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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड इक्यासीवाँ सर्ग प्रातःकालके मङ्गलवाद्य-घोषको सुनकर भरतका दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजीका सभामें आकर मन्त्री आदिको बुलानेके लिये दूत भेजना इधर अयोध्यामें उस अभ्युदयसूचक रात्रिका थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधोंने मङ्गलमयी स्तुतियोंद्वारा भरतका स्तवन आरम्भ किया॥१॥ प्रहरकी समाप्तिको सूचित करनेवाली दुन्दुभि सोनेके डंडेसे आहत होकर बज उठीं। बाजे बजानेवालोंने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके सैकड़ों बाजे बजाये॥२॥ वाद्योंका वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा गूँज उठा और शोकसंतप्त भरतको पुनः शोकाग्निकी आँचसे राँधने लगा॥३॥ वाद्योंकी उस ध्वनिसे भरतकी नींद खुल गयी; वे जाग उठे और 'मैं राजा नहीं हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजोंका बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्नसे बोले—॥४॥ 'शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयीने जगत्‌का कितना महान् अपकार किया है। महाराज दशरथ मुझपर बहुत-से दुःखोंका बोझ डालकर स्वर्गलोकको चले गये॥५॥ 'आज उन धर्मराज महामना नरेशकी यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जलमें पड़ी हुई बिना नाविककी नौकाके समान इधर-उधर डगमगा रही है॥६॥ 'जो हमलोगोंके सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजीको भी स्वयं मेरी इस माताने धर्मको तिलाञ्जलि देकर वनमें भेज दिया॥७॥ उस समय भरतको इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगीं॥८॥ जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्मके ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथके सभाभवनमें प्रवेश किया॥९॥ वह सभाभवन अधिकांश सुवर्णका बना हुआ था। उसमें सोनेके खम्भे लगे थे। वह रमणीय सभा देवताओंकी सुधर्मा सभाके समान शोभा पाती थी। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठने अपने शिष्यगणके साथ उस सभामें पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठपर जो स्वस्तिकाकार बिछौनेसे ढका हुआ था, वे विराजमान हुए। आसन ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने दूतोंको आज्ञा दी—॥१०-११॥ 'तुमलोग शान्तभावसे जाकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, अमात्यों और सेनापतियोंको शीघ्र बुला लाओ। अन्य राजकुमारोंके साथ यशस्वी भरत और शत्रुघ्नको, मन्त्री युधाजित् और सुमन्त्रको तथा और भी जो हितैषी पुरुष वहाँ हों उन सबको शीघ्र बुलाओ। हमें उनसे बहुत ही आवश्यक कार्य है'॥१२-१३॥ तदनन्तर घोड़े, हाथी और रथोंसे आनेवाले लोगोंका महान् कोलाहल आरम्भ हुआ॥१४॥ तत्पश्चात् जैसे देवता इन्द्रका अभिनन्दन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियों (मन्त्री-प्रजा आदि) ने आते हुए भरतका राजा दशरथकी ही भाँति अभिनन्दन किया॥१५॥ तिमि नामक महान् मत्स्य और जलहस्तीसे युक्त, स्थिर जलवाले तथा मुक्ता आदि मणियोंसे युक्त शङ्ख और बालुकावाले समुद्रके जलाशयकी भाँति वह सभा दशरथपुत्र भरतसे सुशोभित होकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे पूर्वकालमें राजा दशरथकी उपस्थितिसे शोभा पाती थी॥१६॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८१॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - punitbapuofficial.org WWW . 'विनय पत्रिका" हे रामचंद्र! आपके चरणोंको छोड़कर और कहाँ जाऊँ? संसारमें आपका नाम '्पतित पावन' है । आपको दीन- दुःखियारे बहुत प्यारे है। हे नाथ! आपने तो चुन चुनकर दुष्टोका भला किया हैः तो मेरी तरफ़ ढील क्यों प्रभु? मेरा भी भला कर दीजिये | punitbapuofficial.org WWW . 'विनय पत्रिका" हे रामचंद्र! आपके चरणोंको छोड़कर और कहाँ जाऊँ? संसारमें आपका नाम '्पतित पावन' है । आपको दीन- दुःखियारे बहुत प्यारे है। हे नाथ! आपने तो चुन चुनकर दुष्टोका भला किया हैः तो मेरी तरफ़ ढील क्यों प्रभु? मेरा भी भला कर दीजिये | - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार 🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *मानव जीवन में सुख एवं दुख आते रहते हैं इससे न तो कोई बचा है ना ही कोई बच पाएगा | सुख में अति प्रसन्न होकर मनुष्य दुख पड़ने पर व्याकुल हो जाता है | दुख के समय को जीवन का सबसे कुसमय माना जाता है | कभी-कभी मनुष्य दुख में इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसे