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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
*थोरी थोरी बैस की अहीरनि की छोरी संग,,भोरी भोरी बातनि उचारति गुमान की।।* #राधे राधे *कहै रतनाकर बजावति मृदंग चंग,,अंगनि उमंग भरी जोबन उठान की।।* *घाघरे की घूमनि समेटि के कछोटी किए,,कटि-तट फेंटि कोछी कलित पिधान की।।* *झोरी भरे रोरी धोरि केसरि कमोरी भरे,,होरी चली खेलन किसोरी बृषभान की ।।*
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शीर्षक: 🌿 "अब जटा #जय श्री कृष्ण क्या सुलझाते हो प्रभु, अब तो जीवन ही सुलझा दो..." एक अद्भुत भक्त कथा 🌿 वृंदावन के एक बाबा की यह कथा आपकी आँखों में आँसू ला देगी। एक बाबा थे, जो दिन-रात युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की उपासना में लीन रहते थे। एक दिन कुञ्जवन के रास्ते में उनकी जटा एक वटवृक्ष में बुरी तरह उलझ गई। बाबा ने प्रयास किया, पर जटा सुलझी नहीं। संतों की हठ भी अद्भुत होती है! बाबा वहीं आसन जमाकर बैठ गए और ठान लिया—"जिसने यह जटा उलझाई है, वही सुलझाने आएगा, अन्यथा मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा।" तीन दिन बीत गए। बाबा भूखे-प्यासे बैठे रहे। तीसरे दिन एक 5-7 वर्ष का सांवला-सलोना ग्वाल आया और बड़े दुलार से बोला—"बाबा! तुम्हारी जटा उलझ गयी, लाओ मैं सुलझा दूँ?" जैसे ही बालक बढ़ा, बाबा बोले—"रुक जा! हाथ मत लगाना। जिसने उलझाई है, वही सुलझाएगा। तू जा यहाँ से।" बालक ने बहुत समझाया, पर बाबा नहीं माने। अंततः उस ग्वाल के रूप से साक्षात् मुरलीधर भगवान बांके बिहारी प्रकट हो गए। 🌸 ठाकुरजी बोले: "महात्मन! लो मैं आ गया। अब जटा सुलझा दूँ?" बाबा ने फिर रोका—"ठहरो! पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो? द्वारिकाधीश हो, मथुराधीश हो, या यशोदानंदन हो?" भगवान ने पूछा—"तुम्हें कौन सा चाहिए?" बाबा बोले—"मैं तो नित्य निकुञ्ज बिहारी का उपासक हूँ।" ठाकुरजी बोले—"मैं वही तो हूँ।" बाबा ने फिर टोका—"नहीं! मेरे नित्य निकुञ्ज बिहारी तो मेरी स्वामिनी श्रीराधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते। तुम तो अकेले हो।" ⚡ इतना कहते ही बिजली सी चमकी और ठाकुरजी के वाम भाग में साक्षात् वृषभानु नंदिनी श्री राधिकारानी प्रकट हो गईं। युगल सरकार का यह अद्भुत दर्शन पाकर बाबा का धैर्य टूट गया। वे फूट-फूट कर रोने लगे और चरणों में गिर पड़े। जब युगल सरकार उनकी जटा सुलझाने आगे बढ़े, तो बाबा ने जो कहा, वह भक्ति की पराकाष्ठा थी: 😭 "प्रभु! अब जटा क्या सुलझाते हो... अब तो जीवन ही सुलझा दो।" इतनी प्रार्थना करते ही बाबा का शरीर शांत हो गया और प्रिया-प्रियतम ने उन्हें अपनी नित्य लीला में स्थान दे दिया। ऐसी अनन्य निष्ठा को कोटि-कोटि नमन। 🙏 ।। जय जय श्री राधे ।।
जय श्री कृष्ण - अब तो जीवन ही सुलझा दो राधे- कृष्ण ।। जय श्री I अब तो जीवन ही सुलझा दो राधे- कृष्ण ।। जय श्री I - ShareChat
#शिव पार्वती #🔱महाशिवरात्रि Coming Soon 🪔 #🙏शिव पार्वती शीर्षक: 🕉️🔥 जब प्रेम की अग्नि में सती हुई 'सती': शिव और शक्ति के अमर प्रेम की गाथा 🔥🕉️ यह कथा है उस प्रेम की, जिसने सृष्टि को हिला दिया, जिसने त्याग की पराकाष्ठा को छुआ। दक्ष प्रजापति ने कठोर तप से माँ आद्या शक्ति को पुत्री 'सती' के रूप में प्राप्त किया। ब्रह्मा जी के परामर्श पर सती का विवाह आदि पुरुष भगवान शिव से हुआ। किंतु, एक सभा में शिव द्वारा खड़े होकर सम्मान न दिए जाने पर अहंकारी दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा और शिव से बैर पाल लिया। दक्ष का महायज्ञ और सती का हठ: एक बार दक्ष ने कनखल में एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। आकाश मार्ग से जाते देवताओं को देख सती ने शिव से वहां जाने का हठ किया। शिव ने बहुत समझाया कि "बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए", पर सती नहीं मानीं। शिव ने उन्हें वीरभद्र के साथ भेज दिया। अपमान की अग्नि: दक्ष के घर पहुँचकर सती को घोर अपमान का सामना करना पड़ा। दक्ष ने शिव के लिए कटु शब्द कहे: "तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है।" सती ने यज्ञमंडप में देखा कि सभी देवताओं का भाग है, पर उनके स्वामी शिव का नहीं। सती का आत्मदाह: पति का यह अपमान सती से सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधित होकर कहा: "जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्द सुनती है, उसे नरक मिलता है। मैं अब एक क्षण भी जीवित नहीं रहना चाहती।" और सती ने योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया। 🔥 शिव का तांडव और शक्तिपीठों का निर्माण: समाचार मिलते ही शिव प्रलयंकार रूप में वहां पहुंचे। वीरभद्र ने दक्ष का वध किया। सती के जले हुए शरीर को देखकर शिव अपनी सुध-बुध खो बैठे। वे सती के शव को कंधे पर उठाकर उन्मत्त होकर तीनों लोकों में घूमने लगे। सृष्टि थम गई। अंततः, भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के अंगों को काटा। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहां 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए। धन्य है शिव और सती का यह अलौकिक प्रेम, जिसने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया। हर हर महादेव! 🙏🌹
शिव पार्वती - शिव और सती का अमर प्रेम प्रेम, त्याग और शक्तिपीठों की गाथा शिव और सती का अमर प्रेम प्रेम, त्याग और शक्तिपीठों की गाथा - ShareChat
