#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६३
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
तिरासीवाँ सर्ग
भरतकी वनयात्रा और शृङ्गवेरपुरमें रात्रिवास
तदनन्तर प्रातःकाल उठकर भरतने उत्तम रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥१॥
उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेवके रथके समान तेजस्वी दिखायी देते थे॥२॥
यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरतके पीछे-पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥३॥
यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरतके पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे॥४॥
उसी प्रकार एक लाख घुड़सवार भी उन यशस्वी रघुकुलनन्दन राजकुमार भरतकी यात्राके समय उनका अनुसरण कर रहे थे॥५॥
कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौसल्या देवी भी श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये की जानेवाली उस यात्रासे संतुष्ट हो तेजस्वी रथके द्वारा प्रस्थित हुईं॥६॥
ब्राह्मण आदि आर्यों (त्रैवर्णिकों) के समूह मनमें अत्यन्त हर्ष लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामका दर्शन करनेके लिये उन्हींके सम्बन्धमें विचित्र बातें कहते-सुनते हुए यात्रा कर रहे थे॥७॥
(वे आपसमें कहते थे—) 'हमलोग दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा संसारका दुःख दूर करनेवाले, स्थितप्रज्ञ, श्यामवर्ण महाबाहु श्रीरामका कब दर्शन करेंगे?॥८॥
'जैसे सूर्यदेव उदय लेते ही सारे जगत्का अन्धकार हर लेते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी हमारी आँखोंके सामने पड़ते ही हमलोगोंका सारा शोक संताप दूर कर देंगे'॥९॥
इस प्रकारकी बातें कहते और अत्यन्त हर्षसे भरकर एक-दूसरेका आलिङ्गन करते हुए अयोध्याके नागरिक उस समय यात्रा कर रहे थे॥१०॥
उस नगरमें जो दूसरे सम्मानित पुरुष थे, वे सब लोग तथा व्यापारी और शुभ विचारवाले प्रजाजन भी बड़े हर्षके साथ श्रीरामसे मिलनेके लिये प्रस्थित हुए॥११॥
जो कोई मणिकार (मणियोंको सानपर चढ़ाकर चमका देनेवाले), अच्छे कुम्भकार, सूतका ताना-बाना करके वस्त्र बनानेकी कलाके विशेषज्ञ, शस्त्र निर्माण करके जीविका चलानेवाले, मायूरक (मोरकी पाँखोंसे छत्र-व्यजन आदि बनानेवाले), आरेसे चन्दन आदिकी लकड़ी चीरनेवाले, मणि-मोती आदिमें छेद करनेवाले, रोचक (दीवारों और वेदी आदिमें शोभाका सम्पादन करनेवाले), दन्तकार (हाथीके दाँत आदिसे नाना प्रकारकी वस्तुओंका निर्माण करनेवाले), सुधाकार (चूना बनानेवाले), गन्धी, प्रसिद्ध सोनार, कम्बल और कालीन बनानेवाले, गरम जलसे नहलानेका काम करनेवाले, वैद्य, धूपक (धूपन-क्रियाद्वारा जीविका चलानेवाले), शौण्डिक (मद्यविक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों तथा गोशालाओंके महतो, स्त्रियोंसहित नट, केवट तथा समाहितचित्त सदाचारी वेदवेत्ता सहस्रों ब्राह्मण बैलगाड़ियोंपर चढ़कर वनकी यात्रा करनेवाले भरतके पीछे-पीछे गये॥१२-१६॥
सबके वेश सुन्दर थे। सबने शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे तथा सबके अङ्गोंमें ताँबेके समान लाल रंगका अङ्गराग लगा था। वे सब-के-सब नाना प्रकारके वाहनोंद्वारा धीरे-धीरे भरतका अनुसरण कर रहे थे॥१७॥
हर्ष और आनन्दमें भरी हुई वह सेना भाईको बुलानेके लिये प्रस्थित हुए कैकेयीकुमार भ्रातृवत्सल भरतके पीछे-पीछे चलने लगी॥१८॥
इस प्रकार रथ, पालकी, घोड़े और हाथियोंके द्वारा बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद वे सब लोग शृङ्गवेरपुरमें गङ्गाजीके तटपर जा पहुँचे॥१९॥
जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका सखा वीर निषादराज गुह सावधानीके साथ उस देशकी रक्षा करता हुआ अपने भाई-बन्धुओंके साथ निवास करता था॥२०॥
चक्रवाकोंसे अलंकृत गङ्गातटपर पहुँचकर भरतका अनुसरण करनेवाली वह सेना ठहर गयी॥२१॥
पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके अपनी उस सेनाको शिथिल हुई देख बातचीत करनेकी कलामें कुशल भरतने समस्त सचिवोंसे कहा—॥२२॥
'आपलोग मेरे सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार यहाँ सब ओर ठहरा दीजिये। आज रातमें विश्राम कर लेनेके बाद हम सब लोग कल सबेरे इन सागरगामिनी नदी गंगाजीको पार करेंगे॥२३॥
