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#राधे राधे #राधे राधे राधे
श्रीराधा रानी की कृपा-वाणी....
हे प्रिय भक्त,
तुम्हारे हृदय की श्रद्धा से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें यह वरदान देती हूँ —
तुम्हारे जीवन में सदा प्रेम और शांति का वास हो।
भक्ति की ज्योति तुम्हारे अंत:करण में निरंतर प्रज्वलित रहे। संकट की हर घड़ी में तुम्हें दिव्य साहस और सही मार्ग का ज्ञान प्राप्त हो।
तुम्हारे परिवार में सुख, समृद्धि और आपसी स्नेह बना रहे। तुम्हारे प्रत्येक शुभ कार्य में मेरी कृपा और श्रीकृष्ण की अनुकम्पा साथ रहे।
जो प्रेम से मेरा स्मरण करता है, उसके जीवन में कृपा-रस की वर्षा होती है। तुम्हारा जीवन सेवा, साधना और आनंद से परिपूर्ण हो — यही मेरा आशीष है।
राधे राधे।
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#राधे राधे
सखी री!
मैंने चितवत ही चित हार्यो...
नन्द नदन छवि रुप लुभावन ,
अंखियन कजरा सार्यो ||
कमर कसी कस फैंट पर्यो,
अरु कांधे पटका कारो ||
मुरली अधरन धरी बंक बन,
यमुना तट पर ठाड़्यो ||
ऐसौ भयो देख कछु जादू ,
सर्वस अपनो बार्यो ||
बौरी भयी भूल गयी सुध बुध,
हिये प्रेम अति बाढ़्यो ||
लोक लाज तजि गलियन डोलूँ,
मिलै न प्रीतम प्यारो ||
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#☝आज का ज्ञान
प्रसिद्ध "सूत जी" कौन थे ..!!?
यदि आपने हिन्दू धर्म के किसी भी धर्मग्रन्थ या व्रत कथाओं को पढ़ा है तो आपके सामने पौराणिक "सूत जी" का नाम अवश्य आया होगा। कारण ये है कि सूत जी कदाचित हिन्दू धर्म के सबसे प्रसिद्ध वक्ता हैं। कारण ये कि पुराणों की कथा का प्रसार जिस स्तर पर उन्होंने किया है वैसा किसी और ने नहीं किया। किन्तु ये "सूत जी" वास्तव में हैं कौन?
सूत जी का वास्तविक नाम "रोमहर्षण" था। उन्हें लोमहर्षण भी कहते हैं। उनका रोमहर्षण नाम इसीलिए पड़ा क्यूंकि उनका सत्संग पाकर श्रोताओं का रोम-रोम हर्ष से भर जाता था। उन्हें सूत जी इसीलिए कहते हैं क्यूंकि वे सूत समुदाय से थे। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे जिस कारण वे सूत के रूप में जन्में। हालाँकि पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था।
एक बार सम्राट पृथु ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया जिसके अंत में सभी देवताओं को हविष्य दिया जा रहा था। ब्राह्मणों ने भूल से देवराज इंद्र को अर्पित किये जाने वाले सोमरस में देवगुरु बृहस्पति के हविष्य का अंश मिला दिया। जब उस हविष्य को अग्नि में डाला गया तो उसी से रोमहर्षण की उत्पत्ति हुई। चूँकि उनका जन्म इंद्र (क्षत्रिय गुण) और बृहस्पति (ब्राह्मण गुण) के मेल से हुआ था, इसलिए उन्हें "सूत" माना गया।
जब महर्षि वेदव्यास ने महापुराणों की रचना की तो उनके मन में चिंता हुई कि इस ज्ञान को कैसे सहेजा जाये। उनके कई शिष्य थे किन्तु कोई भी उन सभी १८ पुराणों को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए। जब सूत जी किशोरावस्था में पहुंचे तो एक योग्य गुरु की खोज करते हुए महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। आज ये माना जाता है कि सूत कुल के व्यक्ति को वेदाभ्यास का अधिकार नहीं था, ये बिलकुल गलत है। क्यूंकि महर्षि वेदव्यास ने रोमहर्षण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।
उनके आश्रम में सूत जी की विशेष रूप से वेदव्यास के एक अन्य शिष्य शौनक ऋषि से घनिष्ठ मित्रता हो गयी। ये दोनों महर्षि व्यास के सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक माने जाते हैं। रोमहर्षण ने अपनी प्रतिभा से व्यास रचित सभी १८ महापुराणों को कंठस्थ कर लिया। ये देख कर व्यास मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने रोमहर्षण से उस अथाह ज्ञान का प्रसार करने को कहा।
तत्पश्चात रोमहर्षण ने अपने गुरु महर्षि व्यास से अपने पुत्र उग्रश्रवा को उनका शिष्य बनाने का अनुरोध किया। उग्रश्रवा अपने पिता के समान ही तेजस्वी थे जिसे देख कर व्यास जी ने उन्हें भी अपना शिष्य बना लिया। रोमहर्षण सभी वेद पुराणों का अध्ययन तो कर ही चुके थे, वे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमपिता ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें अलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया।
