वर्ष में केवल आज के ही दिन वृन्दावन श्री बांकेबिहारी जी के चरण दर्शन होते हैं।😍
करो चरण दर्शन पाओ फल बद्री दर्शन
🌸अक्षय तृतीया की मङ्गल बधाई🌸
🙏🏻🪷जय श्री कृष्ण🪷🙏🏻
#बांके बिहारी
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏
।।जय श्री राम।।
आठंव जथा लाभ संतोषा।
सपनेहुं नहि देखइ परदोषा।।
भगवान ने सबरी माता को सातवीं भक्ति
की महिमा बताई यहां तक हमने पिछले प्रसंगो में पड़ा। अब इस प्रसंग में आठवीं भक्ति की महिमा है। आठवीं भक्ति में कहा गया है कि प्राप्त को ही पर्याप्त समझो।और दूसरों में स्वप्न में भी दोष मत देखो यह हमारा स्वभाव होना चाहिए यह
आठवीं भक्ति की महिमा है।
प्रत्येक परिस्थिति में संतुष्ट बने रहना यह
भगवत भक्ति के लक्षण हैं। असंतुष्ट एंव असंतोष यह बीमारी है पर इसका एक ही इलाज है।छै विकारों में सर्वाधिक प्रबल विकार तीन हैं।काम,क्रौधऔर लोभ
यह तीनों विकार क्षण भर में मुनि जनों के मन में भी छोभ उत्पन्न कर देते हैं।
तात तीन अरु प्रबल खल
काम क्रौध अरु लोभ
मुनि विग्यान धाम मन
करहि निमिष महुं छोभ
तीनों विकारों को मिटानेका एक ही उपाय है और वह है संतोष।श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कामनाओं से निवृत्ति बिना संतोष के मिट नहीं सकती है।
बिना कामनाएं मिटे स्वप्न में भी सुख नहीं मिल सकता है।
बिनु संतोष कि काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहु नाहीं।।
क्रोध को मिटाने का भी यही उपाय है।
जब परशुराम जी को बड़ा क्रोध आ रहा था तब श्री लक्ष्मण जी ने कहा महाराज यदि आप कुछ कहना चाहते हो तो कह डालिए क्रौध को रोककर यह दुसह दुख क्यों सह रहे हो?कहकर संतुष्ट हो जाओ।
क्योंकि बिना कहे आपको संतोष होगा नहीं।
नहिं संतोष तो पुनि कछु कहहीं।
जनि रिषि रोक दुसह दुःख सहहूं।।
श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं जिस तरह अगस्त्य तारे के उदित होने पर नदियों का तालाबों का मार्ग जल सूख जाता है,उसी तरह संतोष लोभ को सोख लेता है।बिना संतोष के लोभ मिटता नहीं
उदित अगस्त्य पंथ जल सोषा।
जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।
इस विषय में कबीर दास जी भी यही कहते हैं कि व्यक्ति के पास चाहे जितना धन आ जाए चाहे हाथी घोड़ा हीरे मोती जवाहरात, संसार की सारी भौतिक वस्तुओं का सुख उसे मिल जाए संतोष नहीं होगा। पर संतोष रुपी धन आने पर
यह सब धूल के समान लगने लगेंगे।
गो धन गज धन बाजि धन
और रत्न धन खानि
जब आवे संतोष धन
सब धन धूरि समान
भगवान का भक्त कौन?। भगवान का भक्त वही जो संतोषी हों। जितना उसे मिल जाए उतने में ही संतुष्ट रहें प्राप्त को
ही पर्याप्त समझें।ऐसा नहीं की इसने इतना नहीं दिया उसने उतना नहीं दिया।
श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि
तुम्हारे लोटे में जल उतना ही आएगा जितनी उस लोटे की क्षमता है। इसके लिए तुम चाहे कुएं के पास जाओ चाहे नदी के पास जाओ चाहे समुद्र के पास जाओ, लोटे की क्षमता से अधिक एक बूंद भी नहीं आएगा।
करम कमंडल कर लियो
तुलसी जहं जहं जाय
सरिता कूप समुद्र जल
बूंद न अधिक समाय।।
एक महात्मा जी कहा करते थे कि भाग्य
में होगा तो भाग कर आ जाएगा और भाग में नहीं होगा तो आया हुआ भी भाग कर चला जाएगा। प्रारब्ध का परिणाम ही
जीवन में मिलता है इसलिए दूसरों को क्या दोष देना। अपने ही भाग्य का फल अपने सामने हैं।
पहले तो प्रारब्ध रच्यो
पाछे रच्यो शरीर
तुलसी चिंता मत करें
भजले श्री रघुवीर।।
इसलिए प्राप्त को ही पर्याप्त समझे। यही है (आंठव जथा लाभ संतोषा )।
जैसे कि प्रत्येक भक्ति के साथ कोई ना कोई शर्त लगी है इसी प्रकार आठवीं भक्ति के साथ भी एक शर्त है । इसमें शर्त यह है कि जितना मिला हो उसमें संतुष्ट तो रहें पर संतुष्ट रहते हुए दूसरों मे दोष दिखाई नहीं देना चाहिए।
श्रृंगवेरपुर में जब श्री सीताराम जी घास फूस के बिछोने पर विश्राम कर रहे थे तब
राम जी के सखा निषाद राज को बड़ा दुख हुआ। निषाद राज ने राम जी के दुख का कारण कैकई माता को माना पर श्री
लक्ष्मण जी ने कहा नहीं भाई। किसी के सुख-दुख का कारण कोई दूसरा नहीं है।
सब अपने ही प्रारब्ध का फल पाते हैं।
कोउ न कछु सुख दुख कर दाता
निज कृत करम भोग सुनु भ्राता।।
अब कई लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि राम जी का ऐसा कौनसा प्रारब्ध था जिसके कारण उन्हें दुःख झेलना पड़ा।?