'यहाँ ठहरनेका एक और प्रयोजन है—मैं चाहता हूँ कि गङ्गाजीमें उतरकर स्वर्गीय महाराजके पारलौकिक कल्याणके लिये जलाञ्जलि दे दूँ'॥२४॥
उनके इस प्रकार कहनेपर सभी मन्त्रियोंने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और समस्त सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ठहरा दिया॥२५॥
महानदी गङ्गाके तटपर खेमे आदिसे सुशोभित होनेवाली उस सेनाको व्यवस्थापूर्वक ठहराकर भरतने महात्मा श्रीरामके लौटनेके विषयमें विचार करते हुए उस समय वहीं निवास किया॥२६॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८३॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
#🕉️सनातन धर्म🚩
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞
‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘
*सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी - देवताओं की मान्यता मानी गयी है | यद्यपि यह सत्य है कि इन देवी - देवताओं को किसी ने देखा नहीं है तथापि बड़ी श्रद्धा के साथ इनका पूजन होता रहता है | इस धरती पर क्या कोई प्रत्यक्ष देवता है ?? इस पर विचार करते हुए यदि धर्मग्रंथों का अध्ययन किया जाता है तो "श्रीमदवाल्मीकीय रामायण" में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं जगज्जननी मैया जानकी का संवाद देखने को मिलता है , जहाँ सीता जी द्वारी प्रत्यक्ष देवताओं के विषय प्रश्न करने पर राघवेन्द्र सरकार कहते हैं ;-- "अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते ! स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम् !! यत्र त्रयं त्रयो लोका: पवित्रं तत्समं भुवि ! नान्यदस्ति शुभाङ्गे तेनेदमभिराध्यते !!" अर्थात :- भगवान श्री राम सीता जी से कहते हैं कि हे सीते! माता-पिता और गुरु ये तीन प्रत्यक्ष देवता हैं, इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की आराधना करना कैसे ठीक हो सकता है ? जिनकी सेवा से अर्थ, धर्म और काम तीनों की प्राप्ति होती है, जिनकी आराधना से तीनों लोकों की आराधना हो जाती है, उन माता-पिता के समान पवित्र इस संसार में दूसरा कोई भी नहीं है | इसलिए लोग इन प्रत्यक्ष देवता (माता-पिता, गुरु) की आराधना करते हैं | जो इनकी अवहेलना करता है उसके द्वारा की हुई पूजा कोई भी देवी - देवता स्वीकार नहीं करते हैं | इस संवाद से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस धरती पर प्रत्यक्ष देवी - देवता माता - पिता एवं गुरु हैं |*
*आज आधुनिकता के रंग में रंगे हुए लोग स्वयं को शिक्षित तो कह सकते हैं परंतु उनके आचरण गंवारों एवं मूर्खों की तरह ही दिखाई पड़ते हैं | आज लगभग घरों में माता - पिता उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं | अपने माता - पिता को उपेक्षित जीवन जीने को विवश करने वाली ये संतानें घरों में देवी - देवताओं की सोने - चाँदी की मूर्तियां स्थापित करके इच्छित फल चाहते हैं | घर में माता - पिता को भूखा रखकर लोग बड़े - बड़े भण्डारे आयोजित करते हैं | प्रत्यक्ष देवी - देवता (माता - पिता) को घर से निकालकर वृद्धाश्रम तक पहुँचाने वाले लोग अपने घरों में पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करते हैं | क्या उनको इनके पूजन करने का फल प्राप्त हो सकता है ?? यह चिन्तन करने का विषय है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूँगा कि सनातन के सभी साहित्यों ने सर्वप्रथम माता - पिता की पूजा करने का निर्देश दिया है | गरुड़ पुराण में भी लिखा है :-- "पितृमातृसमंलोके नास्त्यन्यद दैवतं परम् ! तस्मात सर्वप्रयत्नेन पूजयते् पितरौ सदा !! हितानमुपदेष्टा हि प्रत्यक्षं दैवतं पिता ! अन्या या देवता लोक में देहेप्रभवो हिता : !!" अर्थात :- संसार में माता-पिता के समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है | अत: सदैव सभी प्रकार से अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए | हितकारी उपदेश देने वाला होने से पिता प्रत्यक्ष देवता है | संसार में जो अन्य देवता हैं, वे शरीरधारी नहीं हैं | इन प्रत्यक्ष देवताओं की सदैव पूजा करना अर्थात सेवा करना और सुखी रखना ही हमारा सर्वोपरि धर्म है |*
