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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।।जय श्री राम।। सातंव सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।। श्री राम जी शबरी माता को सातवीं नवधा भक्ति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह सारा संसार मेरा ही स्वरुपहै इसलिए सब में मुझे ही देखना चाहिए। श्री तुलसी दासजी महाराज जगत में जितने जड़और चेतन जीव हैं सभी को राम मय जानकर उन सबके चरणों की वंदना करते हैं। जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि बदंउ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।। भगवान का भक्त सभी में अपने परमात्मा को ही देखता है। इसीलिए श्री तुलसीदास जी महाराज सारे संसार को परमात्मा मय जानकर लिखते हैं।(सियाराम मय सब जग जानी )(करहु प्रणाम जोरिजुग पानी) भगवान ने नवधा भक्ति का जो वर्णन किया है उसमें भक्ति के अनेक रूप बताएं हैं। संत का संग यह भगवान की भक्ति है। भगवत कथा में प्रीति होना यह भगवान की भक्ति है। अभिमान रहित होकर गुरुदेव के चरणों की सेवा करना यह भी भगवान की भक्ति है । निष्कपट भाव से भगवान के गुणों को गाना यह भगवान की भक्ति है भगवान के मंत्र या उसके पावन नाम जप में दृढ़ विश्वास रखना यह भी भगवान की भक्ति है ।और इंद्रियों का संयम करके वैराग्य वान होकर सज्जनों के धर्म का पालन करना यह भी भगवान की भक्ति है। छै भक्तियों का वर्णन अभी तक किया गया है पर सब भक्तियों के साथ शर्त रखी गई है। भगवान के गुण गाए तो शर्त यह है कि कपट का त्याग करें। मंत्र जाप करें तो शर्त यह है की दृढ़ विश्वास रखें। इंद्रियों का संयमी हो वैराग्यवान हों तो इसमें भी शर्त है कि वैराग्य वान होकर निरंतर सज्जनों के आचरण का पालन करें । इसी तरह सातवीं भक्ति में भी शर्त रखी है कि सब में मुझको देखे पर शर्त यह है कि संत को मुझसे भी अधिक समझे। (मौतें अधिक संत करि लेखा ) अब कोई संत यह कहे कि मुझे भगवान से भी अधिक समझो। भगवान ने स्वयं ऐसा कहा कि मुझसे अधिक संत को समझो।तो विचार क्या करते हो समझो ।भगवान से अधिक मुझे समझो। मानस के मर्मज्ञ संत कहते हैं कि जो अपने को भगवान से भी अधिक समझते हों वह संत नहीं हो सकतें हैं। यदि कोई तुम्हें भगवान से अधिक समझे तो तुम्हें खुश होने की आवश्यकता नहीं है यह तुम्हारा सौभाग्य नहीं यह तुम्हारा दुर्भाग्य है। जब भगवान ने कहा कि संत को मुझसे भी अधिक समझो तो वह संत कैसा जो इस बात को स्वीकार करले। संत को तो यही कहना चाहिए नहीं भाई यह तो भगवान की करुणा है जो संतो को इतना महत्व दिया है, पर भगवान से अधिक महिमा तो किसी की नहीं हो सकती है। सबसे अधिक महिमा तो भगवान कीही है भरत जी संत हैं। श्री राम जी कहते हैं भरत तुम्हारे समान पुण्यआत्मा तीनों लोकों में नहीं है। भरत जी ने कहा प्रभु मैं पुण्यआत्मा कैसे?। मैं तो बहुत बड़ा पापी हूं। मेरे पाप के कारण ही आपको वनवास हुआ है। मैं पापी हूं मेरे कारण ही लक्ष्मण भैया को श्री सीता जी को और आपको वनवास हुआ है। श्री राम जी ने कहा भरत तुम ऐसा मानते हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वनवास हुआ है,पर वन में मैंने जब संतों के दर्शन किए तो संतों ने मुझसे पूछा राम तुम्हारा वनवास क्यों हुआ? तुम किस पाप के कारण वन में आए हो?। श्री राम जी ने कहा भरत मैंने संतो से यही कहा कि महाराज शास्त्रों में तो ऐसा वर्णन है कि बिना पुण्य के संतो के दर्शन दुर्लभ है। मैं वन में आया हूं तो मैं अपने पुण्यों के प्रभाव के कारण वन में आया हूं मेरे पुण्यों से मुझे संतों के दर्शन हुए हैं। (पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।। श्री राम जी ने कहा भरत तुम कह रहे हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वन मिला और मैं कह रहा हूं कि मेरे पुण्य के कारण मुझे वनवास हुआ। तो जरा विचार करो जो काम तुम्हारे पाप ने किया वही काम मेरे पुण्य ने किया। तो इससे यह तो सिद्ध होता है कि तुम्हारे पाप और मेरे पुण्य दोनों ने एक ही काम किया। श्री राम जी कहते हैं भरत अब विचार करके देखो जब तुम्हारे पाप मेरे पुण्यों की बराबरी कर सकते हैं, तो तुम्हारे पुण्यों की क्या महिमा होगी। इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम्हारे समान पुणयत्मा तीनों लोकों में नहीं है। तीन काल त्रिभुवन मत मोरे। पुणयसि लोक तात तर तोरे।। श्री राम जी ने कहा भरत तुम कुटिल हो नहीं फिर भी यदि कोई तुम्हें धोखा से कुटिल समझ ले तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा। उर आनत तुम पर कुटलाई। लोक जाई परलोक नसाई।। जब श्री राम जी ने कहा कि यदि कोई तुम्हें धोखे से कुटिल समझेगा तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा तो सभा में बैठे हुए सभी की आंखों में आंसू आ गए पर दो बहुत दुखी हुए। दो कौन दुखी हुए?। निषाद राज और श्री लक्ष्मण जी दोनों बहुत दुखी हो गए। क्योंकि निषाद राज ने और श्री लक्ष्मण जी दोनों ने भरत जी को कुटिल कहा था। निषाद राज ने कहा था यदि भरत के मन में कुटिलता नहीं होती तो सेना लेकर क्यों आते। जौं पै जिय न होत कुटिलाई। तो कत संग लीन्ह कटकाई।। लक्ष्मण जी ने भी यही कहा था कि भाई के मन में कुटिलता है इसीलिए तो यह समझ कर आया है कि रामजी वन मे अकेले हैं अवसर अच्छा है। कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी। जानि राम वनवास एकाकी। राम जी ने जैसे ही कहा कि किसी ने धोखे से भी भरत को कुटिल कुबंधु कहा है तो उसके लोक पर लोक नष्ट हो जाएंगे तो लक्ष्मण जी और निषाद राज दोनों की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा कि यह ब्रह्म वाक्य है। राम जी की बात मिथ्या नहीं हो सकती है। हमारे लोक और परलोक दोनों नष्ट हो गए हैं। वशिष्ठ जी ने राम जी से पूछा कि इसका उपाय क्या है? भरत जी को कुटिल कहने वाले के लोक परलोक नष्ट हो गए हैं तो इसका उपाय क्या है जिससे इनके लोक पर लोक सुधर जाएं। श्री राम जी ने कहा इसका एक ही उपाय है,।भरत जो तुम्हारे नाम का सुमिरन करेगा उसके लोक और परलोक दोनों सुधर जाएंगे। मिटिहहि पाप प्रमेय सब अखिल अमंगल भार लोक सुजसु परलोक सुख सुमिरत नाम तुम्हार।। श्री राम जी अयोध्या वासियों से कहते हैं कि जब मैं वन में आ रहा था तब मैं रथ में बैठ कर आ रहा था और तुम पैदल पैदल आ रहे थे। और तुम भरत जी जैसे संत के साथ में आए तो भरत जी पैदल-पैदल आए और तुम्हें रथ में बैठा कर लाए इसलिए ऐसे महात्मा की महिमा अधिक है। भगवान कहते हैं मैं सभी के हृदय में रहता हूं। और सभी के हृदय में सुमति और कुमति भी रहती है। कुमति के कारण मुझे वनवास हुआ और सुमति रुपी संत ने मुझे वापस सिंहासन पर बैठा कर अयोध्या वासियों से मिला दिया। इसलिए जो भगवान से बिछड़ गए हैं, य भगवान जिन से बिछुड़ गये है उन्हें आपस में मिला देना यह संत का ही काम है। इसलिए मुझसे अधिक महिमा संत की है। ( मोतें अधिक संत करि लेखा ) नवधा भक्ति में आठवीं भक्ति की महिमा का वर्णन अगले प्रशगंमें। जय श्री राम।।
जय सियाराम - मानस प्रसंग भाग २१६ मानस प्रसंग भाग २१६ - ShareChat
