#श्रुमहाभारतकथा-3️⃣0️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
नवनवतितमोऽध्यायः
महर्षि वसिष्ठ द्वारा वसुओं को शाप प्राप्त होने की कथा...(दिन 306)
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नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान् यदन्नुवम् । न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ।। ४० ।।
'मैंने क्रोधमें आकर तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है, उसे असत्य करना नहीं चाहता। ये महामना द्यो मनुष्यलोकमें संतानकी उत्पत्ति नहीं करेंगे ।। ४० ।।
भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः । पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान् वर्जयिष्यति ।। ४१ ।।
'और धर्मात्मा तथा सब शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् होंगे; पिताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग कर देंगे' ।। ४१ ।।
एवमुक्त्वा वसून् सर्वान् स जगाम महानृषिः । ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ।। ४२ ।।
उन सब वसुओंसे ऐसी बात कहकर वे महर्षि वहाँसे चल दिये। तब वे सब वसु एकत्र होकर मेरे पास आये ।। ४२ ।।
अयाचन्त च मां राजन् वरं तच्च मया कृतम् । जाताञ्जातान् प्रक्षिपास्मान् स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि ।। ४३ ।।
राजन् ! उस समय उन्होंने मुझसे याचना की और मैंने उसे पूर्ण किया। उनकी याचना इस प्रकार थी 'गंगे ! हम ज्यों-ज्यों जन्म लें, तुम स्वयं हमें अपने जलमें डाल देना' ।। ४३ ।।
एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम । मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद् यथावत् कृतवत्यहम् ।। ४४ ।।
राजशिरोमणे ! इस प्रकार उन शापग्रस्त वसुओंको इस मनुष्यलोकसे मुक्त करनेके लिये मैंने यथावत् प्रयत्न किया है ।। ४४ ।।
अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम ।
द्यौ राजन् मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ।। ४५ ।।
भारत ! नृपश्रेष्ठ ! यह एकमात्र द्यो ही महर्षिके शापसे दीर्घकालतक मनुष्यलोकमें निवास करेगा ।। ४५ ।।
(अयं देवव्रतश्चैव गङ्गादत्तश्च मे सुतः । द्विनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।। अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति । अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप ।।)
राजन् ! मेरा यह पुत्र देवव्रत और गंगादत्त-दो नामोंसे विख्यात होगा। आपका बालक गुणोंमें आपसे भी बढ़कर होगा। (अच्छा, अब जाती हूँ) आपका यह पुत्र अभी शिशु-अवस्थामें है। बड़ा होनेपर फिर आपके पास आ जायगा और आप जब मुझे बुलायेंगे तभी मैं आपके सामने उपस्थित हो जाऊँगी।
वैशम्पायन उवाच
एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ।। ४६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! ये सब बातें बताकर गंगादेवी उस नवजात शिशुको साथ ले वहीं अन्तर्धान हो गयीं और अपने अभीष्ट स्थानको चली गयीं ।। ४६ ।।
स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् ।
द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ।। ४७ ।।
उस बालकका नाम हुआ देवव्रत। कुछ लोग गांगेय भी कहते थे। द्यु नामवाले वसु शान्तनुके पुत्र होकर गुणोंमें उनसे भी बढ़ गये ।। ४७ ।।
शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः।
तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान् गुणान् ।। ४८ ।।
इधर शान्तनु शोकसे आतुर हो पुनः अपने नगरको लौट गये। शान्तनुके उत्तम गुणोंका मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा ।। ४८ ।।
महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः । यस्येतिहासो द्युतिमान् महाभारतमुच्यते ।। ४९ ।।
उन भरतवंशी महात्मा नरेशके महान् सौभाग्यका भी मैं वर्णन करूँगा, जिनका उज्ज्वल इतिहास 'महाभारत' नामसे विख्यात है ।। ४९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आपवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्यायः।। ९९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आपवोपाख्यानविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१५७
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
छिहत्तरवाँ सर्ग
राजा दशरथका अन्त्येष्टिसंस्कार
इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए, केकयीकुमार भरतसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठने उत्तम वाणीमें कहा—'महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जानेवाला नहीं है॥१॥
अब समयोचित कर्तव्यपर ध्यान दो। राजा दशरथके शवको दाहसंस्कारके लिये ले चलनेका उत्तम प्रबन्ध करो'॥२॥
वसिष्ठजीका वचन सुनकर धर्मज्ञ भरतने पृथ्वीपर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियोंद्वारा पिताके सम्पूर्ण प्रेतकर्मका प्रबन्ध करवाया॥३॥
राजा दशरथका शव तेलके कड़ाहसे निकालकर भूमिपर रखा गया। अधिक समयतक तेलमें पड़े रहनेसे उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों॥४॥
तदनन्तर मृत राजा दशरथको धो-पोंछकर नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे—॥५॥
'राजन्! मैं परदेशमें था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तबतक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर आपने इस तरह स्वर्गमें जानेका निश्चय कैसे कर लिया?॥६॥
'महाराज! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे हीन इस दुःखी सेवकको छोड़ आप कहाँ चले जायँगे?॥७॥
'तात! आप स्वर्गको चल दिये और श्रीरामने वनका आश्रय लिया—ऐसी दशामें आपके इस नगरमें निश्चिन्ततापूर्वक प्रजाके योगक्षेमकी व्यवस्था कौन करेगा?॥८॥
'राजन्! आपके बिना यह पृथ्वी विधवाके समान हो गयी है, अतः इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रिके समान श्रीहीन प्रतीत होती है'॥९॥
इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरतसे महामुनि वसिष्ठने फिर कहा—॥१०॥
'महाबाहो! इन महाराजके लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो'॥११॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर भरतने वसिष्ठजीकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य—सबको इस कार्यके लिये जल्दी करनेको कहा—॥१२॥
राजाकी अग्निशालासे जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकोंद्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया॥१३॥
तत्पश्चात् महाराज दशरथके प्राणहीन शरीरको पालकीमें बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमिको ले चले। उस समय आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था॥१४॥
मार्गमें राजकीय पुरुष राजाके शवके आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र लुटाते चलते थे॥१५॥
श्मशानभूमिमें पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसीने चन्दन लाकर रखा तो किसीने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारुकी लकड़ियाँ ला-लाकर चितामें डालने लगे। कुछ लोगोंने तरह-तरहके सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजोंने राजाके शवको चितापर रखा॥१६-१७॥
उस समय अग्निमें आहुति देकर उनके ऋत्विजोंने वेदोक्त मन्त्रोंका जप किया। सामगान करनेवाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धतिके अनुसार साम-श्रुतियोंका गायन करने लगे॥१८॥
(इसके बाद चितामें आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथकी कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकोंसे घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथोंपर आरूढ़ होकर नगरसे निकलीं तथा शोकसे संतप्त हो श्मशानभूमिमें आकर अश्वमेधान्त यज्ञोंके अनुष्ठाता राजा दशरथके शवकी परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजोंने भी उस शवकी परिक्रमा की॥१९-२०॥
उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियोंका आर्तनाद कुररियोंके चीत्कारके समान सुनायी देता था॥२१॥
दाहकर्मके पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियोंसे ही सरयूके तटपर जाकर उतरीं॥२२॥
भरतके साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितोंने भी राजाके लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए नगरमें आये और दस दिनोंतक भूमिपर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःखसे अपना समय व्यतीत किया॥२३॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७६॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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🎉🎊बधाई बधाई बधाई 🎊🎉
🎊🎋बधाईयाँ बधाईयाँ "श्री वल्लभ के लाडले,सभी वैष्णवों के दुलारे,निकुंजनायक श्रीनाथजी के पाटोत्सव की आप सभी को खुब खुब मंगल बधाई...
