#❤️जीवन की सीख
यह दुनिया अगर नरक है तो केवल उनके लिए जो नारायण को भूले हुए हैं। यह दुनिया स्वर्ग अवश्य है मगर वो भी केवल उनके लिए जिनका प्रभु से प्रेम रुपी सम्बन्ध बन चुका है। जिसे प्रभु की सत्ता पर जितना कम विश्वास होगा वह उतना ही दुखी होगा।
हमारा सुख इस बात पर निर्भर नही करता कि हमारे पास कितनी सम्पत्ति है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे पास कितनी सन्मति है। स्वर्ग का अर्थ वह स्थान नही जहाँ सब सुख हों अपितु वह स्थान है जहाँ सभी खुश रहते हों।
भक्ति हमें सम्पत्ति तो नहीं देती पर प्रसन्नता जरुर देती है। प्रसन्नता से बढकर कोई स्वर्ग नही और निराशा से बढकर दूसरा कोई नरक भी तो नही है।
जय श्री राधे 👏🏻👏🏻.
#कर्मफल तो #भोगना पड़ेगा #कर्म
⁉️प्रश्न:-यदि लालच इस जन्म में 100% खत्म हो गया, मोह खत्म हो गया 70%, ईर्ष्या द्वेष बैर सब पूरे खत्म हो गए। लेकिन भगवद प्राप्ति नहीं हुई तो अगला जब भी इंसान का जन्म मिलेगा तो ये जो लालच 100% खत्म हुआ ये खत्म रहेगा या वापिस आएगा??ऐसे ही मोह 70% खत्म होकर अगले जन्म में 30% पर ही काम करना होगा या शुरू से सब 100 मिलेगा??⁉️
🧘देखिये ये लालच , ईर्ष्या द्वेष इत्यादि सब छोटे अवयव हैं ।
ये किसी के पुत्र हैं । इन सब की माता का नाम अविवेक है और पिता का नाम अहंकार है ।
तुलसीदास जी ने इसको एक में समेट दिया है कि - 🧘
मोह सकल व्याधिन कर मूला ।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु शूला ।।
🧑🍼मोह ही समस्त मानसिक व्याधियों का मूल है ।🧑🍼
⁉️लेकिन यह मोह उपजता क्यों है ?? ⁉️
🌷यह उपजता है अविवेक से ।
अविवेक क्या है ?? हम शरीर हैं ।
यही अविवेक है । जैसे ही हम यह मानते हैं कि हम शरीर हैं , ठीक उसी क्षण से उस शरीर से सम्बंधित विषयों को प्राप्त करने की लालसा पैदा हो जाती है ।
यही लालसा लालच पैदा करती है । यह हमें मिल जाये तो हमारे शरीर को यह लाभ मिल जाएगा ।
और फिर उस लाभ के लिए जी तोड़ मेहनत करना । जब उस लाभ की प्राप्ति में अवरोध आता है तो हमें क्रोध आता है । और उसकी पूर्ति पर और लालच बढ़ता है । उसकी प्राप्ति में जो बाधा बनता है , उससे हमें राग , द्वेष , ईर्ष्या इत्यादि जन्मते हैं । तो यह सब एक दूसरे से connected हैं । यह समझिये कि यह इतने interconnected हैं कि कहीं भी current रहेगा तो वह पूरे wire या fittings में जायेगा ही जायेगा । तो इनको अलग अलग नहीं समाप्त किया जा सकता ।
और इन सबका मूल कारण है , अहंकार । अहं भाव ।बअपने अस्तित्व की सत्ता का भाव ।
कर्तापन का भाव । तो यह कभी नहीं होगा कि हमारे अंदर से द्वेष तो समाप्त हो गया है लेकिन राग बाकी है । बिल्कुल नहीं । जितने प्रतिशत का राग होगा , उतने ही प्रतिशत का द्वेष होगा । जितने प्रतिशत का मोह होगा , उतने ही प्रतिशत का क्रोध होगा और लालच होगा । सब एक दूसरे के directly proportional हैं ।
एक बढ़ेगा तो दूसरा उसी अनुपात या ratio में बढ़ेगा या घटेगा ।
तो मूल में है अहंकार और कर्तापन का भाव । अब ये सब कभी खत्म नहीं हो सकते ।
दबाया जा सकता है इनको , अनुकूल परिस्थिति न दी जाए तो इनको दबाया जा सकता है लेकिन इनका नाश कभी नहीं होता । लेकिन कब तक ?? जब तक भगवदप्राप्ति न हो जाये ।
इसी दबाने को हम दूसरी भाषा में समझाने के लिए बोल देते हैं कि ये कम हो गए । ये नहीं कम हुए , इनका प्रभाव कम हुआ है । ये उसी तरह हैं । जैसे वर्षाकाल होते ही घास उग आती है , ठीक उसी तरह यह भी अनुकूल परिस्थिति मिलने पर फिर से प्रकट हो जाएंगे । तो जब यह कम होते हैं तो धीरे धीरे प्रकाश दिखने लगता है ।
जैसे सूर्य उगता है तो हम घर में भी रहें तब भी बिना सूर्य को साक्षात देखे , हम उसके प्रकाश का अनुभव कर सकते हैं । ठीक ऐसे ही जितना यह दबे रहेंगे उतना ही हमें उस दिव्य तत्त्व का आभास होने लगता है। लेकिन जिस दिन भगवदप्राप्ति होगी , उस दिन यह सब पँचक्लेश , प्रपंच , त्रिकर्म , त्रिदोष , पंचकोश सब नष्ट हो जाते हैं और हम सदा सदा को सदा पश्यन्ति सूरयः तद्विष्णोः परमं पदं की भाँति कृत कृत्य हो जाएंगे ।🌷
🤹अब रही बात कि अगर हम इन्हें नियंत्रण कर लेते हैं कुछ प्रतिशत तो क्या वह अगले जन्म में मिलेगा ?? तो हाँ , यह carry forward हो जाएगा आगे और अगले जन्म में आपको उतनी साधना या controlling power मिल जाएगी । इसीलिए 🤹
एक पिता के विपुल कुमारा ।
