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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
राधे राधे.. #🙏गीता ज्ञान🛕 💐💐 गीता में अठारह अध्याय हैं, सात सौ श्लोक हैं; उनमें बहुत-से ऐसे श्लोक हैं, जिनमें से एक श्लोक भी यदि मनुष्य अर्थ और भावसहित मनन करके काम में लाये तो उसका उद्धार हो सकता है | यहाँ गीता के एक श्लोक के विषय में कुछ विचार किया जाता है— उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः || (६ | ५) ‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु |’ इस श्लोक में प्रधान चार बातें बतलायी गयी हैं— १-मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये | २-मनुष्य को अपने द्वारा अपना अधःपतन नहीं करना चाहिए | ३-मनुष्य आप ही अपना मित्र है | ४-मनुष्य आप ही अपना शत्रु है | अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य जिससे अपना परम हित—कल्याण हो, उस भाव और आचरण को तो ग्रहण करता है और जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण का सर्वथा त्याग करता है, वही अपने द्वारा अपना उद्धार कर रहा है | इसके विपरीत, जो मनुष्य जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण करता है तथा जिससे अपना कल्याण हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण नहीं करता, वही अपने द्वारा अपना अधःपतन पतन करता है | अतः जो मनुष्य अपने द्वारा अपने उद्धार का उपाय करता है, वह स्वयं ही अपना मित्र है; इसके विपरीत, जो मनुष्य समझ-बूझकर भी अपने कल्याण के विरुद्ध आचरण करता है, वह स्वयं ही अपना शत्रु है | अब यह भलीभांति विचार करना चाहिए कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना क्या है और अपने द्वारा अपना अधःपतन करना क्या है | शास्त्रों में कल्याण के लिए बहुत-से उपाय बतलाये गये हैं और सज्जन पुरुष भी हमारे कल्याणकी बहुत-सी बातें कहते हैं | उन सबपर तथा उसके अतिरिक्त भी, ईश्वर ने आपको जो बुद्धि, विवेक और ज्ञान दिया है, उसका आश्रय लेकर पक्षपातरहित हो आपको आपको गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए | इस प्रकार गम्भीर विचार करनेपर आपकी बुद्धि में संशय और भ्रम से रहित जो कल्याणकर भाव और आचरण प्रतीत हो, उसको सिद्धान्त मानकर तत्परतापूर्वक कटिबद्ध हो उसका सेवन करना और उसके विपरीत भाव और आचरण का कभी सेवन न करना—यही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है | इसी प्रकार जो भाव और आचरण हमें विचार करने पर लाभप्रद प्रतीत हो, उसका सेवन न करना और जो पतनकारक प्रतीत हो, उसका सेवन करना अपना अधःपतन करना है |
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#☝आज का ज्ञान 👹 राक्षसों की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या वे जन्म से ही बुरे थे या रक्षक? 🔱✨ वेद और पुराणों में देव, असुर, यक्ष, गंधर्व और नाग आदि जातियों का वर्णन मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन्हें आज हम 'राक्षस' कहते हैं, उनका मूल काम क्या था और रावण का जन्म कैसे हुआ? आइए जानते हैं राक्षस वंश का पूरा और रोचक इतिहास! 👇 1️⃣ रक्ष और यक्ष: उत्पत्ति का रहस्य 🌊 प्रारंभिक काल में जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो समुद्र और जल-प्राणियों की सुरक्षा के लिए कुछ जातियों को उत्पन्न किया। जिन्होंने 'रक्षा' का भार संभाला, वे 'राक्षस' कहलाए। (शुरुआत में यह एक पवित्र कार्य माना जाता था)। जिन्होंने 'यक्षण' (पूजन) स्वीकार किया, वे 'यक्ष' कहलाए। 2️⃣ हेति और प्रहेति: राक्षसों के प्रथम प्रतिनिधि 👑 ब्रह्मा जी के श्रम और क्रोध से 'हेति' और भूख से 'प्रहेति' नामक दो बलशाली भाइयों का जन्म हुआ। प्रहेति तपस्या में लीन हो गया, जबकि हेति ने राजपाट संभाला। हेति के वंश में आगे चलकर 'विद्युत्केश' का जन्म हुआ। 3️⃣ जब शिव-पार्वती ने लिया एक राक्षस पुत्र को गोद 🌙 विद्युत्केश की पत्नी ने अपने नवजात पुत्र को लावारिस छोड़ दिया था। तब उस अनाथ बालक पर भगवान शिव और माता पार्वती की नजर पड़ी। उन्होंने उसे गोद ले लिया और उसका नाम 'सुकेश' रखा। शिव जी के वरदान से वह अत्यंत शक्तिशाली और निर्भीक हो गया। 4️⃣ लंका का निर्माण और राक्षसों का अहंकार 🏰 सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र हुए— माल्यवान, सुमाली और माली। इन तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और अजेय होने का वरदान पाया। विश्वकर्मा जी से इन्होंने समुद्र तट पर 'त्रिकुट पर्वत' के निकट स्वर्ण लंका का निर्माण करवाया। लेकिन वरदान पाकर वे अहंकारी हो गए और यक्षों-देवताओं पर अत्याचार करने लगे। 