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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 317) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ।। १४ ।। 'कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ।। १४ ।। आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ।। १५ ।। 'कुछ लोग आर्ष विधि (यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं। इस प्रकार विवाहित होनेवाले (दैव विवाहकी रीतिसे) पत्नी प्राप्त करते हैं। इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका आठवाँ प्रकार माना है। इन सबको तुमलोग समझो ।। १५ ।। स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च। प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ।। १६ ।। 'क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।। १६ ।। ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः । ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ।। १७ ।। 'अतः भूमिपालो ! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ। तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ।। १७ ।। स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः । एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ।। १८ ।। सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् । आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ।। १९ ।। 'राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ।' परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ।। १८-१९ ।। ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः । संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ।। २० ।। फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते (ताल ठोकते) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ।। २० ।। तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् । आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ।। २१ ।। सब लोग जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे। उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २१ ।। ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय । भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ।। २२ ।। सवर्मभिर्भूणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः । सक्रोधामर्षजिह्म भूकषायीकृतलोचनाः ।। २३ ।। सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्वरुपकल्पितान् । रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ।। २४ ।। प्रयान्तमथ कौरव्यमनुससुरुदायुधाः । ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत । एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २५ ।। जनमेजय ! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय ! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत । उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ।। २२-२५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत
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#खेलें मसाने में होली दिगंबर काशी विश्वनाथ #🙏🌷👌👌घाट पर चिताभस्म की होली 🙏🌷🙏खेले मसाने मे होली दिगम्बर 👌👌🙏 🛐प्रस्तुत है ब्रज की होरी साथ में इस होरी गीत का आध्यात्मिक विवेचना।*🛐 *खेलैं मसाने में होरी दिगंबर* खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होरी भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी। चिता, भस्म भर झोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी। गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना, कौनऊ बाधा। ना साजन ना गोरी, दिगंबर, खेले मसाने में होरी। नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी। भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज की गोरी धन-धन नाथ अघोरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी। खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी ... 🙏शमशान में होली खेलने का अर्थ समझते हैं? मनुष्य सबसे अधिक मृत्यु से भयभीत होता है। उसके हर भय का अंतिम कारण अपनी या अपनों की मृत्यु ही होती है। शमशान में होली खेलने का अर्थ है उस भय से मुक्ति पा लेना। शिव किसी शरीर मात्र का नाम नहीं है, शिव वैराग्य की उस चरम अवस्था का नाम है, जब व्यक्ति मृत्यु की पीड़ा,भय या अवसाद से मुक्त हो जाता है। शिव होने का अर्थ है वैराग्य की उस ऊँचाई पर पहुँच जाना जब किसी की मृत्यु कष्ट न दे, बल्कि उसे भी जीवन का एक आवश्यक हिस्सा मान कर उसे पर्व की तरह खुशी खुशी मनाया जाय। शिव जब शरीर में भभूत लपेट कर नाच उठते हैं, तो समस्त भौतिक गुणों-अवगुणों से मुक्त दिखते हैं। यही शिवत्व है।🙏 ❣️मान्यता है कि काशी की मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के शव की दाहक्रिया की थी। तब से वह महा शमशान है, जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। एक चिता के बुझने से पूर्व ही दूसरी चिता में आग लगा दी जाती है। वह मृत्यु की लौ है जो कभी नहीं बुझती, जीवन की हर ज्योति अंततः उसी लौ में परम ज्योति में समाहित हो जाती है। शिव जब अपने कंधे पर देवी सती का शव ले कर नाच रहे थे, तब वे मोह के चरम पर थे। वे शिव थे, फिर भी शव के मोह में बंध गए थे। मोह बड़ा प्रबल होता है, किसी को नहीं छोड़ता।