🌷 #आमलकी एकादशी 🌷
🌷 *एकादशी व्रत के लाभ* 🌷
➡ *26 फरवरी 2026 गुरुवार को रात्रि 12:33 से 27 फरवरी, शुक्रवार को रात्रि 10:32 तक एकादशी है।*
💥 *विशेष - 27 फरवरी, शुक्रवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखें ।*
🙏🏻 *युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा : श्रीकृष्ण ! मुझे फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम और माहात्म्य बताने की कृपा कीजिये ।*
🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण बोले: महाभाग धर्मनन्दन ! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘आमलकी’ है । इसका पवित्र व्रत विष्णुलोक की प्राप्ति करानेवाला है । राजा मान्धाता ने भी महात्मा वशिष्ठजी से इसी प्रकार का प्रश्न पूछा था, जिसके जवाब में वशिष्ठजी ने कहा था :*
🙏🏻 *‘महाभाग ! भगवान विष्णु के थूकने पर उनके मुख से चन्द्रमा के समान कान्तिमान एक बिन्दु प्रकट होकर पृथ्वी पर गिरा । उसीसे आमलक (आँवले) का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है । इसी समय प्रजा की सृष्टि करने के लिए भगवान ने ब्रह्माजी को उत्पन्न किया और ब्रह्माजी ने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अंतःकरण वाले महर्षियों को जन्म दिया । उनमें से देवता और ॠषि उस स्थान पर आये, जहाँ विष्णुप्रिय आमलक का वृक्ष था । महाभाग ! उसे देखकर देवताओं को बड़ा विस्मय हुआ क्योंकि उस वृक्ष के बारे में वे नहीं जानते थे । उन्हें इस प्रकार विस्मित देख आकाशवाणी हुई: ‘महर्षियो ! यह सर्वश्रेष्ठ आमलक का वृक्ष है, जो विष्णु को प्रिय है । इसके स्मरणमात्र से गोदान का फल मिलता है । स्पर्श करने से इससे दुगना और फल भक्षण करने से तिगुना पुण्य प्राप्त होता है । यह सब पापों को हरनेवाला वैष्णव वृक्ष है । इसके मूल में विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्ध में परमेश्वर भगवान रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण तथा फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं । आमलक सर्वदेवमय है । अत: विष्णुभक्त पुरुषों के लिए यह परम पूज्य है । इसलिए सदा प्रयत्नपूर्वक आमलक का सेवन करना चाहिए ।’*
🙏🏻 *ॠषि बोले : आप कौन हैं ? देवता हैं या कोई और ? हमें ठीक ठीक बताइये ।*
🙏🏻 *पुन : आकाशवाणी हुई : जो सम्पूर्ण भूतों के कर्त्ता और समस्त भुवनों के स्रष्टा हैं, जिन्हें विद्वान पुरुष भी कठिनता से देख पाते हैं, मैं वही सनातन विष्णु हूँ।*
🙏🏻 *देवाधिदेव भगवान विष्णु का यह कथन सुनकर वे ॠषिगण भगवान की स्तुति करने लगे । इससे भगवान श्रीहरि संतुष्ट हुए और बोले : ‘महर्षियो ! तुम्हें कौन सा अभीष्ट वरदान दूँ ?*
🙏🏻 *ॠषि बोले : भगवन् ! यदि आप संतुष्ट हैं तो हम लोगों के हित के लिए कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरुपी फल प्रदान करनेवाला हो ।*
🙏🏻 *श्रीविष्णुजी बोले : महर्षियो ! फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त एकादशी हो तो वह महान पुण्य देनेवाली और बड़े बड़े पातकों का नाश करनेवाली होती है । इस दिन आँवले के वृक्ष के पास जाकर वहाँ रात्रि में जागरण करना चाहिए । इससे मनुष्य सब पापों से छुट जाता है और सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है । विप्रगण ! यह व्रत सभी व्रतों में उत्तम है, जिसे मैंने तुम लोगों को बताया है ।*
🙏🏻 *ॠषि बोले : भगवन् ! इस व्रत की विधि बताइये । इसके देवता और मंत्र क्या हैं ? पूजन कैसे करें? उस समय स्नान और दान कैसे किया जाता है?*
🙏🏻 *भगवान श्रीविष्णुजी ने कहा : द्विजवरो ! इस एकादशी को व्रती प्रात:काल दन्तधावन करके यह संकल्प करे कि ‘ हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! मैं एकादशी को निराहार रहकर दुसरे दिन भोजन करुँगा । आप मुझे शरण में रखें ।’ ऐसा नियम लेने के बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, गुरुपत्नीगामी तथा मर्यादा भंग करनेवाले मनुष्यों से वह वार्तालाप न करे । अपने मन को वश में रखते हुए नदी में, पोखरे में, कुएँ पर अथवा घर में ही स्नान करे । स्नान के पहले शरीर में मिट्टी लगाये ।*
🌷 *मृत्तिका लगाने का मंत्र*
*अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे ।*
*मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोटयां समर्जितम् ॥*
🙏🏻 *वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतार के समय भगवान विष्णु ने भी तुम्हें अपने पैरों से नापा था । मृत्तिके ! मैंने करोड़ों जन्मों में जो पाप किये हैं, मेरे उन सब पापों को हर लो ।’*
🙏🏻 *स्नान का मंत्र*
*त्वं मात: सर्वभूतानां जीवनं तत्तु रक्षकम्।*
*स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसानां पतये नम:॥*
*स्नातोSहं सर्वतीर्थेषु ह्रदप्रस्रवणेषु च्।*
*नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत्॥*
🙏🏻 *‘जल की अधिष्ठात्री देवी ! मातः ! तुम सम्पूर्ण भूतों के लिए जीवन हो । वही जीवन, जो स्वेदज और उद्भिज्ज जाति के जीवों का भी रक्षक है । तुम रसों की स्वामिनी हो । तुम्हें नमस्कार है । आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरों में स्नान कर चुका । मेरा यह स्नान उक्त सभी स्नानों का फल देनेवाला हो ।’*
🙏🏻 *विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह परशुरामजी की सोने की प्रतिमा बनवाये । प्रतिमा अपनी शक्ति और धन के अनुसार एक या आधे माशे सुवर्ण की होनी चाहिए । स्नान के पश्चात् घर आकर पूजा और हवन करे । इसके बाद सब प्रकार की सामग्री लेकर आँवले के वृक्ष के पास जाय । वहाँ वृक्ष के चारों ओर की जमीन झाड़ बुहार, लीप पोतकर शुद्ध करे । शुद्ध की हुई भूमि में मंत्रपाठपूर्वक जल से भरे हुए नवीन कलश की स्थापना करे । कलश में पंचरत्न और दिव्य गन्ध आदि छोड़ दे । श्वेत चन्दन से उसका लेपन करे । उसके कण्ठ में फूल की माला पहनाये । सब प्रकार के धूप की सुगन्ध फैलाये । जलते हुए दीपकों की श्रेणी सजाकर रखे । तात्पर्य यह है कि सब ओर से सुन्दर और मनोहर दृश्य उपस्थित करे । पूजा के लिए नवीन छाता, जूता और वस्त्र भी मँगाकर रखे । कलश के ऊपर एक पात्र रखकर उसे श्रेष्ठ लाजों(खीलों) से भर दे । फिर उसके ऊपर परशुरामजी की मूर्ति (सुवर्ण की) स्थापित करे।*
🌷 *‘विशोकाय नम:’ कहकर उनके चरणों की,*
*‘विश्वरुपिणे नम:’ से दोनों घुटनों की,*
*‘उग्राय नम:’ से जाँघो की,*
