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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *मानव जीवन में गुरु शब्द का बहुत महत्व है | जो आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाय वही गुरु है | अंधकार क्या है ? इस पर हमारे मनीषियों ने बताया है कि अज्ञानता ही अंधकार है | जो अज्ञानता से निकालकर ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित कर दे वही गुरु है | गुरु शब्द की इतनी महत्ता है कि इसे सृष्टि में सबसे ऊँचे स्थान पर प्रतिष्ठित करते हुए पारब्रह्म की संज्ञा दी गयी है | मनुष्य जीवन में गुरु का अत्यधिक महत्व है। वेदों में मातृदेवो भव , पितृदेवो भव के बाद तीसरे स्थान पर गुरु को देवतुल्य माना गया है | गुरु को इतना महत्व देने की क्या जरूरत है ? कबीरदस जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं :- बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो बताय ! अर्थात:- गुरु ही है जो गोविंद तक पहुँचने की राह बताता है | वही है जो गोविंद की पहचान बता सकता है | इसीलिए गुरु की बलिहारी है | यह बात समझ में आ जाए तो यह जानना कोई समस्या ही नहीं है कि गुरु को कितना महत्व देना है | गुरु के पास है वह ज्ञान जो ईश्वर तक ले जाने में सहायक होता है | ईश्वर तक जाना है एक-एक सीढ़ी चढ़ कर , और उस सीढ़ी पर ईश्वर के पहले गुरु खड़ा है | इसीलिए तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं :- "बंदऊं गुरु पद कंज , कृपा सिंधु नर रूप हरि ! महामोह तम पुंज , जासु वचन रवि कर निकर !! इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है |* *आज गुरु शब्द का अर्थ ही बदलकर रह गया है | आज गुंडे - मवालियों के समाज में गुरु शब्द का प्रचलन कुछ अधिक ही हो गया है | वैसे भी आजकल जो कुछ गुरु-शिष्य परंपरा में देखने को मिल रहा है , वह हास्यास्पद है | आज प्रत्येक व्यक्ति को लग रहा है कि किसी रेडीमेड गुरु को पकड़ो , झटपट दीक्षा लो और बस निवृत्त हो जाओ | गुरु भी अपना परिवार (शिष्यों का) बढ़ाने में लगे हैं , चाहे किसी व्यक्ति में शिष्य होने की पात्रता हो या नहीं | पहले जो गुरु थे , उन्हें उचित पात्र की चिंता रहती थी | शिष्य ऐसे मिलें कि गुरु के मंत्र को आत्मसात कर सकें , उसकी साधना कर सकें और उससे समाज का , विश्व का हित करें | परंतु आज मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज भौतिक संपदा प्राप्त करने के लिए गुरु बनाए जा रहे हैं | परमात्मा किसे चाहिए और किसे समाज की चिंता है ? पूर्व के शिष्यों के जीवन पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि उनके गुरुओं ने न केवल उन्हें मार्ग दिखाया , बल्कि उनकी क्षमताओं और सार्मथ्य से उनका परिचय करा दिया | लेकिन साधना के कठिन पथ पर तो ये शिष्य खुद ही चले | गुरु को हम मानें , उसके बताए मार्ग पर चलें , लेकिन अगर हम सोचते हैं कि उसके पीछे भागने से सब कुछ मिल जाएगा , तो यह हमारी भूल है | जब तक हम स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करेंगे , हम प्रगति नहीं कर सकते | स्वयं को जानने के लिए हमें बाहर नहीं भागना है , बल्कि अंतर्यात्रा करनी है , यह तभी होगा जब हम संसार में रहते हुए भी हम निरासक्त होना सीखें | परंतु आज जो परिवेश आश्रमों में बन चुका है , उससे तो यही प्रतीत होता है कि आज शिष्य अपने गुरुओं को भौतिक संपदा प्रदान कर प्रसन्न होते हैं |* *आज गुरु दीक्षा परमात्मा को पाने के लिए नहीं , बल्कि संसार के सुख पाने के लिए दी और ली जा रही है | कमी गुरुओं में है या शिष्यों में , इसका उत्तर तो गुरु और शिष्य ही दे सकते हैं |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #❤️जीवन की सीख