होहिं पृथक गुन शील अचारा ।।
कोउ पण्डित कोउ तापस ज्ञाता ।
कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ।।
👩❤️👩तो यह सब मिल जाता है ।
अगर शुरू से होना होता तो सब monotonous एक ही तरह होते । फिर साधना करने का कोई लाभ नहीं ।👩❤️👩
⁉️पुनः प्रश्न:- इसका कितना परसेंट ये डिसाइड करेगा कि हमे अगला जन्म मनुष्य जन्म का ही प्राप्त होगा?? या जब भी अगला मनुष्य जन्म मिलेगा तब से काउंट होगा। या इसके प्रभाव से मनुष्य जन्म मिलेगा या हरि गुरु कृपा मात्र से या साधना में जितना समर्पण या शरणागति है मूल लक्ष्य के प्रति इसके आधार पर?⁉️
✍️उत्तर:-मनुष्य जन्म का कोई विशेष criteria नहीं है । कईयों को भोगदण्ड भोगाने के लिए दिया जाता है और कोई ऐसा कर्म बन जाता है जो मनुष्य देह का कारण होता है । क्योंकि जो अपमान , तिरस्कार से दुःख की प्राप्ति मनुष्य जन्म में होती है , वह किसी अन्य देह में नहीं । कुत्ते के ऊपर थूक दें या 2 डंडे मार दें , तो उसे बस शरीर का कष्ट होगा । लेकिन मनुष्य तो सोच सोच कर ही मर जाता है । आप लोग देख लीजिए आप सब लोगों की लड़ाई सिर्फ सोच सोच कर होती है कि हमारा अपमान हो गया और कुछ नहीं । किसी ने किसी को शारीरिक कष्ट नहीं पहुँचाया होता है । लेकिन सोच सोच कर कि उसने हमें ऐसा कहा , वह हमें ऐसा समझता है , उसके सामने मेरा अपमान हो गया , आप देखते रहे जैसे द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था और आप भीष्म की तरह बैठे रहे , आदि आदि । तो यह सब सोचने के कारण ही होता है । किसी बात को अधिक हमने लेना शुरू कर दिया तो वह राई का पहाड़ बन जाता है । अरे लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं । तो भोगाने के लिए भी मनुष्य देह मिलता है । लेकिन एक कर्म ऐसा होता है जिसके कारण यह जन्म मिलता है । ऐसे समझिये कि कोयले की खुदाई करते करते एक truck भर कर कोयला निकला ,लेकिन उसमें एक हीरा भी निकल आया । तो यही हीरा कारण बनता है मनुष्य जन्म का । जिसका हीरा जितना बड़ा होगा , अच्छा होगा , cuttings अच्छी होंगी , उसे उतना ही अच्छा कुल , भाग्य , जन्म , शरीर , location, इत्यादि सब मिलता है और यह जान लें कि भगवद पथ पर चलने वालों को , जो कम से कम 8 घण्टे सही सही साधना को दे रहा है , उसे मनुष्य जन्म मिलना निश्चित है ।
जो जितना दिमागदार होगा , उसको विपरीत परिस्थिति में उतना ही कष्ट मिलेगा । कुत्ते को अधिक दिमाग नहीं तो उसे कम कष्ट । चींटी को उससे कम। तो उसे कम कष्ट चाहे आप उसे घर से बाहर निकाल दें , या खाट पर से उठाकर पटक दें । सब वही बात है । शरणागति तभी बढ़ती है जब यह सब कम होने लगते हैं , अहंकार का दमन होने लगता है ।⁉️पुनः प्रश्न:- अहंकार और करतापन का भाव कभी खत्म नहीं होता भगवद प्राप्ति से पहले और अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होते ही ये अपने सर को उठा लेते हैं, तो ऐसी परस्थिति में क्या उचित है .....अगर लग रहा है कि अहंकार या कर्तापन आ रहा है तो उस जगह से भाग जाएं या उसी में रहकर परीक्षा दी जाए और सुधारा जाए? भाग जाए का मतलब ऐसी परिस्थितियों को ही हमेशा पैदा होते ही किनारा कर दें?⁉️
✍️उत्तर:-भागना कोई हल है ही नहीं । कहीं भी भागेंगे मन तो आपके साथ ही जायेगा ।
परिस्थितियाँ तो जड़ हैं , वह कुछ नहीं करती । करता तो सब कुछ ये मन है न । तो भाग कर जाना कहाँ ?? भले हम 10km अंदर जमीन के गुफा में ही क्यों न हों , मन तो साथ रहेगा ही न , वह जीने नहीं देगा । मन को ही सुधारना है , सब परिस्थिति अनुकूल हो जाएगी । परिस्थिति को तो हम ऐसे ही दोष दे देते हैं , लेकिन सबका दोषी मन ही होता है ।
तो कर्ताभाव या कर्तापन हटाने के लिए बस एक उपाय करना है ।
वह क्या है ?? ✍️
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।।
🛐तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो ।।किसे ? भगवान को अर्पण करना है और क्या करना है ?? 🛐
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
और क्या करना है ??
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।
और ??
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिम् निवेशय ।
बुद्धि मुझमें समर्पित कर के चलो । और क्या??
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान ।
सभी कर्मफलों का त्याग करना है । और ???
