙏🙏
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