भगवान परशुराम द्वारा माता का गला काटने का प्रसंग: विस्तृत शास्त्रीय विवेचन
प्रस्तावना #🙏परशुराम जयंती🪔📿
भगवान परशुराम, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, के जीवन का यह प्रसंग हिन्दू शास्त्रों में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह घटना मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 9) एवं महाभारत में विस्तार से वर्णित है। इस लेख में हम शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर सम्पूर्ण कथा का विवेचन करेंगे।
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1. मूल श्लोक एवं अनुवाद
1.1 रेणुका का गन्धर्व राजा को देखना
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_२_
#कदाचित्_रेणुका_याता_गङ्गायां_पद्ममालिनम्_
#गन्धर्वराजं_क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत_
हिन्दी अर्थ: एक बार रेणुका जब गंगा नदी पर गई, तो उसने गन्धर्वराज चित्ररथ को, जो कमलों की माला पहने हुए था, अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हुए देखा।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 2
1.2 रेणुका का मन में विचलित होना
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_३_
#विलोकयन्ती_क्रीडन्तमुदकार्थं_नदीं_गता_
#होमवेलां_न_सस्मार_किञ्चिच्चित्ररथस्पृहा_
हिन्दी अर्थ: वह जल लेने के लिए नदी पर गई थी, लेकिन जब उसने चित्ररथ को क्रीड़ा करते देखा, तो उसके मन में उसके प्रति थोड़ी आसक्ति हो गई और वह होम (यज्ञ) के समय को भूल गई।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 3
1.3 रेणुका का विलम्ब से आश्रम लौटना
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_४_
#कालात्ययं_तां_विलोक्य_मुनेः_शापविशङ्किता_
#आगत्य_कलशं_तस्थौ_पुरोधाय_कृताञ्जलिः_
हिन्दी अर्थ: बाद में, जब उसने समझा कि यज्ञ का समय बीत चुका है, तो वह अपने पति के शाप से डर गई। इसलिए लौटकर उसने जल का घड़ा रख दिया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 4
1.4 जमदग्नि का क्रोध एवं आदेश
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_५_
#व्यभिचारं_मुनिर्ज्ञात्वा_पत्न्याः_प्रकुपितोऽब्रवीत्_
#घ्नतैनां_पुत्रकाः_पापामित्युक्तास्ते_न_चक्रिरे_
हिन्दी अर्थ: महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के मन में व्यभिचार को जान लिया। इसलिए वे अत्यन्त क्रोधित हुए और अपने पुत्रों से कहा – ‘हे पुत्रों! इस पापिनी स्त्री को मार डालो!’ लेकिन पुत्रों ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 5
1.5 परशुराम द्वारा आज्ञापालन
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_६_
#रामः_सञ्चोदितः_पित्रा_भ्रातॄन्मात्रा_सहावधीत्_
#प्रभावज्ञो_मुनेः_सम्यक्समाधेस्तपसश्च_सः_
हिन्दी अर्थ: तब जमदग्नि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को आदेश दिया कि वह अपनी माता एवं अवज्ञाकारी भाइयों को मार डाले। भगवान परशुराम, अपने पिता की तपश्चरण एवं समाधि की शक्ति को जानते हुए, तुरन्त अपनी माता एवं भाइयों को मारने के लिए तैयार हो गए।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 6
1.6 वाल्मीकि रामायण में प्रमाण
वाल्मीकिरामायणे_अयोध्याकाण्डे_२.२१.३२_
#जामद्ग्न्येन_रामेण_रेणुका_जननी_स्वयम्_
#कृत्ता_परशुनाऽरण्ये_पितुर्वचनकारिणा_
हिन्दी अर्थ: जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने, अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, स्वयं अपनी माता रेणुका को वन में परशु (फरसे) से मार डाला।
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड, सर्ग 21, श्लोक 32
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2. घटना का पूर्वरंग
2.1 रेणुका की पवित्रता
रेणुका अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थीं। उनकी पवित्रता का प्रभाव यह था कि वे रेत से मिट्टी का घड़ा बनाकर उसमें नदी से जल भरकर लाती थीं, और वह कच्चा घड़ा भीगता नहीं था। यह उनके पतिव्रत धर्म का चमत्कार था।
2.2 मानसिक विचलन का क्षण
एक दिन रेणुका नदी पर जल लेने गईं। वहाँ उन्होंने गन्धर्व राजा चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते देखा। चित्ररथ अत्यन्त सुन्दर था। रेणुका के मन में उसके प्रति क्षणिक आकर्षण उत्पन्न हो गया।
2.3 पतिव्रत शक्ति का नाश
इस मानसिक विचलन के कारण:
1. रेणुका द्वारा बनाया गया कच्चा घड़ा पानी से भीगने लगा
2. वह घड़ा टूट गया
3. रेणुका खाली हाथ एवं विलम्ब से आश्रम लौटीं
जमदग्नि ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया।
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3. परशुराम के पितृभक्ति का स्वरूप
3.1 भाइयों की अवज्ञा
जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को आदेश दिया कि वे माता का वध करें। परन्तु बड़े तीनों पुत्रों ने पिता की इस आज्ञा का पालन करने से इन्कार कर दिया।
बड़े पुत्रों की अवज्ञा पर जमदग्नि ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि उनकी बुद्धि नष्ट हो जाएगी और वे मूर्ख हो जाएंगे।
3.2 परशुराम का आज्ञापालन
जब सबसे छोटे पुत्र राम (परशुराम) आश्रम लौटे, तो जमदग्नि ने उनसे भी यही आदेश कहा।
परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन क्यों किया?
श्रीमद्भागवत के अनुसार, परशुराम अपने पिता की तपशक्ति एवं समाधि के प्रभाव को जानते थे। उन्होंने सोचा:
· यदि वे आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, तो उन्हें शाप मिलेगा
· यदि वे आज्ञा का पालन करेंगे, तो पिता प्रसन्न होंगे और वरदान माँगने पर माता-भाइयों को पुनर्जीवित कर देंगे
यह परशुराम की दूरदर्शिता एवं पितृभक्ति का परिचायक है।
3.3 परशुराम का वरदान
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_पश्चात्_
#तस्य_प्रीतो_मुनिः_प्रादाद्वरं_तुष्टः_परशवे_
#स_वव्रे_जीवितं_मातुः_भ्रातॄणां_च_पुनर्भवम्_
हिन्दी अर्थ: उनसे प्रसन्न होकर मुनि जमदग्नि ने परशुराम को वरदान दिया। परशुराम ने माता के जीवन की और भाइयों के पुनर्जन्म (पुनः जीवित होने) की प्रार्थना की।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16 (भावार्थ)
जमदग्नि ने अपनी तपशक्ति से रेणुका और तीनों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया। विशेष बात यह है कि पुनर्जीवित होने पर उन्हें यह स्मरण नहीं रहा कि परशुराम ने उनका वध किया था।
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4. लोक कथाओं में सिर बदलने का प्रसंग
4.1 यह कथा शास्त्रीय है या लोकिक?
शास्त्रीय संस्करणों (महाभारत, भागवत, रामायण) से हटकर, लोक कथाओं में एक अतिरिक्त प्रसंग मिलता है:
1. जब परशुराम ने माता का सिर काटा, तो अंधेरे कमरे में गलती से एक चाण्डाल स्त्री का सिर भी कट गया
2. परशुराम ने भूलवश माता के सिर को चाण्डाल स्त्री के शरीर से जोड़ दिया
3. परिणामस्वरूप, दो देवियाँ उत्पन्न हुईं:
· येल्लम्मा / रेणुका - ब्राह्मण सिर एवं चाण्डाल शरीर वाली
· मरियम्मन - चाण्डाल सिर एवं ब्राह्मण शरीर वाली
4.2 शास्त्रीय प्रमाणों में इसका अभाव
यह महत्वपूर्ण है कि श्रीमद्भागवत पुराण एवं महाभारत के प्रामाणिक संस्करणों में सिर बदलने का कोई उल्लेख नहीं है। यह प्रसंग विशेष रूप से:
· येल्लम्मा देवी की उपासना से जुड़ी लोक परम्पराओं में प्रचलित है
· मरियम्मन (चेचक की देवी) की तमिल लोक कथाओं में मिलता है
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5. घटना का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
5.1 पितृभक्ति का आदर्श
परशुराम का यह कृत्य पितृभक्ति के चरम आदर्श के रूप में देखा जाता है। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए उन्होंने स्वयं की माता का वध कर दिया - यह उनकी निःस्वार्थ भक्ति एवं कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है।
5.2 देवी रेणुका का पूजन
रेणुका को आज भी येल्लम्मा देवी, मरियम्मन एवं रेणुका देवी के रूप में पूजा जाता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं तमिलनाडु में उनके मन्दिर हैं।
5.3 वर्ण-व्यवस्था एवं जाति का प्रश्न
लोककथाओं में वर्णित सिर बदलने का प्रसंग जाति एवं वर्ण व्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:
· रेणुका (ब्राह्मण पत्नी) का सिर चाण्डाल शरीर पर लगने के कारण वे आश्रम में नहीं रह सकीं
· उन्हें गाँव के बाहर निवास करना पड़ा
· यह कथा बताती है कि कैसे एक देवी की पूजा विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न रूपों में होने लगी
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6. विभिन्न शास्त्रीय स्रोतों का सारांश
स्रोत घटना का वर्णन सिर बदलने का उल्लेख
श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 9) रेणुका का मानसिक विचलन, परशुराम द्वारा वध, पुनर्जीवन का वरदान नहीं