श्रीहरिरायजी आज्ञा करते हैं कि अंहकार करना दास का धर्म नहीं हैं ऐसा अंहकार करने से स्वधर्म जो दास धर्म है उसका नाश हो जाता हैं।अतः वैष्णव जो भगवान के दास हैं उनके लिये अपने स्वामी श्रीकृष्णचन्द्र की अधीनता की भावना ही कर्तव्य हैं।
राग - रसिया
_*दरसन दो नाथ ध्वजाधारी।तिहारे दरस कों मन तलफत हे तीन लोक महिमा भारी।।१।।ब्रज कूं छोड़ मेवाड़ बसायो यो मेवाड़ लगे प्यारी।।सूरदास प्रभु तिहारे मिलन कूं मंदिर भीर भई भारी।।२।।*_
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#श्रीनाथजी नाथद्वारा
हमें ईश्वर से नहीं, अपने आप से डरना चाहिए!!
क्योंकि पाप हम करते हैं, ईश्वर नहीं।
🚩 जय श्री राम 🚩
🙇♂ जय श्री कृष्ण 🙇♂
#🙏 प्रेरणादायक विचार
#☝आज का ज्ञान #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🌟 मात्र 2 मिनट का दैनिक अभ्यास और इस जन्म में भगवद्-प्राप्ति निश्चित! 🌟
श्रीमद्भागवत पुराण साक्षी है कि राजा खट्वांग को केवल दो घड़ी में भगवान के दर्शन हो गए थे। यह तीनों प्रार्थनाएँ वेदों और पुराणों का सार हैं। यदि आप प्रतिदिन केवल दो मिनट निकालकर सच्चे मन से ये तीन प्रार्थनाएँ करें, तो प्रभु की प्राप्ति इसी जन्म में संभव है।
👇 वे तीन चमत्कारी प्रार्थनाएँ 👇
1️⃣ पहली प्रार्थना (रात को सोते समय): 🛌
‘‘हे मेरे प्राणनाथ गोविंद! जब मेरी मौत आवे और मेरे अंतिम सांस के साथ, जब आप मेरे तन से बाहर निकलो तब आपका नाम उच्चारण करवा देना। भूल मत करना।’’ 🙏
2️⃣ दूसरी प्रार्थना (प्रातःकाल उठते ही): ☀️
‘‘हे मेरे प्राणनाथ! इस समय से लेकर रात को सोने तक, मैं जो कुछ भी कर्म करूँ, वह सब आपका समझ कर ही करूँ और जब मैं भूल जाऊँ, तो मुझे याद करवा देना।’’ 🙏
3️⃣ तीसरी प्रार्थना (स्नान व तिलक के बाद): 🕉️
‘‘हे मेरे प्राणनाथ! गोविंद! आप कृपा करके मेरी दृष्टि ऐसी कर दीजिये कि मैं प्रत्येक कण-कण तथा प्राणीमात्र में आपका ही दर्शन करूँ।’’ 🙏
⚠️ आवश्यक सूचना:
इन तीनों प्रार्थनाओं को लगातार तीन महीने तक करना अनिवार्य है। तीन महीने के बाद यह आपका स्वभाव बन जाएगा और अभ्यास स्वतः होने लगेगा।
आज ही से आरम्भ करें!
जय श्री गोविन्द! ✨
#महाभारत
शिशुपाल का अर्थ है - बच्चों का रक्षक' या 'शिशुओं का पालनहार' यह नाम महाभारत के एक प्रमुख पात्र से जुड़ा है, जो चेदि राज्य का राजा था और जिसका वध भगवान कृष्ण ने किया था. वह विष्णु के द्वारपाल ‘जय’ का तीसरा और अंतिम जन्म माना जाता है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ / राज्याभिषेक में उसने कृष्ण का अपमान किया। बार-बार क्षमा मिलने के बाद भी उसके अपमानजनक व्यवहार से क्रोधित होकर कृष्ण ने अंततः सभा में ही उसका वध कर दिया।
महाभारत की कथा श्रीकृष्ण और शिशुपाल वध के प्रसंग बिना अधूरी है. शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था और रिश्ते में कौरवों तथा पांडवों का भाई था. यह बात जानने योग्य है कि इतना करीबी होने के बाद भी भगवान श्रीकृष्ण को आखिर शिशुपाल का वध करने की क्या आश्यकता पड़ गई. इसका उत्तर जानने के लिए सबसे पहले शिशुपाल की जन्म की कहानी को जानना पड़ेगा.