अभ्यासेSप्यसमर्थोSसि मत्कर्म परमो भव ।
अभ्यास करो कि सभी कर्म उन्हीं को समर्पित करो ।
🕉️बस जो कुछ करो , उन्हें ही समर्पित करना है और उनके निमित्त ही करना है । मन से कहीं नहीं भाग सकते ।🕉️
#जय बजरंगबली
🚩 उड़ते हुए हनुमान जी: प्रगति और सफलता के प्रतीक 🚩
शास्त्रों और वास्तु के अनुसार, उड़ते हुए वीर हनुमान की तस्वीर घर में लगाने के अद्भुत लाभ होते हैं।
🙏1. हनुमान चालीसा में गति और पराक्रम का प्रतीक
"अति बलवान, वेगवान पवनसुत,
करत सदा पर हित सुकृत।"
🙏2. हनुमान चालीसा में संकट मोचन
"संकट कटै मिटै सब पीरा,
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।"
🙏3. रामचरितमानस मेंअद्भुत पराक्रम
"पवन तनय बल पवन समाना,
बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना।"
ये श्लोक उड़ते हुए हनुमान जी के पराक्रम और वेग को उजागर करते हैं, जो घर में प्रगति और सुरक्षा का संचार करता है।
🛑सही दिशा और नियम (वास्तु टिप्स):
🕉️ दिशा: हनुमान जी की शक्ति के लिए उत्तर या पूर्व दिशा सबसे उत्तम है।
🕉️ऊँचाई पर लगाएँ: तस्वीर को हमेशा नजरों के स्तर से थोड़ा ऊपर लगाएँ।
स्वच्छता का ध्यान: जहाँ तस्वीर हो, वहाँ गंदगी न रहने दें।
🌟 तस्वीर लगाने के मुख्य फायदे
🕉️उन्नति और प्रगति: जिस प्रकार हनुमान जी आकाश में तेजी से उड़ते हैं, वैसी ही गति आपके जीवन और करियर में आती है। यह तस्वीर "निरंतर आगे बढ़ने" की प्रेरणा देती है।
🕉️साहस और आत्मविश्वास: उड़ते हुए हनुमान जी अदम्य साहस का प्रतीक हैं। इसे देखने से मन का डर दूर होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
🕉️संकटों का नाश: जब हनुमान जी उड़ते हैं, तो वे अक्सर संकट दूर करने (जैसे संजीवनी लाना) के लिए जाते हैं। यह घर से भारी विपत्तियों को टालने में मदद करता है।
🕉️नकारात्मकता का अंत: घर की उत्तर या पूर्व दिशा में यह तस्वीर लगाने से बुरी शक्तियों का प्रवेश वर्जित होता है।
🏹"पवन वेग से चलने वाले, संकट हरने वाले बजरंगबली की उड़ती हुई तस्वीर घर में लगाने से तरक्की के बंद रास्ते खुल जाते हैं। अगर आप जीवन में ठहराव महसूस कर रहे हैं, तो आज ही पवनपुत्र के इस स्वरूप को अपने घर लाएं! शास्त्रों में भी इसकी महिमा बताई गई है। 🚩"
🙏 जय सियाराम 🌺 🌺 🌺 🌺
#👫 हमारी ज़िन्दगी
जिंदगी न मिलेगी दोबारा
जीवन जब भी अस्त व्यस्त हो, तब व्यस्त होना चुनना होगा, अस्त होना अक्सर समय के लिए छोड़ना उचित रहता है।
Expect नहीं Accept करें तो ही खुश रहेंगे। हर व्यक्ति अच्छा ही हो, यह ज़रूरी नहीं, लेकिन हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छा अवश्य होता है।किसी का जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं करना है क्योंकि हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी का एक भविष्य।
जो भी हो ज़िन्दगी अपनी है, उसे चाव से क्यों न जियें, बार-बार शिकायत क्यों करना कि हमें क्या नहीं दिया।
जय जय श्री राधे
🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷
#राधे राधे
केसर रंग से भरी पिचकारी लाई, पिचकारी लाई
मैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई...
राधा रानी संग विशाखा, सखियां सारी आई
रंग गुलाल अबीर लिए ब्रजमंडल पर छाई
खेले छबीली ग्वालन देखो दौरी आई,दौरी आई
मैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई...