वाल्मीकि रामायण (अयोध्या काण्ड) जमदग्नि के पुत्र द्वारा माता का वध नहीं
महाभारत इसी प्रकार का वर्णन नहीं
ब्रह्माण्ड पुराण रेणुका का गन्धर्व को देखना, पुनर्जीवन नहीं
लोक कथाएँ (येल्लम्मा/मरियम्मन) सिर बदलने की कथा, दो देवियों की उत्पत्ति हाँ (लोक परम्परा में)
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7. निष्कर्ष
भगवान परशुराम ने अपनी माता रेणुका का गला क्यों काटा, इसके शास्त्रीय कारण निम्नलिखित हैं:
7.1 प्रमुख कारण
1. माता का मानसिक विचलन - रेणुका ने गन्धर्व राजा चित्ररथ को देखकर मन में क्षणिक आकर्षण अनुभव किया, जिससे उनका पतिव्रत धर्म नष्ट हो गया
2. पिता जमदग्नि की आज्ञा - ब्रह्मर्षि जमदग्नि ने क्रोधित होकर पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया
3. परशुराम की दूरदर्शिता - परशुराम ने पिता की तपशक्ति जानकर आज्ञा का पालन किया, जिससे पिता प्रसन्न हुए और माता-भाइयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मिला
7.2 महत्वपूर्ण तथ्य
यह समझना आवश्यक है कि:
· यह कोई हत्या नहीं थी, अपितु एक दिव्य लीला थी
· माता पुनर्जीवित हो गईं
· यह प्रसंग परशुराम की पितृभक्ति एवं कर्तव्यनिष्ठा के चरम उदाहरण के रूप में सदियों से स्मरण किया जाता है
7.3 सिर बदलने के प्रसंग का सत्य
जहाँ तक सिर बदलने के प्रसंग का प्रश्न है, यह शास्त्रीय प्रमाणों में उपलब्ध नहीं है, बल्कि लोक कथाओं एवं क्षेत्रीय परम्पराओं में प्रचलित है, विशेष रूप से येल्लम्मा/मरियम्मन देवी की उपासना से जुड़ा हुआ है।
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8. अतिरिक्त श्लोक एवं उनके अर्थ
8.1 परशुराम के बल एवं तप का वर्णन
श्रीमद्भागवते_स्कन्ध_९_अध्याय_१६_श्लोक_१_
श्रीशुक_उवाच_
#पित्रोपशिक्षितो_रामस्तथेति_कुरुनन्दन_
#संवत्सरं_तीर्थयात्रां_चरित्वाश्रममाव्रजत्_
हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेव जी कहते हैं – हे कुरुनन्दन (परीक्षित)! पिता द्वारा इस प्रकार आदेशित होकर परशुराम ने ‘तथास्तु’ कहा। एक वर्ष तक तीर्थयात्रा करने के बाद वे अपने आश्रम लौट आए।
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 16, श्लोक 1
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सन्दर्भ स्रोत:
1. श्रीमद्भागवत पुराण, स्कन्ध 9, अध्याय 15-16
2. वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड, सर्ग 21
3. महाभारत
4. ब्रह्माण्ड पुराण
5. विभिन्न लोक कथाएँ - येल्लम्मा/मरियम्मन देवी
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#🕉️सनातन धर्म🚩 *'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता'*
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भगवान् के अवतार तो प्रतिक्षण अनन्त-अनन्त हो रहे हैं क्योंकि अनन्त ब्रह्मांड हैं। अतएव वेदव्यास जी कहते हैं कि -
अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः । (भागवत १.३.२६)
अर्थात् अवतार असंख्य हो चुके हैं, आप जो भी स्वरूप चाहें, मान लें, इतना ही नहीं, यदि कोई स्वरूप ऐसा भी हो सके जिस स्वरूप का अवतार कभी न हुआ हो, आप उसे भी मान सकते हैं एवं उन्हें उसी रूप में आना होगा। भगवान् को भला क्या परिश्रम है रूप धारण करने में। अतएव आप स्वेच्छा से रूप का निर्माण कर सकते हैं। इसी प्रकार स्वेच्छा से रंग आदि भी बना सकते हैं। ईश्वर इतना दयालु है कि उसने ऐसा कोई कड़ा नियम नहीं बनाया या ऐसी कोई पाबन्दी नहीं लगायी, जिससे किसी जीव को आपत्ति हो। इसी से उसे 'अनन्तनामरूपाय' अर्थात् अनन्त नाम, रूप वाला कहा जाता है। उस अनन्त शक्तिमान् को सीमा में बाँधना अपनी ही नासमझी है। अतएव सभी बातों में आपकी स्वेच्छा रखी गयी है।
यहाँ तक कि उसके नामों में भी सीमा नहीं रखी गयी है। आप जिस भाषा या देश के हों, अपनी इच्छानुसार नाम रख लें। उसे कोई आपत्ति नहीं। यह भी नहीं है कि कोई नाम छोटा है या कोई बड़ा है; ऐसा सोचना ही अक्षम्य नामापराध है।
देखो, भगवान् श्रीकृष्ण को सखा लोग कन्हैया कहा करते थे। मैया यशोदा कृष्ण-बलराम को कनुआँ, बलुआ अथवा लाला ही कहा करती थीं। कहाँ तक कहें, गोपियाँ तो चोर-जार शब्द से ही पुकारती थीं, जिसे सुनने के लिये श्यामसुन्दर व्याकुल रहा करते थे। द्वारिका में 'रणछोर' नाम अधिक प्रिय माना जाता है, जिसका अर्थ है, लड़ाई के मैदान को छोड़कर भागने वाला। भगवान् श्रीकृष्ण जरासंध के भय से भाग कर द्वारिका गये थे। अतएव भक्तों ने उनका नाम रणछोर रख दिया। और इन लीला के नामों में भक्त एवं भगवान् दोनों को रस मिलता है, बशर्ते कि अन्तरंग प्यार हो। प्यार न होने पर तो सारे नाम-रूप व्यर्थ ही से हैं। अतएव नामों में भी शंका न होनी चाहिये कि कौन सा नाम श्रेष्ठ है या किस नाम से नामी शीघ्र मिलेंगे।
वस्तुतस्तु भगवान् के वास्तविक भगवत्ता के नामों, रूपों या कार्यों से किसी भक्त को प्यार नहीं होता। अर्जुन ने विराट् रूप देखकर तुरन्त हाथ जोड़ दिये। नाम-रूप तो असामर्थ्य के ही मधुर होते हैं, क्योंकि उसमें यह सोचने का अवसर मिलता है कि देखो भगवान् कितने दयालु हैं, कितने भक्तवत्सल हैं कि एक बेपढ़ी-लिखी गँवारिन ग्वालिन उन्हें चोर-जार शब्द से पुकारती हुई दुत्कार रही है और वे उसके प्यार में विभोर होकर उसकी दुत्कार पर बलिहार जा रहे हैं। अतएव नामों का झगड़ा भी कुछ नहीं रहा।
इसी प्रकार लीलाओं के विषय में भी सोच लीजिए। जितनी लीलाएँ राम-कृष्णादि की ग्रन्थों में लिखी हैं, ये तो समुद्र के अपार जल की एक बूँद के बराबर भी नहीं हैं। भगवान् राम-कृष्ण की लीलाएँ तो अनादिकाल से प्रतिक्षण हो रही हैं एवं नित्य नई-नई लीलाएँ हो रही हैं, उन्हें सीमा में बाँधना भोलापन है। 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' अर्थात् अवतार एवं लीलाएँ अनन्त हैं। 'रामायण शतकोटि अपारा' का भी यही अभिप्राय है। यदि कोई चाहे कि हम राम-कृष्णादि या किसी अवतार से नई-नई लीलाएँ करायेंगे जो पहले नहीं हुई, तो यद्यपि यह सोचना भोलापन है कि पहले नहीं हुई, अनन्तकाल की सीमा में तुम्हारी ऐसी कौन सी काल्पनिक लीला है जो नहीं की गयी, फिर भी तुम जैसी लीला चाहो मान लो, यदि नहीं भी की होगी तो उनके लिये करना क्या कठिन है।
सारांश में यह समझ लेना चाहिए कि वे तुम्हारी भक्ति के वश में सब कुछ कर सकते हैं। हाँ, यदि कोरी कल्पनामात्र ही होगी, भाव न होगा तो लीला करने, न करने का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।
इसी प्रकार उनमें समस्त गुणों का समावेश है एवं वे गुण अनन्तसीमा के हैं। तुम्हें जो गुण प्रिय हों, तुम उन्हीं का अवलंब ले लो। यह आवश्यक नहीं है कि अमुक गुण ही ग्रहण करो। किसी भक्त को संस्कारवश कोई गुण प्रिय लगता है, किसी को कोई गुण प्रिय लगता है, उनमें भेद-भाव न रखना चाहिये, किन्तु स्वयं जो प्रिय लगे, स्वीकार कर लेना चाहिए।
इसी प्रकार उनके समस्त धाम भी परस्पर एक ही हैं। जो धाम आपको प्रिय हो, उसे स्वीकार कर लीजिये। यहाँ तक कि वे नरक में भी मिल सकते हैं। ऐसी कोई जगह नहीं जो उनका धाम न हो, किन्तु यह ध्यान रहे कि रूप की भाँति नाम, गुण, लीला, धामादि में भी दिव्य चिन्मय भाव बना रहे।
रामायण के अनुसार -
*प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।*
अर्थात् भगवान् समान रूप से सर्वत्र रहते हैं, और यदि कोई असमान यानी विशेष रूप से साकार रूप में चाहे तो भी सर्वत्र रह सकते हैं। फिर भी जिस धाम से विशेष प्यार हो उसको अपना लेना चाहिये। भेद-भाव न रखना चाहिये।
इसी प्रकार उनके भक्तों में भी समझ लेना चाहिये कि उनके सभी भक्त एक से हैं। हमें जिस भक्त के द्वारा विशेष लाभ हो, उसको अपना लेना चाहिये, अन्य में दुर्भावना न रखनी चाहिये।
यह प्रमुख स्मरणीय है कि भगवान् के अनन्त नाम, अनन्त रूप, अनन्त गुण, अनन्त लीलाएँ, अनन्त धाम एवं अनन्त जन हैं, जो परस्पर सब के सब एक ही हैं। सब में सब रहते हैं। अतएव किसी एक के अवलम्ब से भी ईश्वरप्राप्ति हो सकती है। उनमें परस्पर भेद-भाव रखना नामापराध है। हाँ, स्वयं की रुचि जहाँ पर हो उसका सेवन कर लें। बस, इससे अधिक बुद्धि का प्रयोग न करें।
प्रायः विश्व में ऐसा होता है कि एक नाम-रूप-गुणादि के उपासक अन्य नाम-रूपादिकों के उपासक की निन्दा करते हैं। यह महत्तम भूल है। यदि आप कहें कि पुराणादिकों में विरोध सा दिखता है, पर ध्यान रहे कि वह विरोध परिहासयुक्त रसिकता की शैली मात्र है, एवं अपने इष्ट में विशेष निष्ठा-जनक मात्र है, वास्तविक निन्दा नहीं है। शास्त्र कहते हैं कि - *'न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुम्'* अर्थात् निन्दा का अभिप्राय केवल अपने पक्ष की स्तुति में ही है।
*प्रवचनांश- जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज*
#🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 अक्षय तृतीया — सच में “अक्षय” क्या है, या हम खुद को बहला रहे हैं?
