#🙏 प्रेरणादायक विचार #शुभ शनिवार #🙏शुभ शनिवार 🌹
🌟 || जीवन में विचारों की भूमिका || 🌟
विचारों की दुषिता का प्रभाव हमारे जीवन की धवलता को उसी तरह सौंदर्य विहीन कर देती है, जिस तरह काला रंग सफेद कागज को। हमारे जीवन निर्माण में विचारों की बहुत अहम भूमिका होती है। जितने स्वच्छ हमारे विचार होंगे निसंदेह उतना स्वच्छ हमारा जीवन भी होगा। जीवन के गुलदस्ते में कलुषित विचार काले रंग के समान हैं, जो उसके सौंदर्य को नष्ट कर देते हैं।
मैले और गंदे आवरण से परहेज रखना अच्छा है पर मैले और गंदे आचरण से परहेज रखना उससे भी महत्वपूर्ण है। विचारों से हमारे आचरण का निर्माण होता है। स्वच्छ विचार ही श्रेष्ठ आचरण को जन्म देते हैं। जिस प्रकार कपड़ों को स्वचछ रखने का सदैव प्रयास करते हो ऐसे ही विचारों को स्वच्छ रखने के लिए भी सदैव प्रयासरत रहें क्योंकि तन से ज्यादा मन की और चेहरे से ज्यादा चरित्र कि स्वच्छता जीवन को श्रेष्ठ बनाती है।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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🛕 सुविचार ज्ञानामृत 🛕
व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी ही चाहिए कि-
वह अपने दुख,और संघर्षों से अकेला ही जूझ सके..
बगैर किसी की चापलूसी किए....
सुप्रभातम
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#❤️जीवन की सीख
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वयधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 318)
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ते त्विषून् साहस्रांस्तस्मिन् युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वास्तथान्तरा ।। २६ ।।
अच्छिनच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ।। २७ ।।
ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः । स तं बाणमयं वर्ष शरैरावार्य सर्वतः ।। २८ ।।
ततः सर्वान् महीपालान् पर्यविध्यात् त्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन् विव्याध पञ्चभिः ।। २९ ।।
राजन् ! उन नरेशोंने भीष्मजीपर एक ही साथ दस हजार बाण चलाये; परंतु भीष्मजीने उन सबको अपने ऊपर आनेसे पहले बीचमें ही विशाल पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करके शीघ्रतापूर्वक काट गिराया। तब वे सब राजा उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, जैसे बादल पर्वतपर पानीकी धारा बरसाते हैं। भीष्मजीने सब ओरसे उस बाण-वर्षाको रोककर उन सभी राजाओंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब उनमेंसे प्रत्येकने भीष्मजीको पाँच-पाँच बाण मारे ।। २६-२९ ।।
स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् । तद् युद्धमासीत् तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ।। ३० ।।
पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ।। ३१ ।।
चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्याति पुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ।। ३२ ।।
रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । तान् विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ।। ३३ ।।
कन्याभिः सहितः प्रायाद् भारतो भारतान् प्रति ।
ततस्तं पृष्ठतो राजञ्छाल्वराजो महारथः ।। ३४ ।।
अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे।
वारणं जघने भिन्दन् दन्ताभ्यामपरो यथा ।। ३५ ।।
वासितामनुसम्प्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ।। ३६ ।।
शाल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः । ततः सः पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ।। ३७ ।।
तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
विततेषुधनुष्याणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ।। ३८ ।।