*संसार में प्रत्यक्ष देवी - देवता पूजने योग्य यदि कोई है तो वह माता - पिता हैं | इनकी अवहेलना करके किसी भी देवता के पूजन का फल कदापि नहीं प्राप्त हो सकता |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳
सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵
*सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----*
*‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---*
आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟
#👍मोटिवेशनल कोट्स✌
🌟 || विश्वासपूर्ण संबंध || 🌟
अविश्वास ही प्रेम को खंडित करता है, जिससे हमारे परस्पर संबंधों की मजबूत दीवारों में भी दरारें आ जाती हैं। विश्वास की ईंट जितनी मजबूत होगी हमारे संबंधों की दीवार भी उतनी ही टिकाऊ बन पायेगी।विश्वास ही तो संबंधों को प्रेमपूर्ण बनाये रखता है। जब हमारे द्वारा प्रत्येक बात का मूल्यांकन स्वयं की दृष्टि से किया जाता है तो वहाँ अविश्वास अवश्य उत्पन्न हो जाता है।
यह आवश्यक नहीं कि हर बार हमारे मूल्यांकन करने का दृष्टिकोण सही हो इसलिए संबंधों की मधुरता के लिए अपने दृष्टिकोण के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं तक पहुँचने का गुण भी हमारे भीतर अवश्य होना चाहिए। संबध जोड़ना महत्वपूर्ण नहीं अपितु संबंध निभाना महत्वपूर्ण है। संबंधों का जुड़ना संयोग हो सकता है पर संबंधों को निभाना जीवन की एक साधना ही है। संबधों की मजबूती के लिए परस्पर विश्वास ही प्रथम आवश्यक्ता है। 🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥⛓️💥
💫💫💫💫💫💫💫💫💫
🪷 सुप्रभातम् 🪷
कोई व्यक्ति कितना भी खास क्यों ना हो,
उसे एक पल में त्यागने की क्षमता तुम में अवश्य होनी चाहिए...!!
🪷 जय श्री कृष्ण 🪷
💫💫💫💫💫💫💫💫💫
#❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी
#ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र में गौ (गाय) की महिमा (पुनः प्रेषित)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
1👉 ज्योतिषमें गोधूलिका समय विवाहके लिये
सर्वोत्तम माना गया है।
2👉 यदि यात्रा के प्रारम्भ में गाय सामने पड़ जाय अथवा अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने पड़ जाय तो यात्रा सफल होती है।
3👉 जिस घर में गाय होती है, उसमें वास्तुदोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
4 👉 जन्मपत्री में यदि शुक्र अपनी नीचराशि कन्या पर हो, शुक्र की दशा चल रही हो या शुक्र अशुभ भाव (6,8,12)-में स्थित हो तो प्रात:काल के भोजन में से एक
रोटी सफेद रंग की गाय को खिलाने से शुक्र का नीचत्व एवं शुक्र सम्बन्धी कुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है।
5👉 पितृदोष से मुक्ति👉 सूर्य, चन्द्र, मंगल या शुक्र की युति राहु से हो तो पितृदोष होता है। यह भी मान्यता है कि सूर्य का सम्बन्ध पिता से एवं मंगल का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण सूर्य यदि शनि, राहु या केतु के साथ स्थित हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तथा मंगल की युति राहु या केतु से हो तो पितृदोष होता है। इस दोष से जीवन संघर्षमय बन जाता है। यदि पितृदोष हो तो गाय को प्रतिदिन या
अमावास्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाने से पितृदोष समाप्त हो जाता है।
6👉 किसी की जन्मपत्री में सूर्य नीचराशि तुला पर हो या अशुभ स्थिति में हो अथवा केतु के द्वारा परेशानियाँ आ रही हों तो गाय में सूर्य-केतु नाडी में होने के फलस्वरूप
गाय की पूजा करनी चाहिये, दोष समाप्त होंगे।
7👉 यदि रास्ते में जाते समय गोमाता आती हुई दिखायी दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने देना चाहिये, यात्रा सफल होगी।
8👉 यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो
माताका नाम ले, बुरे स्वप्न दिखने बन्द हो जायेंगे।
9👉 गाय के घी का एक नाम आयु भी है-'आयई घृतम्'। अत: गाय के दूध-घी से व्यक्ति दीर्घायु होता है। हस्तरेखा में आयु रेखा टूटी हुई हो तो गायका घी काम में