रोमहर्षण ने उनसे पूछा कि मुझे अपने गुरु से सभी पुराणों का ज्ञान प्राप्त हुआ है और आपने भी मुझे अलौकिक ज्ञान प्रदान किया है। अब मैं किस प्रकार इस ज्ञान का प्रसार करूँ? इस पर ब्रह्मदेव ने उन्हें एक दिव्य चक्र दिया और कहा कि इसे चलाओ और जिस स्थान पर ये रुक जाये वही अपना आश्रम स्थापित कर इस ज्ञान का प्रसार करो।
ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर रोमहर्षण ने उस चक्र को चलाया और वो जाकर "नैमिषारण्य" नामक स्थान पर रुक गया जो ८८००० तपस्वियों का स्थल था। इसी स्थल पर भगवान विष्णु ने निमिष (आंख झपकने में लगने वाला समय) भर में सहस्त्रों दैत्यों का संहार कर दिया था। इसी कारण उस प्रदेश का नाम नैमिषारण्य पड़ा। उसी पवित्र तीर्थ में रोमहर्ष ने अपना आश्रम स्थापित किया और प्रतिदिन सत्संग करने लगे।
कहा जाता है कि उनकी कथा कहने की शैली इतनी रोचक थी कि मनुष्य तो मनुष्य, जीव-जंतु भी उसे सुनने के लिए वहां आ जाते थे। उसी स्थान पर वे "सूत जी" के नाम से प्रसिद्ध हुए। उधर उनके पुत्र उग्रश्रवा भी महर्षि व्यास से शिक्षा लेकर पारंगत हो गए। उन्होंने अपने पिता से भी अधिक शीघ्रता से समस्त पुराणों का अध्ययन कर लिया और वे अपने पिता की भांति ही उस ज्ञान का प्रसार करने लगे।
एक बार नैमिषारण्य के सभी ८८००० ऋषियों ने महर्षि व्यास से ये अनुरोध किया कि वे उन्हें सभी महापुराणों की सम्पूर्ण कथाओं से अवगत कराएं। ये सुनकर महर्षि व्यास ने कहा कि इसके लिए आपको मेरी क्या आवश्यकता है? नैमिषारण्य में मेरे शिष्य रोमहर्षण हैं जो इन सभी कथाओं को सुना सकते है। आप सभी उन्हें "व्यास पद" पर आसीन कर पुराणों का ज्ञान प्राप्त करें। इस पर ऋषियों ने पूछा कि एक सूत को व्यास पद पर कैसे बिठाया जा सकता है? ये सुनकर महर्षि ने सभी को तत्वज्ञान दिया और बताया कि योग्यता जन्म से नहीं बल्कि कर्म से आती है।
ये सुनकर सभी ८८००० ऋषि नैमिषारण्य लौटे और सूत जी को व्यास गद्दी पर बिठा कर पुराणों का ज्ञान देने का अनुरोध किया। इसपर सूत जी ने १२ वर्षों का विशाल यज्ञ सत्र आयोजित किया जिसे सुनने उनके बाल सखा शौनक जी भी पधारे और यजमान का पद ग्रहण किया। सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व पर उनसे प्रश्न करते थे और सूत जी उत्तर देते थे। ऐसा कहते हुए बहुत समय बीत गया और सूत जी ने १० पुराणों की कथा समाप्त कर ११वां पुराण आरम्भ किया।
उधर महाभारत का युद्ध का समाचार सुनकर भगवान बलराम तीर्थ यात्रा पर निकले। घूमते हुए वे नैमिषारण्य पहुंचे जहाँ सूत जी का यज्ञ सत्र चल रहा था। जैसे ही सभी ऋषियों ने बलराम जी को देखा तो सभी अपने स्थान पर खड़े होकर उनका अभिवादन करने लगे और उन्हें आसन दिया। किन्तु सूत जी व्यास गद्दी पर बैठे होने के कारण ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के सम्मान में खड़े नहीं सकते थे। उन्होंने बलराम के आने पर थोड़ी देर के लिए कथा को भी विश्राम दिया।
जब बलराम ने ये देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि इतने बड़े-बड़े महर्षियों ने यहाँ मेरा स्वागत किया किन्तु सूत कुल में जन्मे इस व्यक्ति ने मेरा अपमान किया। यही सोच कर उन्होंने बैठे बैठे ही एक घास को मंत्रसिद्ध कर सूत जी पर चलाया जिससे उनका मस्तक धड़ से अलग हो गया। इस प्रकार सूत जी का वध होते देख कर सारी सभा त्राहि-त्राहि कर उठी। भयानक कोलाहल मच गया।
सभी ऋषि शौनक जी के नेतृत्व में बलराम के पास पहुंचे और उनसे कहा कि आपने ये क्या किया? हम सभी ने महर्षि व्यास के आदेशानुसार सूत जी को व्यास पद प्रदान किया था किन्तु आपने बिना सत्य जाने उनका वध कर दिया। अब तो आप पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया है। उससे अधिक हानि हमारी हुई क्यूंकि सूत जी ने अभी तक पुराणों की कथा सम्पूर्ण नहीं की थी। अब ये ज्ञान सदा के लिए लुप्त हो जाएगा।
जब बलराम जी को सत्य का पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने महर्षि शौनक के चरण पकड़ कर कहा कि अनजाने में मुझसे बड़ा पाप हो गया। आप मुझे इसका प्रायश्चित बताएं। किस प्रकार मैं उनके द्वारा दिए गए इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करूँ?