#🙏परशुराम जयंती🪔📿 मंदिर निरमंड की कथा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ माता की हत्या के पश्चाताप के लिए निरमंड आये थे परशुराम। हिमाचल प्रदेश की सुरमई वादियों में यूं तो कदम-कदम पर देवस्थल मौजूद हैं, लेकिन इनमें से कुछ एक ऐसे भी हैं जो अपने में अनूठी गाथाएँ और रहस्य समेटे हुए हैं| ऐसा ही एक मंदिर है निरमंड का परशुराम मंदिर यह मंदिर शिमला से करीब 150 किलोमीटर दूर रामपुर बुशहर के पास स्थित निरमंड गाँव में है| मान्यता है कि भगवान् परशुराम ने यहाँ अपनी जिन्दगी के अहम् वर्ष गुजारे थे| किवदंतियों के अनुसार ऋषि जमदग्नि हिमाचल के वर्तमान सिरमौर जिला के समीप जंगलों में तपस्या किया करते थे| उनकी पत्नी और परशुराम की माता रेणुका भी आश्रम में उनके साथ रहती थीं| ऋषि जमदग्नि को नित्य पूजा के लिए यमुना के जल की जरूरत होती थी| यह जिम्मेदारी रेणुका पर थी| रेणुका अपने तपोबल से रोज ताज़ा रेत का घडा बनाकर उसे सांप के कुंडल पर धर कर आश्रम लाया करती थीं| लेकिन एक दिन रस्ते में गन्धर्व जोड़े की क्रीडा देख लेने के कारण उनका ध्यान भंग हो गया और नतीजा यह निकला की तपोबल क्षीण होने के कारण उस दिन न तो रेत का घडा बन पाया और न ही सांप आया| इस कारण जमदग्नि की पूजा में विघ्न आ गया| ऋषि इस से इतना व्यथित हुए की क्रोधावेश में आकर उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र परशुराम को माँ रेणुका के वध का आदेश दिया| पितृभक्त परशुराम ने तुंरत पिता की आज्ञा का पालन किया और रेणुका को मौत के घाट उतार दिया| बेटे की पित्री भक्ति से जमदग्नि प्रस्सन हुए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा तो परशुराम ने माँ को दोबारा जीवित करवा लिया| ऋषि और रेणुका की बात तो यहीं आई-गयी हो गयी लेकिन परशुराम इसके बाबजूद मात्रिहत्या के भाव से व्यथित रहने लगे| पश्चताप की इसी ज्वाला की जलन से त्रस्त होकर उन्होंने पिता का आश्रम त्याग दिया और प्रायश्चित के उदेश्य से हिमालय की और कूच कर लिया | इसी क्रम में अंतत परशुराम ने निरमंड में डेरा डाला| यहाँ उन्होंने माँ रेणुका को समर्पित एक मंदिर भी बनवाया जो आज भी देवी अम्बिका के मंदिर के रूप में यहाँ विद्यमान है| इस मंदिर में रेणुका की पौने फुट की प्रतिमा है जो नहं के रेणुका मंदिर की प्रतिमा से मेल खाती है| परशुराम ने यहाँ जो आश्रम बनाया था उसी को आज परशुराम मंदिर के तौर पर पूजा जाता है| यह आश्रम पहाडी और जंगली जानवरों के इलाके में होने के कारण चारों तरफ से बंद था और आने-जाने के लिए एक ही मुख्य द्वार था| मंदिर का यह मूल स्वरुप आज भी जस का तस् है| कहते हैं यहीं पर मात्रि हत्या के दोष निवारण के लिए परशुराम ने एक यज्य भी शुरू करवाया जिसमें तब नरबलि दी जाती थी| किवदंतियों की मानें तो कालांतर में यही नरबलि मौजूदा भूंडा यज्या के तौर पर प्रचलित हुयी| जो आज भी जारी है| एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम ने निरमंड को ख़ास तौर पर क्षत्रियों के संहार के लिए त्यार करने हेतु बसाया था|लेकिन कारण यहाँ भी माता रेणुका थीं| राजा सहस्त्रार्जुन के रेणुका के प्रति प्रेम की परिणिति आखिरकार जमदग्नि और रेणुका के वध के रूप में हुयी| इससे परशुराम कुपित हो उठे और उन्होंने धरती से क्षत्रियों के संहार का संकल्प लिया जिसे पूरा करने के लिए निरमंड में आश्रम बनाया| अब इनमें से सच कौन सी धारणा है यह कहना तो मुश्किल है लेकिन दोनों से यह जरूर साबित होता है की परशुराम ने ही निरमंड बसाया था| यही कारण है की दूसरे तमाम देवों के मंदिर होने के बाबजूद निरमंड में आज भी परशुराम को ही मुख्य देव माना जाता है| परशुराम जी का मंदिर गाँव के बीचों-बीच स्थित है और खास बात यह की आप गाँव के किसी भी रास्ते पर चल दें परशुराम मंदिर जरूर पहुंचेंगे| परशुराम जी का मंदिर या कोठी मूलत लकडी की बनी हुयी है जिसपर प्राचीन काष्टकला उकेरी हुयी है| मुख्य द्वार आज भी एक ही है| मंदिर के गर्भगृह में भगवान परशुराम जी की तीन मुंहों वाली मूर्ति स्थापित है| यह मूर्ति काश्मीर रियासत की तत्कालीन महारानी अगरतला ने स्थापित करवाई थी| कहा जाता है की इसके मुख्य मुख के माथे पर तीसरी आँख के रूप में हीरा भी जड़ा हुआ था| इसके अलावा यहीं पर परशुराम जी के तीनों मुंहों के लिए चांदी का मुखौटा भी हुआ करता था जो बाद में चोरी हो गया था| हालाँकि आज भी यहाँ के भण्डार में समुद्र्सेन के काल का स्वर्णपात्र मौजूद है| इसके अलावा देवी के आभूषण भी हैं| इन्हें भूंडा यज्य के मौके पर जनता के दर्शनार्थ रखा जाता है| बाकी के समय यह ताले में बंद रहते हैं| मंदिर के प्रांगण में सदियों पुराने शिलालेख और प्रस्तर की प्राचीन प्रतिमाएँ भी हैं जो तत्कालीन भव्यता को सहज ही ब्यान करती हैं| परशुराम मंदिर के देखरेख हालाँकि एक समिति करती है लेकिन इसे देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की यह स्थानीय समिति के बस का रोग नहीं है और इसके लिए व्यापक स्तर पर सरकारी प्रयासों की जरूरत है| गाँव के लोग इस प्राचीन मंदिर और उस कारण निरमंड के साथ जुड़े इतिहास के चलते निरमंड को धरोहर का दर्जा मांग रहे हैं| लेकिन यदि सरकार परशुराम मंदिर को ही सहेज ले तो भी बड़ी बात होगी| थोड़े से प्रयास और प्रचार से इसे इलाके का प्रमुख धार्मिक पर्यटन का केंद्र बनाया जा सकता है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🙏परशुराम जयंती🪔📿 - परशूराम T Ris परशूराम T Ris - ShareChat
#🙏परशुराम जयंती🪔📿 जय श्री परशुराम जी की- 🌷🌷🌹🌷🌷🌹🌷🌷 महाभारत के अभिन्न पात्र दानवीर कर्ण ने जीवन में केवल एक बार ही झूठ बोला और यही झूठ उनके जीवन पर सबसे ज्यादा भारी पड़ा। कर्ण ने अस्त्र विद्या भगवान परशुराम से सीखी थी, भगवान परशुराम का प्रण केवल ब्राह्मणों को ही शस्त्र विद्या सिखाने का था। कर्ण ब्राह्मण नहीं थे, लेकिन उन्होंने परशुराम से झूठ बोल दिया कि वो ब्राह्मण है। कर्ण की बात को सच मानकर परशुरामजी ने उन्हें शस्त्र की शिक्षा दे दी। एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और उसने कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा। बहता खून परशुराम के चेहरे तक पहुंचा तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं। कर्ण ने कहा आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। कर्ण ने सच बता दिया। क्रोधित परशुरामजी ने कर्ण को शाप दिया कि तुमने मुझ से जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे, कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे। हुआ भी ऐसा ही, महाभारत के प्रमुख युद्ध में जब कर्ण अर्जुन से लडऩे पहुंचा तो वो अपने आप ही सारे दिव्यास्त्रों के प्रयोग की विधि भूल गया और अर्जुन के हाथों मारा गया। साभार— पं देव शर्मा🔥 🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹🌹🌷🌹🌹
🙏परशुराम जयंती🪔📿 - आज का अमृत गुरु से कपट, मित्र से चोरी। के होय निर्धन, 4814 w181 आज का अमृत गुरु से कपट, मित्र से चोरी। के होय निर्धन, 4814 w181 - ShareChat