#धर्म कर्म #🕉️सनातन धर्म🚩 🐏 धर्म और अधर्म का भेद 🐏 🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏🐏 #महर्षिपतंजलि के अनुसार #धर्म का आधार यम नियम अर्थात सामाजिक एवं व्यक्तिगत नैतिकता एवं आत्म अनुशासन है l सनातन धर्म के शास्त्रों के अध्ययन से पता चलता है कि धर्म की स्थापना आत्मकल्याण के लिये की गयी थी l धर्म जीवन को सही दिशा में ले जाता है जबकि अधर्म उससे भटकाता है l धर्म उचित-अनुचित, नैतिक अनैतिक, मर्यादित अमर्यादित के भेद को समझकर सत्य और न्यायसंगत मार्ग पर चलते हुए आत्म कल्याण करना है l इसके विपरीत अधर्म का आधार अनुचित, अनैतिकता, स्वार्थ, हिंसा और कुकृत्य है, जो अशांति व दुख का कारण बनता है। इस प्रकार धर्म जीवन को सही मार्गदर्शन करता है जबकि अधर्म सही मार्ग से भटकाकर धर्म विरुद्ध आचरण के लिए प्रेरित करना ही अधर्म है* l 🐏 *धर्म और अधर्म में मुख्य अंतर*: 🐏 🐏 *धर्म* : *यह सत्य, अहिंसा, त्याग, दया, संतोष, आत्म-नियंत्रण, नैतिकता, कर्तव्यपरायणता और मन की पवित्रता को दर्शाता है। यह आत्मा को ऊपर उठाता है*। 🦀 *अधर्म* : *यह झूठ, छल, लालच, क्रोध, स्वार्थ और दूसरों को दुख पहुँचाना है। यह प्रकृति के विरुद्ध और विनाशकारी है*। 🌹संदेश:: *प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कोई भी कर्म करते समय यह विचार अवश्य करना चाहिये की वह किन विचारों के साथ जीवन जी रहा है और उसके कर्म पाप का संचय कर रहे हैं अथवा पुण्यों का अर्थात वह धर्म अधर्म में से किस मार्ग पर चल रहा है l हमेशा ध्यान रखिये* 🐏 *धर्म के अनुसरण से दिव्य शक्तियों की एवं दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है साथ ही मान सम्मान, यश और मानसिक शांति मिलती है वहीं अधर्म से अज्ञान, जड़ता, मूढमति और पापों का संचय होता है* l *अतः धर्म के मूलभूत सिद्धांतो का अनुसरण करना चाहिए* l 🦀 *अधर्म के अनुसरण से अधोगति प्राप्त होती है* 🦀 *और* 🌹 *धर्म के अनुसरण से दिव्य लोकों की प्राप्ति* 🌹 🦀 *गुरु द्रोण द्वारा अधर्म के पक्ष का परिणाम* 🦀 🐏 *गुरु द्रोणाचार्य द्वारा महाभारत युद्ध में कौरवों (अधर्म) का पक्ष लेने का परिणाम उनके लिए अत्यंत विनाशकारी रहा। क्षत्रीय वीरों को शस्त्र विद्या का ज्ञान देने वाले पूज्यनीय गुरु द्रोणाचार्य को न केवल अपनी यश-कीर्ति खोनी पड़ी, बल्कि अंत में उन्हें युद्ध के नियमों के विरुद्ध छल (युधिष्ठिर के अश्वत्थामा हतो हतः के अर्धसत्य) के बाद धृष्टद्युम्न द्वारा निहत्था अवस्था में मार दिया गया, जो उनके अधर्म का पक्ष लेने के कर्मों की परिणति थी* । 🦀 *अधर्म के पक्ष के कारण द्रोण के जीवन पर प्रभाव*: 🦀 🪾 *अपमानजनक मृत्यु*: *धर्म का साथ न देने के कारण, द्रोणाचार्य को युद्ध के 15वें दिन अपने ही शिष्य धृष्टद्युम्न के हाथों मृत्यु प्राप्त हुई, जिनका जन्म ही द्रोण का वध करने के लिए हुआ था* । 🪾 *ऋषियों द्वारा चेतावनी*: *जब वे पाण्डवों की ओर से* ( धर्म के लिये) *लड़ रहे योद्धाओं का विनाश कर रहे थे, तब अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप आदि ऋषियों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि उनका युद्ध अधर्म पर आधारित है, जिससे उनका* 🌹*यश नष्ट* 🦀 *हो रहा है* । 🦀 *मानसिक और नैतिक पतन*: *पुत्र मोह* *और हस्तिनापुर के प्रति नमक का ऋण के कारण, उन्हें द्रोपदी के चीरहरण जैसे घिनौने कृत्य और अभिमन्यु की मृत्यु जैसी घटनाओं में मूकदर्शक या सहायक बनना पड़ा, जो उनके लिए नैतिक रूप से पतनकारी था* । 🦀 *अल्पकालिक नरक* : *युधिष्ठिर द्वारा बोले गए अर्धसत्य (*अश्वत्थामा की मृत्यु*) *को सुनकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए थे, जो उनके अंत का कारण बना और कहा जाता है कि इस अधर्म के पक्ष के कारण उन्हें अल्प समय के लिए नरक भोगना पड़ा*। 🦀 *संक्षेप में*, *गुरु द्रोण का अधर्म के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए एक उच्च श्रेणी के आचार्य से एक साधारण सिपाही की तरह मृत्यु प्राप्त करने का कारण बना* । 🌹 *धर्म के अनुसरण की परिणति की पौराणिक कथा* 🌹 🐏 *मार्कण्डेय ऋषि की कथा धर्म के पालन और शिवभक्ति से अकाल मृत्यु पर विजय और अमरता (दीर्घायु) की प्राप्ति का सर्वोत्तम पौराणिक उदाहरण है*। *शिवभक्त मृकण्डु ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय को अल्पायु योग का वरदान था और आयु केवल 16 वर्ष थी, लेकिन उन्होंने शिव की निरंतर भक्ति और धर्मपरायणता से यमराज को भी विवश कर दिया और चिरंजीवी होने का वरदान पाया*। 🐏 *मार्कण्डेय की पौराणिक कथा* (*धर्म की शक्ति*): *नियति और धर्म*: *मार्कण्डेय को पता था कि उनकी मृत्यु निकट है, फिर भी उन्होंने भयभीत होने के बजाय शिव की आराधना और धर्म के मार्ग को चुना* । *अंतिम समय*: *जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तब मार्कण्डेय शिवलिंग को कसकर पकड़कर महामृत्युंजय मंत्र का पाठ कर रहे थे*। *परिणाम*: *मार्कण्डेय की सच्ची भक्ति और धर्म-अनुसरण को देखकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और यमराज को वापस जाने का आदेश दिया। शिव ने मार्कण्डेय को 16 वर्ष की आयु में ही अमर रहने का वरदान दिया* । *निष्कर्ष*: *यह कथा सिखाती है कि धर्म* (*कर्तव्य और ईश्वर भक्ति*) *का पालन करने वालों की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं और वे विपत्ति में भी विजयी होते हैं* । *अन्य उदाहरण*: 🐏 *मनु और प्रलय*: *धर्म और सत्य का आचरण करने वाले मनु ने प्रलय काल में भगवान विष्णु* (*मत्स्य अवतार*) *की कृपा प्राप्त की और मानवता के नए अध्याय के रचयिता बने* । 🐏 *राजा हरिश्चंद्र*: *सत्य और धर्म पर टिके रहने के कारण ही उन्हें अंत में स्वर्ग और अमर कीर्ति प्राप्त हुई* । *ये कथाएं बताती हैं कि धर्म ही सर्वोच्च शक्ति है, जिससे सुख, समृद्धि और अमरत्व प्राप्त होता है* । 🐏 *शास्त्रों में नंदी को धर्म का स्वरुप कहा है जबकि गाय को पृथ्वी कहा गया है l आपके जीवन में धर्म बना रहे इसके लिए नन्दी ( सांड ) को शुद्ध आहार खिलाएं और आपके आहार में सात्विकता हो इसके लिये गौमाता की रक्षा, सेवा करें* l 🙏🌹 *आपको सुविचारित करना ही मेरा ध्येय है, आपमें आध्यात्मिक रुचि उत्पन्न करना मेरा दूसरा ध्येय है एवं ऋषि, मुनियों के ज्ञान से समृद्ध लेख लिखकर आपकी आत्मिक उन्नति मेरा अंतिम ध्येय है* l🌹🙏 🐏 *आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान fallow करें l महर्षि पतंजलि एवं महर्षि वेदव्यास जी को आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिये एवं प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी को शब्दों का ज्ञान ( ब्रह्म ज्ञान) देने के लिये हार्दिक आभार एवं कोटि कोटि नमन* l 🙏 🌹 🌹 🙏 🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹
