#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
सत्य की महिमा ,,,,,
( " विचार ही हमारी पूंजी है , धन नहीं" ! इस कथा से " सत्य" की महिमा को समझिये " )
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काशी में एक बड़े धनवान सेठ रहते थे। वह विष्णु भगवान् के परम भक्त थे और हमेशा सच बोला करते थे। .एक बार जब विष्णु जी सेठ जी की प्रशंसा कर रहे थे तभी माँ लक्ष्मी ने कहा, स्वामी !! आप इस सेठ की इतनी प्रशंसा क्यों करते हो ? क्यों न उसकी परीक्षा ली जाए और जाना जाए कि क्या वह सचमुच इसके लायक है ?
विष्णु जी बोले , ठीक है ! सेठ जी गहरी निद्रा में है आप उसके स्वप्न में जाएं और उसकी परीक्षा ले लें।
.अगले ही क्षण सेठ जी को स्वप्न आया। स्वप्न मेँ धन की देवी लक्ष्मी उनके सामनेँ आई और बोली ,” हे मानव ! मैँ धन की दात्री लक्ष्मी हूँ।” सेठ जी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और वे बोले , ” हे माता आपने साक्षात अपने दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है , बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?” ”कुछ नहीं ! मैं तो बस इतना बताने आयी हूँ कि मेरा स्वाभाव चंचल है, और वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते ऊब चुकी हूँ और यहाँ से जा रही हूँ।”
. सेठ जी बोले , ”मेरा आपसे निवेदन है कि आप यहीं रहे, किन्तु मैं एक साधारण प्राणी भला आपको कैसे रोक सकता हूँ, आप अपनी इच्छा अनुसार जहाँ चाहें जा सकती हैं।”
.और माँ लक्ष्मी उसके घर से चली गई।
.थोड़ी देर बाद माँ लक्ष्मी रूप बदल कर पुनः सेठ के स्वप्न मेँ " यश " ( FAME ) के रूप में आयीं और बोलीं , ” सेठ मुझे पहचान रहे हो ?”
.सेठ- “नहीं महोदय आपको नहीँ पहचाना।
.यश – ” मैं यश हूँ , मैं ही तेरी कीर्ति और प्रसिध्दि का कारण हूँ।
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लेकिन अब मैँ तुम्हारे साथ नहीँ रहना चाहता क्योँकि माँ लक्ष्मी यहाँ से चली गयी हैं, अतः मेरा भी यहाँ कोई काम नहीं।”
.सेठ -” ठीक है , यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही।”
.सेठ जी अभी भी स्वप्न में ही थे और उन्होंने देखा कि वह दरिद्र हो गए है। और धीरे-धीरे उनके सारे रिश्तेदार व मित्र भी उनसे दूर हो गए हैं। यहाँ तक की जो लोग उनका गुणगान किया करते थे वो भी अब बुराई करने लगे हैं।
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कुछ और समय बीतने पर माँ लक्ष्मी धर्म का रूप धारण कर पुनः सेठ के स्वप्न में आयीं और बोलीं , ” मैँ धर्म हूँ। माँ लक्ष्मी और यश के जाने के बाद मैं भी इस दरिद्रता में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मैं जा रहा हूँ।”
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”जैसी आपकी इच्छा।”सेठ ने उत्तर दिया। और धर्म भी वहाँ से चला गया।"
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कुछ और समय बीत जाने पर माँ लक्ष्मी " सत्य" के रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं , ”मैँ सत्य हूँ। लक्ष्मी , यश, और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ.“
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ऐसा सुन सेठ जी ने तुरंत "सत्य" के पाँव पकड़ लिए और बोले , ”हे महाराज, मैँ आपको नहीँ जानेँ दुँगा।
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भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें, मुझे त्याग दें पर कृपया आप ऐसा मत करिये क्योंकि "सुविचार " ही मेरी पूंजी है ! सत्य के बिना मैँ एक क्षण नहीँ रह सकता यदि आप चले जायेंगे तो मैं तत्काल ही अपने प्राण त्याग दूंगा।“
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" सत्य" देव ने कहा ”लेकिन तुमने बाकी तीनो को बड़ी आसानी से जाने दिया , उन्हें क्यों नहीं रोका।” सत्य ने प्रश्न किया।
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सेठ जी बोले , ” मेरे लिए वे तीनो भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उन तीनो के बिना भी मैं भगवान् के नाम का जाप करते-करते उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ , परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में " झूठ" ( अशुद्ध विचार ) प्रवेश कर जाएगा और मेरी वाणी अशुद्ध हो जायेगी ,
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,,,,, !! भला ऐसी वाणी से मैं अपने प्रभु , जगत के पालनहार विष्णु जी की वंदना कैसे कर सकूंगा ""...???
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मैं तो किसी भी कीमत पर आपके बिना नहीं रह सकता।
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सेठ जी का उत्तर सुन सत्य देव प्रसन्न हो गए , और उसने कहा , “तुम्हारी "अटूट भक्ति" नेँ मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया और अब मैँ यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा।”
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और ऐसा कहते हुए सत्य अंतर्ध्यान हो गया।
.सेठ जी अभी भी निद्रा में थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में धर्म वापस आया और बोला , “ मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है .”