आज अक्षय तृतीया है…
और हर साल की तरह आज भी एक ही शोर है
“आज सोना खरीदो… बरकत बढ़ेगी…”
ज्वेलरी शॉप्स भरी हुई हैं…
ऑनलाइन ऑफर्स चल रहे हैं…
लोग EMI पर भी गोल्ड ले रहे हैं…
लेकिन कोई ये नहीं पूछ रहा…
क्या हम सच में “बरकत” खरीद सकते हैं?
कड़वी बात है, लेकिन सच है…
अगर सोना खरीदने से बरकत आती…
तो सबसे अमीर लोग सबसे ज्यादा खुश होते।
पर असलियत क्या है?
* पैसा है… पर सुकून नहीं
* घर है… पर अपनापन नहीं
* दिखावा है… पर दिल खाली है
“अक्षय” का मतलब है — जो कभी खत्म न हो
तो ज़रा ईमानदारी से जवाब दो…
* क्या आपका खरीदा हुआ सोना कभी बिक नहीं सकता?
* क्या मुसीबत में वही सोना सबसे पहले नहीं निकलता?
फिर वो “अक्षय” कैसे हुआ?
सच तो ये है…
हमने एक आध्यात्मिक दिन को मार्केटिंग का त्योहार बना दिया है
जहाँ भावनाओं से ज्यादा ऑफर्स बिक रहे हैं
और आस्था से ज्यादा डिस्काउंट चल रहा है
सोचिए…
एक तरफ वो लोग हैं जो आज हजारों का सोना खरीद रहे हैं…
और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो आज भी दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रहे हैं।
अगर “अक्षय” का मतलब सच में बढ़ती हुई बरकत है…
तो क्या किसी भूखे को खाना खिलाना ज्यादा “अक्षय” नहीं है?
शायद असली अक्षय तृतीया ये नहीं है कि आप क्या खरीदते हो…
बल्कि ये है कि आप क्या देते हो
* किसी की मदद
* किसी का दर्द समझना
* बिना मतलब के अच्छा करना
ये चीज़ें कभी खत्म नहीं होतीं…
और शायद ऊपर वाला भी इसी का हिसाब रखता है… ना कि आपके गोल्ड बिल का।
आज अगर सच में कुछ “अक्षय” बनाना है…
तो अपने बैंक बैलेंस से नहीं…
अपने कर्मों से बनाइए।
सच-सच बताइए…
आपके हिसाब से अक्षय तृतीया
आस्था का दिन है…
या फिर एक और “खरीदारी का बहाना”?
#☝अनमोल ज्ञान वाँ छत्रपति शिवाजी राजे (भोसले) जन्म दिवस (तारीख प्रमाण)
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भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में सभी लोग जानते हैं। बहुत से लोग इन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते हैं तो कुछ लोग इन्हें मराठा गौरव कहते हैं, जबकि वे भारतीय गणराज्य के महानायक थे।
कुछ लोग मानते हैं कि शिवाजी की जन्मतिथि अंग्रेजी कैलेंडर के आधार पर तय की जानी चाहिए। इस बात में भेद बिल्कुल नही होना चाहिये क्योंकि तारीख अंग्रेजी कलेंडर अनुसार मानी जाती है और तिथि भारतीय पञ्चाङ्ग अनुसार जो कि सर्वदा उचित भी है इसका कारण यह है कि तिथि अनुसार जन्मदिवस अथवा पुण्य तिथि के दिन अधिकांश ग्रह नक्षत्र जन्म अथवा मृत्यु के समय वाले ही रहते है उन्ही ग्रह नक्षत्रों में व्यक्ति विशेष के प्रति किये गए दान पुण्य का पूर्ण फल मिलता है।
शिवाजी की जन्मतारीख अंग्रेजी कलेंडर अनुसार 19 फरवरी 1630 है. वहीं पंचांग के अनुसार, वीरशिवाजी का जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया और तृतीया तिथि के मध्य 1551 शक संवत्सर में मानते है।
शिवाजी महाराज व्यक्तिगत विवरण
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पूरा नाम – शिवाजी राजे भोंसले
उप नाम – छत्रपति शिवाजी महाराज
जन्म – 19 फ़रवरी 1630, शिवनेरी दुर्ग, महाराष्ट्र
मृत्यु – 3 अप्रैल 1680, महाराष्ट्र
पिता का नाम – शाहजी भोंसले
माता का नाम – जीजाबाई
शादी – सईबाई निम्बालकर के साथ, लाल महल पुणे में सन 14 मई 1640 में हुई।
शिवाजी महाराज की जीवनी
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हमारा देश वीर शासको और राजाओं की पृष्ठभूमि रहा है. इस धरती पर ऐसे महान शासक पैदा हुए है जिन्होंने अपनी योग्यता और कौशल के दम पर इतिहास में अपना नाम बहुत ही स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया है. ऐसे ही एक महान योद्धा और रणनीतिकार थे – छत्रपति शिवाजी महाराज. वे शिवाजी महाराज ही थे जिन्होंने भारत में मराठा साम्राज्य की नीवं रखी थीं।
शिवाजी जी ने कई सालों तक मुगलों के साथ युद्ध किया था. सन 1674 ई. रायगड़ महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया गया था, तब से उन्हें छत्रपति की उपाधि प्रदान की गयी थीं. इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोसलें था और छत्रपति इनको उपाधि में मिली थी. शिवाजी महाराज ने अपनी सेना, सुसंगठित प्रशासन इकाईयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया था।
शिवाजी महाराज ने भारतीय सामाज के प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं और मराठी एवं संस्कृत को राजाओं की भाषा शैली बनाया था. शिवाजी महाराज अपने शासनकाल में बहुत ही ठोस और चतुर किस्म के राजा थे. लोगो ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र से सीख लेते हुए भारत की आजादी में अपना खून तक बहा दिया था।
शिवाजी महाराज का आरम्भिक जीवन
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शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था. इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था. शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास हैं, शिवाजी का ज्यादा जीवन अपने माता जीजाबाई के साथ बीता था. शिवाजी महाराज बचपन से ही काफी तेज और चालाक थे. शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध कला और राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली थी।
भोसलें एक मराठी क्षत्रिय हिन्दू राजपूत की एक जाति हैं. शिवाजी के पिता भी काफी तेज और शूरवीर थे. शिवाजी महाराज के लालन-पालन और शिक्षा में उनके माता और पिता का बहुत ही ज्यादा प्रभाव रहा हैं. उनके माता और पिता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं को बताती थीं. खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थी जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था. शिवाजी महाराज की शादी सन 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ हुई थीं।
एक सैनिक के रूप में शिवाजी महाराज का वर्चस्व
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सन 1640 और 1641 के समय बीजापुर महाराष्ट्र पर विदेशियों और राजाओं के आक्रमण हो रहे थें. शिवाजी महाराज मावलों को बीजापुर के विरुद्ध इकट्ठा करने लगे. मावल राज्य में सभी जाति के लोग निवास करते हैं, बाद में शिवाजी महाराज ने इन मावलो को एक साथ आपस में मिलाया और मावला नाम दिया. इन मावलों ने कई सारे दुर्ग और महलों का निर्माण करवाया था।
इन मावलो ने शिवाजी महाराज का बहुत ज्यादा साथ दिया. बीजापुर उस समय आपसी संघर्ष और मुगलों के युद्ध से परेशान था जिस कारण उस समय के बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गो से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों में सौप दी दिया था। तभी अचानक बीजापुर के सुल्तान बीमार पड़ गए थे और इसी का फायदा देखकर शिवाजी महाराज ने अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी ने बीजापुर के दुर्गों को हथियाने की नीति अपनायी और पहला दुर्ग तोरण का दुर्ग को अपने कब्जे में ले लिया था।
शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार
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तोरण का दुर्ग पूना (पुणे) में हैं. शिवाजी महाराज ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना एक दूत भेजकर खबर भिजवाई की अगर आपको किला चाहिए तो अच्छी रकम देनी होगी, किले के साथ-साथ उनका क्षेत्र भी उनको सौपं दिया जायेगा. शिवाजी महाराज इतने तेज और चालाक थे की आदिलशाह के दरबारियों को पहले से ही खरीद लिया था।
शिवाजी जी के साम्राज्य विस्तार नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली थी तब वह देखते रह गया. उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिये कहा लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया था और लगान देना भी बंद कर दिया था.