धर्म कर्म - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 यह कथा उस गूढ़ रहस्य को खोलती है, जो केवल शिशुपाल के वध तक सीमित नहीं, बल्कि सृष्टि के तीन युगों—सत्य, त्रेता और द्वापर—में फैली हुई एक दिव्य योजना का हिस्सा है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, भगवान के हाथों प्राप्त मृत्यु मोक्ष का द्वार खोल देती है। शिशुपाल के साथ भी यही हुआ, पर इसके पीछे का कारण एक अत्यंत प्राचीन प्रसंग से जुड़ा है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण और महाभारत दोनों में मिलता है। आइए, इस रहस्यपूर्ण इतिहास को क्रम से समझते हैं। वैकुंठ का द्वार और श्राप की शुरुआत भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ में जय और विजय नामक दो द्वारपाल सदैव सेवा में तत्पर रहते थे। एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र—सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार—भगवान के दर्शन हेतु वैकुंठ पधारे। महान तपस्वी और ब्रह्मपुत्र होने के कारण उनका कहीं भी निर्बाध गमन स्वाभाविक था। किन्तु उनके तेज और महिमा से अनभिज्ञ जय–विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। बार-बार आग्रह के बावजूद जब प्रवेश न मिला, तो क्रोधित होकर सनतकुमारों ने दोनों को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया। नारायण का आगमन और दो मार्ग उसी क्षण स्वयं नारायण द्वार पर प्रकट हुए और अतिथियों का सम्मान किया। जय–विजय ने हृदय से क्षमा याचना की और श्राप निवृत्ति की प्रार्थना की। सनतकुमारों ने कहा कि श्राप टल नहीं सकता, पर भगवान चाहें तो मुक्ति का मार्ग दे सकते हैं। तब नारायण ने कहा— “श्राप का सम्मान बना रहना चाहिए, किन्तु मैं तुम्हें यह वर देता हूँ कि अंततः तुम दोनों पुनः मेरे पास लौट आओगे।” जय–विजय ने पूछा, “प्रभु, इसमें कितना समय लगेगा?” नारायण ने उत्तर दिया कि इसके दो मार्ग हैं— 1. भक्ति का मार्ग: सात जन्मों तक मेरे भक्त बनकर साधना करो, तब वैकुंठ लौटोगे। 2. वैर का मार्ग: मुझसे घोर शत्रुता रखो और मेरे ही हाथों मारे जाओ—तो केवल तीन जन्मों में मुक्ति मिलेगी। जब सनतकुमारों ने इस रहस्य का कारण पूछा, तो नारायण बोले— “भक्त कभी-कभी प्रभु का स्मरण छोड़ सकता है, पर शत्रु शत्रुता में भी निरंतर मेरा ही चिंतन करता है। इस निरंतर स्मरण से वह शीघ्र मुक्त हो जाता है।” तीन जन्मों की लीला वैकुंठ वापसी में विलंब न हो—इस भाव से जय–विजय ने तीन जन्मों का मार्ग चुना। परिणामस्वरूप— सतयुग में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने और वराह तथा नृसिंह अवतार के हाथों मारे गए। त्रेतायुग में रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लेकर श्रीराम के द्वारा मुक्त हुए। द्वापर में शिशुपाल और दंतवक्र बने और भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मृत्यु पाकर अंततः वैकुंठ लौटे। यही कारण है कि शिशुपाल का वध केवल दंड नहीं, बल्कि मोक्ष का अंतिम द्वार था—एक पूर्वनियोजित दिव्य लीला का पूर्ण होना। आशा है यह प्रस्तुति आपको रुचिकर लगी होगी। जय श्रीहरि 🚩
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#महाभारत भीष्म पितामह के पांच तीर🏹 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जब कौरवों की सेना पांडवों से युद्ध हार रही थी तब दुर्योधन भीष्म पितामह के पास गया और उन्हें कहने लगा कि आप अपनी पूरी शक्ति से यह युद्ध नहीं लड़ रहे हैं।* *भीष्म पितामह को काफी गुस्सा आया और उन्होंने तुरंत पांच सोने के तीर लिए और कुछ मंत्र पढ़े।* *मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने दुर्योधन से कहा कि कल इन पांच तीरों से वे पांडवों को मार देंगे।* *मगर दुर्योधन को भीष्म पितामह के ऊपर विश्वास नहीं हुआ और उसने तीर ले लिए और कहा कि वह कल सुबह इन तीरों को वापस करेगा।* *इन तीरों के पीछे की कहानी भी बहुत मजेदार है।* *भगवान श्रीकृष्ण को जब तीरों के बारे में पता चला तो उन्होंने अर्जुन को बुलाया और कहा कि तुम दुर्योधन के पास जाओ और पांचो तीर मांग लो। दुर्योधन की जान तुमने एक बार गंधर्व से बचायी थी। इसके बदले उसने कहा था कि कोई एक चीज जान बचाने के लिए मांग लो। समय आ गया है कि अभी तुम उन पांच सोने के तीर मांग लो। अर्जुन दुर्योधन के पास गया और उसने तीर मांगे। क्षत्रिय होने के नाते दुर्योधन ने अपने वचन को पूरा किया और तीर अर्जुन को दे दिए। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - भीष्मपितामाह के पांच तीर 730Sures भीष्मपितामाह के पांच तीर 730Sures - ShareChat
#🪔विजया एकादशी 🌺 विजया एकादशी फरवरी 13 विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का व्रत है विजया एकादशी। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि एकादशी का व्रत धारण करने से न सिर्फ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है, बल्कि पूर्व जन्म के पापों का भी नाश हो जाता है। वहीं इसका पुण्य उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसकी मृत्यु हो चुकी है आप आप उसकी आत्मा की शांति या मोक्ष की कामना से यह व्रत धारण कर रहे हैं। कथा के अनुसार वनवास के दौरान जब भगवान श्रीराम को रावण से युद्ध करने जाना था तब उन्होंने भी अपनी पूरी सेना के साथ इस महाव्रत को रखकर ही लंका पर विजय प्राप्त की थी। व्रत विधि 〰️〰️〰️ इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर उनकी धूम, दीप, पुष्प, चंदन, फूल, तुलसी आदि से आराधना करें, जिससे कि समस्त दोषों का नाश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है इसलिए इस दिन तुलसी को आवश्यक रूप से पूजन में शामिल करें। भगवान