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🌟|| प्राप्ति ही नहीं, तृप्ति भी आवश्यक ||🌟 प्राप्ति हमारी प्रसन्नता का मापक नहीं अपितु तृप्ति हमारे जीवन में प्रसन्नता का मापक है। केवल वाह्य सुख साधनों से किसी की सफलता अथवा प्रसन्नता का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। हमारा बौद्धिक स्तर ही हमें किसी घटना से अधिक अथवा कम प्रभावित करता है। आंतरिक सूझ-बूझ के अभाव में एक धनवान व्यक्ति भी उतना ही दुःखी हो सकता है, जितना एक निर्धन व्यक्ति और आंतरिक समझ की बदौलत एक निर्धन व्यक्ति भी उतना ही सुखी हो सकता है जितना एक धनवान। जीवन में प्रायः संग्रह करने वालों को रोते और बांटने वालों को हँसते देखा गया है। सुख और दुःख का मापक हमारी आंतरिक प्रसन्नता ही है। किस व्यक्ति ने कितना पाया यह नहीं अपितु कितना तृप्ति का अनुभव किया, यह महत्वपूर्ण है। सकारात्मक सोच के अभाव में जीवन बोझ बन जाता है। सत्संग से, भगवदाश्रय से, महापुरुषों की सन्निधि से ही जीवन में विवेकशीलता एवं आंतरिक समझ का उदय होता है। 🙏 जय श्री राधे कृष्ण🙏 #🙏 प्रेरणादायक विचार #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
🙏 प्रेरणादायक विचार - सुविचार दौलत सिर्फ रहन सहन का स्तर बदल सकती है बुद्धि, नीयत और तक़दीर नहीं सुविचार दौलत सिर्फ रहन सहन का स्तर बदल सकती है बुद्धि, नीयत और तक़दीर नहीं - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः। नश्यत्यचिन्तनेनैव विनेन्धनमिवानलः।। अर्थात् 👉🏻 चिंता को चिंतन ( सोच-विचार ) से बढ़ावा मिलता है , जैसे आग को ईंधन से बढ़ावा मिलता है । तथा चिंता को न सोचने से वह समाप्त हो जाती है , जैसे ईंधन के अभाव में आग बुझ जाती है । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷
❤️जीवन की सीख - हाथ का लिखा ज्योतिष पढ़़े वेद पढ़े मन लेख चेहरा का लिखा माँ पढ़़े, मन का पढ़े महादेव..! हाथ का लिखा ज्योतिष पढ़़े वेद पढ़े मन लेख चेहरा का लिखा माँ पढ़़े, मन का पढ़े महादेव..! - ShareChat
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 316) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच हते चित्राङ्गदे भीष्मो बाले भ्रातरि कौरव । पालयामास तद् राज्यं सत्यवत्या मते स्थितः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! चित्रांगदके मारे जानेपर दूसरे भाई विचित्रवीर्य अभी बहुत छोटे थे, अतः सत्यवतीकी रायसे भीष्मजीने ही उस राज्यका पालन किया ।। १ ।। सम्प्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां वरः । भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ।। २ ।। जब विचित्रवीर्य धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँचे, तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीने उनकी वह अवस्था देख विचित्रवीर्यके विवाहका विचार किया ।। २ ।। अथ काशिपतेर्भीष्मः कन्यास्तिस्रोऽप्सरोपमाः । शुश्राव सहिता राजन् वृण्वाना वै स्वयंवरम् ।। ३ ।। राजन् ! उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं, जो अप्सराओंके समान सुन्दर थीं। भीष्मजीने सुना, वे तीनों कन्याएँ साथ ही स्वयंवर सभामें पतिका वरण करनेवाली हैं ।। ३ ।। ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन शत्रुजित् । जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रभुः ।। ४ ।। तब माता सत्यवतीकी आज्ञा ले रथियोंमें श्रेष्ठ शत्रुविजयी भीष्म एकमात्र रथके साथ वाराणसीपुरीको गये ।। ४ ।। तत्र राज्ञः समुदितान् सर्वतः समुपागतान् । ददर्श कन्यास्ताश्चैव भीष्मः शान्तनुनन्दनः ।। ५ ।। वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मने देखा, सब ओरसे आये हुए राजाओंका समुदाय स्वयंवर-सभामें जुटा हुआ है और वे कन्याएँ भी स्वयंवरमें उपस्थित हैं ।। ५ ।। कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु तदा नामसु सर्वशः । एकाकिनं तदा भीष्मं वृद्धं शान्तनुनन्दनम् ।। ६ ।। सोद्वेगा इव तं दृष्ट्वा कन्याः परमशोभनाः । अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया ।। ७ ।। उस समय सब ओर राजाओंके नाम ले-लेकर उन सबका परिचय दिया जा रहा था। इतनेमें ही शान्तनुनन्दन भीष्म, जो अब वृद्ध हो चले थे, वहाँ अकेले ही आ पहुँचे। उन्हें देखकर वे सब परम सुन्दरी कन्याएँ उद्विग्न-सी होकर, ये बूढ़े हैं, ऐसा सोचती हुई वहाँसे दूर भाग गयीं ।। ६-७ ।। वृद्धः परमधर्मात्मा वलीपलितधारणः । किं कारणमिहायातो निर्लज्जो भरतर्षभः ।। ८ ।। मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यति भारत । ब्रह्मचारीति भीष्मो हि वृथैव प्रथितो भुवि ।। ९ ।। इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः । वहाँ जो नीच स्वभावके नरेश एकत्र थे, वे आपसमें ये बातें कहते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे- 'भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीष्म तो बड़े धर्मात्मा सुने जाते थे। ये बूढ़े हो गये हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो चुके हैं; फिर क्या कारण है कि यहाँ आये हैं? ये तो बड़े निर्लज्ज जान पड़ते हैं। अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके ये लोगोंमें क्या कहेंगे-कैसे मुँह दिखायेंगे? भूमण्डलमें व्यर्थ ही यह बात फैल गयी है कि भीष्मजी ब्रह्मचारी हैं' ।। ८-९ ।। वैशम्पायन उवाच क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चक्रोध भारत ।। १० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! क्षत्रियोंकी ये बातें सुनकर भीष्म अत्यन्त कुपित हो उठे ।। १० ।। भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः । उवाच च महीपालान् राजञ्जलदनिःस्वनः ।। ११ ।। रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः। आहूय दानं कन्यानां गुणवद्भ्यः स्मृतं बुधः ।। १२ ।। अलंकृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि । प्रयच्छन्त्यपरे कन्या मिथुनेन गवामपि ।। १३ ।। राजन् ! वे शक्तिशाली तो थे ही, उन्होंने उस समय स्वयं ही समस्त कन्याओंका वरण किया। इतना ही नहीं, प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीष्मने उन कन्याओंको उठाकर रथपर चढ़ा लिया और समस्त राजाओंको ललकारते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा - 'विद्वानोंने कन्याको यथाशक्ति वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके गुणवान् वरको बुलाकर उसे कुछ धन देनेके साथ ही कन्यादान करना उत्तम (ब्राह्म विवाह) बताया है। कुछ लोग एक जोड़ा गाय और बैल लेकर कन्यादान करते हैं (यह आर्ष विवाह है) ।। ११-१३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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#श्री गणेशाय नमः 🛐।। श्रीहरि:।।🛐 ---------------------------------------- ‼️परमात्मा में प्रेम और महात्मा में श्रद्धा कल्याणकारी है ‼️ ---------------------------------------- 🍀पापों का नाश भगवान् के भजन से होता है | जब ऐसी बात है तो हम भगवान् का भजन क्यों नहीं करते ? 