केसर रंग लिए मनमोहन, जिनकी छवि अति प्यारी
धन धन ये फाग महीनो ब्रज की सेठानी रानी
राधे श्याम की युगल जोड़ी रंग लाई,रंग लाई
मैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई…
राधा माधव फाग मनावत, सखियां गावें गारी
ढोल मंजीरे बाज रहे हैं, और नाच रहे नर नारी
मैया यशोदा देखो रे देखो मुस्काई, देखो मुस्काई
मैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई
एसौ वसंत मत खेलौ रे मोहन,
कहा कहेंगी सखी सब संगकी ।।
मत पकरो करसों कर मेरौं,
मत छूओ अंगिया मेरे अंगकी ।।
मत खोलो घुंघटपट प्यारे ,
मत मारौ पिचकारी रंगकी ।।
बलिबलि जाऊं होरी के रसिया,
हे हरि होरी खेलौ ढंगकी ।।
…
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आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी तथा उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता है।
🙏 सुप्रभात 🙏
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#🙏 प्रेरणादायक विचार
#अजब गजब
भारत के ये 11 अजब गज़ब गाँव
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1. एक गाँव जहां दूध दही मुफ्त मिलता है👇🏻
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यहां के लोग कभी दूध या उससे बनने वाली चीज़ो को बेचते नही हैं बल्कि उन लोगों को मुफ्त में दे देते हैं जिनके पास गएँ ये भैंसे नहीं हैं धोकड़ा गुजरात के कक्ष में बसा ऐसा ही अनोखा गाँव है आज जब इंसानियत खो सी गयी है लोग किसी को पानी तक नही पूछते श्वेत क्रांति के लिए प्रसिद्ध ये गाँव दूध दही ऐसे ही बाँट देता है, यहां पर रहने वाले एक पुजारी बताते हैं की उन्हें महीने में करीब 7,500 रुपए का दूध गाँव से मुफ्त में मिलता है।
2. इस गाँव में आज भी राम राज्य है👇🏻
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महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा तालुके में शनि शिन्ग्नापुर भारत का एक ऐसा गाँव है जहाँ लोगों के घर में एक भी दरवाजा नही है यहाँ तक की लोगों की दुकानों में भी दरवाजे नही हैं, यहाँ पर कोई भी अपनी बहुमूल्य चीजों को ताले – चाबी में बंद करके नहीं रखता फिर भी गाँव में आज – तक कभी कोई चोरी नही हुई |
3. एक अनोखा गाँव जहाँ हर कोई संस्कृत बोलता हैं👇🏻
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आज के समय में हमारे देश की राष्ट्र भाषा हिंदी भी पहचान के संकट से जूझ रही हैं , कर्नाटक के शिमोगा शहर के कुछ ही दूरी पर एक गाँव ऐसा बसा हैं जहाँ ग्रामवासी केवल संस्कृत में ही बात करते हैं। शिमोगा शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर मुत्तुरु अपनी विशिष्ठ पहचान को लेकर चर्चा में हैं। तुंग नदी के किनारे बसे इस गांव में संस्कृत प्राचीन काल से ही बोली जाती है।
करीब पांच सौ परिवारों वाले इस गांव में प्रवेश करते ही “भवत: नाम किम्?” (आपका नाम क्या है?) पूछा जाता है “हैलो” के स्थान पर “हरि ओम्” और “कैसे हो” के स्थान पर “कथा अस्ति?” आदि के द्वारा ही वार्तालाप होता हैं। बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलाएं- सभी बहुत ही सहज रूप से संस्कृत में बात करते हैं। भाषा पर किसी धर्म और समाज का अधिकार नहीं होता तभी तो गांव में रहने वाले मुस्लिम परिवार के लोग भी संस्कृत उतनी ही सहजता से बोलते हैं जैसे दूसरे लोग।
गाँव की विशेषता हैं कि गाँव की मातृभाषा संस्कृत हैं और काम चाहे कोई भी हो संस्कृत ही बोली जाती हैं जैसे इस गांव के बच्चे क्रिकेट खेलते हुए और आपस में झगड़ते हुए भी संस्कृत में ही बातें करते हैं। गांव में संस्कृत में बोधवाक्य लिखा नजर आता है। “मार्गे स्वच्छता विराजते। ग्रामे सुजना: विराजते।” अर्थात् सड़क पर स्वच्छता होने से यह पता चलता है कि गाँव में अच्छे लोग रहते हैं। कुछ घरों में लिखा रहता है कि आप यहां संस्कृत में बात कर कर सकते हैं। इस गांव में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में होती है
4. एक गांव जो हर साल कमाता है 1 अरब रुपए👇🏻
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यूपी का एक गांव अपनी एक खासियत की वजह से पूरे देश में पहचाना जाता है। आप शायद अभी तक इस गांव की पहचान से दूर रहे हों, लेकिन देश के कोने-कोने में इस गांव ने अपने झंडे गाड़ दिए हैं।
अमरोहा जनपद के जोया विकास खंड क्षेत्र का ये छोटा सा गांव है सलारपुर खालसा। 3500 की आबादी वाले इस गांव का नाम पूरे देश में छाया है और इसका कारण है टमाटर। गांव में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर होती है और 17 साल में टमाटर आसपास के गांवों जमापुर, सूदनपुर, अंबेडकरनगर में भी छा गया है।
देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां पर सलारपुर खालसा की जमीन पर पैदा हुआ टमाटर न जाता हो। गांव में 17 साल से चल रही टमाटर की खेती का क्षेत्रफल फैलता ही जा रहा है और अब मुरादाबाद मंडल में सबसे ज्यादा टमाटर की खेती इसी गांव में होती है। कारोबार की बात करें, तो पांच माह में यहां 60 करोड़ का कारोबार होता है।