.सेठ जी ने प्रसन्नतापूर्वक धर्म का स्वागत किया।
.उसके तुरंत बाद यश भी लौट आया और बोला , “ जहाँ सत्य और धर्म हैं, वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है , इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।
.सेठ जी ने यश की भी आव -भगत की।
.और अंत में माँ लक्ष्मी जी भी आयीं।
.उन्हें देखते ही सेठ जी नतमस्तक होकर बोले , “ हे देवी ! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?”
.“अवश्य , जहां , सत्य , धर्म और यश हों वहाँ मेरा " स्थाई वास" निश्चित है।” माँ लक्ष्मी ने उत्तर दिया।
.यह सुनते ही सेठ जी की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा पर वास्तविकता में वह एक कड़ी परीक्षा से उत्तीर्ण हो कर विजयी हुए थे !
विशेष -- सच ही कहा है " विचार ही हमारी पूंजी है ,धन नहीं !" हमें भी हमेशा याद रखना चाहिए कि जहाँ सत्य का निवास होता है वहाँ यश, धर्म और लक्ष्मी का निवास स्वतः ही हो जाता है।
विचारों का उत्पादन महतत्व यानि मन से होता है और मन का निर्माण "आहार " से होता है ! अतः सात्विक आहार ही खाएं !
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#जय श्री राम
🔥जब लंका की दीवारें जल रही थीं… तब धर्म अपनी सबसे शांत मुद्रा में खड़ा था।⚡️🙏♌
सूर्य अस्त होने को है। समुद्र के किनारे सोने सी चमकती लंका, लेकिन उसके प्रांगण में धधकती अग्नि — अहंकार के अंत की गवाही दे रही है। महल की ऊँची दीवारों पर जड़े रत्न अब चमक नहीं रहे, क्योंकि सत्य का प्रकाश उनसे कहीं अधिक तेज है।
सीढ़ियों पर खड़े हैं श्रीराम — चेहरा शांत, हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में। युद्ध समाप्त हो चुका है, लेकिन उनके नेत्रों में विजय का गर्व नहीं, बल्कि करुणा की गहराई है। धनुष अभी भी हाथ में है, पर उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है। यह दृश्य बताता है कि राम का युद्ध कभी व्यक्ति से नहीं था… अधर्म से था।
उनके साथ खड़े हैं पवनपुत्र हनुमान। वही अटल भक्ति, वही अडिग समर्पण। जिनकी शक्ति से लंका की नींव हिली, पर हृदय में केवल राम का नाम बसा रहा। उनके पीछे जलती लपटें मानो घोषणा कर रही हैं कि जहाँ भक्ति और धर्म साथ हों, वहाँ सबसे बड़ी सत्ता भी टिक नहीं सकती।
महल के द्वार पर बने राक्षसी चेहरे अब भयावह नहीं लगते… क्योंकि सत्य के सामने हर भय छोटा हो जाता है।
यह केवल एक युद्ध की जीत नहीं।
यह अधर्म पर धर्म की अंतिम मुहर है।
यह अहंकार पर मर्यादा की विजय है।
🔥 जय श्रीराम🚩
🔥 जय बजरंगबली🚩
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇
⁉️प्रश्न ये हैं कि तृष्णा खत्म कैसे होती है और अगर जैसे मैंने एक दो बार मैने अपनी इच्छाओं को खत्म करना भी चाहा है तो दिक्कत हुई है मुझको। काम के चक्कर मे परिवार में ज्यादा फिर सब मुझको सुनाते है – ये है ,वो है ,काम करना नही चाहता, खर्चा कहा से पूरा होगा आदि बड़ा झंझट है l ⁉️
✍️तृष्णा खत्म नहीं होती । खत्म होना तो सिद्धि प्राप्त कर लेना है । साध्य प्राप्त कर लेना ही है। इसी को खत्म करने के लिए ही तो साधनायें की जाती हैं। यह हमारे मन का वहम है कि हमारी तृष्णा या कामनायें खत्म हो गयी हैं ।
यह केवल दब जाती हैं । यह खत्म एकमात्र मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करने पर होंगी और भक्त अपनी कामनायें नहीं खत्म करता । वह तो मुक्ति चाहता ही नहीं । वह भगवादप्रप्रति के पश्चात कामनायें दिव्य बना लेता है। भगवान के निमित्त उसकी सभी कामनायें या तृष्णाएँ हो जाती हैं। यही मोक्ष और भगवादप्राप्ति में अंतर है।
वहाँ ( मुक्ति में ) मन बुद्धि इन्द्रियाँ समाप्त हो जाती हैं । लेकिन यहाँ ( भगवद्प्राप्ति में ) सब मन बुद्धि इन्द्रियाँ रहती हैं लेकिन दिव्य बन जाती हैं । वह भगवद विषयक हो जाती हैं। ✍️
🌍अब रही बात संसार की, तो संसार मे अगर हम हैं। तो जब तक हैं, चल रहा है , तब तक कर्तव्य का निर्वहन करना है , उसमें लिप्सा नहीं करनी , मतलब उनमें attachment नहीं करना है। जैसे हम नौकरी कर रहे हैं लेकिन हमें नौकरी से attachment नहीं है। अगर हमें कहीं और जगह उससे अच्छी सैलरी मिलेगी तो हम उसे तुरंत छोड़ देंगे। और नौकरी हम एकमात्र पैसे और परिवार के लिए कर रहे हैं । attachment हमारा परिवार और धन में है ,नौकरी में नहीं। तो बस कर्तव्य करना है । हाँ अगर वह स्थिति आ गयी है कि संसार का प्रभाव नहीं पड़ता तो अलग बात है , तब हम सब छोड़ छाड़ कर निकल सकते हैं। लेकिन जब तक यह स्थिति नहीं आई है तब तक हमें कर्तव्य पालन करना पड़ेगा , हम इससे बच नहीं सकते। ऐसा नहीं होगा कि यह भी न करें और वह भी न करें।🌍