🍀 🤹यह हमारी मूर्खता है | भजन तो करते हैं – संसार का करते हैं; प्रेम भी करते हैं – संसार से करते हैं, यही मूर्खता है | जो कुछ हुआ सो हुआ; अब भगवान से प्रेम करना चाहिये | नाम में यह सब बातें भरी हुई हैं | दीखती नहीं ? तार में क्या बिजली दीखती है ? किन्तु हाथ रखो ! पता लग जायगा | इसी प्रकार भजन का प्रभाव है |भजन करके देख लो ! सारे गुण नाम में भरे हैं | जो नाम का जप करता है, उसमें सारे गुण आ जाते हैं | नाम का सेवन करने से उनमे भगवान् के गुण आ जाते हैं | नाम और नामी एक ही हैं, भेद नहीं है | चाहे नाम का सेवन करो, चाहे नामी का करो | एक ही बात है | नाम का जप करने से नामी का चिन्तन हो जाता है |🤹 🧘शुकदेव जी के नाम का उच्चारण करेंगे तो शुकदेव जी के गुण हमारे में आने लगेंगे, उनका स्वरूप याद आयेगा; इसलिये नाम के अधीन रूप है | इसीलिये यह बात कही जाती है कि नाम में सारे गुण भरे हुए हैं |🧘 🌷इसलिये नाम का जप होना चाहिये | स्वरूप स्मरण साथ में हो तो और भी अच्छा है | इसलिए हमें भजन और सत्संग करना चाहिये | इससे ही प्रेम होता है और प्रेम से भगवान् मिलते हैं | ध्यान की बात आपको पहले बताई | ध्यान नहीं लगे तो भजन, सत्संग करना चाहिये | उससे ध्यान लग जाता है | जिन आदमियों का ध्यान नहीं लगा है, उनको ध्यान की युक्तियाँ सत्संग से ही तो मिली | भजन करने से अन्त:करण शुद्ध होकर ध्यान लगता है |🌷 👩‍❤️‍👩हमें संसार से वैराग्य करना चाहिये | संसार से वैराग्य होने से मन स्वत: ही भगवान् में लग जाता है | संसार से प्रेम हटाने का नाम ही वैराग्य है |👩‍❤️‍👩 ⁉️संसार से प्रेम कैसे हटे |⁉️🌍संसार में अवगुण देखें | संसार के तत्व को देखें | यह अस्थायी है, दु:खरूप है, खतरे की चीज है, घृणा करने लायक है | इस तरह की बात जँच जाय तो मन स्वत: ही इससे हट जायगा | संसार के दोषों की बात सुनते रहो | दोष की बात सुनने से श्रद्धा, प्रेम हट जाता है |🌍 🛐इसी प्रकार महात्मा के दोषों की बात सुनोगे तो उनमे श्रद्धा, प्रेम हट जायगा | संसार के दोष सुनते रहोगे तो उनमे मन जायगा ही नहीं | भगवान् के गुण, प्रभाव, प्रेम की बात सुनते रहो, फिर आपका मन भगवान् को छोड दुसरे में नहीं जायगा | आपने निराकार सहित ध्यान की बात पूछी सो बता दी | फिर भी ध्यान नहीं लगे तो भजन-सत्संग करना चाहिये |🛐 🙏नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण ! 🙏
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#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख आज की कहानी मै पढ़िए की बहुत सारे लोगो को कुछ न कुछ बात का घमंड होता है। वो चाहे पैसे का हो, अपनी सुंदरता का हो या अपनी प्रतिष्ठा का हो, लेकिन होता जरूर है। घमंड से कुछ हासिल हो या ना हो ,लेकिन आपके पास जो भी है वो घमंड की वजह से चला जा सकता है जिस किसी के अंदर घमंड पनपने लगता है, उसका पतन वही से शुरू हो जाता है। आइये एक कहानी की और चलते है। और आप इससे शिक्षा ले सभी पढ़े और एक शेयर जरुर करे। एक लड़का था, उसके पापा की इतनी बड़ी कंपनी थी की अमरीका में बैठे-बैठे, अफ्रीका की सरकार को गिरा दे। उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी, पैसा, सत्ता सब उनके हाथ में था। लेकिन पैसा कमाते-कमाते वो अपने बच्चे को समय नहीं दे पाए। इसके बदले में बच्चे ने अपनी मनमानी करना शुरू किया, उसको कोई कुछ कहने वाला नहीं था। जैसे-जैसे बड़ा होता चला गया, उसको लगने लगा की, उसका कोई क्या बिगड़ सकता है ?? वो अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं था। एक दिन वो एक बड़ी होटल में कॉफ़ी पीने के लिए गया। वहाँ पर नज़दीक से एक नौकर गुज़र रहा था। नौकर के हाथ से एक कॉफ़ी का गिलास गिर गया। उस लड़के के नज़दीक में गिलास गिरने की वजह से वो लड़का चिल्लाया, और कहा की, साले अंधे तुझे दिखाई नहीं देता ?? बेवफ़ूक कही का। न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते है। इतना बोलते ही उसने कहा की तुम्हारे मैनेजर को बुलाओ, नौकर के बहुत मना कर ने पर भी वो नहीं माना। उतनी देर में वहां पर मैनेजर आ पहुँचता है। मैनेजर