*‘दामोदराय नम:’ से कटिभाग की,*
*‘पधनाभाय नम:’ से उदर की,*
*‘श्रीवत्सधारिणे नम:’ से वक्ष: स्थल की,*
*‘चक्रिणे नम:’ से बायीं बाँह की,*
*‘गदिने नम:’ से दाहिनी बाँह की,*
*‘वैकुण्ठाय नम:’ से कण्ठ की,*
*‘यज्ञमुखाय नम:’ से मुख की,*
*‘विशोकनिधये नम:’ से नासिका की,*
*‘वासुदेवाय नम:’ से नेत्रों की,*
*‘वामनाय नम:’ से ललाट की,*
*‘सर्वात्मने नम:’ से संपूर्ण अंगो तथा *मस्तक की पूजा करे ।*
🙏🏻 *ये ही पूजा के मंत्र हैं। तदनन्तर भक्तियुक्त चित्त से शुद्ध फल के द्वारा देवाधिदेव परशुरामजी को अर्ध्य प्रदान करे । अर्ध्य का मंत्र इस प्रकार है :*
🌷 *नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोSस्तु ते ।*
*गृहाणार्ध्यमिमं दत्तमामलक्या युतं हरे ॥*
🙏🏻 *‘देवदेवेश्वर ! जमदग्निनन्दन ! श्री विष्णुस्वरुप परशुरामजी ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । आँवले के फल के साथ दिया हुआ मेरा यह अर्ध्य ग्रहण कीजिये ।’*
🙏🏻 *तदनन्तर भक्तियुक्त चित्त से जागरण करे । नृत्य, संगीत, वाघ, धार्मिक उपाख्यान तथा श्रीविष्णु संबंधी कथा वार्ता आदि के द्वारा वह रात्रि व्यतीत करे । उसके बाद भगवान विष्णु के नाम ले लेकर आमलक वृक्ष की परिक्रमा एक सौ आठ या अट्ठाईस बार करे । फिर सवेरा होने पर श्रीहरि की आरती करे । ब्राह्मण की पूजा करके वहाँ की सब सामग्री उसे निवेदित कर दे । परशुरामजी का कलश, दो वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएँ दान कर दे और यह भावना करे कि : ‘परशुरामजी के स्वरुप में भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ।’ तत्पश्चात् आमलक का स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करे और स्नान करने के बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराये । तदनन्तर कुटुम्बियों के साथ बैठकर स्वयं भी भोजन करे ।*
🙏🏻 *सम्पूर्ण तीर्थों के सेवन से जो पुण्य प्राप्त होता है तथा सब प्रकार के दान देने दे जो फल मिलता है, वह सब उपर्युक्त विधि के पालन से सुलभ होता है । समस्त यज्ञों की अपेक्षा भी अधिक फल मिलता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है ।’*
🙏🏻 *वशिष्ठजी कहते हैं : महाराज ! इतना कहकर देवेश्वर भगवान विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये । तत्पश्चात् उन समस्त महर्षियों ने उक्त व्रत का पूर्णरुप से पालन किया । नृपश्रेष्ठ ! इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ।*
🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह दुर्धर्ष व्रत मनुष्य को सब पापों से मुक्त करनेवाला है ।*
*🌞ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌞*
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फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी या रंगभरी एकादशी कहते हैं, इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है।
आमलकी या रंगभरी एकादशी के पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, इस दिन को मनाने के कुछ अनूठे और रोचक पहलू निम्नलिखित हैं:
- आंवले का महत्व: इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है और भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करते हैं।।
- पौराणिक कथा: माना जाता है कि भगवान शिव इस दिन माता पार्वती का गौना कराने के बाद काशी पहुंचे थे, और वहां उनके आगमन का उत्सव मनाया गया था।
- रंगों का समावेश: इस दिन काशी में बाबा विश्वनाथ और माँ पार्वती को रंग अर्पित करने की परंपरा है, जो होली के आगमन की शुरुआत का प्रतीक है।
- आमलकी एकादशी का व्रत पाप नाश, मोक्ष प्राप्ति और स्वास्थ्य लाभ देने वाला माना जाता है।
इस विशेष दिन पर भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा करने से सुख-समृद्धि और जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय….
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🙏द्रोण गुरु के पद पर🙏
गुरु द्रोणाचार्य ब्राह्मण थे, धनुर्विद्या के महान आचार्य थे, पर बड़े गरीब थे| इतने गरीब थे कि जीवन का निर्वाह होना कठिन था| घर में कुल तीन प्राणी थे - द्रोणाचार्य स्वयं, उनकी पत्नी और उनका पुत्र अश्वत्थामा| पुत्र की अवस्था पांच-छ: वर्ष की थी|
एक दिन पुत्र ने अपने एक साथी को दूध पीते हुए देख लिया| उसके मन में भी दूध पीने की अभिलाषा जाग उठी|
उसने अपनी मां के पास जाकर कहा, "मां, मैं दूध पीऊंगा|"
पर मां दूध पाती तो कहां पाती? जिस मां को खाने के लिए अन्न न मिल रहा हो, वह अपने बालक को दूध कैसे पिलाती? मां का हृदय विदीर्ण हो गया| पर बालक को तो सांत्वना प्रदान करनी ही थी|
मां ने आटे का पानी बालक को देते हुए कहा, "लो, दूध पी लो|"
बालक को तो दूध के स्वाद का पता ही नहीं था| उसने आटे के पानी को पीकर समझा कि उसकी मां उसे दूध पिला रहे है| गुरु द्रोणाचार्य का हृदय यह सब देख-सुन कर कांप उठा| उन्होंने प्रतिज्ञा की कि या तो धन और यश पैदा करके रहूंगा या मर जाऊंगा|
गुरु द्रोणाचार्य मन ही मन सोचने लगे...क्या करना चाहिए? धन और यश के लिए किस ओर जाना चाहिए? द्रोणाचार्य को पांचाल नरेश द्रुपद याद आया| विद्यार्थी अवस्था में द्रुपद और उन्होंने एक ही गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की थी| द्रोणाचार्य आशाओं के रथ पर सवार होकर पांचाल देश की राजधानी की ओर चल पड़े| मार्ग में बड़े-बड़े कष्ट उठाए, पर धन मिलने की आशा में वे कष्ट भी उन्हें सुखदायी मालूम हुए|
कई दिनों तक बराबर पैदल चलने के पश्चात द्रोणाचार्य पांचाल की राजधानी में पहुंचे| उन्होंने सोचा था, राजधानी में पहुंचते ही द्रुपद से भेंट हो जाएगी, वह उनका स्वागत करेगा, उन्हें बड़े आदर से ठहराएगा और उनकी सहायता करेगा| किंतु उन्हें क्या पता था कि द्रुपद अब गुरुकुल का विद्यार्थी नहीं है| अब वह एक बहुत बड़े राज्य का नृपति है| सिपाहियों, सैनिकों और मंत्रियों से घिरा रहता है| दूसरों की तो बात ही क्या, अपने लोगों से भी उसकी भेंट बड़ी कठिनाई से हो पाती थी|
कई दिनों तक प्रयत्न करने के पश्चात द्रोणाचार्य द्रुपद के सामने जा पाए| किंतु यह क्या? द्रुपद ने तो उन्हें देखते ही मुंह फेर लिया| सहायता करने की कौन कहे, उसने तो उन्हें पहचानने से भी इनकार कर दिया|