यह नहीं समझ में आता तो क्या करना चाहिए क्या नहीं ? सारे मार्ग बंद दिखाई पड़ते हैं , ऐसे समय में मनुष्य को सहारा देने वाला कोई नहीं मिलता तब उस दुख में मनुष्य का धैर्य ही उसका साथ देता है | बाबा जी ने मानस में लिखा है :- "धीरज धरहुं कुसमय बिचारी" अर्थात मनुष्य का सच्चा साथी दुख है और दुख का समय ऐसा होता है कि इस समय में मनुष्य का धैर्य ही उसका साथ दे सकता है | दुख पड़ने पर जिसने अपने धैर्य को बनाए रखा वही दुख के समय को व्यतीत कर के सुख प्राप्त कर पाता है | दुख के समय में जिसने अपने धैर्य को खो दिया उसका जीवन अंधकारमय भी हो सकता है | इसलिए संकट के समय अपने धैर्य को नहीं खोना चाहिए यही संकट के समय का सच्चा साथी होता है | दुख मनुष्य को संकट से जूझने का साहस प्रदान करता है | धैर्य धारण करते हुए जिसने भी संकट एवं दुख के समय को सकारात्मकता के साथ बिता लिया अंततोगत्वा वही सुख का उपभोग करता है |* *आज के युग में अनेकों संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी कोई भी सुखी नहीं दिखाई पड़ता | यह भी सत्य है कि आज मनुष्य में धैर्य बहुत कम दिखाई पड़ रहा है | प्राय: समाचार पत्रों में आत्महत्या करने की घटनाएं पढ़ने को मिला करती हैं | यह घटनाएं यह सिद्ध करती हैं कि आज मनुष्य ने अपने धैर्य को खो दिया है | थोड़ा सा भी संकट आने पर मनुष्य को ऐसा लगने लगता है अब उसके चारों ओर अंधकार छा गया है और कोई मार्ग नहीं बचा है , जब यह विचार जब मन में उठने लगते हैं तो मनुष्य आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है , जबकि मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि इस संसार का सबसे बड़ा पाप आत्महत्या है | दुख आया है तो सुख भी आएगा जिस प्रकार अमावस की काली रात्रि आ जाने पर मनुष्य प्रातः सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हुए अपनी रात्रि व्यतीत कर देता है उसी प्रकार घोर संकट को काली रात्रि समझ कर धैर्य के साथ सुख रुपी सूर्योदय की प्रतीक्षा प्रत्येक मनुष्य को करनी चाहिए और इसके लिए धैर्य का होना बहुत आवश्यक है | विचार कीजिए कि जब रात्रि में कोई दुर्घटना घट जाती है या कोई मृतक हो जाता है तो मनुष्य धैर्य के साथ प्रातः काल होने की प्रतीक्षा किया करता है और प्रातः काल होने पर भी उस मृतक का अंतिम संस्कार हो पाता है ! ठीक उसी प्रकार किसी भी प्रकार का दुख पड़ने पर मनुष्य को धैर्य का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि जिसने धैर्य खो दिया समझ लो उसका जीवन समाप्त हो गया | दुख में सच्चा साथी मनुष्य का धैर्य ही होता है इसलिए सदैव अपने धैर्य को बनाए रखना चाहिए |* *दुख में मनुष्य घबराने लगता है जबकि दुख एवं सुख मनुष्य के मन की अनुभूति होती है इस अनुभूति में धैर्य मनाने बनाए रखना परम आवश्यक है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟
🙏 प्रेरणादायक विचार - सुविचार हा सके तो कभी किसी से जलना मत ऊपरवाला जिसे देता है अपने खजाने में से देता है किसी से छीन के नहीं देता सुविचार हा सके तो कभी किसी से जलना मत ऊपरवाला जिसे देता है अपने खजाने में से देता है किसी से छीन के नहीं देता - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🌟 || संसार का सत्य || 🌟 संसार अपना दिखता हुआ प्रतीत होते हुए भी अपना नहीं है और परमात्मा अपने से दूर प्रतीत होते हुए भी अपने सबसे निकट एवं सबसे बड़े हितैषी हैं। संसार का मायावी व्यवहार जितना शीघ्र समझ आ जायेगा उतनी शीघ्र आपकी बुद्धि परमात्मा की ओर लगने लगेगी। केवल सांसारिक बुद्धि से जीव का कल्याण कभी संभव नहीं हो सकता इसलिए संसार की परीक्षा भी करते रहना चाहिए। जितनी जल्दी संसार के सत्य को जान लोगे इससे मुक्त हो जाओगे क्योंकि जानना ही मुक्त होने का मार्ग भी है। संसार की परीक्षा करते-करते समय-समय पर स्वयं का भी निरीक्षण करते रहें कि कहीं मैं अपने मार्ग से भटक तो नहीं रहा। भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि आपको स्वयं के द्वारा ही प्राप्त होगी। अज्ञानी व्यक्ति स्वयं के बजाय दूसरों के गुण-दोषों का चिंतन करते रहने के कारण अपने जीवन में कुछ श्रेष्ठ पाने से भी वंचित रह जाता है। संसार का त्याग नहीं अपितु संसार मेरा है, इस भावना का त्याग आपको प्रभु चरणों का प्रेमी बना देगा।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - राम राम जी सुप्रभात।। Sudhir chourasia राम राम जी सुप्रभात।। Sudhir chourasia - ShareChat
🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 💁🏻‍♂️ निंदा की बौछारो से, हुनर कहां झुकता है ! उड़ते हैं लाखों धुएं, मगर सूर्य कहां छिपता है !! !!जय श्री राधेकृष्ण !! 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 #☝आज का ज्ञान
☝आज का ज्ञान - राधे राध मिले या गम चाहे ? तेरी ही शरण में रहेंगे हम அிசன ge} रैधे राधे राध मिले या गम चाहे ? तेरी ही शरण में रहेंगे हम அிசன ge} रैधे - ShareChat
#जय श्री कृष्ण मोरपंख का महत्त्व 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ ज्योतिष में मोरपंख को सभी नौ ग्रहों का प्रतिनिधि माना गया है, विशेष तौर पर मोरपंख के कुछ ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें किसी शुभ मुहूर्त में करने से सभी समस्याओं से तुरंत छुटकारा मिल जाता है। श्रीकृष्ण का श्रृंगार मोर पंख के बिना अधूरा ही लगता है। वे अपने मुकुट में मोर पंख भी विशेष रूप से धारण करते हैं। मोर पंख का संबंध केवल श्रीकृष्ण से नहीं, बल्कि अन्य देवी-देवताओं से भी है। शास्त्रों के अनुसार मोर के पंखों में सभी देवी-देवताओं और सभी नौ ग्रहों का वास होता है। प्राचीन काल में एक मोर के माध्यम से देवताओं ने संध्या नाम के असुर का वध किया था। पक्षी शास्त्र में मोर और गरुड़ के पंखों का विशेष महत्व बताया गया है। आइये जानते हैं मोर पंख आपके जीवन को किस तरह सुख- समृद्धि से भर देता है- * मोर का शत्रु सर्प है. अत: ज्योतिष में जिन लोगों को राहू की स्थिति शुभ नहीं हो उन्हें मोर पंख सदैव अपने साथ रखना चाहिए। * आयुर्वेद में मोर पंख से तपेदिक, दमा, लकवा, नजला और बांझपन जैसे दुसाध्य रोगों में सफलता पूर्वक चिकित्सा बताई गई है। * जीवन में मोर पंख से कई तरह के संकट दूर किये जा सकते हैं. अचानक कष्ट या विपत्ति आने पर घर अथवा शयनकक्ष के अग्नि कोण में मोर पंख लगाना चाहिए. थोड़े ही समय में सकारात्मक असर होगा। * धन-वैभव में वृद्धि की कामना से निवेदन पूर्वक नित्य पूजित मन्दिर में श्रीराधा-कृष्ण के मुकुट में मोर पंख की स्थापना करके/करवाकर 40वें दिन उस मोर पंख को लाकर अपनी तिजोरी या लॉकर में रख दें. धन-संपत्ति में वृद्धि होना प्रारम्भ हो जायेगी। सभी प्रकार के रुके हुए कार्य भी इस प्रयोग से बन जाते हैं। * जिन लोगों की कुण्डली में राहू-केतु कालसर्प योग का निर्माण कर रहे हों उन्हें अपने तकिये के खोल में 7 मोर पंख सोमवार की रात्रि में डालकर उस तकिये का उपयोग करना चाहिए साथ ही शयनकक्ष की पश्चिम दिशा की दीवार पर मोर पंखों का पंखा जिसमें कम से कम 11 मोर पंख लगे हों लगा देना चाहिए। इससे कुण्डली में अच्छे ग्रह अपनी शुभ प्रभाव देने लगेंगे और राहू-केतु का अशुभत्व कम हो जायेगा। * अगर बच्चा जिद्दी होता जा रहा हो तो उसे नित्य मोर पंखों से बने पंखे से हवा करनी चाहिए या अपने सीलिंग फैन पर ही मोर पंख पंखुड़ियों पर चिपका देना चाहिए। * नवजात शिशु के सिरहाने चांदी के तावीज में एक मोर पंख भरकर रखने शिशु को डर नहीं लगेगा नजर इत्यादि का डर भी नहीं रहेगा। * कोई शत्रु ज्यादा तंग कर रहा हो मोर के पंख पर हनुमान जी के मस्तक के सिंदूर से मंगलवार या शनिवार रात्रि में उस शत्रु का नाम लिखकर के अपने घर के मन्दिर में रात भर रखें। प्रात:काल उठकर बिना नहाये-धोये बहते पानी में बहा देने से शत्रु-शत्रुता छोड़कर मित्रवत् व्यवहार करने लगता है. इस तरह मोर पंख से हम अपने जीवन के अमंगलों को हटाकर मंगलमय स्थिति को ला सकते हैं।श्री राधे।।।गुरु कृपा केवलं।। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
जय श्री कृष्ण - मोर पँख का महत्त्व मोर पँख का महत्त्व - ShareChat
#अपना काशी बनारस🏝🏝🏡 तिलभांडेश्वर महादेव, काशी 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान श‌िव की नगरी काशी में कई प्रसिद्ध शिव मंद‌िर है, इनमें एक है बाबा त‌िल भांडेश्वर। कहते हैं यह सतयुग में प्रकट हुआ स्वयंभू श‌िवल‌िंग है। कल‌युग से पहले तक यह श‌िवल‌िंग हर द‌िन त‌िल आकार में बढ़ता था। लेक‌िन कलयुग के आगमन पर लोगों को यह च‌िंता सताने लगी क‌ि यह इसी आकार में हर द‌िन बढ़ता रहा तो पूरी दुन‌िया इस श‌िवल‌िंग में समा जाएगी। भगवान श‌िव की आराधना करने पर भगवान श‌िव ने प्रकट होकर साल में केवल संक्रांति पर ही इसके बढ़ने का वरदान दिया। कहते हैं उस समय से हर साल मकर संक्रांत‌ि पर इस श‌िवल‌िंग का आकार बढ़ता है। इस मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहां विशालकाय शिवलिंग हर रोज तिल के बराबर बढ़ता है, जिसके कारण से इस मंदिर को तिलभांडेश्वर