वे 1647 ई. तक चाकन से लेकर निरा तक के भू-भाग के भी मालिक बन चुके थें. अब शिवाजी महाराज ने पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों की और चलना शुरू कर दिया था. शिवाजी जी ने कोंकण और कोंकण के 9 अन्य दुर्गों पर अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी महाराज को कई देशी और कई विदेशियों राजाओं के साथ-साथ युद्ध करना पड़ा था और सफल भी हुए थे।
शाहजी की बंदी और युद्ध बंद करने की घोषणा
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बीजापुर के सुल्तान शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही गुस्से में था. सुल्तान ने शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बनाने का आदेश दिया था. शाहजी उनके पिता उस समय कर्नाटक राज्य में थें और दुर्भाग्य से शिवाजी महाराज के पिता को सुल्तान के कुछ गुप्तचरों ने बंदी बना लिया था. उनके पिता को एक शर्त पर रिहा किया गया कि शिवाजी महाराज बीजापुर के किले पर आक्रमण नहीं करेगा. पिताजी की रिहाई के लिए शिवाजी महाराज ने भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए 5 सालों तक कोई युद्ध नहीं किया और तब शिवाजी अपनी विशाल सेना को मजबूत करने में लगे रहे।
शिवाजी महाराज का राज्य विस्तार
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शाहजी की रिहा के समय जो शर्ते लागू की थी उन शर्तो में शिवाजी ने पालन तो किया लेकिन बीजापुर के साउथ के इलाकों में अपनी शक्ति को बढ़ाने में ध्यान लगा दिया था पर इस में जावली नामक राज्य बीच में रोड़ा बना हुआ था. उस समय यह राज्य वर्तमान में सतारा महाराष्ट्र के उत्तर और वेस्ट के कृष्णा नदी के पास था. कुछ समय बाद शिवाजी ने जावली पर युद्ध किया और जावली के राजा के बेटों ने शिवाजी के साथ युद्ध किया और शिवाजी ने दोनों बेटों को बंदी बना लिया था और किले की सारी संपति को अपने कब्जे में ले लिया था और इसी बीच कई मावल शिवाजियो के साथ मिल गए थे।
मुगलों से पहला मुकाबला
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मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद साउथ भारत की तरफ गया. उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था. औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था. शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने 3 साल तक लूटपाट की।
एक बार शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था तब शाइस्ता खान अपनी जान निकालकर भाग खड़ा हुआ और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 4 उँगलियाँ खोनी पड़ी. इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया था. उसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया था।
सूरत की लूट
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इस जीत से शिवाजी की शक्ति ओर मजबूत हो गयी थीं. लेकिन 6 साल बाद शाइस्ताखान ने अपने 15,000 सैनिको के साथ मिलकर राजा शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया था. बाद में शिवाजी ने इस तबाही को पूरा करने के लिये मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी. सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था. शिवाजी ने 4 हजार सैनिको के साथ सूरत के व्यापारियों को लुटा लेकिन उन्होंने किसी भी आम आदमी को अपनी लुट का शिकार नहीं बनाया।
आगरा में आमन्त्रित और पलायन
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शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया है. इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया. औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और शिवाजी पर 500 सैनिको का पहरा लगा दिया. कुछ ही दिनों बाद 1666 को शिवाजी महाराज को जान से मारने का औरंगजेब ने इरादा बनाया था लेकिन अपने बेजोड़ साहस और युक्ति के साथ शिवाजी और संभाजी दोनों कैद से भागने में सफल हो गये।
संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गये थे और बाद में सकुशल राजगड आ गये. औरंगजेब ने जयसिंह पर शक आया और उसने विष देकर उसकी हत्या करा दी. जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दूसरी बार संधि की. 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लुटा था, यहाँ से शिवाजी को 132 लाख की संपति हाथ लगी और शिवाजी ने मुगलों को सूरत में फिर से हराया था।
शिवाजी महाराज का राज्यभिषेक
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सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरंदर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे. बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से मिलते हुए प्रमाण भेजे थें. इस कार्यक्रम में विदेशी व्यापारियों और विभिन्न राज्यों के दूतों को इस समारोह में बुलाया था. शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की और काशी के पंडित भट्ट को इसमें समारोह में विशेष रूप से बुलाया गया था. शिवाजी के राज्यभिषेक करने के 12वें दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था और फिर दूसरा राज्याभिषेक हुआ।
शिवाजी महाराज की मृत्यु और वारिस
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शिवाजी अपने आखिरी दिनों में बीमार पड़ गये थे और 3 अप्रैल 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गयी थी. उसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी को राजगद्दी मिली. उस समय मराठों ने संभाजी को अपना नया राजा मान लिया था. शिवाजी की मौत के बाद औरंगजेब ने पुरे भारत पर राज्य करने की अभिलाषा को पूरा करने के लिए अपनी 5,00,000 सेना को लेकर दक्षिण भारत का रूख किया इसी समय औरंगजेब के पुत्र ने विद्रोह कर दिया तब संभाजी ने उसे शरण दी लेकिन औरंगजेब ने विद्रोह शांत होने पर सम्भाजी को बंदी बनाकर मृत्यु कर दी। इसके बाद संभाजी के छोटे भाई राजाराम ने मराठो की गद्दी संभाली।
1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी थी उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्ष के पुत्र शिवाजी 2 की सरंक्षण बनकर राज्य किया। आखिरकार 25 साल मराठा स्वराज से युद्ध और थके हुए औरंगजेब को उसी छत्रपति शिवाजी के स्वराज में दफन किये गया।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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हयग्रीव अवतार जन्मोत्सव विशेष #🥳अक्षय तृतीया सेलिब्रेशन🎊🙏 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂
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नारायण के हयग्रीव अवतार की कथा
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ऋषि बोले — हे सूत जी ! आप के यह आश्चर्यजनक वचन सुन कर हम सब के मन में अत्याधिक संदेह हो रहा हे. सब के स्वामी श्री जनार्धन माधव का सिर उनके शरीर से अलग हो गया !! और उस के बाद वे हयग्रीव कहलाये गये – अश्व मुख वाले . आह ! इस से अधिक और आश्चर्यजनक क्या हो सकता हे. जिनकी वेद भी प्रशंसा करते हैं, देवता भी जिसपर निर्भर हैं, जो सभी कारणों के भी कारण हैं, आदिदेव जगन्नाथ, आह ! यह कैसे हुआ कि उनका भी सिर कट गया ! हे परम बुद्धिमान ! इस वृत्तांत का विस्टा से वर्णन कीजिये।
सूत जी बोले — हे मुनियों, देवों के देव, परम शक्तिशाली, विष्णु के महान कृत्य को ध्यान से सुनें. एक समय की बात है। हयग्रीव नाम का एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तट पर जाकर भगवती महामाया की प्रसन्नता के लिए बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनों तक बिना कुछ खाए भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामंत्र का जाप करता रहा। उसकी इंद्रियां उसके वश में हो चुकी थीं।
सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, ‘‘महाभाग! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम पर परम प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करने के लिए तैयार हूं। वत्स! वर मांगो।’’
भगवती की दया और प्रेम से ओत-प्रोत वाणी को सुनकर हयग्रीव की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसके नेत्र आनंद के अश्रुओं से भर गए। उसने भगवती की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘हे कल्याणमयी देवि! आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें।’’
देवी ने कहा, ‘‘दैत्य राज! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता। किसी का सदा के लिए अमर होना असंभव है। अमर देवताओं को भी पुण्य समाप्त होने पर मृत्यु लोक में जाना पड़ता है। अत: तुम अमरत्व के अतिरिक्त कोई और वर मांगो।’’
हयग्रीव बोला, ‘‘अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्यु हो। दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मन की यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करने की कृपा करें।’’ ‘ऐसा ही होगा’। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव असीम आनंद का अनुभव करते हुए अपने घर चला गया। वह देवी के वर के प्रभाव से अजेय हो गया। त्रिलोकी में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट को मार सके।
उसने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगडऩे लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान विष्णु के पास गए, किन्तु वे योगनिद्रा में निमग्र थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी।
उस समय बड़ा भयंकर टंकार हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं के दुख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटना को देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा, ‘‘देवताओ चिंता मत करो।
मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्मा जी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे।’’ ऐसा कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गई।
भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया। भगवती के कृपा प्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया।
हयग्रीव स्तोत्र
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श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥
ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवम् उपास्महे ॥ १ ॥
स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिकमणि भूभृत्प्रतिभटं । सुधा सध्रीचीभिर् धुतिभिर् अवदातत्रिभुवनम्।
अनन्तैस्त्रय्यन्तैर् अनुविहित हेषा हलहलं । हताशेषावद्यं हयवदन मीडी महि महः ॥ २ ॥
समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां । लयः प्रत्यूहानां लहरि विततिर्बोधजलधेः ।
कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं । हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदन हेषा हलहलः ॥ ३ ॥
प्राची सन्ध्या काचिदन्तर् निशायाः । प्रज्ञादृष्टेरञ्जन श्रीरपूर्वा ।
वक्त्री वेदान् भातु मे वाजि वक्त्रा । वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ ४ ॥
विशुद्ध विज्ञान घन स्वरूपं । विज्ञान विश्राणन बद्ध दीक्षम् ।
दयानिधिं देहभृतां शरण्यं । देवं हयग्रीवम् अहं प्रपद्ये ॥ ५ ॥
अपौरुषेयैर् अपि वाक्प्रपञ्चैः । अद्यापि ते भूति मदृष्ट पाराम् ।
स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव । कारुण्यतो नाथ कटाक्षणीयः ॥ ६ ॥
दाक्षिण्य रम्या गिरिशस्य मूर्तिः । देवी सरोजासन धर्मपत्नी ।
व्यासादयोऽपि व्यपदेश्य वाचः । स्फुरन्ति सर्वे तव शक्ति लेशैः ॥ ७ ॥
मन्दोऽभविष्यन् नियतं विरिञ्चो । वाचां निधे वञ्चित भाग धेयः ।
दैत्यापनीतान् दययैव भूयोऽपि । अध्यापयिष्यो निगमान् न चेत् त्वम् ॥ ८ ॥
वितर्क डोलां व्यवधूय सत्वे । बृहस्पतिं वर्तयसे यतस्त्वम् ।
तेनैव देव त्रिदशेश्वराणाम् । अस्पृष्ट डोलायित माधिराज्यम् ॥ ९ ॥
अग्नोउ समिद्धार्चिषि सप्ततन्तोः । आतस्थिवान् मन्त्रमयं शरीरम् ।
अखण्ड सारैर् हविषां प्रदानैः । आप्यायनं व्योम सदां विधत्से ॥ १० ॥
यन्मूलमीदृक् प्रतिभाति तत्वं । या मूलमाम्नाय महाद्रुमाणाम् ।