शिशुपाल वासुदेव की बहन और छेदी के राजा दमघोष का पुत्र था. इस तरह से वह श्रीकृष्ण का भाई था. शिशुपाल का जन्म जब हुआ तो वह विचित्र था. जन्म के समय शिशुपाल की तीन आंख और चार हाथ थे. शिशुपाल के इस रूप को देखकर माता पिता चिंता में पड़ गए और शिशुपाल को त्यागने का फैसला किया. लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बच्चे का त्याग न करें, जब सही समय आएगा तो इस बच्चे की अतिरिक्त आंख और हाथ गायब हो जाएंगे. लेकिन इसके साथ ही यह भी आकाशवाणी हुई कि जिस व्यक्ति की गोद में बैठने के बाद इस बच्चे की आंख और हाथ गायब होंगे वही व्यक्ति इसका काल बनेगा.
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर आए. वहां शिशुपाल भी खेल रहा था. श्रीकृष्ण के मन शिशुपाल को देखकर स्नेह जागा तो उन्होंने उसे गोद में उठा लिया. गोद में उठाते ही शिशुपाल की अतिरिक्त आंख और हाथ गायब हो गए. यह देख शिशुपाल के माता पिता को आकाशवाणी याद आ गयी और वे बहुत भयभीत हो गए. तब श्रीकृष्ण की बुआ ने एक वचन लिया. भगवान अपनी बुआ को दुख नहीं देना चाहते थे, लेकिन विधि के विधान को वे टाल भी नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने अपनी बुआ से कहा कि वे शिशुपाल की 100 गलतियों को माफ कर देंगे लेकिन 101 वीं गलती पर उसे दंड देना ही पड़ेगा.
शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था. लेकिन रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और उनसे ही विवाह करना चाहती थीं. लेकिन रुक्मणी के भाई राजकुमार रुक्मी को रिश्ता मंजूर नहीं था. तब भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी को महल से लेकर आ गए थे. इसी बात से शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को शत्रु मानने लगा था. इसी शत्रुता के कारण जब युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया और राजसूय यज्ञ का आयोजन किया गया तो सभी रिश्तेदारों और प्रतापी राजाओं को भी बुलाया गया. इस मौके पर वासुदेव, श्रीकृष्ण और शिशुपाल को भी आमंत्रित किए गया था.
यहीं पर शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो जाता है. भगवान श्रीकृष्ण का युधिष्ठिर आदर सत्कार करते हैं. यह बात शिशुपाल को पसंद नहीं आई और सभी के सामने भगवान श्रीकृष्ण को बुरा भला कहने लगा. भगवान श्रीकृष्ण शांत मन से आयोजन को देखने लगे लेकिन शिशुपाल लगातार अपमान करने लगा, उन्हें अपशब्द बोलने लगा. श्रीकृष्ण वचन से बंधे इसलिए वे शिशुपाल की गलतियों को सहन करते रहे. लेकिन जैसे ही शिशुपाल ने सौ अपशब्द पूर्ण किये और 101 वां अपशब्द कहा, श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया. एक पल में ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग कर दी. इस प्रकार से श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया.