जनपद में 1200 हेक्टेयर में होने वाली टमाटर की खेती में इन चार गांवों में ही अकेले 1000 हेक्टेयर में खेती होती है। जिसके चलते यह गांव मुरादाबाद मंडल में भी अव्वल नंबर पर है। जबकि सूबे में भी टमाटर खेती में आगे रहने वाली जगहों में इस गांव का नाम शामिल है।
इस साल की बात करें, तो प्रदेश में डेढ़ क्विंटल टमाटर बीज की बिक्री हुई थी। जिसमें अकेले सलारपुर खालसा में ही 80 किलो बीज बिका था।
5. ये है जुड़वों का गाँव, रहते है 350 से ज्यादा जुड़वाँ👇🏻
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केरल के मलप्पुरम जिले में स्तिथ कोडिन्ही गाँव (Kodihni Village) को जुड़वों के गाँव (Twins Village) के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर वर्तमान में करीब 350 जुड़वा जोड़े रहते है जिनमे नवजात शिशु से लेकर 65 साल के बुजुर्ग तक शामिल है। विशव स्तर पर हर 1000 बच्चो पर 4 जुड़वाँ पैदा होते है, एशिया में तो यह औसत 4 से भी कम है। लेकिन कोडिन्ही में हर 1000 बच्चों पर 45 बच्चे जुड़वा पैदा होते है। हालांकि यह औसत पुरे विशव में दूसरे नंबर पर , लेकिन एशिया में पहले नंबर पर आता है। विशव में पहला नंबर नाइज़ीरिआ के इग्बो-ओरा को प्राप्त है जहाँ यह औसत 145 है। कोडिन्ही गाँव एक मुस्लिम बहुल गाँव है जिसकी आबादी करीब 2000 है। इस गाँव में घर, स्कूल, बाज़ार हर जगह हमशक्ल नज़र आते है।
6. एक गाँव जिसे कहते है भगवान का अपना बगीचा👇🏻
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जहाँ एक और सफाई के मामले में हमारे अधिकांश गाँवो, कस्बों और शहरों की हालत बहुत खराब है वही यह एक सुखद आश्चर्य की बात है की एशिया का सबसे साफ़ सुथरा गाँव भी हमारे देश भारत है। यह है मेघालय का मावल्यान्नॉंग गांव जिसे की भगवान का अपना बगीचा (God’s Own Garden) के नाम से भी जाना जाता है। सफाई के साथ साथ यह गाँव शिक्षा में भी अवल्ल है। यहाँ की साक्षरता दर 100 फीसदी है, यानी यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं। इतना ही नहीं, इस गांव में ज्यादातर लोग सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करते हैं।
खासी हिल्स डिस्ट्रिक्ट का यह गांव मेघालय के शिलॉंन्ग और भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से 90 किलोमीटर दूर है। साल 2014 की गणना के अनुसार, यहां 95 परिवार रहते हैं। यहां सुपारी की खेती आजीविका का मुख्य साधन है। यहां लोग घर से निकलने वाले कूड़े-कचरे को बांस से बने डस्टबिन में जमा करते हैं और उसे एक जगह इकट्ठा कर खेती के लिए खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं।
7. एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान – रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा👇🏻
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हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा(Kuldhara) गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं।कुलधरा(Kuldhara) गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।
कहा जाता है कि यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता यह गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं।
8. इस गांव में कुछ भी छुआ तो लगता है 1000 रुपए का जुर्माना👇🏻
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हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के अति दुर्गम इलाके में स्तिथ है मलाणा गाँव। इसे आप भारत का सबसे रहस्यमयी गाँव कह सकते है। यहाँ के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते है। यहां पर भारतीय क़ानून नहीं चलते है यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। मलाणा भारत का इकलौता गांव है जहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की पूजा की जाती है।
हिमाचल के मलाणा गांव में लगे नोटिस बोर्ड।
कुल्लू के मलाणा गांव में यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने किसी चीज़ को छुआ तो जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की रकम 1000 रुपए से 2500 रुपए तक कुछ भी हो सकती है।
अपनी विचित्र परंपराओं लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण पहचाने जाने वाले इस गांव में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। इनके रुकने की व्यवस्था इस गांव में नहीं है। पर्यटक गांव के बाहर टेंट में रहते हैं। अगर इस गांव में किसी ने मकान-दुकान या यहां के किसी निवासी को छू (टच) लिया तो यहां के लोग उस व्यक्ति से एक हजार रुपए वसूलते हैं।
ऐसा नहीं हैं कि यहां के निवासी यहां आने वाले लोगों से जबरिया वसूली करते हों। मलाणा के लोगों ने यहां हर जगह नोटिस बोर्ड लगा रखे हैं। इन नोटिस बोर्ड पर साफ-साफ चेतावनी लिखी गई है। गांव के लोग बाहरी लोगों पर हर पल निगाह रखते हैं, जरा सी लापरवाही भी यहां आने वालों पर भारी पड़ जाती है।
मलाणा गांव में कुछ दुकानें भी हैं। इन पर गांव के लोग तो आसानी से सामान खरीद सकते हैं, पर बाहरी लोग दुकान में न जा सकते हैं न दुकान छू सकते हैं। बाहरी ग्राहकों के दुकान के बाहर से ही खड़े होकर सामान मांगना पड़ता है। दुकानदार पहले सामान की कीमत बताते हैं। रुपए दुकान के बाहर रखवाने के बाद सामन भी बाहर रख देते हैं।