तत्वेन जानन्ति विशुद्ध सत्वाः । त्वाम् अक्षराम् अक्षर मातृकां ते ॥ ११ ॥
अव्याकृताद् व्याकृत वानसि त्वं । नामानि रूपाणि च यानि पूर्वम् ।
शंसन्ति तेषां चरमां प्रतिष्टां । वागीश्वर त्वां त्वदुपज्ञ वाचः ॥ १२ ॥
मुग्धेन्दु निष्यन्द विलोभ नीयां । मूर्तिं तवानन्द सुधा प्रसूतिम् ।
विपश्चितश्चेतसि भावयन्ते । वेला मुदारामिव दुग्ध सिन्धोः ॥ १३ ॥
मनोगतं पश्यति यः सदा त्वां । मनीषिणां मानस राज हंसम् ।
स्वयं पुरोभाव विवादभाजः । किंकुर्वते तस्य गिरो यथार्हम् ॥ १४।।
अपि क्षणार्धं कलयन्ति ये त्वां । आप्लावयन्तं विशदैर् मयूखैः ।
वाचां प्रवाहैर् अनिवारितैस्ते । मन्दाकिनीं मन्दयितुं क्षमन्ते ॥ १५ ॥
स्वामिन् भवद्ध्यान सुधाभिषेकात् । वहन्ति धन्याः पुलकानुबन्धम् ।
अलक्षिते क्वापि निरूढ मूलं । अङ्गेष्विवानन्दथुम् अङ्कुरन्तम् ॥ १६ ॥
स्वामिन् प्रतीचा हृदयेन धन्याः । त्वद्ध्यान चन्द्रोदय वर्धमानम् ।
अमान्त मानन्द पयोधिमन्तः । पयोभिरक्ष्णां परिवाहयन्ति ॥ १७ ॥
स्वैरानुभावास् त्वदधीन भावाः । समृद्ध वीर्यास् त्वदनुग्रहेण ।
विपश्चितो नाथ तरन्ति मायां । वैहारिकीं मोहन पिञ्छिकां ते ॥ १८ ॥
प्राङ् निर्मितानां तपसां विपाकाः । प्रत्यग्र निश्श्रेयस संपदो मे ।
समेधिषीरंस्तव पाद पद्मे । संकल्प चिन्तामणयः प्रणामाः ॥ १९ ॥
विलुप्त मूर्धन्य लिपिक्र माणां । सुरेन्द्र चूडापद लालितानाम् ।
त्वदंघ्रि राजीव रजः कणानां । भूयान् प्रसादो मयि नाथ भूयात् ॥ २० ॥
परिस्फुरन् नूपुर चित्रभानु । प्रकाश निर्धूत तमोनुषङ्गाम् ।
पदद्वयीं ते परिचिन् महेऽन्तः । प्रबोध राजीव विभात सन्ध्याम् ॥ २१ ॥
त्वत् किङ्करा लंकरणो चितानां । त्वयैव कल्पान्तर पालितानाम् ।
मञ्जुप्रणादं मणिनूपुरं ते । मञ्जूषिकां वेद गिरां प्रतीमः ॥ २२ ॥
संचिन्तयामि प्रतिभाद शास्थान् । संधुक्षयन्तं समय प्रदीपान् ।
विज्ञान कल्पद्रुम पल्लवाभं । व्याख्यान मुद्रा मधुरं करं ते ॥ २३ ॥
चित्ते करोमि स्फुरिताक्षमालं । सव्येतरं नाथ करं त्वदीयम् ।
ज्ञानामृतो दञ्चन लम्पटानां । लीला घटी यन्त्र मिवाश्रितानाम् ॥ २४ ॥
प्रबोध सिन्धोररुणैः प्रकाशैः । प्रवाल सङ्घात मिवोद्वहन्तम् ।
विभावये देव सपुस्तकं ते । वामं करं दक्षिणम् आश्रितानाम् ॥ २५ ॥
तमांसि भित्वा विशदैर्मयूखैः । संप्रीणयन्तं विदुषश्चकोरान् ।
निशामये त्वां नव पुण्डरीके । शरद्घने चन्द्रमिव स्फुरन्तम् ॥ २६ ॥
दिशन्तु मे देव सदा त्वदीयाः । दया तरङ्गानुचराः कटाक्षाः ।
श्रोत्रेषु पुंसाम् अमृतं क्षरन्तीं । सरस्वतीं संश्रित कामधेनुम् ॥ २७ ॥
विशेष वित्पारिष देषु नाथ । विदग्ध गोष्ठी समराङ्गणेषु ।
जिगीषतो मे कवितार्कि केन्द्रान् । जिह्वाग्र सिंहासनम् अभ्युपेयाः ॥ २८ ॥
त्वां चिन्तयन् त्वन्मयतां प्रपन्नः । त्वामुद्गृणन् शब्द मयेन धाम्ना ।
स्वामिन् समाजेषु समेधिषीय । स्वच्छन्द वादाहव बद्ध शूरः ॥ २९ ॥
नाना विधानामगतिः कलानां । न चापि तीर्थेषु कृतावतारः ।
ध्रुवं तवानाथ परिग्रहायाः । नवं नवं पात्रमहं दयायाः ॥ ३० ॥
अकम्पनीयान् यपनीति भेदैः । अलंकृषीरन् हृदयं मदीयम् ।
शङ्का कलङ्का पगमोज्ज्वलानि । तत्वानि सम्यञ्चि तव प्रसादात् ॥ ३१ ॥
व्याख्या मुद्रां करसरसिजैः पुस्तकं शङ्क चक्रे । बिभ्रद् भिन्नस्फटिक रुचिरे पुण्डरीके निषण्णः ।
अम्लानश्रीर् अमृत विशदैर् अंशुभिः प्लावयन् मां । आविर्भूया दनघ महिमा मानसे वाग धीशः ॥ ३२ ॥
वागर्थ सिद्धिहेतोः । पठत हयग्रीव संस्तुतिं भक्त्या ।
कवितार्किक केसरिणा । वेङ्कट नाथेन विरचिता मेताम् ॥ ३३ ॥
॥ इति श्रीहयग्रीवस्तोत्रं समाप्तम् ॥
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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नर नारायण जन्मोत्सव विशेष #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🥳अक्षय तृतीया सेलिब्रेशन🎊🙏
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कथा नर और नारायण की
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प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे।
आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा।
भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है। वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है। बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है। उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं। बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।
सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये। ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये। उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है। इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म। अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए। उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए। क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए। उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए। ये सब अधर्म की सन्तति है। ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति -
ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ। प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की। उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया। एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को। जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति।
धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई। सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया। जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया। क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है। वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है।
नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की। अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा। पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी। अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी। दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये।
बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं।
श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है।
नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है।
इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा।
उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।'
भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण.
कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी
आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं।
कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा
उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ।
केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी।
*केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*
भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें।
नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।
नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।
दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।
महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।
यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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भगवान परशुराम जन्मोत्सव विशेष #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🙏परशुराम जयंती🪔📿
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भगवान परशुराम जन्मोत्सव हिन्दू पंचांग के वैशाख माह की शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन दिये गए पुण्य का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता। अक्षय तृतीया से त्रेता युग का आरंभ माना जाता है. इस दिन का विशेष महत्व है।
भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाले अधिक लोग हैं. मध्य कालीन समय के बाद जब से हिन्दू धर्म का पुनुरोद्धार हुआ है, तब से परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
परशुराम के जन्म एवं जन्मस्थान के पीछे कई मान्यताएँ एवं अनसुलझे सवाल है. सभी की अलग अलग राय एवं अलग अलग विश्वास हैं।
भार्गव परशुराम को हाइहाया राज्य, जो कि अब मध्य प्रदेश के महेश्वर नर्मदा नदी के किनारे बसा है, वहाँ का तथा वहीं से परशुराम का जन्म भी माना जाता है।
एक और मान्यता के अनुसार रेणुका तीर्थ पर परशुराम के जन्म के पूर्व जमदग्नि एवं उनकी पत्नी रेणुका ने शिवजी की तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने वरदान दिया और स्वयं विष्णु ने रेणुका के गर्भ से जमदग्नि के पांचवें पुत्र के रूप में इस धरती पर जन्म लिया. उन्होनें अपने इस पुत्र का नाम “रामभद्र” रखा।
परशुराम के अगले जन्म के पीछे बहुत सी दिलचस्प मान्यता है. एसा माना जाता है, कि वे भगवान विष्णु के दसवें अवतार में कल्कि के रूप में फिर एक बार पृथ्वी पर अवतरित होंगे. हिंदुओं के अनुसार यह भगवान विष्णु का धरती पर अंतिम अवतार होगा. इसी के साथ कलियुग की समाप्ति होगी।
परशुराम का परिवार एवं कुल
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परशुराम सप्तऋषि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र थे।
ऋषि जमदग्नि के पिता का नाम ऋषि ऋचिका तथा ऋषि ऋचिका, प्रख्यात संत भृगु के पुत्र थे।
ऋषि भृगु के पिता का नाम च्यावणा था. ऋचिका ऋषि धनुर्वेद तथा युद्धकला में अत्यंत निपुण थे. अपने पूर्वजों कि तरह ऋषि जमदग्नि भी युद्ध में कुशल योद्धा थे।
जमदग्नि के पांचों पुत्रों वासू, विस्वा वासू, ब्रिहुध्यनु, बृत्वकन्व तथा परशुराम में परशुराम ही सबसे कुशल एवं निपुण योद्धा एवं सभी प्रकार से युद्धकला में दक्ष थे।
परशुराम भारद्वाज एवं कश्यप गोत्र के कुलगुरु भी माने जाते हैं।
भगवान परशुराम के अस्त्र
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परशुराम का मुख्य अस्त्र “कुल्हाड़ी” माना जाता है. इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है. परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी. इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी. अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया. शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा. शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी. तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की।
उनकी इस तपस्या से एक बार फिर शिवजी प्रसन्न हुए. उन्होनें परशुराम को वरदान देते हुए कहा कि परशुराम का जन्म धरती के राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ है. इसीलिए भगवान शिवजी ने परशुराम को, देवताओं के सभी शत्रु, दैत्य, राक्षस तथा दानवों को मारने में सक्षमता का वरदान दिया।
परशुराम युद्धकला में निपुण थे. हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले ज्ञानी, पंडित कहते हैं कि धरती पर रहने वालों में परशुराम और रावण के पुत्र इंद्रजीत को ही सबसे खतरनाक, अद्वितीय और शक्तिशाली अस्त्र – ब्रह्मांड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पाशुपतास्त्र प्राप्त थे।
परशुराम शिवजी के उपासक थे. उन्होनें सबसे कठिन युद्धकला “कलारिपायट्टू” की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की. शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे।
“विजया” उनका धनुष कमान था, जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था।
जन्म की कथा
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महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।
राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र विष्णु के अवतार परशुराम शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष परशु (कुल्हाड़ी) प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था किन्तु शंकर द्वारा प्रदत अमोघ परशु को सदैव धारण किए रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो वामन एवं रामचन्द्र के मध्य में हैं गिने जाते हैं। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये जामदग्न्य भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीय (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय तिथि) को हुआ था। अतः इस दिन व्रत करने व उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था।
