#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१९९
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
एक सौ अठारहवाँ सर्ग
सीता-अनसूया-संवाद, अनसूयाका सीताको प्रेमोपहार देना तथा अनसूयाके पूछनेपर सीताका उन्हें अपने स्वयंवरकी कथा सुनाना
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
तपस्विनी अनसूयाके इस प्रकार उपदेश देनेपर किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाली विदेहराजकुमारी सीताने उनके वचनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया॥१॥
'देवि! आप संसारकी स्त्रियोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। आपके मुँहसे ऐसी बातोंका सुनना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। नारीका गुरु पति ही है, इस विषयमें जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहलेसे ही विदित है॥२॥
'मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन) तथा जीविकाके साधनोंसे रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधाके इनकी सेवामें लगी रहती॥३॥
'फिर जब कि ये अपने गुणोंके कारण ही सबकी प्रशंसाके पात्र हैं, तब तो इनकी सेवाके लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखनेवाले, धर्मात्मा तथा माता-पिताके समान प्रिय हैं॥४॥
'महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्याके प्रत्ति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथकी दूसरी रानियोंके साथ भी करते हैं॥५॥
'महाराज दशरथने एक बार भी जिन स्त्रियोंको प्रेमदृष्टिसे देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माताके समान ही बर्ताव करते हैं॥६॥
'जब मैं पतिके साथ निर्जन वनमें आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्याने मुझे जो कर्तव्यका उपदेश दिया था, वह मेरे हृदयमें ज्यों-का-त्यों स्थिरभावसे अङ्कित है॥७॥
पहले मेरे विवाह-कालमें अग्निके समीप माताने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है॥८॥
'धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनोंने अपने वचनोंद्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है। स्त्रीके लिये पतिकी सेवाके अतिरिक्त दूसरे किसी तपका विधान नहीं है॥९॥
'सत्यवान्की पत्नी सावित्री पतिकी सेवा करके ही स्वर्गलोकमें पूजित हो रही हैं। उन्हींके समान बर्ताव करनेवाली आप (अनसूया देवी) ने भी पतिकी सेवाके ही प्रभावसे स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया है॥१०॥
'सम्पूर्ण स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह स्वर्गकी देवी रोहिणी पतिसेवाके प्रभावसे ही एक मुहूर्तके लिये भी चन्द्रमासे बिलग होती नहीं देखी जाती॥११॥'इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्मका पालन करनेवाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्मके बलसे देवलोकमें आदर पा रही हैं'॥१२॥
तदनन्तर सीताके कहे हुए वचन सुनकर अनसूयाको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा—॥१३॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीते! मैंने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहती हूँ॥१४॥
'मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है। उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?'॥१५॥
उनका यह कथन सुनकर सीताको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तपोबलसम्पन्न अनसूयासे मन्द मन्द मुसकराती हुई बोलीं—'आपने अपने वचनोंद्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं है'॥१६॥
सीताके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ अनसूयाको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं—'सीते! तुम्हारी निर्लोभतासे जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुममें जो लोभहीनताके कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी॥१७॥
'यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ। विदेह-नन्दिनि सीते! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगी। ये सब तुम्हारे ही योग्य है और सदा उपयोगमें लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेगी॥१८-१९॥
'जनककिशोरी! इस दिव्य अङ्गरागको अङ्गोंमें लगाकर तुम अपने पतिको उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शोभा बढ़ाती है'॥२०॥
अनसूयाकी आज्ञासे धीर स्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीताने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हारको उनकी प्रसन्नताका परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया। उस प्रेमोपहारको ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूयाकी सेवामें बैठी रहीं॥२१-२२॥
तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीतासे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अनसूयाने कोई परम प्रिय कथा सुनानेके लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥२३॥
'सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्रने तुम्हें स्वयंवरमें प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है॥२४॥
'मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहती हूँ। अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूपसे मुझे बताओ'॥२५॥
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सीताने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूयासे कहा—'माताजी! सुनिये।' ऐसा कहकर उन्होंने उस कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥२६॥
'मिथिला जनपदके वीर राजा 'जनक' नामसे प्रसिद्ध हैं। वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः क्षत्रियोचित कर्ममें तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हैं॥२७॥
'एक समयकी बात है, वे यज्ञके योग्य क्षेत्रको हाथमें हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वीको फाड़कर प्रकट हुई। इतनेमात्रसे ही मैं राजा जनककी पुत्री हुई॥२८॥
'वे राजा उस क्षेत्रमें ओषधियोंको मुट्ठीमें लेकर बो रहे थे। इतनेहीमें उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गोंमें धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्थामें मुझे देखकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ॥२९॥
'उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोदमें ले लिया और 'यह मेरी बेटी है' ऐसा कहकर मुझपर अपने हृदयका सारा स्नेह उड़ेल दिया॥३०॥
'इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतः मानवी भाषामें कही गयी थी (अथवा मेरे विषयमें प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी—दिव्य थी)। उसने कहा—'नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है'॥३१॥
'यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेशने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी॥३२॥
'उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानीको, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया। उन स्नेहमयी महारानीने मातृसमुचित सौहार्दसे मेरा लालन-पालन किया॥३३॥
'जब पिताने देखा कि मेरी अवस्था विवाहके योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्तामें पड़े। जैसे कमाये हुए धनका नाश हो जानेसे निर्धन मनुष्यको बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाहकी चिन्तासे बहुत दुःखी हो गये॥३४॥
'संसारमें कन्याके पिताको, वह भूतलपर इन्द्रके ही तुल्य क्यों न हो, वरपक्षके लोगोंसे, वे अपने समान या अपनेसे छोटी हैसियतके ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है॥३५॥
'वह अपमान सहन करनेकी घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ताके समुद्रमें डूब गये। जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ताका पार नहीं पा रहे थे॥३६॥
'मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पतिका विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥३७॥
'सदा मेरे विवाहकी चिन्तामें पड़े रहनेवाले उन महाराजके मनमें एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्रीका स्वयंवर करूँगा॥३८॥
'उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञमें प्रसन्न होकर महात्मा वरुणने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दिये॥३९॥
'वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न करनेपर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे। भूमण्डलके नरेश स्वप्नमें भी उस धनुषको झुकानेमें असमर्थ थे॥४०॥
'उस धनुषको पाकर मेरे सत्यवादी पिताने पहले भूमण्डलके राजाओंको आमन्त्रित करके उन नरेशोंके समूहमें यह बात कही—॥४१॥
'जो मनुष्य इस धनुषको उठाकर इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसीकी पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है॥४२॥
'अपने भारीपनके कारण पहाड़-जैसे प्रतीत होनेवाले उस श्रेष्ठ धनुषको देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठानेमें समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये॥४३॥
'तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्रजीके साथ मेरे पिताका यज्ञ देखनेके लिये मिथिलामें पधारे। उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिका बड़ा आदर-सत्कार किया॥४४-४५॥
'तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पितासे बोले—'राजन्! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुषका दर्शन करना चाहते हैं। आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीरामको दिखाइये॥४६॥
'विप्रवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर पिताजीने उस दिव्य धनुषको मँगवाया और राजकुमार श्रीरामको उसे दिखाया॥४७॥
'महाबली और परम पराक्रमी श्रीरामने पलक मारते-मारते उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कानतक खींचा॥४८॥
'उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीचसे ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो॥४९॥
'तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जलका उत्तम पात्र लेकर श्रीरामके हाथमें मुझे दे देनेका उद्योग किया॥५०॥
'उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथके अभिप्रायको जाने बिना श्रीरामने राजा जनकके देनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण किया॥५१॥
'तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथकी अनुमति लेकर पिताजीने आत्मज्ञानी श्रीरामको मेरा दान कर दिया॥५२॥
'तत्पश्चात् पिताजीने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिलाको लक्ष्मणकी पत्नीरूपसे उनके हाथमें दे दिया॥५३॥
'इस प्रकार उस स्वयंवरमें पिताजीने श्रीरामके हाथमें मुझको सौंपा था। मैं धर्मके अनुसार अपने पति बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीराममें सदा अनुरक्त रहती हूँ'॥५४॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥११८॥*
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*इस संसार में मनुष्य में बुद्धि - विवेक विशेष रूप से परमात्मा द्वारा प्रदान किया गया है | मनुष्य अपने विवेक के द्वारा अनेकों कार्य सम्पन्न करता रहता है | इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण है मनुष्य का दृष्टिकोण , क्योंकि मनुष्य का दृष्टिकोण ही उसके जीवन की दिशाधारा को तय करता है | एक ही घटना को अनेक मनुष्य भिन्न - भिन्न दृष्टिकोण से देखते हुए उसका वर्णन करते हैं | छोटी - छोटी घटनाओं में दृष्टिभेद से ही मनुष्य के देखने के नजरिये में अन्तर हो जाता है | मनुष्य के दृष्टिकोण का निर्माण उसके चिंतन पर निर्भर करता है ! किसी भी व्यक्ति या वस्तु के विषय में जो जैसा चिंतन करता है उसके प्रति उसका वैसा ही दृष्टिकोण हो जाता है | प्रत्येक व्यक्ति में गुण एवं अवगुण विद्यमान रहते हैं , यदि मनुष्य का चिंतन गुणों की ओर होता है तो मनुष्य शांति एवं प्रसन्नता का अनुभव करता है वहीं निराशावादी एवं अवगुणवादी मनुष्य अपने चारों ओर अभावों एवं दोषों का दर्शन करते रहते हैं जिसके परिणास्वरूप उसके जीवन में शांति एवं प्रसन्नता का अभाव ही रहता है | जो भी मनुष्य सकारात्मक दृष्टिकोण से संसार को देखते हुए अभाव को भाव , विषाद को हर्ष एवं दु:ख को सुख में बदलने की कला जानता है उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक एवं सफल होता है | यह मनुष्य का दृष्टिकोण ही है कि छोटा सा दु:ख भी उसे पहाड़ जैसा दिखने लगता है और वह स्वयं को संसार का सबसे दु:खी एवं अभागा समझने लगता है जबकि यदि वह सकारात्मक दृष्टिकोण से यह विचार करे कि संसार में हमसे भी ज्यादा दु:खी लोग बहुतायत मात्रा में हैं तो उसका दु:ख स्वयं समाप्तप्राय हो जायेगा | अत: मनुष्य को सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए |*
*आज प्रायः मनुष्य अपने परिवार के वातावरण , व्यवसाय और नौकरी से असंतुष्ट और दुखी प्रतीत होता है , जबकि वह दूसरे परिवारों में व्यवसाय में , नौकरी में अधिक सुख , शांति , वैभव एवं उन्नति के दर्शन करता है , परंतु जब वह उनकी अंतरंग स्थिति से परिचित होता है तो उसे स्वयं के इस दृष्टिकोण पर हंसी आती है | यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है कि वह स्वयं को सबसे अधिक दुखी समझता है इस प्रवृति से छुटकारा पाने की आवश्यकता है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि दूसरों के परिवार सकारात्मक एवं सुखी समझने वाले लोग जब उस परिवार के साथ दो दिन रहते हैं तब उनको यह प्रतीत होता है कि इससे अच्छा तो हमारा ही परिवार है | जैसे दूर से देखने में पर्वत बहुत ही मनोरम दिखाई पड़ता है परंतु जैसे-जैसे उसके नजदीक पहुंचो पर्वत का मनोरम स्वरूप अदृश्य हो जाता है एवं उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है | कहने का तात्पर्य है सुखी एवं दुखी दोनों तरह के मनुष्यों के लिए अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना बहुत आवश्यक है , इससे जहां सुख का अभिमान मिट जाता है वही दु:ख का भाव और तनाव भी समाप्त हो जाता है | मनुष्य को ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाना है | ऐसा करके वह इस दु:खी संसार में भी सुखी रह सकता है | जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण का होना बहुत ही आवश्यक है |*
*दूसरों को देखकरके उनके जैसा बनना , उनके जैसा पाना यह प्रवृत्ति मनुष्य को सिर्फ भीड़ का हिस्सा बना कर छोड़ देती है | वहीं यदि मनुष्य सकारात्मक दृष्टिकोण से अपने कार्य का आंकलन करें तो वह स्वयं एक सफल व्यक्ति बन सकता है |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#☝आज का ज्ञान
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #📖जीवन का लक्ष्य🤔
🌟|| संतुष्टि ही मुक्ति है || 🌟
निश्चित ही अपने जीवन में जो संतुष्ट है, वह मुक्त भी है। यदि जीवन में संतुष्टि का सुख नहीं तो बड़ी से बड़ी सफलता भी प्रसन्नता नहीं दे सकती है। संतुष्टि, व्यक्ति को जीते जी मुक्त करा देती है। संतों का मत है, कि इच्छाओं का शेष रहना और श्वासों का खत्म हो जाना ही मोह एवं इच्छाओं का खत्म हो जाना और श्वासों का शेष रहना ही मोक्ष है। आपने अपना जीवन कितनी संतुष्टि में जिया यही आपकी मुक्ति का मापदंड भी है।