फिर भीष्मजी ने भी अपना पराक्रम प्रकट करते हुए प्रत्येक योद्धाको दो-दो बाणों से बींध डाला। बाणों और शक्तियोंसे व्याप्त उनका वह तुमुल युद्ध देवासुर संग्रामके समान भयंकर जान पडता था। उस समरांगणमें भीष्मने लोकविख्यात वीरोंके देखते-देखते उनके धनुष, ध्वजाके अग्रभाग, कवच और मस्तक सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें काट गिराये। युद्धमें रथसे विचरनेवाले भीष्मजीकी दूसरे वीरोंसे बढ़कर हाथकी फुर्ती और आत्मरक्षा आदिकी शत्रुओंने भी सराहना की। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भरतकुलभूषण भीष्मजीने उन सब योद्धाओंको जीतकर कन्याओंको साथ ले भरतवंशियोंकी राजधानी हस्तिनापुरको प्रस्थान किया। राजन् ! तब महारथी शाल्वराजने पीछेसे आकर युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मपर आक्रमण किया। शाल्वके शारीरिक बलकी कोई सीमा नहीं थी। जैसे हथिनीके पीछे लगे हुए एक गजराजके पृष्ठभागमें उसीका पीछा करनेवाला दूसरा यूथपति दाँतोंसे प्रहार करके उसे विदीर्ण करना चाहता है, उसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु शाल्वराज स्त्रीको पानेकी इच्छासे ईर्ष्या और क्रोधके वशीभूत हो भीष्मका पीछा करते हुए उनसे बोला- 'अरे ओ! खड़ा रह, खड़ा रह।' तब शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह भीष्म उसके वचनोंको सुनकर क्रोधसे व्याकुल हो धूमरहित अग्निके समान जलने लगे और हाथमें धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये। उनके ललाटमें सिकुड़न आ गयी ।। ३०-३८ ।।
क्षत्रधर्म समास्थाय व्यपेतभयसम्भ्रमः ।
निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ।। ३९ ।।
महारथी भीष्मने क्षत्रिय धर्मका आश्रय ले भय और घबराहट छोड़कर शाल्वकी ओर अपना रथ लौटाया ।। ३९ ।।
निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते ।
प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मशाल्वसमागमे ।। ४० ।।
उन्हें लौटते देख सब राजा भीष्म और शाल्व के युद्ध में कुछ भाग न लेकर केवल दर्शक बन गये ।। ४० ।।
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । अन्योन्यमभ्यवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ।। ४१ ।।
ये दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़नेवाले दो साँड़ोंकी तरह हुंकार करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। दोनों ही बल और पराक्रमसे सुशोभित थे ।। ४१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
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#राधे राधे #राधे राधे राधे
श्रीराधा रानी की कृपा-वाणी....
हे प्रिय भक्त,
तुम्हारे हृदय की श्रद्धा से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें यह वरदान देती हूँ —
तुम्हारे जीवन में सदा प्रेम और शांति का वास हो।
भक्ति की ज्योति तुम्हारे अंत:करण में निरंतर प्रज्वलित रहे। संकट की हर घड़ी में तुम्हें दिव्य साहस और सही मार्ग का ज्ञान प्राप्त हो।
तुम्हारे परिवार में सुख, समृद्धि और आपसी स्नेह बना रहे। तुम्हारे प्रत्येक शुभ कार्य में मेरी कृपा और श्रीकृष्ण की अनुकम्पा साथ रहे।
जो प्रेम से मेरा स्मरण करता है, उसके जीवन में कृपा-रस की वर्षा होती है। तुम्हारा जीवन सेवा, साधना और आनंद से परिपूर्ण हो — यही मेरा आशीष है।
राधे राधे।
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#राधे राधे
सखी री!
मैंने चितवत ही चित हार्यो...
नन्द नदन छवि रुप लुभावन ,
अंखियन कजरा सार्यो ||
कमर कसी कस फैंट पर्यो,
अरु कांधे पटका कारो ||
मुरली अधरन धरी बंक बन,
यमुना तट पर ठाड़्यो ||
ऐसौ भयो देख कछु जादू ,
सर्वस अपनो बार्यो ||
बौरी भयी भूल गयी सुध बुध,
हिये प्रेम अति बाढ़्यो ||
लोक लाज तजि गलियन डोलूँ,
मिलै न प्रीतम प्यारो ||
...
#☝आज का ज्ञान
प्रसिद्ध "सूत जी" कौन थे ..!!?
यदि आपने हिन्दू धर्म के किसी भी धर्मग्रन्थ या व्रत कथाओं को पढ़ा है तो आपके सामने पौराणिक "सूत जी" का नाम अवश्य आया होगा। कारण ये है कि सूत जी कदाचित हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध वक्ता हैं। कारण ये कि पुराणों की कथा का प्रसार जिस स्तर पर उन्होंने किया है वैसा किसी और ने नहीं किया। किन्तु ये "सूत जी" वास्तव में हैं कौन?