5️⃣ रावण का जन्म और लंका पर अधिकार ⚔️ देवताओं से हारने के बाद राक्षसों को लंका छोड़नी पड़ी और लंका प्रजापति ब्रह्मा ने धनपति कुबेर (यक्ष) को सौंप दी। सुमाली की पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से हुआ। इन्हीं के पुत्र हुए— महापराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और पुत्री शूर्पणखा। रावण ने अपनी माता के कहने पर शिव जी की तपस्या की, मायावी शक्तियां पाईं और अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया। 6️⃣ रावण का वंश और महाविनाश 🔥 रावण ने मंदोदरी से विवाह किया, जिससे मेघनाद, अक्षयकुमार आदि पुत्र हुए। कुम्भकर्ण के पुत्रों में भीम (जिसके नाम पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग है) और विभीषण की पुत्री त्रिजटा (जो सीता जी की रक्षक थी) प्रमुख थे। अपने अहंकार और अधर्म के कारण रावण ने देवलोक तक दुश्मनी मोल ली। अंततः रामायण के महायुद्ध में विभीषण को छोड़कर लंका के समस्त राक्षस वंश का नाश हो गया और धर्म की जीत हुई। ।। जय जय सियाराम ।। 🙏🚩
☝आज का ज्ञान - रक्षसों की उत्पत्तिः एक पौराणिक गाथा ইনি-সট্টনি ম যানতা নক ক্া মক্চয रक्षसों की उत्पत्तिः एक पौराणिक गाथा ইনি-সট্টনি ম যানতা নক ক্া মক্চয - ShareChat
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती महादेव का नाम लेकर सुबह की शुरुआत करना न केवल आध्यात्मिक रूप से कल्याणकारी है, बल्कि यह मानसिक शांति और असीम ऊर्जा भी प्रदान करता है। आप अपनी सुबह को शिवमय बनाने के लिए निम्नलिखित विधि अपना सकते हैं: 1. आंखें खुलते ही करावलम्वन (कर-दर्शन) बिस्तर पर बैठे हुए ही अपनी हथेलियों को देखें और महादेव का स्मरण करें। आप इस सरल मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं: > "कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। > करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥" > इसके बाद मन ही मन "ॐ नमः शिवाय" का जप करते हुए धरती माता को स्पर्श कर प्रणाम करें। > 2. शिव पंचक्षर मंत्र का जप बिस्तर से उठने के बाद शांत चित्त होकर कम से कम 11 बार "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। यह मंत्र पंच तत्वों को संतुलित करता है और दिन भर के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। 3. सूर्योदय के समय महादेव का ध्यान स्नान आदि से निवृत्त होकर, यदि संभव हो तो शिवलिंग पर जल अर्पित करें। जल चढ़ाते समय इस भाव को मन में रखें कि आप अपने अहंकार और नकारात्मकता को महादेव के चरणों में अर्पित कर रहे हैं। 4. महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव यदि आप किसी विशेष भय या तनाव में हैं, तो सुबह के समय महामृत्युंजय मंत्र का 3 या 11 बार पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है: > "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। > उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥" > 5. कल्याणकारी विचार (संकल्प) दिन की शुरुआत करते समय महादेव से यह प्रार्थना करें: > "हे महादेव, आज का मेरा हर कार्य आपकी सेवा हो, मेरी हर वाणी आपका नाम हो और मेरा हर कदम आपके मार्ग पर चले।" > 6. संक्षिप्त शिव स्तुति समय कम हो तो केवल इस पंक्ति का स्मरण करें: > "कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। > सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥" >
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#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #जय श्री कृष्ण जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। भगवान शिव की भी इच्छा हुई के मैं महारास में प्रवेश करूँ। भगवान शिव बावरे होकर अपने कैलाश को छोड़कर ब्रज में आये । पार्वती जी ने मनाया भी लेकिन त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्रीआसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये। वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं श्री ललिता जी ने ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, “श्रेष्ठ जनों” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता। भगवान शिव बोले की तो क्या करना पड़ेगा? ललिता सखी बोली की आप भी गोपी बन जाओ। भगवान शिव बोले की जो बनाना हैं जल्दी बनाओ लेकिन मुझे महारास में प्रवेश जरूर दिलाओ। भगवान शिव को गोपी बनाया जा रहा हैं। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया हैं। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया हैं। भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये।फिर क्या था, प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये। भगवान ने जब भगवान शिव को देखा तो समझ गए। भगवान ने सोचा की चलो भगवान शिव का परिचय सबसे करवा देते हैं जो गोपी बनकर मेरे महारास का दर्शन करने आये हैं। सभी गोपियाँ भगवान शिव के बारे में सोच के कह रही हैं ये कौन सी गोपी हैं। हैं तो लम्बी तगड़ी और सुन्दर। कैसे छम-छम चली जा रही हैं। भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं। गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा हैं? आप देख लो हमारा चेहरा। लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजती पर ही तुला हैं। भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा। भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा। कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा। सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए। जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा। भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया। भगवान शिव दौड़कर दूसरी और जाने लगे तो भगवान कृष्ण गोपियों से बोले गोपियों पीछे किसी गोपी का मैं मुख दर्शन करूँगा पहले इस गोपी का मुख दर्शन करूँगा जो मुख दिखने में इतनी लाज शर्म कर रही हैं। इतना कहकर भगवान शिव दौड़े और दौड़कर भगवान शिव को पकड़ लिया। और घूँघट ऊपर किया और कहा आओ गोपीश्वर आओ। आपकी जय हो। बोलिए गोपेश्वर महादेव की जय। शंकर भगवान की जय।। श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, “भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, “प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा “हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु’ कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव’ के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि व्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी विराजमान है। 🚩🕉️🕉️🚩
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।। जय श्री राम ।। *भगवान विष्णु का प्रमुख आयुध ‘श्रीसुदर्शन-चक्र* #श्री हरि विष्णु भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है। 👉‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें,क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया। 👾‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी। ‘ 👉वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है कि एक बार भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा था कि ‘आप लोगों के पास जो अस्त्र हैं, उनसे असुरों का वध नहीं किया जा सकता। आप सब अपना-अपना तेज दें।’ इस पर सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज दिया। सब तेज एकत्र होने पर भगवान् विष्णु ने भी अपना तेज दिया। फिर महादेव शंकर ने इस एकत्रित तेज के द्वारा अत्युत्तम शस्त्र बनाया और उसका नाम ‘सुदर्शन-चक्र’ रखा। भगवान् शिव ने‘सुदर्शन-चक्र’ को दुष्टों का संहार करने तथा साधुओं की रक्षा करने के लिए विष्णु को प्रदान किया। 👉‘हरि-भक्ति-विलास’ में लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र’ बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग इसे चिह्न के रुप में धारण करें। ‘गरुड़-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’का महत्त्व बताया गया है और इसकी पूजा-विधि दी गई है। ‘श्रीमद्-भागवत’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ की स्तुति इस प्रकार की गई है- ‘हे सुदर्शन! आपका आकार चक्र की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय-कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सभी ओर घूमते हैं। जिस प्रकार अग्नि वायु की सहायता से शुष्क तृण को जला डालती है, उसी प्रकार आप हमारी शत्रु-सेना को तत्काल जला दीजिए।’ ‘विष्णु-धर्मोत्तर-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का वर्णन एक पुरुष के रुप में हुआ है। इसकी दो आँखें तथा बड़ा-सा पेट है। चक्र का यह रुप अनेक अलंकारों से सुसज्जित तथा चामर से युक्त है। वल्लभाचार्य कृत 👉‘सुदर्शन-कवच’--- 〰️〰️〰️〰️👾👾〰️〰️ वैष्णवानां हि रक्षार्थं, श्रीवल्लभः-निरुपितः। सुदर्शन महामन्त्रो, वैष्णवानां हितावहः।। मन्त्रा मध्ये निरुप्यन्ते, चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा-गर्भ-रक्षां च, परीक्षित-हिते-रतः।। ब्रह्मास्त्र-वारणं चैव, भक्तानां भय-भञ्जनः। वधं च सुष्ट-दैत्यानां, खण्डं-खण्डं च कारयेत्।। वैष्णवानां हितार्थाय, चक्रं धारयते हरिः। पीताम्बरो पर-ब्रह्म, वन-माली गदाधरः।। कोटि-कन्दर्प-लावण्यो, गोपिका-प्राण-वल्लभः। श्री-वल्लभः कृपानाथो, गिरिधरः शत्रुमर्दनः।। दावाग्नि-दर्प-हर्ता च, गोपीनां भय-नाशनः। गोपालो गोप-कन्याभिः, समावृत्तोऽधि-तिष्ठते।। वज्र-मण्डल-प्रकाशी च, कालिन्दी-विरहानलः। स्वरुपानन्द-दानार्थं, तापनोत्तर-भावनः।। निकुञ्ज-विहार-भावाग्ने, देहि मे निज दर्शनम्। गो-गोपिका-श्रुताकीर्णो, वेणु-वादन-तत्परः।। काम-रुपी कला-वांश्च, कामिन्यां कामदो विभुः। मन्मथो मथुरा-नाथो, माधवो मकर-ध्वजः।। श्रीधरः श्रीकरश्चैव, श्री-निवासः सतां गतिः। मुक्तिदो भुक्तिदो विष्णुः, भू-धरो भुत-भावनः।। सर्व-दुःख-हरो वीरो, दुष्ट-दानव-नाशकः। श्रीनृसिंहो महाविष्णुः, श्री-निवासः सतां गतिः।। चिदानन्द-मयो नित्यः, पूर्ण-ब्रह्म सनातनः। कोटि-भानु-प्रकाशी च, कोटि-लीला-प्रकाशवान्।। भक्त-प्रियः पद्म-नेत्रो, भक्तानां वाञ्छित-प्रदः। हृदि कृष्णो मुखे कृष्णो, नेत्रे कृष्णश्च कर्णयोः।। भक्ति-प्रियश्च श्रीकृष्णः, सर्वं कृष्ण-मयं जगत्। कालं मृत्युं यमं दूतं, भूतं प्रेतं च प्रपूयते।। 👉“ॐ नमो भगवते महा-प्रतापाय महा-विभूति-पतये, वज्र-देह वज्र-काम वज्र-तुण्ड वज्र-नख वज्र-मुख वज्र-बाहु वज्र-नेत्र वज्र-दन्त वज्र-कर-कमठ भूमात्म-कराय, श्रीमकर-पिंगलाक्ष उग्र-प्रलय कालाग्नि-रौद्र-वीर-भद्रावतार पूर्ण-ब्रह्म परमात्मने, ऋषि-मुनि-वन्द्य-शिवास्त्र-ब्रह्मास्त्र-वैष्णवास्त्र-नारायणास्त्र-काल-शक्ति-दण्ड-कालपाश-अघोरास्त्र-निवारणाय, पाशुपातास्त्र-मृडास्त्र-सर्वशक्ति-परास्त-कराय, पर-विद्या-निवारण अग्नि-दीप्ताय, अथर्व-वेद-ऋग्वेद-साम-वेद-यजुर्वेद-सिद्धि-कराय, निराहाराय, वायु-वेग मनोवेग श्रीबाल-कृष्णः प्रतिषठानन्द-करः स्थल-जलाग्नि-गमे मतोद्-भेदि, सर्व-शत्रु छेदि-छेदि,मम बैरीन् खादयोत्खादय, सञ्जीवन-पर्वतोच्चाटय, डाकिनी-शाकिनी-विध्वंस-कराय महा-प्रतापाय निज-लीला-प्रदर्शकाय निष्कलंकृत-नन्द-कुमार-बटुक-ब्रह्मचारी-निकुञ्जस्थ-भक्त-स्नेह-कराय दुष्ट-जन-स्तम्भनाय सर्व-पाप-ग्रह-कुमार्ग-ग्रहान् छेदय छेदय, भिन्दि-भिन्दि, खादय, कण्टकान् ताडय ताडय मारय मारय, शोषय शोषय, ज्वालय-ज्वालय, संहारय-संहारय, (देवदत्तं) नाशय नाशय, अति-शोषय शोषय, मम सर्वत्र रक्ष रक्ष,महा-पुरुषाय सर्व-दुःख-विनाशनाय ग्रह-मण्डल-भूत-मण्डल-प्रेत-मण्डल-पिशाच-मण्डल उच्चाटन उच्चाटनाय अन्तर-भवादिक-ज्वर-माहेश्वर-ज्वर-वैष्णव-ज्वर-ब्रह्म-ज्वर-विषम-ज्वर-शीत-ज्वर-वात-ज्वर-कफ-ज्वर-एकाहिक-द्वाहिक-त्र्याहिक-चातुर्थिक-अर्द्ध-मासिक मासिक षाण्मासिक सम्वत्सरादि-कर भ्रमि-भ्रमि,छेदय छेदय, भिन्दि भिन्दि, महाबल-पराक्रमाय महा-विपत्ति-निवारणाय भक्र-जन-कल्पना-कल्प-द्रुमाय-दुष्ट-जन-मनोरथ-स्तम्भनाय क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय नमः।। पिशाचान् राक्षसान् चैव, हृदि-रोगांश्च दारुणान् भूचरान् खेचरान् सर्वे, डाकिनी शाकिनी तथा।। नाटकं चेटकं चैव, छल-छिद्रं न दृश्यते। अकाले मरणं तस्य, शोक-दोषो न लभ्यते।। सर्व-विघ्न-क्षयं यान्ति, रक्ष मे गोपिका-प्रियः। भयं दावाग्नि-चौराणां, विग्रहे राज-संकटे।। 👉।।फल-श्रुति।।--- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्याल-व्याघ्र-महाशत्रु-वैरि-बन्धो न लभ्यते। आधि-व्याधि-हरश्चैव, ग्रह-पीडा-विनाशने।। संग्राम-जयदस्तस्माद्, ध्याये देवं सुदर्शनम्। सप्तादश इमे श्लोका, यन्त्र-मध्ये च लिख्यते।। वैष्णवानां इदं यन्त्रं, अन्येभ्श्च न दीयते। वंश-वृद्धिर्भवेत् तस्य, श्रोता च फलमाप्नुयात्।। 👉सुदर्शन-महा-मन्त्रो, लभते जय-मंगलम्।। सर्व-दुःख-हरश्चेदं,अंग-शूल-अक्ष-शूल-उदर-शूल-गुद-शूल-कुक्षि-शूल-जानु-शूल-जंघ-शूल-हस्त-शूल-पाद-शूल-वायु-शूल-स्तन-शूल-सर्व-शूलान्निर्मूलय,दानव-दैत्य-कामिनिवेताल-ब्रह्म-राक्षस-कालाहल-अनन्त-वासुकी-तक्षक-कर्कोट-तक्षक-कालीय-स्थल-रोग-जल-रोग-नाग-पाश-काल-पाश-विषं निर्विषं कृष्ण! त्वामहं शरणागतः। वैष्णवार्थं कृतं यत्र श्रीवल्लभ-निरुपितम्।। ॐ 👉इसका नित्य प्रातः और रात्री में सोते समय पांच - पांच बार पाठ करने मात्र से ही समस्त शत्रुओं का नाश होता है और शत्रु अपनी शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगते है. ।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।
श्री हरि विष्णु - ShareChat