को लड़का कहता है की मुझे तुम्हारे कर्मचारी बिलकुल पसंद नहीं आये। में ये होटल खरीद के अपने कर्मचारी रखूँगा। उसने मैनेजर को कहा की मुझे इस होटल के मालिक से बात करवाओ। मैनेजर के लाख कहने पर भी लड़का नहीं माना। उसने होटल के मालिक से बात की और कहा की मुझे तुम्हारी होटल खरीदनी है। आपको कितना पैसा चाहिए ?? होटल का मालिक उसे पहचान गया। और सोच रहा था की, अगर में उसको मेरी ये होटल नहीं बेचूंगा तो ये मेरा बिज़नेस बर्बाद कर देगा। इसलिए होटल के मालिक ने होटल की कीमत 400 करोड़ कही। लड़के ने अपने मैनेजर को कॉल करके 800 करोड़ का चेक बनवाया। और इस तरह से उसने होटल को खरीद लिया। एक छोटी सी बात के लिए उसने इतना बड़ा हंगामा कर लिया। इस बात से साफ पता चलता है की, इसके अंदर कितना घमंड था। लेकिन एक दिन ऐसा आता है की उसके पापा की मृत्यु होती है, अब कारोबार उसके कंधो पे आ जाता है। कभी कारोबार में ध्यान नहीं देने की वजह से वो कारोबार को अच्छे से संभाल नहीं पाया। और एक दिन एक बड़े नुकसान की वजह से ऐसी नौबत आयी की उसको अपना घर, गाड़ी सब कुछ बेच देना पड़ा। उसके घमंडी स्वभाव के कारन कोई उसकी मदद के लिए भी नहीं आया। अब न तो उसको पास खाने के लिए पैसे थे और न रहने के लिए घर था। तो मेरे प्यारे,जब तक आप अपने दायरे में रहकर काम करते हो तब तक कोई परेशानी नहीं है, लेकिन जिस दिन आपने उस दायरे से बाहर जाने की कोशिश की तब आप मुश्किल में आ सकते हो।
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#☝आज का ज्ञान किसी भी बीमारी को नष्ट करने में असरकारक है यह नाम त्रय अस्त्र मंत्र! विष्णु भगवान के तीन नामों को महारोगनाशक अस्त्र कहा गया है। अर्थात् इस तीन नाम के जप से कैंसर, किडनी, पैरालाइसिस आदि जैसी बड़ी से बड़ी बीमारी का संकट भी टल जाता है। जो पूरे विष्णु सहस्रनाम को पढ़ने में असमर्थ हैं और किसी भयंकर व्याधि से पीड़ित हैं तो साधना में बैठकर भगवान विष्णु जी के इन तीन नामों का कम से कम 108 बार जाप प्रतिदिन सुबह अथवा शाम में करें। जप नहीं कर सकते तो कॉपी या डायरी लेकर इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार लिखें। लिखने के बाद कॉपी को इधर-उधर रखने की जगह अपने पूजा कक्ष में रखें। कोई बहुत बीमार है, और वो जाप नहीं कर सकता, लिख नहीं सकता, तो उनके परिवार का कोई सदस्य उनके सिरहाने बैठकर कम से कम 108 बार मंत्र जाप करे ताकि उनके कानों में मंत्र जाए। इस मंत्र के उदय की कथा:- मां ललिता त्रिपुरा महासुन्दरी और भंडासुर के मध्य जब युद्ध हुआ उस समय व्याधिनाशक इस महाअस्त्र मंत्र का उदय हुआ था। युद्ध में पराजय जानकर भंडासुर ने महारोगास्त्र का प्रयोग किया, जिसे मां त्रिपुरा सुंदरी ने इस नामत्रय अस्त्र मंत्र का निर्माण कर उस महारोगास्त्र को नष्ट कर दिया। उसके बाद से ही किसी भी बीमारी को नष्ट करने में इस मंत्र का उपयोग सनातन धर्म में होता आ रहा है। यह नामत्रय मंत्र है:- ॐ अच्युताय नमः ॐ अनंताय नमः ॐ गोविंदाय नमः इन तीन नामों की महिमा गाते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:- अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारण भेषजात्। नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्। हां, यह मंत्र काम तभी करेगा जब आपको भगवान विष्णु में संपूर्ण आस्था हो, उनके समक्ष आपका संपूर्ण समर्पण हो। वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् 🙏