सूत जी का वास्तविक नाम "रोमहर्षण" था। उन्हें लोमहर्षण भी कहते हैं। उनका रोमहर्षण नाम इसीलिए पड़ा क्यूंकि उनका सत्संग पाकर श्रोताओं का रोम-रोम हर्ष से भर जाता था। उन्हें सूत जी इसीलिए कहते हैं क्यूंकि वे सूत समुदाय से थे। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे जिस कारण वे सूत के रूप में जन्में। हालाँकि पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था।
एक बार सम्राट पृथु ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया जिसके अंत में सभी देवताओं को हविष्य दिया जा रहा था। ब्राह्मणों ने भूल से देवराज इंद्र को अर्पित किये जाने वाले सोमरस में देवगुरु बृहस्पति के हविष्य का अंश मिला दिया। जब उस हविष्य को अग्नि में डाला गया तो उसी से रोमहर्षण की उत्पत्ति हुई। चूँकि उनका जन्म इंद्र (क्षत्रिय गुण) और बृहस्पति (ब्राह्मण गुण) के मेल से हुआ था, इसलिए उन्हें "सूत" माना गया।
जब महर्षि वेदव्यास ने महापुराणों की रचना की तो उनके मन में चिंता हुई कि इस ज्ञान को कैसे सहेजा जाये। उनके कई शिष्य थे किन्तु कोई भी उन सभी १८ पुराणों को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए। जब सूत जी किशोरावस्था में पहुंचे तो एक योग्य गुरु की खोज करते हुए महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। आज ये माना जाता है कि सूत कुल के व्यक्ति को वेदाभ्यास का अधिकार नहीं था, ये बिलकुल गलत है। क्यूंकि महर्षि वेदव्यास ने रोमहर्षण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।
उनके आश्रम में सूत जी की विशेष रूप से वेदव्यास के एक अन्य शिष्य शौनक ऋषि से घनिष्ठ मित्रता हो गयी। ये दोनों महर्षि व्यास के सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक माने जाते हैं। रोमहर्षण ने अपनी प्रतिभा से व्यास रचित सभी १८ महापुराणों को कंठस्थ कर लिया। ये देख कर व्यास मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रोमहर्षण से उस अथाह ज्ञान का प्रसार करने को कहा।
तत्पश्चात रोमहर्षण ने अपने गुरु महर्षि व्यास से अपने पुत्र उग्रश्रवा को उनका शिष्य बनाने का अनुरोध किया। उग्रश्रवा अपने पिता के समान ही तेजस्वी थे जिसे देख कर व्यास जी ने उन्हें भी अपना शिष्य बना लिया। रोमहर्षण सभी वेद पुराणों का अध्ययन तो कर ही चुके थे, वे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमपिता ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया।
रोमहर्षण ने उनसे पूछा कि मुझे अपने गुरु से सभी पुराणों का ज्ञान प्राप्त हुआ है और आपने भी मुझे अलौकिक ज्ञान प्रदान किया है। अब मैं किस प्रकार इस ज्ञान का प्रसार करूँ? इस पर ब्रह्मदेव ने उन्हें एक दिव्य चक्र दिया और कहा कि इसे चलाओ और जिस स्थान पर ये रुक जाये वही अपना आश्रम स्थापित कर इस ज्ञान का प्रसार करो।
ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर रोमहर्षण ने उस चक्र को चलाया और वो जाकर "नैमिषारण्य" नामक स्थान पर रुक गया जो ८८००० तपस्वियों का स्थल था। इसी स्थल पर भगवान विष्णु ने निमिष (आंख झपकने में लगने वाला समय) भर में सहस्त्रों दैत्यों का संहार कर दिया था। इसी कारण उस प्रदेश का नाम नैमिषारण्य पड़ा। उसी पवित्र तीर्थ में रोमहर्ष ने अपना आश्रम स्थापित किया और प्रतिदिन सत्संग करने लगे।