द्रोणाचार्य का मन-मानस जैसे मथ सा गया| उनके मन में जगत से ही नहीं, मानव मात्र से घृणा उत्पन्न हो गई| उन्होंने निश्चय किया, अब वे संन्यासी हो जाएंगे और वन की गोद में बैठकर अपना जीवन व्यतीत करेंगे| द्रोणाचार्य संन्यासी बनने के उद्देश्य से पैदल ही हरिद्वार की ओर चल पड़े|
संध्या के पूर्व का समय था| थके-मांदे द्रोणाचार्य हस्तिनापुर में एक कुएं के पास जा पहुंचे| वे कुएं पर ही रात्रि व्यतीत करना चाहते थे, पर वहां पांडव और कौरव राजकुमारों को देखकर विस्मित हो गए| यद्यपि वे उन्हें पहचानते नहीं थे, पर उनके रंग-ढंग और उनके वार्तालाप से उन्होंने यह जान लिया कि यह पांडव और कौरव राजकुमार हैं|
पांडव और कौरव राजकुमार कुएं के पास गेंद खेल रहे थे| उनकी गेंद कुएं में जा गिरी थी| वे अपनी गेंद कुएं से बाहर निकालने के लिए बड़ा प्रयत्न कर रहे थे, किंतु निकाल नहीं पा रहे थे|
द्रोणाचार्य राजकुमारों की व्याकुलता का कारण जानकर द्रवित हो उठे| उन्होंने राजकुमारों से कहा, "तुम लोग चिंता मत करो| मैं अभी तुम्हारी गेंद कुएं से बाहर निकाले देता हूं|"
द्रोणाचार्य धनुर्विद्या के महान पंडित थे| दूसरे विद्वान ब्राह्मण तो अपने पास शास्त्र रखते हैं, पर द्रोणाचार्य अपने पास धनुष-बाण रखते थे| वे जहां भी जाते थे, धनुष-बाण लिए रहते थे|
द्रोणाचार्य ने कुएं के मुख पर खड़े होकर भीतर गिरी हुई गेंद को लक्ष्य करके एक बाण चलाया| बाण का फलक गेंद में चुभ गया| बाण सीधा खड़ा हो गया| द्रोणाचार्य ने दूसरा बाण प्रथम बाण के ऊपर चलाया, दूसरा बाण प्रथम बाण में चुभकर खड़ा हो गया| इसी प्रकार द्रोणाचार्य ने तीन-चार बाण और चलाए| सभी बाण एक दूसरे पर खड़े हो गए| अंतिम बाण द्रोणाचार्य के हाथ में था| उन्होंने उसे खींचकर सभी बाणों के साथ गेंद बाहर निकाल ली|
गेंद पाकर राजकुमारों का मन प्रसन्नता से खिल उठा| साथ ही वे द्रोणाचार्य की बाण विद्या और उनके चातुर्य पर विमुग्ध हो उठे| वे उन्हें देवव्रत के पास ले गए, क्योंकि उन दिनों देवव्रत ही उनकी देख-रेख किया करते थे|
राजकुमारों ने देवव्रत से द्रोणाचार्य की बाण विद्या की बड़ी प्रशंसा की| स्वयं देवव्रत भी द्रोणाचार्य से वार्तालाप करके बड़े प्रसन्न हुए| उन्होंने राजकुमारों को बाण विद्या सिखाने के लिए द्रोणाचार्य को गुरु पद पर प्रतिष्ठित कर दिया| द्रोणाचार्य का अभीष्ट पूर्ण हो गया| उन्हें गुरु-पद पर रहते हुए धन तो मिला ही, बहुत बड़ा यश भी मिला| इतना बड़ा यश मिला कि यदि द्रोणाचार्य को निकाल दिया जाए, तो महाभारत का युद्ध एक खेल-सा लगने लगता है|
मनुष्य का भाग्य जब चमकता है, तो इसी प्रकार चमकता है| पुत्र को दूध के स्थान पर आटे का पानी पिलाने वाले द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के पूज्य बन गए| दुर्योधन तो उन्हें शीश झुकाता ही था, अर्जुन भी शीश झुकाया करता था|.
#पौराणिक कथा
एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूँढ रहे थे।
एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया। तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा-“दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है?” राजा बलि बोले-“देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं। आप स्वयं पूछ लें।”
इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकारते हैं। जैसे-श्री, लक्ष्मी आदि।” इन्द्र बोले-“देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?”
लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूँ। अर्थात मैं समयानुसार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूँ।” इन्द्र बोले-“देवी! आप असुरों के यहाँ निवास क्यों नहीं करतीं?” लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहाँ सत्य हो, धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों। लेकिन असुर भ्रष्ट हो रहे हैं।
ये पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पर अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं।ये तप-उपवास नहीं करते; यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है। पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है। ये लोग पशु तो पाल लेते हैं लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं।
ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया। देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसलिए अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूँगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, जया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियाँ भी निवास करेंगी।
देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा।” तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए। यह कहानी भक्ति और भगवान की शेयर जरूर करें जिससे उन लोगों को भी विश्वास हो जिन्हें भगवान पर विश्वास नहीं है और हमारा सोया हुआ हिंदू जाग सके... जय मां लक्ष्मी...जय श्री कृष्ण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
लक्ष्मी नारायण #जय लक्ष्मी नारायण
लक्ष्मी और नारायण की संयुक्त रूप से पूजा करना ब्रह्मांड की पालनकर्ता और ऐश्वर्य प्रदाता शक्तियों को एक साथ साधने जैसा है। इनकी कृपा से न केवल भौतिक बल्कि आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दोषों का भी निवारण होता है।
लक्ष्मी नारायण के आशीर्वाद से मुख्य रूप से निम्नलिखित दोष दूर होते हैं:
1. दरिद्रता और आर्थिक दोष
लक्ष्मी जी धन की देवी हैं और नारायण उसके संरक्षक। जब इनकी संयुक्त कृपा होती है, तो घर से 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता) का वास समाप्त होता है। यदि कुंडली में 'धन योग' बाधित हो या आय के स्रोतों में निरंतर रुकावट आ रही हो, तो वह दोष दूर होता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
2. पितृ दोष का प्रभाव कम होना
भगवान विष्णु को पितरों का अधिपति माना जाता है। लक्ष्मी नारायण की भक्ति करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। यदि परिवार में वंश वृद्धि में बाधा आ रही हो या बिना कारण के कलह रहता हो, तो इनकी आराधना से पितृ दोष की शांति होती है और कुल की उन्नति होती है।
3. दांपत्य जीवन के दोष
लक्ष्मी नारायण को आदर्श युगल माना जाता है। इनकी पूजा से वैवाहिक जीवन के तनाव, मनमुटाव और मांगलिक दोष जैसे ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। यह आशीर्वाद पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और प्रेम को बढ़ाकर पारिवारिक कलह को समाप्त करता है।