उत्तर सीधा सा है ।वन गमन की इच्छा ही रामजी की थी। सरस्वती जी को प्रेरित ही राम जी ने किया इसके पश्चात जो भी घटना क्रम हुआ सब रामजी की इच्छा से ही हुआ। इसलिए इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है ।
भगवान का भक्त किसी को दोषी नहीं मानता है। कागभुसुंडि जी ने गरुड़ जी को अपनी कथा सुनाई थी कि लोमश ऋषि के वचनों को जब मैंने स्वीकार नहीं किया तब क्रोध में आकर लोमश ऋषि ने
मुझे कौवा होने का श्राप दे दिया।
गरुड़ जी ने कहा फिर तो तुम्हें लोमश ऋषि पर क्रौध आया होगा? कागभुशुण्डि जी बोले मुझे क्रौध नहीं आया। गरुड़ जी ने कहा तुम्हें क्रोध क्यों नहीं आया?।श्राप
दिया ही था तो मनुष्य ही बने रहने देते कौवा क्यों बनाया?।
कागभुशुण्डि जी बोले कौवा होने पर मैं तो प्रशन्न हो गया। मनुष्य होता तो राम जी के दर्शन के लिए अयोध्या जाता फिर जरूरी नहीं कि मुझे अयोध्या के राज महल में प्रवेश मिल ही जाता।और यदि
एक बार प्रवेश मिल भी जाता तो केवल
एक ही बार राम जी के दर्शन कर पाता।
अब मुझे कौवे का रूप मिल गया तो मैं स्वतंत्र हो गया। आराम से उड़कर सीधे राजमहल में जाऊंगा किसी से पूछना ही नहीं है। वहीं रहकर अपने प्रभु के दर्शन करूंगा।और यह श्राप कोई लोमश ऋषि ने थोड़े ही दिया।यह तो भगवान की ही इच्छाथी।लोमसऋषि तो केवल माध्यम थे
भगवान मेरी परीक्षा लेना चाह रहे थे।
कृपा सिंधु मुनि मति करि भोरी
लीन्ही प्रेम परीक्षा मोरी।।
कागभुशुण्डि जी कहते हैं जब मैं कौवा
होकर उड़के जाने लगा तो मेरे गुरु देव ने
मुझे बुलाया। मेरे गुरुदेव का तो केवल बहाना था यह परीक्षा तो मेरी भगवान के द्वारा ही ली जा रही थी कि भक्त कच्चा है या पक्का।
जब मैंने अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया तो गुरुदेव की आंखों से आंसू बर सने लगे मानो संकेत यह था कि तुम परीक्षा में पास हो गए हो।तो भगवान का भक्त हर परिस्थिति को भगवान की ही इच्छा मानता है।वह किसी को दोषी नहीं मानताहै यही आंठवी भक्ति की महिमा है
आठंव जथा लाभ संतोषा।
सपनेहु नहिं देखइ परदोषा।।
नवधा भक्ति प्रसंग की नवीं भक्ति की महिमा हम अगले प्रशंग में पड़ेंगे। इसके
पश्चात श्री राम जी के वन गमन की लीला में आगे श्री राम जी ने और क्या-क्या चरित्र किए उन प्रसंगों को पढ़ेंगे जय श्री राम।।
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१९५
*श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण*
*अयोध्याकाण्ड*
*एक सौ चौदहवाँ सर्ग*
*भरतके द्वारा अयोध्याकी दुरवस्थाका दर्शन तथा अन्तःपुरमें प्रवेश करके भरतका दुःखी होना*
इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरतने स्निग्ध, गम्भीर घर्घर घोषसे युक्त रथके द्वारा यात्रा करके शीघ्र ही अयोध्यामें प्रवेश किया॥१॥
उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे। घरोंके किवाड़ बंद थे। सारे नगरमें अन्धकार छा रहा था। प्रकाश न होनेके कारण वह पुरी कृष्णपक्षकी काली रातके समान जान पड़ती थी॥२॥
जैसे चन्द्रमाकी प्रिय पत्नी और अपनी शोभासे प्रकाशित कान्तिवाली रोहिणी उदित हुए राहु नामक ग्रहके द्वारा अपने पतिके ग्रस लिये जानेपर अकेली असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्यसे प्रकाशित होनेवाली अयोध्या राजाके कालकवलित हो जानेके कारण पीड़ित एवं असहाय हो रही थी॥३॥
वह पुरी उस पर्वतीय नदीकी भाँति कृशकाय दिखायी देती थी, जिसका जल सूर्यकी किरणोंसे तपकर कुछ गरम और गँदला हो रहा हो, जिसके पक्षी धूपसे संतप्त होकर भाग गये हों तथा जिसके मीन, मत्स्य और ग्राह गहरे जलमें छिप गये हों॥४॥
जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखाके समान प्रकाशित होती थी, वहीं श्रीरामवनवासके बाद हवनीय दुग्धसे सींची गयी अग्निकी ज्वालाके समान बुझकर विलीन-सी हो गयी है॥५॥
उस समय अयोध्या महासमरमें संकटग्रस्त हुई उस सेनाके समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न-भिन्न हो गये हों और मुख्य-मुख्य वीर मार डाले गये हों॥६॥
प्रबल वायुके वेगसे फेन और गर्जनाके साथ उठी हुई समुद्रकी उत्ताल तरंग सहसा वायुके शान्त हो जानेपर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्दशून्य-सी जान पड़ती थी॥७॥
यज्ञकाल समाप्त होनेपर 'स्फ्य' आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकोंसे सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारणकी ध्वनिसे रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी॥८॥
जैसे कोई गाय साँड़के साथ समागमके लिये उत्सुक हो, उसी अवस्थामें उसे साँड़से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भावसे गोष्ठमें बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदनासे पीड़ित थी॥९॥