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#महाभारत 🙏🌹एक गाय की सत्यनिष्ठा 🌹🙏 (महाभारत का एक प्रसंग) 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 महाभारत में एक प्रसंग है। चंद्रावती पुरी में चंद्रसेन नाम का एक राजा था। उसी राज्य के एक गांव में हरि भक्त ब्राह्मण के घर बहुला नाम की गाय थी। वह हंस के समान श्वेत थी। यमुना तट के निकट एक पर्वत की गुफाओं में अनेक जीव जंतु रहते थे। पर्वत के पास नदी के किनारे गायें घास चरने जाया करती थी। इन्हीं गायों के साथ बहुला गाय भी घास चरने जाती थी। एक दिन बहुला घास चरते चरते पर्वत के निकट आ गई। तभी पास की गुफा से एक भयंकर सिंह निकला और गाय की तरफ तेजी से झपटा और बोला कि, मैं तुझे खा जाऊंगा। वह गाय अपने बछड़े को याद करके रोने लगी तथा सिंह से बोली- ‘मुझे मृत्यु का भय नहीं है, जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है, किंतु मेरा बछड़ा अभी दूध पीता है, मुझे उससे बड़ा प्रेम है, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा, अत: मैं उसको दूध पिला कर वापस आ जाऊंगी, तब तुम मुझे खा लेना।’ मुझे मुर्ख समझती है? इस तरह झूठ बोलकर मरने से बचना चाहती है! घर में जाकर तू अपने बछड़े को छोड़कर क्या पुन: वापस आएगी? बहुला बोली कि ‘यदि मैं वापस ना आऊं तो मुझे गुरु हत्या जैसा घोर पाप लगे और घोर पातक कृत्यों का जो फल मिलता है, वह मुझे मिले यदि मैं वापस ना आऊं! ऐसा कहकर गाय ने वापस आने की शपथ ली। सिंह को गाय की बातों पर विश्वास हो गया और वह आश्वस्त हो गया कि वह वापस आएगी। सिंह की अनुमति से गाय घर आ गई। उसे देखकर बछड़ा दौड़ता हुआ उसके पास आया। गाय ने उसे चूमा तथा दूध पिलाया, किंतु बछड़े को यह आभास हो गया कि उसकी मां बहुत दुखी है। उसने मां से दुखी होने का कारण पूछा, तो बड़े उदास मन से बहुला ने बताया कि उसे सिंह के पास वापस जाना है, ऐसा वचन देकर वह आई है। सिंह उसको मार कर खा जाएगा। यह कहकर मां बोली- बेटा! आज जी भर कर देख लो, कल से हमारी भेंट नहीं होगी। इस पर बछड़ा बोला मैं तुम्हारे बदले में सिंह के पास चला जाऊंगा। माँ ने उसे समझा कर नकार दिया। फिर वह गाय अपनी सहेली गायों के पास गई। उनसे अंतिम भेंट की। सभी गायों के मना करने पर भी बहुला गाय सब से विदा लेकर पर्वत की ओर चल दी और वह सिंह के पास जाकर बोली-‘ मैं आ गई हूं, मुझे खाकर अपनी भूख मिटाओ। वह क्रूरता सिंह गौ माता के सत्य पालन के आगे नतमस्तक हो गया और बोला-‘ हे माता! मैं तुम्हें नहीं खाऊंगा, चाहे भूख से मेरी मृत्यु ही क्यों ना हो जाए। सत्य बोलने वाला कहीं दुख पाता है? सत्य में सर्वधर्म है। सत्य में ज्ञान तथा मुक्ति है। धन्य है वह भूमि जहां तुम रहती हो। धन्य है वह लोग जो तुम्हारा दूध पीते हैं। सिंह ने भविष्य में जीव मात्र की हिंसा छोड़ दी, वह गाय से बोला-हे माता! हमारे अपराधों को क्षमा करो तथा अपने घर जाओ। जीव मात्र की हिंसा के त्याग के प्रभाव से, सिंह को मोक्ष की प्राप्ति हुई। विशेष :: यह कथा महाभारत से ली गई है और "*सत्य*" की महिमा का बखान करती है l 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 इसी कथा को बहुला चतुर्थी व्रत में इस प्रकार कहा गया है l बहुला चतुर्थी व्रत की प्रचलित कथा...। बहुला चतुर्थी व्रत से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप लेकर अवतार लिया। कामधेनु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई। भगवान श्रीकृष्ण का बहुला गाय से बड़ा स्नेह था। एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में चर रही थी तब भगवान सिंह रूप में प्रकट हो गए। मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली, 'हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है। बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी।' सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं, तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा ही रह जाऊंगा। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आऊंगी। बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया। बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई। बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि 'हे बहुला, तुम परीक्षा में सफल हुई। अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ-माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा।' 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 🙏🌹🌺गीता ज्ञान🌺🌹🙏 मूल श्लोकः दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।। ।।16.5।।इन दोनों सम्पत्तियोंका कार्य बतलाया जाता है --, जो दैवी सम्पत्ति है? वह तो संसारबन्धनसे मुक्त करनेके लिये है? तथा आसुरी और राक्षसी सम्पत्ति निःसन्देह बन्धनके लिये मानी गयी है। निश्चित बन्धनका नाम निबन्ध है? उसके लिये मानी गयी है। इतना कहनेके उपरान्त अर्जुनके अन्तःकरणमें यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर? कि क्या मैं आसुरी सम्पत्तिसे युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पत्तिसे भगवान् बोले -- हे पाण्डव शोक मत कर? तू दैवी सम्पत्तिको लेकर उत्पन्न हुआ है। अर्थात् भविष्यमें तेरा कल्याण होनेवाला है। विशेष ::हमेशा याद रखो तामसिक भोजन आसुरी सम्पति का निर्माण करता है अतः सात्विक आहार ही खाये l तामसिक आहार से शने: शने: बुद्धी मंद होती जाती है और अज्ञान, जड़ता एवं मूढमति बनाती है और अंततः अधम योनि में जन्म मिलता है l ये भी ध्यान मे रखना चाहिए कि ईश्वर ने मनुष्य को दुर्लभ योनि इसलिये कहा है कि उसके पास 3 दिव्य कोष है वे है 1. बुद्धी, 2. महतत्त्व यानि मन जहां विचारो का उत्पादन होता है और 3. अहंकार l ईन तीनों दिव्य कोषों को तामसिक आहार मन्द कर देता है /नष्ट कर देता है और अंत में अधम योनि मे प्रवेश होता है l 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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#❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #👫 हमारी ज़िन्दगी ⁉️प्रश्न:- किसी की हर छोटी बात पर भी मुझे गुस्सा आ जाता है स्थिति वाद-विवाद तक पहुँच जाती है , इससे कैसा बचा जाए?⁉️ ✍️उत्तर:- Chemistry में कुछ gases होते हैं जिन्हें Inert Gases बोला जाता है । वह किसी भी chemical से कोई Reaction नहीं देते । आप जानते हैं , उनके इस व्यवहार के कारण वैज्ञानिकों ने उनका नाम रखा है - Noble Gases । वह सब Noble हैं । मतलब *महान* हैं । जो जल्दी react करते हैं, हर बात पर , हर chemical पर , उनको Kerosene में , किसी reagent में डुबा कर रखा जाता है , जैसे Sodium । Sodium हवा या पानी के सम्पर्क में आते ही blast कर देता है। तो उसको पचास तरीके से बाँध कर रखा जाता है और उसको Scientist कहते हैं Alkali metals।✍️ ⁉️ये elements react क्यों करते हैं ?? ⁉️ 🧘इसके पीछे का कारण सुनिए , वह सभी elements react करते हैं जल्दी जिसके Outer most shell electrons से खाली होंगे । जो जितना अंदर से जितना खाली होगा , वह उतने जल्दी react करेगा । जो अंदर से जितना ज्यादा भरा होगा , वह उतना कम react करेगा ।। और यह जितने reactive substance या metal या elements हैं , सभी react इसलिए करते हैं ताकि वह अपने अंदर का खालीपन जो electrons द्वारा है , उसे भरकर Noble Elements बन जाये । और Noble elements या Inert Elements इसलिए नहीं react करते क्योंकि वह सम्पूर्ण होते हैं । उनके अंदर खालीपन नहीं होता । वह *पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते* वाली स्थिति में होते हैं ।🧘 🌍तो हमें इस संसार में Inert बनना है । और हम inert कैसे बन सकते हैं ?? 