कहा जाता है कि उनकी कथा कहने की शैली इतनी रोचक थी कि मनुष्य तो मनुष्य, जीव-जंतु भी उसे सुनने के लिए वहां आ जाते थे। उसी स्थान पर वे "सूत जी" के नाम से प्रसिद्ध हुए। उधर उनके पुत्र उग्रश्रवा भी महर्षि व्यास से शिक्षा लेकर पारंगत हो गए। उन्होंने अपने पिता से भी अधिक शीघ्रता से समस्त पुराणों का अध्ययन कर लिया और वे अपने पिता की भांति ही उस ज्ञान का प्रसार करने लगे।
एक बार नैमिषारण्य के सभी ८८००० ऋषियों ने महर्षि व्यास से ये अनुरोध किया कि वे उन्हें सभी महापुराणों की सम्पूर्ण कथाओं से अवगत कराएं। ये सुनकर महर्षि व्यास ने कहा कि इसके लिए आपको मेरी क्या आवश्यकता है? नैमिषारण्य में मेरे शिष्य रोमहर्षण हैं जो इन सभी कथाओं को सुना सकते है। आप सभी उन्हें "व्यास पद" पर आसीन कर पुराणों का ज्ञान प्राप्त करें। इस पर ऋषियों ने पूछा कि एक सूत को व्यास पद पर कैसे बिठाया जा सकता है? ये सुनकर महर्षि ने सभी को तत्वज्ञान दिया और बताया कि योग्यता जन्म से नहीं बल्कि कर्म से आती है।
ये सुनकर सभी ८८००० ऋषि नैमिषारण्य लौटे और सूत जी को व्यास गद्दी पर बिठा कर पुराणों का ज्ञान देने का अनुरोध किया। इसपर सूत जी ने १२ वर्षों का विशाल यज्ञ सत्र आयोजित किया जिसे सुनने उनके बाल सखा शौनक जी भी पधारे और यजमान का पद ग्रहण किया। सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व पर उनसे प्रश्न करते थे और सूत जी उत्तर देते थे। ऐसा कहते हुए बहुत समय बीत गया और सूत जी ने १० पुराणों की कथा समाप्त कर ११वां पुराण आरम्भ किया।
उधर महाभारत का युद्ध का समाचार सुनकर भगवान बलराम तीर्थ यात्रा पर निकले। घूमते हुए वे नैमिषारण्य पहुंचे जहाँ सूत जी का यज्ञ सत्र चल रहा था। जैसे ही सभी ऋषियों ने बलराम जी को देखा तो सभी अपने स्थान पर खड़े होकर उनका अभिवादन करने लगे और उन्हें आसन दिया। किन्तु सूत जी व्यास गद्दी पर बैठे होने के कारण ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के सम्मान में खड़े नहीं सकते थे। उन्होंने बलराम के आने पर थोड़ी देर के लिए कथा को भी विश्राम दिया।
जब बलराम ने ये देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि इतने बड़े-बड़े महर्षियों ने यहाँ मेरा स्वागत किया किन्तु सूत कुल में जन्मे इस व्यक्ति ने मेरा अपमान किया। यही सोच कर उन्होंने बैठे बैठे ही एक घास को मंत्रसिद्ध कर सूत जी पर चलाया जिससे उनका मस्तक धड़ से अलग हो गया। इस प्रकार सूत जी का वध होते देख कर सारी सभा त्राहि-त्राहि कर उठी। भयानक कोलाहल मच गया।
सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व में बलराम के पास पहुंचे और उनसे कहा कि आपने ये क्या किया? हम सभी ने महर्षि व्यास के आदेशानुसार सूत जी को व्यास पद प्रदान किया था किन्तु आपने बिना सत्य जाने उनका वध कर दिया। अब तो आप पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया है। उससे अधिक हानि हमारी हुई क्यूंकि सूत जी ने अभी तक पुराणों की कथा सम्पूर्ण नहीं की थी। अब ये ज्ञान सदा के लिए लुप्त हो जाएगा।
जब बलराम जी को सत्य का पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने महर्षि शौनक के चरण पकड़ कर कहा कि अनजाने में मुझसे बड़ा पाप हो गया। आप मुझे इसका प्रायश्चित बताएं। किस प्रकार मैं उनके द्वारा दिए गए इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करूँ?