के नाम से जाना जाता है। जिसका बखान शिव पुराण में भी है। वर्तमान में इस लिंग का आधार कहां है, ये तो पता नहीं पता लेकिन जमीन से सौ मीटर ऊंचाई पर भी यह विशाल शिवलिंग भक्तों की हर मनोकामना पूरी करता है। महाशिवरात्रि में इस जागृत शिवलिंग की आराधना का विशेष महत्व है। इस शिवलिंग के दर्शन से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस मंदिर के साथ अनेक मान्यताएं जुडी हैं, जिनमें से एक है विभाण्ड ऋषि के तप की कथा- कथा के अनुसार वर्षों पहले इसी स्थान पर विभाण्ड ऋषि ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। इसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में बाबा ने उन्हें दर्शन दिया था और कहा था कि कलयुग में ये शिवलिंग रोज तिल के सामान बढे़गा और इसके दर्शन मात्र से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। यह शिवलिंग शनि की महादशा से पीड़ित लोगों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कष्टों से मुक्ति के लिए शनि ने स्वयं यहां ढाई वर्ष तपस्या की थी। यही कारण है कि शिवभक्त यहां महाशिवरात्रि में विशेष तौर पर पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर का शिवलिंग तिल-तिल बढ़ने और शनि के तिल प्रिय होने का कारण तिलभांडेश्वर पड़ा। इतना विशाल शिवलिंग और उस पर जल अर्पण के साथ बेलपत्र और फूलों का श्रृंगार का महत्व है। शिव पुराण के ही अनुसार इस मंदिर में बाबा को भांग और बेल पत्र के साथ-साथ तिल और तिल का तेल चढ़ाया जाता है। मान्यता यह भी है कि जिस पर भी शनि की महादशा चलती है। वह इस मंदिर में स्थापित बाबा के शिवलिंग के साथ ही शनि का दीपक जला कर शनि के कोप से बच सकता है। इसके अलावा मंदिर में उपस्थित कुछ पुराने लोगों ने बताया कि मुस्लिम शासन के दौरान मंदिरों को ध्वस्त करने के क्रम में तिलभांडेश्वर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई थी। मंदिर को तीन बार मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त कराने के लिए सैनिकों को भेजा, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट गया कि सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी। अंगेजी शासन के दौरान एक बार ब्रिटिश अधिकारियों ने शिवलिंग के आकार में बढ़ोत्तरी को नापने के लिए उसके चारों ओर धागा बांध दिया, जो अगले दिन टूटा मिला। ।। ॐ नमः शिवाय ।। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#चंद्रमा चंद्रमा की सुन्दरता व राजा दक्ष प्रजापति का चंद्रमा को श्राप 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ चंद्रमा की सुंदरता पर राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां मोहित हो गईं. वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थी दक्ष ने समझाया सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां जिद पर अड़ी रहीं. अश्विनी सबसे बड़ी थी. उसने कहा कि पिताजी हम आपस में मेलजोल से मित्रवत रहेंगे. आपको शिकायत नहीं मिलेगी. दक्ष ने सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया. विवाह से चंद्रमा और उनकी पत्नियां दोनों बहुत प्रसन्न थे लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही. जल्द ही चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे. यह बात दक्ष को पता चली और उन्होंने चंद्रमा को समझाया. कुछ दिनों तक तो चंद्रमा ठीक रहे लेकिन जल्द ही वापस रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से भी ज्यादा तेज हो गई. अन्य पुत्रियों के विलाप से दुखी दक्ष ने फिर चंद्रमा से बात की लेकिन उन्होंने इसे अपना निजी मामला बताकर दक्ष का अपमान कर दिया. दक्ष प्रजापति थे. कोई देवता भी उनका अनादर नहीं करता था. क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दिया कि तुम क्षय रोग के मरीज हो जाओ. दक्ष के शाप से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए. उनकी चमक समाप्त हो गई. पृथ्वी की गति बिगड़ने लगी. परेशान ऋषि-मुनि और देवता भगवान ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्मा, दक्ष के पिता थे लेकिन दक्ष के शाप को समाप्त कर पाना उनके वश में नहीं था. उन्होंने देवताओं को शिवजी की शरण में जाने का सुझाव दिया. ब्रह्मा ने कहा- चंद्रदेव भगवान शिव को तप से प्रसन्न करें. दक्ष पर उनके अलावा किसी का वश नहीं चल सकता. ब्रह्मा की सलाह पर चंद्रमा ने शिवलिंग बनाकर घोर तप आरंभ किया. महादेव प्रसन्न हुए और चंद्रमा से वरदान मांगने को कहा. चंद्रमा ने