।। जय श्री कृष्ण ।।
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#राधे कृष्ण
श्रीकृष्ण का अवतार मानव इतिहास के सबसे महान और दिव्य अवतारों में से एक माना जाता है। वे भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे, जिन्होंने धर्म की स्थापना, अधर्म का नाश और मानवता को सत्य, प्रेम, और कर्तव्य का संदेश देने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था।
🌸 श्रीकृष्ण के अवतार का मुख्य उद्देश्य
1. धर्म की पुनर्स्थापना (धर्म की रक्षा करना)
भगवान विष्णु ने स्वयं भगवद्गीता में कहा है —
> “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।”
— (गीता 4.7)
अर्थात् — जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर आता हूँ।
कृष्ण ने अन्याय, अत्याचार और पाप की वृद्धि के समय जन्म लेकर धर्म की स्थापना की।
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2. अधर्म और अत्याचार का नाश करना
कृष्ण का अवतार मुख्य रूप से कंस, शिशुपाल, जरासंध, कौरवों जैसे अत्याचारी और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए हुआ।
उन्होंने बताया कि जब अन्याय बढ़ जाए तो मौन रहना भी अधर्म है, इसलिए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध भी आवश्यक है।
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3. मानव को कर्म का महत्व सिखाना
कृष्ण ने अर्जुन को गीता के माध्यम से बताया कि —
> “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात् मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
यह शिक्षा पूरे मानव समाज के लिए एक आदर्श जीवन दर्शन बन गई।
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4. भक्ति, प्रेम और योग का मार्ग दिखाना
कृष्ण ने लोगों को सिखाया कि भगवान तक पहुँचने के कई मार्ग हैं —
भक्ति योग (प्रेम और समर्पण का मार्ग)
कर्म योग (कर्तव्य पालन का मार्ग)
ज्ञान योग (सत्य का बोध)
वे स्वयं गोपियों, मीरा और भक्तों के आदर्श आराध्य बने।
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5. निष्काम कर्म और जीवन का आदर्श प्रस्तुत करना
कृष्ण ने जीवन के हर क्षेत्र में यह बताया कि कर्तव्य करते हुए भी मन को भगवान में लगाना ही सच्चा योग है।
उन्होंने गृहस्थ, मित्र, दूत, सारथी और भगवान — सभी रूपों में आदर्श प्रस्तुत किया।
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6. अर्जुन को कर्तव्य बोध कराना (गीता का उपदेश)
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन मोह में पड़ गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद्गीता का उपदेश दिया —
यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन है।
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7. सत्य, प्रेम और करुणा का प्रचार
कृष्ण ने यह सिखाया कि सच्चा धर्म केवल पूजा या कर्मकांड में नहीं, बल्कि सच्चाई, प्रेम, दया, क्षमा और सेवा में है।
उन्होंने समाज को जाति, भेदभाव और अंधविश्वास से ऊपर उठकर जीने की प्रेरणा दी।
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8. संसार को मोक्ष का मार्ग दिखाना
कृष्ण ने यह भी बताया कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा को परमात्मा में समर्पित कर देता है, वह जन्म–मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
उनका जीवन भक्ति से मुक्ति तक की पूर्ण यात्रा है।
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🌼 संक्षेप में कहा जाए तो —
श्रीकृष्ण का अवतार इसलिए हुआ ताकि वे —
धर्म की स्थापना करें,
अधर्म का नाश करें,
मानव को कर्म, प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाएँ,
और मानवता को मोक्ष का सच्चा ज्ञान दें।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
⁉️पुराणों में किसी व्रत उपवास का वर्णन आता है और लिखा होता है कि यह करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं l जबकि शास्त्रों का कहना है कि सारे पाप को भोगना ही पड़ेगा।🛐