महापुरुषों का जीवन इसलिए सफल अथवा वंदनीय नहीं माना जाता कि उन्होंने बहुत कुछ पा लिया है अपितु इसलिए सफल और वंदनीय माना जाता है, कि उन्होंने जो और जितना पाया है, बस उसी में संतुलन बनाना और संतुष्ट रहना सीख लिया है। संतुष्टि का अर्थ निष्क्रिय हो जाना नहीं अपितु परिणाम के प्रति अपेक्षा रहित हो जाना है। एक संतुष्ट जीवन ही सुखी जीवन व सफल जीवन भी कहलाता है।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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पूर्व जन्म कृतं पापं व्याधि रुपेण बाधते।
तच्छान्ति रौषधैर्दानैर्ज पहोमार्चं नादिभिः।।
भावार्थ:- जीव द्वारा पूर्व जन्म में किया गया पाप वर्तमान जन्म में जीव को नाना प्रकार की व्याधियों के रुप में प्रकट होकर पीड़ा प्रदान करता रहता है, जीव को उसकी शान्ति औषधि के रूप में जप, तप, हवन, यज्ञ, पूजा पाठ, ईश्वर स्मरण और दान आदि धार्मिक अनुष्ठानों को करके निवृत्ति प्राप्त करने का सतत् प्रयास करते रहना चाहिये।
🙏🌹🙏
🙏🌹 सुप्रभात वंदन🌹🙏
#🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #🌞सुप्रभात सन्देश
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏
।।जय श्री राम।।
नवमहुं एकउ जिन्ह के होई।
नारि पुरुष सचराचर कोई।।
भगवान ने शबरी माता से कहा कि माता
यह नौ प्रकार की भक्ति है । शबरी माता ने पूंछा प्रभु इन नौ में कितने प्रकार की भक्ति हों तो कल्याण हो जाता है?। श्री
राम जी ने कहा नौ में पांच सात तीन दो
नहीं, नौ में से यदि एक भी भक्ति किसी के पास है तो उसका कल्याण है।
शबरी माता ने पूंछा प्रभु यह भक्ति करने का अधिकार किसको है? ज्ञान के तो सब अधिकारी नहीं होते हैं?वैराग्यवान ही ज्ञान का अधिकारी होता है। धर्म की व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं यज्ञ के भी सब अधिकारी नहीं होते हैं इसलिए मुझे यह समझाने की कृपा करें कि भक्ति करने का अधिकारी कौन है?।
श्री राम जी ने कहा सबरी माता भक्ति ऐसी है कि इसमें अधिकार वाली कोई बात ही नहीं है। चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो कोई भी हों भक्ति के सब अधिकारी हैं
शर्त केवल यह है कि कपट त्याग दें।
शबरी जी ने कहा भगवान मुझमें तो कोई भक्ति होगी नहीं क्योंकि मैं तो अधम से भी अधम हूं मतिमंद हूं।
गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं देखो भक्त की दीनता देखो। भगवान तो सबरी जी की कुटिया को आश्रम समझ रहे हैं।
(ताहि देइ गति राम उदारा। )
(सबरी के आश्रम पगु धारा )
और सबरी जी अपनी कुटिया को घर समझ रहीहैं(सबरी देखि राम गृह आए )
जब शबरी मैया ने श्री राम जी से पूंछा कि
प्रभु मुझ में तो कोई भक्ति होगी नहीं तब श्री राम जी ने कहा मैय्या तुझ में तो सब तरह की भक्ति है। तुम्हारे पास नौ प्रकार की भक्ति है।
प्रथम भक्ति संतन करि संगा, तो तुम यहां
वन में संतों का संग पाने के उद्देश्य से वन में आई तो तुम्हारे पास यह पहली भक्ति है।दूसरि रति मम कथा प्रसंगा, तो तुमने
महात्माओं के बीच में कथा सुनी तो यह तुम्हारी दूसरी भक्ति है।
मतंग ऋषि का गुरु भाव से आश्रय लिया तो यह तुम्हारी तीसरी भक्ति है।और अब
तक मेरा गुणगान करके मेरी प्रतीक्षा की है तो गुरु आज्ञा का पालन किया राम-राम करते हुए मेरी प्रतीक्षा की तो मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा सज्जन धर्मा का पालन किया।
तुमने अमान होकर मेरा भजन किया किसी ने तुम्हारा अपमान भी किया तो तुमने कोई शिकायत नहीं रखी सपने में भी उनमें कोई दोष नहीं देखा।और आज भी तुम सरल होकर कह रही हो कि मैं अधम हूं। इसलिए शबरी माता तुम्हारे में सभी भक्तियां हैं।
श्री राम जी ने सबरी माता से कहा माता
इस नवधा भक्ति उपदेश देकर एक तरह से मैंने तुम्हारी स्तुति ही की है अब मुझे
आज्ञा दीजिए। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि यदि आप श्री जानकी जी की कोई खबर जानती हों तो बताने की कृपा करें।
सबरी माता ने कहा प्रभु आप पंपा नामक सरोवर पर जाइए वहां आपकी मित्रता सुग्रीव से होगी वह आपको श्री सीता जी का सब हाल बतायेगा।
अब भगवान सबरी माता से विदा लेने लगे। भगवान ने कहा शबरी माता अब मैं जाऊं ?शबरी माता ने कहा प्रभु अभी नहीं। मेरी इन आंखों ने आपको आते हुए देखा है अब अपने से दूर जाते हुए नहीं देख सकती।
शबरी माता कहती है प्रभु आप जब तक ठहरे रहो जब तक मैं नहीं जाती हूं। श्री
राम जी ठहर गए। शबरी माता ने भगवान के चरणों में दृष्टि लगाई। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं।
तजि जोग पावक देह
हरि पद लीन भइ जंह
नहि फिरे।।
शबरी माता भगवान के उस धाम को गई जहां से आना नहीं होता है।अब श्री राम जी भाई श्री लक्ष्मण जी के साथ वन में श्री सीता जी को खोजते हुए आगे की ओर चलते हैं ।
श्री राम जी ने एक अत्यंत सुंदर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया
वृक्ष की सुंदर छाया देखकर श्री राम जी उसके नीचे बैठ गए। श्री लक्ष्मण जी ने देखा कि श्री राम जी वृक्ष के नीचे बैठे हैं
और बंदर वृक्ष के ऊपर बैठे हैं।
लक्ष्मण जी ने श्री राम जी से कहा प्रभु
इन बंदरों में शिष्टाचार वाली कोई बात ही नहीं है। आप वृक्ष के नीचे बैठे हैं और यह वृक्ष के ऊपर बैठे हैं आप कहो तो मैं इन्हें कुछ सबक सिखाऊ?।
श्री राम जी ने मुस्कुराते हुए कहा नहीं लक्ष्मण इन्हें बैठे रहने दो। कहीं नारद जी
आ गये तो कम से कम यह तो उन्हें लगेगा कि राम जी स्वतंत्र नहीं है वह बंदर
वाला श्राप अभी भी इनके सिर पर है इसलिए बंदरों को मेरे सिर पर ही बैठे रहने दो।
श्री राम जी और लक्ष्मण जी के बीच यह वार्तालाप चल ही रहा था कि तबतक नारद जी वहां आ ही पहुंचे। नारद जी ने भगवान को विरह युक्त अवस्था में देखा।
नारद जी समझ गए कि आज भगवान मेरे ही श्राप का परिणाम भोग रहे हैं।
नारद जी श्री राम जी के पास जाते हैं और श्री राम जी और नारद जी के बीच क्या संवाद होता है यह प्रसंग अगली पोस्ट में ।।जय श्री राम।।
#🏋️♂️स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़💪 #🌿आयुर्वेदिक नुस्खों पर चर्चा #💁🏻♀️घरेलू नुस्खे #🌿दादी नानी के नुस्खे #🌿आयुर्वेद
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले दर्द और उनके संभावित कारणों को सरल भाषा में समझाता है। इसमें बताया गया है कि शरीर में होने वाला हर दर्द केवल सामान्य नहीं होता, बल्कि यह किसी अंदरूनी समस्या या पोषण की कमी का संकेत भी हो सकता है।
जैसे कंधे का दर्द पित्त या पाचन से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है, जबकि घुटने का दर्द विटामिन D की कमी से संबंधित हो सकता है। कमर के निचले हिस्से में दर्द किडनी से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है।
हाथों में झुनझुनी या सुन्नपन विटामिन B12 की कमी का संकेत हो सकता है। सीने में जलन आमतौर पर एसिडिटी से जुड़ी होती है, जबकि पैरों में दर्द या तकलीफ शुगर (डायबिटीज) की समस्या से संबंधित हो सकती है। रात में पैरों में ऐंठन मैग्नीशियम की कमी के कारण हो सकती है, और जोड़ों में जकड़न ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी की ओर संकेत करती है।
यह चित्र लोगों को अपने शरीर के संकेतों को समझने में मदद करता है, ताकि समय रहते सही कदम उठाए जा सकें और स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखा जा सके।
⚠️ डिस्क्लेमर:
यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई है। यह किसी भी प्रकार की मेडिकल सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। हर व्यक्ति के शरीर और समस्या अलग हो सकती है, इसलिए यदि आपको लगातार दर्द, कमजोरी या कोई अन्य असामान्य लक्षण महसूस हो, तो तुरंत किसी योग्य डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें। स्वयं उपचार करने से बचें।
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले दर्द और उनके संभावित कारणों को सरल भाषा में समझाता है। इसमें बताया गया है कि शरीर में होने वाला हर दर्द केवल सामान्य नहीं होता, बल्कि यह किसी अंदरूनी समस्या या पोषण की कमी का संकेत भी हो सकता है।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 368)
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तं तथाधिगतं पाण्डुम्मृषयः सह चारणैः ।
अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ।। अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम् । दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ।। समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे । ते समाश्वासिते विप्रैः विलेपतुरनिन्दिते ।।
इस प्रकार मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए पाण्डु के पास चारणों सहित सभी ऋषि-मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे। अस्ताचल को पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्र की भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डु को देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये। उस समय ऋषियों को तथा पाण्डुपुत्रोंको समानरूप से शोक का अनुभव हो रहा था। ब्राह्मणों ने पाण्डु की दोनों सती-साध्वी रानियों को समझा-बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ।
कुन्त्युवाच
हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् ।। हा राजन् मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै। निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात् ।। युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ । कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते ।। नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत । यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि ।। आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम् । आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम् ।।