लें तथा गाय की पूजा करें।
11👉 देशी गाय की पीठ पर जो ककुद् (कूबड़) होता है, वह 'बृहस्पति' है। अत: जन्मपत्रिका में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हों या अशुभ स्थिति हों तो देशी गाय के इस बृहस्पति भाग एवं शिवलिंग रूपी ककुद् के दर्शन करने चाहिये। गुड़ तथा चने की दाल रखकर गाय को रोटी भी दें।
👉 गोमाता के नेत्रों में प्रकाश स्वरूप भगवान् सुर्य तथा ज्योत्स्ना के अधिष्ठाता चन्द्रदेव का निवास होता है। जन्म पत्री में सूर्य-चन्द्र कमजोर हो तो गोनेत्र के दर्शन करें, लाभ होगा।
वास्तुदोषों का निवारण भी करती है गाय
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
जिस स्थान पर भवन, घर का निर्माण करना हो, यदि वहाँ पर बछड़े वाली गाय को लाकर बाँधा जाय तो वहाँ सम्भावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता
है, कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएँ नहीं आतीं।
गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गोसेवा को एक कर्तव्य के रूप में माना गया है। गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिये निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत प्रसिद्ध हैं। 'समरांगणसूत्रधार'-जैसा प्रसिद्ध बृहद्वास्तुग्रन्थ गोरूप में पृथ्वी-ब्रह्मादि के समागम-संवाद से ही आरम्भ होता है।
वास्तुग्रन्थ 'मयमतम्' में कहा गया है कि भवन निर्माणका शुभारम्भ करनेसे पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बाँधना चाहिये, जो सवत्सा (बछड़ेवाली) हो। नवजात बछडे को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमिपर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वो समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि ग्रन्थों में का
महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयता पूर्वक सांस लेती है तो उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है।
निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति ।।
यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा होती है, वहाँ पुत्र-पौत्र, धन, विद्या आदि सुख जो भी चाहिये, मिल जाता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आयी है। महर्षि अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस
घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे
होगा?
गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। इससे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णुपुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गये तो नन्द-दम्पती ने गाय की पूँछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भयका निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन
लेकर यात्रा में जाने से कार्य सिद्ध होता है।
पद्मपुराण और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लाँघकर नहीं जाना चाहिये। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिये जाते समय गाय के रँभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान-लाभ के लिये गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है।
शिवपुराण एवं स्कन्दपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पाँवकी धूलिका भी अपना महत्त्व है। यह पापविनाशक है, ऐसा
गरुडपुराण और पद्मपुराण का मत है। ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि गोधूलि वेला विवाहादि मंगलकार्यों के लिये सर्वोत्तम मुहूर्त है। जब गायें जंगल से
चरकर वापस घर को आती हैं, उस समयको गोधूलि वेला कहा जाता है। गायके खुरों से उठने वाली धूलराशि। समस्त पाप-तापों को दूर करनेवाली है। पंचगव्य एवं पंचामृत की महिमा तो सर्वविदित है ही। गोदान की महिमा से कौन अपरिचित है ! ग्रहों के अरिष्ट-निवारण के
लिये गोग्रास देने तथा गौ के दान की विधि ज्योतिष-ग्रन्थों में विस्तार से निरूपित है। इस प्रकार गाय सर्वविध कल्याणकारी ही है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
#🕉️सनातन धर्म🚩
अखाड़ों के संत नाम के आगे गिरि,पुरी आदि उपनाम क्यों रखते हैं ?