🛐दूसरी बात सप्तशती पाठ, महामृत्युंजय मंत्र जप का कुछ तो प्रभाव होता होगा, समस्त वेद शास्त्र उपनिषद पुराण से लेकर समस्त संत महापुरुषों की वाणी क्रिया कृत्य बस एक लक्ष्य की ओर लेकर चलते हैं , वह है कि येन केन प्रकारेण मन का लगाव संसार से हटकर भगवान में लगे ।
प्रवृत्ति मार्ग से हटाकर निवृत्ति मार्ग पर ले चले । प्रेय मार्ग से श्रेय मार्ग की ओर ले चले । अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चले । दुःख से सुख या आनंद की ओर ले चले ।
और कोई भी लक्ष्य नहीं है , नहीं है , नहीं है , यह स्वर्ण क्या हीरक अक्षरों में लिख लें और दिमाग में बिठा लें ।🛐
🧘इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार के साधन बताये हैं और विभिन्न प्रकार से मन को लगाने का उपाय बताया है । प्यार से , पुचकार से , डर से , लोभ से , डरा कर , धमका कर , प्यार करके उन्होंने जीवों को इस क्षेत्र में लाने का प्रयास किया है ।
व्रत उपवास शारारिक तर्पण अर्थात शरीर की शुद्धता या परिमार्जन के उद्देश्य से बनाया गया है। ताकि उसके कारण मनुष्य का शरीर सात्विक hormones release करे ,जो कि मन को पुनः शास्त्रों को समझने और भगवद क्षेत्र में मन लगाने में सहायक बने ।🧘
📕पुराणों में इसके लिए खूब प्रलोभन दिए गए हैं कि तुम्हारा बच्चा जीवित हो जाएगा , तुम्हारा यह ठीक हो जाएगा इत्यादि ।
देखिये अमृत है । चाहे उसको कोई डरा कर पिला दे , कोई धमका कर पिला दे , कोई धोखे से पिला दे ,कोई प्यार से पिला दे , कोई जबरदस्ती पिला दे , कोई जानबूझकर पी ले , अमृत उसे अमर करके ही रहेगा । बस यही नीति और फॉर्मूला हमारे शास्त्रों ने, पुराणों ने ,महापुरुषों ने अपनाया कि इन जीवों को किसी तरह इस क्षेत्र में मोड़ा जाय ।
बाकी का जो आपने कर्म किया है , वह अवश्य भोगना ही भोगना पड़ेगा ।📕
🍀भगवदक्षेत्र या धर्म या व्रत उपवास का आलंबन लेने से यह होगा कि उस भोग को भोगने की शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि होगी । जिसके कारण उसका प्रभाव अन्तःकरण पर कम पड़ेगा ।
वरना आपने देखा ही होगा कि एक छोटा सा दुःख आता है तो कई लोग सहन नहीं कर पाते और आत्महत्या तक कर लेते हैं और कई ऐसे होते हैं कि घोर विपत्ति और दुःख में भी सम बने रहते हैं ।
चौदह वर्ष का कठोर वनवास मिला राम लक्ष्मण सीता जी को ।
क्या कौशल्या से लेकर समस्त प्रजाजन उनके निमित्त व्रत उपवास नहीं कर सकते थे और उनका दुख काट सकते थे ??
उर्मिला , मांडवी , श्रुतकीर्ति से लेकर जनक सीरध्वज और उनकी पत्नी सुनयना से लेकर सभी व्रत उपवास करके टाल सकते थे ।
पांडवों को वनवास मिला ? भगवान कृष्ण उनके साथ थे , चाहते तो पाण्डवों को व्रत करवाकर उनका दुख टाल सकते थे । अभिमन्यु मरा , बुरी तरह मारा गया । वेदव्यास के साथ मिलकर श्रीकृष्ण व्रत उपवास करके और महामृत्युंजय जाप करवाकर उसकी मृत्यु टाल सकते थे । द्रौपदी के पाँचों पुत्रों अर्थात सभी पांडवों के पुत्रों की हत्या हो गयी । महामृत्युंजय करके क्यों नहीं टाला ?? गांधारी भगवान शंकर की प्रचंड भक्त । लेकिन उसने भी महामृत्युंजय से अपने 100 पुत्रों की मृत्यु को नहीं टाल पाई । रावण जैसा ज्योतिषी कहीं नहीं था । उसे पता भी था कि उसकी मृत्यु ,उसके भाई की मृत्यु , उसके बेटे की मृत्यु होगी ।
भगवान शंकर का बहुत बड़ा भक्त । लेकिन वह भी व्रत उपवास महामृत्युजंय से मृत्यु नहीं टाल पाया ।🍀
इक लख पूत सवा लख नाती ।
ता रावण घर दिया न बाती ।।
👩❤️👩नल दमयंती , हरिश्चंद्र से लेकर अनंत उदाहरण हैं । अरे परीक्षित को जानते ही होंगे । उन्हें तो 7 दिन पहले ही पता लग गया था । भगवान शुकदेव साथ में थे , ज्ञान लेने की बजाय अपने पुत्र जनमेजय के साथ मिलकर महामृत्युंजय जाप ही करवा डालते । अरे सब छोड़िए , कलियुग में ही आईये । भगवान शंकर के अवतार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य 32 वर्ष की अल्पायु में मुँह से खून फेंककर शरीर त्याग कर देते हैं , क्या वह मूर्ख थे ??