उनकी माता जल का कलश भरने के लिए नदी पर गई। वहां गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गई कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को मां की हत्या करने का आदेश दिया। किन्तु परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माता का शीश काट डाला। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होने परशुराम को वर मांगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान मांगे। 1. माता पुनर्जीवित हो जाएं, 2. उन्हें मरने की स्मृति न रहे, 3. भाई चेतना युक्त हो जाएं और 4. मां परमायु हो। जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिए।
दुर्वासा की भांति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात हैं
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एक बार कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से परशुराम के पिता जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।
रामावतार में श्री रामचन्द्र द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आए थे। इन्हेांने परीक्षा के लिए उनका धनुष श्री रामचन्द्र जी को दिया था। जब श्री रामचन्द्र जी ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गए कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गए। परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवाई थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र से पीछे हटकर गिरिश्रेष्ठ महेन्द्र पर निवास किया।
रामजी का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गए और राजा दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। रामजी ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किए। परशुराम एक वर्ष तक लज्ज्ति, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तद्न्तर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज पुनः प्राप्त किया।
परशुराम कुंड नामक तीर्थस्नान में पांच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जाएंगे।
जानापाव पहाड़ी का संक्षिप्त परिचय एवं धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
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इस स्थल को जानापाव कहने के बारे में जनश्रुति है। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को अपनी माँ का सिर काटने का आदेश दिया था। उन्होंने यह कार्य करके पिता को कहा कि अब मुझे माँ जीवित चाहिए। तब ऋषि ने अपने कमण्डल से जल छींटा तो माँ में वापस जान आ गई थी। इसलिए इसका नाम जानापाव यानी जान वापस आना पड़ा। इन्दौर जिले की महू तहसील से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर विन्ध्याचल पर्वत की श्रृंखला में धार्मिक एवं पौराणिक महत्व का स्थान जानापाव स्थित है। जानापाव में भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि ने जनकेश्वर शिवलिंग की स्थापना कर अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिवजी ने महर्षि जमदग्नि को वरदान स्वरूप समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनू गाय प्रदान की थी।
वर्षों पूर्व जानापाव पहाड़ी ज्वालामुखी का उद्गम स्थल था। ज्वालामुखी के लावे से ही मालवा क्षेत्रा में काली मिट्टी का फैलाव हुआ था। वर्तमान में यह बिन्दुजल कुण्ड के रूप में विद्यमान है। नदियों का उद्गम स्थलः जानापाव पहाड़ी की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ से सात नदियों का उद्गम हुआ है। इनमें से तीन नदियाँ चोरल, गम्भीर एवं चम्बल मुख्य हैं। शेष चार सहायक नदियाँ नखेरी, अजनार, कारम और जामली हैं।
प्रति वर्ष अक्षय तृतीया को जानापाव में भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव बडे़ पैमाने पर मनाया जाता है। साथ ही एक मेले का भी आयोजन किया जाता है। प्रति वर्ष नवरात्रि एवं भूतड़ी अमावस्या को भी मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भूतड़ी अमावस्या को जानापाव के कुण्ड में स्नान करने से भूतप्रेत बाधा एवं समस्त शारीरिक रोगों का नाश होता है। अतः इस मेले में देश, प्रदेश के समस्त श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।
परशुराम और सहस्रबाहु की कथा
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राम चरितमानस में आया है कि ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ का कई बार उल्लेख आया है। महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था। उन्होने दत्तत्राई को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। दत्तत्राई उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने दत्तत्राई से एक हजार हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा। इसे सहस्त्राबाहू और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेयवीर भी कहा जाता है।
कहा जाता है महिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन अपने घमंड में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। उसके अत्याचार व अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों को मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, यहाँ तक की उसने अपने मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था।
एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ झाड-जंगलों से पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अदभुत गाय थी। महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु को ले जाने लगा। तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई।
जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तब उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई। परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेशित हो गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और परशुराम का युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़ परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन के वध के बाद पिता के आदेश से इस वध का प्रायश्चित करने के लिए परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गए। तब मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने सहयोगी क्षत्रियों की मदद से तपस्यारत महर्षि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर उनका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते हुए, आश्रम को जला डाला। माता रेणुका ने सहायतावश पुत्र परशुराम को विलाप स्वर में पुकारा। जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो माता को विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 घाव देखे। यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा भी किया। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर को भर कर अपने संकल्प को पूरा किया। कहा जाता है की महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया था तब जाकर किसी तरह क्षत्रियों का विनाश भूलोक पर रुका। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपने पितरों के श्राद्ध क्रिया की एवं उनके आज्ञानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ किया।
अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित
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महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया.. तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।
बाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का परशुराम भगवान से कोई विवाद नही हुआ था
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गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ। जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 तृतीया पौराणिक महात्म्य एवं शीघ्र विवाह और धन प्राप्ति के लिए शुभ उपाय
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हिन्दुओ के प्रमुख त्योहार में से एक अक्षय तृतीया इस वर्ष 19 अप्रैल रविवार के दिन मनाई जाएगी जानिए इस दिन विशेष की कुछ महत्वपुर्ण जानकारी।
वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं, यह सनातन धर्मियों का प्रधान त्यौहार है, इस दिन दिये हुए दान और किये हुए स्त्रान, होम, जप आदि सभी कर्मोंका फल अनन्त होता है - सभी अक्षय (जिसका क्षय या नाश ना हो) हो जाते हैं ; इसी से इसका नाम अक्षय हुआ है,
अक्षय तृतीया अभिजीत मुहुर्त
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स्वयंसिद्ध साढेतीन मुहूर्त के रुप में अक्षय तृतीया का बहुत अधिक महत्व है। धर्म शास्त्रों में इस पुण्य शुभ पर्व की कथाओं के बारे में बहुत कुछ विस्तार पूर्वक कहा गया है. इनके अनुसार यह दिन सौभाग्य और संपन्नता का सूचक होता है. दशहरा, धनतेरस, देवउठान एकादशी की तरह अक्षय तृतीया को अभिजीत, अबूझ मुहुर्त या सर्वसिद्धि मुहूर्त भी कहा जाता है. क्योंकि इस दिन किसी भी शुभ कार्य करने हेतु पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती. अर्थात इस दिन किसी भी शुभ काम को करने के लिए आपको मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती. अक्षय अर्थात कभी कम ना होना वाला इसलिए मान्यता अनुसार इस दिन किए गए कार्यों में शुभता प्राप्त होती है. भविष्य में उसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
हिन्दू समुदाय के अतिरिक्त जैन धर्म के लोग भी इस तिथि को बहुत महत्व देते है। इस दिन बिना पंचांग या शुभ मुहूर्त देखे आप हर प्रकार के मांगलिक कार्य जैसे विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, वस्त्र आभूषण आदि की खरीदारी, जमीन या वाहन खरीदना आदि को कर सकते है। पुराणों में इस दिन पितरों का तर्पण, पिंडदान या अन्य किसी भी तरह का दान अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते है। इतना ही नहीं इस दिन किये जाने वाला जप, तप, हवन, दान और पुण्य कार्य भी अक्षय हो जाते है।
आज के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च राशि मे होते है। अतः मन और आत्मा दोनों से बलवान रहते है,तो आज आप जो भी कार्य करते है वो मन और आत्मा से जुड़ा रहता है ऐसे में आज का किया पूजा पाठ और दान पुण्य बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावी होते है।
इसी तिथि को नर - नारायण, परशुराम और हयग्रीव - अवतार हुए थे; इसलिये इस दिन इनका जन्मोत्सव भी मनाया जाता है तथा इसी दिन त्रेतायुग भी आरम्भ हुआ था, अतएव इसे मध्याह्न व्यापिनी ग्रहण करना चाहिये, परंतु परशुरामजी प्रदोष काल में प्रकट हुए थे; इसलिये यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाये तो उस दिन अक्षय तृत्तीया, नर - नारायण जन्मोत्सव, परशुराम जन्मोत्सव और हयग्रीव जन्मोत्सव सब सम्पन्न की जा सकती हैं और यदि द्वितीया अधिक हो तो परशुराम - जन्मोत्सव दूसरे दिन होता है। यदि इस दिन गौरीव्रत भी हो तो ' गौरी विनायकोपेता ' के अनुसार गौरीपुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का सहयोग अधिक शुभ होता है। अक्षयतृत्तीया बड़ी पवित्र और महान् फल देने वाली तिथि है, इसलिये इस दिन सफलता की आशा से व्रतोत्सवादि के अतिरिक्त वस्त्र, शस्त्र और आभूषणादि बनवाये अथवा धारण किये जाते है तथा नवीन स्थान, संस्था एवं समाज वर्ष की तेजी - मंदी जानने के लिये इस दिन सब प्रकार के अन्न, वस्त्र आदि व्यावहारिक वस्तुओं और व्यक्ति विशेषों के नामों को तौलकर एक सुपूजित स्थान में रखते हैं और दूसरे दिन फिर तौलवर उनकी न्यूनाधिकता से भविष्य का शुभाशुभ मालूम करते हैं, अक्षयतृत्तीया में तृत्तीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र ये तीनों हों तो बहुत श्रेष्ठ माना जाता है, किसान लोग उस दिन चन्द्रमाके अस्त होते समय रोहिणी का आगे जाना अच्छा और पीछे रहे जाना बुरा मानते हैं !!