की व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में हरिभजन करते हुए उनसे आपके दुखों का नाश करने की प्रार्थना करें। रात्रि जागकरण का पुण्य फल आपको जरूर ही प्राप्त होगा। व्रत धारण करने से एक दिन पहले ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत धारण करने से व्यक्ति कठिन कार्यों एवं हालातों में विजय प्राप्त करता है। एकादशी कथा 〰️〰️〰️〰️〰️ युधिष्ठिर ने पूछा: हे वासुदेव! फाल्गुन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार माघ) के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका व्रत करने की विधि क्या है? कृपा करके बताइये। भगवान श्रीकृष्ण बोले: युधिष्ठिर एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की ‘विजया एकादशी’ के व्रत से होनेवाले पुण्य के बारे में पूछा था तथा ब्रह्माजी ने इस व्रत के बारे में उन्हें जो कथा और विधि बतायी थी, उसे सुनो। ब्रह्माजी ने कहा : नारद यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है । यह एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे पहुँचे, तब उन्हें समुद्र को पार करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा ‘सुमित्रानन्दन किस उपाय से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयंकर जल जन्तुओं से भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमता से पार किया जा सके। लक्ष्मणजी बोले हे प्रभु आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है? यहाँ से आधे योजन की दूरी पर कुमारी द्वीप में बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं। आप उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये। श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया। महर्षि ने प्रसन्न होकर श्रीरामजी के आगमन का कारण पूछा। श्रीरामचन्द्रजी बोले ब्रह्मन् मैं लंका पर चढ़ाई करने के उद्धेश्य से अपनी सेनासहित यहाँ आया हूँ। मुने अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, कृपा करके वह उपाय बताइये। बकदाल्भय मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी होती है, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे। राजन् ! अब इस व्रत की फलदायक विधि सुनिये: दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित कर उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें। उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें। फिर एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें। कलश को पुन: स्थापित करें। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा विशेष रुप से उसका पूजन करें। कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें। गन्ध, धूप, दीप और भाँति भाँति के नैवेघ से पूजन करें। कलश के सामने बैठकर उत्तम कथा वार्ता आदि के द्वारा सारा दिन व्यतीत करें और रात में भी वहाँ जागरण करें । अखण्ड व्रत की सिद्धि के लिए घी का दीपक जलायें । फिर द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी जलाशय के समीप (नदी, झरने या पोखर के तट पर) स्थापित करें और उसकी विधिवत् पूजा करके देव प्रतिमासहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें कलश के साथ ही और भी बड़े बड़े दान देने चाहिए। श्रीराम आप अपने सेनापतियों के साथ इसी विधि से प्रयत्नपूर्वक ‘विजया एकादशी’ का व्रत कीजिये इससे आपकी विजय होगी। ब्रह्माजी कहते हैं नारद यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि के कथनानुसार उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया। उस व्रत के करने से श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पायी और सीता को प्राप्त किया बेटा जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना चाहिए । इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जगदीश जी की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश… जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश… मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश… तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश… तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश… तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश… दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे। करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश… विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश… विजया एकादशी मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एकादशी आरम्भ👉 12 फरवरी दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से। एकादशी तिथि समाप्त👉 13 फरवरी दोपहर 02 बजकर 25 मिनट तक। पारण का समय👉 14 फरवरी प्रातः 06 बजकर 57 मिनट से प्रातः 09 बजकर 10 मिनट के बीच कर लेना चाहिए। पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय सायं 04:01। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🪔विजया एकादशी 🌺 - নিতত্রা বক্কান্রথীী शुक्रवार फरवरी १३ विशेष নিতত্রা বক্কান্রথীী शुक्रवार फरवरी १३ विशेष - ShareChat
