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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#महाभारत कृष्णभक्तों में से एक है-- दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय : महाभारत के अलावा और कंही कृष्णभक्त संजय जी के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। स्वभाव से बेहद विनम्र और धर्म- परायण होने के नाते वे पुत्रमोहान्ध महाराज धृतराष्ट्र और उनके दुष्ट पुत्रों को सही रास्ता दिखाने के लिए कभी- कभी खरी- खोटी बात सुनाते थे। उनके बात पर महाराज धृतराष्ट्र भी क्षुब्ध हो जाते थे। फिर भी यह निष्पक्ष- निर्भीक- धर्मप्राण- आदर्श चरित्र को काव्य- साहित्यकार और पुराण- वाचकों के द्वारा ज्यादा गुरुत्व नहीं दिया गया है।। महाभारत युद्ध के समय उस युद्ध का सजीव- वर्णन सुनाने के लिए महर्षि वेदव्यास ने ही संजय को 'दिव्यदृष्टि' प्रदान की थी। असल में संजय तो पेशे से 'बुनकर' किन्तु अपनी विद्वत्ता से धृतराष्ट्र के मंत्री बने थे। किन्तु आश्चर्य की बात है-- कुरु- पांडवों की युद्ध के बाद उनके बारे में और कंही चर्चा होना आमतौर पर खत्म हो गई थी।। विशेष तथ्य ये है कि-- संजय थे महर्षि वेदव्यास के गुरुकुल की शिष्य- मंडली में से एक होनहार छात्र। शिक्षा- समाप्ति के बाद संजय ने मंत्री विदुर जी के नीचे सहयोगी 'मंत्री' बनने से पहले, अपनी विद्वत्ता और सूझबूझ गुणों से ही वे धृतराष्ट्र की राजसभा में एक सम्मानित सभासद की हैसियत से दाखिला पाया था। मूलतः संजय थे 'बुनकर' कुल से और उनके विद्वान पिताश्री थे 'गावाल्गण' नामक एक सम्माननीय 'सूत'।। बुद्धिमान मंत्री संजय को धृतराष्ट्र ने महाभारत युद्ध से ठीक पहले ही पांडवों के पास बातचीत करने के लिए भेजा था। वहां से आकर संजय जी ने धृतराष्ट्र को युधिष्ठिर का संदेश भी सुनाया था। कोरवों के राजसत्ता में एक मंत्री होने से भी संजय जी धर्मप्राण पाण्डवों के प्रति सहानुभुति रखते थे। इसलिए, निष्फल होने से भी धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों को अधर्म से रोकने के लिये वे कड़ी से कड़ी वचन कहने में कभी हिचकते नहीं थे। संजय जी अत्यंत कर्त्तव्य परायण मंत्री थे। इसलिए मंत्री- धर्म पालन कर हमेशा समय- समय पर धृतराष्ट्र को सही सलाह देते रहते थे।। समय क्रम में शकुनि की चाल से जब दूसरी बार पांडवों ने जुआ में हारकर 13 सालों के लिए वनवास लेकर गए, तब संजय जी ने धृतराष्ट्र को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि-- ''ये क्या किया राजन ! इस कारण से कुरुवंश का समूल विनाश तो पक्का है, लेकिन साथ में निरीह प्रजा भी नाहक मारी जाएगी।" हालांकि धृतराष्ट्र तो उनकी स्पष्टवादिता पर अक्सर क्षुब्ध होना उनके अभ्यास बन गया था, इस बार भी असंतोष व्यक्त करके बैठ गए थे।। तेरह सालों के बाद पांडवों ने प्रकट हो गए थे। इस समय भगवान कृष्ण भी दोनों पक्ष के विबाद का मीमांशा करने के लिए वंहा पधारे थे। किंतु शकुनि के प्रपंच से अहंकारी दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध के बिना सूच्यग्र भूमि भी देने से इनकार कर दिया, तो महायुद्ध की नौबत आ गयी थी। जब ये पक्का हो गया कि युद्ध को टाला नहीं जा सकता और दोनों पक्ष कुरुक्षेत्र में आमने- सामने होने की समय आ गया, तब महर्षि वेदव्यास ने पधार कर संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, ताकि वो युद्ध- क्षेत्र की सारी घटनाओं को महल में बैठकर ही देख लें और उसका हाल धृतराष्ट्र को सुनाएं। इसके बाद सायद विश्व के प्रथम धारावाहिक विबरणी देने वाला संजय जी ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र को महाभारत- युद्ध का हर अंश की दृश्यों की