स्त्रात्वा हुत्वा च दत्त्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत् !! ( भारते )
यत्किञ्चिद् दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु !
तत् सर्वमक्षयं यस्मात् तेनेयमक्षया स्मृता !!
जैनियों में अक्षय तृतीया की मान्यताएँ
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हिंदुओं के साथ साथ जैन समुदाय में भी अक्षय तृतीया का महत्व है. जैन धर्म में यह दिन उनके प्रथम चौबीस तीर्थंकर में से एक, भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है. ऋषभदेव ही बाद में जा कर भगवान आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए. ऋषभदेव जैनी भिक्षु थे. इन्होंने ही जैन धर्म में“आहराचार्य– जैनी साधुओं तक आहार (भोजन) पहुंचाने का तरीका” प्रचारित किया था। जैनी भिक्षु कभी खुद के लिए भोजन नहीं पकाते तथा कभी भी किसी से कुछ नहीं मांगते, जो कुछ भी उन्हें लोग प्रेम से दे देते, वे उसे खा लेते.अक्षय तृतीया के पीछे जैन समुदाय में बहुत ही रोचक कथा है. ऋषभदेव ने अपना राज्य पाठ अपने 101 पुत्रों के बीच बाँटते हुए संसार की मोह माया त्याग दी. उन्होने छः महीने तक बिना भोजन तथा पानी के तपस्या की और फिर उसके बाद वे भोजन की आवश्यकता में ध्यान से बाहर बैठ गए. यह जैनी संत आहार की प्रतीक्षा करने लगे। लोगों ने ऋषभदेव को राजा समझकर उन्हें सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, हाथी, घोड़े, कपड़े और कुछ ने तो अपने राजा को खुश करने के लिए अपनीपुत्री तक दान में दे दी। परंतु ऋषभदेव को यह सब नहीं चाहिए था, वे तो सिर्फ भोजन के एक कौर की चाह में थे. इसलिए ऋषभदेव फिर से एक साल की तपस्या के लिए चले गए और उन्हें सालभर तक उपवास रखना पड़ा. फिर एक साल बाद राजा श्रेयांश हुए जिन्होने अपने “पूर्व-भाव-स्मरण” (पिछले जन्म के विचार जानने की शक्ति) से ऋषभदेव के मन की बात समझी और उनका उपवास तुड़वा कर उन्हें गन्ने का रस पिलाया. यह दिन अक्षय तृतीया का दिन था. उस दिन से आजतक तीर्थंकर ऋषभदेवके उपवास का महत्व समझते हुए जैन समुदाय अक्षय तृतीया के दिन उपवास रखकर गन्ने के रस से अपना उपवास खतम करते हैं. इस प्रथा को“पारणा”कहते हैं।
अक्षयतृतीया के दान एवं खरीददारी
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राशि के अनुसार करें इसकी खरीदारी
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मेष 🐐 सोना, पीतल।
वृष 🐂 चांदी, स्टील।
मिथुन 👫 सोना, चांदी , पीतल।
कर्क 🦀 चांदी, वस्त्र।
सिंह 🐅 सोना, तांबा।
कन्या 👩 सोना, चांदी, पीतल।
तुला ⚖️ चांदी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर।
वृश्चिक 🐉 सोना, पीतल।
धनु 🏹 सोना, पीतल, फ्रिज, वाटर कूलर।
मकर 🐊 सोना, पीतल, चांदी, स्टील।
कुंभ 🍯 सोना, चांदी, पीतल, स्टील, वाहन।
मीन 🐬 सोना, पीतल, पूजन सामग्री व बर्तन।
ग्रहों से सम्बंधित दान:
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सूर्य👉 लाल चंदन, लाल वस्त्र, गेहूं, गुड़, स्वर्ण, माणिक्य, घी व केसर का दान सूर्योदय के समय करना लाभप्रद होता है।
चंद्रमा👉 चांदी, चावल, सफेद चंदन, मोती, शंख, कर्पूर, दही, मिश्री आदि का दान संध्या के समय में फलदायी है।
मंगल👉 स्वर्ण, गुड़, घी, लाल वस्त्र, कस्तूरी, केसर, मसूर की दाल, मूंगा, ताम्बे के बर्तन आदि का दान सूर्यास्त से पौन घंटे पूर्व करना चाहिए।
बुध👉 कांसे का पात्र, मूंग, फल, पन्ना, स्वर्ण आदि का दान अपराह्न में करें।
गुरु👉 चने की दाल, धार्मिक पुस्तकें, पुखराज, पीला वस्त्र, हल्दी, केसर, पीले फल आदि का दान संन्ध्या के समय करना चाहिए।
शुक्र👉 चांदी, चावल, मिश्री, दूध, दही, इत्र, सफेद चंदन आदि का दान सूर्योदय के समय करना चाहिए।
शनि👉 लोहा, उड़द की दाल, सरसों का तेल, काले वस्त्र, जूते व नीलम का दान दोपहर के समय करें।
राहु👉 तिल, सरसों, सप्तधान्य, लोहे का चाकू व छलनी व छाजला, सीसा, कम्बल, नीला वस्त्र, गोमेद आदि का दान रात्रि समय करना चाहिए।
केतु👉 लोहा, तिल, सप्तधान, तेल, दो रंगे या चितकबरे कम्बल या अन्य वस्त्र, शस्त्र, लहसुनिया व बहुमूल्य धातुओं में स्वर्ण का दान निशा काल में करना चाहिए।
अक्षयतृतीया व्रत -विधि
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इस दिन उपर्युक्त तीनों जन्मोत्सव एकत्र होने से व्रती को चाहिये कि वह प्रातःस्त्रानादि से निवृत्त होकर ''ममाखिलपापक्षयपूर्वक सकलशुभफलप्राप्तये भागवत्प्रीत्यर्थं सकल कामना संसिध्यर्थं देवत्रयपूजनमहं करिष्ये '' ऐसा संकल्प करके भगवान का यथाविधि षोडशोपचार से पूजन करे, उन्हें पञ्चामृत से स्त्रान करावे, सुगन्धित द्रव्य चढ़ाकर पुष्पमाला पहनावे और नैवेद्य में नर - नारायण के निमित्त सेके हुए जौ या गेहूँ का ' सत्तू ', परशुराम के निमित्त कोमल ककड़ी और हयग्रीव के निमित्त भीगी हुई चने की दाल अर्पण करे, बन सके तो उपवास तथा समुद्र स्त्रान या गङ्गा स्त्रान करे और जौ, गेहूँ, चने, सत्तू, दही - चावल ईख के रस और दुध के बने हुए खाद्य पदार्थ ( खाँड़, मावा, मिठाई आदि ) तथा सुवर्ण एवं जलपूर्ण कलश, धर्मघट, अन्न, सब प्रकार के रस और ग्रीष्म ऋतु के उपयोगी वस्तुओं का दान करे तथा पितृश्राद्ध करे और ब्राह्मण भोजन भी करावे, यह सब यथाशक्ति करने से अनन्त फल होता है !!
यः पश्यति तृतीयायां कृष्णं चन्दनभूषितम् !
वैशाखस्य सिते पक्षे स यात्यच्युतमन्दिरम् !!
युगादौ तु नरः स्त्रात्वा विधिवल्लवणोदधौ !
गोसहस्त्रप्रदानस्य फलं प्राप्रोति मानवः !!
यवगोधूमचणकान् सक्तु दध्योदनं तथा !
इक्षुक्षीरविकाराश्च हिरण्यं च स्वशक्तितः !!
उदकुम्भान् सरकरकान् सन्नान् सर्वरसैः सह !
ग्रैष्मिकं सर्वमेवात्र सस्यं दाने प्रशस्यते !!
'गन्धोदकतिलैर्मिश्रं सान्नं कुम्भं फलान्वितम् ।
पितृभ्यः सम्प्रदास्यामि अक्षय्यमुपतिष्ठतु !!