#जय श्री हनुमान
संकट मोचन हनुमानाष्टक
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॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥
अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥
रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥
रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥
काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥
📿🚩📿🚩📿🚩📿
#महाभारत
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना केवल एक युद्ध-कथा के रूप में नहीं की, बल्कि जीवन के शाश्वत मूल्यों—धर्म, कर्तव्य, नीति और अध्यात्म—को स्थापित करने के लिए की।
इतने विराट ग्रंथ की रचना के बाद भी वे संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उसमें भगवान-तत्व केंद्र में नहीं था।
नारद के उपदेश से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की, जिसमें भगवान ही केंद्र में हैं।
कलियुग की दुर्बलताओं को जानते हुए उन्होंने वेदों को चार भागों—
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—में विभाजित किया, ताकि सामान्य जन भी उन्हें समझ सकें।
महाभारत का हृदय श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, ज्ञान और भक्ति का उपदेश दिया।
वेदव्यास का अंतिम संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
दूसरों को पीड़ा न देना और उनकी सेवा करना ही धर्म है।
जो व्यवहार हमें स्वयं को पसंद नहीं, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
भाषा-दृष्टि से सँवरा हुआ अंश (उद्धरण-योग्य)
“धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है,
फिर भी मनुष्य उसका आचरण क्यों नहीं करता?
जो अपने कल्याण की इच्छा रखता है,
उसे भय या लोभ के कारण धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।”
#👫 हमारी ज़िन्दगी #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
“जीवन की यात्रा: जन्म से निर्वाण तक मानव आत्मा का अनंत प्रवाह”
पुनर्जन्म उसे कहते हैं जब जीवात्मा एक शरीर त्याग कर दूसरे शरीर को धारण करती है। यह प्रक्रिया बार-बार तब तक चलती रहती है, जब तक कर्मों का पूर्ण फल भोग न लिया जाए।
पुनर्जन्म का कारण अधूरे कर्म हैं। एक जन्म में किए गए सभी कर्मों का फल एक ही जीवन में भोगना संभव नहीं होता, इसलिए आत्मा नए शरीर को प्राप्त करती है।
जीवन और मृत्यु को समझे बिना पुनर्जन्म को समझा नहीं जा सकता। जीवन आत्मा का शरीर के साथ संयोग है और मृत्यु आत्मा का स्थूल शरीर से वियोग है। मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
शरीर दो प्रकार का होता है—सूक्ष्म और स्थूल। सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन और ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, जो आत्मा के साथ सृष्टि के आरंभ से अंत तक रहती हैं। स्थूल शरीर पंचतत्वों से बना होता है और नश्वर है।
जन्म तब होता है जब आत्मा अपने सूक्ष्म शरीर सहित पंचभौतिक शरीर में प्रवेश करती है। मृत्यु तब होती है जब आत्मा स्थूल शरीर को छोड़ देती है। यह वस्त्र बदलने जैसी स्वाभाविक प्रक्रिया है।
मृत्यु आवश्यक है, क्योंकि एक समय बाद शरीर की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है। यदि मृत्यु न हो तो पृथ्वी पर भारी अव्यवस्था उत्पन्न हो जाए।
मृत्यु भयावह नहीं है, भय अज्ञान से उत्पन्न होता है। मृत्यु की अवस्था नींद में जाने जैसी होती है, जहाँ पीड़ा का अनुभव नहीं होता। ईश्वर की यह महान करुणा है।
मृत्यु भय से मुक्ति का उपाय वैदिक ग्रंथों का अध्ययन, योग और आत्मज्ञान है। योग, सांख्य और गीता के ज्ञान से ही मनुष्य निर्भय बनता है।
पुनर्जन्म कर्मों के कारण होता है। आत्मा कर्म किए बिना नहीं रह सकती। कर्म ही पुनर्जन्म का आधार हैं।
मोक्ष होने पर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि उस अवस्था में आत्मा का सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में लीन हो जाता है। मोक्ष में आत्मा ईश्वरीय आनंद में स्थित रहती है।
