#महाभारत
भीष्म पितामह के पांच तीर🏹
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जब कौरवों की सेना पांडवों से युद्ध हार रही थी तब दुर्योधन भीष्म पितामह के पास गया और उन्हें कहने लगा कि आप अपनी पूरी शक्ति से यह युद्ध नहीं लड़ रहे हैं।* *भीष्म पितामह को काफी गुस्सा आया और उन्होंने तुरंत पांच सोने के तीर लिए और कुछ मंत्र पढ़े।* *मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने दुर्योधन से कहा कि कल इन पांच तीरों से वे पांडवों को मार देंगे।* *मगर दुर्योधन को भीष्म पितामह के ऊपर विश्वास नहीं हुआ और उसने तीर ले लिए और कहा कि वह कल सुबह इन तीरों को वापस करेगा।* *इन तीरों के पीछे की कहानी भी बहुत मजेदार है।* *भगवान श्रीकृष्ण को जब तीरों के बारे में पता चला तो उन्होंने अर्जुन को बुलाया और कहा कि तुम दुर्योधन के पास जाओ और पांचो तीर मांग लो। दुर्योधन की जान तुमने एक बार गंधर्व से बचायी थी। इसके बदले उसने कहा था कि कोई एक चीज जान बचाने के लिए मांग लो। समय आ गया है कि अभी तुम उन पांच सोने के तीर मांग लो। अर्जुन दुर्योधन के पास गया और उसने तीर मांगे। क्षत्रिय होने के नाते दुर्योधन ने अपने वचन को पूरा किया और तीर अर्जुन को दे दिए।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🪔विजया एकादशी 🌺
विजया एकादशी फरवरी 13 विशेष
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भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का व्रत है विजया एकादशी। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि एकादशी का व्रत धारण करने से न सिर्फ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है, बल्कि पूर्व जन्म के पापों का भी नाश हो जाता है। वहीं इसका पुण्य उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसकी मृत्यु हो चुकी है आप आप उसकी आत्मा की शांति या मोक्ष की कामना से यह व्रत धारण कर रहे हैं।
कथा के अनुसार वनवास के दौरान जब भगवान श्रीराम को रावण से युद्ध करने जाना था तब उन्होंने भी अपनी पूरी सेना के साथ इस महाव्रत को रखकर ही लंका पर विजय प्राप्त की थी।
व्रत विधि
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इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर उनकी धूम, दीप, पुष्प, चंदन, फूल, तुलसी आदि से आराधना करें, जिससे कि समस्त दोषों का नाश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है इसलिए इस दिन तुलसी को आवश्यक रूप से पूजन में शामिल करें। भगवान की व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में हरिभजन करते हुए उनसे आपके दुखों का नाश करने की प्रार्थना करें। रात्रि जागकरण का पुण्य फल आपको जरूर ही प्राप्त होगा। व्रत धारण करने से एक दिन पहले ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत धारण करने से व्यक्ति कठिन कार्यों एवं हालातों में विजय प्राप्त करता है।
एकादशी कथा
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युधिष्ठिर ने पूछा: हे वासुदेव! फाल्गुन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार माघ) के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका व्रत करने की विधि क्या है? कृपा करके बताइये।
भगवान श्रीकृष्ण बोले: युधिष्ठिर एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की ‘विजया एकादशी’ के व्रत से होनेवाले पुण्य के बारे में पूछा था तथा ब्रह्माजी ने इस व्रत के बारे में उन्हें जो कथा और विधि बतायी थी, उसे सुनो।
ब्रह्माजी ने कहा : नारद यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है । यह एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे पहुँचे, तब उन्हें समुद्र को पार करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा ‘सुमित्रानन्दन किस उपाय से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयंकर जल जन्तुओं से भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमता से पार किया जा सके।
लक्ष्मणजी बोले हे प्रभु आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है? यहाँ से आधे योजन की दूरी पर कुमारी द्वीप में बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं। आप उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये।
श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया। महर्षि ने प्रसन्न होकर श्रीरामजी के आगमन का कारण पूछा।
श्रीरामचन्द्रजी बोले ब्रह्मन् मैं लंका पर चढ़ाई करने के उद्धेश्य से अपनी सेनासहित यहाँ आया हूँ। मुने अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, कृपा करके वह उपाय बताइये।
बकदाल्भय मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी होती है, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे।
राजन् ! अब इस व्रत की फलदायक विधि सुनिये: दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित कर उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें। उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें। फिर एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें। कलश को पुन: स्थापित करें। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा विशेष रुप से उसका पूजन करें। कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें। गन्ध, धूप, दीप और भाँति भाँति के नैवेघ से पूजन करें। कलश के सामने बैठकर उत्तम कथा वार्ता आदि के द्वारा सारा दिन व्यतीत करें और रात में भी वहाँ जागरण करें । अखण्ड व्रत की सिद्धि के लिए घी का दीपक जलायें । फिर द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी जलाशय के समीप (नदी, झरने या पोखर के तट पर) स्थापित करें और उसकी विधिवत् पूजा करके देव प्रतिमासहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें कलश के साथ ही और भी बड़े बड़े दान देने चाहिए। श्रीराम आप अपने सेनापतियों के साथ इसी विधि से प्रयत्नपूर्वक ‘विजया एकादशी’ का व्रत कीजिये इससे आपकी विजय होगी।