अक्षय तृतीया की पौराणिक प्रचलित कथा
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अक्षय तृतीया की अनेक व्रत कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाखशुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।
शादी में हो रही बाधा दूर करने के उपाय
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इस उपाय को अक्षय तृतीया के दिन किया जाता है। इस दिन अक्षय मुहूर्त माना गया है। यह शुभ मुहूर्त है। यह उपाय रात के समय में किया जाता है।
1👉 आप को एक चौकी या पटिए पर पीला कपड़ा बिछाना चाहिए और पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके बैठ जाए।
2👉 पूजा स्थल पर मां पार्वती का चित्र रख लें।
3👉 चौकी पर एक मुट्ठी गेहूं रख दें।
4👉 गेहूं की ढेरी पर विवाह बाधा निवारण विग्रह (यंत्र) स्थापित करने के बाद चंदन अथवा केसर से तिलक लगा दें। यह पूरी प्रक्रिया ठीक से होने के बाद हल्दी की माला से इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
युवतियों के लिए यह मंत्र
ऊं गं घ्रौ गं शीघ्र विवाह सिद्धये गौर्यै फट्।
युवक करें इस मंत्र का जाप
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम।
तारणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोदभवाम।।
इस मंत्र की तीन-तीन माला 7 दिनों तक नियमित जपना चाहिए। अंतिम दिवस को इस सामग्री को मंदिर में ले जाकर देवी पार्वती के चरणों में समर्पित कर दें। इसे श्रद्धा और विश्वास से करने पर शीघ्र ही विवाह हो जाएगा। यह सिद्ध प्रयोग है, इसलिए मन में कोई संदेह न रखें। नहीं तो यह प्रभावशाली नहीं रहेगा।
अन्य सौभाग्य वर्धक उपाय
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1👉 आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया से प्रारंभ करते हुए माता लक्ष्मी के मंदिर में प्रत्येक शुक्रवार धूपबत्ती व गुलाब की अगरबत्ती दान करने से जीवन में अचानक धन प्राप्ति के योग बनते
2👉 धनधान्य की वृद्धि के लिए अक्षय तृतीया को एक मुट्ठी बासमती चावल सर से 11 बार ऊसर कर बहते हुए जल में श्री महालक्ष्मी का ध्यान करते हुए व श्री मंत्र का जप करते हुए जल प्रवाह कर दें। आश्चर्यजनक लाभ होगा।
3👉 ऋण से मुक्ति के लिए अक्षय तृतीया पर कनकधारा यंत्र की लाल वस्त्र पर पूजा घर में स्थापना करें। पंचोपचार से पूजा करें। 51 दिन तक श्रद्धा से यंत्र का पाठ करें। धीरे-धीरे ऋण कैसे उतर गया, यह पता भी न चलेगा।
4👉 स्फटिक के श्रीयंत्र को पंचोपचार पूजन द्वारा विधिवत स्थापित करें। माता लक्ष्मी का ध्यान करें, श्रीसूक्त का पाठ करें।
5👉 जितना संभव हो सके, मंत्र ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् का कमलगट्टे की माला से नियमित जप करें। नियमित रूप से एक गुलाब अर्पित करते रहें।
इस प्रकार पूजा करके ऐसे श्रीयंत्र को आप इस दिन व्यावसायिक स्थल पर भी स्थापित कर सकते हैं। माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
6👉 अक्षय तृतीया का व्रत रखकर और गर्मी में निम्न वस्तुओं जैसे- छाता, दही, जूता-चप्पल, जल का घड़ा, सत्तू, खरबूजा, तरबूज, बेल का सरबत, मीठा जल, हाथ वाले पंखे, टोपी, सुराही आदि वस्तुओं का दान करने से भाग्योन्नति में बाधा पहुचाने वाली समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
7👉 अक्षय तृतीया के दिन 11 कौड़ियों को लाल कपडे में बांधकर पूजा स्थान में रखने से देवी लक्ष्मी आकर्षित होती हैं। देवी लक्ष्मी के समान ही कौड़ियां भी समुद्र से उत्पन्न हुई हैं।
अक्षय तृतीया के विषय मे अन्य रोचक जानकारी
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👉 मान्यता के अनुसार त्रेता युग के शुरू होने पर धरती की सबसे पावन माने जानी वाली गंगा नदी इसी दिन स्वर्ग से धरती पर आई. गंगा नदी को भागीरथ धरती पर लाये थे. इस पवित्र नदी के धरती पर आने से इस दिन की पवित्रता और बढ़ जाती है और इसीलिए यह दिन हिंदुओं के पावन पर्व में शामिल है. इस दिन पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।
👉 यह दिन पृथ्वी के रक्षक श्री विष्णुजी को समर्पित है. हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार विष्णुजी ने श्री परशुराम के रूप में धरती पर अवतार लिया था. इस दिन परशुराम के रूप में विष्णुजी छटवी बार धरती पर अवतरित हुए थे, और इसीलिए यह दिन परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णुजी त्रेता एवं द्वापरयुग तक पृथ्वी पर चिरंजीवी (अमर) रहे. परशुराम सप्तऋषि में से एक ऋषि जमदगनी तथा रेणुका के पुत्र थे. यह ब्राह्मण कुल में जन्मे और इसीलिए अक्षय तृतीय तथा परशुराम जयंती को सभी हिन्दू बड़े धूमधाम से मनाते हैं।
👉 यह दिन रसोई एवं पाक (भोजन) की देवी माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन भी माना जाता है. अक्षय तृतीया के दिन माँ अन्नपूर्णा का भी पूजन किया जाता है और माँ से भंडारे भरपूर रखने का वरदान मांगा जाता है. अन्नपूर्णा के पूजन से रसोई तथा भोजन में स्वाद बढ़ जाता है।
👉 महाभारत में अक्षय तृतीया की एक और कथा प्रचलित है. इसी दिन दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था. द्रौपदी को इस चीरहरण से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने कभी न खत्म होने वाली साड़ी का दान किया था।
7👉 अक्षय तृतीया के पीछे हिंदुओं की एक और रोचक मान्यता है. जब श्री कृष्ण ने धरती पर जन्म लिया, तब अक्षय तृतीया के दिन उनके निर्धन मित्र सुदामा, कृष्ण से मिलने पहुंचे. सुदामा के पास कृष्ण को देने के लिए सिर्फ चार चावल के दाने थे, वही सुदामा ने कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिये परंतु अपने मित्र एवं सबके हृदय की जानने वाले अंतर्यामी भगवान सब कुछ समझ गए और उन्होने सुदामा की निर्धनता को दूर करते हुए उसकी झोपड़ी को महल में परिवर्तित कर दिया और उसे सब सुविधाओं से सम्पन्न बना दिया. तब से अक्षय तृतीया पर किए गए दान का महत्व बढ़ गया।
👉 दक्षिण प्रांत में इस दिन की अलग ही मान्यता है. उनके अनुसार इस दिन कुबेर (भगवान के दरबार का खजांची) ने शिवपुरम नामक जगह पर शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था. कुबेर की तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने कुबेर से वर मांगने को कहा. कुबेर ने अपना धन एवं संपत्ति लक्ष्मीजी से पुनःप्राप्त करने का वरदान मांगा. तभी शंकरजी ने कुबेर को लक्ष्मीजी का पूजन करने की सलाह दी. इसीलिए तब से ले कर आजतक अक्षय तृतीया पर लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है. लक्ष्मी विष्णुपत्नी हैं इसीलिए लक्ष्मीजी के पूजन के पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. दक्षिण में इस दिन लक्ष्मी यंत्रम की पूजा की जाती है, जिसमें विष्णु, लक्ष्मीजी के साथ – साथ कुबेर का भी चित्र रहता है।
👉 सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ भी इसी दिन हुआ था ।
👉 ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी अक्षयतृतीया के दिन हुआ था ।
👉 प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट अक्षयतृतीया के दिन खोला जाता है।
👉 बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल अक्षयतृतीया ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है ।
5👉 अक्षय तृतीया के दिन ही महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखना आरंभ की थी. इसी दिन महाभारत के युधिष्ठिर को “अक्षय पात्र” की प्राप्ति हुई थी. इस अक्षय पात्र की विशेषता थी, कि इसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था. इस पात्र के द्वारा युधिष्ठिर अपने राज्य के निर्धन एवं भूखे लोगों को भोजन दे कर उनकी सहायता करते थे. इसी मान्यता के आधार पर इस दिन किए जाने वाले दान का पुण्य भी अक्षय माना जाता है अर्थात इस दिन मिलने वाला पुण्य कभी खत्म नहीं होता. यह मनुष्य के भाग्य को सालों साल बढाता है। एवं इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त भी हुआ था।
👉 भारत के उड़ीसा में अक्षय तृतीया का दिन किसानों के लिए शुभ माना जाता है. इस दिन से ही यहाँ के किसान अपने खेत को जोतना शुरू करते हैं।
👉 अलग अलग प्रांत में इस दिन का अपना अलग ही महत्व है. बंगाल में इस दिन गणेशजी तथा लक्ष्मीजी का पूजन कर सभी व्यापारी द्वारा अपनी लेखा जोखा (ऑडिट बूक) की किताब शुरू करने की प्रथा है. इसे यहाँ “हलखता” कहते हैं।
1👉 पंजाब में भी इस दिन का बहुत महत्व है. इस दिन को नए मौसम के आगाज का सूचक माना जाता है. इस अक्षय तृतीया के दिन जाट परिवार का पुरुष सदस्य ब्रह्म मुहूर्त में अपने खेत की ओर जाते हैं. उस रास्ते में जितने अधिक जानवर एवं पक्षी मिलते हैं, उतना ही फसल तथा बरसात के लिए शुभ शगुन माना जाता है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#☝अनमोल ज्ञान
🌟 || व्यक्तित्व निमार्ण || 🌟
विचारों से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। मनुष्य अपने विचारों से निर्मित एक प्राणी है, वह जैसा सोचता है, वैसा बन जाता है। मनुष्य के सिवा अन्य कोई भी प्राणी श्रेष्ठ विचारों द्वारा एक श्रेष्ठ जीवन का निर्माण नहीं कर सकता है। मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसका व्यक्तित्व निर्माण प्रकृति से ज्यादा उसकी स्वयं की प्रवृत्ति पर निर्भर होता। मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी का निर्माण प्रकृति ने जैसा कर दिया, कर दिया। अब उसमें और बेहतर बनने की कोई संभावना बाकी नहीं रह जाती है।
मनुष्य में जीवन के अंतिम क्षणों तक विचार परिवर्तन से जीवन परिवर्तन के द्वार सदा खुले रहते हैं। वह अपने जीवन को अपने अनुसार उत्कृष्ट या निकृष्ट बना सकने में समर्थ होता है। पशु के जीवन में पशु से पशुपतिनाथ बनने की संभावना नहीं होती पर एक मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ संग और महापुरुषों के आश्रय से नर से नारायण बनने की प्रबल संभावना विद्यमान रहती है। जीवन में सद्गुणों की बहुलता ही इंसान को भगवान बना देती है।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति ।
ग्रीष्मकालेऽथ वा शीते एवं पापमपोहति ॥
ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती ।
तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुनः ॥
[ महाभारत , अनुशासनपर्व ( १३ ) , १२५.५६-५७ ]
अर्थात् 👉🏻 सूर्य की रश्मि/किरणें ग्रीष्म/गर्मियों में एवं शीत/ठंड में भी पापों को दूर करती हैं । जो व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाता है , उसकी दीप्ति शाश्वत हो जाती है तथा वह सूर्य की तरह तेजस्वी औऱ चंद्रमा की तरह प्रकाशमान हो जाता है ।
{ इस श्लोक में सूर्य भगवान की महिमा का वर्णन है , जो यह बताता है कि सूर्य की रश्मि/किरणें न केवल हमें प्रकाश देती हैं , अपितु हमारे पापों को भी नष्ट/दूर करती हैं । }
🌄🌄 प्रभातवंदन 🌄🌄
#🌞सुप्रभात सन्देश #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #शुभ रविवार