कुन्ती बोली- हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं। हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ। मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये। मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है। प्रजानाथ ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव-इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत ! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है। अजमीढकुलनन्दन ! आपके पूर्वजोंने पुण्य-कर्मोंद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
(विलपित्वा भृशं त्वेवं निःसंज्ञे पतिते भुवि । युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः ।
तेऽप्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ।। पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे।
कुन्त्युवाच
अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम । अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ।। २३ ।। अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् । उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान् ।। २४ ।।
अवाप्य पुत्रॉल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये।
कुन्तीने कहा-माद्री ! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है। जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो। पुत्रोंको पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ ।। २३-२४ ।।
माद्युवाच
अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् ।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ।। २५ ।।
माद्री बोली- रणभूमिसे कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पतिदेवके साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होनेवाले कामभोगसे मैं तृप्त नहीं हो सकी हूँ। आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनी चाहिये ।। २५ ।।
मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद् भरतसत्तमः ।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ।। २६ ।।
ये भरतश्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः मुझे किसी प्रकार परलोकमें पहुँचकर उनकी उस कामवासनाकी निवृत्ति करनी चाहिये ।। २६ ।।
न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुनेषु ते ।
वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ।। २७ ।।
आर्ये! मैं आपके पुत्रोंके साथ अपने सगे पुत्रोंकी भाँति बर्ताव नहीं कर सकूँगी। उस दशामें मुझे पाप लगेगा ।। २७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🌊गंगा सप्तमी 🌸
आज गंगा सप्तमी विशेष
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सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों
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गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।'
' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं।
यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।
इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल।
मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं।
सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।
कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है।
उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।
रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया।
राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था।
अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये।
वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ।
' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया।
उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की।
लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए।
भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।
गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा।
भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा।
जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🌊गंगा सप्तमी 🌸
माँ पार्वती और माँ गंगा के बीच विवाद?
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देवाधिदेव महादेव को जगतपिता भी कहा जाता है, क्योंकि उनका विवाह इस संसार की शक्ति, मां पार्वती से हुआ था। शिव और शक्ति के संयोजन से ही हमारी यह प्रकृति चल रही है। वे दोनों, एक दूसरे के अर्धांग हैं और एक दूसरे के बिना अपूर्ण भी हैं। जहां, एक तरफ भगवान शिव, अनादि के सृजनकर्ता हैं, वहीं, माता पार्वती, प्रकृति का मूल स्वरूप हैं।
माता पार्वती, राजा हिमावन की पुत्री हैं, जिसके अनुसार, उन्हें, शैलपुत्री भी कहा जाता है। सनातन धर्म के अनुसार, देवी गंगा का अवतरण भी हिमालय से हुआ था, जिसके अनुसार, वे, माता पार्वती की बहन लगती हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार, इन दोनों बहनों में शिव जी को लेकर विवाद हो गया, जो संभाले नहीं संभल रहा था। आइए जानतें हैं माता पार्वती और गंगा जी के विवाद की रोचक कथा के बारे में...