इस पर शौनक जी ने कहा कि आप सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा को यहाँ बुलाइये क्यूंकि व्यास जी के अतिरिक्त अब एक वे ही है जिनके पास समस्त पुराणों का ज्ञान है। ये सुनकर बलराम तत्काल शौनक जी के साथ उग्रश्रवा ऋषि के पास पहुंचे और उनसे क्षमा याचना की। वे उन्हें मना कर नैमिषारण्य ले आये जहाँ उग्रश्रवा जी ने बांकी ८ पुराणों की कथा सुनाने का वचन दिया। बलराम को इससे थोड़ा संतोष हुआ।
उन्होंने पुनः प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले सभी ऋषियों से पूछा कि मुझे बताइये कि मैं प्रायश्चित के लिए निकलने से पहले आपका और क्या हित करूँ? तब सभी ऋषियों ने कहा कि हे बलराम इस वन में "बल्वल" नामक एक असुर है जो इल्वल का पुत्र है। वो सदैव हमारे यज्ञ में विघ्न डालता है और यज्ञ कुंड में अपशिष्ट पदार्थ डाल देता है। कृपया उससे हमारी रक्षा करें।
ऋषियों का ऐसा अनुरोध सुनकर बलराम जी ने बल्वल ये युद्ध कर सहज ही उसका वध कर दिया और नैमिषारण्य को राक्षसों के आतंक से मुक्त किया। तत्पश्चात वे प्रायश्चित के लिए तीर्थ यात्रा पर निकल गए। तब सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा ने अपने पिता का सत्संग आगे बढ़ाया और बचे हुए ८ महापुराणों के ज्ञान से समस्त ऋषियों को परिपूर्ण कर दिया।
महाभारत की कथा जो आज हम पढ़ते हैं वो भी सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा सौति द्वारा ही सुनाई हुई है। जब महर्षि वैशम्पायन ने महाभारत की मूल कथा, जिसे जय कहते हैं, परीक्षित पुत्र जन्मेजय को सुनाई थी, उस समय लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति ने भी वो कथा सुनी थी। बाद में उन्होंने नैमिषारण्य में पहुँच कर वही कथा विस्तार पूर्वक ८८००० ऋषियों को महर्षि शौनक की उपस्थिति में सुनाया। उन्होंने अपने पिता का पद प्राप्त किया था इस कारण उग्रश्रवा सौति को भी अपने पिता की भांति सूत जी कहा जाने लगा।
कुछ लोगों का ये भी मानना है कि लोमहर्षण या उग्रश्रवा सौति सूत नहीं बल्कि ब्राह्मण थे किन्तु ये भी गलत है। हालाँकि कुछ पुराणों मेंरोमहर्षण को अग्नि से उत्पन्न अवश्य माना गया है किन्तु वास्तव में वे सूत ही थे। महाभारत में अनेकों स्थानों पर उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति को "सूत नंदन" कहकर सम्बोधित किया गया है। वैसे भी सूत एक सम्मानित पद ही था, इसीलिए इसे अन्यथा के रूप में नहीं देखना चाहिए।
समान पद होने के कारण ही जनमानस में ये संदेह फैला है कि वास्तविक सूत जी कौन हैं? कुछ लोग लोमहर्षण को सूत जी मानते हैं तो कुछ लोग उग्रश्रवा सौति को। तो इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझें कि दोनों पिता-पुत्र सूत जी ही कहलाते हैं लेकिन पुराणों में अधिकतर स्थानों जिन सूत जी का वर्णन वो लोमहर्षण (रोमहर्षण) हैं और महाभारत के सन्दर्भ में जिन सूत जी का वर्णन आता है वो उग्रश्रवा सौति हैं। आम तौर पर जिन सूत जी की बात होती हैं उन्हें रोमहर्षण ही समझा जाना चाहिए।
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#राधे राधे
तिल भर भी चरण शरण से दूरी न हो,
तिल भर भी श्री ठाकुरजी के स्वरूप की विस्मृति न हो तिल भर भी नाम सेवा न छुटे तिल भर भी श्रीजी की रूप माधुरी से हटकर नेत्र कहीं ओर न चले जाएं !!