🌍 🤹बस अपने मन बुद्धि अंतःकरण में हरि गुरु के चिंतन के अलावा उसे कभी खाली न रखें । खाली रहेंगे अंदर से , आनंद से वंचित रहेंगे ।अंदर से तो सदा उस खालीपन के कारण छोटी छोटी बातों का reaction देंगे ही देंगे । इसलिए सदा अपने अंतःकरण को भगवान के नाम , रूप , लीला , गुण , धाम और उनके सन्तों से भरकर रखें । सांसारिक बातों के लिए कोई स्थान न दें । तभी हम Noble या महान बन पायेंगे । ये हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है कि हमें कहाँ कब कितना react करना है । 🤹 ‼️तब धीरे धीरे यह भी हुनर आ जायेगा और बाहर बाहर से react करके अंतःकरण पर कोई असर नहीं पड़ेगा ।‼️
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#जय श्री राम श्री राम की उपासना भारतीय अध्यात्म में 'राम' नाम को महामंत्र माना गया है। भगवान शिव के अनुसार, "राम" नाम विष्णु सहस्रनाम के समान फलदायी है। श्री राम की भक्ति से जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—की प्राप्ति अत्यंत सरल हो जाती है। यहाँ इसकी विस्तृत व्याख्या दी गई है: 1. धर्म की प्राप्ति (Righteousness) श्री राम स्वयं "विग्रहवान धर्मः" अर्थात् साक्षात् धर्म के स्वरूप हैं। उनकी उपासना से व्यक्ति के भीतर निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं: * कर्तव्य बोध: राम जी का जीवन एक आदर्श पुत्र, भाई, पति और राजा का है। उनकी भक्ति करने से साधक को अपने सांसारिक कर्तव्यों को धर्मपूर्वक निभाने की शक्ति मिलती है। * चरित्र निर्माण: उपासना से मन के विकार (काम, क्रोध, लोभ) शांत होते हैं और व्यक्ति सत्य, मर्यादा और अनुशासन के मार्ग पर चलने लगता है, जो धर्म का मूल है। 2. धन की प्राप्ति (Wealth/Prosperity) श्री राम भगवान विष्णु के अवतार हैं और माता सीता साक्षात् लक्ष्मी स्वरूपा हैं। जहाँ राम का वास होता है, वहाँ लक्ष्मी स्वतः ही निवास करती हैं: * स्थिर लक्ष्मी: राम जी की भक्ति से प्राप्त धन नीतिगत और न्यायपूर्ण होता है, जो कुल में सुख और शांति लाता है। * दरिद्रता का नाश: 'रामचरितमानस' के अनुसार, राम नाम के जप से मानसिक और भौतिक दरिद्रता दूर होती है। भक्त हनुमान जी की कृपा भी प्राप्त होती है, जो अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता हैं। * सफलता: श्री राम की कृपा से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, जिससे व्यापार और करियर में उन्नति होती है। 3. मोक्ष की प्राप्ति (Liberation) अध्यात्म में "राम" नाम को 'तारक मंत्र' कहा गया है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाता है: * अंतिम गति: काशी में भगवान शिव स्वयं मरते हुए प्राणी के कान में 'राम' नाम फूंकते हैं ताकि उसे मोक्ष प्राप्त हो सके। * माया से मुक्ति: राम की अनन्य भक्ति साधक को संसार के मोह-माया के बंधनों से ऊपर उठा देती है। * परम पद: गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार, "राम भगति बिनु मुति न होई।" अर्थात् बिना राम की भक्ति के जीव को परम पद (वैकुंठ या प्रभु के चरणों में स्थान) प्राप्त नहीं हो सकता। उपासना के सरल उपाय * नाम जप: निरंतर "राम" या "जय सिया राम" का मानसिक जाप करना। * रामायण/रामचरितमानस का पाठ: प्रभु के गुणों का गान और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना। * शरणागति: पूर्ण विश्वास रखना कि "प्रभु ही मेरे रक्षक हैं।" श्री राम की उपासना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है जो मनुष्य को सांसारिक सुख (धन) देते हुए श्रेष्ठ आचरण (धर्म) की ओर ले जाती है और अंततः ईश्वर में विलीन (मोक्ष) कर देती है।
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