जीवंत- विवरण को लगातर सुनाया था।। संजय जी ने युद्ध के धारा- विबरणी देते समय कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप, जो केवल अर्जुन को ही दिखाई दे रहा था, वे भी उसे दिव्यदृष्टि से देखा था। किन्तु युद्ध के बाद उनकी दिव्यदृष्टि नष्ट हो गयी थी।। महाभारत युद्ध के बाद कई सालों तक संजय जी ने युधिष्ठर के राज्य में रहे थे। इसके बाद वो धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती के साथ संन्यास लेकर चले गए थे। परन्तु कुछ पौराणिक ग्रंथो के अनुसार वो धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद हिमालय चले गए थे। बस, संजय जी के बारे में इतनी ही विबरणी उपलब्ध है।। RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI
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#रामायण #🙏रामायण🕉 🙇जयंत और माता सीता का प्रसंग (चित्रकूट वन) (आधार: रामायण)🙇 चित्रकूट के शांत, हरे-भरे वन में श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता अपना वनवास बिता रहे थे। सुबह का समय था—पक्षियों की मधुर ध्वनि, मंद हवा और कुटिया के बाहर फैली शांति। इसी समय एक अद्भुत घटना घटी, जिसने तीनों लोकों को हिला दिया। जयंत की परीक्षा का विचार देवताओं के राजा इंद्र के पुत्र जयंत के मन में अचानक एक विचार आया— "राम को अवतार कहा जाता है, किंतु मैं उनकी वास्तविक शक्ति परखकर देखूँ!" उत्सुकता और अहंकार के मिश्रण में, उसने एक कौवे का रूप धारण कर लिया। कौवे का प्रहार कुटिया में उस समय माता सीता और श्री राम शांति से बैठे थे। तभी वह कौवा उड़ता हुआ आया और माता सीता के चरणों पर हल्का सा प्रहार कर दिया। सीता चौंक उठीं—उनके चरण से रक्त की एक बूँद निकली। राम ने देखा कि कोई पक्षी सीता को चोट पहुँचा गया है। उनके शांत स्वरूप में पहली बार कठोरता का तेज झलक पड़ा। राम का क्रोध और तिनके का ब्रह्मास्त्र राम ने धरती से एक सामान्य-सा तिनका उठाया। गंभीर मंत्रों से वह तिनका प्रकाशमान हो उठा— एक साधारण तिनका अब ब्रह्मास्त्र बन चुका था। उस ब्रह्मास्त्र को राम ने कौवे की ओर छोड़ दिया। तिनका कौवे के पीछे ऐसा लगा कि कहीं भी जाए, उसका पीछा नहीं छूटे। जयंत की तीनों लोकों में दौड़ अब जयंत अपने असली रूप में लौट आया, किंतु ब्रह्मास्त्र से बचना असंभव था। वह स्वर्ग गया—देवताओं ने कहा, “राम के अस्त्र से कोई रक्षा नहीं।” वह पृथ्वी और पाताल गया—किसी ने शरण नहीं दी। अंत में निराश होकर उसने नारदजी की बात मानी और शीघ्र ही चित्रकूट पहुँचकर राम के चरणों में गिर पड़ा। शरणागति और क्षमा जयंत ने स्वीकार किया— "मेरी भूल थी, प्रभु! मुझे क्षमा दें।" राम को किसी शरणागत से क्रोध न था। उन्होंने उसे जीवनदान दिया। परंतु ब्रह्मास्त्र खाली नहीं जा सकता था। इसलिए दंड स्वरूप उसकी एक आँख का तेज नष्ट हो गया, और वह सदा के लिए आधा दृष्टिहीन हो गया। इस प्रसंग का संदेश यह कथा स्पष्ट बताती है कि— ईश्वर के भक्तों को कष्ट देना गंभीर अपराध है। शरणागति सबसे बड़ी शक्ति है—जो भगवान की शरण आए, उसे जीवनदान मिलता है। शक्ति का दुरुपयोग अंततः विनाश लाता है।
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#🪔आमलकी एकादशी📿 अमरीश राजा और दुर्वासा ऋषि की एकादशी कथा ----- सतयुग में अमरीश नामक एक महान राजा हुए। वे बड़े धर्मात्मा, सत्यवादी और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखते और नियमपूर्वक द्वादशी को उसका पारण करते थे। एक बार कार्तिक मास की एकादशी के दिन उन्होंने उपवास किया और द्वादशी को व्रत पारण की तैयारी की। ठीक उसी समय प्रसिद्ध तपस्वी दुर्वासा ऋषि वहाँ आ पहुँचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और