ब्रह्माजी कहते हैं नारद यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि के कथनानुसार उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया। उस व्रत के करने से श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पायी और सीता को प्राप्त किया बेटा जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना चाहिए । इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
जगदीश जी की आरती
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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…
विजया एकादशी मुहूर्त
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एकादशी आरम्भ👉 12 फरवरी दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से।
एकादशी तिथि समाप्त👉 13 फरवरी दोपहर 02 बजकर 25 मिनट तक।
पारण का समय👉 14 फरवरी प्रातः 06 बजकर 57 मिनट से प्रातः 09 बजकर 10 मिनट के बीच कर लेना चाहिए।
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय सायं 04:01।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🪔विजया एकादशी 🌺
एकादशी व्रत उद्यापन की विस्तृत विधि
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एकादशी का व्रत एक तप है तो उद्यापन उसकी पूर्णता है। उद्यापन वर्ष में एक बार किया जाता है इसके अंग हैं- व्रत, पूजन, जागरण, हवन, दान, ब्राह्मण भोजन, पारण। समय व जानकारी के अभाव में कम लोग ही पूर्ण विधि-विधान के साथ उद्यापन कर पाते हैं। प्रत्येक व्रत के उद्यापन की अलग-अलग शास्त्रसम्मत विधि होती है। इसी क्रम में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशियों का उद्यापन करने की विस्तृत शास्त्रोक्त विधि आपके समक्ष प्रस्तुत है।
वर्ष भर के 24 एकादशी व्रत किसी ने कर लिये हों तो वो उसके लिए उद्यापन करे। जिसने एकादशी व्रत अभी नहीं शुरु किये लेकिन आगे से शुरुआत करनी है तो वह भी पहले ही एकादशी उद्यापन कर सकते हैं और उस उद्यापन के बाद 24 एकादशी व्रत रख ले। कुछ लोग साल भर केवल कृष्ण पक्ष के 12 एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन करते हैं तो कुछ लोग साल भर के 12 शुक्ल एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन भी करते हैं । अतः जैसी इच्छा हो वैसे करे लेकिन उद्यापन अवश्य ही करे तभी व्रत को पूर्णता मिलती है। कृष्ण पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन कृष्ण पक्ष की एकादशी - द्वादशी को करे, शुक्ल पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन शुक्ल पक्ष की एकादशी - द्वादशी को करे। दोनों पक्ष के 24 एकादशी व्रतों का उद्यापन किसी भी पक्ष की एकादशी को कर सकते हैं (लेकिन चौमासे में एकादशी उद्यापन नहीं करना है)।
शास्त्रों के अनुसार एकादशी उद्यापन दो दिन का कार्यक्रम होता है पहले दिन एकादशी को व्रत के साथ पूजा होती है तथा द्वादशी को हवन करके 24 या12 ब्राह्मणों को दान देकर भोजन करवाया जाता है।
प्राचीन महाभारत काल में इस एकादशी उद्यापन की विधि के बारे में पूछते हुए अर्जुन बोले, “हे कृपानिधि ! एकादशी व्रत का उद्यापन कैसा होना चाहिये और उसकी क्या विधि है? उसको आप कृपा करके मुझे उपदेश दें।” तब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "हे पांडवश्रेष्ठ ! उद्यापन के बिना, कष्ट से किये हुए व्रत भी निष्फल हैं। सो तुम्हें उसकी विधि बताता हूं। देवताओं के प्रबोध समय में ही एकादशी का उद्यापन करे। विशेष कर मार्गशीर्ष के महीने, माघ माह में या भीम तिथि (माघ शुक्ल एकादशी) के दिन उद्यापन करना चाहिये |" भगवान के उपरोक्त कथन से तात्पर्य है कि चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ला एकादशी से लेकर कार्तिक कृष्ण एकादशी) में एकादशी उद्यापन नहीं करे।
एकादशी उद्यापन की पूजा सामग्री
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उद्यापन की सारी सामग्री समय से एकत्रित कर ले ताकि पूजा में व्यवधान न हो।
एकादशी उद्यापन का सामान
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️तुलसीदल (मंजरी), तुलसीपत्र, फूल, दूब, गंगाजल (अथवा सामान्य पवित्र पानी), पंचामृत, आचमन पात्र + आचमनी, कलश, शंख / अर्घ्य, भगवान के लिए कपड़ा जनेऊ - फूलमाला- रुद्राक्षमाला, कलश के लिए सवा मीटर काला- सफेद वस्त्र, कटोरे -5 (1 कलश के लिए, गणेश-मातृका-दुर्गा-क्षेत्रपाल के लिए4), लक्ष्मीजी व विष्णुजी की मूर्ति, गणेशजी दुर्गाजी की मूर्ति अथवा पूगीफल ले लें, चंदन पाउडर, रोली (कुमकुम), चावल, धूप-अगरबत्ती, फल व दक्षिणा (गणेशजी, 16मातृका, वेदी, कलश, विष्णुजी 5 के लिए), पान के 2 पत्ते, लौंग-इलायची सुपारी (पूगीफल), रुई- बत्तियां, घी की बत्ती, दिया (मुख्य और आरती के लिए), माचिस, कपूर, दक्षिणा- आचार्य के लिए। आचार्य को देने के लिए धोती/अंगोछा। क्षेत्रपाल के लिए - गुड / उड़द-लौंग । 16 मातृका,गणेशजी को नैवेद्य लगाने के लिए - मोदक, बताशे, इलायची-दाना ।
वेदी के लिए
〰️〰️〰️〰️साफ मिट्टी/बालू, सर्वतोभद्र व अष्टदल कमल बनाने के लिए अबीर आदि रंग या फिर रोली आटे-तिल-चावल-हल्दी से बनाए । दालों से भी सर्वतोभद्र बन सकता है- मलका-लाल, उड़द काला, मूंग-हरा, चावल-सफेद, पीली-दाल ।
24 नैवेद्य