इस पर शौनक जी ने कहा कि आप सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा को यहाँ बुलाइये क्यूंकि व्यास जी के अतिरिक्त अब एक वे ही है जिनके पास समस्त पुराणों का ज्ञान है। ये सुनकर बलराम तत्काल शौनक जी के साथ उग्रश्रवा ऋषि के पास पहुंचे और उनसे क्षमा याचना की। वे उन्हें मना कर नैमिषारण्य ले आये जहाँ उग्रश्रवा जी ने बांकी ८ पुराणों की कथा सुनाने का वचन दिया। बलराम को इससे थोड़ा संतोष हुआ।
उन्होंने पुनः प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले सभी ऋषियों से पूछा कि मुझे बताइये कि मैं प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले आपका और क्या हित करूँ? तब सभी ऋषियों ने कहा कि हे बलराम इस वन में "बल्वल" नामक एक असुर है जो इल्वल का पुत्र है। वो सदैव हमारे यज्ञ में विघ्न डालता है और यज्ञ कुंड में अपशिष्ट पदार्थ डाल देता है। कृपया उससे हमारी रक्षा करें।
ऋषियों का ऐसा अनुरोध सुनकर बलराम जी ने बल्वल ये युद्ध कर सहज ही उसका वध कर दिया और नैमिषारण्य को राक्षसों के आतंक से मुक्त किया। तत्पश्चात वे प्रायश्चित के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल गए। तब सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने पिता का सत्संग आगे बढ़ाया और बचे हुए ८ महापुराणों के ज्ञान से समस्त ऋषियों को परिपूर्ण कर दिया।
महाभारत की कथा जो आज हम पढ़ते हैं वो भी सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा सौति द्वारा ही सुनाई हुई है। जब महर्षि वैशम्पायन ने महाभारत की मूल कथा, जिसे जय कहते हैं, परीक्षित पुत्र जन्मेजय को सुनाई थी, उस समय लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति ने भी वो कथा सुनी थी। बाद में उन्होंने नैमिषारण्य में पहुँच कर वही कथा विस्तार पूर्वक ८८००० ऋषियों को महर्षि शौनक की उपस्थिति में सुनाया। उन्होंने अपने पिता का पद प्राप्त किया था इस कारण उग्रश्रवा सौति को भी अपने पिता की भांति सूत जी कहा जाने लगा।
कुछ लोगों का ये भी मानना है कि लोमहर्षण या उग्रश्रवा सौति सूत नहीं बल्कि ब्राह्मण थे किन्तु ये भी गलत है। हालाँकि कुछ पुराणों मेंरोमहर्षण को अग्नि से उत्पन्न अवश्य माना गया है किन्तु वास्तव में वे सूत ही थे। महाभारत में अनेकों स्थानों पर उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति को "सूत नंदन" कहकर सम्बोधित किया गया है। वैसे भी सूत एक सम्मानित पद ही था, इसीलिए इसे अन्यथा के रूप में नहीं देखना चाहिए।
समान पद होने के कारण ही जनमानस में ये संदेह फैला है कि वास्तविक सूत जी कौन हैं? कुछ लोग लोमहर्षण को सूत जी मानते हैं तो कुछ लोग उग्रश्रवा सौति को। तो इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझें कि दोनों पिता-पुत्र सूत जी ही कहलाते हैं लेकिन पुराणों में अधिकतर स्थानों जिन सूत जी का वर्णन वो लोमहर्षण (रोमहर्षण) हैं और महाभारत के सन्दर्भ में जिन सूत जी का वर्णन आता है वो उग्रश्रवा सौति हैं। आम तौर पर जिन सूत जी की बात होती हैं उन्हें रोमहर्षण ही समझा जाना चाहिए।
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#राधे राधे
तिल भर भी चरण शरण से दूरी न हो,
तिल भर भी श्री ठाकुरजी के स्वरूप की विस्मृति न हो तिल भर भी नाम सेवा न छुटे तिल भर भी श्रीजी की रूप माधुरी से हटकर नेत्र कहीं ओर न चले जाएं !!