निवेदन किया – “ऋषिवर! कृपया पहले आप स्नान करके पधारें, फिर मैं आपके साथ मिलकर व्रत का पारण करूँगा।” ऋषि स्नान के लिए यमुना जी गए। उधर समय बीतता गया और द्वादशी का पारण काल समाप्त होने के निकट आ गया। राजा धर्मसंकट में पड़ गए कि ऋषि लौटे नहीं और काल निकल जाए तो व्रत भंग हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार उस समय एक ही उपाय था – जल से पारण करना। राजा ने मन ही मन भगवान विष्णु का ध्यान किया और केवल एक घूंट जल पिया। कुछ देर बाद जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने ध्यान से देखा कि राजा ने बिना उनकी प्रतीक्षा किए व्रत पारण कर लिया है। ऋषि को यह अपमान लगा और वे क्रोधित हो उठे। अपने क्रोध में उन्होंने कहा – “राजन! तूने मुझे धोखा दिया है, मेरा अपमान किया है। इसका दंड तुझे अवश्य मिलेगा।” क्रोधावेश में ऋषि ने अपनी जटा से एक भयानक क्रूर राक्षस उत्पन्न कर दिया और उसे राजा को भस्म कर देने का आदेश दिया। परंतु उसी क्षण भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को प्रकट कर उस राक्षस का संहार कर दिया। इतना ही नहीं, सुदर्शन चक्र ऋषि दुर्वासा की ओर भी बढ़ा। अब दुर्वासा ऋषि भयभीत हो गए। वे आकाश, पाताल, सभी लोकों में भागे, ब्रह्मा जी और शिव जी के पास गए, परंतु सबने कहा – “ऋषिवर, यह चक्र भगवान विष्णु का है, हम कुछ नहीं कर सकते।” अंत में वे स्वयं भगवान विष्णु के पास पहुँचे और शरण माँगी। भगवान ने कहा – “ऋषिवर, मैं तो अपने भक्तों का दास हूँ। मेरे सुदर्शन चक्र को शांत करने की सामर्थ्य केवल मेरे भक्त राजा अमरीश के पास ही है। आप उन्हीं से क्षमा माँगें।” दुर्वासा ऋषि लज्जित होकर राजा अमरीश के पास पहुँचे और क्षमा माँगने लगे। राजा ने तुरंत विनम्रता से क्षमा कर दी और प्रार्थना की कि सुदर्शन चक्र शांत हो जाए। राजा की करुणा और विनम्रता देखकर चक्र शांत हो गया। ________________________________________ कथा से शिक्षा 1. एकादशी व्रत का पालन अत्यंत पवित्र है, इसे समय पर और विधि से करना चाहिए। 2. भगवान विष्णु अपने सच्चे भक्त की हमेशा रक्षा करते हैं। 3. अहंकार और क्रोध ऋषि जैसे महान पुरुष को भी संकट में डाल देता है। 4. क्षमा, नम्रता और भक्तिभाव से बड़ा कोई बल नहीं। ---:: ॐ :: ---
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#महालक्ष्मी श्री महालक्ष्मी अष्टकम् ॥ नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥१॥ नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि । सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥२॥ सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥३॥ सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि । मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥४॥ आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि । योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥५॥ स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे । महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥६॥ पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि । परमेशि जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥७॥ श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते । जगत्स्थिते जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥८॥ --- संक्षिप्त भावार्थ इस स्तोत्र में देवी महालक्ष्मी को महामाया, आदिशक्ति, जगत की माता, दुःख और पाप का नाश करने वाली तथा धन, बुद्धि, सिद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में प्रणाम किया गया है। जप का महत्व समृद्धि, सौभाग्य और शांति की प्राप्ति आर्थिक स्थिरता और मानसिक संतुलन जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और कल्याण परंपरा अनुसार शुक्रवार या दीप प्रज्वलित कर श्रद्धापूर्वक पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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#🕉️सनातन धर्म🚩 🛐हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति🛐 🌍हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति का अर्थ है — तीन प्रमुख देवताओं का दिव्य स्वरूप, जो सृष्टि के संचालन के तीन मुख्य कार्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं:🌍 सृजन (Creation), पालन (Preservation) और संहार (Destruction)। 🕉️त्रिमूर्ति में ये तीन देव शामिल हैं:🕉️ 🚩1. Brahma – सृष्टि के रचयिता🚩 ब्रह्मा जी को सृष्टि का निर्माता माना जाता है। पुराणों के अनुसार उन्होंने वेदों की रचना की और समस्त जीवों तथा जगत की उत्पत्ति की। इनके चार मुख चारों वेदों का प्रतीक माने जाते हैं। 🚩2.Vishnu – पालनकर्ता🚩 भगवान विष्णु संसार का पालन करते हैं। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब वे विभिन्न अवतार (जैसे राम और कृष्ण) लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। 🚩3. Shiva – संहारकर्ता🚩 भगवान शिव को संहार और पुनर्निर्माण का देवता माना जाता है। उनका संहार विनाश नहीं बल्कि नए सृजन की शुरुआत का प्रतीक है। वे तप, योग और वैराग्य के भी प्रतीक हैं। 🍀त्रिमूर्ति का दार्शनिक महत्व🍀 त्रिमूर्ति यह दर्शाती है कि संसार एक चक्र की तरह चलता है — सृजन → पालन → संहार → पुनः सृजन । यह जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक है। त्रिमूर्ति का सिद्धांत यह सिखाता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है और हर अंत एक नई शुरुआत लेकर आता है।
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🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *परमपिता परमात्मा ने इस समस्त सृष्टि में जीवों की रचना की , जीवन देने के बाद जीवात्मा को एक निश्चित समय के लिए इस पृथ्वी लोक पर भेजा | जिस जीवात्मा का समय पूर्ण हो जाता है वह किसी न किसी बहाने से इस धरा धाम का त्याग कर देता है | नश्वर शरीर को छोड़करके आत्मा नई यात्रा पर अग्रसर हो जाती है इसी को हमारे धर्म ग्रंथों में मृत्यु कहा गया है | यह धराधाम जहां पर प्राणी निवास करते हैं इसका नाम ही मृत्युलोक है , अर्थात "मौत का घर" यहां जो भी आया है उसको एक ना एक दिन इस पृथ्वी का त्याग करके अपने कर्मानुसार योनियों में जाना ही पड़ता है | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है यदि मृत्यु की परिभाषा की खोज की जाय तो यही परिणाम निकल कर आएगा कि "जब जीवात्मा की आंतरिक एवं वाहय गतिशीलता समाप्त हो जाती है तब उसका शरीर शांत हो जाता है और जब यह नश्वर शरीर शांत हो जाता है इसकी क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है तब मनुष्य को मृत घोषित कर दिया जाता है" | वैसे तो मृत्यु को जीवन के अंत के रूप में जाना जाता है परंतु मनुष्य के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जो उसे जीवित अवस्था में भी मृतक के समान घोषित कर देते हैं | श्रीरामचरितमानस में बाबा जी ने चौदह प्रकार के मृतक बताए है | जब मनुष्य अपने आचरण एवं अपने मानवोचित कर्म के विपरीत कर्म करने लगता है तो वह मृतकतुल्य हो जाता है ' ऐसे मनुष्य इस पृथ्वी पर भारस्वरूप ही रहते हैं | लोग मृत्युलोक में रहते हुए भी मृत्यु से भयाक्रांत रहते हैं , इस संसार में मनुष्य सब कुछ तो चाहता है परंतु मृत्यु को स्वीकार नहीं करना चाहता , क्योंकि वह मोहमाया में लिप्त