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः नकुल और सहदेव की उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रों के नामकरण-संस्कार...(दिन 364) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः । चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ।। १३ ।। 'सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे-बड़े कठिन कर्म किये हैं ।। १३ ।। सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ।। १४ ।। 'अनिन्दिते ! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो' ।। १४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ।। १५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा- 'तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है' ।। १५ ।। ततो माद्री विचार्येवं जगाम मनसाश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ।। १६ ।। तब माद्रीने मन-ही-मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया। तब उन दोनों ने आकर माद्री के गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये ।। १६ ।। नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमी भुवि । तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी ।। १७ ।। उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव। पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा ।। १७ ।। सत्त्वरूपगुणोपेतौ भवतोऽत्यश्विनाविति । भासतस्तेजसात्यर्थ रूपद्रविणसम्पदा ।। १८ ।। 'ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे। अपने तेज तथा बढ़ी-चढ़ी रूप-सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे' ।। १८ ।। नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः । भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशाम्पते ।। १९ ।। तदनन्तर शतशृंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण संस्कार किये। उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे ।। १९ ।। ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ।। २० ।। कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरे का नाम अर्जुन रखा गया ।। २० ।। पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् । माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ।। २१ ।। उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणों ने माद्री पुत्रों में से जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरे का सहदेव निश्चित किया ।। २१ ।। अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ।। २२ ।। वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक-एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक-से सुशोभित हो रहे थे ।। २२ ।। महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः । पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजसः ।। २३ ।। मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ।। २४ ।। प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् । कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ।। २५ ।। वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंको देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशृंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया ।। २३-२५ ।। तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती। उक्ता सकृद् द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ।। २६ ।। राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली- 'महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये। इससे मैं ठगी गयी ।। २६ ।। बिभेम्यस्याः परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी । नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ।। २७ ।। तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ।। २८ ।। सम्भूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः । शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत् प्रियदर्शनाः ।। २९ ।। 'अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।' इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था ।। २७-२९।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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भगवान परशुराम द्वारा माता का गला काटने का प्रसंग: विस्तृत शास्त्रीय विवेचन प्रस्तावना #🙏परशुराम जयंती🪔📿 भगवान परशुराम, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, के जीवन का यह प्रसंग हिन्दू शास्त्रों में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह घटना मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 9) एवं महाभारत में विस्तार से वर्णित है। इस लेख में हम शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर सम्पूर्ण कथा का विवेचन करेंगे। --- 1. मूल श्लोक एवं अनुवाद 1.1 रेणुका का गन्धर्व राजा को देखना श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_२_ #कदाचित्_रेणुका_याता_गङ्गायां_पद्ममालिनम्_ #गन्धर्वराजं_क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत_ हिन्दी अर्थ: एक बार रेणुका जब गंगा नदी पर गई, तो उसने गन्धर्वराज चित्ररथ को, जो कमलों की माला पहने हुए था, अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हुए देखा। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 2 1.2 रेणुका का मन में विचलित होना श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_३_ #विलोकयन्ती_क्रीडन्तमुदकार्थं_नदीं_गता_ #होमवेलां_न_सस्मार_किञ्चिच्चित्ररथस्पृहा_ हिन्दी अर्थ: वह जल लेने के लिए नदी पर गई थी, लेकिन जब उसने चित्ररथ को क्रीड़ा करते देखा, तो उसके मन में उसके प्रति थोड़ी आसक्ति हो गई और वह होम (यज्ञ) के समय को भूल गई। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 3 1.3 रेणुका का विलम्ब से आश्रम लौटना श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_४_ #कालात्ययं_तां_विलोक्य_मुनेः_शापविशङ्किता_ #आगत्य_कलशं_तस्थौ_पुरोधाय_कृताञ्जलिः_ हिन्दी अर्थ: बाद में, जब उसने समझा कि यज्ञ का समय बीत चुका है, तो वह अपने पति के शाप से डर गई। इसलिए लौटकर उसने जल का घड़ा रख दिया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 4 1.4 जमदग्नि का क्रोध एवं आदेश श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_५_ #व्यभिचारं_मुनिर्ज्ञात्वा_पत्न्याः_प्रकुपितोऽब्रवीत्_ #घ्नतैनां_पुत्रकाः_पापामित्युक्तास्ते_न_चक्रिरे_ हिन्दी अर्थ: महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के मन में व्यभिचार को जान लिया। इसलिए वे अत्यन्त क्रोधित हुए और अपने पुत्रों से कहा – ‘हे पुत्रों! इस पापिनी स्त्री को मार डालो!’ लेकिन पुत्रों ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 5 1.5 परशुराम द्वारा आज्ञापालन श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_६_ #रामः_सञ्चोदितः_पित्रा_भ्रातॄन्मात्रा_सहावधीत्_ #प्रभावज्ञो_मुनेः_सम्यक्समाधेस्तपसश्च_सः_ हिन्दी अर्थ: तब जमदग्नि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया कि वह अपनी माता एवं अवज्ञाकारी भाइयों को मार डाले। भगवान परशुराम, अपने पिता की तपश्चरण एवं समाधि की शक्ति को जानते हुए, तुरन्त अपनी माता एवं भाइयों को मारने के लिए तैयार हो गए। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 6 1.6 वाल्मीकि रामायण में प्रमाण वाल्मीकिरामायणे_अयोध्याकाण्डे_२.२१.३२_ #जामद्ग्न्येन_रामेण_रेणुका_जननी_स्वयम्_ #कृत्ता_परशुनाऽरण्ये_पितुर्वचनकारिणा_ हिन्दी अर्थ: जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने, अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, स्वयं अपनी माता रेणुका को वन में परशु (फरसे) से मार डाला। स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड, सर्ग 21, श्लोक 32 --- 2. घटना का पूर्वरंग 2.1 रेणुका की पवित्रता रेणुका अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थीं। उनकी पवित्रता का प्रभाव यह था कि वे रेत से मिट्टी का घड़ा बनाकर उसमें नदी से जल भरकर लाती थीं, और वह कच्चा घड़ा भीगता नहीं था। यह उनके पतिव्रत धर्म का चमत्कार था। 2.2 मानसिक विचलन का क्षण एक दिन रेणुका नदी पर जल लेने गईं। वहाँ उन्होंने गन्धर्व राजा चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते देखा। चित्ररथ अत्यन्त सुन्दर था। रेणुका के मन में उसके प्रति क्षणिक आकर्षण उत्पन्न हो गया। 