श्रीराम आदिसे रहित हुई अयोध्या मोतियोंकी उस नूतन मालाके समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसको अत्यन्त चिकनी-चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जातिकी पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों॥१०॥
जो पुण्य-क्षय होनेके कारण सहसा अपने स्थानसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाशसे गिरी हुई उस तारिकाकी भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी॥११॥
जो ग्रीष्म-ऋतुमें पहले फूलोंसे लदी हुई होनेके कारण मतवाले भ्रमरोंसे सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानलके लपेटमें आकर मुरझा गयी हो, वनकी उस लताके समान पहलेकी उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी॥१२॥
वहाँके व्यापारी वणिक् शोकसे व्याकुल होनेके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार-हाट और दुकानें बहुत कम खुली थीं। उस समय सारी पुरी उस आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलोंकी घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों॥१३॥
(उन दिनों अयोध्यापुरीकी सड़कें झाड़ी-बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र-तत्र कूड़े-करकटके ढेर पड़े थे। उस अवस्थामें) वह नगरी उस उजड़ी हुई पानभूमि (मधुशाला) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधुसे खाली टूटी-फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँके पीनेवाले भी नष्ट हो गये हों॥१४॥
उस पुरीकी दशा उस पौंसलेकी-सी हो रही थी, जो खम्भोंके टूट जानेसे ढह गया हो, जिसका चबूतरा छिन्न-भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट-फूटकर इधर-उधर सब ओर बिखरे पड़े हों॥१५॥
जो विशाल और सम्पूर्ण धनुषमें फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों (किनारों) में बाँधनेके लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरोंके बाणोंसे कटकर धनुषसे पृथ्वीपर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चा के समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई-सी दिखायी देती थी॥१६॥
जिसपर युद्धकुशल घुड़सवारने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्षकी सेनाने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमिमें पड़ी हुई उस घोड़ीकी जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरीकी भी थी (कैकेयीके कुचक्रसे उसके संचालक नरेशका स्वर्गवास और युवराजका वनवास हो गया था)॥१७॥
रथपर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरतने उस समय श्रेष्ठ रथका संचालन करनेवाले सारथि सुमन्त्रसे प्रकार कहा—॥१८॥
'अब अयोध्यामें पहलेकी भाँति सब ओर फैला हुआ गाने-बजानेका गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्टकी बात है॥१९॥
'अब चारों ओर वारुणी (मधु) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलोंकी सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरुकी पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है॥२०॥
'अच्छी-अच्छी सवारियोंकी आवाज, घोड़ोंके हींसनेका सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियोंका चिग्घाड़ना तथा रथोंकी घर्घराहटका महान् शब्द—ये सब नहीं सुनामी दे रहे हैं॥२१॥
'श्रीरामचन्द्रजीके निर्वासित होनेके कारण ही इस पुरीमें इस समय इन सब प्रकारके शब्दोंका श्रवण नहीं हो रहा है। श्रीरामके चले जानेसे यहाँके तरुण बहुत ही संतप्त हैं। वे चन्दन और अगुरुकी सुगन्धका सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते। अब इस पुरीके लोग विचित्र फूलोंके हार पहनकर बाहर घूमनेके लिये नहीं निकलते हैं॥२२-२३॥
'श्रीरामके शोकसे पीड़ित हुए इस नगरमें अब नाना प्रकारके उत्सव नहीं हो रहे हैं। निश्चय ही इस पुरीकी वह सारी शोभा मेरे भाईके साथ ही चली गयी॥२४॥
'जैसे वेगयुक्त वर्षाके कारण शुक्लपक्षकी चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है। अब कब मेरे भाई महोत्सवकी भाँति अयोध्यामें पधारेंगे और ग्रीष्म-ऋतुमें प्रकट हुए मेघकी भाँति सबके हृदयमें हर्षका संचार करेंगे॥२५½॥
'अब अयोध्याकी बड़ी-बड़ी सड़कें हर्षसे उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणोंके शुभागमनसे शोभा नहीं पा रही हैं'॥२६½॥
इस प्रकार सारथिके साथ बातचीत करते हुए दुःखी भरत उस समय सिंहसे रहित गुफाकी भाँति राजा दशरथसे हीन पिता के निवासस्थान राजमहलमें गये॥२७½॥
जैसे सूर्यके छिप जानेसे दिनकी शोभा नष्ट हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय वह अन्तःपुर शोभाहीन हो गया था और वहाँक लोग शोकमग्न थे। उसे सब औरसे स्वच्छता और सजावटसे हीन देख भरत धैर्यवान् होनेपर भी अत्यन्त दुःखी हो आँसू बहाने लगे॥२९॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११४॥*
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞
‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*आदिकाल से इस धरा धाम पर मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से सफलता एवं विफलता प्राप्त करता रहा है | किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम मनुष्य को छलहीन एवं निष्कपट होना परम आवश्यक है | मनुष्य कुछ देर के लिए सफल होकर अपनी सफलता पर प्रसन्न तो हो सकता है परंतु उसकी प्रसन्नता चिरस्थाई नहीं होती | हमारे पुराणों में अनेकों उदाहरण इस प्रकार के मिलते हैं जहां दैत्यों ने तपस्वी बनकरके तपस्या किया एवं वरदान भी प्राप्त कर लिया , परंतु उनके मन में पूर्व से स्थापित कपट नहीं जा पाया और अपने कपटभाव के कारण ही वे अपने जीवन में कुछ करने के पहले ही इस संसार से विदा हो गए | यदि भस्मासुर का उदाहरण दिया जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | जब तक उसे वरदान नहीं मिला था तब तक वह भगवान शिव को अपना आराध्य एवं पार्वती जी को सम्मान की दृष्टि से देख रहा था , और वरदान प्राप्त होते ही उसके मन में पार्वती मैया के प्रति कपट भाव का उदय हुआ और वह उन्हीं को प्राप्त करने के लिए उद्वेलित हो गया | जिसका परिणाम हुआ उसका विनाश | उसी प्रकार कपटी मनुष्य का कपट हृदय से कभी नहीं जा सकता है वह चाहे जितने ऊंचे सिंहासन पर बैठ जाय |*
*आज के समाज में निष्कपट भाव मिलना लगभग असंभव सा दिख रहा है | आज की स्थिति यह है कि किसी के ऊपर दया करने के पहले हजारों बार सोचना पड़ता है | यदि किसी ने किसी की दीनता पर पिघल कर उसको आश्रय दे दिया तो वह एक निश्चित समय के बाद उसी के साथ कपट करता हुआ देखा जा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कह सकता हूं कि कपटी मनुष्य कभी भी सफल नहीं हो सकता , क्योंकि ऐसे लोगों का कार्य होता है जिसके साथ रह रहे हैं उसकी बुराई करके दूसरा समाज ग्रहण करना | कुछ दिन वहां रहने के बाद उनके हृदय में बैठा हुआ कपट उनको उद्वेलित कर देता है और अपने नए आश्रय दाता के साथ भी वह अपना कपट पूर्ण चरित्र दर्शा ही देते हैं | ऐसे व्यक्तियों से सदैव सावधान रहने की आवश्यकता है | शायद ऐसे ही लोगों को "आस्तीन का सांप" कहा गया है | ऐसे व्यक्ति नीलश्रृगाल की तरह होते हैं जो कुछ दिन तो सिंह बनकर भले जंगल में राज्य कर लें परंतु उनके अंदर जो अवगुण है वह बहुत दिन तक नहीं छुप सकता है | एक दिन समाज उनके वास्तविक चरित्र का दर्शन अवश्य करता है | तब ऐसे लोग अपनी गलती ना मान करके तरह-तरह के आरोप अपने आश्रयदाता के ऊपर लगाने लगते हैं , परंतु यह समाज यह जानता है कि कल को यही व्यक्ति अमुक के ऊपर दोषारोपण कर रहा था आज दूसरे के ऊपर दोषारोपण कर रहा है इसका अर्थ यही हुआ इस का आश्रयदाता गलत नहीं है बल्कि गलत यही व्यक्ति है | ऐसे व्यक्ति जब समाज में ऊँचे मंचों पर बैठकर समाज को सदुपदेश देते हैं तो बड़ा हास्यास्पद लगता है |*
*व्यक्ति किसी के पास जब जाता है तो दीन हीन बनकर जाता है परंतु कुछ दिन बाद उसका असली चरित्र उजागर हो ही जाता है | अत: सावधान रहें |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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*सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----*
*‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---*
आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #🌞सुप्रभात सन्देश #☝अनमोल ज्ञान
#🙏परशुराम जयंती🪔📿
🌟 || जयतु परशुरामः || 🌟
जब राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ बढ़ने लग जाये, राष्ट्र के ऊपर ही कुठाराघात होने लग जाये एवं सत्ता और व्यवस्था निरकुंश होकर निर्बल लोगों को सताने लग जाये तब एक ब्राह्मण और साधु की राष्ट्र व समाज के प्रति भूमिका को भगवान परशुराम जी के जीवन में देखनी चाहिए। भगवान परशुराम जी का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि राष्ट्र रक्षा, स्वरक्षा एवं धर्म रक्षा के लिए शास्त्र और शस्त्र दोनों ही परमावश्यक हैं। हमारे जीवन में शक्ति और क्षमा दोनों होनी चाहिये। दुर्बल के लिए क्षमा और अपराधियों के लिये दण्ड देने की सामर्थ्य हमारी भुजाओं में होनी ही चाहिए।
स्वयं की शांति का त्याग करके समाज में शांति और सद्भावना की स्थापना एवं आसुरी शक्तियों के दमन के लिए भगवान परशुराम ने अपने हाथों में परशु धारण किया। हमारी समस्त शक्ति का राष्ट्र हित में और समाज सेवा में लग जाना ही उसकी सार्थकता है। यही प्रमुख सीख विप्र कुलभूषण भगवान परशुराम जी का जीवन समाज को प्रदान करता है। राष्ट्र रक्षा एवं धर्म रक्षा के लिए सदैव उद्यत श्री परशुराम भगवान की सदा जय हो।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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आप समस्त को अक्षय तृतीया एवं परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 💐✨
दानं दुर्गति नाशनम् ।
दान दुर्गति का नाश करने वाला है ।
दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन ।
हाथों की शोभा कंकन आभूषण पहनने से नही अपितु दान से होती है ।
तस्यां वै भार्गवऋषेः सुता वसुमदादयः ।
यवीयांजज्ञ एतेषां राम इत्यभिविश्रुतः ॥१३॥
यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम् ॥१४॥
भावार्थ 👉🏻 रेणुकाके गर्भसे जमदग्नि ऋषिके वसुमान् आदि कई पुत्र हुए । उनमें सबसे छोटे परशुरामजी थे । उनका यश सारे संसारमें प्रसिद्ध है कहते हैं कि हैहयवंशका अन्त करनेके लिये स्वयं भगवान् ने ही परशुरामके रूपमें अंशावतार ग्रहण किया था । उन्होंने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया ।
[ श्रीमद्भागवत पुराण ९.१५.१३-१४ ]
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂
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#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏
।।जय श्री राम।।
सातंव सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा।।
श्री राम जी शबरी माता को सातवीं नवधा भक्ति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह सारा संसार मेरा ही स्वरुपहै इसलिए
सब में मुझे ही देखना चाहिए। श्री तुलसी दासजी महाराज जगत में जितने जड़और चेतन जीव हैं सभी को राम मय जानकर उन सबके चरणों की वंदना करते हैं।
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि
बदंउ सब के पद कमल
सदा जोरि जुग पानि।।
भगवान का भक्त सभी में अपने परमात्मा को ही देखता है। इसीलिए श्री तुलसीदास जी महाराज सारे संसार को परमात्मा मय जानकर लिखते हैं।(सियाराम मय सब जग जानी )(करहु प्रणाम जोरिजुग पानी)
भगवान ने नवधा भक्ति का जो वर्णन किया है उसमें भक्ति के अनेक रूप बताएं हैं। संत का संग यह भगवान की भक्ति है। भगवत कथा में प्रीति होना यह भगवान की भक्ति है। अभिमान रहित होकर गुरुदेव के चरणों की सेवा करना यह भी भगवान की भक्ति है ।
निष्कपट भाव से भगवान के गुणों को गाना यह भगवान की भक्ति है भगवान के मंत्र या उसके पावन नाम जप में दृढ़ विश्वास रखना यह भी भगवान की भक्ति है ।और इंद्रियों का संयम करके वैराग्य वान होकर सज्जनों के धर्म का पालन करना यह भी भगवान की भक्ति है।
छै भक्तियों का वर्णन अभी तक किया गया है पर सब भक्तियों के साथ शर्त रखी गई है। भगवान के गुण गाए तो शर्त यह है कि कपट का त्याग करें। मंत्र जाप करें तो शर्त यह है की दृढ़ विश्वास रखें।
इंद्रियों का संयमी हो वैराग्यवान हों तो इसमें भी शर्त है कि वैराग्य वान होकर निरंतर सज्जनों के आचरण का पालन करें ।
इसी तरह सातवीं भक्ति में भी शर्त रखी है कि सब में मुझको देखे पर शर्त यह है कि संत को मुझसे भी अधिक समझे। (मौतें अधिक संत करि लेखा )
अब कोई संत यह कहे कि मुझे भगवान से भी अधिक समझो। भगवान ने स्वयं ऐसा कहा कि मुझसे अधिक संत को समझो।तो विचार क्या करते हो समझो ।भगवान से अधिक मुझे समझो।
मानस के मर्मज्ञ संत कहते हैं कि जो अपने को भगवान से भी अधिक समझते हों वह संत नहीं हो सकतें हैं। यदि कोई तुम्हें भगवान से अधिक समझे तो तुम्हें खुश होने की आवश्यकता नहीं है यह तुम्हारा सौभाग्य नहीं यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।
जब भगवान ने कहा कि संत को मुझसे भी अधिक समझो तो वह संत कैसा जो इस बात को स्वीकार करले। संत को तो यही कहना चाहिए नहीं भाई यह तो भगवान की करुणा है जो संतो को इतना महत्व दिया है, पर भगवान से अधिक महिमा तो किसी की नहीं हो सकती है।
सबसे अधिक महिमा तो भगवान कीही है
भरत जी संत हैं। श्री राम जी कहते हैं भरत तुम्हारे समान पुण्यआत्मा तीनों लोकों में नहीं है। भरत जी ने कहा प्रभु मैं पुण्यआत्मा कैसे?। मैं तो बहुत बड़ा पापी हूं। मेरे पाप के कारण ही आपको वनवास हुआ है। मैं पापी हूं मेरे कारण ही लक्ष्मण भैया को श्री सीता जी को और आपको वनवास हुआ है।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम ऐसा मानते हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वनवास हुआ है,पर वन में मैंने जब संतों के दर्शन किए तो संतों ने मुझसे पूछा राम तुम्हारा वनवास क्यों हुआ? तुम किस पाप के कारण वन में आए हो?।
श्री राम जी ने कहा भरत मैंने संतो से यही कहा कि महाराज शास्त्रों में तो ऐसा वर्णन है कि बिना पुण्य के संतो के दर्शन दुर्लभ है। मैं वन में आया हूं तो मैं अपने पुण्यों के प्रभाव के कारण वन में आया हूं
मेरे पुण्यों से मुझे संतों के दर्शन हुए हैं।
(पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सतसंगति संसृति कर अंता।।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम कह रहे हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वन मिला
और मैं कह रहा हूं कि मेरे पुण्य के कारण मुझे वनवास हुआ। तो जरा विचार करो जो काम तुम्हारे पाप ने किया वही काम मेरे पुण्य ने किया। तो इससे यह तो सिद्ध होता है कि तुम्हारे पाप और मेरे पुण्य दोनों ने एक ही काम किया।