9. यह गाँव कहलाता है ‘मिनी लंदन’👇🏻
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झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बा गांव है मैक्लुस्कीगंज। एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए बसाई गई दुनिया की इस बस्ती को मिनी लंदन भी कहा जाता है।
घनघोर जंगलों और आदिवासी गांवों के बीच सन् 1933 में कोलोनाइजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया ने मैकलुस्कीगंज को बसाया था। 1930 के दशक में रातू महाराज से ली गई लीज की 10 हजार एकड़ जमीन पर अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नामक एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने इसकी नींव रखी थी। चामा, रामदागादो, केदल, दुली, कोनका, मायापुर, महुलिया, हेसाल और लपरा जैसे गांवों वाला यह इलाका 365 बंगलों के साथ पहचान पाता है जिसमें कभी एंग्लो-इंडियन लोग आबाद थे। पश्चिमी संस्कृति के रंग-ढंग और गोरे लोगों की उपस्थिति इसे लंदन का सा रूप देती तो इसे लोग मिनी लंदन कहने लगे।
मैकलुस्की के पिता आइरिश थे और रेल की नौकरी में रहे थे। नौकरी के दौरान बनारस के एक ब्राह्मण परिवार की लड़की से उन्हें प्यार हो गया। समाज के विरोध के बावजूद दोनों ने शादी की। ऐसे में मैकलुस्की बचपन से ही एंग्लो-इंडियन समुदाय की छटपटाहट देखते आए थे। अपने समुदाय के लिए कुछ कर गुजरने का सपना शुरू से उनके मन में था। वे बंगाल विधान परिषद के मेंबर बने और कोलकाता में रियल एस्टेट का कारोबार भी खूब ढंग से चलाया।कोलकाता में प्रॉपर्टी डीलिंग के पेशे से जुड़ा टिमोथी जब इस इलाके में आया तो यहां की आबोहवा ने उसे मोहित कर लिया। यहां के गांवों में आम, जामुन, करंज, सेमल, कदंब, महुआ, भेलवा, सखुआ और परास के मंजर, फूल या फलों से सदाबहार पेड़ उसे कुछ इस कदर भाए कि उसने भारत के एंग्लो-इंडियन परिवारों के लिए एक अपना ही चमन विकसित करने की ठान ली।
1930 के दशक में साइमन कमीशन की रिपोर्ट आई जिसमें एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रति अंग्रेज सरकार ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया था। पूरे एंग्लो-इंडियन समुदाय के सामने खड़े इस संकट को देखते हुए मैकलुस्की ने तय किया कि वह समुदाय के लिए एक गांव इसी भारत में बनाएंगे। बाद ऐसा ही हुआ। कोलकाता और अन्य दूसरे महानगरों में रहने वाले कई धनी एंग्लो-इंडियन परिवारों ने मैकलुस्कीगंज में डेरा जमाया, जमीनें खरीदीं और आकर्षक बंगले बनवाकर यहीं रहने लगे।
इंसानों की तरह मैकलुस्कीगंज को भी कभी बुरे दिन देखने पड़े थे। यहां के लोग उस दौर को भी याद करते हैं जब एक के बाद एक एंग्लो-इंडियन परिवार ये जगह छोड़ते चले गए। कुछ 20-25 परिवार रह गए, बाकी ने शहर खाली कर दिया। इसके बाद तो खाली बंगलों के कारण भूतों का शहर बन गया था मैकलुस्कीगंज।
लेकिन, और अब यह दौर है जब गिने-चुने परिवार मैकलुस्कीगंज को आबाद करने में जुटे हैं। यहां कई हाई प्रोफाइल स्कूल खुल गए हैं, जिनमें पड़ने के लिए दूर-दूर से छात्र आ रहे हैं। पक्की सड़कें बनी हैं, जरूरत के सामान की कई दुकानें भी खुल गई हैं। एक के बाद कई स्कूल खुल गए हैं। साथ ही बस्ती की अधिकतर गलियों या बंगलों में छात्रावास होने के साइनबोर्ड भी मिलेंगे। ये सब एक नए मैकलुस्कीगंज की ओर मिनी लंदन को ले जा रहे हैं।
10. एक गाँव जहाँ छत पर रखी पानी की टंकियों से होती है घरो की पहचान👇🏻
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यह कहानी है पंजाब के जालंधर शहर के एक गांव उप्पलां की। इस गाँव में अब लोगों की पहचान उनके घरों पर बनी पानी की टंकियों से होती है। अब आप सोच रहे होंगे की पानी की टंकियों में ऐसी क्या विशेषता है तो हम आपको बता दे की यहाँ के मकानो की छतो पर आम वाटर टैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर शिप, हवाईजहाज़, घोडा, गुलाब, कार, बस आदि अनेकों आकर की टंकिया है।
इस गांव के अधिकतर लोग पैसा कमाने लिए विदेशों में रहते है। गांव में खास तौर पर एनआरआईज की कोठियां में छत पर इस तरह की टंकिया रखी है। अब कोठी पर रखी जाने वाली टंकियो से उसकी पहचानी जा रही हैं। नामी परिवार अपने घरों पर तरह तरह की टंकियां बनवा रहे हैं। कोई गुलाब का फूल बना खुशहाली का संकेत देता है तो कोई घोड़ा बनाकर रुआबदार परिवार का संदेश देता है। कोई शेर बनाकर अपनी बहादुरी जाहिर करता है तो कोई बाज बनाकर अपनी पहचान को दमदार रूप से प्रस्तुत करता है।
तरसेम सिंह उप्पल जब 70 साल पहले हांगकांग गए थे तो उन्होंने सफर शिप से किया था। अपने बेटों को अपनी पहली यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था कि हम भी अपने घर पर शिप बनवाएंगे। 1995 में यह शिप बनाई गई।
82 साल के गुरदेव सिंह द्वारा बनाया गया बब्बर शेर भी कई सालों तक चर्चा का विषय बना रहा। क्यों जो गुरदेव सिंह ने शेर पर खुद की मूरत बनाकर बिठा दी थी। कहा जाता है कि ऐसे करते ही गांव में लोग इकट्ठा होना शुरू हो गए। कहा गया कि शेर पर तो शेरां वाली माता ही बैठ सकती है। आनन फानन में मूरत हटा ली गई। शेर की मूरत वैसे की वैसी ही है। हटाई गई गुरदेव सिंह की मूरत अब भी कोठी में पड़ी है।