हमारी तिल जैसी सेवा से भी अकारण प्रसन्न हो जाने वाले हमारे परमाराध्य श्री युगल श्यामा श्याम हम सब पर सदैव कृपा करें !!
श्री राधे राधे....
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#होली
#राधे कृष्ण
करतारी देदे नाचेंही बोलें सब होरी हो॥ध्रु.॥
संग लियें बहु सहचरी वृषभान दुलारी हो॥
गावत आवत साजसों उतते गिरिधारी हो॥1॥
दोऊ प्रेम आनंदसों उमगे अति भारी॥
चितवन भर अनुरागसों छूटी पिचकारी॥2॥
मृदंग ताल डफ वाजहीं उपजे गति न्यारी॥
झूमक चेतव गावहीं ये मीठी गारी॥3॥
लाल गुलाल उडावहीं सोंधे सुखकारी॥
प्यारी मुखहिलगावहीं प्यारो ललन विहारी॥4॥
हरे हरे आंई दुरकरी अबीर अंधियारी॥
घेरले गईं कुंवरकों भरकें अंक वारी॥5॥
काहू गहिवेनी गुही रचि मांग संवारी॥
काहू अंजनसों आज अरु अखियां अनियारी॥6॥
कोऊ सोंधेसों सानकें पहरावत सारी॥
करते मुरली हरि लई वृषभान दुलारी॥7॥
तब ललिता मिलकें कछू एक बात विचारी॥
प्रिया वसन पियकों दये पियके दीये प्यारी॥8॥
मृगमद केसर घोरकें नख सिखते ढारी॥
सखियन गठजोरो कियो हंस मुसकाय निहारी॥9॥
याही रस निवहो सदा यह केलि तिहारी॥
निरख माधुरी सहचरी छबि पर बलहारी॥10॥
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राधे राधे..
#🙏गीता ज्ञान🛕
💐💐 गीता में अठारह अध्याय हैं, सात सौ श्लोक हैं; उनमें बहुत-से ऐसे श्लोक हैं, जिनमें से एक श्लोक भी यदि मनुष्य अर्थ और भावसहित मनन करके काम में लाये तो उसका उद्धार हो सकता है | यहाँ गीता के एक श्लोक के विषय में कुछ विचार किया जाता है—
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||
(६ | ५)
‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु |’
इस श्लोक में प्रधान चार बातें बतलायी गयी हैं—
१-मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये |
२-मनुष्य को अपने द्वारा अपना अधःपतन नहीं करना चाहिए |
३-मनुष्य आप ही अपना मित्र है |
४-मनुष्य आप ही अपना शत्रु है |
अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य जिससे अपना परम हित—कल्याण हो, उस भाव और आचरण को तो ग्रहण करता है और जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण का सर्वथा त्याग करता है, वही अपने द्वारा अपना उद्धार कर रहा है | इसके विपरीत, जो मनुष्य जिससे अपना अधःपतन हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण करता है तथा जिससे अपना कल्याण हो, उस भाव और आचरण को ग्रहण नहीं करता, वही अपने द्वारा अपना अधःपतन पतन करता है | अतः जो मनुष्य अपने द्वारा अपने उद्धार का उपाय करता है, वह स्वयं ही अपना मित्र है; इसके विपरीत, जो मनुष्य समझ-बूझकर भी अपने कल्याण के विरुद्ध आचरण करता है, वह स्वयं ही अपना शत्रु है |
अब यह भलीभांति विचार करना चाहिए कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना क्या है और अपने द्वारा अपना अधःपतन करना क्या है |
शास्त्रों में कल्याण के लिए बहुत-से उपाय बतलाये गये हैं और सज्जन पुरुष भी हमारे कल्याणकी बहुत-सी बातें कहते हैं | उन सबपर तथा उसके अतिरिक्त भी, ईश्वर ने आपको जो बुद्धि, विवेक और ज्ञान दिया है, उसका आश्रय लेकर पक्षपातरहित हो आपको आपको गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए | इस प्रकार गम्भीर विचार करनेपर आपकी बुद्धि में संशय और भ्रम से रहित जो कल्याणकर भाव और आचरण प्रतीत हो, उसको सिद्धान्त मानकर तत्परतापूर्वक कटिबद्ध हो उसका सेवन करना और उसके विपरीत भाव और आचरण का कभी सेवन न करना—यही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है | इसी प्रकार जो भाव और आचरण हमें विचार करने पर लाभप्रद प्रतीत हो, उसका सेवन न करना और जो पतनकारक प्रतीत हो, उसका सेवन करना अपना अधःपतन करना है |
#☝आज का ज्ञान
👹 राक्षसों की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या वे जन्म से ही बुरे थे या रक्षक? 🔱✨
वेद और पुराणों में देव, असुर, यक्ष, गंधर्व और नाग आदि जातियों का वर्णन मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन्हें आज हम 'राक्षस' कहते हैं, उनका मूल काम क्या था और रावण का जन्म कैसे हुआ?