श्री राम जी कहते हैं भरत अब विचार करके देखो जब तुम्हारे पाप मेरे पुण्यों की बराबरी कर सकते हैं, तो तुम्हारे पुण्यों की क्या महिमा होगी। इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम्हारे समान पुणयत्मा तीनों लोकों में नहीं है।
तीन काल त्रिभुवन मत मोरे।
पुणयसि लोक तात तर तोरे।।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम कुटिल हो नहीं फिर भी यदि कोई तुम्हें धोखा से कुटिल समझ ले तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा।
उर आनत तुम पर कुटलाई।
लोक जाई परलोक नसाई।।
जब श्री राम जी ने कहा कि यदि कोई तुम्हें धोखे से कुटिल समझेगा तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा
तो सभा में बैठे हुए सभी की आंखों में आंसू आ गए पर दो बहुत दुखी हुए।
दो कौन दुखी हुए?।
निषाद राज और श्री लक्ष्मण जी दोनों
बहुत दुखी हो गए। क्योंकि निषाद राज ने और श्री लक्ष्मण जी दोनों ने भरत जी को कुटिल कहा था। निषाद राज ने कहा था
यदि भरत के मन में कुटिलता नहीं होती
तो सेना लेकर क्यों आते।
जौं पै जिय न होत कुटिलाई।
तो कत संग लीन्ह कटकाई।।
लक्ष्मण जी ने भी यही कहा था कि भाई के मन में कुटिलता है इसीलिए तो यह समझ कर आया है कि रामजी वन मे अकेले हैं अवसर अच्छा है।
कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी।
जानि राम वनवास एकाकी।
राम जी ने जैसे ही कहा कि किसी ने धोखे से भी भरत को कुटिल कुबंधु कहा है तो उसके लोक पर लोक नष्ट हो जाएंगे
तो लक्ष्मण जी और निषाद राज दोनों की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा कि यह ब्रह्म वाक्य है। राम जी की बात मिथ्या नहीं हो सकती है। हमारे लोक और परलोक दोनों नष्ट हो गए हैं।
वशिष्ठ जी ने राम जी से पूछा कि इसका उपाय क्या है? भरत जी को कुटिल कहने वाले के लोक परलोक नष्ट हो गए हैं तो इसका उपाय क्या है जिससे इनके लोक पर लोक सुधर जाएं।
श्री राम जी ने कहा इसका एक ही उपाय है,।भरत जो तुम्हारे नाम का सुमिरन करेगा उसके लोक और परलोक दोनों सुधर जाएंगे।
मिटिहहि पाप प्रमेय सब
अखिल अमंगल भार
लोक सुजसु परलोक सुख
सुमिरत नाम तुम्हार।।
श्री राम जी अयोध्या वासियों से कहते हैं कि जब मैं वन में आ रहा था तब मैं रथ
में बैठ कर आ रहा था और तुम पैदल पैदल आ रहे थे। और तुम भरत जी जैसे संत के साथ में आए तो भरत जी पैदल-पैदल आए और तुम्हें रथ में बैठा कर लाए इसलिए ऐसे महात्मा की महिमा अधिक है।
भगवान कहते हैं मैं सभी के हृदय में रहता हूं। और सभी के हृदय में सुमति और कुमति भी रहती है। कुमति के कारण मुझे वनवास हुआ और सुमति रुपी संत ने मुझे वापस सिंहासन पर बैठा कर अयोध्या वासियों से मिला दिया।
इसलिए जो भगवान से बिछड़ गए हैं, य
भगवान जिन से बिछुड़ गये है उन्हें आपस में मिला देना यह संत का ही काम है। इसलिए मुझसे अधिक महिमा संत की है।
( मोतें अधिक संत करि लेखा )
नवधा भक्ति में आठवीं भक्ति की महिमा का वर्णन अगले प्रशगंमें। जय श्री राम।।
#🙏परशुराम जयंती🪔📿 मंदिर निरमंड की कथा
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माता की हत्या के पश्चाताप के लिए निरमंड आये थे परशुराम।
हिमाचल प्रदेश की सुरमई वादियों में यूं तो कदम-कदम पर देवस्थल मौजूद हैं, लेकिन इनमें से कुछ एक ऐसे भी हैं जो अपने में अनूठी गाथाएँ और रहस्य समेटे हुए हैं| ऐसा ही एक मंदिर है निरमंड का परशुराम मंदिर
यह मंदिर शिमला से करीब 150 किलोमीटर दूर रामपुर बुशहर के पास स्थित निरमंड गाँव में है| मान्यता है कि भगवान् परशुराम ने यहाँ अपनी जिन्दगी के अहम् वर्ष गुजारे थे|
किवदंतियों के अनुसार ऋषि जमदग्नि हिमाचल के वर्तमान सिरमौर जिला के समीप जंगलों में तपस्या किया करते थे| उनकी पत्नी और परशुराम की माता रेणुका भी आश्रम में उनके साथ रहती थीं| ऋषि जमदग्नि को नित्य पूजा के लिए यमुना के जल की जरूरत होती थी| यह जिम्मेदारी रेणुका पर थी| रेणुका अपने तपोबल से रोज ताज़ा रेत का घडा बनाकर उसे सांप के कुंडल पर धर कर आश्रम लाया करती थीं|
लेकिन एक दिन रस्ते में गन्धर्व जोड़े की क्रीडा देख लेने के कारण उनका ध्यान भंग हो गया और नतीजा यह निकला की तपोबल क्षीण होने के कारण उस दिन न तो रेत का घडा बन पाया और न ही सांप आया| इस कारण जमदग्नि की पूजा में विघ्न आ गया| ऋषि इस से इतना व्यथित हुए की क्रोधावेश में आकर उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र परशुराम को माँ रेणुका के वध का आदेश दिया|
पितृभक्त परशुराम ने तुंरत पिता की आज्ञा का पालन किया और रेणुका को मौत के घाट उतार दिया| बेटे की पित्री भक्ति से जमदग्नि प्रस्सन हुए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा तो परशुराम ने माँ को दोबारा जीवित करवा लिया|