4. वास्तु दोष का निवारण
जिस घर में नियमित रूप से लक्ष्मी नारायण की पूजा और 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ होता है, वहां की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या मुख्य स्थान पर इनकी उपस्थिति से वास्तु जनित दोष स्वतः शांत होने लगते हैं और घर में सकारात्मकता का संचार होता है।
5. ग्रहों के अशुभ प्रभाव (विशेषकर शनि और राहु)
भगवान विष्णु 'जगन्नाथ' हैं, जो सभी ग्रहों को नियंत्रित करते हैं। लक्ष्मी नारायण की शरण में जाने से शनि की साढ़ेसाती या राहु-केतु के अशुभ गोचर से होने वाली मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर होती हैं। यह भक्त के भीतर संकल्प शक्ति पैदा करता है, जिससे वह बुरे समय के दोषों को पार कर लेता है।
> विशेष: "ॐ लक्ष्मी नारायणाय नमः" मंत्र का नियमित जाप 'भय' और 'असुरक्षा' जैसे मानसिक दोषों को दूर कर व्यक्ति को निर्भय और संतुष्ट बनाता है।
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#🕉️सनातन धर्म🚩
⁉️मंत्र को गुप्त क्यो रखा जाता हैं⁉️
🕉️मंत्र दीक्षा का अर्थ है कि जब तुम समर्पण करते हो तो गुरु तुममें प्रवेश कर जाता है। वह तुम्हारे शरीर मन आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। गुरु तुम्हारे अंतस में जाकर तुम्हारे अनुकूल ध्वनि की खोज करेगा। वह तुम्हारा मंत्र होगा और जब तुम उसका उच्चारण करोगे , तो तुम एक भिन्न आयाम में एक भिन्न व्यक्त
होओगे। जब तक समर्पण नहीं होता, मंत्र नहीं दिया जा सकता है मंत्र देने का अर्थ है कि गुरु ने तुममें प्रवेश किया है। गुरु ने तुम्हारी गहरी लयबद्धता को तुम्हारे प्राणों के संगीत को अनुभव किया है और फिर वह तुम्हें प्रतीक रूप में एक मंत्र देता है, जो तुम्हारे अंतस के संगीत से मेल खाता हो और जब तुम उस मंत्र का उच्चारड़ करते हो तो तुम आंतरिक संगीत के जगत में प्रवेश कर जाते हो। तब आंतरिक लयबद्धता उपलब्ध होती है।।🕉️
‼️मंत्र तो सिर्फ चाबी है और चाबी तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक ताले को न जान लिया जाए। मैं तुम्हें तभी चाबी दे सकता हूं जब तुम्हारे ताले को समझ लूं। चाबी तभी सार्थक है जब वह ताले को खोले। किसी भी चाबी से काम नहीं चलेगा प्रत्येक आदमी विशेष ढंग का ताला है उसके लिए विशेष ढंग की चाबी जरूरी है।
यही कारण है कि मंत्रों को गुप्त रखा जाता है। अगर तुम अपना मंत्र किसी और को बताते हो, तो वह उसका प्रयोग कर सकता है। यही कारण है कि लोगों को अपने अपने मंत्र गुप्त रखने चाहिए। उन्हें सार्वजनिक बनाना ठीक नहीं है। वह खतरनाक है। तुम दीक्षित हुए हो तो तुम जानते हो। तुम उसका मूल्य जानते हो । तुम उसे बांटते नहीं फिर सकते। यह दूसरों के लिए हानिकर हो सकता है । यह तुम्हारे लिए भी हानिकर हो सकता है। इसके कई कारण हैं।
पहली बात कि तुम वचन तोड़ रहे हो और जैसे ही वचन टूटता है, गुरु के साथ तुम्हारा संपर्क टूट जाता है। फिर तुम गुरु के संपर्क में नहीं रहोगे। वचन पालन करने से ही सतत संपर्क कायम रहता है। दूसरी बात दूसरे को बताने से दूसरे के साथ उसके संबंध में बातचीत करने से मंत्र मन की सतह पर चला आता है और उसकी गहरी जड़ें टूट जाती हैं। तब मंत्र गपशप का हिस्सा बन जाता है और तीसरा कारण है कि गुप्त रखने से मंत्र गहराता है। जितना गुप्त रखोगे वह उतना ही गहरे जाएगा उसे गहरे में जाना ही होगा।‼️
🧘मारपा के संबंध में खबर है कि जब उसके गुरु ने उसे गुह्य मंत्र दिया, तो उससे वचन ले लिया कि वह उसे बिलकुल गुप्त रखेगा। उसे कहा गया कि तुम इसे किसी को भी नहीं बताओगे। फिर मारपा का गुरु उसके स्वप्न में प्रकट हुआ और उसने पूछा कि तुम्हारा मंत्र क्या है और स्वप्न में भी मारपा ने वचन का पालन किया; उसने बताने से इनकार कर दिया और कहा जाता है कि इस भय से कि कहीं स्वप्न में गुरु फिर प्रकट हों या किसी को भेजें और वह इतनी नींद में हो कि गुप्त मंत्र को प्रकट कर दे और वचन टूट जाए। मारपा ने बिलकुल सोना ही छोड़ दिया वह सोता ही नहीं था। ऐसे सोए बिना मारपा को सात आठ दिन हो गए थे। फिर जब उसके गुरु ने पूछा कि तुम सोते क्यों नहीं हो। मैं देखता हूं कि तुमने सोना छोड़ दिया है। बात क्या है मारपा ने गुरु से कहा :आप मेरे साथ चालबाजी कर रहे हैं। आपने स्वप्न में आकर मुझसे मेरा मंत्र पूछा था मैं आपको भी नहीं बताने वाला हूं। जब वचन दे दिया तो मैं उसका स्वप्न में भी पालन करूंगा। लेकिन फिर मैं डर गया नींद में कौन जाने किसी दिन मैं भूल भी सकता हूं। अगर तुम अपने वचन के प्रति इतने सावधान हो कि स्वप्न में भी उसका स्मरण रहता है तो उसका अर्थ है कि वह गहराई में उतर रहा है। वह अंतस में उतर रहा है वह अंतरस्थ प्रदेश में प्रवेश कर रहा है और वह जितनी गहराई को छुएगा, वह उतना ही तुम्हारे लिए चाबी बनता जाएगा। क्योंकि ताला तो अंतर्तम में है । किसी चीज के साथ भी प्रयोग करो अगर तुम उसे गुप्त रख सके , तो वह गहराई प्राप्त करेगा और अगर तुम उसे गुप्त न रख सके तो वह बाहर निकल आएगा। तुम क्यों कोई बात दूसरे से कहना चाहते हो तुम क्यों बातें करते रहते हो। सच तो यह है कि जिस चीज को तुम कह देते हो उससे मुक्त हो जाते हो। एक बार तुमने किसी से कह दिया , तुम्हारा उससे छुटकारा हो जाता है। वह चीज बाहर निकल गई। मनो विश्लेषण का पूरा धंधा इसी पर खड़ा है । रोगी बोलता रहता है और मनोविश्लेषक सुनता रहता है। इससे रोगी को राहत मिलती है। वह अपनी समस्याओं के बारे में ,अपने दुख के बारे में, जितना ही बोलता है वह उनसे उतनी ही छुट्टी पा लेता है और इसके ठीक विपरीत घटित होता है, जब तुम किसी चीज को छिपाकर रखते हो, गुप्त रखते हो। इसीलिए तुम्हें कहा जाता है कि मंत्र को किसी से कभी मत कहो। तब वह गहरे से गहरे तल पर उतरता जाता है और किसी दिन ताले को खोल देता
है ।🧘
🕉️ ॐ नमः शिवाय🕉️
#☝आज का ज्ञान
वरुणी — जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं”
सनातन धर्म की विशेषता यह है कि वह जीवन के किसी भी पक्ष से आँखें नहीं मूँदता। समुद्र मंथन — Samudra Manthan — के समय जब अनेक रत्न प्रकट हुए, तब वरुणी देवी भी प्रकट हुईं।
यह घटना यह नहीं सिखाती कि मदिरा का उत्सव मनाया जाए।
यह सिखाती है कि मनुष्य को हर शक्ति का सम्मान करना चाहिए — और उससे दूर रहकर संयम रखना चाहिए।
Varuni कौन हैं?