〰️〰️〰️1. मोदक, 2. गुड़, 3. चूर्ण- आटे या सूजी चीनी को घी में भून कर बना प्रसाद, 4. घृत-गुड़ मिले आटे की पूरी बनाए, 5. मण्डक = रोटी (चाहे तो घी दूध चीनी में आटा गूंथकर मीठी रोटियाँ बनाए), 6. सोहालिका / सोहालक खाँडयुक्त अशोकवर्तिका= फेनी बनाएं या दूध की सेवईं बना लें, 7 मक्खन 8. बेर या बेल फल या फिर सेब, 9. सत्तू- भुना वाला चना चीनी के साथ पीसकर रखें, 10. बड़े-भीगे हुए उड़द पीसकर हल्दी, धनिया, आजवायन, नमक डालकर तलकर गोल पकौड़े जैसे बना लें, 11. खीर, 12. दूध, 13. शालि (उबला चावल, बासमती हो तो उत्तम) 14. दही-चावल, 15.इंडरीक = इडली = सूजी, दही, चुटकी भर सोडा, एक चम्मच तेल और नमक डालकर घोल तैयार कर लें इस इडली घोल को 20 मिनट तक ढककर रख दें। इडली स्टैण्ड हो ठीक है वर्ना एक बडा बर्तन गैस पर रख लें, उसमें थोड़ा पानी लें उसमें दो कटोरी रखें, उसके उपर छोटी प्लेट रखें और उसके उपर छोटी कटोरियों में इडली का घोल भरकर रख दें। बर्तन को अच्छी से ढककर 8-10 मिनट भाप में पकने दें फिर ये इडलियाँ भगवान को भोग लगाए।,
16. बिना घी की आटे की पूरियां तल लें 17. अपूप (पुए) = सूजी, आटे में चीनी, गुड़, घी, दही अच्छी से मिलाकर तलकर छोटी-छोटी गोल मीठी पकौड़ियां सी बना लें, 18. गुड़ के लड्डू, 19. शर्करा सहित तिलपिष्ट = साफ तिल चीनी के साथ पीसकर थोड़ा भूनकर कटोरी में रख दें,
20. कर्णवेष्ट = आटा चीनी दूध घी मिलाकर गूंथ लें इसकी लोई बनाकर रोटी की तरह बेल लें फिर चाकू से पतली सी पट्टियां काट लें, हर एक पट्टी को अंगुली की सहायता से कान के कुंडल जैसी गोल बना लें इन गोल आकृतियों को तलकर नैवेद्य के लिए रख लें,
21.शालिपिष्ट= चावल (बासमती हो तो उत्तम) के आटे को घी में भूनकर चीनी मिलाकर प्रसाद बना ले,
22. केला, 23. घृतयुक्त मुद्गपिष्ट : मिक्सी में मूँग दाल का आटा बना ले या फिर मूंग भिगोकर पीसकर, उसमें घी और चीनी डालकर पका ले, 24. गुड़ मिला उबला चावल(भात) द्वादशी के लिए हवन के लिए: घी (अधिक घी न हो तो घी के समाप्त होने के बाद तिल के तेल से भी हवन पूर्ण किया जा सकता है), खीर (आहुति में इसका प्रचुर मात्रा में प्रयोग होना है, आहुतियाँ गिनकर हिसाब से बना ले अन्यथा तिल-जौं आदि हवन सामग्री से ही हवन कर ले, लेकिन स्विष्टकृत हवन में खीर ही प्रयोग होगी), कुल कितनी आहुति देनी हैं हिसाब लगा ले, अगर घी/ खीर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है तो तिल (काले व सफेद) + जौं (तिल से कम मात्रा में) + चावल (जौं से कम) + “हवन सामग्री” का पैकेट।
गोबर व गोमूत्र, पानी, कपूर, रुई की बत्तियां, माचिस, फूल, कुश(या दूब), 4 पवित्र (2 कुश/दूर्वा को साथ बांधकर 1 पवित्र बनता है), समिधा के लिए छोटी सूखी पतली लकड़ियाँ(आम/पीपल आदि वृक्ष की लेकिन काँटेदार पेड़ की न हो), हवन कुंड (या ईंट लगाकर मिट्टी/रेत से वेदी बनाए) । प्रणीता पात्र और प्रापण पात्र ( न हों तो 2कटोरे ले) । स्रुक स्रुव ( न हों तो खीर होम करने के लिए चम्मच ले, घृत होम के लिए आम/पीपल की पत्ती लें)। तिलक के लिए रोली अक्षत। ब्रह्माजी के लिए दक्षिणा ।
आचार्य व ब्राह्मण को दान के लिए:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️अन्न, वस्त्र (धोती, अंगोछा, टोपी का कपड़ा अंगूठी (छल्ले), जूते/चप्पल, दक्षिणा, आचार्य-पत्नी भी बुलाई हैं तो साड़ी-बिंदी आदि इच्छानुसार दें। आचार्य को या सबको फल, अन्न (साबुत दाल, चावल), मिठाई दे सकते हैं। पीतल/तांबे / मिट्टी से बने कलश व विष्णु मूर्ति के दान का भी महत्व है। इसके अलावा सबके लिए समय से भोजन तैयार करवा ले ।
भगवान ने कहा 👉 "हे अर्जुन! अब उद्यापन की विधि को मैं कहता हूं। यदि सामर्थ्यवान मनुष्य श्रद्धा से हजार 'स्वर्ण मुद्रा' दान दे और असमर्थ व्यक्ति एक 'कौड़ी' भी यदि श्रद्धा से दान दे दे तो उन दोनों का फल एक समान ही है।” दान विधि में जितना बताया है यदि धनसम्पन्न व्यक्ति हो समर्थ हो तो दुगुना दान दे। लेकिन अशक्त मनुष्य यदि उससे आधा भी दान देता है तो वह दान का पूरा फल पाता है। स्वर्ण मुद्रा प्राचीन समय में प्रचलित थी इतना अधिक आज के समय में सम्भव नहीं। अब रुपया प्रचलन में है, अतः व्रती अपनी जैसी सामर्थ्य हो उस अनुसार रुपये का, उपयोगी वस्तुओं का दान करे। विधान के साथ हवन करने में असमर्थ हो तो उसके लिए भी अलग से पंडितजी को दक्षिणा दान दे देनी चाहिए।
एकादशी उद्यापन की शास्त्रोक्त विधि
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दशमी तिथि को 👉 दशमी तिथि के दिन एक समय भोजन करे। इस दिन मंदिर साफ करके पूजा की आवश्यक सामग्रियाँ खरीद लाए । आचार्य वरण के लिए दशमी तिथि की शाम को गुरु / पंडितजी के घर जाए निमंत्रण कह दे। रात्रि को दन्तधावन करके भगवान आगे नियम करे कि, (मैं एकादशी को निराहार रहकर द्वादशी को भोजन करूंगा। हे पुण्डरीकाक्ष भगवन्! मैं आपकी शरण में हूं) अब शयन करे।
एकादशी तिथि को
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हे पार्थ! एकादशी को प्रातःकाल सावधान मन से स्नान आदि करके पाखंडी और पतित नास्तिक लोगों से दूर रहे। संध्या करके नदी, तालाब आदि के शुद्ध जल में या घर पर ही शुद्ध जल में मन्त्र पूर्वक (भगवान का नाम स्मरण करते हुए) स्नान करके पितरों का तर्पण करे (पितरों के नाम से जलांजलि दे दे)| फिर पूजा की सारी सामग्री इकट्ठी कर ले, 24 नैवेद्य बना ले या बनवा ले।
अब गुरु/आचार्य/पंडित को बुलाए, सम्भव हो तो उनकी पत्नी सहित बुलाए । आचार्य शान्त, सर्वगुणसम्पन्न, सदाचारी, वेद-वेदांगों का जानने वाला हो। या फिर किसी पूजा पाठ के जानकार व्यक्ति या किसी योग्य धार्मिक व्यक्ति को पुरोहित आचार्य बनाकर पूजा स्थल पर बुला ले। आदरपूर्वक उन आचार्य का स्वागत करे पूजा स्थल पर सामने आसन देकर उन्हें बैठा दे एवं उनको प्रणाम करके नमस्कार करके प्रार्थना करे। व्रती आचार्य को तिलक करे, फूल चढ़ाए, उसे वस्त्र (धोती / अंगोछा) दान देकर कहे कि, (हे आचार्य, मेरा यह (हरिवासर से सम्बन्ध रखने वाला) व्रत जिस तरह संपूर्ण हो ऐसा उपाय कीजिये।)
सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करके संकल्प करे। हाथ में जल पुष्प तिल लेकर संस्कृत में नीचे लिखे अनुसार संकल्प पढ़ें, कोष्ठक में दिये विकल्प सम्वत्सर, माह, पक्ष आदि सावधानी से चुने। यदि 24 एकादशी व्रत कर लिये हों तो आचरितस्य बोले एकादशी व्रत रखना यदि अभी नहीं शुरु किया हो तो किये जाने वाले व्रत के लिए करिष्यमाणस्य बोले ।
संकल्प:
〰️〰️〰️ॐ गणपतिर्जयति || ॐ विष्णुर् - विष्णुर् विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलि-युगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे आर्य्यावर्तेक देशांतर्गत (* शहर का नाम *) स्थाने, (*संवत्सर का नाम *) नाम्नि संवत्सरे, (*उत्तरायण / दक्षिणायन *) अयने, (*ऋतु का नाम*) ऋतौ, महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे ( हिन्दू मास का नाम *) मासे शुभ (*कृष्ण / शुक्ल*) पक्षे एकादश्यां तिथौ (*वार का नाम*) वासरे (*गोत्र का नाम *) गौत्रः (*व्रतीका नाम* शर्मा/ वर्मा/ गुप्तो दासो) अहं मया ( *व्रत रख दिए तो आचरितस्य बोले / व्रत उद्यापन के बाद रखने वाले हैं तो करिष्यमाणस्य *) (*शुक्ल / कृष्ण * ) एकादशी व्रतस्य साङ्गता-सिद्धयर्थम् तत्सम्पूर्ण फल-प्राप्तयर्थम् देश कलाद्यनुसारतो यथाज्ञानेन (शुक्ल-कृष्ण) एकादशी व्रतोद्यापन-महं करिष्ये तदङ्गत्वेन गणपतिपूजनं पुण्याहवाचनम् आचार्यंवरणंम् च करिष्ये ।
[एकादशी व्रतों की सिद्धि एवम् उसके संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए देश काल के अनुसार यथा ज्ञान एकादशी के व्रत उद्यापन को मैं आज करता हूं, व्रत का भंग न हो जाए इस कारण मैं गणपति पूजन, आचार्य वरण पूर्वक पुण्याहवाचन भी करूंगा या कराऊंगा" संकल्प के पीछे यह भाव छिपा है]
इसके बाद श्रीगणेश जी का पूजन करें
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अपने सामने गणेश जी और दुर्गा जी की मूर्ति/चित्र रख दे जिसकी मूर्ति न हो तो मूर्ति की जगह कटोरे में सुपारी(पूगीफल) रखे, या स्वस्तिक बनाकर पूज सकते हैं। प्रतिष्ठित मूर्ति न हो तो प्रतिष्ठा के लिये हाथ में अक्षत पुष्प लेकर मन्त्र बोले -
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं
यज्ञं समिमं दधातु । विश्व देवास इह मादयंताम् ॐ प्रतिष्ठ ॥ गणपति देवस्य प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः चरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, श्री गणपति गौरीमावाहयामि, प्रतिष्ठापयामि पूजयामि नमः ।
हाथ में पुष्प लेकर श्रीगणेश एवं दुर्गाजी का ध्यान करें गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ॥ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै प्रणताः स्मताम् ॥
श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ध्यानार्थे पुष्पम् समर्पयामि । (श्रीगणेश व दुर्गा जी पर फूल चढ़ाकर नमस्कार करें)
गंध👉 श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, गन्धम् समर्पयामि। (चन्दन का तिलक लगाएँ।)
अब हाथ में फूल लेकर बोले :
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ॐ सुमुखश्चैक दन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो गणाधिपः ।। धूम्रकेतुः गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा संग्रामे संकटेश्चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। ॐ सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।। ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे, निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम् । ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन | ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः । (फूल चढ़ाएँ।)
धूप: धूप दिखाएँ
〰️〰️〰️〰️〰️ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, धूपं आघ्रापयामि।
दीप:
〰️〰️ एक दीपक जलाएँ व निम्न मंत्र से दीप दिखाएँ : ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दीपं दर्शयामि ।
नैवेद्य
〰️〰️ बताशे फल आदि नैवेद्य अर्पित करें :
शर्कराखंडखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च। आहारं भक्ष्य भोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नैवेद्यं निवेदयामि ॥ (नैवेद्य निवेदित करें।)
अब आचमनी से जल छोड़ते हुए बोलें 👉 नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
तांबूल👉 इलायची, लौंग, सुपारी युक्त पान अर्पित करें ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मुखवासार्थम् एलालवंग ताम्बूलं समर्पयामि ॥
इसके पश्चात हाथ जोड़कर श्री गणेशाम्बिका की प्रार्थना करें👉
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय
जगद्धिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञ विभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥
लम्बोदर नमस्तुभ्यं नमस्ते मोदकप्रिय । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमाता शर्वाणी हरवल्लभा सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भव्या भाव्या भयापहा नमो नमस्ते ॥ 'अनया पूजया श्रीगणेशाम्बिका प्रीयन्ताम्' कहकर जल छोड़ दें।
षोडश मातृका पूजन
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एक कटोरे पर रोली से 16 बिंदु दे दे। अब निम्न मन्त्र पढ़ते हुए उन बिंदुओं पर अक्षत, जौ, गेहूँ चढ़ाते जाए:
"गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया, देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातरः ॥ धृति पुष्टि-स्तथा तुष्टि रात्मनः कुलदेवता गणेशे नाधिका होता वृद्धौ पूज्याश्च षोडशः । ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः ॥ श्रीगणेश गौरी सहित षोडशमातृकाम् आवाहयामि, स्थापयामि।”