शिवजी से अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगते हुए क्षय रोग से मुक्ति का वरदान मांगा. भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें जिसने शाप दिया है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है. उसके शाप को समाप्त करना संभव नहीं फिर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ न कुछ करूंगा जरूर. शिवजी बोले- एक माह में जो दो पक्ष होते हैं, उसमें से एक पक्ष में तुम मेरे वरदान से निखरते जाओगे, लेकिन दक्ष के शाप के प्रभाव से दूसरे पक्ष में क्षीण होते जाओगे. शिव के वरदान से चंद्रमा शुक्लपक्ष में तेजस्वी रहते हैं और कृष्ण पक्ष में धूमिल हो जाते हैं. चंद्रमा की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हो गए थे उस स्थान की देवों ने पूजा की और वह स्थान सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ. चंद्रमा की वे सताइस पत्नियां ही सताइस विभिन्न नक्षत्र हैं. (शिवपुराण की कथा🙏🏻💐) साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
चंद्रमा - प्रजापति राजा दक्ष ChT चंद्रमा को श्राप प्रजापति राजा दक्ष ChT चंद्रमा को श्राप - ShareChat
#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 भृंगी की कथा 〰🌼🌼〰 महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। भृंगी की कथा 〰🌼🌼〰 महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। कहते हैं जहां शिव होंगे वहां गणेश, नंदी, श्रृंगी, भृंगी, वीरभद्र का वास स्वयं ही होगा। शिव-शिवा के साथ उनके ये गण अवश्य चलते हैं। इनमें से सभी प्रमुख गणों के बारे में तो कहानियां प्रचलित हैं। जैसे दक्ष यज्ञध्वंस के लिए वीरभद्र उत्पन्न हुए। मां पार्वती ने श्रीगणेश को उत्पन्न किया। नंदी तो शिव के वाहन हैं जो धर्म के अवतार हैं। शिलाद मुनि के पुत्र के रूप में जन्म लेकर शिवजीके वाहन बने नंदी। आपने यह सब कथाएं खूब सुनी होंगी पर क्या प्रमुख शिवगण भृंगी की कथा सुनी है?भृंगी की खास बात यह हैं कि उनके तीन पैर हैं। शिव विवाह के लिए चलीबारात में उनका जिक्र मिलता हैं बिनु पद होए कोई.. बहुपद बाहू” (यानी शिवगणों में कई बिना पैरों के थे और किसी के पास कई पैर थे) ये पद तुलसीदासजी ने भृंगी के लिए ही लिखा है।भृंगी के तीन पैर कैसे हुए? इसके पीछे एक कथा है जो हमें बताती है कि उमा-शंकर के बीच का प्रेम कितना गहरा है। ये दोनों वस्तुत: एक ही हैं। दरअसल भृंगी की एक अनुचित जिद ही वजह से सदाशिव और जगदंबा को अर्द्धनारीश्वर रुप धारण करना पड़ा।भृंगी महान शिवभक्त थे। सदाशिव के चरणों में उनकी अत्य़धिक प्रीति थी। उन्होंने स्वप्न में भी शिव के अतिरिक्त किसी का ध्यान नहीं किया था। यहां तक कि वह जगद्जननी मां पार्वती को भी सदाशिव से अलग मानते थे। शिवस्य चरणम् केवलम्” के भाव में हमेशा रहते थे। उनकी बुद्धि यह स्वीकार ही नहीं करती थी कि शिव और पार्वती में कोई भेद नहीं है। एक बार सदाशिव के परम भक्त श्रृंगी ऋषि कैलाश पर अपने आराध्य की परिक्रमा करने पहुंचे। सदैव की तरह महादेव के बाईं जंघा पर आदिशक्तिजगदंबा विराजमान थीं। महादेव समाधि में थे और जगदंबा चैतन्य थीं। जगदंबा के नेत्र खुले थे। भृंगी तो आए थे शिवजी की परिक्रमा करने। शिवजी तो ध्यानमग्न थे। शिवप्रेम में भृंगी मतवाले हो रहे थे। वह सिर्फ शिवजी की परिक्रमा करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य की उनकी परिभाषा अलग थी। पर क्या करें, पार्वतीजी तो शिवजी के वामांग में विराजमान हैं। भृंगी अपना उतावनापन रोक ही नहीं पाए। साहस इतना बढ़ गया कि उन्होंने जगदंबा से अनुरोध कर दिया कि वह शिवजी से अलग होकर बैठें ताकि मैं शिवजी की परिक्रमा कर सकूं। जगदंबा समझ गईं कि यह है तो तपस्वी लेकिन इसे ज्ञान नहीं हुआ है। अभी यह अधूरा ज्ञान का है इसलिए उन्होंने भृंगी की बात को अनसुना किया। भृंगी तो हठ में थे, कुछ भी सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। फिर से पार्वतीजी से कहा कि आपकुछ देर के लिए हट जाएं, मैं परिक्रमा कर लूं।मां पार्वती ने इसपर आपत्ति जताई और कहा कि अनुचित बात बंद करो. जगदंबा महादेव की शक्ति हैं. वह सदाशिव से पृथक होने को कैसे तैयार होतीं! माता ने भृंगी को कई तरह से समझाया, प्रकृति और पुरुष के संबंधों की व्याख्या की। वेदों का उदाहरण दिया परंतु भृंगी भी वैसे ही हठी। हठी की बुद्धि तो वैसे भी आधी हो जाती है।