आइए जानते हैं राक्षस वंश का पूरा और रोचक इतिहास! 👇
1️⃣ रक्ष और यक्ष: उत्पत्ति का रहस्य 🌊
प्रारंभिक काल में जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो समुद्र और जल-प्राणियों की सुरक्षा के लिए कुछ जातियों को उत्पन्न किया।
जिन्होंने 'रक्षा' का भार संभाला, वे 'राक्षस' कहलाए। (शुरुआत में यह एक पवित्र कार्य माना जाता था)।
जिन्होंने 'यक्षण' (पूजन) स्वीकार किया, वे 'यक्ष' कहलाए।
2️⃣ हेति और प्रहेति: राक्षसों के प्रथम प्रतिनिधि 👑
ब्रह्मा जी के श्रम और क्रोध से 'हेति' और भूख से 'प्रहेति' नामक दो बलशाली भाइयों का जन्म हुआ। प्रहेति तपस्या में लीन हो गया, जबकि हेति ने राजपाट संभाला। हेति के वंश में आगे चलकर 'विद्युत्केश' का जन्म हुआ।
3️⃣ जब शिव-पार्वती ने लिया एक राक्षस पुत्र को गोद 🌙
विद्युत्केश की पत्नी ने अपने नवजात पुत्र को लावारिस छोड़ दिया था। तब उस अनाथ बालक पर भगवान शिव और माता पार्वती की नजर पड़ी। उन्होंने उसे गोद ले लिया और उसका नाम 'सुकेश' रखा। शिव जी के वरदान से वह अत्यंत शक्तिशाली और निर्भीक हो गया।
4️⃣ लंका का निर्माण और राक्षसों का अहंकार 🏰
सुकेश के तीन पराक्रमी पुत्र हुए— माल्यवान, सुमाली और माली।
इन तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और अजेय होने का वरदान पाया। विश्वकर्मा जी से इन्होंने समुद्र तट पर 'त्रिकुट पर्वत' के निकट स्वर्ण लंका का निर्माण करवाया। लेकिन वरदान पाकर वे अहंकारी हो गए और यक्षों-देवताओं पर अत्याचार करने लगे।
5️⃣ रावण का जन्म और लंका पर अधिकार ⚔️
देवताओं से हारने के बाद राक्षसों को लंका छोड़नी पड़ी और लंका प्रजापति ब्रह्मा ने धनपति कुबेर (यक्ष) को सौंप दी।
सुमाली की पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से हुआ। इन्हीं के पुत्र हुए— महापराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और पुत्री शूर्पणखा। रावण ने अपनी माता के कहने पर शिव जी की तपस्या की, मायावी शक्तियां पाईं और अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया।
6️⃣ रावण का वंश और महाविनाश 🔥
रावण ने मंदोदरी से विवाह किया, जिससे मेघनाद, अक्षयकुमार आदि पुत्र हुए।
कुम्भकर्ण के पुत्रों में भीम (जिसके नाम पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग है) और विभीषण की पुत्री त्रिजटा (जो सीता जी की रक्षक थी) प्रमुख थे।
अपने अहंकार और अधर्म के कारण रावण ने देवलोक तक दुश्मनी मोल ली।
अंततः रामायण के महायुद्ध में विभीषण को छोड़कर लंका के समस्त राक्षस वंश का नाश हो गया और धर्म की जीत हुई।
।। जय जय सियाराम ।। 🙏🚩
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती
महादेव का नाम लेकर सुबह की शुरुआत करना न केवल आध्यात्मिक रूप से कल्याणकारी है, बल्कि यह मानसिक शांति और असीम ऊर्जा भी प्रदान करता है। आप अपनी सुबह को शिवमय बनाने के लिए निम्नलिखित विधि अपना सकते हैं:
1. आंखें खुलते ही करावलम्वन (कर-दर्शन)
बिस्तर पर बैठे हुए ही अपनी हथेलियों को देखें और महादेव का स्मरण करें। आप इस सरल मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं:
> "कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
> करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥"
> इसके बाद मन ही मन "ॐ नमः शिवाय" का जप करते हुए धरती माता को स्पर्श कर प्रणाम करें।
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2. शिव पंचक्षर मंत्र का जप
बिस्तर से उठने के बाद शांत चित्त होकर कम से कम 11 बार "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। यह मंत्र पंच तत्वों को संतुलित करता है और दिन भर के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
3. सूर्योदय के समय महादेव का ध्यान