हमारी तिल जैसी सेवा से भी अकारण प्रसन्न हो जाने वाले हमारे परमाराध्य श्री युगल श्यामा श्याम हम सब पर सदैव कृपा करें !!
श्री राधे राधे....
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#होली
#राधे कृष्ण
करतारी देदे नाचेंही बोलें सब होरी हो॥ध्रु.॥
संग लियें बहु सहचरी वृषभान दुलारी हो॥
गावत आवत साजसों उतते गिरिधारी हो॥1॥
दोऊ प्रेम आनंदसों उमगे अति भारी॥
चितवन भर अनुरागसों छूटी पिचकारी॥2॥
मृदंग ताल डफ वाजहीं उपजे गति न्यारी॥
झूमक चेतव गावहीं ये मीठी गारी॥3॥
लाल गुलाल उडावहीं सोंधे सुखकारी॥
प्यारी मुखहिलगावहीं प्यारो ललन विहारी॥4॥
हरे हरे आंई दुरकरी अबीर अंधियारी॥
घेरले गईं कुंवरकों भरकें अंक वारी॥5॥
काहू गहिवेनी गुही रचि मांग संवारी॥
काहू अंजनसों आज अरु अखियां अनियारी॥6॥
कोऊ सोंधेसों सानकें पहरावत सारी॥
करते मुरली हरि लई वृषभान दुलारी॥7॥
तब ललिता मिलकें कछू एक बात विचारी॥
प्रिया वसन पियकों दये पियके दीये प्यारी॥8॥
मृगमद केसर घोरकें नख सिखते ढारी॥
सखियन गठजोरो कियो हंस मुसकाय निहारी॥9॥
याही रस निवहो सदा यह केलि तिहारी॥
निरख माधुरी सहचरी छबि पर बलहारी॥10॥
…
राधे राधे..
#🙏गीता ज्ञान🛕
💐💐 गीता में अठारह अध्याय हैं, सात सौ श्लोक हैं; उनमें बहुत-से ऐसे श्लोक हैं, जिनमें से एक श्लोक भी यदि मनुष्य अर्थ और भावसहित मनन करके काम में लाये तो उसका उद्धार हो सकता है | यहाँ गीता के एक श्लोक के विषय में कुछ विचार किया जाता है—
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||
(६ | ५)
‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु |’
इस श्लोक में प्रधान चार बातें बतलायी गयी हैं—
१-मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये |
२-मनुष्य को अपने द्वारा अपना अधःपतन नहीं करना चाहिए |
३-मनुष्य आप ही अपना मित्र है |
४-मनुष्य आप ही अपना शत्रु है |
अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य जिससे अपना परम हित—कल्याण हो, उस भाव और आचरण को तो ग्रहण करता है और जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण का सर्वथा त्याग करता है, वही अपने द्वारा अपना उद्धार कर रहा है | इसके विपरीत, जो मनुष्य जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण करता है तथा जिससे अपना कल्याण हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण नहीं करता, वही अपने द्वारा अपना अधःपतन पतन करता है | अतः जो मनुष्य अपने द्वारा अपने उद्धार का उपाय करता है, वह स्वयं ही अपना मित्र है; इसके विपरीत, जो मनुष्य समझ-बूझकर भी अपने कल्याण के विरुद्ध आचरण करता है, वह स्वयं ही अपना शत्रु है |
अब यह भलीभांति विचार करना चाहिए कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना क्या है और अपने द्वारा अपना अधःपतन करना क्या है |
शास्त्रों में कल्याण के लिए बहुत-से उपाय बतलाये गये हैं और सज्जन पुरुष भी हमारे कल्याणकी बहुत-सी बातें कहते हैं | उन सबपर तथा उसके अतिरिक्त भी, ईश्वर ने आपको जो बुद्धि, विवेक और ज्ञान दिया है, उसका आश्रय लेकर पक्षपातरहित हो आपको आपको गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए | इस प्रकार गम्भीर विचार करनेपर आपकी बुद्धि में संशय और भ्रम से रहित जो कल्याणकर भाव और आचरण प्रतीत हो, उसको सिद्धान्त मानकर तत्परतापूर्वक कटिबद्ध हो उसका सेवन करना और उसके विपरीत भाव और आचरण का कभी सेवन न करना—यही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है | इसी प्रकार जो भाव और आचरण हमें विचार करने पर लाभप्रद प्रतीत हो, उसका सेवन न करना और जो पतनकारक प्रतीत हो, उसका सेवन करना अपना अधःपतन करना है |
#☝आज का ज्ञान
👹 राक्षसों की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या वे जन्म से ही बुरे थे या रक्षक? 🔱✨
वेद और पुराणों में देव, असुर, यक्ष, गंधर्व और नाग आदि जातियों का वर्णन मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन्हें आज हम 'राक्षस' कहते हैं, उनका मूल काम क्या था और रावण का जन्म कैसे हुआ?