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
हिन्दू संतों के 13 अखाड़े हैं इनमे से शिव (संन्यासी) संप्रदाय के 7 अखाड़े, बैरागी (वैष्णव) संप्रदाय के 3 अखाड़े और उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं।
इन्हीं में नाथ, दशनामी आदि होते हैं।
आओ जानते हैं कि संत अपने नाम के आगे गिरि, पुरी, भारती, दास, नाथ आदि उपनाम क्यों लगाते हैं।
1. इस उपनाम से ही यह पता चलता हैं कि वे किस अखाड़े, मठ, मड़ी और किस संत समाज से संबंध रखते हैं।
2. शिव संन्यासी संप्रदाय के अंतर्गत ही दशनामी संप्रदाय जुड़ा हुआ है।
ये दशनामी संप्रदाय के नाम :- गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती,वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम।
सन्यासी समाज के लोग इसी दशनामी संप्रदाय से संबंधित हैं। इन 7 अखाड़ों में से जूना अखाड़ा इनका खास अखाड़ा है।
3. दशनामी संप्रदाय में शंकराचार्य, महंत, आचार्य और महामंडलेश्वर आदि पद होते हैं।
किसी भी अखाड़े में आचार्यमहामंडलेश्वर का पद सबसे ऊंचा होता है।
4. शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे जो 10 क्षेत्रों में बंटें थे जिनके एक-एक मठाधीश थे।
5. कौन किस कुल से संबंधित है जानिए...
1.गिरी,
2.पर्वत और
3.सागर।
इनके ऋषि हैं भ्रुगु।
4.पुरी,
5.भारती और
6.सरस्वती।
इनके ऋषि हैं शांडिल्य।
7.वन और
8.अरण्य के ऋषि हैं कश्यप।
6. नागा क्या है 👉 चार जगहों पर होने वाले कुंभ में नागा साधु बनने पर उन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं।
इलाहाबाद के कुंभ में उपाधि पाने वाले को
राजराजेश्वरी नागा, उज्जैन में खूनी नागा,
हरिद्वार में बर्फानी नागा तथा नासिक में उपाधि पाने वाले को खिचडिया नागा कहा जाता है।
इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है।
शैव पंथ के 7 अखाड़े में ही नागा साधु बनते हैं।
नागाओं के अखाड़ा पद 👉 नागा में दीक्षा लेने के बाद साधुओं को उनकी वरीयता के आधार पर पद भी दिए जाते हैं।
कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत, श्रीमहंत और सचिव उनके पद होते हैं।
सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद श्रीमहंत का होता है।
8. बैरागी वैष्णव संप्रदाय के अखाड़े में आचार्य, स्वामी, नारायण, दास आदि उपनाम रखते हैं।
जैसे रामदास, रामानंद आचार्य, स्वामी नारायण आदि।
9. नाथ संप्रदाय के सभी साधुओं के नाम के आगे नाथ लगता है। जैसे गोरखनाथ, मछिंदरनाथ आदि।
10. उदासीन संप्रदाय के संत निरंकारी होते हैं। इनके अखाड़ों की स्थापना गुरु नानकदेव जी के पुत्र श्रीचंद ने की थी।
इनके संतों में दास, निरंकारी और सिंह अधिक होते हैं।
नोट : संत नाम विशेषण और प्रत्यय : - परमहंस, महर्षि, ऋषि, स्वामी, आचार्य, महंत, नागा, संन्यासी, नाथ और आनंद
आदि।
साधुओं के प्रमुख अखाड़े
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
13 अखाड़े - 7 शैव, 3 वैष्णव और 3 उदासीन अखाड़े
ये 13 अखाड़े हैं-