वरुणी हिंदू धर्म में मदिरा (सुरा) से जुड़ी देवी मानी जाती हैं। उनका प्राकट्य समुद्र मंथन — Samudra Manthan — के समय हुआ था। जब देवता और असुर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन कर रहे थे, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ वरुणी भी प्रकट हुईं।
🔹 उनका संबंध किससे है?
• उन्हें जल के देवता Varuna की पुत्री (कुछ कथाओं में पत्नी) माना जाता है।
• “वारुणी” शब्द का अर्थ ही है — वरुण से संबंधित।
🔹 वे क्या प्रतीक करती हैं?
वरुणी केवल मदिरा की देवी के रूप में नहीं, बल्कि मोह और आसक्ति की परीक्षा के रूप में भी देखी जाती हैं।
समुद्र मंथन में जहाँ अमृत निकला, वहीं विष भी निकला। यह संदेश देता है कि संसार की हर वस्तु में द्वंद्व है — उपयोग और दुरुपयोग।
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🕉️ सनातन दृष्टि
सनातन धर्म ने वरुणी के अस्तित्व को स्वीकार किया, पर नशे का महिमामंडन नहीं किया।
शास्त्रों ने सिखाया:
• संयम सर्वोपरि है।
• जो वस्तु विवेक को कमजोर करे, उससे दूरी ही श्रेष्ठ है।
• नशा मनुष्य की परीक्षा लेता है, इसलिए उससे सावधान रहना चाहिए।
इस प्रकार, वरुणी की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि मदिरा का उत्सव मनाया जाए,
बल्कि यह सिखाती है कि धर्म, मर्यादा और आत्म-नियंत्रण जीवन का आधार हैं।
Varuni – एक सीख, न कि उत्सव
सनातन धर्म की विशेषता यह है कि वह जीवन के किसी भी पक्ष से आँखें नहीं मूँदता। समुद्र मंथन — Samudra Manthan — के समय जब अनेक रत्न प्रकट हुए, तब वरुणी देवी भी प्रकट हुईं।
यह घटना यह नहीं सिखाती कि मदिरा का उत्सव मनाया जाए।
यह सिखाती है कि मनुष्य को हर शक्ति का सम्मान करना चाहिए — और उससे दूर रहकर संयम रखना चाहिए।
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🕉️ सनातन की शिक्षा – संयम
हिंदू परंपरा ने कभी भी नशे को महान या आवश्यक नहीं बताया।
बल्कि यह स्पष्ट किया कि:
• नशा मन को विचलित करता है।
• विवेक को कमज़ोर करता है।
• और व्यक्ति के वास्तविक संस्कारों को उजागर कर देता है।
इसलिए हमारे शास्त्रों और आचार्यों ने संयम (आत्म-नियंत्रण) को सर्वोच्च गुण माना।
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⚖️ सम्मान का अर्थ क्या है?
सम्मान का अर्थ यह नहीं कि उसका सेवन किया जाए।
सम्मान का अर्थ है — उसकी शक्ति को समझना और उससे सावधान रहना।
जैसे अग्नि का सम्मान किया जाता है, पर उससे खेला नहीं जाता।
वैसे ही नशे की वस्तुओं से दूरी रखना ही बुद्धिमानी मानी गई।
सनातन यह सिखाता है:
• अपने आचरण को कभी गिरने न दो।
• नशे को बहाना बनाकर अधर्म मत करो।
• यदि कोई वस्तु आपके विवेक को कमजोर करे, तो उससे दूर रहना ही श्रेष्ठ है।
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🌿 हिंदू समाज ने क्या सीखा?
हमारे ऋषियों ने समझा कि मनुष्य का पतन धीरे-धीरे होता है।
पहले आकर्षण, फिर आदत, फिर निर्भरता।
इसलिए परिवार और समाज में हमेशा यही कहा गया:
“संयम ही रक्षा है।”
नशा क्षणिक सुख दे सकता है,
पर स्थायी शांति केवल सदाचार से मिलती है।
⸻
🔥 अंतिम भाव
वरुणी की कथा हमें यह याद दिलाती है कि
जीवन में हर चीज़ का सम्मान करो —
पर अपने चरित्र, विवेक और धर्म की रक्षा सबसे पहले करो।
सनातन धर्म हमें भोग नहीं,
योग और संयम का मार्ग सिखाता है।
#रामायण #🙏रामायण🕉
#रामशलाका प्रश्नावली से जानिए आपके प्रश्नों का उत्तर
हमारे जीवन में उतार-चढ़ाव के दौरान अनेक बार ऐसे मौके आते हैं जब समझ नहीं आता कि हमें कौन सा रास्ता चुनना चाहिए। इस भटकाव से उबरने के लिए श्री राम शलाका प्रश्नावली या #रामायणप्रश्नावली के रूप में एक कीमती कुंजी हमें परंपरा से प्राप्त हुई है। लोक मान्यता है कि श्री राम शलाका की उत्पत्ति वाल्मीकि कृत #रामायण से हुई है।
#श्रीरामचरित मानस एक धार्मिक आस्था का प्रतीक तथा पूज्यनीय ग्रन्थ होने के साथ साथ ज्योतिषीय शास्त्र के रूप में भी अपनी प्रतिष्ठा रखता है। चाहे कैसी भी परेशानी हो, रामायण प्रश्नावली में आपके सभी प्रश्नो का जवाब छुपा है। गोस्वामी तुलसी जी ने नौ चौपाई का प्रयोग इस प्रश्नावली में किया है। एक एक चौपाई अलग अलग ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। अंक ज्योतिष के अनुसार सूर्य आदि नवग्रहों को एक से लेकर नौ अंको के बीच माना गया है।
श्री रामायण प्रश्नावली में नव चौपाइयों को लेकर ही हर प्रश्न का समाधान दिया गया है। इन नौ चौपाइयों में से तीन चौपाइयों के हिसाब से कार्य में संदेह दिखाया गया है जो कि शनि, राहू, और केतु का फल बताती है और तीन चौपाइयों में कार्य सिद्ध होना बताया है जो कि चन्द्र, वृहस्पति और शुक्र का फल हमारे सामने रखती। इसके अलावा तीन चौपाइयों में अनिश्चय की स्थिति रख कर सूर्य, मंगल और बुध के गुणों को हमारे सामने रखती है।
#उपयोग विधि :
🔹🔸🔹🔸🔹
इसमें कोष्ठकों में कुछ अक्षर, मात्राएँ आदि लिखे होते हैं। मान्याता है कि किसी को जब कभी अपने अभीष्ट प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने की इच्छा हो तो सर्वप्रथम उस व्यक्ति को भगवान श्रीराम का ध्यान करना चाहिए। फिर अपने प्रश्न का चिंतन करते हुए श्री राम शलाका प्रश्नावली के किसी कोष्ट में अँगुली या कोई शलाका (छोटी डण्डी) रख देना चाहिए। अब श्रीरामशलाका प्रश्नावली के उस कोष्ट में लिखे अक्षर या मात्रा को किसी कोरे काग़ज़ या स्लेट पर लिख लेना चाहिए।