ऋषि और रेणुका की बात तो यहीं आई-गयी हो गयी लेकिन परशुराम इसके बाबजूद मात्रिहत्या के भाव से व्यथित रहने लगे| पश्चताप की इसी ज्वाला की जलन से त्रस्त होकर उन्होंने पिता का आश्रम त्याग दिया और प्रायश्चित के उदेश्य से हिमालय की और कूच कर लिया |
इसी क्रम में अंतत परशुराम ने निरमंड में डेरा डाला| यहाँ उन्होंने माँ रेणुका को समर्पित एक मंदिर भी बनवाया जो आज भी देवी अम्बिका के मंदिर के रूप में यहाँ विद्यमान है| इस मंदिर में रेणुका की पौने फुट की प्रतिमा है जो नहं के रेणुका मंदिर की प्रतिमा से मेल खाती है|
परशुराम ने यहाँ जो आश्रम बनाया था उसी को आज परशुराम मंदिर के तौर पर पूजा जाता है| यह आश्रम पहाडी और जंगली जानवरों के इलाके में होने के कारण चारों तरफ से बंद था और आने-जाने के लिए एक ही मुख्य द्वार था|
मंदिर का यह मूल स्वरुप आज भी जस का तस् है| कहते हैं यहीं पर मात्रि हत्या के दोष निवारण के लिए परशुराम ने एक यज्य भी शुरू करवाया जिसमें तब नरबलि दी जाती थी| किवदंतियों की मानें तो कालांतर में यही नरबलि मौजूदा भूंडा यज्या के तौर पर प्रचलित हुयी| जो आज भी जारी है|
एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम ने निरमंड को ख़ास तौर पर क्षत्रियों के संहार के लिए त्यार करने हेतु बसाया था|लेकिन कारण यहाँ भी माता रेणुका थीं| राजा सहस्त्रार्जुन के रेणुका के प्रति प्रेम की परिणिति आखिरकार जमदग्नि और रेणुका के वध के रूप में हुयी|
इससे परशुराम कुपित हो उठे और उन्होंने धरती से क्षत्रियों के संहार का संकल्प लिया जिसे पूरा करने के लिए निरमंड में आश्रम बनाया| अब इनमें से सच कौन सी धारणा है यह कहना तो मुश्किल है लेकिन दोनों से यह जरूर साबित होता है की परशुराम ने ही निरमंड बसाया था|
यही कारण है की दूसरे तमाम देवों के मंदिर होने के बाबजूद निरमंड में आज भी परशुराम को ही मुख्य देव माना जाता है| परशुराम जी का मंदिर गाँव के बीचों-बीच स्थित है और खास बात यह की आप गाँव के किसी भी रास्ते पर चल दें परशुराम मंदिर जरूर पहुंचेंगे|
परशुराम जी का मंदिर या कोठी मूलत लकडी की बनी हुयी है जिसपर प्राचीन काष्टकला उकेरी हुयी है| मुख्य द्वार आज भी एक ही है| मंदिर के गर्भगृह में भगवान परशुराम जी की तीन मुंहों वाली मूर्ति स्थापित है|
यह मूर्ति काश्मीर रियासत की तत्कालीन महारानी अगरतला ने स्थापित करवाई थी| कहा जाता है की इसके मुख्य मुख के माथे पर तीसरी आँख के रूप में हीरा भी जड़ा हुआ था| इसके अलावा यहीं पर परशुराम जी के तीनों मुंहों के लिए चांदी का मुखौटा भी हुआ करता था जो बाद में चोरी हो गया था| हालाँकि आज भी यहाँ के भण्डार में समुद्र्सेन के काल का स्वर्णपात्र मौजूद है|
इसके अलावा देवी के आभूषण भी हैं| इन्हें भूंडा यज्य के मौके पर जनता के दर्शनार्थ रखा जाता है| बाकी के समय यह ताले में बंद रहते हैं| मंदिर के प्रांगण में सदियों पुराने शिलालेख और प्रस्तर की प्राचीन प्रतिमाएँ भी हैं जो तत्कालीन भव्यता को सहज ही ब्यान करती हैं|
परशुराम मंदिर के देखरेख हालाँकि एक समिति करती है लेकिन इसे देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की यह स्थानीय समिति के बस का रोग नहीं है और इसके लिए व्यापक स्तर पर सरकारी प्रयासों की जरूरत है|
गाँव के लोग इस प्राचीन मंदिर और उस कारण निरमंड के साथ जुड़े इतिहास के चलते निरमंड को धरोहर का दर्जा मांग रहे हैं| लेकिन यदि सरकार परशुराम मंदिर को ही सहेज ले तो भी बड़ी बात होगी| थोड़े से प्रयास और प्रचार से इसे इलाके का प्रमुख धार्मिक पर्यटन का केंद्र बनाया जा सकता है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿
जय श्री परशुराम जी की-
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महाभारत के अभिन्न पात्र दानवीर कर्ण ने जीवन में केवल एक बार ही झूठ बोला और यही झूठ उनके जीवन पर सबसे ज्यादा भारी पड़ा।
कर्ण ने अस्त्र विद्या भगवान परशुराम से सीखी थी, भगवान परशुराम का प्रण केवल ब्राह्मणों को ही शस्त्र विद्या सिखाने का था।
कर्ण ब्राह्मण नहीं थे, लेकिन उन्होंने परशुराम से झूठ बोल दिया कि वो ब्राह्मण है।
कर्ण की बात को सच मानकर परशुरामजी ने उन्हें शस्त्र की
शिक्षा दे दी।
एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं।
कर्ण ने उनका सिर अपनी
गोद में रख लिया।
परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और उसने कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।
बहता खून परशुराम के चेहरे तक पहुंचा तो उनकी नींद खुल गई।
उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं।
कर्ण ने कहा आपकी नींद
टूटने का डर था इसलिए।
परशुराम ने कहा किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो।
कर्ण ने सच बता दिया।