मोक्ष की भी एक निश्चित अवधि होती है। उस अवधि के पूर्ण होने पर आत्मा पुनः मनुष्य शरीर को प्राप्त करती है, क्योंकि मोक्ष के बाद कोई पाप शेष नहीं रहता।
पुनर्जन्म में शरीर कर्मों के आधार पर मिलता है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।
सात्त्विक और राजसिक कर्मों से मनुष्य जन्म मिलता है। तामसिक कर्मों की अधिकता से पशु या नीच योनियाँ प्राप्त होती हैं।
मनुष्य अपने पिछले या अगले जन्म को सामान्यतः नहीं जान सकता। यह केवल सिद्ध योगी ही जान सकते हैं, जिनकी बुद्धि योग से विकसित हो चुकी होती है।
पुनर्जन्म के प्रमाण बच्चों के व्यवहार में देखे जा सकते हैं। बिना सिखाए दूध पीना, अकेले में हँसना, या पुराने अनुभवों की झलक देना इसके संकेत हैं।
कई घटनाओं में बच्चों ने अपने पिछले जन्म की भाषा, स्थान और मृत्यु तक का वर्णन किया है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से संस्कार-स्मृति का प्रमाण है।
पुनर्जन्म केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व और पूरे ब्रह्मांड में होता है। आत्मा अणुरूप है, इसलिए किसी भी शरीर को धारण कर सकती है—चाहे वह बड़ा हो या छोटा।
पुनर्जन्म ईश्वरीय व्यवस्था है। आत्मा, कर्म और प्रकृति के नियमों से बँधी यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक मोक्ष प्राप्त न हो जाए।
#जय श्री कृष्ण
शुकदेवजी महाराज राजा परीक्षित से कहते हैं,कि हे प्रिय परीक्षित्! यह कथा परम गोपनीय—अत्यन्त रहस्यमय है। मलय पर्वत पर विराजमान भगवान् अगस्त्यजी ने श्रीहरि की पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था,आप भी सुने
कान्यकुब्ज (कन्नौज) में एक ब्राम्हण रहता था। उसका नाम अजामिल था। यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणों का तो यह खजाना ही था। ब्रम्हचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था। इसने गुरु, संत-महात्माओं सबकी सेवा की थी। एक बार अपने पिता के आदेशानुसार वन में गया और वहाँ से फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर घर के लिये लौटा। लौटते समय इसने देखा की एक व्यक्ति मदिरा पीकर किसी वेश्या के साथ विहार कर रहा है।
वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। अजामिल ने पाप किया नहीं केवल आँखों से देखा और काम के वश हो गया । अजामिल ने अपने मन को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया ।
अजामिल सुन्दर-सुन्दर वस्त्र-आभूषण आदि वस्तुएँ, जिनसे वह प्रसन्न होती, ले आता। यहाँ तक कि इसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति देकर भी उसी कुलटा को रिझाया। यह ब्राम्हण उसी प्रकार की चेष्टा करता, जिससे वह वेश्या प्रसन्न हो।
इस वेश्या के चक्कर में इसने अपने कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नी तक का परित्याग कर दिया और उस वैश्या के साथ रहने लगा। इसने बहुत दिनों तक वेश्या के मल-समान अपवित्र अन्न से अपना जीवन व्यतीत किया और अपना सारा जीवन ही पापमय कर लिया। यह कुबुद्धि न्याय से, अन्याय से जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहीं से उठा लाता। उस वेश्या के बड़े कुटुम्ब का पालन करने में ही यह व्यस्त रहता। चोरी से, जुए से और धोखा-धड़ी से अपने परिवार का पेट पलटा था।
एक बार कुछ संत इसके गांव में आये। गाँव के बाहर संतों ने कुछ लोगों से पूछा की भैया, किसी ब्राह्मण का घर बताइए हमें वहां पर रात गुजारनी है। इन लोगों ने संतों के साथ मजाक किया और कहा- संतों- हमारे गाँव में तो एक ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है जिसका नाम है अजामिल। और इतना बड़ा भगवान का भक्त है की गाँव के अंदर नहीं रहता गाँव के बाहर ही रहता है।
अब संत जन अजामिल के घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया- भक्त अजामिल दरवाजा खोलो। जैसे ही अजामिल ने आज दरवाजा खोला तो संतों के दर्शन करते ही मानो आज अपने पुराने अच्छे कर्म उसे याद आ गए।
संतों ने कहा की भैया- रात बहुत हो गई है आप हमारे लिए भोजन और सोने का प्रबंध कीजिये।अजामिल ने सुंदर भोजन तैयार करवाया और संतो को करवाया। जब अजामिल ने संतों से सोने के लिए कहा तो संत कहते हैं भैया- हम प्रतिदिन सोने से पहले कीर्तन करते हैं। यदि आपको समस्या न हो तो हम कीर्तन करलें?