होकर के सदैव इस संसार का सुख भोगने की प्रबल इच्छा रखता है | जिसको ईश्वर ने समस्त ऐश्वर्य प्रदान कर रखा है उसकी तो बात छोड़ दीजिए भगवान की माया इतनी प्रबल है कि जो मनुष्य अपने जीवन से विमुख होकर के बार-बार ईश्वर से यही कामना करता है कि हे भगवन ! अब मेरी मृत्यु हो जाय वह भी मृत्यु को समक्ष देख कर के भयाक्रांत हो जाता है | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है इससे न कोई बचा है और ना ही बच पाएगा |* *आज के इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया है , इस धरती के रहस्यों को सुलझाने में वैज्ञानिक दिन रात लगे रहते हैं परंतु कुछ विधान ऐसे हैं जिनकी बागडोर ईश्वर ने स्वयं अपने हाथ में ले रखी है | इन्हीं विधानों मे से एक है मृत्यु का विधान | इतना विकास कर लेने के बाद भी मनुष्य आज तक मृत्यु के रहस्य को नहीं जान पाया | वैज्ञानिकों का मानना है कि जब मनुष्य की आंतरिक मशीनरी कार्य करना बंद कर देती है तब मनुष्य नि:चेष्ट हो करके मृत्यु को प्राप्त हो जाता है , परंतु मृत्यु के वास्तविक रहस्य को आज भी वैज्ञानिक नहीं जान पाए है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सद्गुरुओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर यही कह सकता हूं कि मृत्यु कोई भयभीत करने वाली वस्तु नहीं है , यह मात्र एक शब्द नहीं है बल्कि महाभारत के अनुसार मृत्यु को एक देवी के रूप में स्थापित किया गया है | मृत्यु को स्वीकार करने के लिए मनुष्य को आत्मसंयमी होने के साथ-साथ इस संसार के चकाचौंध भरे जीवन से विमुख हो करके इस सत्य को जानना एवं समझना चाहिए | जब मनुष्य इस संसार में अपने जन्म लेने का प्रयोजन एवं स्वयं के रहस्य को जान जाता है तब उसे मृत्यु से भय कदापि नहीं लगता है | जीव को जब जन्म लेना होता है तब संसार के लोगों को पूर्वाभास हो जाता है परंतु उस जीव का इस धरती से गमन कब होगा इसका आभास नहीं हो पाता ऐसा इसलिए क्योंकि जीवात्मा अपने कर्मानुसार इस संसार से गमन करता है | जीवात्मा का इस संसार में आने का मार्ग निश्चित है परंतु जीवात्मा को इस संसार का त्याग करने के लिए अनेक मार्ग है जीवात्मा किसी भी मार्ग का चुनाव करके इस संसार का त्याग करेगा तो उसे मृत्यु का ही नाम दिया जाएगा | जब जीवात्मा इस नश्वर शरीर का त्याग करके आगे की यात्रा प्रारंभ करता है तो संसार के प्राणी उसे मृतक मानकर के नश्वर शरीर का अंतिम संस्कार कर देते हैं | मृत्यु इस संसार का अटल सत्य है परंतु मनुष्य इसे स्वीकार नहीं कर पाता है | मनुष्य जब अपने आचरण से पतित हो जाता है तब वह जीवित तो रहता है परंतु उसे जीवित नहीं माना जाता है | किसी सम्मानित व्यक्ति का किसी मानव समुदाय में यदि अपमान हो जाता है तो वह मृतक के समान हो जाता है | इस प्रकार शरीर को त्याग देना ही मृत्यु नहीं है बल्कि मनुष्य की मृत्यु कई प्रकार से होती है इसको समझने व जानने की आवश्यकता है | सदाचरण का पालन करते हुए जीवन यापन करने वालों की मृत्यु कभी नहीं होती वह इस संसार का त्याग देने के बाद भी युगों युगों तक लोगों के मानस पटल पर जीवित रहते हैं , अतः मनुष्य को अपने कर्मों का चुनाव करते हुए यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि उसके कर्म ऐसे हों कि संसार को त्याग देने के बाद भी वह संसार मे स्मृति के रुप मे जीवित रहे |* *मनुष्य इस संसार से तो चला जाता है परंतु उसके कर्म उसको युगो युगो तक जीवित रखते है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को मृत्योपरांत भी जीवित रहने का प्रयास करते रहना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #☝आज का ज्ञान