नागा साधुओं के प्रमुख अखाड़े भारतीय धार्मिकता के महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं और इनका प्राचीन इतिहास है। भारत में कुल 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिन्हें तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
👉 पहली श्रेणी में शैव अखाड़े आते हैं, जिनकी संख्या कुल 7 है और जिनका संबंध शिव भक्त धारा से है। ये शैव अखाड़े हिन्दू धर्म के शिव संप्रदाय का अनुसरण करते हैं और इनका मुख्य उद्देश्य शिव की आराधना और उनके सिद्धांतों का पालन करना होता है।
👉 दूसरी श्रेणी वैष्णव अखाड़ों की है, जिनमें 3 प्रमुख अखाड़े शामिल हैं। वैष्णव अखाड़े विष्णु भगवान की पूजा करते हैं और उनके अनुयायी वैष्णव परंपराओं का पालन करते हैं, जो भक्ति योग और ध्यान पर विशेष जोर देते हैं।
👉 तीसरी श्रेणी उदासीन अखाड़ों की है, जिनमें भी 3 प्रमुख अखाड़े आते हैं। उदासीन अखाड़े सिख गुरुओं की परंपरा और उनके सिद्धांतों का पालन करते हैं और ये साधुगण ठहराव और निर्वाण की खोज पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
इन सभी अखाड़ों के साधु महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह में भाग लेते हैं, विशेषकर कुंभ मेले में, जहाँ ये अपने अनुष्ठान और प्रथाओं को पूरे जोश के साथ संपन्न करते हैं।
1.निरंजनी अखाड़ा
2.जूना अखाड़ा
3.महानिर्वाण अखाड़ा
4.अटल अखाड़ा
5.आह्वान अखाड़ा
6.आनंद अखाड़ा
7.पंचाग्नि अखाड़ा
8.नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा
9.वैष्णव अखाड़ा
10.उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा
11.उदासीन नया अखाड़ा
12.निर्मल पंचायती अखाड़ा
13.निर्मोही अखाडा ।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
#वृंदावन
🌺 वृन्दावन में कुम्भ क्यों नहीं? एक अद्भुत प्रसंग 🌺
एक बार प्रयागराज में कुम्भ का महायोग था। चारों ओर उत्साह था। श्रीनन्द बाबा और गोष्ठ के अन्य बड़े-बुजुर्गों ने विचार किया कि हम भी प्रयागराज चलकर स्नान-दान और पुण्य कमा कर आते हैं।
किंतु, हमारे कन्हैया को यह कैसे स्वीकार होता?
प्रातः काल नन्द बाबा अपनी बैठक में वृद्ध गोपों के साथ चर्चा कर रहे थे, तभी सामने से एक भयानक काला घोड़ा सरपट भागता हुआ आया। सभी डर गए कि कहीं यह कंस का भेजा कोई असुर तो नहीं?
लेकिन वह घोड़ा आया और 'ज्ञान-गुदड़ी' स्थल की कोमल ब्रज-रज (धूल) में लोट-पोट होने लगा। देखते ही देखते चमत्कार हुआ!
✨ उसका रंग काले से बदलकर गोरा और अति मनोहर हो गया! ✨
नन्द बाबा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, "कौन है भाई तू? और यह कायाकल्प कैसे हुआ?"
घोड़ा एक दिव्य महापुरुष के रूप में प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर बोला:
"हे व्रजराज! मैं साक्षात् प्रयागराज हूँ। संसार के सभी अच्छे-बुरे लोग मुझमें अपने पाप त्याग जाते हैं, जिससे मैं काला पड़ जाता हूँ। अपनी शुद्धि के लिए मैं हर कुम्भ से पहले श्रीधाम वृन्दावन की इस पावन रज में लोटने आता हूँ। यहाँ की धूलि से मेरे समस्त पाप धुल जाते हैं और मैं निर्मल होकर लौटता हूँ।"
यह सुनकर कान्हा मुस्कुराए और बोले, "बाबा! अब कब चलना है प्रयाग?"