#जय श्री राम #जय बजरंगबली कालनेमि की रोचक कथा,,,,,, एक ऐसा दैत्य जिसने कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा... सतयुग में दो महाशक्तिशाली दैत्य हुए - हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष। ये इतने शक्तिशाली थे कि इनका वध करने को स्वयं भगवान विष्णु को अवतार लेना पड़ा। हिरण्याक्ष ने अपनी शक्ति से पृथ्वी को सागर में डुबो दिया। तब नारायण ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया। उसके दो पुत्र थे - अंधक एवं कालनेमि जो उसके ही समान शक्तिशली थे। जब तक उनके चाचा हिरण्यकशिपु जीवित रहे, उन्होंने उनके संरक्षण में जीवन बिताया किन्तु जब नारायण ने हिरण्यकशिपु को नृसिंह अवतार लेकर मारा तब दोनों भाई ने प्रतिशोध लेने की ठानी। अंधक अपनी महान शक्ति के मद में आकर देवी पार्वती से धृष्टता कर बैठा और महारुद्र के हाथों मारा गया। तब कालनेमि ने महादेव से प्रतिशोध लेने हेतु अपनी पुत्री वृंदा, जिसे ये वरदान प्राप्त था कि उसके होते उसके पति की मृत्यु नहीं हो सकती, उसका विवाह जालंधर नमक दैत्य से कर दिया जो महादेव का घोर शत्रु था। हालाँकि वृंदा का सतीत्व भी जालंधर को बचा नहीं सका और वो नारायण के छल के कारण भगवान शिव के हाथों मारा गया। जब कालनेमि को विष्णु के छल और अपनी पुत्री और दामाद के मृत्यु का समाचार मिला तो उसने नारायण से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की। परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि, जो प्रजापति होने के साथ-साथ सप्तर्षिओं में भी एक थे, उनके छः पुत्र हुए। एक दिन महर्षि मारीचि अपने पुत्रों के साथ अपने पिता ब्रह्मदेव से मिलने गए। वहाँ देवी सरस्वती भी उपस्थित थी। जब वे वहाँ पहुँचे तो उनके सभी पुत्रों ने अपने पितामह ब्रह्मा से परिहास में ही कहा कि - "हे पितामह! सुना है कि आपने अपनी ही पुत्री देवी सरस्वती से विवाह कर लिया था। ये कैसे संभव है?" ऐसा कह कर सारे हँसने लगे। तब ब्रह्माजी ने उन सभी को श्राप दिया कि अगले जन्म में वो एक दैत्य के रूप में जन्मेंगे। उनके क्षमा माँगने पर उन्होंने कहा कि उसके भी अगले जन्म में उन्हें नारायण के बड़े भाई के रूप में जन्म लेने का सौभाग्य मिलेगा और उन्हें अधिक समय तक पृथ्वीलोक पर ना रहना पड़े इसी कारण जन्मते ही उन्हें मुक्ति मिल जाएगी। उधर कालनेमि अपने पिता हिरण्याक्ष के वध का प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्माजी की तपस्या कर रहा था। जब ब्रह्माजी प्रसन्न हुए तो उसने वरदान माँगा कि उसे छः ऐसे पुत्र मिलें जो अजेय हों। तब ब्रह्मदेव के वरदान स्वरूप महर्षि मरीचि के श्रापग्रसित छः पुत्र अगले जन्म में कालनेमि के छः पुत्रों के रूप में जन्मे। उनके अतिरिक्त उसकी एक और कन्या थी वृंदा, जिसे तुलसी के नाम से भी जानते हैं। जब कालनेमि के छः पुत्रों ने उत्पात मचाना शुरू किया तो कालनेमि के चाचा हिरण्यकशिपु ने उन्हें पाताल जाने की आज्ञा दे दी। कालनेमि के रोकने पर भी उन सभी ने हिरण्यकशिपु की आज्ञा मानी और पाताल जाकर बस गए। इससे कालनेमि स्वयं अपने पुत्रों का शत्रु हो गया और निश्चय किया कि वो अगले जन्म में अपने ही पुत्रों का अपने हाथों से वध करेगा। इसके बाद अपने चाचा हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात, अपने भाई प्रह्लाद के लाख समझाने के बाद भी कालनेमि ने भगवान विष्णु पर आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में उसने देवी दुर्गा की भांति सिंह को अपना वाहन बनाया। दोनों में घनघोर युद्ध हुआ और कहा जाता है कि उस युद्ध में कालनेमि ने भगवान विष्णु पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार किया किन्तु उससे नारायण को कोई हानि नहीं हुई। फिर कालनेमि ने नारायण पर एक अमोघ त्रिशूल से प्रहार किया किन्तु नारायण ने उसे बीच में ही पकड़ कर नष्ट कर दया। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से कालनेमि का अंत कर दिया। मरते हुए उसने प्रतिज्ञा की कि वो फिर जन्म लेगा और नारायण से प्रतिशोध लेगा। अपने भाई की मृत्यु पर प्रह्लाद अत्यंत दुखी हो गया। अंततः प्रह्लाद की प्राथना पर भगवान विष्णु ने उसे आश्वासन दिलाया कि अगले जन्म में भी वही उसका वध करके उसे जीवन मरण के चक्र से मुक्त करेंगे। मथुरा के राजा उग्रसेन अपनी पत्नी पद्मावती के साथ सुख से राज कर रहे थे। विवाह के तुरंत बाद पद्मावती अपने पिता सत्यकेतु के घर गयी। एक बार कुबेर का एक संदेशवाहक गन्धर्व द्रुमिला (गोभिला) सत्यकेतु से मिलने आया। जब उसने पद्मावती को देखा तो उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसने छल से उग्रसेन का वेश बनाया और पद्मावती से मिलने आया। पद्मावती उसे अपना पति समझ कर उसके साथ उसी प्रकार का व्यहवार करने लगी। थोड़े दिनों के पश्चात उसके पुत्र के रूप में कालनेमि