स्नान आदि से निवृत्त होकर, यदि संभव हो तो शिवलिंग पर जल अर्पित करें। जल चढ़ाते समय इस भाव को मन में रखें कि आप अपने अहंकार और नकारात्मकता को महादेव के चरणों में अर्पित कर रहे हैं।
4. महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव
यदि आप किसी विशेष भय या तनाव में हैं, तो सुबह के समय महामृत्युंजय मंत्र का 3 या 11 बार पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है:
> "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
> उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
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5. कल्याणकारी विचार (संकल्प)
दिन की शुरुआत करते समय महादेव से यह प्रार्थना करें:
> "हे महादेव, आज का मेरा हर कार्य आपकी सेवा हो, मेरी हर वाणी आपका नाम हो और मेरा हर कदम आपके मार्ग पर चले।"
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6. संक्षिप्त शिव स्तुति
समय कम हो तो केवल इस पंक्ति का स्मरण करें:
> "कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
> सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
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#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #जय श्री कृष्ण
जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। भगवान शिव की भी इच्छा हुई के मैं महारास में प्रवेश करूँ। भगवान शिव बावरे होकर अपने कैलाश को छोड़कर ब्रज में आये । पार्वती जी ने मनाया भी लेकिन त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्रीआसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये।
वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं श्री ललिता जी ने ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, “श्रेष्ठ जनों” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता।
भगवान शिव बोले की तो क्या करना पड़ेगा?
ललिता सखी बोली की आप भी गोपी बन जाओ। भगवान शिव बोले की जो बनाना हैं जल्दी बनाओ लेकिन मुझे महारास में प्रवेश जरूर दिलाओ।
भगवान शिव को गोपी बनाया जा रहा हैं। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया हैं। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया हैं। भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये।फिर क्या था, प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये।
भगवान ने जब भगवान शिव को देखा तो समझ गए। भगवान ने सोचा की चलो भगवान शिव का परिचय सबसे करवा देते हैं जो गोपी बनकर मेरे महारास का दर्शन करने आये हैं। सभी गोपियाँ भगवान शिव के बारे में सोच के कह रही हैं ये कौन सी गोपी हैं। हैं तो लम्बी तगड़ी और सुन्दर। कैसे छम-छम चली जा रही हैं। भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं।
गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा हैं? आप देख लो हमारा चेहरा।
लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजती पर ही तुला हैं।
भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा।
भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा। कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा।
सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए।
जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा।
भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया। भगवान शिव दौड़कर दूसरी और जाने लगे तो भगवान कृष्ण गोपियों से बोले गोपियों पीछे किसी गोपी का मैं मुख दर्शन करूँगा पहले इस गोपी का मुख दर्शन करूँगा जो मुख दिखने में इतनी लाज शर्म कर रही हैं। इतना कहकर भगवान शिव दौड़े और दौड़कर भगवान शिव को पकड़ लिया। और घूँघट ऊपर किया और कहा आओ गोपीश्वर आओ। आपकी जय हो। बोलिए गोपेश्वर महादेव की जय। शंकर भगवान की जय।।