11. इसे कहते है मंदिरों का गाँव और गुप्त काशी👇🏻
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झारखंड के दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे एक छोटे से गांव ” मलूटी” में आप जिधर नज़र दौड़ाएंगे आपको प्राचीन मंदिर नज़र आएंगे। मंदिरों की बड़ी संख्या होने के कारण इस क्षेत्र को गुप्त काशी और मंदिरों का गाँव भी कहा जाता है। इस गांव का राजा कभी एक किसान हुआ करते था। उसके वंशजों ने यहां 108 भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया।
ये मंदिर बाज बसंत राजवंशों के काल में बनाए गए थे। शुरूआत में कुल 108 मंदिर थे, लेकिन संरक्षण के आभाव में अब सिर्फ 72 मंदिर ही रह गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण 1720 से लेकर 1840 के मध्य हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण सुप्रसिद्व चाला रीति से की गयी है। ये छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईटों से निर्मित हैं और इनकी ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण-महाभारत के दृश्यों का चित्रण भी बेहद खूबसूरती से किया गया है।
मलूटी पशुओं की बली के लिए भी जाना जाता है। यहां काली पूजा के दिन एक भैंस और एक भेड़ सहित करीब 100 बकरियों की बली दी जाती है। हालांकि पशु कार्यकर्ता समूह अक्सर यहां पशु बली का विरोध करते रहते हैं। जहां तक बात है मंदिरों के संरक्षण की तो बिहार के पुरातत्व विभाग ने 1984 में गांव को पुरातात्विक प्रांगण के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी। इसके तहत मंदिरों का संरक्षण कार्य शुरू किया गया था और आज पूरा गांव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण पर्यटक यहां रात में रुकने से घबराते हैं।
मलूटी गांव में इतने सारे मंदिर होने के पीछे एक रोचक कहानी है। यहां के राजा महल बनाने की बजाए मंदिर बनाना पसंद करते थे और राजाओं में अच्छे से अच्छा मंदिर बनाने की होड़ सी लग गई। परिणाम स्वरूप यहां हर जगह खूबसूरत मंदिर ही मंदिर बन गए और यह गांव मंदिर के गांव के रूप में जाना जाने लगा। मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। भगवान भोले शंकर के मंदिरों के अतिरिक्त यहां दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त यहां मौलिक्षा माता का भी मंदिर है, जिनकी मान्यता जाग्रत शाक्त देवी के रूप में है।
यह गांव सबसे पहले ननकार राजवंश के समय में प्रकाश में आया था। उसके बाद गौर के सुल्तान अलाउद्दीन हसन शाह (1495–1525) ने इस गांव को बाज बसंत रॉय को इनाम में दे दिया था। राजा बाज बसंत शुरुआत में एक अनाथ किसान थे। उनके नाम के आगे बाज शब्द कैसे लगा इसके पीछे एक अनोखी कहानी है। एक बार की बात है जब सुल्तान अलाउद्दीन की बेगम का पालतू पक्षी बाज उड़ गया और बाज को उड़ता देख गरीब किसान बसंत ने उसे पकड़कर रानी को वापस लौटा दिया। बसंत के इस काम से खुश होकर सुल्तान ने उन्हें मलूटी गांव इनाम में दे दिया और बसंत राजा बाज बसंत के नाम से पहचाने जाने लगे।
साभार~ पं देव शर्मा💐
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#🕉️सनातन धर्म🚩
पृथ्वीपति , देवता , मठाधीश आदि को पदयात्रा नहीं करनी चाहिए । अतः तीर्थयात्रा के समय यान प्रयोग का निषेध इनके लिए नहीं है ।
नारायण
🪷🌷🪷
#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
सत्य की महिमा ,,,,,
( " विचार ही हमारी पूंजी है , धन नहीं" ! इस कथा से " सत्य" की महिमा को समझिये " )
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काशी में एक बड़े धनवान सेठ रहते थे। वह विष्णु भगवान् के परम भक्त थे और हमेशा सच बोला करते थे। .एक बार जब विष्णु जी सेठ जी की प्रशंसा कर रहे थे तभी माँ लक्ष्मी ने कहा, स्वामी !! आप इस सेठ की इतनी प्रशंसा क्यों करते हो ? क्यों न उसकी परीक्षा ली जाए और जाना जाए कि क्या वह सचमुच इसके लायक है ?
विष्णु जी बोले , ठीक है ! सेठ जी गहरी निद्रा में है आप उसके स्वप्न में जाएं और उसकी परीक्षा ले लें।
.अगले ही क्षण सेठ जी को स्वप्न आया। स्वप्न मेँ धन की देवी लक्ष्मी उनके सामनेँ आई और बोली ,” हे मानव ! मैँ धन की दात्री लक्ष्मी हूँ।” सेठ जी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और वे बोले , ” हे माता आपने साक्षात अपने दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है , बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?” ”कुछ नहीं ! मैं तो बस इतना बताने आयी हूँ कि मेरा स्वाभाव चंचल है, और वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते ऊब चुकी हूँ और यहाँ से जा रही हूँ।”
. सेठ जी बोले , ”मेरा आपसे निवेदन है कि आप यहीं रहे, किन्तु मैं एक साधारण प्राणी भला आपको कैसे रोक सकता हूँ, आप अपनी इच्छा अनुसार जहाँ चाहें जा सकती हैं।”
.और माँ लक्ष्मी उसके घर से चली गई।
.थोड़ी देर बाद माँ लक्ष्मी रूप बदल कर पुनः सेठ के स्वप्न मेँ " यश " ( FAME ) के रूप में आयीं और बोलीं , ” सेठ मुझे पहचान रहे हो ?”