ने नारायण से प्रतिशोध लेने के लिए जन्म लिया। उसका नाम कंस रखा गया। उसके जन्म के पश्चात देवर्षि नारद ने पद्मावती को गन्धर्व के छल के बारे में बता दिया जिससे उसे अपने पुत्र से घृणा हो गयी। उसने अपने पति उग्रसेन को तो कुछ नहीं बतया किन्तु वो मन ही मन उसकी मृत्यु की कामना करने लगी। आगे चल कर कंस ने अपने पिता को कैद कर लिया और ये जानकर कि देवकी उस संतान को जन्म देगी जो उसके वध का कारण बनेगा, उसे भी कारावास में डाल दिया। बाद में उसे पता चला कि देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु जन्म लेंगे तो उसने उसे मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने की ठानी। देवकी के पहले छः पुत्रों के रूप में कालनेमि के छः पुत्र जन्मे जिन्हे मारकर कंस रुपी कालनेमि ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की। देवकी की सातवीं संतान संकर्षित हो वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में चली गयी जिससे बलराम का जन्म हुआ। देवकी के गर्भ से उनकी जगह महामाया ने जन्म लिया जिसने बताया कि देवकी की आठवीं संतान का भी जन्म हो गया है। अपना प्रतिशोध लेने के लिए कंसरुपी कालनेमि ने कृष्ण के कारण गोकुल के सभी बच्चों के वध का आदेश दिया। सैकड़ों बच्चे मारे गए किन्तु कृष्ण को कुछ नहीं हुआ। १६ वर्ष की आयु में कृष्ण ने अपने भाई बलराम के साथ कंस का वध कर संसार को उसके अत्याचार से मुक्त किया। इस प्रकार कालनेमि ने सतयुग से द्वापर तक नारायण का पीछा किया किन्तु प्रभु को कौन मार सका है? हर बार उसे अपने प्राण गवाने पड़े। कहते है कि कालनेमि ही द्वापर के अंत समय प्रत्येक रात्रि के रूप में उसे कलियुग के और निकट ले जाता है। यहाँ तक कि कलियुग को भी कालनेमि का अवतार माना जाता है। ये भी मान्यता है कि अपना प्रतिशोध लेने के लिए ही कालनेमि कलियुग के रूप में जन्मा ताकि इस युग में भी वो नारायण के कल्कि अवतार से प्रतिशोध ले सके। हालाँकि अगर ये सत्य है तो हम जानते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा। जय श्री सीताराम जी 🙏🌺🌺🚩 जय बजरंगबली हनुमान जी 🙏🌺🌺🚩
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६३ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड तिरासीवाँ सर्ग भरतकी वनयात्रा और शृङ्गवेरपुरमें रात्रिवास तदनन्तर प्रातःकाल उठकर भरतने उत्तम रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥१॥ उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेवके रथके समान तेजस्वी दिखायी देते थे॥२॥ यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरतके पीछे-पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥३॥ यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरतके पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे॥४॥ उसी प्रकार एक लाख घुड़सवार भी उन यशस्वी रघुकुलनन्दन राजकुमार भरतकी यात्राके समय उनका अनुसरण कर रहे थे॥५॥ कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौसल्या देवी भी श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये की जानेवाली उस यात्रासे संतुष्ट हो तेजस्वी रथके द्वारा प्रस्थित हुईं॥६॥ ब्राह्मण आदि आर्यों (त्रैवर्णिकों) के समूह मनमें अत्यन्त हर्ष लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामका दर्शन करनेके लिये उन्हींके सम्बन्धमें विचित्र बातें कहते-सुनते हुए यात्रा कर रहे थे॥७॥ (वे आपसमें कहते थे—) 'हमलोग दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा संसारका दुःख दूर करनेवाले, स्थितप्रज्ञ, श्यामवर्ण महाबाहु श्रीरामका कब दर्शन करेंगे?॥८॥ 'जैसे सूर्यदेव उदय लेते ही सारे जगत्‌का अन्धकार हर लेते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी हमारी आँखोंके सामने पड़ते ही हमलोगोंका सारा शोक संताप दूर कर देंगे'॥९॥ इस प्रकारकी बातें कहते और अत्यन्त हर्षसे भरकर एक-दूसरेका आलिङ्गन करते हुए अयोध्याके नागरिक उस समय यात्रा कर रहे थे॥१०॥ उस नगरमें जो दूसरे सम्मानित पुरुष थे, वे सब लोग तथा व्यापारी और शुभ विचारवाले प्रजाजन भी बड़े हर्षके साथ श्रीरामसे मिलनेके लिये प्रस्थित हुए॥११॥ जो कोई मणिकार (मणियोंको सानपर चढ़ाकर चमका देनेवाले), अच्छे कुम्भकार, सूतका ताना-बाना करके वस्त्र बनानेकी कलाके विशेषज्ञ, शस्त्र निर्माण करके जीविका चलानेवाले, मायूरक (मोरकी पाँखोंसे छत्र-व्यजन आदि बनानेवाले), आरेसे चन्दन आदिकी लकड़ी चीरनेवाले, मणि-मोती आदिमें छेद करनेवाले, रोचक (दीवारों और वेदी आदिमें शोभाका सम्पादन करनेवाले), दन्तकार (हाथीके दाँत आदिसे नाना प्रकारकी वस्तुओंका निर्माण करनेवाले), सुधाकार (चूना बनानेवाले), गन्धी, प्रसिद्ध सोनार, कम्बल और कालीन बनानेवाले, गरम जलसे नहलानेका काम करनेवाले, वैद्य, धूपक (धूपन-क्रियाद्वारा जीविका चलानेवाले), शौण्डिक (मद्यविक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों तथा गोशालाओंके महतो, स्त्रियोंसहित नट, केवट तथा समाहितचित्त सदाचारी वेदवेत्ता सहस्रों ब्राह्मण बैलगाड़ियोंपर चढ़कर वनकी यात्रा करनेवाले भरतके पीछे-पीछे गये॥१२-१६॥ सबके वेश सुन्दर थे। सबने शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे तथा सबके अङ्गोंमें ताँबेके समान लाल रंगका अङ्गराग लगा था। वे सब-के-सब नाना प्रकारके वाहनोंद्वारा धीरे-धीरे भरतका अनुसरण कर रहे थे॥१७॥ हर्ष और आनन्दमें भरी हुई वह सेना भाईको बुलानेके लिये प्रस्थित हुए कैकेयीकुमार भ्रातृवत्सल भरतके पीछे-पीछे चलने लगी॥१८॥ इस प्रकार रथ, पालकी, घोड़े और हाथियोंके द्वारा बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद वे सब लोग शृङ्गवेरपुरमें गङ्गाजीके तटपर जा पहुँचे॥१९॥ जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका सखा वीर निषादराज गुह सावधानीके साथ उस देशकी रक्षा करता हुआ अपने भाई-बन्धुओंके साथ निवास करता था॥२०॥ चक्रवाकोंसे अलंकृत गङ्गातटपर पहुँचकर भरतका अनुसरण करनेवाली वह सेना ठहर गयी॥२१॥ पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके अपनी उस सेनाको शिथिल हुई देख बातचीत करनेकी कलामें कुशल भरतने समस्त सचिवोंसे कहा—॥२२॥ 'आपलोग मेरे सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार यहाँ सब ओर ठहरा दीजिये। आज रातमें विश्राम कर लेनेके बाद हम सब लोग कल सबेरे इन सागरगामिनी नदी गंगाजीको पार करेंगे॥२३॥ 'यहाँ ठहरनेका एक और प्रयोजन है—मैं चाहता हूँ कि गङ्गाजीमें उतरकर स्वर्गीय महाराजके पारलौकिक कल्याणके लिये जलाञ्जलि दे दूँ'॥२४॥ उनके इस प्रकार कहनेपर सभी मन्त्रियोंने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और समस्त सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ठहरा दिया॥२५॥ महानदी गङ्गाके तटपर खेमे आदिसे सुशोभित होनेवाली उस सेनाको व्यवस्थापूर्वक ठहराकर भरतने महात्मा श्रीरामके लौटनेके विषयमें विचार करते हुए उस समय वहीं निवास किया॥२६॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८३॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - "विनय पत्रिका हे राघव! ऐसा क्या अपराध है, जिस अपराधसें आपने मुझे दुष्ट समझकर एक अनजान की तरह छोड़ दिया? जिनके आचरण बड़े ही पवित्र है, उन्हींको आप अपनाते है, तो फ़िर अजामिल , गिद्ध गनिका आदिका उध्धार क्यों किया? क्या उनसे आपकी कोई खास रिश्तेदारी थी। हे नाथ! जीवका काल, कर्म, सुगति , दुर्गति सबकुछ आपही के हाथ है ; अतः मेरा भी भला कर दीजिये | punitbapuofficialorg M "विनय पत्रिका हे राघव! ऐसा क्या अपराध है, जिस अपराधसें आपने मुझे दुष्ट समझकर एक अनजान की तरह छोड़ दिया? जिनके आचरण बड़े ही पवित्र है, उन्हींको आप अपनाते है, तो फ़िर अजामिल , गिद्ध गनिका आदिका उध्धार क्यों किया? क्या उनसे आपकी कोई खास रिश्तेदारी थी। हे नाथ! जीवका काल, कर्म, सुगति , दुर्गति सबकुछ आपही के हाथ है ; अतः मेरा भी भला कर दीजिये | punitbapuofficialorg M - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी - देवताओं की मान्यता मानी गयी है | यद्यपि यह सत्य है कि इन देवी - देवताओं को किसी ने देखा नहीं है तथापि बड़ी श्रद्धा के साथ इनका पूजन होता रहता है | इस धरती पर क्या कोई प्रत्यक्ष देवता है ?? इस पर विचार करते हुए यदि धर्मग्रंथों का अध्ययन किया जाता है तो "श्रीमदवाल्मीकीय रामायण" में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं जगज्जननी मैया जानकी का संवाद देखने को मिलता है , जहाँ सीता जी द्वारी प्रत्यक्ष देवताओं के विषय प्रश्न करने पर राघवेन्द्र सरकार कहते हैं ;-- "अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते ! स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम् !! यत्र त्रयं त्रयो लोका: पवित्रं तत्समं भुवि ! नान्यदस्ति शुभाङ्गे तेनेदमभिराध्यते !!" अर्थात :- भगवान श्री राम सीता जी से कहते हैं कि हे सीते! माता-पिता और गुरु ये तीन प्रत्यक्ष देवता हैं, इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की आराधना करना कैसे ठीक हो सकता है ? जिनकी सेवा से अर्थ, धर्म और काम तीनों की प्राप्ति होती है, जिनकी आराधना से तीनों लोकों की आराधना हो जाती