अजामिल ने कहा- आप ही का घर है महाराज! जो दिल में आये सो करो।
संतों ने सुंदर कीर्तन प्रारम्भ किया और उस कीर्तन में अजामिल बैठा। सारी रात कीर्तन चला और अजामिल की आँखों से खूब आसूं गिरे हैं। मानो आज आँखों से आंसू नहीं पाप धूल गए हैं। सारी रात भगवान का नाम लिया ।
जब सुबह हुई संत जन चलने लगे तो अजामिल ने कहा- महात्माओं, मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं कोई भक्त वक्त नहीं हूँ। मैं तो एक मह पापी हूँ। मैं वैश्या के साथ रहता हूँ। और मुझे गाँव से बाहर निकाल दिया गया है। केवल आपकी सेवा के लिए मैंने आपको भोजन करवाया। नहीं तो मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है।
संतों ने कहा- अरे अजामिल! तूने ये बात हमें कल क्यों नहीं बताई, हम तेरे घर में रुकते ही नहीं।
अब तूने हमें आश्रय दिया है तो चिंता मत कर। ये बता तेरे घर में कितने बालक हैं। अजामिल ने बता दिया की महाराज 9 बच्चे हैं और अभी ये गर्भवती है।
संतों ने कहा की अबके जो तेरे संतान होंगी वो तेरे पुत्र होगा। और तू उसका नाम “नारायण” रखना। जा तेरा कल्याण हो जायेगा।
संत जन आशीर्वाद देकर चले गए। समय बिता उसके पुत्र हुआ। नाम रखा नारायण। अजामिल अपने नारायण पुत्र में बहुत आशक्त था। अजामिल ने अपना सम्पूर्ण हृदय अपने बच्चे नारायण को सौंप दिया था। हर समय अजामिल कहता था- नारायण भोजन करलो।
नारायण पानी पी लो। नारायण तुम्हारा खेलने का समय है तुम खेल लो। हर समय नारायण नारायण करता था।
इस तरह अट्ठासी वर्ष बीत गए। वह अतिशय मूढ़ हो गया था, उसे इस बात का पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिर पर आ पहुँची है ।
अब वह अपने पुत्र बालक नारायण के सम्बन्ध में ही सोचने-विचारने लगा। इतने में ही अजामिल ने देखा कि उसे ले जाने के लिये अत्यन्त भयावने तीन यमदूत आये हैं। उनके हाथों में फाँसी है, मुँह टेढ़े-टेढ़े हैं और शरीर के रोएँ खड़े हुए हैं । उस समय बालक नारायण वहाँ से कुछ दूरी पर खेल रहा था।
यमदूतों को देखकर अजामिल डर गया और अपने पुत्र को कहता हैं-नारायण! नारायण मेरी रक्षा करो! नारायण मुझे बचाओ!
भगवान् के पार्षदों ने देखा कि यह मरते समय हमारे स्वामी भगवान् नारायण का नाम ले रहा है, उनके नाम का कीर्तन कर रहा है; अतः वे बड़े वेग से झटपट वहाँ आ पहुँचे । उस समय यमराज के दूर दासीपति अजामिल के शरीर में से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। विष्णु दूतों ने बलपूर्वक रोक दिया ।
उनके रोकने पर यमराज के दूतों ने उनसे कहा—‘अरे, धर्मराज की आज्ञा का निषेध करने वाले तुम लोग हो कौन ? तुम किसके दूत हो, कहाँ से आये हो और इसे ले जाने से हमें क्यों रोक रहे हो ?
जब यमदूतों ने इस प्रकार कहा, तब भगवान् नारायण के आज्ञाकारी पार्षदों ने हँसकर कहा—यमदूतों! यदि तुम लोग सचमुच धर्मराज के आज्ञाकारी हो तो हमें धर्म का लक्षण और धर्म का तत्व सुनाओ । दण्ड का पात्र कौन है ?
यमदूतों ने कहा—वेदों ने जिन कर्मों का विधान किया है, वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है, वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान् के स्वरुप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास एवं स्वयं प्रकाश ज्ञान हैं—ऐसा हमने सुना है । पाप कर्म करने वाले सभी मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार दण्डनीय होते हैं ।
भगवान् के पार्षदों ने कहा—यमदूतों! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि धर्मज्ञों की सभा में अधर्म प्रवेश कर रह है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियों को व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है । यमदूतों! इसने कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशि का पूरा-पूरा प्रायश्चित कर लिया है।
क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया है । जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरों का उच्चारण किया, उसी समय केवल उतने से ही इस पापी के समस्त पापों का प्रायश्चित हो गया ।
चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रम्हघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगों का संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गाय को मारने वाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभी के लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है कि भगवान् के नामों का उच्चारण किया जाय; क्योंकि भगवन्नामों के उच्चारण से मनुष्य की बुद्धि भगवान् के गुण, लीला और स्वरुप में रम जाती है और स्वयं भगवान् की उसके प्रति आत्मीय बुद्धि हो जाती है ।
तुम लोग अजामिल को मत ले जाओ। इसने सारे पापों का प्रायश्चित कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय भगवान् के नाम का उच्चारण किया है।
इस प्रकार भगवान् के पार्षदों ने भागवत-धर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया भगवान् की महिमा सुनने से अजामिल के हृदय में शीघ्र ही भक्ति का उदय हो गया।
अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चाताप होने लगा । (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ! मैंने एक दासी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राम्हणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःख की बात है। धिक्कार है! मुझे बार-बार धिक्कार है! मैं संतों के द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ! मैंने अपने कुल में कलंक का टीका लगा दिया!
मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया। ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ। मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकार की यमयातना भोगते हैं। कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रम्हतेज को नष्ट करने वाला तथा कहाँ भगवान् का वह परम मंगलमय ‘नारायण’ नाम! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया)।
अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणों को वश में करके ऐसा प्रयत्न करूँगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालूँ । मैंने यमदूतों के डर अपने पुत्र “नारायण” को पुकारा। और भगवान के पार्षद प्रकट हो गए यदि मैं वास्तव में नारायण को पुकारता तो क्या आज श्री नारायण मेरे सामने प्रकट नहीं हो जाते?