2.3 पतिव्रत शक्ति का नाश इस मानसिक विचलन के कारण: 1. रेणुका द्वारा बनाया गया कच्चा घड़ा पानी से भीगने लगा 2. वह घड़ा टूट गया 3. रेणुका खाली हाथ एवं विलम्ब से आश्रम लौटीं जमदग्नि ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया। --- 3. परशुराम के पितृभक्ति का स्वरूप 3.1 भाइयों की अवज्ञा जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को आदेश दिया कि वे माता का वध करें। परन्तु बड़े तीनों पुत्रों ने पिता की इस आज्ञा का पालन करने से इन्कार कर दिया। बड़े पुत्रों की अवज्ञा पर जमदग्नि ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि उनकी बुद्धि नष्ट हो जाएगी और वे मूर्ख हो जाएंगे। 3.2 परशुराम का आज्ञापालन जब सबसे छोटे पुत्र राम (परशुराम) आश्रम लौटे, तो जमदग्नि ने उनसे भी यही आदेश कहा। परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन क्यों किया? श्रीमद्भागवत के अनुसार, परशुराम अपने पिता की तपशक्ति एवं समाधि के प्रभाव को जानते थे। उन्होंने सोचा: · यदि वे आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, तो उन्हें शाप मिलेगा · यदि वे आज्ञा का पालन करेंगे, तो पिता प्रसन्न होंगे और वरदान माँगने पर माता-भाइयों को पुनर्जीवित कर देंगे यह परशुराम की दूरदर्शिता एवं पितृभक्ति का परिचायक है। 3.3 परशुराम का वरदान श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_पश्चात्_ #तस्य_प्रीतो_मुनिः_प्रादाद्वरं_तुष्टः_परशवे_ #स_वव्रे_जीवितं_मातुः_भ्रातॄणां_च_पुनर्भवम्_ हिन्दी अर्थ: उनसे प्रसन्न होकर मुनि जमदग्नि ने परशुराम को वरदान दिया। परशुराम ने माता के जीवन की और भाइयों के पुनर्जन्म (पुनः जीवित होने) की प्रार्थना की। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16 (भावार्थ) जमदग्नि ने अपनी तपशक्ति से रेणुका और तीनों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया। विशेष बात यह है कि पुनर्जीवित होने पर उन्हें यह स्मरण नहीं रहा कि परशुराम ने उनका वध किया था। --- 4. लोक कथाओं में सिर बदलने का प्रसंग 4.1 यह कथा शास्त्रीय है या लोकिक? शास्त्रीय संस्करणों (महाभारत, भागवत, रामायण) से हटकर, लोक कथाओं में एक अतिरिक्त प्रसंग मिलता है: 1. जब परशुराम ने माता का सिर काटा, तो अंधेरे कमरे में गलती से एक चाण्डाल स्त्री का सिर भी कट गया 2. परशुराम ने भूलवश माता के सिर को चाण्डाल स्त्री के शरीर से जोड़ दिया 3. परिणामस्वरूप, दो देवियाँ उत्पन्न हुईं: · येल्लम्मा / रेणुका - ब्राह्मण सिर एवं चाण्डाल शरीर वाली · मरियम्मन - चाण्डाल सिर एवं ब्राह्मण शरीर वाली 4.2 शास्त्रीय प्रमाणों में इसका अभाव यह महत्वपूर्ण है कि श्रीमद्भागवत पुराण एवं महाभारत के प्रामाणिक संस्करणों में सिर बदलने का कोई उल्लेख नहीं है। यह प्रसंग विशेष रूप से: · येल्लम्मा देवी की उपासना से जुड़ी लोक परम्पराओं में प्रचलित है · मरियम्मन (चेचक की देवी) की तमिल लोक कथाओं में मिलता है --- 5. घटना का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व 5.1 पितृभक्ति का आदर्श परशुराम का यह कृत्य पितृभक्ति के चरम आदर्श के रूप में देखा जाता है। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए उन्होंने स्वयं की माता का वध कर दिया - यह उनकी निःस्वार्थ भक्ति एवं कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है। 5.2 देवी रेणुका का पूजन रेणुका को आज भी येल्लम्मा देवी, मरियम्मन एवं रेणुका देवी के रूप में पूजा जाता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं तमिलनाडु में उनके मन्दिर हैं। 5.3 वर्ण-व्यवस्था एवं जाति का प्रश्न लोककथाओं में वर्णित सिर बदलने का प्रसंग जाति एवं वर्ण व्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है: · रेणुका (ब्राह्मण पत्नी) का सिर चाण्डाल शरीर पर लगने के कारण वे आश्रम में नहीं रह सकीं · उन्हें गाँव के बाहर निवास करना पड़ा · यह कथा बताती है कि कैसे एक देवी की पूजा विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न रूपों में होने लगी --- 6. विभिन्न शास्त्रीय स्रोतों का सारांश स्रोत घटना का वर्णन सिर बदलने का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 9) रेणुका का मानसिक विचलन, परशुराम द्वारा वध, पुनर्जीवन का वरदान नहीं वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड) जमदग्नि के पुत्र द्वारा माता का वध नहीं महाभारत इसी प्रकार का वर्णन नहीं ब्रह्माण्ड पुराण रेणुका का गन्धर्व को देखना, पुनर्जीवन नहीं लोक कथाएँ (येल्लम्मा/मरियम्मन) सिर बदलने की कथा, दो देवियों की उत्पत्ति हाँ (लोक परम्परा में) --- 7. निष्कर्ष भगवान परशुराम ने अपनी माता रेणुका का गला क्यों काटा, इसके शास्त्रीय कारण निम्नलिखित हैं: 7.1 प्रमुख कारण 1. माता का मानसिक विचलन - रेणुका ने गन्धर्व राजा चित्ररथ को देखकर मन में क्षणिक आकर्षण अनुभव किया, जिससे उनका पतिव्रत धर्म नष्ट हो गया 2. पिता जमदग्नि की आज्ञा - ब्रह्मर्षि जमदग्नि ने क्रोधित होकर पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया 3. परशुराम की दूरदर्शिता - परशुराम ने पिता की तपशक्ति जानकर आज्ञा का पालन किया, जिससे पिता प्रसन्न हुए और माता-भाइयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मिला 7.2 महत्वपूर्ण तथ्य यह समझना आवश्यक है कि: · यह कोई हत्या नहीं थी, अपितु एक दिव्य लीला थी · माता पुनर्जीवित हो गईं · यह प्रसंग परशुराम की पितृभक्ति एवं कर्तव्यनिष्ठा के चरम उदाहरण के रूप में सदियों से स्मरण किया जाता है 7.3 सिर बदलने के प्रसंग का सत्य जहाँ तक सिर बदलने के प्रसंग का प्रश्न है, यह शास्त्रीय प्रमाणों में उपलब्ध नहीं है, बल्कि लोक कथाओं एवं क्षेत्रीय परम्पराओं में प्रचलित है, विशेष रूप से येल्लम्मा/मरियम्मन देवी की उपासना से जुड़ा हुआ है। --- 8. अतिरिक्त श्लोक एवं उनके अर्थ 8.1 परशुराम के बल एवं तप का वर्णन श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_१_ श्रीशुक_उवाच_ #पित्रोपशिक्षितो_रामस्तथेति_कुरुनन्दन_ #संवत्सरं_तीर्थयात्रां_चरित्वाश्रममाव्रजत्_ हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेव जी कहते हैं – हे कुरुनन्दन (परीक्षित)! पिता द्वारा इस प्रकार आदेशित होकर परशुराम ने ‘तथास्तु’ कहा। एक वर्ष तक तीर्थयात्रा करने के बाद वे अपने आश्रम लौट आए। स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 1 --- सन्दर्भ स्रोत: 1. श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 15-16 2. वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड, सर्ग 21 3. महाभारत 4. ब्रह्माण्ड पुराण 5. विभिन्न लोक कथाएँ - येल्लम्मा/मरियम्मन देवी -----