माता द्वारा दिए ज्ञान-उपदेश उनके विवेक में उतरे ही नहीं। उनकी बुद्धि सृष्टि के इस रहस्य को समझने के लिए तैयार ही नहीं हुई। उन्होंने सिर्फ शिव की परिक्रमा करने की ठान रखी थी। माता ने सोचा इस अज्ञानी को कुछ भी समझाने का लाभ नहीं। इसे अनदेखा ही कर देना चाहिए। माता शिवजी से अलग न हुईं। भृंगी ने भी हठ ही पाल रखा था। अपने मन की करने के लिए एक योजना बना ली। भृंगी ने सर्प का रुप धारण किया और शिवजी की परिक्रमा करने लगे। सरकते हुए वह जगदंबा और महादेव के बीच से निकलने का यत्न करने लगे। उनकी इस धृष्टता का परिणाम हुआ कि शिवजी की समाधि भंग हो गई। उन्होंने समझ लिया कि मूर्ख जगदंबा को मेरे वाम अंग पर देखकर विचलित है। वह दोनों में भेद कर रहा है। इसे सांकेतिक रूप से समझाने के लिए शिवजी ने तत्काल अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण कर लिया। जगदंबा अब उन्हीं में विलीन हो गईं थी। शिवजी दाहिने भाग से पुरुष रूप में और बाएं भाग से स्त्रीरूप में दिखने लगे।अब तो भृंगी की योजना पर पानी फिरने लगा। हठी का हठ तो भगवान से भी ऊपर जाने लगता है। भृंगी ने इतने पर भी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें तो बस शिवजी की ही परिक्रमा करनी थी। अपनी जिद पूरी करने की लिए एक और मूर्खतापूर्ण प्रयास किया। अब भृंगी ने चूहे का रुप धारण कर लिया। चूहे के रूप में प्रभु के अर्द्धनारीश्वर रुप को कुतरकर एक दूसरे से अलग करने की कोशिश में जुट गए। अब यह तो अति थी। शिवभक्त भृंगी की धृष्टता को लगातार सहन करती आ रही जगदंबा का धैर्य चूक गयी| उन्होंने भृंगी को श्राप दिया- “हे भृंगी तू सृष्टि के आदि नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यदि तू मातृशक्ति का सम्मान करने में अपनी हेठी समझता है तो अभी इसी समय तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाएगा। यह श्राप सुनकर स्वयं महादेव भी व्याकुल हो उठे। भृंगी की बुद्धि भले ही हर गई थी पर महादेव जानते थे कि इस श्राप का मतलब कितना गंभीर है। *शरीर विज्ञान की तंत्रोक्त व्याख्या के मुताबिक इंसान के शरीर में हड्डियां और पेशियां पिता से मिलती हैं, जबकि रक्त और मांसमाता के अंश से प्राप्त होता है।* फिर क्या था, भृंगी की तो दुर्गति हो गई। उनके शरीर से तत्काल रक्त और मांस अलग हो गया। शरीर में बची रह गईं तो सिर्फ हड्डियां और मांसपेशियां। मृत्यु तो हो नहीं सकती थी क्योंकि वो अविमुक्त कैलाश के क्षेत्र में थे और स्वयं सदाशिव और महामाया उनके सामने थे। उनके प्राण हरने के लिए यमदूत वहां पहुंचने का साहस ही नहीं कर सकते थे। असह्य पीड़ा से भृंगी बेचैन होने लगे। ये शाप भी आदिशक्ति जगदंबा का दिया हुआ था। उन्होंने ये शाप भृंगी की भेदबुद्धि को सही रास्ते पर लाने के लिए दिया था। इसलिए महादेव भी बीच में नहीं पड़े। इस शाप का लाभ यह हुआ कि भृंगी असहनीय पीड़ा में पड़कर समझ गए कि पितृशक्ति किसी भी सूरत में मातृशक्ति से परे नहीं है। माता और पितामिलकर ही इस शरीर का निर्माण करते हैं। इसलिए दोनों ही पूज्य हैं।इसके बाद भृंगी ने असह्य पीड़ा से तड़पते हुए जगदंबा की अभ्यर्थना की। माता तो माता होती है। उन्होंने तुरंत उनपर कृपा की और पीड़ा समाप्त कर दी। माता ने अपना शाप वापस लेने का उपक्रम शुरू किया लेकिन धन्य थे भक्त भृंगी भी। उन्होंने माता को शाप वापस लेने से रोका। भृंगी ने कहा- माता मेरी पीड़ा दूर करके आपने मेरे उपर बड़ी कृपा की है। परंतु मुझे इसी स्वरुप में रहने दीजिए। मेरा यह स्वरूप संसार के लिए एक उदाहरण होगा। इस सृष्टि में फिर से कोई मेरी तरह भ्रम का शिकार होकर माता और पिता को एक दूसरे से अलग समझने की भूल न करेगा। मैंने इतना अपराध किया फिर भी आपने मेरे ऊपर अनुग्रह किया। अब मैं एक जीवंत उदाहरण बनकर सदैव आपके आसपास ही रहूंगा। भक्त की यह बात सुनकर महादेव और जगदंबा दोनों पुलकित हो गए। अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण किए हुए मां जगदंबा और पिता महादेव ने तुरंत भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया। भृंगी चलने-फिरने में समर्थ हो सकें इसलिए उन्हें तीसरा पैर भी दिया। तीसरे पैर से वह अपने भार को संभालकर शिव-पार्वती के साथ चलते हैं।अर्धनारीश्वर भगवान ने कहा- हे भृंगी तुम सदा हमारे साथ रहोगे। तुम्हारी उपस्थिति इस जगत को संदेश होगी कि हर जीव में जितना अंश पुरूष है उतनी ही अंश है नारी। नारी और पुरुष में भेद करने वाले की गति तुम्हारे जैसे हो जाती है। पुरुष और स्त्री मिलकर संसार को आगे बढ़ाएं, दोनों बराबर अंश के योगी हैं यही सिद्ध करने को मैंने अर्धनारीश्वर रूप धरा है। स्त्री-पुरुष दोनों का अपना स्थान, अपना अस्तित्व है। इसे नकारने वाले को शिव-शिवा दोनों में से किसी की भी कृपा प्राप्त नहीं होती। वह जीव मृत्युलोक में सदा शिव-शिवा की कृपा के लिए तरसता ही विदा हो जाएगा। भृंगी को वो पद प्राप्त हुआ, जिसे हासिल करने के लिए इंद्रादि बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं। संसार को मैथुनी सृष्टि की व्यवस्था शिवजी ने दी है। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को अपना अर्धनारीश्वर स्वरूप दिखाया। उसे देखकर ही ब्रह्मा ने नारी की कल्पना की। नारी और पुरुष के संयोग से सृष्टि रचना की व्यवस्था दी। अर्थात नर-नारी मिलकर सूक्ष्म ब्रह्मा की तरह सृष्टिकर्ता हो जाते हैं। फिर शिव ने जगदंबा के साथ विवाह व्यवस्था दी। सर्वप्रथम विवाह शिव-जगदंबा का ही है। जय महाकाल👏🏻🌼 साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान शूद्र द्वारा विवाहिता ब्राह्मणी से हुए पुत्र को चाण्डाल कहते हैं । 🎯स्पष्ट है कि प्रतिलोम विवाह प्राचीन काल से हो रहे हैं तथा ऐसे दंपति को मारा नहीं गया । नारायण 🪷🌷🪷
🕉️सनातन धर्म🚩 - { प्रतिलोमास्त्वायोगवमागधवैणक्षत्तूपुल्कसकुक्कुटवैदेहकचण्डालाः  /<// साथ विवाहिता स्त्रियों से जो पुत्र अनु०-अपने से निम्न वर्ण के पुरुप के पैदा होते हैं॰ वे हैं आयोगव मागध, वैण, क्षत्तृ पुल्कस, कुक्कुट, वैदेहक और चण्डाल डॉ नरेन्द्र चुमार आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली सन् १९९९, पृष्ठ ८४ " यौधायन धमसूत्रम अध्याय खणड १६ व्याख्या शूद्राद्वैश्यायां मागधः क्षत्रियायां क्षत्ता व्राह्मण्यां चण्डालः | १ ६।। @punehtant ( a a अनु०-यदि शूद्र पुरुष वैश्या स्त्री से सन्तान उत्पन्न करे तो उसे मागध कहते हैँ, और क्षत्रिया, ब्राह्मणी से उत्पन्न पुत्र को क्रमशःक्षित्ता और(चिण्डाल कहते हैं ढॉ नरेन्द्र कुमार  आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली सन् १९९९ पृष्ठ ८६  बौधायन धर्मसूत्रम , अध्याय खण्ड १७. च्याख्या { प्रतिलोमास्त्वायोगवमागधवैणक्षत्तूपुल्कसकुक्कुटवैदेहकचण्डालाः  /<// साथ विवाहिता स्त्रियों से जो पुत्र अनु०-अपने से निम्न वर्ण के पुरुप के पैदा होते हैं॰ वे हैं आयोगव मागध, वैण, क्षत्तृ पुल्कस, कुक्कुट, वैदेहक और चण्डाल डॉ नरेन्द्र चुमार आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली सन् १९९९, पृष्ठ ८४ " यौधायन धमसूत्रम अध्याय खणड १६ व्याख्या शूद्राद्वैश्यायां मागधः क्षत्रियायां क्षत्ता व्राह्मण्यां चण्डालः | १ ६।। @punehtant ( a a अनु०-यदि शूद्र पुरुष वैश्या स्त्री से सन्तान उत्पन्न करे तो उसे मागध कहते हैँ, और क्षत्रिया, ब्राह्मणी से उत्पन्न पुत्र को क्रमशःक्षित्ता और(चिण्डाल कहते हैं ढॉ नरेन्द्र कुमार  आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली सन् १९९९ पृष्ठ ८६  बौधायन धर्मसूत्रम , अध्याय खण्ड १७. च्याख्या - ShareChat
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मनुस्मृति-मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं:👇 #🕉️सनातन धर्म🚩 धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है । साधारण लोग इसे नही समझ पाते । इसलिए शास्त्र और सन्त जो बतलावे उसे ही ठीक रास्ता समझना चाहिए । भिन्न भिन्न देश और जातियों मे जो जो महात्मा हो गए है उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर रचे हुये अपने ग्रंथों मे जो जो बातें बताये है उन्हीं का हमें यथायोग्य पालन करना चाहिए । धर्म क्या ही अधर्म क्या है इस बात का फैसला वेद करते है । समस्त स्मृतियोंमे मनुस्मृति सबसे प्राचीन और अधिक प्रामाणिक मानी जाती है । उसमें मनुजीने धर्म के दस मुख्य अंग बताये है । वे कहते है - धृति ,क्षमा ,दम ,अस्तेय ,शौच ,इन्द्रियनिग्रह ,धी, विद्या, सत्य, और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है । धृति 👉 धैर्य धारण संतोष अथवा सहनशीलताका नाम धृति है । धैर्यकी ही धर्म नींव है । जिसे धैर्य नही वह धर्म का आचरण कैसे कर सकेगा ? बिना नींव का मकान नहीं होता । इसी प्रकार बिना धैर्य के धर्म नही होता । तुम एकांत मे बैठकर भगवान से प्राथना करो कि हमारी चाहे जो भी दशा हो जाए परन्तु धैर्य न छूटे । क्षमा 👉 दूसरा धर्म क्षमा है । अपनेमे पूरी शक्ति होनेपर भी अपना अपकार करनेवालेसे किसी प्रकार का बदला न लेना तथा उस अपकारको प्रसन्नता से सहन करना क्षमा कहलाता है । इसलिए इस जीवन संग्राममे हमें सर्वदा क्षमा का कवच पहने हुए ही सारे काम करने चाहिए। दम 👉 तीसरा धर्म दम है । दमका साधारण