अब अजामिल के चित्त में संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हो गया। वे सबसे सम्बन्ध और मोह को छोड़कर हरिद्वार चले गये। उस देवस्थान में जाकर वे भगवान् के मन्दिर में आसन से बैठ गये और उन्होंने योग मार्ग का आश्रय लेकर अपनी सारी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन में लीन कर लिया और मन को बुद्धि में मिला दिया।
इसके बाद आत्मचिन्तन के द्वारा उन्होंने बुद्धि को विषयों से पृथक् कर लिया तथा भगवान् के धाम अनुभव स्वरुप परब्रम्ह में जोड़ दिया । इस प्रकार जब अजामिल की बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर भगवान् के स्वरुप में स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं।
अजामिल ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। उनका दर्शन पाने के बाद उन्होंने उस तीर्थस्थान में गंगा के तट पर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान् के पार्षदों का स्वरुप प्राप्त कर दिया ।
अजामिल भगवान् के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से भगवान् लक्ष्मीपति के निवास स्थान वैकुण्ठ को चले गये।
शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित्! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो पुरुष श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरक में कही नहीं जाता। यमराज के दूत तो आँख उठाकर उसकी ओर देख तक नहीं सकते।
उस पुरुष का जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोक में उसकी पूजा होती है । परीक्षित्! देखो-अजामिल-जैसे पापी ने मृत्यु के समय पुत्र के बहाने भगवान् नाम का उच्चारण किया! उसे भी वैकुण्ठ की प्राप्ति हो गयी! फिर जो लोग श्रद्धा के साथ भगवन्नाम का उच्चारण करते हैं, उनकी तो बात ही क्या है ।
*यमदूत और यमराज का संवाद*
जब भगवान के पार्षदों ने यमदूतों से अजामिल को छुड़ाया तो यमदूत यमराज के पास पहुंचे और कहते हैं-
प्रभो! संसार के जीव तीन प्रकार के कर्म करते हैं—पाप, पुण्य अथवा दोनों से मिश्रित। इन जीवों को उन कर्मों का फल देने वाले शासक संसार में कितने हैं ?
हम तो ऐसा समझते हैं कि अकेले आप ही समस्त प्राणियों और उनके स्वामियों के भी अधीश्वर हैं। आप ही मनुष्यों के पाप और पुण्य के निर्णायक, दण्डदाता और शासक हैं।
यमराज ने कहा—दूतों! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत् के स्वामी हैं। उन्हीं में यह सम्पूर्ण जगत् सूत में वस्त्र के समान ओत-प्रोत है। उन्हीं के अंश, ब्रम्हा, विष्णु और शंकर इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हीं ने इस सारे जगत् को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है।
मेरे प्यारे दूतों! जैसे किसान अपने बैलों को पहले छोटी-छोटी रस्सियों में बाँधकर फिर उन रस्सियों को एक बड़ी आड़ी रस्सी में बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान् ने भी ब्रम्हाणादि वर्ण और ब्रम्हचर्य आदि आश्रम रूप छोटी-छोटी नाम की रस्सियों में बाँधकर फिर सब नामों को वेदवाणी रूप बड़ी रस्सी में बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्म रूप बन्धन में बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं।
सभी भगवान के आधीन हैं इनमें मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रम्हा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रूद्र, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता।
भगवान् के नामोच्चारण की महिमा तो देखो, अजामिल-जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करने मात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया। भगवान् के गुण, लीला और नामों का भलीभाँति कीर्तन मनुष्यों के पापों का सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिल ने मरने के समय चंचल चित्त से अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया।
उस नामाभासमात्र से ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्ति की प्राप्ति भी हो गयी। बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि कभी भगवान् की माया से मोहित हो जाती है। वे कर्मों के मीठे-मीठे फलों का वर्णन करने वाली अर्थवाद रूपिणी वेदवाणी में ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े-बड़े कर्मों में ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नाम की महिमा को नहीं जानते।
यह कितने खेद की बात है। प्रिय दूतों! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान् अनन्त में ही सम्पूर्ण अन्तःकरण से अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं। वे मेरे दण्ड के पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, लेकिन यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान् का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है।
जिनकी जीभ भगवान् के गुणों और नामों का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरणारविन्दों का चिन्तन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में नहीं झुकता, उन भगवत्सेवा-विमुख पापियों को ही मेरे पास लाया करो।
जब यमदूतों ने अपने स्वामी धर्मराज के मुख से इस प्रकार भगवान् की महिमा सुनी और उसका स्मरण किया, तब उनके आश्चर्य की सीमा न रही। तभी से वे धर्मराज की बात पर विश्वास करके अपने नाश की आशंका से भगवान् के आश्रित भक्तों के पास नहीं जाते और तो क्या, वे उनकी ओर आँख उठाकर देखने में भी डरते हैं।
प्रिय परीक्षित्! यह इतिहास परम गोपनीय है।
।। जय श्री हरि ।।
#🌹🙏श्री रामचरित मानस🙏🌹
🛑 अपना समय व्यर्थ न करें: श्रीरामचरितमानस की 7 बड़ी सीख 🛑
हम अक्सर उन लोगों को समझाने में अपनी ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं जो हमारी बात समझने के पात्र ही नहीं होते। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया है कि किन लोगों से कौन-सी बात करना 'बंजर धरती में बीज बोने' जैसा है।
जब समुद्र ने तीन दिन तक श्रीराम की विनती नहीं सुनी, तब प्रभु ने लक्ष्मण जी को ये नीति समझाई:
🔇 मूर्ख (सठ): मूर्ख व्यक्ति से विनय या प्रार्थना करना व्यर्थ है। वह केवल भय या दंड की भाषा समझता है।
🐍 कुटिल: जो मन का कपटी हो, उससे प्रेम (प्रीति) की बात न करें।
💰 कंजूस: जो जन्मजात कंजूस है, उसे दान या उदारता का ज्ञान देना समय की बर्बादी है।
🏠 ममता में फंसा व्यक्ति: जिसे मोह-माया ने जकड़ रखा हो, उसे ज्ञान की बात समझ नहीं आएगी।
🤑 लोभी: लालची व्यक्ति से वैराग्य (त्याग) की बात करना व्यर्थ है।
😡 क्रोधी: जो गुस्से में हो, उसे शांति या धर्म का उपदेश न दें।
👁️ कामी: काम-वासना में लिप्त व्यक्ति को भगवान की कथा (हरिकथा) नहीं सुहाती।
🌿 चौपाई:
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
जीवन में शांति चाहिए तो सही व्यक्ति से ही सही बात करें।
जय सियाराम! 🙏🚩
⁉️क्या मृत्यु के समय सिर्फ भगवान का नाम लेने से मुक्ति मिल सकती है?⁉️
🤹अजामिल की यह अद्भुत सत्य कथा आपको हैरान कर देगी!