शिव शक्ति
एक बार, शिव जी, अपने परम निवास, कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ बैठे थे, जहां उनके साथ में ही माता पार्वती भी ध्यान में मग्न थीं। शिव और शक्ति का यह सुदंर स्वरूप, एक साथ बहुत ही मनमोहक लग रहा था। ध्यानमग्न, माता पार्वती और अपने प्रभु शिव जी की शोभा को उनके परम भक्त नंदी जी निहार रहे थे। दोनों का यह सुंदर स्वरूप देख, नंदी जी के नेत्रों से खुशी के आंसू बहने लगे। अपने भक्त की आंखों से बहते अश्रुओं का भान जैसे ही महादेव को हुआ, उन्होंने अपने नेत्र खोले।
महादेव के समक्ष, साक्षात थीं गंगा जी
महादेव ने जैसे ही भक्त की चिंता में नेत्र खोले, उन्होंने देखा, सामने गंगा जी हाथ जोड़े खड़ी थीं। गंगा जी को देख, महादेव हैरान होते हुए बोले, “देवी गंगे, आप?!” तो उत्तर में मां गंगा बोलीं, “हे आदिपुरुष! आपके इस रूप को देखकर, मैं आप पर मोहित हो गई हूं। कृपा कर, मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें।”
मां पार्वती का क्रोध
जैसे ही मां गंगा के स्वर, माता पार्वती के कानों में पड़े, वे हैरान हो गईं। मां गंगा की यह बात सुनकर उनके नेत्र लाल हो गए और क्रोधवश, वे बोल पड़ीं, “देवी गंगा, सीमा ना लांघिए! मत भूलिए महादेव हमारे पति हैं!” यह सुनकर ठिठोली करते हुए मां गंगा बोलीं, “अरे बहन, क्या फर्क पड़ता है? वैसे भी भले ही तुम महादेव की पत्नी हो फिर भी देवाधिदेव महादेव, अपने शीश पर तो मुझे ही धारण करते हैं। जहां महादेव के साथ तुम नहीं जा सकतीं, मैं तो वहां भी पहुंच ही जाती हूं!”
गंगा की यह बात सुनते ही माता पार्वती के क्रोध का ठिकाना ना रहा, उनका क्रोध से मुख भयंकर हो गया।
मां पार्वती का गंगा को श्राप
मां गंगा के वचन सुनकर, मां पार्वती, उन्हें श्राप देते हुए बोलीं, “गंगे! तुमने मेरी बहन होने की सीमा लांघ दी है। मैं तुम्हे श्राप देती हूं कि तुम में मृत देह बहेंगी! जग जन के पाप धोते-धोते, तुम मैली हो जाओगी! तुम्हारा यह अहम टूटेगा और तुम्हारा रंग भी काला पड़ जाएगा!”