#🪔विजया एकादशी 🌺 एकादशी व्रत उद्यापन की विस्तृत विधि 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एकादशी का व्रत एक तप है तो उद्यापन उसकी पूर्णता है। उद्यापन वर्ष में एक बार किया जाता है इसके अंग हैं- व्रत, पूजन, जागरण, हवन, दान, ब्राह्मण भोजन, पारण। समय व जानकारी के अभाव में कम लोग ही पूर्ण विधि-विधान के साथ उद्यापन कर पाते हैं। प्रत्येक व्रत के उद्यापन की अलग-अलग शास्त्रसम्मत विधि होती है। इसी क्रम में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशियों का उद्यापन करने की विस्तृत शास्त्रोक्त विधि आपके समक्ष प्रस्तुत है। वर्ष भर के 24 एकादशी व्रत किसी ने कर लिये हों तो वो उसके लिए उद्यापन करे। जिसने एकादशी व्रत अभी नहीं शुरु किये लेकिन आगे से शुरुआत करनी है तो वह भी पहले ही एकादशी उद्यापन कर सकते हैं और उस उद्यापन के बाद 24 एकादशी व्रत रख ले। कुछ लोग साल भर केवल कृष्ण पक्ष के 12 एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन करते हैं तो कुछ लोग साल भर के 12 शुक्ल एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन भी करते हैं । अतः जैसी इच्छा हो वैसे करे लेकिन उद्यापन अवश्य ही करे तभी व्रत को पूर्णता मिलती है। कृष्ण पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन कृष्ण पक्ष की एकादशी - द्वादशी को करे, शुक्ल पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन शुक्ल पक्ष की एकादशी - द्वादशी को करे। दोनों पक्ष के 24 एकादशी व्रतों का उद्यापन किसी भी पक्ष की एकादशी को कर सकते हैं (लेकिन चौमासे में एकादशी उद्यापन नहीं करना है)। शास्त्रों के अनुसार एकादशी उद्यापन दो दिन का कार्यक्रम होता है पहले दिन एकादशी को व्रत के साथ पूजा होती है तथा द्वादशी को हवन करके 24 या12 ब्राह्मणों को दान देकर भोजन करवाया जाता है। प्राचीन महाभारत काल में इस एकादशी उद्यापन की विधि के बारे में पूछते हुए अर्जुन बोले, “हे कृपानिधि ! एकादशी व्रत का उद्यापन कैसा होना चाहिये और उसकी क्या विधि है? उसको आप कृपा करके मुझे उपदेश दें।” तब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "हे पांडवश्रेष्ठ ! उद्यापन के बिना, कष्ट से किये हुए व्रत भी निष्फल हैं। सो तुम्हें उसकी विधि बताता हूं। देवताओं के प्रबोध समय में ही एकादशी का उद्यापन करे। विशेष कर मार्गशीर्ष के महीने, माघ माह में या भीम तिथि (माघ शुक्ल एकादशी) के दिन उद्यापन करना चाहिये |" भगवान के उपरोक्त कथन से तात्पर्य है कि चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ला एकादशी से लेकर कार्तिक कृष्ण एकादशी) में एकादशी उद्यापन नहीं करे। एकादशी उद्यापन की पूजा सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ उद्यापन की सारी सामग्री समय से एकत्रित कर ले ताकि पूजा में व्यवधान न हो। एकादशी उद्यापन का सामान 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️तुलसीदल (मंजरी), तुलसीपत्र, फूल, दूब, गंगाजल (अथवा सामान्य पवित्र पानी), पंचामृत, आचमन पात्र + आचमनी, कलश, शंख / अर्घ्य, भगवान के लिए कपड़ा जनेऊ - फूलमाला- रुद्राक्षमाला, कलश के लिए सवा मीटर काला- सफेद वस्त्र, कटोरे -5 (1 कलश के लिए, गणेश-मातृका-दुर्गा-क्षेत्रपाल के लिए4), लक्ष्मीजी व विष्णुजी की मूर्ति, गणेशजी दुर्गाजी की मूर्ति अथवा पूगीफल ले लें, चंदन पाउडर, रोली (कुमकुम), चावल, धूप-अगरबत्ती, फल व दक्षिणा (गणेशजी, 16मातृका, वेदी, कलश, विष्णुजी 5 के लिए), पान के 2 पत्ते, लौंग-इलायची सुपारी (पूगीफल), रुई- बत्तियां, घी की बत्ती, दिया (मुख्य और आरती के लिए), माचिस, कपूर, दक्षिणा- आचार्य के लिए। आचार्य को देने के लिए धोती/अंगोछा। क्षेत्रपाल के लिए - गुड / उड़द-लौंग । 16 मातृका,गणेशजी को नैवेद्य लगाने के लिए - मोदक, बताशे, इलायची-दाना । वेदी के लिए 〰️〰️〰️〰️साफ मिट्टी/बालू, सर्वतोभद्र व अष्टदल कमल बनाने के लिए अबीर आदि रंग या फिर रोली आटे-तिल-चावल-हल्दी से बनाए । दालों से भी सर्वतोभद्र बन सकता है- मलका-लाल, उड़द काला, मूंग-हरा, चावल-सफेद, पीली-दाल । 24 नैवेद्य 〰️〰️〰️1. मोदक, 2. गुड़, 3. चूर्ण- आटे या सूजी चीनी को घी में भून कर बना प्रसाद, 4. घृत-गुड़ मिले आटे की पूरी बनाए, 5. मण्डक = रोटी (चाहे तो घी दूध चीनी में आटा गूंथकर मीठी रोटियाँ बनाए), 6. सोहालिका / सोहालक खाँडयुक्त अशोकवर्तिका= फेनी बनाएं या दूध की सेवईं बना लें, 7 मक्खन 8. बेर या बेल फल या फिर सेब, 9. सत्तू- भुना वाला चना चीनी के साथ पीसकर रखें, 10. बड़े-भीगे हुए उड़द पीसकर हल्दी, धनिया, आजवायन, नमक डालकर तलकर गोल पकौड़े जैसे बना लें, 11. खीर, 12. दूध, 13. शालि (उबला चावल, बासमती हो तो उत्तम) 14. दही-चावल, 15.इंडरीक = इडली = सूजी, दही, चुटकी भर सोडा, एक चम्मच तेल और नमक डालकर घोल तैयार कर लें इस इडली घोल को 20 मिनट तक ढककर रख दें। इडली स्टैण्ड हो ठीक है वर्ना एक बडा बर्तन गैस पर रख लें, उसमें थोड़ा पानी लें उसमें दो कटोरी रखें, उसके उपर छोटी प्लेट रखें और उसके उपर छोटी कटोरियों में इडली का घोल भरकर रख दें। बर्तन को अच्छी से ढककर 8-10 मिनट भाप में पकने दें फिर ये इडलियाँ भगवान को भोग लगाए।, 16. बिना घी की आटे की पूरियां तल लें 17. अपूप (पुए) = सूजी, आटे में चीनी, गुड़, घी, दही अच्छी से मिलाकर तलकर छोटी-छोटी गोल मीठी पकौड़ियां सी बना लें, 18. गुड़ के लड्डू, 19. शर्करा सहित तिलपिष्ट = साफ तिल चीनी के साथ पीसकर थोड़ा भूनकर कटोरी में रख दें, 20. कर्णवेष्ट = आटा चीनी दूध घी मिलाकर गूंथ लें इसकी लोई बनाकर रोटी की तरह बेल लें फिर चाकू से पतली सी पट्टियां काट लें, हर एक पट्टी को अंगुली की सहायता से कान के कुंडल जैसी गोल बना लें इन गोल आकृतियों को तलकर नैवेद्य के लिए रख लें, 21.शालिपिष्ट= चावल (बासमती हो तो उत्तम) के आटे को घी में भूनकर चीनी मिलाकर प्रसाद बना ले, 22. केला, 23. घृतयुक्त मुद्गपिष्ट : मिक्सी में मूँग दाल का आटा बना ले या फिर मूंग भिगोकर पीसकर, उसमें घी और चीनी डालकर पका ले, 24. गुड़ मिला उबला चावल(भात) द्वादशी के लिए हवन के लिए: घी (अधिक घी न हो तो घी के समाप्त होने के बाद तिल के तेल से भी हवन पूर्ण किया जा सकता है), खीर (आहुति में इसका प्रचुर मात्रा में प्रयोग होना है, आहुतियाँ गिनकर हिसाब से बना ले अन्यथा तिल-जौं आदि हवन सामग्री से ही हवन कर ले, लेकिन स्विष्टकृत हवन में खीर ही प्रयोग होगी), कुल कितनी आहुति देनी हैं हिसाब लगा ले, अगर घी/ खीर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है तो तिल (काले व सफेद) + जौं (तिल से कम मात्रा में) + चावल (जौं से कम) + “हवन सामग्री” का पैकेट। गोबर व गोमूत्र, पानी, कपूर, रुई की बत्तियां, माचिस, फूल, कुश(या दूब), 4 पवित्र (2 कुश/दूर्वा को साथ बांधकर 1 पवित्र बनता है), समिधा के लिए छोटी सूखी पतली