अब अक्षत लेकर बोले : ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य
बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयंताम् ॐ प्रतिष्ठ ॥ अब अक्षत "षोडश
मातृका" पर छोड़ दे।
अब "ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः
गंधम् समर्पयामि।" से षोडश मातृका पर आचमनी द्वारा चन्दन मिश्रित जल छिड़क दे
"ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः धूपम् आघ्रापयामि " बोलकर धूप जला दे "
ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः दीपम् 11 दर्शयामि " दीप दिखा दे
"ॐ आयुरारोग्यमैश्वर्यं ददध्वं मातरो मम । निर्विघ्नं सर्वकार्येषु कुरुष्वं सगणाधिपाः ॥ ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः नैवेद्यम्-ऋतु फलं च निवेदयामि |" बताशे और फल का नैवेद्य रख दे
आचमन के लिए षोडश मातृका पर जल छिड़के "ॐ गणेश गौरी सहित षोडश मातृकाभ्यो नमः दक्षिणा समर्पयामि।" दक्षिणा चढ़ा दे फूल और अक्षत लेकर बोले "अनया पूजया श्री षोडश मातृका प्रीयताम् नमः" अक्षत उन 16 माताओं पर चढ़ा दे
क्षेत्रपाल पूजन
〰️〰️〰️〰️〰️ एक कटोरे पर चंदन से त्रिशूल की आकृति बनाकर “ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, क्षेत्रपाल भैरवम् आवाहयामि पूजयामि नमः शुभम् कुरू" बोलकर अक्षत-पुष्प चढ़ा दें।
ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, नैवेद्यम् निवेदयामि बोलकर गुड/उड़द-लौंग चढ़ा दे(पूजा के बाद इसे किसी पेड़ की जड़ में डाले) ।
अब हाथ जोड़कर पूजा की आज्ञा माँगते हुए बोलें👉
“तीक्ष्ण दंष्ट्र महाकाय कल्पांत दहनोपम। भैरवाय नमस्तुभ्यम् अनुज्ञां दातु मर्हसि ॥” अब ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः बोलकर फूल चढ़ा दें।
क्रमशः👉 यहाँ शब्द सीमा होने के कारण दूसरा भाग अगली पोस्ट मे दिया जा रहा है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
[ हिदोपदेश, मित्रलाभ- ४ ]
अर्थात् 👉🏻 संसार के समस्त द्रव्यों में उत्तम विद्यारूपी धन ही है , क्योंकि न यह चुराई जा सकती है , न इसका कोई मोल लगा सकता है तथा न इसका कभी क्षय ही हो सकता है ।
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 ##🌺 विजया एकादशी🙏 #🙏विजया एकादशी🪔 #🌸 विजया एकादशी 🪔 #विजया एकादशी🌸
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*परमात्मा की इच्छा से ब्रह्मा जी ने सुंदर सृष्टि की रचना की , अनेक प्रकार के जीन बनाए | पर्वत , नदियां , पेड़-पौधे सब ईश्वर की कृपा से इस धरा धाम पर प्रकट हुये | ईश्वर समदर्शी है ! वह कभी भी किसी से भेदभाव नहीं करता है | ईश्वर की प्रतिनिधि है प्रकृति और प्रकृति सबको बराबर बांटने का प्रयास करती है | सूर्य जब आसमान पर चमकता है तो यह विचार नहीं करता कि किसी को प्रकाश अधिक दे दे और किसी को कम | सुंदर , शीतल , सुगंधित वायु जब प्रवाहित होती है तो वह सबको बराबर स्पर्श करते हुए निकलने का प्रयास करती है | इसी प्रकार ईश्वर के बनाए हुए वृक्ष सबको समान फल देने का प्रयास करते हैं | अब यहां प्रश्न यह है कि जब ईश्वर समदर्शी है तो सबको बराबर लाभ क्यों नहीं मिलता ? ईश्वर ने तो सबके लिए बराबर व्यवस्था है कि अब यह अलग विषय है कि कौन उसका लाभ लेना चाहता है और कौन नहीं | सूर्य की ऊष्मा यद्यपि सबके लिए बराबर है परंतु इसका लाभ वही ले पाता है जो धूप में आकर बैठता है | वृक्षों में लगे हुए फल सबके लिए हैं परंतु प्राप्त उसी को होंगे जो कर्म करते हुए उनके पास तक जाएगा | कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर ने सबके लिए समान साधन उपलब्ध कराये हैं परंतु उसके लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ता है | यह सृष्टि कर्म प्रधान है , बिना कर्म किए यहां कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता और कर्म करने वालों के लिए सब कुछ उपलब्ध है | जो कर्महीन होते उन्हें कुछ भी नहीं प्राप्त हो पाता | बाबा जी ने मानस में लिखा है "सकल पदारथ है जग माही ! कर्महीन नर पावत नाही !!" कहने का तात्पर्य यह है कि सब कुछ यहां उपलब्ध है परंतु कुछ भी प्राप्त करने के लिए कर्म करना ही पड़ता है बिना कर्म की कुछ भी प्राप्त हो पाना संभव नहीं है | मानव जीवन का परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति बताया गया है और भगवत्प्राप्ति करने का साधन सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है परंतु मनुष्य ईश्वर की साधना - उपासना नहीं कर पाता और जब दूसरों को भक्ति के पथ पर अग्रसर देता है तो अपने मन ही मन में विचार करता है ईश्वर ने अमुक साधक को अपनी भक्ति प्रदान कर दी परंतु हमें नहीं प्राप्त हो पाई | इसका कारण है कि ईश्वर भेदभाव करता है | ईश्वर भेदभाव कदापि नहीं करता है जिन लोगों ने कुछ प्राप्त किया है उन्होंने कर्म को माध्यम बनाकर के वह सफलताएं अर्जित की है और कर्म रूपी अस्त्र , कर्म रूपी साधन सबके लिए ईश्वर ने समान रूप से उपलब्ध कराया है जो भी इस रहस्य को समझ जाता है वह कभी भी ईश्वर को भेदभाव करने वाला कह ही नहीं सकता |*