है, उन माता-पिता के समान पवित्र इस संसार में दूसरा कोई भी नहीं है | इसलिए लोग इन प्रत्यक्ष देवता (माता-पिता, गुरु) की आराधना करते हैं | जो इनकी अवहेलना करता है उसके द्वारा की हुई पूजा कोई भी देवी - देवता स्वीकार नहीं करते हैं | इस संवाद से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस धरती पर प्रत्यक्ष देवी - देवता माता - पिता एवं गुरु हैं |* *आज आधुनिकता के रंग में रंगे हुए लोग स्वयं को शिक्षित तो कह सकते हैं परंतु उनके आचरण गंवारों एवं मूर्खों की तरह ही दिखाई पड़ते हैं | आज लगभग घरों में माता - पिता उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं | अपने माता - पिता को उपेक्षित जीवन जीने को विवश करने वाली ये संतानें घरों में देवी - देवताओं की सोने - चाँदी की मूर्तियां स्थापित करके इच्छित फल चाहते हैं | घर में माता - पिता को भूखा रखकर लोग बड़े - बड़े भण्डारे आयोजित करते हैं | प्रत्यक्ष देवी - देवता (माता - पिता) को घर से निकालकर वृद्धाश्रम तक पहुँचाने वाले लोग अपने घरों में पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करते हैं | क्या उनको इनके पूजन करने का फल प्राप्त हो सकता है ?? यह चिन्तन करने का विषय है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूँगा कि सनातन के सभी साहित्यों ने सर्वप्रथम माता - पिता की पूजा करने का निर्देश दिया है | गरुड़ पुराण में भी लिखा है :-- "पितृमातृसमंलोके नास्त्यन्यद दैवतं परम् ! तस्मात सर्वप्रयत्नेन पूजयते् पितरौ सदा !! हितानमुपदेष्टा हि प्रत्यक्षं दैवतं पिता ! अन्या या देवता लोक में देहेप्रभवो हिता : !!" अर्थात :- संसार में माता-पिता के समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है | अत: सदैव सभी प्रकार से अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए | हितकारी उपदेश देने वाला होने से पिता प्रत्यक्ष देवता है | संसार में जो अन्य देवता हैं, वे शरीरधारी नहीं हैं | इन प्रत्यक्ष देवताओं की सदैव पूजा करना अर्थात सेवा करना और सुखी रखना ही हमारा सर्वोपरि धर्म है |* *संसार में प्रत्यक्ष देवी - देवता पूजने योग्य यदि कोई है तो वह माता - पिता हैं | इनकी अवहेलना करके किसी भी देवता के पूजन का फल कदापि नहीं प्राप्त हो सकता |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟
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#👍मोटिवेशनल कोट्स✌ 🌟 || विश्वासपूर्ण संबंध || 🌟 अविश्वास ही प्रेम को खंडित करता है, जिससे हमारे परस्पर संबंधों की मजबूत दीवारों में भी दरारें आ जाती हैं। विश्वास की ईंट जितनी मजबूत होगी हमारे संबंधों की दीवार भी उतनी ही टिकाऊ बन पायेगी।विश्वास ही तो संबंधों को प्रेमपूर्ण बनाये रखता है। जब हमारे द्वारा प्रत्येक बात का मूल्यांकन स्वयं की दृष्टि से किया जाता है तो वहाँ अविश्वास अवश्य उत्पन्न हो जाता है। यह आवश्यक नहीं कि हर बार हमारे मूल्यांकन करने का दृष्टिकोण सही हो इसलिए संबंधों की मधुरता के लिए अपने दृष्टिकोण के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं तक पहुँचने का गुण भी हमारे भीतर अवश्य होना चाहिए। संबध जोड़ना महत्वपूर्ण नहीं अपितु संबंध निभाना महत्वपूर्ण है। संबंधों का जुड़ना संयोग हो सकता है पर संबंधों को निभाना जीवन की एक साधना ही है। संबधों की मजबूती के लिए परस्पर विश्वास ही प्रथम आवश्यक्ता है। 🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
👍मोटिवेशनल कोट्स✌ - शुभ शुक्रवार महालक्ष्मी नमोस्तुते 3 Radhe Radhe S (ID[EటIIIG शुभ शुक्रवार महालक्ष्मी नमोस्तुते 3 Radhe Radhe S (ID[EటIIIG - ShareChat
💫💫💫💫💫💫💫💫💫 🪷 सुप्रभातम् 🪷 कोई व्यक्ति कितना भी खास क्यों ना हो, उसे एक पल में त्यागने की क्षमता तुम में अवश्य होनी चाहिए...!! 🪷 जय श्री कृष्ण 🪷 💫💫💫💫💫💫💫💫💫 #❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी
❤️जीवन की सीख - जिनके पास अपने हैं, वो अपनों से झगड़ते हैं.॰. जिनका कोई नहीं अपना, वो अपनों को तरसते हैं। कल न हम होंगे , न गिला होगा | सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिलसिला होगा| जो लम्हे हैं, चलो हंसकर बिता लें। जाने कल जिंदगी का क्या फैसला FTTI श्री कृष्ण जय जिनके पास अपने हैं, वो अपनों से झगड़ते हैं.॰. जिनका कोई नहीं अपना, वो अपनों को तरसते हैं। कल न हम होंगे , न गिला होगा | सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिलसिला होगा| जो लम्हे हैं, चलो हंसकर बिता लें। जाने कल जिंदगी का क्या फैसला FTTI श्री कृष्ण जय - ShareChat