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#❤️जीवन की सीख 🌟 || सीखें और सिखायें || 🌟 बिना प्रेरणा लिए हमारा जीवन प्रेरणादायक नहीं बन सकता है। जिसमें कुछ सीखने की ललक होती है, वही कुछ सिखाने की काबिलियत भी रखता है। यदि हम लेना चाहें तो संपूर्ण प्रकृति प्रेरणा से भरी हुई है। प्रेरणा पर्वत से लेनी चाहिए जिसके मार्ग में अनेक आंधी और तूफान आते हैं पर उसके स्वाभिमान एवं मस्तक को नहीं झुका पाते। प्रेरणा लहरों से लेनी चाहिए जो गिरकर फिर उठ जाती हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचे बगैर रुकती नहीं। प्रेरणा बादलों से लेनी चाहिये जो समुद्र से जल लेते हैं और रेगिस्तान में बरसा देते हैं। प्रेरणा हमें वृक्षों से लेनी चाहिए, फल लग जाने के बाद जिनकी डालियाँ स्वतः झुक जाया करती हैं। प्रेरणा उन फूलों से लेनी चाहिए जो खिलते भी दूसरों के लिए और टूटते भी दूसरों के लिए हैं। जो व्यक्ति प्रेरणा लेना जानता है उसका जीवन एक दिन स्वतः प्रेरणा दायक भी बन जाता है। 🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - सुप्रभात सुविचार जाने वो कैसे मुकद्दर की किताब लिख देता है  सांसें गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है . ! सुप्रभात @SHARMAUS - 8:19 सुप्रभात सुविचार जाने वो कैसे मुकद्दर की किताब लिख देता है  सांसें गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है . ! सुप्रभात @SHARMAUS - 8:19 - ShareChat
अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत !। तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥ [ महाभारत अनुशासनपर्व ५८/२६। ] अर्थात् 👉🏻 भरतनन्दन! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने मरे हुए पूर्वजों एवं भविष्य में होनेवाली संतानों का तथा पितृकुल का भी उद्धार कर देता है , इसलिए वृक्षों को अवश्य लगाना चाहिए । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - ~~` ramnk भरतनन्दन। वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपन मरे हुएं पूर्वजों एवं भविष्य में हनिवाली संतानों को तथा पितृकुल काभी उद्धा कारत है, इसलिए वक्षों को अवण्य लपाना चाहिए ~~` ramnk भरतनन्दन। वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपन मरे हुएं पूर्वजों एवं भविष्य में हनिवाली संतानों को तथा पितृकुल काभी उद्धा कारत है, इसलिए वक्षों को अवण्य लपाना चाहिए - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गीता ज्ञान🛕 🙏।।श्रीहरिः।।🙏 ‼️त्याग से भगवत्-प्राप्ति‼️ ---------------------------------------- त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥ 👩‍❤️‍👩गृहस्थाश्रम में रहता हुआ भी मनुष्य त्याग के द्वारा परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। परमात्मा को प्राप्त करने के लिये 'त्याग' ही मुख्य साधन है। अतएव सात श्रेणियों में विभक्त करके त्याग के लक्षण संक्षेप में लिखे जाते हैं।👩‍❤️‍👩 🚩(१) निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग। चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट, छल,जबरदस्ती,हिंसा, अभक्ष्य भोजन और प्रमाद आदि शास्त्र विरुद्ध नीच कर्मों को मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी न करना, यह पहली श्रेणी का त्याग है। 🚩(२) काम्य कर्मों का त्याग। स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के उद्देश्य से एवं रोग-संकटादि की निवृत्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले यज्ञ, दान, तप और उपासनादि सकाम कर्मो को अपने स्वार्थ के लिये न करना, यह दूसरी श्रेणी का त्याग है। यदि कोई लौकिक अथवा शास्त्रीय ऐसा कर्म संयोगवश प्राप्त हो जाय ,जो कि स्वरूप से तो सकाम हो, परन्तु उसके न करने से किसी को कष्ट पहुँचता हो या कर्म-उपासना की परम्परा में किसी प्रकार की बाधा आती हो। तो स्वार्थ का त्याग करके केवल लोकसंग्रह के लिये उसका कर लेना सकाम कर्म नहीं है। 