*आज के यांत्रिक युग में मनुष्य इतना व्यस्त हो गया है कि उसे यह तक ज्ञात नहीं रह गया है कि हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए | आज मनुष्य थोड़ा सा कष्ट आ जाने पर ईश्वर को दोषी बताने लगता है परंतु वह स्वयं अपनी पत्नी , अपने बच्चे और अपना परिवार इससे आगे नहीं निकल पाता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि जब एक उपदेशक/कथावाचक व्यास गद्दी पर बैठ कर भगवान के उपदेशों को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करता है तो वह यह विचार नहीं करता कि हमारा उपदेश किसी को ज्यादा मिल जाए किसी को कम | वह ध्वनि विस्तारक यंत्र के माध्यम से सबको समान रूप से उपदेश देता है परंतु उसी जनमानस में कुछ लोग उसका लाभ ले लेते हैं और कुछ लोगों के द्वारा पूरा समय व्यतीत कर देने के बाद भी यह नहीं समझ आता उपदेशक ने क्या बता दिया , क्योंकि उन्होंने उस उपदेश का लाभ लेने का प्रयास ही नहीं किया | ठीक उसी प्रकार ईश्वर सबको बराबर बांट रहा है परंतु सभी लोग इसका लाभ लेना ही नहीं चाहते | जिस प्रकार एक पिता के चार पुत्र होते हैं और वह सबके लिए समान व्यवस्थाएं करता है परंतु उसके चारों पुत्र उन व्यवस्थाओं का लाभ लेकर सफल हो ही जाए यह आवश्यक नहीं है | पिता ने तो सबके लिए समान व्यवस्था की परंतु सभी पुत्र उसका लाभ नहीं ले पाते , ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी सबके लिए समान व्यवस्था करता है परंतु ईश्वर की कृपा उसी को मिलती है जो ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाता है अन्यथा जीवन भर ईश्वर का , समाज का एवं परिवार का दोष मानते हुए उसका जीवन व्यतीत हो जाता है | ईश्वर को भेदभाव करने वाला मानने वाले स्वयं भेदभाव करने के रोग से ग्रसित हैं क्योंकि उनको अपने परिवार के अतिरिक्त और कोई दिखाई नहीं पड़ता | जो कुछ भी करना चाहते हैं अपने परिवार के लिए ही करना चाहते हैं | जिस दिन मनुष्य अपने परिवार से ऊपर उठकर समभाव से सबके लिए विचार करने लगता है , चिंतन करने लगता है उसी दिन उसको ईश्वर भी समदर्शी दिखाई पड़ने लगता है अन्यथा जब हम स्वयं समदर्शी नहीं बन पाए हैं तो ईश्वर की समदर्शिता हमको नहीं दिखाई पड़ सकती है |*
*हम दूसरों पर दोषारोपण करने में सिद्धहस्त हो गए हैं | जिस दिन हम स्वयं समदर्शी हो जाएंगे उसी दिन हमें सारा संसार और ईश्वर भी समान रूप से व्यवहार करने वाले दिखने लगेगें |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#🙏 प्रेरणादायक विचार
#☝आज का ज्ञान
|| जीवन का प्रसाद ||
जीवन का एक सत्य यह भी है, कि संग्रह किया गया विषाद बन जाता है और बाँटा गया प्रसाद बन जाता है। उपयोग, उपभोग और नाश शास्त्रों में धन की ये तीन गतियां बताई गई हैं। धन से जितना आप चाहो सुख के साधनों को अर्जित करो बाकी बचा धन सृजन कार्यों में, सद्कार्यों में, श्रेष्ठ कार्यों में लगे अपने जीवन का ऐसा अभ्यास बनाओ। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो समझ लेना फिर आपका धन नाश को प्राप्त होने वाला है।
जो लोग धन का दुरूपयोग अथवा अनुपयोग करते हैं समझो वो उसका नाश ही कर रहे हैं। दुनिया आपको इसलिए याद नहीं करती कि आपके पास बड़ा धन है अपितु इसलिए याद करती है कि आपके पास बड़ा मन है और आप केवल धन का अर्जन ही नहीं करते अपितु आवश्यकता पड़ने पर विसर्जन भी करते हैं। केवल धन के अर्जन से समाज में आपका महत्व नहीं बढ़ जाता अपितु अर्जन के साथ-साथ विसर्जन ही समाज में किसी व्यक्ति को मूल्यवान एवं विशिष्ट बनाता है।
🙏जय श्री राधे कृष्ण🙏
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽह- मृतूनां कुसुमाकरः ॥
[ श्रीमद् भगवद्गीता के १०वें अध्याय- विभूतियोग का ३५वां श्लोक ]
अर्थात् 👉🏻 श्री भगवान बोले- मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम एवं छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा माहों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ ।
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
#🙏गीता ज्ञान🛕
#वेद पुराण
वेद पुराणों से जुड़ी जानकारी .....
शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है:- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है।
वेदों में क्या है?
वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। वेद चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।
ऋग्वेद :ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।
यजुर्वेद :यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।
सामवेद : साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसी से शास्त्रिय संगीत और नृत्य का जिक्र भी मिलता है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें संगीत के विज्ञान और मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।
अथर्वदेव :थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसमें भारतीय परंपरा और ज्योतिष का ज्ञान भी मिलता है।
उपनिषद् क्या है?
उपनिषद वेदों का सार है। सार अर्थात निचोड़ या संक्षिप्त। उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। ईश्वर है या नहीं, आत्मा है या नहीं, ब्रह्मांड कैसा है आदि सभी गंभीर, तत्व ज्ञान, योग, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि की बातें उपनिषद में मिलेगी। उपनिषदों को प्रत्येक हिन्दुओं को पढ़ना चाहिए। इन्हें पढ़ने से ईश्वर, आत्मा, मोक्ष और जगत के बारे में सच्चा ज्ञान मिलता है।
वेदों के अंतिम भाग को 'वेदांत' कहते हैं। वेदांतों को ही उपनिषद कहते हैं। उपनिषद में तत्व ज्ञान की चर्चा है। उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गए हैं, जैसे- 1. ईश, 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छांदोग्य, 10. बृहदारण्यक, 11. कौषीतकि और 12. श्वेताश्वतर।
षड्दर्शन क्या है?
वेद से निकला षड्दर्शन : वेद और उपनिषद को पढ़कर ही 6 ऋषियों ने अपना दर्शन गढ़ा है। इसे भारत का षड्दर्शन कहते हैं। दरअसल यह वेद के ज्ञान का श्रेणीकरण है। ये छह दर्शन हैं:- 1.न्याय, 2.वैशेषिक, 3.सांख्य, 4.योग, 5.मीमांसा और 6.वेदांत। वेदों के अनुसार सत्य या ईश्वर को किसी एक माध्यम से नहीं जाना जा सकता। इसीलिए वेदों ने कई मार्गों या माध्यमों की चर्चा की है।
गीता में क्या है?
महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता में भी कुल 18 अध्याय हैं। 10 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। वेदों के ज्ञान को नए तरीके से किसी ने व्यवस्थित किया है तो वह हैं भगवान श्रीकृष्ण। अत: वेदों का पॉकेट संस्करण है गीता जो हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र ग्रंथ है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। गीता को बार बार पढ़ने के बाद ही वह समझ में आने लगती है।
गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है।
गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकासक्रम, हिन्दू संदेवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म, कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी, देवता, उपासना, प्रार्थना, यम, नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है।
श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है, जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। गीता को अर्जुन के अलावा और संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने- 574, अर्जुन ने- 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने- 1 श्लोक कहा है।
#☝आज का ज्ञान
जामवंत रामायण के एक ऐसे पात्र हैं जिनके विषय में बहुत विस्तार से नहीं लिखा गया है। हालाँकि रामायण में ही उनके विषय में केवल एक-दो चीजें ऐसी बताई गयी है जिनसे आप उनके बल के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। आइये उन्हें देखते हैं।
पहली बात तो जामवंत सतयुग के व्यक्ति थे। अब सतयुग में निःसंदेह योद्धा अन्य युगों की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली होते थे। उनकी उत्पत्ति सीधे ब्रह्माजी से बताई गयी है। अब परमपिता ब्रह्मा से जो जन्मा हो उसकी शक्ति के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
रामचरितमानस में उनके पराक्रम के बारे में दो घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन दोनों स्थानों पर जामवंत का युद्ध रावण और मेघनाद के साथ हुआ था जिसमें दोनों को जामवंत ने अपने पाद प्रहार से मूर्छित कर दिया था। मेघनाद की शक्ति तो उन्होंने अपने हाथों से ही पकड़ कर पलट दी थी। अत्यंत वृद्धावस्था में भी जो रावण और मेघनाद जैसे योद्धाओं को अपने घात से मूर्छित कर दे, जरा सोचिये युवावस्था में उसका बल क्या होगा।
जब द्वापर आया और जामवंत और अधिक बूढ़े हो गए, उस समय उनका युद्ध श्रीकृष्ण से हुआ था। जनमवंत को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण को उनसे एक-दो नहीं बल्कि 28 दिनों तक युद्ध करना पड़ा। स्वयं परमेश्वर कृष्ण को जिसे परास्त करने में अट्ठाइस दिन लग गए हों, वो भी वृद्धावस्था में, जवानी में उनके बल के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं।
जब सीता माता को खोजने के लिए समुद्र लांघने की बात चल रही थी उस समय जामवंत कहते हैं कि "मैं तो अब बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, फिर भी इस समुद्र में मैं 90 योजन तक जा सकता हूँ।" हनुमान जी अपनी युवावस्था में 100 योजन छलांग गए, जामवंत की आयु उस समय 6 मन्वन्तर की बताई गयी है। एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षों का होता है, फिर भी वे 90 योजन तक जाने की क्षमता रखते थे, इसी से उनके बल का पता चलता है।
इस वार्तालाप के दौरान उन्होंने युवावस्था में अपने बल के बारे में दो बातें बताई जिसे ध्यान से सुनना आवश्यक है। इससे आपको जामवंत की वास्तविक शक्ति का पता चलेगा।
पहली घटना तब की है जब समुद्र मंथन चल रहा था जिसे देवता और दैत्य मिलकर बड़ी मुश्किल से कर पा रहे थे। उस समय जामवंत ने अपनी जवानी के जोश में एक बार अकेले ही सम्पूर्ण मंदराचल पर्वत को घुमा दिया था। मंदराचल को अकेले घुमाने के लिए कितनी शक्ति चाहिए होगी, क्या आपको अंदाजा है?
दूसरी घटना भगवान विष्णु के वामन अवतार की है। जब श्रीहरि ने विराट स्वरुप लिया और एक पैर से स्वर्ग को नाप लिया। फिर जब उन्होंने अपना पैर पृथ्वी को नापने के लिए उठाया, उस दौरान जामवंत ने केवल 7 पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। जरा सोचिये महावीर हनुमान एक ही रात में लंका से सैकड़ों योजन दूर से पर्वत शिखर उखाड़ कर ले आये लेकिन जामवंत ने केवल सात पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। एक पल लगभग 24 सेकंड का होता है। क्या आप उनकी गति का अनुमान लगा सकते हैं?
उस उनके बल का ऐसा वर्णन सुनकर जब अंगद उनसे पूछते हैं कि उनका बल क्षीण कैसे हुआ? तब वे बताते हैं कि जब वे पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे तो अंतिम परिक्रमा के समय उनके पैर के अंगूठे का नाख़ून महामेरु पर्वत से छू गया, जिससे उसका शिखर खंडित हो गया। इसे अपना अपमान मानते हुए मेरु ने जामवंत को ये श्राप दे दिया कि वो सदा के लिए बूढ़ा हो जाएगा और उसका बल क्षीण हो जाएगा।
आशा है आपको जामवंत की शक्ति का कुछ अंदाजा हो गया होगा। किन्तु इतने शक्तिशाली होने के बाद भी उनमें लेश मात्र भी घमंड नहीं था।
जय श्रीराम।🙏🏻
#जय श्री हनुमान
।। राम।।
श्रीमद्भागवत प्रसंग
एक व्यक्ति हनुमानजी के मन्दिर गया उसको कोई सन्तान नहीं थी, उसने हनुमानजी से आराधना की, हे हनुमानजी! आपकी कृपा से सभी दुर्गम कार्य सुगम हो जाते है- "दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते" कृपा करें मुझे एक सुन्दर सा बेटा अगर मिले तो मैं आपको हीरों का हार चढाऊं, पुजारी ने कहा कोई चिंता मत कीजिये हम आपकी ओर से अनुष्ठान करेंगे, पुजारी को भी लोभ था हीरे का हार चढेगा तो अपने को ही मिलेगा।
चालीस दिन का पाठ किया, संयोग से, सौभाग्य से उनकी पत्नी गर्भवती हो गई, निश्चित समय के उपरांत इनको पुत्र रत्न पैदा हो गया, बेटे का नाम रखा हीरालाल, छोटे बच्चों को कोई हीरालाल नहीं बोले, सभी बोले ओ हीरा-हीरा, पुजारी को पता लगा कि सेठजी को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, बडे खुश हुये कि अब तो जरूर हीरे का हार चढेगा, तीन महीने का बालक हो गया, पत्नी ने कहा चलो जी मन्दिर में पूजा कर आएं, मनौती तो पूरी हो गयी, सेठजी बोले रूक अभी बालक को थोडा और बडा होने दे।
दो साल का हो गया, तो पति ने कहा पाँच वर्ष का हो जाएगा तो मुण्डन के बाद चलेंगे, बालक पाँच वर्ष का हो गया तो पत्नी ने फिर कहा, हमने हनुमानजी के वहाँ जो बोला हुआ है वह पूरा करना है, देवता के सामने मनौती जो रखी जाती है वह पूरी की जाती है अन्यथा अशिष्ट हो सकता है, चलिए न अपने यहाँ कमी किस बात की है, इसी बालक के नाम पर एक हीरे का हार चढाने को कहा है तो वह चढा देते हैं, आदमी तो आदमी है जब तक काम पूरा नहीं होता प्रार्थना के लिए भाव होते हैं, काम पूरा होते ही प्रार्थना के और भाव हो जाते हैं।
पत्नि ने बहुत आग्रह किया तो एक दिन तय हो गया, अच्छा चलो हनुमानजी को हीरे का हार चढाएं, पुजारी को भी समाचार मिल गया, सेठजी आ रहे हैं हीरे का हार चढाने, मन्दिर धोया, चोला चढाया, दीपक और अगरबत्ती जलाई, अब पूजा सब हो गयी, माथा टेक दिया बार-बार पत्नि भी देखे पुजारी भी देखे सेठजी के हीरो का हार, पत्नि ने कहा हीरे का हार चढाओ, लडके के गले में सुन्दर फूलों का हार पहनाकर ले गए थे और वह उतार कर हनुमानजी के चरणों में चढा दिया, बोले यह लो हीरे का हार, बोले क्या मतलब?