अब उस कोष्ट के आगे (दाहिने) और वह पंक्ति समाप्त होने पर नीचे की पंक्तियों पर बाएँ से दाहिने बढ़ते हुए उस कोष्ट से प्रत्येक नवें (9) कोष्ट में लिखे अक्षर या मात्रा को उस कागज या स्लेट पर लिखते जाना चाहिए। इस प्रकार जब सभी नवें अक्षर या मात्राएँ जोड़े जाएँगे तो श्री राम चरित मानस की कोई एक चौपाई पूरी हो जाएगी जिसमें आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।
9 चौपाई आपके प्रश्नों जवाब छिपे हैं इनमे:
🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी।
यह चौपाई बालकाण्ड में श्रीसीताजी के गौरीपूजन के प्रसंग में है। गौरीजी ने श्रीसीताजी को आशीर्वाद दिया है। फल - प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न उत्तम है, कार्य सिद्ध होगा।
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।
हृदय राखि कोसलपुर राजा।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी के लंका में प्रवेश करने के समय की है। फल - भगवान् का स्मरण करके कार्यारम्भ करो, सफलता मिलेगी।
उघरें अंत न होइ निबाहू।
कालनेमि जिमि रावन राहू।।
यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है। फल - इस कार्य में भलाई नहीं है। कार्य की सफलता में सन्देह है।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं।
फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है। फल - खोटे मनुष्यों का संग छोड़ दो। कार्य की सफलता में सन्देह है।
होइ है सोई जो राम रचि राखा।
को करि तरक बढ़ावहिं साषा।।
यह चौपाई #बालकाण्डान्तर्गत शिव और पार्वती के संवाद में है। फलः-कार्य होने में सन्देह है, अतः उसे भगवान् पर छोड़ देना श्रेयष्कर है।
मुद मंगलमय संत समाजू।
जिमि जग जंगम तीरथ राजू।।
यह चौपाई #बालकाण्ड में संत-समाजरुपी तीर्थ के वर्णन में है। फल - प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा।
गरल सुधा रिपु करय मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
यह चौपाई #श्रीहनुमान् जी के लंका प्रवेश करने के समय की है। फल - प्रश्न बहुत श्रेष्ठ है। कार्य सफल होगा।
बरुन कुबेर सुरेस समीरा।
रन सनमुख धरि काह न धीरा।।
यह चौपाई #लंकाकाण्ड में रावन की मृत्यु के पश्चात् मन्दोदरी के विलाप के प्रसंग में है। फल - कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे।
राम लखनु सुनि भए सुखारे।।
यह चौपाई #बालकाण्ड पुष्पवाटिका से पुष्प लाने पर विश्वामित्रजी का आशीर्वाद है। फल - प्रश्न बहुत उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा।
#श्रीराम चरित मानस रुपी इस शास्त्र को बड़ी श्रद्धा के साथ #पीले रंग के #वस्त्र में लपेट कर घर में उचित स्थान दे नित्य प्रति पूजन करें तो यह आपके जीवन के सभी #प्रश्नों का #समाधान करने में सक्षम है।
#👍मोटिवेशनल कोट्स✌ #🕉️सनातन धर्म🚩
‼️अन्त_मति_सो_गति‼️
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ८|६
🛐 ❝मृत्यु के समय मनुष्य सबसे अन्त में जो विचार करता है, जिसका चिन्तन करता है, उसका अगला जन्म उसी प्रकार का होता है।❞ 🛐
♦️भगवान् ऋषभदेव के पुत्र, सप्तद्वीपवती पृथिवी के एकच्छत्र सम्राट् भरत — वही भरत जिनके नाम पर हमारे इस देश का प्राचीनतम नाम अजनाभ वर्ष बदल गया और सब इसे 'भारतवर्ष' कहने लगे — वे धर्मात्मा सम्राट् वानप्रस्थ का समय आने पर राज्य, कुटुम्ब, गृह का त्याग करके वन में चले गये। महाराज भरत के वैराग्य में कोई कमी नहीं थी। राज्य करते समय उन्हें किसी बात का अभाव भी नहीं रहा था। शत्रुरहित समस्त भूमण्डल के वे सम्राट् थे। उनको परम पतिव्रता पत्नी मिली थी और किसी भी राजर्षि-कुल का गौरव बढ़ा सकें, ऐसे पाँच पुत्र थे। महाराज भरत ने उद्वेग से नहीं, विवेक पूर्वक भगवद्भजन के लिये गृह का त्याग किया। पुलहाश्रम में पहुँच कर वे निष्ठापूर्वक भजन में लग गये।♦️
🎇 संयोग की बात थी — राजर्षि भरत एक दिन नदी में स्नान करके सन्ध्या कर रहे थे। उसी समय एक गर्भवती हरिणी वहाँ जल पीने आयी। मृगी पानी पी ही रही थी कि वन में कहीं पास सिंह की भयंकर गर्जना हुई। भय के मारे मृगी पानी पीना छोड़ कर छलाँग मार कर भागी। मृगी का प्रसव काल समीप आ चुका था, भय की अधिकता और पूरे वेग से उछलने के कारण उसके पेट का मृगशावक बाहर निकल पड़ा और नदी के प्रवाह में बहने लगा। हरिनी तो इस आघात से कहीं दूर जाकर मर गयी। सद्यः प्रसूत मृगशावक भी मरणासन्न था। राजर्षि भरत को दया आ गयी। वे उसे प्रवाह में से उठा कर आश्रम ले आये।🎇
🌷 किसी मरणासन्न प्राणी पर दया करके उसकी रक्षा करना पाप नहीं है — यह तो पुण्य ही है। राजर्षि भरत ने पुण्य ही किया था। वे बड़े स्नेह से उस मृगशावक का लालन-पालन करने लगे। इसमें भी कोई दोष नहीं था। लेकिन इसी में, एक दोष, पता नहीं कब चुपचाप प्रविष्ट हो गया। उस मृगशावक से उन्हें मोह हो गया। अपने राज्य, स्त्री तथा सगे पुत्रों के मोह का सर्वथा त्याग कर के वन में आये थे, उन्हें एक हरिणी के बच्चे से मोह हो गया !