श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, “भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, “प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा “हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु’ कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव’ के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि व्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी विराजमान है।
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।। जय श्री राम ।।
*भगवान विष्णु का प्रमुख आयुध ‘श्रीसुदर्शन-चक्र*
#श्री हरि विष्णु
भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है।
👉‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें,क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया।
👾‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी।
‘ 👉वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है कि एक बार भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा था कि ‘आप लोगों के पास जो अस्त्र हैं, उनसे असुरों का वध नहीं किया जा सकता। आप सब अपना-अपना तेज दें।’ इस पर सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज दिया। सब तेज एकत्र होने पर भगवान् विष्णु ने भी अपना तेज दिया। फिर महादेव शंकर ने इस एकत्रित तेज के द्वारा अत्युत्तम शस्त्र बनाया और उसका नाम ‘सुदर्शन-चक्र’ रखा। भगवान् शिव ने‘सुदर्शन-चक्र’ को दुष्टों का संहार करने तथा साधुओं की रक्षा करने के लिए विष्णु को प्रदान किया।
👉‘हरि-भक्ति-विलास’ में लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र’ बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग इसे चिह्न के रुप में धारण करें। ‘गरुड़-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’का महत्त्व बताया गया है और इसकी पूजा-विधि दी गई है। ‘श्रीमद्-भागवत’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ की स्तुति इस प्रकार की गई है- ‘हे सुदर्शन! आपका आकार चक्र की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय-कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सभी ओर घूमते हैं। जिस प्रकार अग्नि वायु की सहायता से शुष्क तृण को जला डालती है, उसी प्रकार आप हमारी शत्रु-सेना को तत्काल जला दीजिए।’
‘विष्णु-धर्मोत्तर-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का वर्णन एक पुरुष के रुप में हुआ है। इसकी दो आँखें तथा बड़ा-सा पेट है। चक्र का यह रुप अनेक अलंकारों से सुसज्जित तथा चामर से युक्त है।
वल्लभाचार्य कृत
👉‘सुदर्शन-कवच’---
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वैष्णवानां हि रक्षार्थं, श्रीवल्लभः-निरुपितः।
सुदर्शन महामन्त्रो, वैष्णवानां हितावहः।।
मन्त्रा मध्ये निरुप्यन्ते, चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा-गर्भ-रक्षां च, परीक्षित-हिते-रतः।।
ब्रह्मास्त्र-वारणं चैव, भक्तानां भय-भञ्जनः।
वधं च सुष्ट-दैत्यानां, खण्डं-खण्डं च कारयेत्।।
वैष्णवानां हितार्थाय, चक्रं धारयते हरिः।
पीताम्बरो पर-ब्रह्म, वन-माली गदाधरः।।
कोटि-कन्दर्प-लावण्यो, गोपिका-प्राण-वल्लभः। श्री-वल्लभः कृपानाथो, गिरिधरः शत्रुमर्दनः।।
दावाग्नि-दर्प-हर्ता च, गोपीनां भय-नाशनः।
गोपालो गोप-कन्याभिः, समावृत्तोऽधि-तिष्ठते।।
वज्र-मण्डल-प्रकाशी च, कालिन्दी-विरहानलः। स्वरुपानन्द-दानार्थं, तापनोत्तर-भावनः।।
निकुञ्ज-विहार-भावाग्ने, देहि मे निज दर्शनम्। गो-गोपिका-श्रुताकीर्णो, वेणु-वादन-तत्परः।।
काम-रुपी कला-वांश्च, कामिन्यां कामदो विभुः।