नन्द बाबा और समस्त ब्रजवासियों ने एक स्वर में कहा- "जब स्वयं तीर्थराज प्रयाग हमारी ब्रज की रज में पवित्र होने आते हैं, तो हमें कहीं और जाने की क्या आवश्यकता?" और उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी।
ऐसी है श्री वृन्दावन धाम और ब्रज रज की महिमा! 🙏
🌿 दोहा 🌿
धनि धनि श्रीवृन्दावन धाम, जाकी महिमा बेद बखानत।
सब बिधि पूरण काम, आश करत हैं जाकी रज की, ब्रह्मादिक सुर ग्राम॥
।। जय जय श्री राधे ।।
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वयधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 317)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ।। १४ ।।
'कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ।। १४ ।।
आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ।। १५ ।।
'कुछ लोग आर्ष विधि (यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं। इस प्रकार विवाहित होनेवाले (दैव विवाहकी रीतिसे) पत्नी प्राप्त करते हैं। इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका आठवाँ प्रकार माना है। इन सबको तुमलोग समझो ।। १५ ।।
स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च।
प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ।। १६ ।।
'क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।। १६ ।।
ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः ।
ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ।। १७ ।।
'अतः भूमिपालो ! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ। तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ।। १७ ।।
स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः ।
एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ।। १८ ।।
सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् ।
आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ।। १९ ।।
'राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ।' परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ।। १८-१९ ।।
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः ।
संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ।। २० ।।
फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते (ताल ठोकते) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ।। २० ।।
तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् ।
आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ।। २१ ।।
सब लोग जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे। उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २१ ।।
ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय ।
भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ।। २२ ।।
सवर्मभिर्भूणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः ।
सक्रोधामर्षजिह्म भूकषायीकृतलोचनाः ।। २३ ।।
सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्वरुपकल्पितान् ।
रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ।। २४ ।।
प्रयान्तमथ कौरव्यमनुससुरुदायुधाः ।
ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत ।
एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २५ ।।
जनमेजय ! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय ! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत । उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ।। २२-२५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
#महाभारत
#खेलें मसाने में होली दिगंबर काशी विश्वनाथ #🙏🌷👌👌घाट पर चिताभस्म की होली 🙏🌷🙏खेले मसाने मे होली दिगम्बर 👌👌🙏
🛐प्रस्तुत है ब्रज की होरी साथ में इस होरी गीत का आध्यात्मिक विवेचना।*🛐
*खेलैं मसाने में होरी दिगंबर*
खेलैं मसाने में होरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
भूत पिशाच बटोरी दिगंबर,
खेले मसाने में होरी।
चिता, भस्म भर झोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी।
गोप न गोपी श्याम न राधा,
ना कोई रोक ना, कौनऊ बाधा।
ना साजन ना गोरी, दिगंबर,
खेले मसाने में होरी।
नाचत गावत डमरूधारी,
छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी
पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर
खेले मसाने में होरी।
भूतनाथ की मंगल-होरी,
देखि सिहाएं बिरिज की गोरी
धन-धन नाथ अघोरी
दिगंबर खेलैं मसाने में होरी।
खेलें मसाने में होरी,
दिगम्बर खेलें मसाने में होरी ...