.सेठ- “नहीं महोदय आपको नहीँ पहचाना।
.यश – ” मैं यश हूँ , मैं ही तेरी कीर्ति और प्रसिध्दि का कारण हूँ।
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लेकिन अब मैँ तुम्हारे साथ नहीँ रहना चाहता क्योँकि माँ लक्ष्मी यहाँ से चली गयी हैं, अतः मेरा भी यहाँ कोई काम नहीं।”
.सेठ -” ठीक है , यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही।”
.सेठ जी अभी भी स्वप्न में ही थे और उन्होंने देखा कि वह दरिद्र हो गए है। और धीरे-धीरे उनके सारे रिश्तेदार व मित्र भी उनसे दूर हो गए हैं। यहाँ तक की जो लोग उनका गुणगान किया करते थे वो भी अब बुराई करने लगे हैं।
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कुछ और समय बीतने पर माँ लक्ष्मी धर्म का रूप धारण कर पुनः सेठ के स्वप्न में आयीं और बोलीं , ” मैँ धर्म हूँ। माँ लक्ष्मी और यश के जाने के बाद मैं भी इस दरिद्रता में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मैं जा रहा हूँ।”
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”जैसी आपकी इच्छा।”सेठ ने उत्तर दिया। और धर्म भी वहाँ से चला गया।"
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कुछ और समय बीत जाने पर माँ लक्ष्मी " सत्य" के रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं , ”मैँ सत्य हूँ। लक्ष्मी , यश, और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ.“
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ऐसा सुन सेठ जी ने तुरंत "सत्य" के पाँव पकड़ लिए और बोले , ”हे महाराज, मैँ आपको नहीँ जानेँ दुँगा।
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भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें, मुझे त्याग दें पर कृपया आप ऐसा मत करिये क्योंकि "सुविचार " ही मेरी पूंजी है ! सत्य के बिना मैँ एक क्षण नहीँ रह सकता यदि आप चले जायेंगे तो मैं तत्काल ही अपने प्राण त्याग दूंगा।“
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" सत्य" देव ने कहा ”लेकिन तुमने बाकी तीनो को बड़ी आसानी से जाने दिया , उन्हें क्यों नहीं रोका।” सत्य ने प्रश्न किया।
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सेठ जी बोले , ” मेरे लिए वे तीनो भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उन तीनो के बिना भी मैं भगवान् के नाम का जाप करते-करते उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ , परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में " झूठ" ( अशुद्ध विचार ) प्रवेश कर जाएगा और मेरी वाणी अशुद्ध हो जायेगी ,
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,,,,, !! भला ऐसी वाणी से मैं अपने प्रभु , जगत के पालनहार विष्णु जी की वंदना कैसे कर सकूंगा ""...???
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मैं तो किसी भी कीमत पर आपके बिना नहीं रह सकता।
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सेठ जी का उत्तर सुन सत्य देव प्रसन्न हो गए , और उसने कहा , “तुम्हारी "अटूट भक्ति" नेँ मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया और अब मैँ यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा।”
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और ऐसा कहते हुए सत्य अंतर्ध्यान हो गया।
.सेठ जी अभी भी निद्रा में थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में धर्म वापस आया और बोला , “ मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है .”
.सेठ जी ने प्रसन्नतापूर्वक धर्म का स्वागत किया।
.उसके तुरंत बाद यश भी लौट आया और बोला , “ जहाँ सत्य और धर्म हैं, वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है , इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।
.सेठ जी ने यश की भी आव -भगत की।
.और अंत में माँ लक्ष्मी जी भी आयीं।
.उन्हें देखते ही सेठ जी नतमस्तक होकर बोले , “ हे देवी ! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?”
.“अवश्य , जहां , सत्य , धर्म और यश हों वहाँ मेरा " स्थाई वास" निश्चित है।” माँ लक्ष्मी ने उत्तर दिया।
.यह सुनते ही सेठ जी की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा पर वास्तविकता में वह एक कड़ी परीक्षा से उत्तीर्ण हो कर विजयी हुए थे !
विशेष -- सच ही कहा है " विचार ही हमारी पूंजी है ,धन नहीं !" हमें भी हमेशा याद रखना चाहिए कि जहाँ सत्य का निवास होता है वहाँ यश, धर्म और लक्ष्मी का निवास स्वतः ही हो जाता है।
विचारों का उत्पादन महतत्व यानि मन से होता है और मन का निर्माण "आहार " से होता है ! अतः सात्विक आहार ही खाएं !
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#जय श्री राम
🔥जब लंका की दीवारें जल रही थीं… तब धर्म अपनी सबसे शांत मुद्रा में खड़ा था।⚡️🙏♌
सूर्य अस्त होने को है। समुद्र के किनारे सोने सी चमकती लंका, लेकिन उसके प्रांगण में धधकती अग्नि — अहंकार के अंत की गवाही दे रही है। महल की ऊँची दीवारों पर जड़े रत्न अब चमक नहीं रहे, क्योंकि सत्य का प्रकाश उनसे कहीं अधिक तेज है।
सीढ़ियों पर खड़े हैं श्रीराम — चेहरा शांत, हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में। युद्ध समाप्त हो चुका है, लेकिन उनके नेत्रों में विजय का गर्व नहीं, बल्कि करुणा की गहराई है। धनुष अभी भी हाथ में है, पर उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है। यह दृश्य बताता है कि राम का युद्ध कभी व्यक्ति से नहीं था… अधर्म से था।
उनके साथ खड़े हैं पवनपुत्र हनुमान। वही अटल भक्ति, वही अडिग समर्पण। जिनकी शक्ति से लंका की नींव हिली, पर हृदय में केवल राम का नाम बसा रहा। उनके पीछे जलती लपटें मानो घोषणा कर रही हैं कि जहाँ भक्ति और धर्म साथ हों, वहाँ सबसे बड़ी सत्ता भी टिक नहीं सकती।
महल के द्वार पर बने राक्षसी चेहरे अब भयावह नहीं लगते… क्योंकि सत्य के सामने हर भय छोटा हो जाता है।
यह केवल एक युद्ध की जीत नहीं।
यह अधर्म पर धर्म की अंतिम मुहर है।
यह अहंकार पर मर्यादा की विजय है।
🔥 जय श्रीराम🚩
🔥 जय बजरंगबली🚩