लकड़ियाँ(आम/पीपल आदि वृक्ष की लेकिन काँटेदार पेड़ की न हो), हवन कुंड (या ईंट लगाकर मिट्टी/रेत से वेदी बनाए) । प्रणीता पात्र और प्रापण पात्र ( न हों तो 2कटोरे ले) । स्रुक स्रुव ( न हों तो खीर होम करने के लिए चम्मच ले, घृत होम के लिए आम/पीपल की पत्ती लें)। तिलक के लिए रोली अक्षत। ब्रह्माजी के लिए दक्षिणा । आचार्य व ब्राह्मण को दान के लिए: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️अन्न, वस्त्र (धोती, अंगोछा, टोपी का कपड़ा अंगूठी (छल्ले), जूते/चप्पल, दक्षिणा, आचार्य-पत्नी भी बुलाई हैं तो साड़ी-बिंदी आदि इच्छानुसार दें। आचार्य को या सबको फल, अन्न (साबुत दाल, चावल), मिठाई दे सकते हैं। पीतल/तांबे / मिट्टी से बने कलश व विष्णु मूर्ति के दान का भी महत्व है। इसके अलावा सबके लिए समय से भोजन तैयार करवा ले । भगवान ने कहा 👉 "हे अर्जुन! अब उद्यापन की विधि को मैं कहता हूं। यदि सामर्थ्यवान मनुष्य श्रद्धा से हजार 'स्वर्ण मुद्रा' दान दे और असमर्थ व्यक्ति एक 'कौड़ी' भी यदि श्रद्धा से दान दे दे तो उन दोनों का फल एक समान ही है।” दान विधि में जितना बताया है यदि धनसम्पन्न व्यक्ति हो समर्थ हो तो दुगुना दान दे। लेकिन अशक्त मनुष्य यदि उससे आधा भी दान देता है तो वह दान का पूरा फल पाता है। स्वर्ण मुद्रा प्राचीन समय में प्रचलित थी इतना अधिक आज के समय में सम्भव नहीं। अब रुपया प्रचलन में है, अतः व्रती अपनी जैसी सामर्थ्य हो उस अनुसार रुपये का, उपयोगी वस्तुओं का दान करे। विधान के साथ हवन करने में असमर्थ हो तो उसके लिए भी अलग से पंडितजी को दक्षिणा दान दे देनी चाहिए। एकादशी उद्यापन की शास्त्रोक्त विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दशमी तिथि को 👉 दशमी तिथि के दिन एक समय भोजन करे। इस दिन मंदिर साफ करके पूजा की आवश्यक सामग्रियाँ खरीद लाए । आचार्य वरण के लिए दशमी तिथि की शाम को गुरु / पंडितजी के घर जाए निमंत्रण कह दे। रात्रि को दन्तधावन करके भगवान आगे नियम करे कि, (मैं एकादशी को निराहार रहकर द्वादशी को भोजन करूंगा। हे पुण्डरीकाक्ष भगवन्! मैं आपकी शरण में हूं) अब शयन करे। एकादशी तिथि को 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हे पार्थ! एकादशी को प्रातःकाल सावधान मन से स्नान आदि करके पाखंडी और पतित नास्तिक लोगों से दूर रहे। संध्या करके नदी, तालाब आदि के शुद्ध जल में या घर पर ही शुद्ध जल में मन्त्र पूर्वक (भगवान का नाम स्मरण करते हुए) स्नान करके पितरों का तर्पण करे (पितरों के नाम से जलांजलि दे दे)| फिर पूजा की सारी सामग्री इकट्ठी कर ले, 24 नैवेद्य बना ले या बनवा ले। अब गुरु/आचार्य/पंडित को बुलाए, सम्भव हो तो उनकी पत्नी सहित बुलाए । आचार्य शान्त, सर्वगुणसम्पन्न, सदाचारी, वेद-वेदांगों का जानने वाला हो। या फिर किसी पूजा पाठ के जानकार व्यक्ति या किसी योग्य धार्मिक व्यक्ति को पुरोहित आचार्य बनाकर पूजा स्थल पर बुला ले। आदरपूर्वक उन आचार्य का स्वागत करे पूजा स्थल पर सामने आसन देकर उन्हें बैठा दे एवं उनको प्रणाम करके नमस्कार करके प्रार्थना करे। व्रती आचार्य को तिलक करे, फूल चढ़ाए, उसे वस्त्र (धोती / अंगोछा) दान देकर कहे कि, (हे आचार्य, मेरा यह (हरिवासर से सम्बन्ध रखने वाला) व्रत जिस तरह संपूर्ण हो ऐसा उपाय कीजिये।) सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करके संकल्प करे। हाथ में जल पुष्प तिल लेकर संस्कृत में नीचे लिखे अनुसार संकल्प पढ़ें, कोष्ठक में दिये विकल्प सम्वत्सर, माह, पक्ष आदि सावधानी से चुने। यदि 24 एकादशी व्रत कर लिये हों तो आचरितस्य बोले एकादशी व्रत रखना यदि अभी नहीं शुरु किया हो तो किये जाने वाले व्रत के लिए करिष्यमाणस्य बोले । संकल्प: 〰️〰️〰️ॐ गणपतिर्जयति || ॐ विष्णुर् - विष्णुर् विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलि-युगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे आर्य्यावर्तेक देशांतर्गत (* शहर का नाम *) स्थाने, (*संवत्सर का नाम *) नाम्नि संवत्सरे, (*उत्तरायण / दक्षिणायन *) अयने, (*ऋतु का नाम*) ऋतौ, महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे ( हिन्दू मास का नाम *) मासे शुभ (*कृष्ण / शुक्ल*) पक्षे एकादश्यां तिथौ (*वार का नाम*) वासरे (*गोत्र का नाम *) गौत्रः (*व्रतीका नाम* शर्मा/ वर्मा/ गुप्तो दासो) अहं मया ( *व्रत रख दिए तो आचरितस्य बोले / व्रत उद्यापन के बाद रखने वाले हैं तो करिष्यमाणस्य *) (*शुक्ल / कृष्ण * ) एकादशी व्रतस्य साङ्गता-सिद्धयर्थम् तत्सम्पूर्ण फल-प्राप्तयर्थम् देश कलाद्यनुसारतो यथाज्ञानेन (शुक्ल-कृष्ण) एकादशी व्रतोद्यापन-महं करिष्ये तदङ्गत्वेन गणपतिपूजनं पुण्याहवाचनम् आचार्यंवरणंम् च करिष्ये । [एकादशी व्रतों की सिद्धि एवम् उसके संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए देश काल के अनुसार यथा ज्ञान एकादशी के व्रत उद्यापन को मैं आज करता हूं, व्रत का भंग न हो जाए इस कारण मैं गणपति पूजन, आचार्य वरण पूर्वक पुण्याहवाचन भी करूंगा या कराऊंगा" संकल्प के पीछे यह भाव छिपा है] इसके बाद श्रीगणेश जी का पूजन करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अपने सामने गणेश जी और दुर्गा जी की मूर्ति/चित्र रख दे जिसकी मूर्ति न हो तो मूर्ति की जगह कटोरे में सुपारी(पूगीफल) रखे, या स्वस्तिक बनाकर पूज सकते हैं। प्रतिष्ठित मूर्ति न हो तो प्रतिष्ठा के लिये हाथ में अक्षत पुष्प लेकर मन्त्र बोले - ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु । विश्व देवास इह मादयंताम् ॐ प्रतिष्ठ ॥ गणपति देवस्य प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः चरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, श्री गणपति गौरीमावाहयामि, प्रतिष्ठापयामि पूजयामि नमः । हाथ में पुष्प लेकर श्रीगणेश एवं दुर्गाजी का ध्यान करें गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ॥ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै प्रणताः स्मताम् ॥ श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ध्यानार्थे पुष्पम् समर्पयामि । (श्रीगणेश व दुर्गा जी पर फूल चढ़ाकर नमस्कार करें) गंध👉 श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, गन्धम् समर्पयामि। (चन्दन का तिलक लगाएँ।) अब हाथ में फूल लेकर बोले : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ सुमुखश्चैक दन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो गणाधिपः ।। धूम्रकेतुः गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा संग्रामे संकटेश्चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। ॐ सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।। ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे, निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम् । ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन | ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः । (फूल चढ़ाएँ।) धूप: धूप दिखाएँ 〰️〰️〰️〰️〰️ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, धूपं आघ्रापयामि। दीप: 〰️〰️ एक दीपक जलाएँ व निम्न मंत्र से दीप दिखाएँ : ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दीपं दर्शयामि । नैवेद्य 〰️〰️ बताशे फल आदि नैवेद्य अर्पित करें : शर्कराखंडखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च। आहारं भक्ष्य भोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नैवेद्यं निवेदयामि ॥ (नैवेद्य निवेदित करें।) अब आचमनी से जल छोड़ते हुए बोलें 👉 नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। तांबूल👉 इलायची, लौंग, सुपारी युक्त पान अर्पित करें ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मुखवासार्थम् एलालवंग ताम्बूलं समर्पयामि ॥ इसके पश्चात हाथ जोड़कर श्री गणेशाम्बिका की प्रार्थना करें👉 विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञ विभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥ लम्बोदर नमस्तुभ्यं नमस्ते मोदकप्रिय । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा । सर्वेश्वरी सर्वमाता शर्वाणी हरवल्लभा सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भव्या भाव्या भयापहा नमो नमस्ते ॥ 'अनया पूजया श्रीगणेशाम्बिका प्रीयन्ताम्' कहकर जल छोड़ दें। षोडश मातृका पूजन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक कटोरे पर रोली से 16 बिंदु दे दे। अब निम्न मन्त्र पढ़ते हुए उन बिंदुओं पर अक्षत, जौ, गेहूँ चढ़ाते जाए: "गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया, देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातरः ॥ धृति पुष्टि-स्तथा तुष्टि रात्मनः कुलदेवता गणेशे नाधिका होता वृद्धौ पूज्याश्च षोडशः । ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः ॥ श्रीगणेश गौरी सहित षोडशमातृकाम् आवाहयामि, स्थापयामि।” अब अक्षत लेकर बोले : ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयंताम् ॐ प्रतिष्ठ ॥ अब अक्षत "षोडश मातृका" पर छोड़ दे। अब "ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः गंधम् समर्पयामि।" से षोडश मातृका पर आचमनी द्वारा चन्दन मिश्रित जल छिड़क दे "ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि " बोलकर धूप जला दे " ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः दीपम् 11 दर्शयामि " दीप दिखा दे "ॐ आयुरारोग्यमैश्वर्यं ददध्वं मातरो मम । निर्विघ्नं सर्वकार्येषु कुरुष्वं सगणाधिपाः ॥ ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः नैवेद्यम्-ऋतु फलं च निवेदयामि |" बताशे और फल का नैवेद्य रख दे आचमन के लिए षोडश मातृका पर जल छिड़के "ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः दक्षिणा समर्पयामि।" दक्षिणा चढ़ा दे फूल और अक्षत लेकर बोले "अनया पूजया श्री षोडश मातृका प्रीयताम् नमः" अक्षत उन 16 माताओं पर चढ़ा दे क्षेत्रपाल पूजन 〰️〰️〰️〰️〰️ एक कटोरे पर चंदन से त्रिशूल की आकृति बनाकर “ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, क्षेत्रपाल भैरवम् आवाहयामि पूजयामि नमः शुभम् कुरू" बोलकर अक्षत-पुष्प चढ़ा दें। ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, नैवेद्यम् निवेदयामि बोलकर गुड/उड़द-लौंग चढ़ा दे(पूजा के बाद इसे किसी पेड़ की जड़ में डाले) । अब हाथ जोड़कर पूजा की आज्ञा माँगते हुए बोलें👉 “तीक्ष्ण दंष्ट्र महाकाय कल्पांत दहनोपम। भैरवाय नमस्तुभ्यम् अनुज्ञां दातु मर्हसि ॥” अब ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः बोलकर फूल चढ़ा दें। क्रमशः👉 यहाँ शब्द सीमा होने के कारण दूसरा भाग अगली पोस्ट मे दिया जा रहा है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🪔विजया एकादशी 🌺 - एकादशी व्रत उद्यापन की विस्तृत विधि ( भाग १) एकादशी व्रत उद्यापन की विस्तृत विधि ( भाग १) - ShareChat
सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥ [ हिदोपदेश, मित्रलाभ- ४ ] अर्थात् 👉🏻 संसार के समस्त द्रव्यों में उत्तम विद्यारूपी धन ही है , क्योंकि न यह चुराई जा सकती है , न इसका कोई मोल लगा सकता है तथा न इसका कभी क्षय ही हो सकता है । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 ##🌺 विजया एकादशी🙏 #🙏विजया एकादशी🪔 #🌸 विजया एकादशी 🪔 #विजया एकादशी🌸
#🌺 विजया एकादशी🙏 - 13 फरवरी २०२६ विजया एकादशी  सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।  কী 34 विजया एकादशी व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता हे।यह अपर्ने नाम के अनुरूप फल देती हे॰ इस दिन तत धारण करने से व्यक्ति को मनोवाछित फल की प्राप्ति होती हे व जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है। यदि आपके काम पूरे बिगद नहीं होते बनते - बनते ज्नाते हों तो विजया एकादशी का वत करना चाहिए। चिजया एकादशी के दिन श़री हरी की आराधना कर ३ नमो भगतते तासुदेवाय मंन्न का १०८ बार जाप करना माना गया द। फलदायी  13 फरवरी २०२६ विजया एकादशी  सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।  কী 34 विजया एकादशी व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता हे।यह अपर्ने नाम के अनुरूप फल देती हे॰ इस दिन तत धारण करने से व्यक्ति को मनोवाछित फल की प्राप्ति होती हे व जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है। यदि आपके काम पूरे बिगद नहीं होते बनते - बनते ज्नाते हों तो विजया एकादशी का वत करना चाहिए। चिजया एकादशी के दिन श़री हरी की आराधना कर ३ नमो भगतते तासुदेवाय मंन्न का १०८ बार जाप करना माना गया द। फलदायी - ShareChat