क्यों नहीं महामृत्युंजय जाप करवाया उन्होंने ??? तो इसलिये इन पोंगा पंडितों की बात में आना बंद करिये सभी लोग । 👩❤️👩
♦️आप लोग सत्य सुनना चाहते थे न तो सत्य यही है कि कहीं कुछ नहीं है ,सब महापुरुष संत हमें धोखा देते हैं ,सभी शास्त्र धोखा देते हैं , हमें lure करते हैं इन सब बातों से ताकि हम लोग किसी तरह ज्ञान प्राप्त कर भगवान के क्षेत्र में चल पड़े ।।♦️
🕉️★ और महामृत्युजंय का अर्थ कहीं ऐसा नहीं है कि यह मृत्यु टाल देगा । लोग कहते हैं - जी बहुत पूजा पाठ करके देख लिया जी , कुछ नहीं होता !सब बकवास है ! मैं रोज़ मंगलवार को व्रत रखता था और 1 kg लड्डू चढ़ाता था ! क्या हुआ ? मेरा बेटा मर गया ! हनुमान जी ने कुछ नहीं किया ! मैंने अपने बेटे के बीमार होने पर पंडितों से महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया , पर मेरा बेटा नहीं बचा ! मैं नहीं मानता भगवान् वगवान को ! अरे सिद्धांत शास्त्र चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है कि भगवान् भी अपने नियम के विरुद्ध नहीं जाते ! 🕉️
🧘यहाँ तक कि भगवत प्राप्त महापुरुषों तक को भी यह अधिकार नहीं है कि वह भगवान् के बनाये हुए नियम क़ानून का उल्लंघन करें !🧘
जगतव्यापार वर्जनं !
🧑🍼 हालांकि वह कर सकते हैं , समर्थ हैं , पर नहीं। अगर सच्चा महापुरुष होगा तो वह कदापि नहीं करेगा , भगवान् के नियम के विरुद्ध कभी नहीं जाएगा ! हाँ छोटे मोटे स्थितिप्रज्ञ महापुरुष जो थोडा बहुत रिद्धि सिद्धि पा गये हैं , वो भी थोड़े समय के लिए कुछ अंश टाल सकते हैं , पर उसमें उनका पूरा बैंक बैलेंस ( साधना ) खाली हो जाता है और फिर से उन्हें उसी नर्सरी से चलना पड़ेगा ! 🧑🍼
🕉️लोग महामृत्युंजय मंत्र की बात करते हैं , उसमें कहाँ लिखा है कि मृत्यु टल जायेगी ?? ये है मंत्र 🕉️
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
✍️इसका अर्थ है की हे प्रभु हमें जन्म मरण के चक्कर से मुक्त करो और मोक्ष प्रदान करो ! इस मंत्र में कहीं भी जीवन देने वाली बात नहीं कही गयी है ! ये पंडित लोग खुद इन मन्त्रों का अर्थ नहीं जानते तो वो हमारा क्या कल्याण करेगा ? अभिमन्यु जिनके मामा स्वयं श्री कृष्ण , गांडीवधारी अर्जुन पिता , विवाह करने वाले वेदों को मथने वाले , भगवन के अंश वेदव्यास , वो तक बचा नहीं पाए तो औरो की क्या बिसात !
इसीलिए महापुरुष और ज्ञानी लोग कहते हैं , पहले सिद्धांत को समझो , तभी आगे बढ़ पाओगे !