🙏शमशान में होली खेलने का अर्थ समझते हैं? मनुष्य सबसे अधिक मृत्यु से भयभीत होता है। उसके हर भय का अंतिम कारण अपनी या अपनों की मृत्यु ही होती है। शमशान में होली खेलने का अर्थ है उस भय से मुक्ति पा लेना। शिव किसी शरीर मात्र का नाम नहीं है, शिव वैराग्य की उस चरम अवस्था का नाम है, जब व्यक्ति मृत्यु की पीड़ा,भय या अवसाद से मुक्त हो जाता है। शिव होने का अर्थ है वैराग्य की उस ऊँचाई पर पहुँच जाना जब किसी की मृत्यु कष्ट न दे, बल्कि उसे भी जीवन का एक आवश्यक हिस्सा मान कर उसे पर्व की तरह खुशी खुशी मनाया जाय। शिव जब शरीर में भभूत लपेट कर नाच उठते हैं, तो समस्त भौतिक गुणों-अवगुणों से मुक्त दिखते हैं। यही शिवत्व है।🙏
❣️मान्यता है कि काशी की मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के शव की दाहक्रिया की थी। तब से वह महा शमशान है, जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। एक चिता के बुझने से पूर्व ही दूसरी चिता में आग लगा दी जाती है। वह मृत्यु की लौ है जो कभी नहीं बुझती, जीवन की हर ज्योति अंततः उसी लौ में परम ज्योति में समाहित हो जाती है। शिव जब अपने कंधे पर देवी सती का शव ले कर नाच रहे थे, तब वे मोह के चरम पर थे। वे शिव थे, फिर भी शव के मोह में बंध गए थे। मोह बड़ा प्रबल होता है, किसी को नहीं छोड़ता।सामान्य जन भी विपरीत परिस्थितियों में, या अपनों की मृत्यु के समय यूँ ही शव के मोह में तड़पते हैं। शिव शिव थे, वे रुके तो उसी प्रिय पत्नी की चिता भष्म से होली खेल कर युगों युगों के लिए वैरागी हो गए। मोह के चरम पर ही वैराग्य उभरता है न। पर मनुष्य इस मोह से नहीं निकल पाता, वह एक मोह से छूटता है तो दूसरे के फंदे में फंस जाता है। शायद यही मोह मनुष्य को शिवत्व प्राप्त नहीं होने देता।❣️
🕉️कहते हैं काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है। शिव की अपनी नगरी है काशी, कैलाश के बाद उन्हें सबसे अधिक काशी ही प्रिय है। शायद इसी कारण काशी एक अलग प्रकार की वैरागी ठसक के साथ जीती है। मणिकर्णिकाघाट, हरिश्चंदघाट, युगों युगों से गङ्गा के इस पावन तट पर मुक्ति की आशा ले कर देश विदेश से आने वाले लोग वस्तुतः शिव की अखण्ड ज्योति में समाहित होने ही आते हैं। होली आ रही है। फागुन में काशी का कण कण फ़ाग गाता है-“खेले मशाने में होली दिगम्बर खेले मशाने में होली” सच यही है कि शिव के साथ साथ हर जीव संसार के इस महाश्मशान में होली ही खेल रहा है। तबतक, तबतक उस मणिकर्णिका की ज्योति में समाहित नहीं हो जाता। संसार शमशान ही तो हैं।🕉️
#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
शास्त्र कहते हैं मनुष्य को अपने जीवन में चार पुरुषार्थों के संतुलन से चलना चाहिए ...
1. धर्म — कर्तव्य, नैतिकता, सत्य और मर्यादा के साथ
यह विवेक कि क्या करना उचित है।
2. अर्थ — जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक धन;
कितना पर्याप्त है, इसका बोध
अधिकतम संग्रह का आग्रह नहीं।
3. काम इच्छाएँ, सुख, सौंदर्य और प्रेम परंतु धर्म की सीमाओं के भीतर।
4. मोक्ष बंधन से मुक्ति, आत्मबोध
और यही अंतिम लक्ष्य।
शास्त्रों में अर्थ (धन) को कभी भी धर्म और मोक्ष से ऊपर नहीं रखा गया।
लक्ष्मी जी और उल्लू से जुड़ी पौराणिक कथाएँ भी इसी संतुलन का आध्यात्मिक संकेत देती हैं ।
धन, चेतना और विवेक का संतुलन।
उल्लू, जो अँधेरे में भी देख सकता है, यह सिखाता है कि अज्ञान, लोभ और भ्रम के अँधेरे में भी जो सत्य देख सके वही लक्ष्मी का पात्र है।
धन तभी कल्याणकारी होता है जब उसके साथ दृष्टि (बुद्धि) हो।
उल्लू यह भी चेतावनी देता है कि यदि धन विवेक के बिना आए,तो वही धन अहंकार, पतन और दुःख का कारण बन जाता है।इसीलिए लक्ष्मी जी का वाहन सिंह या हाथी नहीं, उल्लू है—
मानो वह कह रही हों: “मैं वहीं ठहरती हूँ जहाँ बुद्धि मेरी सवारी करती है।”
उल्लू रात्रिचर है—
यह संकेत है कि जो व्यक्ति केवल दिन के दिखावे में जीता है, वह अंततः लक्ष्मी को खो देता है।
कुछ परंपराओं में उल्लू को मूर्खता का प्रतीक भी माना गया है।
यह दोहरा अर्थ जानबूझकर रखा गया है— यदि लक्ष्मी का सही उपयोग न हो, तो मनुष्य “धनवान मूर्ख” बन जाता है।
आज अपने आसपास हम ऐसी अनेक घटनाएँ देखते हैं जो शास्त्रसम्मत तो बिल्कुल नहीं हैं। फिर भी हर सत्य अंततः प्रकाश में आता है।
धर्म को ताक पर रखकर जो धनवान हुए हैं, उन्हें देखकर कई बार हमारा उस अदृश्य सत्ता में विश्वास का सिंहासन डोलने लगता है, पर सच यह है कि अधर्म से आया धन धूप में रखी बर्फ़ है जो दिखता बहुत है, पर टिकता नहीं।
अंत में न धन साथ जाता है, न सत्ता, न नाम। साथ रह जाता है
केवल वही जो धर्म के साथ जिया जाएगा....