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *परमात्मा की इच्छा से ब्रह्मा जी ने सुंदर सृष्टि की रचना की , अनेक प्रकार के जीन बनाए | पर्वत , नदियां , पेड़-पौधे सब ईश्वर की कृपा से इस धरा धाम पर प्रकट हुये | ईश्वर समदर्शी है ! वह कभी भी किसी से भेदभाव नहीं करता है | ईश्वर की प्रतिनिधि है प्रकृति और प्रकृति सबको बराबर बांटने का प्रयास करती है | सूर्य जब आसमान पर चमकता है तो यह विचार नहीं करता कि किसी को प्रकाश अधिक दे दे और किसी को कम | सुंदर , शीतल , सुगंधित वायु जब प्रवाहित होती है तो वह सबको बराबर स्पर्श करते हुए निकलने का प्रयास करती है | इसी प्रकार ईश्वर के बनाए हुए वृक्ष सबको समान फल देने का प्रयास करते हैं | अब यहां प्रश्न यह है कि जब ईश्वर समदर्शी है तो सबको बराबर लाभ क्यों नहीं मिलता ? ईश्वर ने तो सबके लिए बराबर व्यवस्था है कि अब यह अलग विषय है कि कौन उसका लाभ लेना चाहता है और कौन नहीं | सूर्य की ऊष्मा यद्यपि सबके लिए बराबर है परंतु इसका लाभ वही ले पाता है जो धूप में आकर बैठता है | वृक्षों में लगे हुए फल सबके लिए हैं परंतु प्राप्त उसी को होंगे जो कर्म करते हुए उनके पास तक जाएगा | कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर ने सबके लिए समान साधन उपलब्ध कराये हैं परंतु उसके लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ता है | यह सृष्टि कर्म प्रधान है , बिना कर्म किए यहां कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता और कर्म करने वालों के लिए सब कुछ उपलब्ध है | जो कर्महीन होते उन्हें कुछ भी नहीं प्राप्त हो पाता | बाबा जी ने मानस में लिखा है "सकल पदारथ है जग माही ! कर्महीन नर पावत नाही !!" कहने का तात्पर्य यह है कि सब कुछ यहां उपलब्ध है परंतु कुछ भी प्राप्त करने के लिए कर्म करना ही पड़ता है बिना कर्म की कुछ भी प्राप्त हो पाना संभव नहीं है | मानव जीवन का परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति बताया गया है और भगवत्प्राप्ति करने का साधन सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है परंतु मनुष्य ईश्वर की साधना - उपासना नहीं कर पाता और जब दूसरों को भक्ति के पथ पर अग्रसर देता है तो अपने मन ही मन में विचार करता है ईश्वर ने अमुक साधक को अपनी भक्ति प्रदान कर दी परंतु हमें नहीं प्राप्त हो पाई | इसका कारण है कि ईश्वर भेदभाव करता है | ईश्वर भेदभाव कदापि नहीं करता है जिन लोगों ने कुछ प्राप्त किया है उन्होंने कर्म को माध्यम बनाकर के वह सफलताएं अर्जित की है और कर्म रूपी अस्त्र , कर्म रूपी साधन सबके लिए ईश्वर ने समान रूप से उपलब्ध कराया है जो भी इस रहस्य को समझ जाता है वह कभी भी ईश्वर को भेदभाव करने वाला कह ही नहीं सकता |* *आज के यांत्रिक युग में मनुष्य इतना व्यस्त हो गया है कि उसे यह तक ज्ञात नहीं रह गया है कि हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए | आज मनुष्य थोड़ा सा कष्ट आ जाने पर ईश्वर को दोषी बताने लगता है परंतु वह स्वयं अपनी पत्नी , अपने बच्चे और अपना परिवार इससे आगे नहीं निकल पाता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि जब एक उपदेशक/कथावाचक व्यास गद्दी पर बैठ कर भगवान के उपदेशों को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करता है तो वह यह विचार नहीं करता कि हमारा उपदेश किसी को ज्यादा मिल जाए किसी को कम | वह ध्वनि विस्तारक यंत्र के माध्यम से सबको समान रूप से उपदेश देता है परंतु उसी जनमानस में कुछ लोग उसका लाभ ले लेते हैं और कुछ लोगों के द्वारा पूरा समय व्यतीत कर देने के बाद भी यह नहीं समझ आता उपदेशक ने क्या बता दिया , क्योंकि उन्होंने उस उपदेश का लाभ लेने का प्रयास ही नहीं किया | ठीक उसी प्रकार ईश्वर सबको बराबर बांट रहा है परंतु सभी लोग इसका लाभ लेना ही नहीं चाहते | जिस प्रकार एक पिता के चार पुत्र होते हैं और वह सबके लिए समान व्यवस्थाएं करता है परंतु उसके चारों पुत्र उन व्यवस्थाओं का लाभ लेकर सफल हो ही जाए यह आवश्यक नहीं है | पिता ने तो सबके लिए समान व्यवस्था की परंतु सभी पुत्र उसका लाभ नहीं ले पाते , ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी सबके लिए समान व्यवस्था करता है परंतु ईश्वर की कृपा उसी को मिलती है जो ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाता है अन्यथा जीवन भर ईश्वर का , समाज का एवं परिवार का दोष मानते हुए उसका जीवन व्यतीत हो जाता है | ईश्वर को भेदभाव करने वाला मानने वाले स्वयं भेदभाव करने के रोग से ग्रसित हैं क्योंकि उनको अपने परिवार के अतिरिक्त और कोई दिखाई नहीं पड़ता | जो कुछ भी करना चाहते हैं अपने परिवार के लिए ही करना चाहते हैं | जिस दिन मनुष्य अपने परिवार से ऊपर उठकर समभाव से सबके लिए विचार करने लगता है , चिंतन करने लगता है उसी दिन उसको ईश्वर भी समदर्शी दिखाई पड़ने लगता है अन्यथा जब हम स्वयं समदर्शी नहीं बन पाए हैं तो ईश्वर की समदर्शिता हमको नहीं दिखाई पड़ सकती है |* *हम दूसरों पर दोषारोपण करने में सिद्धहस्त हो गए हैं | जिस दिन हम स्वयं समदर्शी हो जाएंगे उसी दिन हमें सारा संसार और ईश्वर भी समान रूप से व्यवहार करने वाले दिखने लगेगें |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #🙏 प्रेरणादायक विचार
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