🙏परशुराम जयंती🪔📿 - श्री परशुराम भक्त  o श्री परशुराम भक्त  o - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 *'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता'* ___________________ भगवान् के अवतार तो प्रतिक्षण अनन्त-अनन्त हो रहे हैं क्योंकि अनन्त ब्रह्मांड हैं। अतएव वेदव्यास जी कहते हैं कि - अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः । (भागवत १.३.२६) अर्थात् अवतार असंख्य हो चुके हैं, आप जो भी स्वरूप चाहें, मान लें, इतना ही नहीं, यदि कोई स्वरूप ऐसा भी हो सके जिस स्वरूप का अवतार कभी न हुआ हो, आप उसे भी मान सकते हैं एवं उन्हें उसी रूप में आना होगा। भगवान् को भला क्या परिश्रम है रूप धारण करने में। अतएव आप स्वेच्छा से रूप का निर्माण कर सकते हैं। इसी प्रकार स्वेच्छा से रंग आदि भी बना सकते हैं। ईश्वर इतना दयालु है कि उसने ऐसा कोई कड़ा नियम नहीं बनाया या ऐसी कोई पाबन्दी नहीं लगायी, जिससे किसी जीव को आपत्ति हो। इसी से उसे 'अनन्तनामरूपाय' अर्थात् अनन्त नाम, रूप वाला कहा जाता है। उस अनन्त शक्तिमान् को सीमा में बाँधना अपनी ही नासमझी है। अतएव सभी बातों में आपकी स्वेच्छा रखी गयी है। यहाँ तक कि उसके नामों में भी सीमा नहीं रखी गयी है। आप जिस भाषा या देश के हों, अपनी इच्छानुसार नाम रख लें। उसे कोई आपत्ति नहीं। यह भी नहीं है कि कोई नाम छोटा है या कोई बड़ा है; ऐसा सोचना ही अक्षम्य नामापराध है। देखो, भगवान् श्रीकृष्ण को सखा लोग कन्हैया कहा करते थे। मैया यशोदा कृष्ण-बलराम को कनुआँ, बलुआ अथवा लाला ही कहा करती थीं। कहाँ तक कहें, गोपियाँ तो चोर-जार शब्द से ही पुकारती थीं, जिसे सुनने के लिये श्यामसुन्दर व्याकुल रहा करते थे। द्वारिका में 'रणछोर' नाम अधिक प्रिय माना जाता है, जिसका अर्थ है, लड़ाई के मैदान को छोड़कर भागने वाला। भगवान् श्रीकृष्ण जरासंध के भय से भाग कर द्वारिका गये थे। अतएव भक्तों ने उनका नाम रणछोर रख दिया। और इन लीला के नामों में भक्त एवं भगवान् दोनों को रस मिलता है, बशर्ते कि अन्तरंग प्यार हो। प्यार न होने पर तो सारे नाम-रूप व्यर्थ ही से हैं। अतएव नामों में भी शंका न होनी चाहिये कि कौन सा नाम श्रेष्ठ है या किस नाम से नामी शीघ्र मिलेंगे। वस्तुतस्तु भगवान् के वास्तविक भगवत्ता के नामों, रूपों या कार्यों से किसी भक्त को प्यार नहीं होता। अर्जुन ने विराट् रूप देखकर तुरन्त हाथ जोड़ दिये। नाम-रूप तो असामर्थ्य के ही मधुर होते हैं, क्योंकि उसमें यह सोचने का अवसर मिलता है कि देखो भगवान् कितने दयालु हैं, कितने भक्तवत्सल हैं कि एक बेपढ़ी-लिखी गँवारिन ग्वालिन उन्हें चोर-जार शब्द से पुकारती हुई दुत्कार रही है और वे उसके प्यार में विभोर होकर उसकी दुत्कार पर बलिहार जा रहे हैं। अतएव नामों का झगड़ा भी कुछ नहीं रहा। इसी प्रकार लीलाओं के विषय में भी सोच लीजिए। जितनी लीलाएँ राम-कृष्णादि की ग्रन्थों में लिखी हैं, ये तो समुद्र के अपार जल की एक बूँद के बराबर भी नहीं हैं। भगवान् राम-कृष्ण की लीलाएँ तो अनादिकाल से प्रतिक्षण हो रही हैं एवं नित्य नई-नई लीलाएँ हो रही हैं, उन्हें सीमा में बाँधना भोलापन है। 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' अर्थात् अवतार एवं लीलाएँ अनन्त हैं। 'रामायण शतकोटि अपारा' का भी यही अभिप्राय है। यदि कोई चाहे कि हम राम-कृष्णादि या किसी अवतार से नई-नई लीलाएँ करायेंगे जो पहले नहीं हुई, तो यद्यपि यह सोचना भोलापन है कि पहले नहीं हुई, अनन्तकाल की सीमा में तुम्हारी ऐसी कौन सी काल्पनिक लीला है जो नहीं की गयी, फिर भी तुम जैसी लीला चाहो मान लो, यदि नहीं भी की होगी तो उनके लिये करना क्या कठिन है। सारांश में यह समझ लेना चाहिए कि वे तुम्हारी भक्ति के वश में सब कुछ कर सकते हैं। हाँ, यदि कोरी कल्पनामात्र ही होगी, भाव न होगा तो लीला करने, न करने का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। इसी प्रकार उनमें समस्त गुणों का समावेश है एवं वे गुण अनन्तसीमा के हैं। तुम्हें जो गुण प्रिय हों, तुम उन्हीं का अवलंब ले लो। यह आवश्यक नहीं है कि अमुक गुण ही ग्रहण करो। किसी भक्त को संस्कारवश कोई गुण प्रिय लगता है, किसी को कोई गुण प्रिय लगता है, उनमें भेद-भाव न रखना चाहिये, किन्तु स्वयं जो प्रिय लगे, स्वीकार कर लेना चाहिए। इसी प्रकार उनके समस्त धाम भी परस्पर एक ही हैं। जो धाम आपको प्रिय हो, उसे स्वीकार कर लीजिये। यहाँ तक कि वे नरक में भी मिल सकते हैं। ऐसी कोई जगह नहीं जो उनका धाम न हो, किन्तु यह ध्यान रहे कि रूप की भाँति नाम, गुण, लीला, धामादि में भी दिव्य चिन्मय भाव बना रहे। रामायण के अनुसार - *प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।* अर्थात् भगवान् समान रूप से सर्वत्र रहते हैं, और यदि कोई असमान यानी विशेष रूप से साकार रूप में चाहे तो भी सर्वत्र रह सकते हैं। फिर भी जिस धाम से विशेष प्यार हो उसको अपना लेना चाहिये। भेद-भाव न रखना चाहिये। इसी प्रकार उनके भक्तों में भी समझ लेना चाहिये कि उनके सभी भक्त एक से हैं। हमें जिस भक्त के द्वारा विशेष लाभ हो, उसको अपना लेना चाहिये, अन्य में दुर्भावना न रखनी चाहिये। यह प्रमुख स्मरणीय है कि भगवान् के अनन्त नाम, अनन्त रूप, अनन्त गुण, अनन्त लीलाएँ, अनन्त धाम एवं अनन्त जन हैं, जो परस्पर सब के सब एक ही हैं। सब में सब रहते हैं। अतएव किसी एक के अवलम्ब से भी ईश्वरप्राप्ति हो सकती है। उनमें परस्पर भेद-भाव रखना नामापराध है। हाँ, स्वयं की रुचि जहाँ पर हो उसका सेवन कर लें। बस, इससे अधिक बुद्धि का प्रयोग न करें। प्रायः विश्व में ऐसा होता है कि एक नाम-रूप-गुणादि के उपासक अन्य नाम-रूपादिकों के उपासक की निन्दा करते हैं। यह महत्तम भूल है। यदि आप कहें कि पुराणादिकों में विरोध सा दिखता है, पर ध्यान रहे कि वह विरोध परिहासयुक्त रसिकता की शैली मात्र है, एवं अपने इष्ट में विशेष निष्ठा-जनक मात्र है, वास्तविक निन्दा नहीं है। शास्त्र कहते हैं कि - *'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुम्'* अर्थात् निन्दा का अभिप्राय केवल अपने पक्ष की स्तुति में ही है। *प्रवचनांश- जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज*
🕉️सनातन धर्म🚩 - रसना ते हरि बोल्ना गोरविंद रादे$ ?೫ TiR ?# ಶFಣr ಠತ 51ತ್ತಣಗಣ 9T ತ್ಾಐರ್ರ ಶಷಸಖ रसना ते हरि बोल्ना गोरविंद रादे$ ?೫ TiR ?# ಶFಣr ಠತ 51ತ್ತಣಗಣ 9T ತ್ಾಐರ್ರ ಶಷಸಖ - ShareChat
#🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 अक्षय तृतीया — सच में “अक्षय” क्या है, या हम खुद को बहला रहे हैं? आज अक्षय तृतीया है… और हर साल की तरह आज भी एक ही शोर है “आज सोना खरीदो… बरकत बढ़ेगी…” ज्वेलरी शॉप्स भरी हुई हैं… ऑनलाइन ऑफर्स चल रहे हैं… लोग EMI पर भी गोल्ड ले रहे हैं… लेकिन कोई ये नहीं पूछ रहा… क्या हम सच में “बरकत” खरीद सकते हैं? कड़वी बात है, लेकिन सच है… अगर सोना खरीदने से बरकत आती… तो सबसे अमीर लोग सबसे ज्यादा खुश होते। पर असलियत क्या है? * पैसा है… पर सुकून नहीं * घर है… पर अपनापन नहीं * दिखावा है… पर दिल खाली है “अक्षय” का मतलब है — जो कभी खत्म न हो तो ज़रा ईमानदारी से जवाब दो… * क्या आपका खरीदा हुआ सोना कभी बिक नहीं सकता? * क्या मुसीबत में वही सोना सबसे पहले नहीं निकलता? फिर वो “अक्षय” कैसे हुआ? सच तो ये है… हमने एक आध्यात्मिक दिन को मार्केटिंग का त्योहार बना दिया है जहाँ भावनाओं से ज्यादा ऑफर्स बिक रहे हैं और आस्था से ज्यादा डिस्काउंट चल रहा है सोचिए… एक तरफ वो लोग हैं जो आज हजारों का सोना खरीद रहे हैं… और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो आज भी दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रहे हैं। अगर “अक्षय” का मतलब सच में बढ़ती हुई बरकत है… तो क्या किसी भूखे को खाना खिलाना ज्यादा “अक्षय” नहीं है? शायद असली अक्षय तृतीया ये नहीं है कि आप क्या खरीदते हो… बल्कि ये है कि आप क्या देते हो * किसी की मदद * किसी का दर्द समझना * बिना मतलब के अच्छा करना ये चीज़ें कभी खत्म नहीं होतीं… और शायद ऊपर वाला भी इसी का हिसाब रखता है… ना कि आपके गोल्ड बिल का। आज अगर सच में कुछ “अक्षय” बनाना है… तो अपने बैंक बैलेंस से नहीं… अपने कर्मों से बनाइए। सच-सच बताइए… आपके हिसाब से अक्षय तृतीया आस्था का दिन है… या फिर एक और “खरीदारी का बहाना”?
🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 - जो चीज़ कल बिक सकती है, वो आज ' अक्षय नहीं हो सकती. आज आप सोना जोड़ रहे हो, और ऊपर वाला आपके कर्म.. ! जो चीज़ कल बिक सकती है, वो आज ' अक्षय नहीं हो सकती. आज आप सोना जोड़ रहे हो, और ऊपर वाला आपके कर्म.. ! - ShareChat
#☝अनमोल ज्ञान वाँ छत्रपति शिवाजी राजे (भोसले) जन्म दिवस (तारीख प्रमाण) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में सभी लोग जानते हैं। बहुत से लोग इन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते हैं तो कुछ लोग इन्हें मराठा गौरव कहते हैं, जबकि वे भारतीय गणराज्य के महानायक थे। कुछ लोग मानते हैं कि शिवाजी की जन्मतिथि अंग्रेजी कैलेंडर के आधार पर तय की जानी चाहिए। इस बात में भेद बिल्कुल नही होना चाहिये क्योंकि तारीख अंग्रेजी कलेंडर अनुसार मानी जाती है और तिथि भारतीय पञ्चाङ्ग अनुसार जो कि सर्वदा उचित भी है इसका कारण यह है कि तिथि अनुसार जन्मदिवस अथवा पुण्य तिथि के दिन अधिकांश ग्रह नक्षत्र जन्म अथवा मृत्यु के समय वाले ही रहते है उन्ही ग्रह नक्षत्रों में व्यक्ति विशेष के प्रति किये गए दान पुण्य का पूर्ण फल मिलता है। शिवाजी की जन्मतारीख अंग्रेजी कलेंडर अनुसार 19 फरवरी 1630 है. वहीं पंचांग के अनुसार, वीरशिवाजी का जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया और तृतीया तिथि के मध्य 1551 शक संवत्सर में मानते है। शिवाजी महाराज व्यक्तिगत विवरण 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पूरा नाम – शिवाजी राजे भोंसले उप नाम – छत्रपति शिवाजी महाराज जन्म – 19 फ़रवरी 1630, शिवनेरी दुर्ग, महाराष्ट्र मृत्यु – 3 अप्रैल 1680, महाराष्ट्र पिता का नाम – शाहजी भोंसले माता का नाम – जीजाबाई शादी – सईबाई निम्बालकर के साथ, लाल महल पुणे में सन 14 मई 1640 में हुई। शिवाजी महाराज की जीवनी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हमारा देश वीर शासको और राजाओं की पृष्ठभूमि रहा है. इस धरती पर ऐसे महान शासक पैदा हुए है जिन्होंने अपनी योग्यता और कौशल के दम पर इतिहास में अपना नाम बहुत ही स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया है. ऐसे ही एक महान योद्धा और रणनीतिकार थे – छत्रपति शिवाजी महाराज. वे शिवाजी महाराज ही थे जिन्होंने भारत में मराठा साम्राज्य की नीवं रखी थीं। शिवाजी जी ने कई सालों तक मुगलों के साथ युद्ध किया था. सन 1674 ई. रायगड़ महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया गया था, तब से उन्हें छत्रपति की उपाधि प्रदान की गयी थीं. इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोसलें था और छत्रपति इनको उपाधि में मिली थी. शिवाजी महाराज ने अपनी सेना, सुसंगठित प्रशासन इकाईयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया था। शिवाजी महाराज ने भारतीय सामाज के प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं और मराठी एवं संस्कृत को राजाओं की भाषा शैली बनाया था. शिवाजी महाराज अपने शासनकाल में बहुत ही ठोस और चतुर किस्म के राजा थे. लोगो ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र से सीख लेते हुए भारत की आजादी में अपना खून तक बहा दिया था। शिवाजी महाराज का आरम्भिक जीवन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था. इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था. शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास हैं, शिवाजी का ज्यादा जीवन अपने माता जीजाबाई के साथ बीता था. शिवाजी महाराज बचपन से ही काफी तेज और चालाक थे. शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध कला और राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली थी। भोसलें एक मराठी क्षत्रिय हिन्दू राजपूत की एक जाति हैं. शिवाजी के पिता भी काफी तेज और शूरवीर थे. शिवाजी महाराज के लालन-पालन और शिक्षा में उनके माता और पिता का बहुत ही ज्यादा प्रभाव रहा हैं. उनके माता और पिता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं को बताती थीं. खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थी जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था. शिवाजी महाराज की शादी सन 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ हुई थीं। एक सैनिक के रूप में शिवाजी महाराज का वर्चस्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सन 1640 और 1641 के समय बीजापुर महाराष्ट्र पर विदेशियों और राजाओं के आक्रमण हो रहे थें. शिवाजी महाराज मावलों को बीजापुर के विरुद्ध इकट्ठा करने लगे. मावल राज्य में सभी जाति के लोग निवास करते हैं, बाद में शिवाजी महाराज ने इन मावलो को एक साथ आपस में मिलाया और मावला नाम दिया. इन मावलों ने कई सारे दुर्ग और महलों का निर्माण करवाया था। इन मावलो ने शिवाजी महाराज का बहुत ज्यादा साथ दिया. बीजापुर उस समय आपसी संघर्ष और मुगलों के युद्ध से परेशान था जिस कारण उस समय के बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गो से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों में सौप दी दिया था। तभी अचानक बीजापुर के सुल्तान बीमार पड़ गए थे और इसी का फायदा देखकर शिवाजी महाराज ने अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी ने बीजापुर के दुर्गों को हथियाने की नीति अपनायी और पहला दुर्ग तोरण का दुर्ग को अपने कब्जे में ले लिया था। शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ तोरण का दुर्ग पूना (पुणे) में हैं. शिवाजी महाराज ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना एक दूत भेजकर खबर भिजवाई की अगर आपको किला चाहिए तो अच्छी रकम देनी होगी, किले के साथ-साथ उनका क्षेत्र भी उनको सौपं दिया जायेगा. शिवाजी महाराज इतने तेज और चालाक थे की आदिलशाह के दरबारियों को पहले से ही खरीद लिया था। शिवाजी जी के साम्राज्य विस्तार नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली थी तब वह देखते रह गया. उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिये कहा लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया था और लगान देना भी बंद कर दिया था. वे 1647 ई. तक चाकन से लेकर निरा तक के भू-भाग के भी मालिक बन चुके थें. अब शिवाजी महाराज ने पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों की और चलना शुरू कर दिया था. शिवाजी जी ने कोंकण और कोंकण के 9 अन्य दुर्गों पर अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी महाराज को कई देशी और कई विदेशियों राजाओं के साथ-साथ युद्ध करना पड़ा था और सफल भी हुए थे। शाहजी की बंदी और युद्ध बंद करने की घोषणा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ बीजापुर के सुल्तान शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही गुस्से में था. सुल्तान ने शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बनाने का आदेश दिया था. शाहजी उनके पिता उस समय कर्नाटक राज्य में थें और दुर्भाग्य से शिवाजी महाराज के पिता को सुल्तान के कुछ गुप्तचरों ने बंदी बना लिया था. उनके पिता को एक शर्त पर रिहा किया गया कि शिवाजी महाराज बीजापुर के किले पर आक्रमण नहीं करेगा. पिताजी की रिहाई के लिए शिवाजी महाराज ने भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए 5 सालों तक कोई युद्ध नहीं किया और तब शिवाजी अपनी विशाल सेना को मजबूत करने में लगे रहे। शिवाजी महाराज का राज्य विस्तार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शाहजी की रिहा के समय जो शर्ते लागू की थी उन शर्तो में शिवाजी ने पालन तो किया लेकिन बीजापुर के साउथ के इलाकों में अपनी शक्ति को बढ़ाने में ध्यान लगा दिया था पर इस में जावली नामक राज्य बीच में रोड़ा बना हुआ था. उस समय यह राज्य वर्तमान में सतारा महाराष्ट्र के उत्तर और वेस्ट के कृष्णा नदी के पास था. कुछ समय बाद शिवाजी ने जावली पर युद्ध किया और जावली के राजा के बेटों ने शिवाजी के साथ युद्ध किया और शिवाजी ने दोनों बेटों को बंदी बना लिया था और किले की सारी संपति को अपने कब्जे में ले लिया था और इसी बीच कई मावल शिवाजियो के साथ मिल गए थे। मुगलों से पहला मुकाबला 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद साउथ भारत की तरफ गया. उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था. औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था. शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने 3 साल तक लूटपाट की। एक बार शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था तब शाइस्ता खान अपनी जान निकालकर भाग खड़ा हुआ और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 4 उँगलियाँ खोनी पड़ी. इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया था. उसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया था। सूरत की लूट 〰️〰️〰️〰️ इस जीत से शिवाजी की शक्ति ओर मजबूत हो गयी थीं. लेकिन 6 साल बाद शाइस्ताखान ने अपने 15,000 सैनिको के साथ मिलकर राजा शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया था. बाद में शिवाजी ने इस तबाही को पूरा करने के लिये मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी. सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था. शिवाजी ने 4 हजार सैनिको के साथ सूरत के व्यापारियों को लुटा लेकिन उन्होंने किसी भी आम आदमी को अपनी लुट का शिकार नहीं बनाया। आगरा में आमन्त्रित और पलायन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया है. इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया. औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और शिवाजी पर 500 सैनिको का पहरा लगा दिया. कुछ ही दिनों बाद 1666 को शिवाजी महाराज को जान से मारने का औरंगजेब ने इरादा बनाया था लेकिन अपने बेजोड़ साहस और युक्ति के साथ शिवाजी और संभाजी दोनों कैद से भागने में सफल हो गये। संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गये थे और बाद में सकुशल राजगड आ गये. औरंगजेब ने जयसिंह पर शक आया और उसने विष देकर उसकी हत्या करा दी. जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दूसरी बार संधि की. 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लुटा था, यहाँ से शिवाजी को 132 लाख की संपति हाथ लगी और शिवाजी ने मुगलों को सूरत में फिर से हराया था। शिवाजी महाराज का राज्यभिषेक 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरंदर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे. बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से मिलते हुए प्रमाण भेजे थें. इस कार्यक्रम में विदेशी व्यापारियों और विभिन्न राज्यों के दूतों को इस समारोह में बुलाया था. शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की और काशी के पंडित भट्ट को इसमें समारोह में विशेष रूप से बुलाया गया था. शिवाजी के राज्यभिषेक करने के 12वें दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था और फिर दूसरा राज्याभिषेक हुआ। शिवाजी महाराज की मृत्यु और वारिस 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिवाजी अपने आखिरी दिनों में बीमार पड़ गये थे और 3 अप्रैल 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गयी थी. उसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी को राजगद्दी मिली. उस समय मराठों ने संभाजी को अपना नया राजा मान लिया था. शिवाजी की मौत के बाद औरंगजेब ने पुरे भारत पर राज्य करने की अभिलाषा को पूरा करने के लिए अपनी 5,00,000 सेना को लेकर दक्षिण भारत का रूख किया इसी समय औरंगजेब के पुत्र ने विद्रोह कर दिया तब संभाजी ने उसे शरण दी लेकिन औरंगजेब ने विद्रोह शांत होने पर सम्भाजी को बंदी बनाकर मृत्यु कर दी। इसके बाद संभाजी के छोटे भाई राजाराम ने मराठो की गद्दी संभाली। 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी थी उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्ष के पुत्र शिवाजी 2 की सरंक्षण बनकर राज्य किया। आखिरकार 25 साल मराठा स्वराज से युद्ध और थके हुए औरंगजेब को उसी छत्रपति शिवाजी के स्वराज में दफन किये गया। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
☝अनमोल ज्ञान - 419 47 छत्रपति शिवाजी হাতী (ন্মীমল) जन्म दिवस (तारीख प्रमाण) 419 47 छत्रपति शिवाजी হাতী (ন্মীমল) जन्म दिवस (तारीख प्रमाण) - ShareChat
हयग्रीव अवतार जन्मोत्सव विशेष #🥳अक्षय तृतीया सेलिब्रेशन🎊🙏 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नारायण के हयग्रीव अवतार की कथा 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ ऋषि बोले — हे सूत जी ! आप के यह आश्चर्यजनक वचन सुन कर हम सब के मन में अत्याधिक संदेह हो रहा हे. सब के स्वामी श्री जनार्धन माधव का सिर उनके शरीर से अलग हो गया !! और उस के बाद वे हयग्रीव कहलाये गये – अश्व मुख वाले . आह ! इस से अधिक और आश्चर्यजनक क्या हो सकता हे. जिनकी वेद भी प्रशंसा करते हैं, देवता भी जिसपर निर्भर हैं, जो सभी कारणों के भी कारण हैं, आदिदेव जगन्नाथ, आह ! यह कैसे हुआ कि उनका भी सिर कट गया ! हे परम बुद्धिमान ! इस वृत्तांत का विस्टा से वर्णन कीजिये। सूत जी बोले — हे मुनियों, देवों के देव, परम शक्तिशाली, विष्णु के महान कृत्य को ध्यान से सुनें. एक समय की बात है। हयग्रीव नाम का एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तट पर जाकर भगवती महामाया की प्रसन्नता के लिए बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनों तक बिना कुछ खाए भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामंत्र का जाप करता रहा। उसकी इंद्रियां उसके वश में हो चुकी थीं। सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, ‘‘महाभाग! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम पर परम प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करने के लिए तैयार हूं। वत्स! वर मांगो।’’ भगवती की दया और प्रेम से ओत-प्रोत वाणी को सुनकर हयग्रीव की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसके नेत्र आनंद के अश्रुओं से भर गए। उसने भगवती की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘हे कल्याणमयी देवि! आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें।’’ देवी ने कहा, ‘‘दैत्य राज! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता। किसी का सदा के लिए अमर होना असंभव है। अमर देवताओं को भी पुण्य समाप्त होने पर मृत्यु लोक में जाना पड़ता है। अत: तुम अमरत्व के अतिरिक्त कोई और वर मांगो।’’ हयग्रीव बोला, ‘‘अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्यु हो। दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मन की यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करने की कृपा करें।’’ ‘ऐसा ही होगा’। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव असीम आनंद का अनुभव करते हुए अपने घर चला गया। वह देवी के वर के प्रभाव से अजेय हो गया। त्रिलोकी में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट को मार सके। उसने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगडऩे लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान विष्णु के पास गए, किन्तु वे योगनिद्रा में निमग्र थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर टंकार हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं के दुख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटना को देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा, ‘‘देवताओ चिंता मत करो। मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्मा जी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे।’’ ऐसा कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गई। भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया। भगवती के कृपा प्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया। हयग्रीव स्तोत्र 〰️〰️〰️〰️ श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥ ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवम् उपास्महे ॥ १ ॥ स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिकमणि भूभृत्प्रतिभटं । सुधा सध्रीचीभिर् धुतिभिर् अवदातत्रिभुवनम्। अनन्तैस्त्रय्यन्तैर् अनुविहित हेषा हलहलं । हताशेषावद्यं हयवदन मीडी महि महः ॥ २ ॥ समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां । लयः प्रत्यूहानां लहरि विततिर्बोधजलधेः । कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं । हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदन हेषा हलहलः ॥ ३ ॥ प्राची सन्ध्या काचिदन्तर् निशायाः । प्रज्ञादृष्टेरञ्जन श्रीरपूर्वा । वक्त्री वेदान् भातु मे वाजि वक्त्रा । वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ ४ ॥ विशुद्ध विज्ञान घन स्वरूपं । विज्ञान विश्राणन बद्ध दीक्षम् । दयानिधिं देहभृतां शरण्यं । देवं हयग्रीवम् अहं प्रपद्ये ॥ ५ ॥ अपौरुषेयैर् अपि वाक्प्रपञ्चैः । अद्यापि ते भूति मदृष्ट पाराम् । स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव । कारुण्यतो नाथ कटाक्षणीयः ॥ ६ ॥ दाक्षिण्य रम्या गिरिशस्य मूर्तिः । देवी सरोजासन धर्मपत्नी । व्यासादयोऽपि व्यपदेश्य वाचः । स्फुरन्ति सर्वे तव शक्ति लेशैः ॥ ७ ॥ मन्दोऽभविष्यन् नियतं विरिञ्चो । वाचां निधे वञ्चित भाग धेयः । दैत्यापनीतान् दययैव भूयोऽपि । अध्यापयिष्यो निगमान् न चेत् त्वम् ॥ ८ ॥ वितर्क डोलां व्यवधूय सत्वे । बृहस्पतिं वर्तयसे यतस्त्वम् । तेनैव देव त्रिदशेश्वराणाम् । अस्पृष्ट डोलायित माधिराज्यम् ॥ ९ ॥ अग्नोउ समिद्धार्चिषि सप्ततन्तोः । आतस्थिवान् मन्त्रमयं शरीरम् । अखण्ड सारैर् हविषां प्रदानैः । आप्यायनं व्योम सदां विधत्से ॥ १० ॥ यन्मूलमीदृक् प्रतिभाति तत्वं । या मूलमाम्नाय महाद्रुमाणाम् । तत्वेन जानन्ति विशुद्ध सत्वाः । त्वाम् अक्षराम् अक्षर मातृकां ते ॥ ११ ॥ अव्याकृताद् व्याकृत वानसि त्वं । नामानि रूपाणि च यानि पूर्वम् । शंसन्ति तेषां चरमां प्रतिष्टां । वागीश्वर त्वां त्वदुपज्ञ वाचः ॥ १२ ॥ मुग्धेन्दु निष्यन्द विलोभ नीयां । मूर्तिं तवानन्द सुधा प्रसूतिम् । विपश्चितश्चेतसि भावयन्ते । वेला मुदारामिव दुग्ध सिन्धोः ॥ १३ ॥ मनोगतं पश्यति यः सदा त्वां । मनीषिणां मानस राज हंसम् । स्वयं पुरोभाव विवादभाजः । किंकुर्वते तस्य गिरो यथार्हम् ॥ १४।। अपि क्षणार्धं कलयन्ति ये त्वां । आप्लावयन्तं विशदैर् मयूखैः । वाचां प्रवाहैर् अनिवारितैस्ते । मन्दाकिनीं मन्दयितुं क्षमन्ते ॥ १५ ॥ स्वामिन् भवद्ध्यान सुधाभिषेकात् । वहन्ति धन्याः पुलकानुबन्धम् । अलक्षिते क्वापि निरूढ मूलं । अङ्गेष्विवानन्दथुम् अङ्कुरन्तम् ॥ १६ ॥ स्वामिन् प्रतीचा हृदयेन धन्याः । त्वद्ध्यान चन्द्रोदय वर्धमानम् । अमान्त मानन्द पयोधिमन्तः । पयोभिरक्ष्णां परिवाहयन्ति ॥ १७ ॥ स्वैरानुभावास् त्वदधीन भावाः । समृद्ध वीर्यास् त्वदनुग्रहेण । विपश्चितो नाथ तरन्ति मायां । वैहारिकीं मोहन पिञ्छिकां ते ॥ १८ ॥ प्राङ् निर्मितानां तपसां विपाकाः । प्रत्यग्र निश्श्रेयस संपदो मे । समेधिषीरंस्तव पाद पद्मे । संकल्प चिन्तामणयः प्रणामाः ॥ १९ ॥ विलुप्त मूर्धन्य लिपिक्र माणां । सुरेन्द्र चूडापद लालितानाम् । त्वदंघ्रि राजीव रजः कणानां । भूयान् प्रसादो मयि नाथ भूयात् ॥ २० ॥ परिस्फुरन् नूपुर चित्रभानु । प्रकाश निर्धूत तमोनुषङ्गाम् । पदद्वयीं ते परिचिन् महेऽन्तः । प्रबोध राजीव विभात सन्ध्याम् ॥ २१ ॥ त्वत् किङ्करा लंकरणो चितानां । त्वयैव कल्पान्तर पालितानाम् । मञ्जुप्रणादं मणिनूपुरं ते । मञ्जूषिकां वेद गिरां प्रतीमः ॥ २२ ॥ संचिन्तयामि प्रतिभाद शास्थान् । संधुक्षयन्तं समय प्रदीपान् । विज्ञान कल्पद्रुम पल्लवाभं । व्याख्यान मुद्रा मधुरं करं ते ॥ २३ ॥ चित्ते करोमि स्फुरिताक्षमालं । सव्येतरं नाथ करं त्वदीयम् । ज्ञानामृतो दञ्चन लम्पटानां । लीला घटी यन्त्र मिवाश्रितानाम् ॥ २४ ॥ प्रबोध सिन्धोररुणैः प्रकाशैः । प्रवाल सङ्घात मिवोद्वहन्तम् । विभावये देव सपुस्तकं ते । वामं करं दक्षिणम् आश्रितानाम् ॥ २५ ॥ तमांसि भित्वा विशदैर्मयूखैः । संप्रीणयन्तं विदुषश्चकोरान् । निशामये त्वां नव पुण्डरीके । शरद्घने चन्द्रमिव स्फुरन्तम् ॥ २६ ॥ दिशन्तु मे देव सदा त्वदीयाः । दया तरङ्गानुचराः कटाक्षाः । श्रोत्रेषु पुंसाम् अमृतं क्षरन्तीं । सरस्वतीं संश्रित कामधेनुम् ॥ २७ ॥ विशेष वित्पारिष देषु नाथ । विदग्ध गोष्ठी समराङ्गणेषु । जिगीषतो मे कवितार्कि केन्द्रान् । जिह्वाग्र सिंहासनम् अभ्युपेयाः ॥ २८ ॥ त्वां चिन्तयन् त्वन्मयतां प्रपन्नः । त्वामुद्गृणन् शब्द मयेन धाम्ना । स्वामिन् समाजेषु समेधिषीय । स्वच्छन्द वादाहव बद्ध शूरः ॥ २९ ॥ नाना विधानामगतिः कलानां । न चापि तीर्थेषु कृतावतारः । ध्रुवं तवानाथ परिग्रहायाः । नवं नवं पात्रमहं दयायाः ॥ ३० ॥ अकम्पनीयान् यपनीति भेदैः । अलंकृषीरन् हृदयं मदीयम् । शङ्का कलङ्का पगमोज्ज्वलानि । तत्वानि सम्यञ्चि तव प्रसादात् ॥ ३१ ॥ व्याख्या मुद्रां करसरसिजैः पुस्तकं शङ्क चक्रे । बिभ्रद् भिन्नस्फटिक रुचिरे पुण्डरीके निषण्णः । अम्लानश्रीर् अमृत विशदैर् अंशुभिः प्लावयन् मां । आविर्भूया दनघ महिमा मानसे वाग धीशः ॥ ३२ ॥ वागर्थ सिद्धिहेतोः । पठत हयग्रीव संस्तुतिं भक्त्या । कवितार्किक केसरिणा । वेङ्कट नाथेन विरचिता मेताम् ॥ ३३ ॥ ॥ इति श्रीहयग्रीवस्तोत्रं समाप्तम् ॥ साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
🥳अक्षय तृतीया सेलिब्रेशन🎊🙏 - हयग्रीव अवतार जन्मोत्सव रविवार १९ अप्रैल विशेष हयग्रीव अवतार जन्मोत्सव रविवार १९ अप्रैल विशेष - ShareChat
नर नारायण जन्मोत्सव विशेष #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🥳अक्षय तृतीया सेलिब्रेशन🎊🙏 〰️〰️🌸〰️🌸〰️🌸〰️〰️ कथा नर और नारायण की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे। आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा। भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है। वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है। बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है। उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं। बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं। सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये। ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये। उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है। इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म। अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए। उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए। क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए। उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए। ये सब अधर्म की सन्तति है। ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति - ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ। प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की। उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया। एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को। जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति। धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई। सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया। जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया। क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है। वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है। नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की। अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा। पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी। अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी। दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये। बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं। श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है। नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है। इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।' भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण. कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ। केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी। *केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति* भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें। नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो। नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए। दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है। महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 - नर नारायण जन्मोत्सव विशेष नर नारायण जन्मोत्सव विशेष - ShareChat