मन्मथो मथुरा-नाथो, माधवो मकर-ध्वजः।।
श्रीधरः श्रीकरश्चैव, श्री-निवासः सतां गतिः।
मुक्तिदो भुक्तिदो विष्णुः, भू-धरो भुत-भावनः।।
सर्व-दुःख-हरो वीरो, दुष्ट-दानव-नाशकः।
श्रीनृसिंहो महाविष्णुः, श्री-निवासः सतां गतिः।।
चिदानन्द-मयो नित्यः, पूर्ण-ब्रह्म सनातनः। कोटि-भानु-प्रकाशी च, कोटि-लीला-प्रकाशवान्।।
भक्त-प्रियः पद्म-नेत्रो, भक्तानां वाञ्छित-प्रदः।
हृदि कृष्णो मुखे कृष्णो, नेत्रे कृष्णश्च कर्णयोः।।
भक्ति-प्रियश्च श्रीकृष्णः, सर्वं कृष्ण-मयं जगत्।
कालं मृत्युं यमं दूतं, भूतं प्रेतं च प्रपूयते।।
👉“ॐ नमो भगवते महा-प्रतापाय महा-विभूति-पतये, वज्र-देह वज्र-काम वज्र-तुण्ड वज्र-नख वज्र-मुख वज्र-बाहु वज्र-नेत्र वज्र-दन्त वज्र-कर-कमठ भूमात्म-कराय, श्रीमकर-पिंगलाक्ष उग्र-प्रलय कालाग्नि-रौद्र-वीर-भद्रावतार पूर्ण-ब्रह्म परमात्मने, ऋषि-मुनि-वन्द्य-शिवास्त्र-ब्रह्मास्त्र-वैष्णवास्त्र-नारायणास्त्र-काल-शक्ति-दण्ड-कालपाश-अघोरास्त्र-निवारणाय, पाशुपातास्त्र-मृडास्त्र-सर्वशक्ति-परास्त-कराय, पर-विद्या-निवारण अग्नि-दीप्ताय, अथर्व-वेद-ऋग्वेद-साम-वेद-यजुर्वेद-सिद्धि-कराय, निराहाराय, वायु-वेग मनोवेग श्रीबाल-कृष्णः प्रतिषठानन्द-करः स्थल-जलाग्नि-गमे मतोद्-भेदि, सर्व-शत्रु छेदि-छेदि,मम बैरीन् खादयोत्खादय, सञ्जीवन-पर्वतोच्चाटय, डाकिनी-शाकिनी-विध्वंस-कराय महा-प्रतापाय निज-लीला-प्रदर्शकाय निष्कलंकृत-नन्द-कुमार-बटुक-ब्रह्मचारी-निकुञ्जस्थ-भक्त-स्नेह-कराय दुष्ट-जन-स्तम्भनाय सर्व-पाप-ग्रह-कुमार्ग-ग्रहान् छेदय छेदय, भिन्दि-भिन्दि, खादय, कण्टकान् ताडय ताडय मारय मारय, शोषय शोषय, ज्वालय-ज्वालय, संहारय-संहारय, (देवदत्तं) नाशय नाशय, अति-शोषय शोषय, मम सर्वत्र रक्ष रक्ष,महा-पुरुषाय सर्व-दुःख-विनाशनाय ग्रह-मण्डल-भूत-मण्डल-प्रेत-मण्डल-पिशाच-मण्डल उच्चाटन उच्चाटनाय अन्तर-भवादिक-ज्वर-माहेश्वर-ज्वर-वैष्णव-ज्वर-ब्रह्म-ज्वर-विषम-ज्वर-शीत-ज्वर-वात-ज्वर-कफ-ज्वर-एकाहिक-द्वाहिक-त्र्याहिक-चातुर्थिक-अर्द्ध-मासिक मासिक षाण्मासिक सम्वत्सरादि-कर भ्रमि-भ्रमि,छेदय छेदय, भिन्दि भिन्दि, महाबल-पराक्रमाय महा-विपत्ति-निवारणाय भक्र-जन-कल्पना-कल्प-द्रुमाय-दुष्ट-जन-मनोरथ-स्तम्भनाय क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय नमः।।
पिशाचान् राक्षसान् चैव, हृदि-रोगांश्च दारुणान् भूचरान् खेचरान् सर्वे, डाकिनी शाकिनी तथा।।
नाटकं चेटकं चैव, छल-छिद्रं न दृश्यते। अकाले मरणं तस्य, शोक-दोषो न लभ्यते।।
सर्व-विघ्न-क्षयं यान्ति, रक्ष मे गोपिका-प्रियः। भयं दावाग्नि-चौराणां, विग्रहे राज-संकटे।।
👉।।फल-श्रुति।।---
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व्याल-व्याघ्र-महाशत्रु-वैरि-बन्धो न लभ्यते। आधि-व्याधि-हरश्चैव, ग्रह-पीडा-विनाशने।।
संग्राम-जयदस्तस्माद्, ध्याये देवं सुदर्शनम्।
सप्तादश इमे श्लोका, यन्त्र-मध्ये च लिख्यते।।
वैष्णवानां इदं यन्त्रं, अन्येभ्श्च न दीयते।
वंश-वृद्धिर्भवेत् तस्य, श्रोता च फलमाप्नुयात्।।
👉सुदर्शन-महा-मन्त्रो, लभते जय-मंगलम्।।
सर्व-दुःख-हरश्चेदं,अंग-शूल-अक्ष-शूल-उदर-शूल-गुद-शूल-कुक्षि-शूल-जानु-शूल-जंघ-शूल-हस्त-शूल-पाद-शूल-वायु-शूल-स्तन-शूल-सर्व-शूलान्निर्मूलय,दानव-दैत्य-कामिनिवेताल-ब्रह्म-राक्षस-कालाहल-अनन्त-वासुकी-तक्षक-कर्कोट-तक्षक-कालीय-स्थल-रोग-जल-रोग-नाग-पाश-काल-पाश-विषं निर्विषं कृष्ण! त्वामहं शरणागतः।
वैष्णवार्थं कृतं यत्र श्रीवल्लभ-निरुपितम्।। ॐ
👉इसका नित्य प्रातः और रात्री में सोते समय पांच - पांच बार पाठ करने मात्र से ही समस्त शत्रुओं का नाश होता है और शत्रु अपनी शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगते है.
।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।