🚩(३) तृष्णा का सर्वथा त्याग। मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्री, पुत्र और धनादि जो कुछ भी अनित्य पदार्थ प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त हुए हों, उनके बढ़ने की इच्छा को भगवत्प्राप्ति में बाधक समझ कर उसका त्याग करना, यह तीसरी श्रेणी का त्याग है। 🚩(४) स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने का त्याग। अपने सुख के लिये किसी से भी धनादि पदार्थों की अथवा सेवा कराने की याचना करना एवं बिना याचना के दिये हुए पदार्थों को या की हुई सेवा को स्वीकार करना तथा किसी प्रकार भी किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध करने की मन में इच्छा रखना इत्यादि जो स्वार्थ के लिये दूसरों से सेवा कराने के भाव हैं, उन सबका त्याग करना, यह चौथी श्रेणी का त्याग है। यदि कोई ऐसा अवसर योग्यता से प्राप्त हो जाय कि शरीर सम्बन्धी सेवा अथवा भोजनादि पदार्थों के स्वीकार न करने से किसी को कष्ट पहुँचता हो या लोक शिक्षा में किसी प्रकार की बाधा आती हो तो उस अवसर पर स्वार्थ का त्याग करके केवल उनकी प्रीति के लिये सेवादि का स्वीकार करना दोष युक्त नहीं है; क्योंकि स्त्री, पुत्र और नौकर आदि से की हुई सेवा एवं बन्धु बान्धव और मित्र आदि द्वारा दिये हुए भोजनादि पदार्थ स्वीकार न करने से उनको कष्ट होना एवं लोक-मर्यादा में बाधा पड़ना सम्भव है। 🚩(५) सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों में आलस्य और फल की इच्छा का सर्वथा त्याग। ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान, तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर-सम्बन्धी खान- पान इत्यादि जितने कर्तव्य कर्म हैं, उन सबमें आलस्य का और सब प्रकार की कामना का त्याग करना।
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#☝आज का ज्ञान #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ काशी में एक जगह पर तुलसीदास रोज रामचरित मानस का पाठ करते थे । उनकी कथा को बहुत सारे भक्त सुनने आते थे तुलसीदास जी रोज जंगल में शौच के लिए जाते थे एवं शौच के पश्चात् वापिस नगर की ओर लौटते हुए शौच से बचा हुआ लोटे का पानी एक पेड़ की जड़ में डाल दिया करते थे जिससे उस पेड़ पर रहने वाले एक पेड़ की प्यास बुझती थी। एक दिन वह प्रेत तुलसीदास के सामने प्रकट हो गया और बोला कि आपने शौच के बचे हुए जल से जो सींचन किया है मैं उससे तृप्त हुआ हूँ और मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ। तुलसीदास बोले – मेरी केवल एक ही इच्छा है , प्रभु श्री राम के दर्शन। राम जी की कथा तो मैंने लिखी भी और गायी भी है परन्तु साक्षात् दर्शन अभी तक नहीं हुए। यदि दर्शन हो जाए तो बड़ी कृपा होगी उस प्रेत ने कहा कि महाराज! आपको प्रभु श्री राम के दर्शन करवा सकूँ ऐसी मेरी सामर्थ्य नहीं हैं और यदि मैं दर्शन करवा सकता तो मैं अब तक स्वयं इस प्रेत योनि से मुक्त हो चुका होता। प्रेत की बात सुनकर तुलसीदास जी बोले – परन्तु इसके अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिए। तब उस प्रेत ने कहा – सुनिए श्रीमान ! मैं आपको दर्शन तो नहीं करवा सकता लेकिन दर्शन कैसे होंगे उसका मार्ग आपको अवश्य बता सकता हूँ। तुलसीदास जी ने कोतुहल वश वह मार्ग पूछा। प्रेत बोला आप जहाँ पर कथा सुनाते हो, बहुत सारे भक्त सुनने आते हैं। आपको तो मालूम नहीं लेकिन मैं जानता हूँ आपकी कथा में रोज हनुमानजी भी सुनने आते हैं। वे आपको अवश्य ही श्री राम जी से मिलवा सकते हैं। तब तुलसीदास जी ने पूछा "पर मैं उनको कैसे पहचानूँगा ?" तब प्रेत ने उन्हें बताया कि हनुमान जी कथा में सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं तथा वे सबसे पीछे कम्बल ओढ़कर, एक दीन हीन एक कोढ़ी के रूप में बैठते हैं । उनके पैर पकड़ लेना वो हनुमान जी ही हैं। तुलसीदास जी बड़े प्रसन्न हुए हैं। आज जब कथा हुई है गोस्वामीजी की नजर उसी व्यक्ति पर थी और कथा के अंत में सबसे आखिर में जैसे ही वो व्यक्ति जाने लगा, तो तुलसीदास जी अपने आसन से कूद पड़े और दौड़ पड़े। जाकर उस व्यक्ति के चरणों में गिर गए। तुलसीदास जी बोले कि प्रभु आप सबसे छुप सकते हो मुझसे नहीं छुप सकते हो। अब आपके चरण मैं तब तक नहीं छोडूंगा जब तक आप प्रभु राम जी से नहीं मिलवाओगे। कृपा करके मुझे प्रभु राम जी के दर्शन करा दीजिए । राम जी के साक्षात्कार के सिवाय अब और कोई जीवन की अभिलाषा शेष नहीं बची। । हनुमानजी, आप तो राम जी से मिलवा सकते हो। अगर आप नहीं मिलवाओगे तो कौन मिलवायेगा? तुलसीदास जी का अनुनय विनय सुनकर हनुमानजी अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। हनुमानजी बोले कि आपको रामजी अवश्य मिलेंगे और मैं मिलवाऊँगा लेकिन उसके लिए आपको चित्रकूट जाना पड़ेगा, वहाँ आपको श्री राम जी के साक्षात् दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँचे । मन्दाकिनी जी में स्नान कर , कामदगिरि की परिक्रमा लगा रहे थे , तभी सामने से घोड़े पर सवार होकर दो सुकुमार राजकुमार आते हुए दिखाई दिए । एक गौर वर्ण और एक श्याम वर्ण। उनका रूप और तेज देखते ही बनता था , अद्भुत सौन्दर्य था उनका। तुलसीदास जी उनकी छवि देख कर मंत्रमुग्ध होकर उनको देखते रहे और सोचने लगे कि ये राजकुमार यहाँ क्या कर रहे हैं। वे यह समझ ही नहीं पाए की वही श्री राम और लक्ष्मण हैं। उन दिव्य राजकुमारों के जाने के बाद हनुमानजी प्रकट हुए और तुलसीदास जी पूछा कि क्या उनको श्री राम जी के दर्शन हुए। तुलसीदास जी ने कहा – नहीं ? तब हनुमान जी ने बताया कि अभी अभी घोड़े पर जो राजकुमार गए है , वे श्री राम और लक्षमण ही थे। तुलसीदास जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने हनुमान जी से एक बार फिर से दर्शन कराने की प्रार्थना की जिसे हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया। अगले ही दिन सुबह तुलसीदास जी मन्दाकिनी नदी में स्नान करने के पश्चात् घाट पर बैठ कर राम नाम का जप कर रहे थे और चन्दन घिस रहे थे और भगवान किस रूप में दुबारा दर्शन देंगे यह सोच रहे थे। तभी भगवान राम एक बालक के रूप में उनके समक्ष आये और कहा बाबा.. बाबा… चन्दन तो आपने बहुत प्यारा घिसा है। थोड़ा सा चन्दन हमें दे दो… लगा दो। गोस्वामीजी को लगा कि कोई बालक होगा। चन्दन घिसते देखा तो आ गया। तो तुरंत लेकर चन्दन बालक को देने लगे। हनुमानजी समझ गए कि आज फिर तुलसीदास जी से चूक हो सकती है। हनुमानजी तुरंत तोता बनकर आ गए शुक रूप में और कहा कि : हनुमानजी ने अत्यंत करुणरस में इशारा किया कि अब मत चूक जाना। आज जो आपसे चन्दन ग्रहण कर रहे हैं ये साक्षात् रघुनाथ हैं। तुलसीदास जी ने सिर उठाकर देखा तो सामने दिव्य रूप में श्री राम जी खड़े थे। तुलसीदास जी उनको देखते ही रह गए। प्रभु श्री राम ने फिर से उनसे चन्दन माँगा पर तुलसीदास जी तो प्रभु श्रीराम जी का रूप देखकर पूरी तरह स्थिर हो चुके थे , उनको तो जैसे कुछ सुनाई ही ना दिया हो। वे तो बस प्रभु श्री राम जी को निहारते ही रहे। यह देखकर श्री राम ने स्वयं ही चन्दन लिया और तुलसीदास जी के माथे पर लगाकर अंतर्ध्यान हो गए।
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