मृगशावक जब हृष्ट-पुष्ट-समर्थ हो गया, उसके पालन का कर्तव्य पूरा हो चुका था। उसे वन में स्वतन्त्र कर छोड़ देना था, लेकिन मृगशावक का मोह — वह मृग भी राजर्षि भरत को उसी प्रकार स्नेह करने लगा था, जैसे परिवार के स्वजन करते हैं। मृत्यु तो सबको अपना ग्रास बनाती ही है। राजर्षि भरत का भी अन्तिम समय पास आया। मृगशावक उनके पास ही उदास बैठा था। उसी की ओर देखते हुए, उसी की चिन्ता करते हुए भरत का शरीर छूटा। फल यह हुआ कि दूसरे जन्म में उन्हें मृग होना पड़ा।🌷
🧘 भगवद्भजन व्यर्थ नहीं जाता। भरत को मृग-शरीर में भी पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही। यहाँ भी उनमें वैराग्य एवं भक्ति का भाव उदय हुआ। मृग-देह छूटने पर वे ब्राह्मण-कुमार हुए। पूर्वजन्म की स्मृति के कारण वे अब पूर्ण सावधान हो गये थे। कहीं मोह न हो जाय — इस भय से अपने को पागल के समान रखते थे। उनका नाम ही 'जड भरत' पड़ गया। वे महान् ज्ञानी हैं, यह तो तब पता लगा, जब राजा रहूगण पर कृपा करके उन्होंने उपदेश किया।🧘
✍️इस पूरी कथा में देखने की बात यह है कि राजर्षि भरत-जैसे त्यागी, विरक्त, भगवद्भक्त को भी मृगशावक के मोह से मृग होना पड़ा। अन्त में मृग का स्मरण उन्हें मृग-योनि में ले ही गया। दया करो, प्रेम करो, हित करो; पर कहीं आसक्ति मत करो, किसी में मोह मत करो, कहीं ममता के बन्धन में अपने को मत बाँधो ।✍️
🕉️अन्त समय भगवान् का स्मरण कर लेंगे। 'यह कर लेंगे' अपने वश की बात नहीं है। अन्त समय मनुष्य सावधान नहीं रहता। वह प्रायः इस अवस्था में नहीं होता कि कुछ विचारपूर्वक सोचे। जीवन में जिससे उसकी आसक्ति रही है, उसके मन का सर्वाधिक आकर्षण जहाँ है, अन्त समय में वही उसे स्मरण होगा। जीवन में ही मन भगवान् में लग जाय। मन के आकर्षण के केन्द्र भगवान् बन जायँ — अन्त में तभी वे परम प्रभु स्मरण आयेंगे।🕉️
🙏ॐ_नमो_नारायणाय______
_ॐ_नमो_भगवते_वासुदेवाय🙏
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यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि
नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।
ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा
संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये 💞🙏💞
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#❤️जीवन की सीख
एक संन्यासी लंबी यात्रा पर था। दिन भर चलने के बाद वह थक गया, इसलिए एक घने पेड़ की छांव देखकर वहीं विश्राम करने लगा। कुछ ही देर में उसे गहरी नींद आ गई… और उसी नींद में उसने एक अजीब सपना देखा।
सपने में उसने देखा कि एक रास्ते से एक व्यापारी गुजर रहा है। उसके साथ पांच गधे थे, और हर गधे पर भारी-भरकम बोरे लदे हुए थे। उन बोझों के कारण गधे हांफ रहे थे, जैसे उनसे चलना मुश्किल हो रहा हो।
संन्यासी ने आगे बढ़कर उस व्यापारी से पूछा—
“भाई, इन बोरों में ऐसा क्या है जो बेचारे पशु इतनी तकलीफ से ढो रहे हैं?”
व्यापारी मुस्कुराया और बोला—
“ये सब इंसानों के काम की चीजें हैं, जिन्हें मैं बाजार में बेचने जा रहा हूं।”
संन्यासी को आश्चर्य हुआ—
“जरा बताओ तो सही, इनमें क्या-क्या भरा है?”
व्यापारी ने पहले गधे की ओर इशारा करते हुए कहा—
“इस पर जुल्म और अत्याचार का माल है। इसे खरीदने वाले वो लोग होते हैं जिनके पास ताकत और सत्ता होती है। ये बहुत महंगे दाम पर बिकता है।”
संन्यासी ने दूसरा सवाल किया—
“और इस दूसरे बोरे में क्या है?”
व्यापारी ने उत्तर दिया—
“इसमें घमंड भरा है। इसे पढ़े-लिखे और खुद को श्रेष्ठ समझने वाले लोग बड़े शौक से खरीदते हैं।”
संन्यासी अब और उत्सुक हो गया—
“तीसरे गधे का बोझ क्या है?”
व्यापारी बोला—
“इसमें जलन है। ऐसे लोग इसे खरीदते हैं जिन्हें दूसरों की सफलता देखकर चैन नहीं आता।”
संन्यासी ने चौथे गधे की ओर देखा—
“और इसमें क्या भरा है?”
व्यापारी ने कहा—
“यह धोखे और बेईमानी से भरा है। व्यापार में चालाकी से लाभ कमाने वाले लोग इसके सबसे बड़े ग्राहक हैं।”
अब संन्यासी ने आखिरी गधे के बारे में पूछा—
“और इस अंतिम बोरे में क्या रखा है?”
व्यापारी थोड़ा झुककर बोला—
“इसमें कपट और छल है। इसे वे लोग खरीदते हैं जो दूसरों को गिराकर खुद आगे बढ़ना चाहते हैं।”
इतना सुनते ही अचानक संन्यासी की आंख खुल गई। वह कुछ देर तक शांत बैठा रहा, मानो उस स्वप्न का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हो।
उसे एहसास हुआ कि वह व्यापारी कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि वही शक्ति थी जो दुनिया में बुराइयों को फैलाती है। और जो लोग अपने मन पर नियंत्रण नहीं रखते, वही इन बुराइयों के आसान शिकार बन जाते हैं।
उसने मन ही मन निश्चय किया—
यदि मन को स्वच्छ और स्थिर रखा जाए, और ईश्वर में सच्चा विश्वास बना रहे, तो कोई भी व्यक्ति इन बुराइयों से खुद को बचा सकता है।
क्योंकि जब भीतर प्रकाश होता है, तब अंधकार अपने आप दूर हो जाता है।
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६६
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
छियासीवाँ सर्ग
निषादराज गुहके द्वारा लक्ष्मणके सद्भाव और विलापका वर्णन
वनचारी गुहने अप्रमेय शक्तिशाली भरतसे महात्मा लक्ष्मणके सद्भावका इस प्रकार वर्णन किया—॥१॥
'लक्ष्मण अपने भाईकी रक्षाके लिये श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये अधिक कालतक जागते रहे। उस समय उन सद्गुणशाली लक्ष्मणसे मैंने इस प्रकार कहा—॥२॥
'तात रघुकुलनन्दन! मैंने तुम्हारे लिये यह सुखदायिनी शय्या तैयार की है। तुम इसपर सुखपूर्वक सोओ और भलीभाँति विश्राम करो। यह (मैं) सेवक तथा इसके साथके सब लोग वनवासी होनेके कारण दुःख सहन करनेके योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहनेका अभ्यास है); परंतु तुम सुखमें ही पले होनेके कारण उसीके योग्य हो। धर्मात्मन्! हमलोग श्रीरामचन्द्रजीकी रक्षाके लिये रातभर जागते रहेंगे॥३-४॥
'मैं तुम्हारे सामने सत्य कहता हूँ कि इस भूमण्डलमें मुझे श्रीरामसे बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है; अतः तुम इनकी रक्षाके लिये उत्सुक न होओ॥५॥