आज लोगों के दुःख , निराशा , तरह तरह के आडम्बर , अंध विश्वास , रूढीवादीयाँ इसीलिए फ़ैल गयी हैं क्यूंकि सिद्धांत का अभाव है !✍️
🧘★ हमारे ऋषि मुनि यह चाहते थे कि यह मानव प्रजाति का किसी तरह से कल्याण हो l तो वह लोग मानव जाति का कल्याण करने के लिए सारे हथकंडे अपनाते थे l ठीक वैसे ही,,
जैसे छोटे छोटे बच्चे को स्कूल भेजने के लिए टॉफी , चॉकलेट , बिस्किट और पैसे का लालच देकर उसको शुरुआत में स्कूल भेजा जाता है l फिर जब उस बच्चे को आनंद आने लगता है , स्कूल में रम जाता है तो वह बिना किसी लालच के जाता है l वैसे ही हमारे ऋषि मुनि भी मानव जाति का कल्याण करने के लिए सारे हथकंडे अपनाते थे l कई बार ऐसा भी होता था कि लोग नहीं समझ पाते थे तो सीधे धर्म से जोड़ दिया कि आप यह व्रत करोगे तो आपको पाप धुल जाएंगे ।अगर आप यह व्रत करोगे तो आपको संतान धन की प्राप्त होगी l आदि l तो जब हम भगवत प्राप्त हो जाएंगे उसके बाद हमारे सारे पाप और पुण्य का लेखा-जोखा समाप्त हो जाता है, सारे पाप और पुण्य खत्म हो जाते हैं l🧘
🚩लेकिन जब तक भगवत प्राप्ति नहीं होगी उसके पहले तक हम पाप और पुण्य के बंधन में बंधे रहेंगे और उसी के अनुसार हमें कर्म का फल भोगना होगा l
अगर केवल व्रत करने से ही सारे पाप नष्ट होने लगे तो फिर " कर्म फल " का सिद्धांत ही गलत साबित हो जाएगा l जबकि " कर्म फल " का सिद्धांत कभी गलत नहीं होता है lबाबा तुलसीदास कहते हैं -🚩
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा l
जो जस करहिं
सो तस फल चाखा ll
कर्म फल के कारण ही तो महाभारत की गांधारी के 100 पुत्र मारे गये थे ************************
★⁉️ तो क्या ऋषि मुनि भी झूठ बोलते थे ? ⁉️
‼️नहीं , ऋषि मुनि झूठ नहीं बोलते थे l सारी बातें हमें आसानी से समझ में आ जाए , इसलिए ऐसा करते थे l वैसे ही जैसे, एक मां अपने बच्चे को सुलाने के लिए बोलती है - बेटा सो जा नहीं तो भूत आ जाएगा l
लेकिन जब बच्चा नहीं सोता है तो भूत तब भी नहीं आता है l
ऐसे ही समझिए ।‼️
#☝आज का ज्ञान
संतोषी सदा सुखी
हर व्यक्ति अपने Own Vision की सीमाओं (Limit) को ही दुनिया की सीमाएं मान लेता है। जहां संतोष होता है, वहां मन स्थिर और हल्का रहता है। जब आत्मा के भीतर संतोष का अनुभव होता है, तो खुशी किसी कारण का मोहताज नहीं रहती। वह स्वाभाविक रूप से जीवन में प्रकट हो जाती है। ज़िंदगी हमारे रोने से शुरू होती है और दूसरों के रोने पर खत्म होती है। तो जितना हो सके इस कमी को हंसी से भरें।
हमारी कल्पना से भी बड़ी हो सकती है अंदरूनी ताकत। Inner strength. अकेले चलना सबसे मुश्किल है, लेकिन यही वो चलना है जो हमें सबसे मज़बूत बनाता है। हमें सोचना है कि, कुछ भी हासिल करने के लिए जरूरी नहीं है हमेशा दौड़ा ही जाय। बहुत सारी चीजें, ठहरने से भी प्राप्त हो जातीं हैं। जैसे सुख, शांति,और सुकून। संतुलन का झुकाव के लिए मध्य में बने रहने के लिए कभी दाएँ झुकना पड़ता है, कभी बाएँ।
जय जय श्री राधे
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