आइए जानते हैं राक्षस वंश का पूरा और रोचक इतिहास! 👇
1️⃣ रक्ष और यक्ष: उत्पत्ति का रहस्य 🌊
प्रारंभिक काल में जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो समुद्र और जल-प्राणियों की सुरक्षा के लिए कुछ जातियों को उत्पन्न किया।
जिन्होंने 'रक्षा' का भार संभाला, वे 'राक्षस' कहलाए। (शुरुआत में यह एक पवित्र कार्य माना जाता था)।
जिन्होंने 'यक्षण' (पूजन) स्वीकार किया, वे 'यक्ष' कहलाए।
2️⃣ हेति और प्रहेति: राक्षसों के प्रथम प्रतिनिधि 👑
ब्रह्मा जी के श्रम और क्रोध से 'हेति' और भूख से 'प्रहेति' नामक दो बलशाली भाइयों का जन्म हुआ। प्रहेति तपस्या में लीन हो गया, जबकि हेति ने राजपाट संभाला। हेति के वंश में आगे चलकर 'विद्युत्केश' का जन्म हुआ।
3️⃣ जब शिव-पार्वती ने लिया एक राक्षस पुत्र को गोद 🌙
विद्युत्केश की पत्नी ने अपने नवजात पुत्र को लावारिस छोड़ दिया था। तब उस अनाथ बालक पर भगवान शिव और माता पार्वती की नजर पड़ी। उन्होंने उसे गोद ले लिया और उसका नाम 'सुकेश' रखा। शिव जी के वरदान से वह अत्यंत शक्तिशाली और निर्भीक हो गया।
4️⃣ लंका का निर्माण और राक्षसों का अहंकार 🏰
सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र हुए— माल्यवान, सुमाली और माली।
इन तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और अजेय होने का वरदान पाया। विश्वकर्मा जी से इन्होंने समुद्र तट पर 'त्रिकुट पर्वत' के निकट स्वर्ण लंका का निर्माण करवाया। लेकिन वरदान पाकर वे अहंकारी हो गए और यक्षों-देवताओं पर अत्याचार करने लगे।
5️⃣ रावण का जन्म और लंका पर अधिकार ⚔️
देवताओं से हारने के बाद राक्षसों को लंका छोड़नी पड़ी और लंका प्रजापति ब्रह्मा ने धनपति कुबेर (यक्ष) को सौंप दी।
सुमाली की पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से हुआ। इन्हीं के पुत्र हुए— महापराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और पुत्री शूर्पणखा। रावण ने अपनी माता के कहने पर शिव जी की तपस्या की, मायावी शक्तियां पाईं और अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया।
6️⃣ रावण का वंश और महाविनाश 🔥
रावण ने मंदोदरी से विवाह किया, जिससे मेघनाद, अक्षयकुमार आदि पुत्र हुए।
कुम्भकर्ण के पुत्रों में भीम (जिसके नाम पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग है) और विभीषण की पुत्री त्रिजटा (जो सीता जी की रक्षक थी) प्रमुख थे।
अपने अहंकार और अधर्म के कारण रावण ने देवलोक तक दुश्मनी मोल ली।
अंततः रामायण के महायुद्ध में विभीषण को छोड़कर लंका के समस्त राक्षस वंश का नाश हो गया और धर्म की जीत हुई।
।। जय जय सियाराम ।। 🙏🚩