गंगा की याचना
मां गंगा, यह सुनते ही महादेव और मां पार्वती के चरणों में गिर गईं। वे, अपनी भूल का पश्चातापकर, मां पार्वती और महादेव से क्षमा याचना करने लगीं। तब महादेव ने उनसे कहा कि “हे गंगे! यह श्राप तो अब फलित होकर रहेगा परन्तु आपके पश्चाताप से प्रसन्न होकर हम आपको इस श्राप से मुक्ति देते हैं।
हे गंगे! आप जन मानस के पापों से दूषित होंगी परन्तु संतजन के स्नान से आपकी शुद्धि, आपको वापस प्राप्त होगी।” इस प्रकार, भगवान शिव ने मां गंगा को प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद से ही गंगा में स्नान से पाप धुलने लगे। तब से ही लोग, गंगा में स्नान करने के लिए दूर-दूर से आते हैं और भूल-चूक में हुए पापों से मुक्ति पाते हैं।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🌊गंगा सप्तमी 🌸
मां गंगा का सफर गौमुख से हरिद्वार तक
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उत्तराखंड देवभूमि है। यहां पंच प्रयाग में दर्शन से जीवन में उल्लास आता है।
ये प्रमुख पंच प्रयाग हैं👉 विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग।
यह पंच प्रयाग उत्तराखंड की मुख्य नदियों के संगम पर हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नदियों का संगम बहुत ही पवित्र माना जाता है। इन पंच प्रयागों का पवित्र जल एक साथ अलकनंदा और भगीरथी का जल भगवान श्रीराम की तपस्थली देवप्रयाग में मिलता है और यहीं से भगीरथी और अलकनंदा का संगम गंगा के रूप में अवतरित होता है।
उत्तराखंड के हिमालय के क्षेत्र के पंच प्रयाग यानी संगम को सबसे पवित्र माना गया है, क्योंकि गंगा, यमुना सरस्वती और उनकी सहायक नदियों का उत्तराखंड देवभूमि उद्गम स्थल है। जिन जगहों पर इनका संगम होता है उन्हें प्रमुख तीर्थ माना जाता है। जिनमें स्नान का विशेष महत्व है और इन्हीं संगम स्थलों पर पूर्वजों के मोक्ष के लिए श्राद्ध तर्पण भी किया जाता है।
विष्णुप्रयाग
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बद्रीनाथ से होकर निकलने वाली विष्णु प्रिया अलकनंदा नदी और धौली गंगा नदी का जोशीमठ के नजदीक जिस स्थान पर मिलन होता है इन दोनों नदियों के उस पवित्र संगम को विष्णु प्रयाग कहते हैं। इस पवित्र संगम पर भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर है। यह या पवित्र संगम तल से 1372 मीटर की ऊंचाई पर है। स्कंदपुराण में विष्णुप्रयाग की महिमा बताई गई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस संगम की प्रमुख नदियों धौलीगंगा और अलकनंदा में पांच-पांच कुंड हैं। यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। इसी स्थान पर दाएं जय और बाएं विजय दो पर्वत स्थित हैं, जिन्हें विष्णु भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है।
नंदप्रयाग
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अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के संगम को नंदप्रयाग कहते हैं। यह समुद्र तल से 2805 फुट की ऊंचाई पर है। पौराणिक कथा के मुताबिक इस स्थान पर मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम स्थल पर नंद महाराज ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए और पुत्र की प्राप्ति की कामना के लिए कठोर तप किया था। यहां पर नंदादेवी का दिव्य और भव्य मंदिर है। नन्दा का मंदिर, नंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी के संगम के कारण इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा।
कर्णप्रयाग
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अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों का संगम स्थल कर्णप्रयाग के नाम से विख्यात है। पिण्डर नदी को कर्ण गंगा भी कहा जाता है। इसलिए इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहां पर उमा मंदिर और कर्ण मंदिर स्थित है। संगम स्थल पर मां भगवती उमा का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। कहते हैं कि यहां पर दानवीर कर्ण ने कठोर तपस्या की थी और यहां पर संगम से पश्चिम दिशा की तरफ शिलाखंड के रूप में दानवीर कर्ण की तपस्थली और मन्दिर हैं। कर्ण की तपस्थली होने के कारण ही यह पवित्र पावन स्थान कर्णप्रयाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
रुद्रप्रयाग
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मंदाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर रुद्रप्रयाग स्थित है। संगम स्थल क्षेत्र में चामुंडा देवी व रुद्रनाथ मंदिर है। मान्यता है कि नारद मुनि ने इस पर संगीत के रहस्यों को जानने के लिये रुद्रनाथ महादेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। पौराणिक मान्यता है कि यहां पर ब्रह्मा की आज्ञा से देवर्षि नारद ने कई वर्षों तक भगवान शंकर की तपस्या की थी भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर नारद को सांगोपांग गांधर्व शास्त्र विद्या से पारंगत किया था। यहां पर भगवान शंकर का रुद्रेश्वर नामक लिंग है। यहीं से केदारनाथ के लिए तीर्थ यात्रा शुरू होती है।
देवप्रयाग
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देवप्रयाग में अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों का संगम है। देवप्रयाग समुद्र तल से 1500 फुट की ऊंचाई पर है। गढ़वाल क्षेत्र में भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड़ शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में इस तीर्थ ब्रह्मपुरी क्षेत्र कहा गया है लोक कथाओं के अनुसार देवप्रयाग में देव शर्मा नामक ब्राह्मण ने सतयुग में निराहार सूखे पत्ते चबाकर तथा एक पैर पर खड़े रहकर कई वर्षों तक कठोर तप किया और भगवान विष्णु के दर्शन कर वर प्राप्त किया।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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