क्रोधित परशुरामजी ने कर्ण को शाप दिया कि तुमने मुझ से जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे, कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।
हुआ भी ऐसा ही, महाभारत के प्रमुख युद्ध में जब कर्ण अर्जुन से लडऩे पहुंचा तो वो अपने आप ही सारे दिव्यास्त्रों के प्रयोग की विधि भूल गया और अर्जुन के हाथों मारा गया।
साभार— पं देव शर्मा🔥
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
नकुल और सहदेव की उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रों के नामकरण-संस्कार...(दिन 364)
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तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ।
चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ।। १३ ।।
'सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे-बड़े कठिन कर्म किये हैं ।। १३ ।।
सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ।। १४ ।।
'अनिन्दिते ! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो' ।। १४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ।। १५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा- 'तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है' ।। १५ ।।
ततो माद्री विचार्येवं जगाम मनसाश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ।। १६ ।।
तब माद्रीने मन-ही-मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया। तब उन दोनों ने आकर माद्री के गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये ।। १६ ।।
नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमी भुवि ।
तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी ।। १७ ।।
उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव। पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा ।। १७ ।।
सत्त्वरूपगुणोपेतौ भवतोऽत्यश्विनाविति । भासतस्तेजसात्यर्थ रूपद्रविणसम्पदा ।। १८ ।।
'ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे। अपने तेज तथा बढ़ी-चढ़ी रूप-सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे' ।। १८ ।।
नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः ।
भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशाम्पते ।। १९ ।।
तदनन्तर शतशृंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण संस्कार किये। उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे ।। १९ ।।
ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ।। २० ।।
कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरे का नाम अर्जुन रखा गया ।। २० ।।
पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् ।
माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ।। २१ ।।
उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणों ने माद्री पुत्रों में से जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरे का सहदेव निश्चित किया ।। २१ ।।
अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ।। २२ ।।
वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक-एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक-से सुशोभित हो रहे थे ।। २२ ।।
महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः ।
पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजसः ।। २३ ।।
मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ।। २४ ।।
प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् ।
कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ।। २५ ।।
वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंको देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशृंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया ।। २३-२५ ।।
तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती।
उक्ता सकृद् द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ।। २६ ।।
राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली- 'महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये। इससे मैं ठगी गयी ।। २६ ।।
बिभेम्यस्याः परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी ।
नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ।। २७ ।।
तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ।। २८ ।।
सम्भूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः ।
शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत् प्रियदर्शनाः ।। २९ ।।
'अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।' इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था ।। २७-२९।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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