क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन भर पाप करने वाला व्यक्ति, अंत समय में सिर्फ एक बार भगवान का नाम लेकर मोक्ष पा सकता है? श्रीमद्भागवत महापुराण की यह परम गोपनीय कथा इसी रहस्य को उजागर करती है।🤹
📜 एक ब्राह्मण का पतन:
कान्यकुब्ज (कन्नौज) का अजामिल एक सदाचारी और विद्वान ब्राह्मण था। लेकिन एक दिन, एक वेश्या को देखकर उसका मन विचलित हो गया और वह पाप के दलदल में धंसता चला गया। उसने अपना धर्म, परिवार, सब कुछ त्याग दिया और जीवन भर अधर्म का साथ दिया।
✨ संतों की कृपा और 'नारायण' नाम:
एक बार कुछ संत संयोगवश उसके घर आए। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संतों ने उसे आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे होने वाले पुत्र का नाम 'नारायण' रखना। अजामिल ने ऐसा ही किया और पुत्र मोह में दिन-रात "नारायण, नारायण" पुकारने लगा।
💀 मृत्यु का क्षण और यमदूत:
88 वर्ष की आयु में जब अजामिल की मृत्यु का समय आया, तो उसे भयानक यमदूत दिखाई दिए। भयभीत होकर उसने अपने पुत्र को पुकारा: "नारायण! मेरी रक्षा करो!"
🙏 हरि नाम का चमत्कार:
बस, इतना ही काफी था! मरते समय मुख से निकले भगवान के नाम का ऐसा प्रभाव हुआ कि यमदूतों को रोककर, भगवान विष्णु के पार्षद वहां प्रकट हो गए।
✨ विष्णु पार्षदों का तर्क:
पार्षदों ने यमदूतों को बताया कि यद्यपि अजामिल ने जीवन भर पाप किए हैं, लेकिन मृत्यु के समय विवश होकर ही सही, उसने भगवान के परम पवित्र नाम 'नारायण' का उच्चारण किया है। इस एक नाम ने उसके कोटि-कोटि जन्मों के पापों का प्रायश्चित कर दिया है।
🌟 परिणाम:
अजामिल मृत्यु के मुख से बच गया। उसे अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ और वह सब कुछ छोड़कर हरिद्वार चला गया। वहां कठोर तपस्या और भक्ति करके अंततः उसने वैकुंठ धाम प्राप्त किया।
निष्कर्ष: यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान का नाम कितना शक्तिशाली है। चाहे अनजाने में या विवशता में लिया जाए, यह हमारे पापों को भस्म करके हमें मुक्ति दिला सकता है।
बोलिए श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि! 🙏🌸
#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
👩❤️👩जो मनुष्य अपने अच्छे कर्म भगवान के समर्पण कर देता है। तो फिर भगवान उसे बुरे कर्मों का फल भी नहीं भुगताते!🤹
🛐जो कह देता है कि *हे प्रभो! मेने जो कुछ भी यज्ञ दान किए हैं,सब आपको समर्पण कर देता हूं ,--*श्रीकृष्णार्पणमस्तु* !तो भगवान कहते हैं कि तेरे जितने पाप है,उन्हे में माफ कर देता हूं!इतनी देर का काम है!जन्म- जन्मान्तरो में जो कुछ भी पुण्य कर्म किये है,उन सब को हम क्षणमात्र में भगवान के समर्पण कर दे तो क्षणमात्र में बन्धन से मुक्त हो जाये !🛐
🧘इस प्रकार यज्ञ दान तप भगवान के अर्पण द्वारा हमने जो पुण्य अर्पण किया तो भगवान पुण्य और पाप दोनो से उसी समय मुक्ति दे देते हैं!स्वय भगवान ने गीता (९/२७) में कहा है -
*यत्करोषि यदश्र्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्*!
*यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्*!!
हे अर्जुन!तू जो कुछ भी यज्ञ करता है,तप करता है दान करता है भोजन करता है या जो कुछ भी किर्या तू अपने निर्वाह के लिए करता है,वह सब तू मेरे समर्पण कर दे !क्यो कि जब अच्छे कर्मों को तू मेरे अर्पण कर देगा तो शुभ और अशुभ इन दोनो प्रकार के कर्मो के फल से मुक्त हो जायेगा--
*शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै*;!
*संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि*!! (गीता ९/२८)
जब तुम पुण्य-फल नहीं चाहोगे तो में पाप-फल को नहीं भुगताऊंगा ! इसलिए दोनो प्रकार के कर्मो के बन्धन से तू एकदम मुक्त हो जायेगा ! पापों का दण्ड भोगने से छूट जायेगा!🛐
♦️*भगवान ने इस प्रकार की छूट दे दी है,*इसलिए हम आज तक के-जन्म-जन्मान्तर के सारे पुण्य भगवान् के समर्पण कर दे तो भगवान हमको पापों से भी मुक्त कर देंगे*। *इस प्रकार खाता बराबर हो जायगा !**खाता बराबर हो गया तो मुक्त हो गया,*कितनी सहज बात है। आपने हजारों जन्म-जन्मान्तर में जो पुण्य आदि किये है,उन सब को भगवान के समर्पण करना एक क्षण का काम है*। एक क्षण में भगवान को समर्पण कर दे, तो पुण्य और पाप दोनो के बन्धनो से सदा के लिए हम मुक्त हो जाएंगे*!ये भगवान के वचन है, कोई मेरे नहीं!आप बतलाइये कल्याण होने में कितना समय लगा !यदि मनुष्य इस रहस्य को समझ जाय , तत्त्व को समझ जाय ओर इस प्रकार पुण्य-फल का त्याग कर दे तो उस त्याग का यह फल प्राप्त हो जाय !
भगवान् का ध्यान करने से श्रैष्ठ है कर्मफल का त्याग: क्योंकि त्याग से शान्ति मिल जाती है--♦️
*ध्यानात् कर्मफलत्यागस्त्या गाच्छान्तिरनन्तरम्*
(गीता १२/१२)
🌷इसलिए हम लोगों को अपने सम्पूर्ण कर्मो को भगवदर्थ अर्पण कर देना चाहिए ! सबका फल त्याग देना चाहिए !केवल फल त्याग से कल्याण है!जो इस तत्व को जान लेता है,वह तुरंत ही पापों से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है!*कर्मफलो का ह्रदय से त्याग करना चाहिए*। मान लो एक भाई के सिर पर लाख रुपए का ऋण है ओर कई लोगों को देना है! उसके पास केवल पचीस हजार रुपए की पूंजी है। तो वह अपनी पूंजी लाकर गवर्नमेंट को सोंप देता है या महाजनों के पास सोंप देता है और कहता है कि मेरे पास अपनी जितनी पूंजी है सब आपको दे देता हूं, इससे आप मेरा ऋण सलटा दें ! यह कानून है कि यदि कोई दिवालिया हो जाता है और सब कुछ लाकर सच्चे दिल से सरकार के पास जमा करा देता है तो सरकार पचीस हजार रुपए में भी एक लाख रुपए का कर्ज चुकता करवा देती है! निर्णय कर देती है कि यह दिवालिया हो गया,
इसलिए मांगने वालों को रुपए में चोथाई मिलेगा !🌷
🕉️*किंतु भगवान के दरबार में इसका दूसरा कानून है! उनका कानून यह है कि अपने पास में जो कुछ भी पूंजी है वह लाकर भगवान के दरबार में दे-दे! भगवान् अपने प्यारे भक्त को दिवालिया नहीं करते!अपनी पूंजी में से धन मिला करके मांगने वालों की मांग पूरी करके विदा करेंगे और उसे मुक्त कर देंगें*!
*भगवान् बार-बार यही कह रहे हैं कि तुम्हारे पास जो कुछ है,सब मेरे अर्पण करो , फिर तुम्हारे पाप और पुण्य---इन दोनों के फल--बन्धन---सबकी जिम्मैवारी मेरी रही!**पुण्य -कर्म सोने की बेड़ी है और पाप-कर्म लोहे की बेड़ी है! मतलब यह है कि पुण्य कर्म करने वाला स्वर्ग में जाता है और पाप कर्म करने वाला नरक में जाता है!**जो मनुष्य अपने स्वर्ग का त्याग इस भाव से कर देता है कि अपने पुण्य कर्म हम भगवान को समर्पण करतें हैं तो भगवान कहते हैं कि जब इसने अपना पुण्य-कर्म मुझे समर्पण कर दिया तो पुण्य कर्मों का जो फल है। इतना ही लाभ यदि इसे हम दें तो हमारे अर्पण करने से इसे क्या लाभ मिला, ऐसा तो कहीं भी मिल जाता है! समर्पण करने वाले से भगवान् पूछते हैं कि तुम्हारे उपर ऋण कितना है वह कहता है सरकार मेरे उपर लाख रुपए का ऋण है ओर मेरे पास पूंजी है पचीस हजार रुपए!तो भगवान कहते हैं जाओ मोज करो! तात्पर्य यह है कि भगवान सबसे मुक्त कर देते हैं, इसलिए कि भगवान के भण्डार में तो कोई कमी है नहीं!जब वह शरणागत होकर कहता है कि भगवान रुपया चुकायें तो भगवान रुपया चुकाते हैं और एकदम उसे ऋण से मुक्त कर देते हैं! ऐसा भगवान का भाव है! भगवान् ऐसे दयालु है कि शरण जानें मात्र से बेड़ा पार हो जाय! संसार-सागर से शीघ्र-से शीघ्र पार होने का यह एक सुगम रास्ता
है!*🕉️