अर्थ तो इन्द्रियनिग्रह है परंतु यहां दम का अर्थ मनको वश मे करना है । मन को वशमे कर लेने पर सभी इन्द्रियनिग्रह अपने अधिन हो जाती है । अस्तेय 👉 अस्तेय चोरी न करने का नाम ही है । इसका अर्थ बहुत व्यापक है । साधारणतः दुसरे की चीज को बिना पुछे ले लेना ही चोरी समझी जाती है । शौच 👉 अब शौच के विषय मे सुनो । शौच का अर्थ है सफाई या पवित्रता । यह दो प्रकार की होती है बाहरी और भीतरी । आजकल इस बाहरी सफाई के विषय मे बड़ा भ्रम फैला हुआ है l इन्द्रियनिग्रह 👉 अच्छा अब इन्द्रियनिग्रह पर आता हू । जीव की सारी अशान्ति का कारण इन्द्रियो का असंयम ही है । इस शरीर रुप रथ का रथी जीव है । बुध्दि सारथी है और मन लगाम है और इन्द्रिया घोड़े है । जिसके इन्द्रिय रुप घोड़े बुद्धि रुप सारथी के अधीन होते है । वही सुख पूर्वक अपने लक्ष्य तक जा सकता है । धी 👉 धी बुद्धि को कहते है । मनुष्य के सारे आचार और विचार का रास्ता बुद्धि ही बतलाती है । बुद्धि जिस ओर ले जाती है उसी ओर पुरुष को जाना होता है । जैसा करना चाहती है वैसा ही करता है । इसलिए जीवन मे सफलता प्राप्त करने के लिए सद् बुद्धि की बहुत बड़ी आवश्यकता है । विद्या 👉 विद्या का अर्थ knowledge है । किन्तु सभी प्रकार का knowledge धर्म की कोटि मे नही आ सकता । इसलिए इसे अध्यात्म विद्या ही समझना चाहिएl सत्य 👉 सत्य के साधारण स्वरूपसे सभी परिचित है । यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है । धर्म का ही नही यदि सूक्ष्मतासे विचारा जाय तो यही स्वयं भगवान का स्वरूप है । वास्तव मे सत्य ही भगवान है । अक्रोध 👉 मनुष्य से जितने पाप बनते है । उनमें से अधिकांश परिणाम मे दूषित संस्कार पैदा करने वाले होने से भी हेय है । किन्तु यह क्रोध तो आरम्भ मे ही उद्वेग पैदा कर देता है । यह पहले जलन पैदा करता है । और पहले उसीको जलाता है जिसे होता है । महर्षि याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।। (अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति) श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में सनातन धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं : सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।। संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:। नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।। अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:। तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।। श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।। नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:। त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।। महात्मा विदुर-महाभारत के महान यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं - इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ। उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है। तुलसीदास द्वारा वर्णित धर्मरथ सुनहु सखा, कह कृपानिधाना, जेहिं जय होई सो स्यन्दन आना। सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका। बल बिबेक दम पर-हित घोरे, छमा कृपा समता रजु जोरे। ईस भजनु सारथी सुजाना, बिरति चर्म संतोष कृपाना। दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा, बर बिग्यान कठिन कोदंडा। अमल अचल मन त्रोन सामना, सम जम नियम सिलीमुख नाना। कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा, एहि सम बिजय उपाय न दूजा। सखा धर्ममय अस रथ जाकें, जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें। महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होई दृढ़, सुनहु सखा मति-धीर।। (लंकाकांड) पद्मपुराण-ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते। दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।। अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते। एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।। अर्थात ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है। धर्मसर्वस्वम् -जिस नैतिक नियम को आजकल 'गोल्डेन रूल' या 'एथिक आफ रेसिप्रोसिटी' कहते हैं उसे भारत में प्राचीन काल से मान्यता है। सनातन धर्म में इसे 'धर्मसर्वस्वम्" (धर्म का सब कुछ) कहा गया है: श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। --- पद्मपुराण, शृष्टि 19/357-358 अर्थ: धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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