बोले हीरा ही तो है लडका और इसी का हार तो मैं चढा रहा हूँ, गले की माला चढाकर चले गये, भजन में चतुराई, जीवन में चतुराई, दूसरे का पैसा कैसे अपनी जेब में आए इसी चतुराई में हम डूबे है, जो मन के विकारों को छोड़कर भजन में लगा दे वही मन चतुर है, हम लोग उसी को चतुर मानते हैं जो जैसे-तैसे पैसा कमा ले, हम उदाहरण देते हैं देखो वह कितना चतुर व समझदार हैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया।
हनुमान गुणी चातुर का अर्थ है सब कुछ छूट सकता है किन्तु प्रभु की सेवा से प्रभु की भक्ति से, रावण को समझाया है हनुमानजी ने बडी चतुराई से, रावण किसी की बात सुनने को तैयार नहीं, पत्नी की, परिवार की सुनने को तैयार नहीं, मानस में तो संकेत है कि कुम्भकर्ण ने समझाया, मेघनाथ ने समझाया, उनकी भी सुनने को तैयार नहीं, हनुमानजी ने चारों प्रकार से रावण को समझाया साम, दाम, दण्ड, भेद।
साम माने समझाकर,"विनती करहुँ जोरि कर रावण, सुनहु मान तजि मोर सिखावन" मन्दोदरी ने समझाया, विभीषण ने समझाया माल्यवंत, मारीच, कालनेमि, अंगदजी सभी ने समझाया, दाम यानि लोभ से समझाया! अरे रावण, "राम चरण पंकज उर धरहू, लंका अचल राजु तुम्ह करहू" नहीं माना, दण्ड से, भय से समझाया अगर तुम नहीं मानोगे तो "संकर सहस विष्णु अज तोही, सकहिं न राखि राम कर द्रोही" फिर तुमको ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी नहीं बचा पाएंगे, तुम रामद्रोह छोड दो और भेद से यानि कपट से भी समझा दिया।
सज्जनों, हनुमानजी ने सारी लंका जलाकर राख कर दी केवल "एक विभीषण, कर गृह नाहीं" रावण और विभीषण में भेद डाल दिया और परिणाम यह हुआ कि अंत में विभीषण रावण को छोड़कर राम की शरण में आ गया, वैसे इसमें बुराई नहीं है, अज्ञानतावश, मानसिक कमजोरी के कारण अगर कोई दुर्जन के चंगुल में सज्जन फँस गया तो येन-केन प्रकारेन दुर्जन के चंगुल से निकालकर परमात्मा के सम्पर्क में ले आना कपट नहीं है बल्कि नीति है तो दुर्जन से सज्जन को हनुमानजी ने दूर कर दिया।
रावण को जब यह पता लगा कि पूरी लंका जल गयी केवल विभीषण का घर बचा है तो रावण का माथा उसी समय ठनक गया था कि यह विभीषण लगता है कि इस वानर से अन्दर ही अन्दर मिला हुआ है, इसी ने उसे मृत्युदण्ड से बचाया है, "नीति विरोध न मारिय दूता" इसी ने बोला था, "आन दण्ड कछु करिअ गोसाँई" और उसी आग को रावण ह्रदय में लिए बैठा रहा, अंत में रावण ने विभीषण पर लात का प्रहार कर दिया, जा उसी तपस्वी की शरण में जा, तो साम, दाम, दण्ड, भेद चारों नीतियों का जो जीवन में पालन करता हो वह चतुर नहीं अति चतुर है।
सज्जनों, हनुमानजी महाराज रामकाज करने को आतुर हैं, "रामकाज करबे को आतुर" और हम सब कामकाज करने को आतुर हैं, जब देखो यही सुनने को मिलता है, बडे जरूरी काम से जा रहा हूँ, कहाँ गए थे? बडे जरूरी काम से, कहाँ जा रहे हो, बड़े जरूरी काम से, भैया न रात न दिन, न सुबह न शाम चौबीस घण्टे काम ही काम, श्रीहनुमानजी रामकाज में और हम लोग कामकाज में, श्रीहनुमानजी रामकाज करिबे को आतुर और हम सभी कामकाज करिबे को आतुर, देखो रामकाज और कामकाज ये कोई विरोधाभाषी नहीं इन दोनों में कोई विरोध नहीं है।
दोनों बिल्कुल एक है कई बार हम लोग कहते हैं काम काज में डूबे हैं, राम काज कैसे कर पाएंगे इनको अलग अलग मत समझिए, भजन करने में सब कुछ छोड़कर बैठ जाने को भजन नहीं कहा है, यह तो आलस्य हैं कुछ काम नहीं है तो कहते हैं कि हम भजन कर रहे हैं, हम कई सज्जनों को देखते हैं कि वे आराम कर रहे हैं कहते हैं हम तो अनुष्ठान कर रहे हैं, बढिया बढिया माल खा रहे हैं कहते हैं कि हमारा तो उपवास चल रहा है, हमारा व्रत चल रहा है, यह चतुराई हैं यह चालाकी है, भजन माने पलायनवाद नहीं, आलस्य नहीं है, सब कुछ छोड़कर किसी कमरे में कैद हो जाना भजन नहीं है, भजन का अर्थ है सब कुछ भगवान् से जोड देना यही रामकाज है।
जय श्री रामजी
जय श्री हनुमानजी
।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।
जय हो!!!! जय सिया राम🚩🚩🚩🚩