'इन श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे ही में इस लोकमें महान् यश, प्रचुर धर्मलाभ तथा विशुद्ध अर्थ एवं भोग्य वस्तु पानेकी आशा करता हूँ॥६॥
'अतः मैं अपने समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ हाथमें धनुष लेकर सीताके साथ सोये प्रिय सखा श्रीरामकी (सब प्रकारसे) रक्षा करूँगा॥७॥
'इस वनमें सदा विचरते रहनेके कारण मुझसे यहाँकी कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ युद्धमें शत्रुकी चतुरङ्गिणी सेनाका भी अच्छी तरह सामना कर सकते हैं'॥८॥
'हमारे इस प्रकार कहनेपर धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाले महात्मा लक्ष्मणने हम सब लोगोंसे अनुनयपूर्वक कहा—॥९॥
'निषादराज! जब दशरथनन्दन श्रीराम देवी सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन-धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है?॥१०॥
'गुह! देखो, सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें जिनके वेगको नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीताके साथ तिनकोंपर सो रहे हैं॥११॥
'महान् तप और नाना प्रकारके परिश्रमसाध्य उपायोंद्वारा जो यह महाराज दशरथको अपने समान उत्तम लक्षणोंसे युक्त ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीरामके वनमें आ जानेसे राजा दशरथ अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकेंगे। जान पड़ता है निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी॥१२-१३॥
'अवश्य ही अब रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोरसे आर्तनाद करके अधिक श्रमके कारण अब चुप हो गयी होंगी और राजमहलका वह हाहाकार इस समय शान्त हो गया होगा॥१४॥
'महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा ये सब लोग आजकी इस राततक जीवित रह सकेंगे या नहीं; यह मैं नहीं कह सकता॥१५॥
'शत्रुघ्नकी बाट देखनेके कारण सम्भव है, मेरी माता सुमित्रा जीवित रह जायँ; परंतु पुत्रके विरहसे दुःखमें डूबी हुई वीर-जननी कौसल्या अवश्य नष्ट हो जायँगी॥१६॥
'(महाराजकी इच्छा थी कि श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथको न पाकर श्रीरामको राज्यपर स्थापित किये बिना ही 'हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया! नष्ट हो गया!!' ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे॥१७॥
'उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग वहाँ रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता महाराज दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं॥१८॥
'(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, हाथियों, घोड़ों और रथोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे व्याप्त, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे परिपूर्ण तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥१९-२१॥
'क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर सकुशल लौटे हुए सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ हमलोग अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे'॥२२॥
'इस प्रकार विलाप करते हुए महामनस्वी राजकुमार लक्ष्मणकी वह सारी रात जागते ही बीती॥२३॥
'प्रातःकाल निर्मल सूर्योदय होनेपर मैंने भागीरथीके तटपर (वटके दूधसे) उन दोनोंके केशोंको जटाका रूप दिलवाया और उन्हें सुखपूर्वक पार उतारा॥२४॥
'सिरपर जटा धारण करके वल्कल एवं चीर-वस्त्र पहने हुए, महाबली, शत्रुसंतापी श्रीराम और लक्ष्मण दो गजयूथपतियोंके समान शोभा पाते थे। वे सुन्दर तरकस और धनुष धारण किये इधर-उधर देखते हुए सीताके साथ चले गये॥२५॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८६॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५










![रामायण - बि |होे।मु | ग |व |सु|नु |बि उ घ ।सि|सि| रें बस है| मं ल |न| ल| य सु |कु|म|स|ग| त|न|ई | ल धा T कु।जो। म।रि|र र।अ|की।हो # न सी |जे| इ|ग|म | सं |क|रे| स हा [ ह |बब प।चि| स|य 7 T క . 7 గౌ T|र | र। मा।मि | मो।म्हा ा।जा ٤ रे ]री [हृका। फखा।जि।इ।र रा पू मि।गो। न| मजि| य|ने ननि।क ज म | स|रि।ग। द।न ष| मखिजि मनि न न |कौ|नि।ज | र।ग |धुख | सु। F7T 7T TT7 TaTగT7 अ प ध ল কা $ ব্ | T 7|3 अ எ - 1 म्हा|रा| र| स| हिं र त| न | ष हीं | षा Tf ಪ लाधी हू जू [ 5 बि |होे।मु | ग |व |सु|नु |बि उ घ ।सि|सि| रें बस है| मं ल |न| ल| य सु |कु|म|स|ग| त|न|ई | ल धा T कु।जो। म।रि|र र।अ|की।हो # न सी |जे| इ|ग|म | सं |क|रे| स हा [ ह |बब प।चि| स|य 7 T క . 7 గౌ T|र | र। मा।मि | मो।म्हा ा।जा ٤ रे ]री [हृका। फखा।जि।इ।र रा पू मि।गो। न| मजि| य|ने ननि।क ज म | स|रि।ग। द।न ष| मखिजि मनि न न |कौ|नि।ज | र।ग |धुख | सु। F7T 7T TT7 TaTగT7 अ प ध ল কা $ ব্ | T 7|3 अ எ - 1 म्हा|रा| र| स| हिं र त| न | ष हीं | षा Tf ಪ लाधी हू जू [ 5 - ShareChat रामायण - बि |होे।मु | ग |व |सु|नु |बि उ घ ।सि|सि| रें बस है| मं ल |न| ल| य सु |कु|म|स|ग| त|न|ई | ल धा T कु।जो। म।रि|र र।अ|की।हो # न सी |जे| इ|ग|म | सं |क|रे| स हा [ ह |बब प।चि| स|य 7 T క . 7 గౌ T|र | र। मा।मि | मो।म्हा ा।जा ٤ रे ]री [हृका। फखा।जि।इ।र रा पू मि।गो। न| मजि| य|ने ननि।क ज म | स|रि।ग। द।न ष| मखिजि मनि न न |कौ|नि।ज | र।ग |धुख | सु। F7T 7T TT7 TaTగT7 अ प ध ল কা $ ব্ | T 7|3 अ எ - 1 म्हा|रा| र| स| हिं र त| न | ष हीं | षा Tf ಪ लाधी हू जू [ 5 बि |होे।मु | ग |व |सु|नु |बि उ घ ।सि|सि| रें बस है| मं ल |न| ल| य सु |कु|म|स|ग| त|न|ई | ल धा T कु।जो। म।रि|र र।अ|की।हो # न सी |जे| इ|ग|म | सं |क|रे| स हा [ ह |बब प।चि| स|य 7 T క . 7 గౌ T|र | र। मा।मि | मो।म्हा ा।जा ٤ रे ]री [हृका। फखा।जि।इ।र रा पू मि।गो। न| मजि| य|ने ननि।क ज म | स|रि।ग। द।न ष| मखिजि मनि न न |कौ|नि।ज | र।ग |धुख | सु। F7T 7T TT7 TaTగT7 अ प ध ল কা $ ব্ | T 7|3 अ எ - 1 म्हा|रा| र| स| हिं र त| न | ष हीं | षा Tf ಪ लाधी हू जू [ 5 - ShareChat](https://cdn4.sharechat.com/bd5223f_s1w/compressed_gm_40_img_306837_39a33f4b_1772092304948_sc.jpg?tenant=sc&referrer=user-profile-service%2FrequestType50&f=948_sc.jpg)