सामान्य जन भी विपरीत परिस्थितियों में, या अपनों की मृत्यु के समय यूँ ही शव के मोह में तड़पते हैं। शिव शिव थे, वे रुके तो उसी प्रिय पत्नी की चिता भष्म से होली खेल कर युगों युगों के लिए वैरागी हो गए। मोह के चरम पर ही वैराग्य उभरता है न। पर मनुष्य इस मोह से नहीं निकल पाता, वह एक मोह से छूटता है तो दूसरे के फंदे में फंस जाता है। शायद यही मोह मनुष्य को शिवत्व प्राप्त नहीं होने देता।❣️ 🕉️कहते हैं काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है। शिव की अपनी नगरी है काशी, कैलाश के बाद उन्हें सबसे अधिक काशी ही प्रिय है। शायद इसी कारण काशी एक अलग प्रकार की वैरागी ठसक के साथ जीती है। मणिकर्णिकाघाट, हरिश्चंदघाट, युगों युगों से गङ्गा के इस पावन तट पर मुक्ति की आशा ले कर देश विदेश से आने वाले लोग वस्तुतः शिव की अखण्ड ज्योति में समाहित होने ही आते हैं। होली आ रही है। फागुन में काशी का कण कण फ़ाग गाता है-“खेले मशाने में होली दिगम्बर खेले मशाने में होली” सच यही है कि शिव के साथ साथ हर जीव संसार के इस महाश्मशान में होली ही खेल रहा है। तबतक, तबतक उस मणिकर्णिका की ज्योति में समाहित नहीं हो जाता। संसार शमशान ही तो हैं।🕉️
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#👫 हमारी ज़िन्दगी #❤️जीवन की सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ शास्त्र कहते हैं मनुष्य को अपने जीवन में चार पुरुषार्थों के संतुलन से चलना चाहिए ... 1. धर्म — कर्तव्य, नैतिकता, सत्य और मर्यादा के साथ यह विवेक कि क्या करना उचित है। 2. अर्थ — जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक धन; कितना पर्याप्त है, इसका बोध अधिकतम संग्रह का आग्रह नहीं। 3. काम इच्छाएँ, सुख, सौंदर्य और प्रेम परंतु धर्म की सीमाओं के भीतर। 4. मोक्ष बंधन से मुक्ति, आत्मबोध और यही अंतिम लक्ष्य। शास्त्रों में अर्थ (धन) को कभी भी धर्म और मोक्ष से ऊपर नहीं रखा गया। लक्ष्मी जी और उल्लू से जुड़ी पौराणिक कथाएँ भी इसी संतुलन का आध्यात्मिक संकेत देती हैं । धन, चेतना और विवेक का संतुलन। उल्लू, जो अँधेरे में भी देख सकता है, यह सिखाता है कि अज्ञान, लोभ और भ्रम के अँधेरे में भी जो सत्य देख सके वही लक्ष्मी का पात्र है। धन तभी कल्याणकारी होता है जब उसके साथ दृष्टि (बुद्धि) हो। उल्लू यह भी चेतावनी देता है कि यदि धन विवेक के बिना आए,तो वही धन अहंकार, पतन और दुःख का कारण बन जाता है।इसीलिए लक्ष्मी जी का वाहन सिंह या हाथी नहीं, उल्लू है— मानो वह कह रही हों: “मैं वहीं ठहरती हूँ जहाँ बुद्धि मेरी सवारी करती है।” उल्लू रात्रिचर है— यह संकेत है कि जो व्यक्ति केवल दिन के दिखावे में जीता है, वह अंततः लक्ष्मी को खो देता है। कुछ परंपराओं में उल्लू को मूर्खता का प्रतीक भी माना गया है। यह दोहरा अर्थ जानबूझकर रखा गया है— यदि लक्ष्मी का सही उपयोग न हो, तो मनुष्य “धनवान मूर्ख” बन जाता है। आज अपने आसपास हम ऐसी अनेक घटनाएँ देखते हैं जो शास्त्रसम्मत तो बिल्कुल नहीं हैं। फिर भी हर सत्य अंततः प्रकाश में आता है। धर्म को ताक पर रखकर जो धनवान हुए हैं, उन्हें देखकर कई बार हमारा उस अदृश्य सत्ता में विश्वास का सिंहासन डोलने लगता है, पर सच यह है कि अधर्म से आया धन धूप में रखी बर्फ़ है जो दिखता बहुत है, पर टिकता नहीं। अंत में न धन साथ जाता है, न सत्ता, न नाम। साथ रह जाता है केवल वही जो धर्म के साथ जिया जाएगा....
👫 हमारी ज़िन्दगी - लाभ 5 लाभ 5 - ShareChat
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती एक बार की बात है, कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती अपने दोनों पुत्रों, गणेश और कार्तिकेय, के साथ आनंदपूर्वक रह रहे थे। दोनों पुत्रों में शिव और पार्वती के प्रति बहुत प्रेम था, लेकिन एक दिन दोनों में यह सवाल उठा कि माँ-पिता के प्रति सबसे बड़ा भक्त और प्रिय कौन है। माता पार्वती ने उनकी इस उत्सुकता को देखते हुए एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, "हम दोनों में से जो भी इस पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके सबसे पहले वापस आएगा, उसे हम सबसे प्रिय मानेंगे।" यह सुनकर कार्तिकेय अपने तेज़ मयूर पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। उन्हें विश्वास था कि अपनी गति के कारण वे यह प्रतियोगिता जीत जाएंगे। दूसरी ओर, गणेश जी ने इस पर सोचा और फिर शांतिपूर्वक माता-पिता के पास आए। उन्होंने शिव और पार्वती की तीन बार परिक्रमा की और कहा, "आप दोनों ही मेरे लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। आप ही मेरी पृथ्वी, आकाश, और समस्त लोक हैं।" जब भगवान शिव और माता पार्वती ने यह देखा, तो वे गणेश जी के इस ज्ञान और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश को अपनी गोद में बिठाया और आशीर्वाद दिया कि वह ज्ञान और बुद्धि के देवता के रूप में पूजे जाएंगे। उनकी बुद्धि और प्रेम के कारण ही उन्हें सबसे पहले पूजा जाने का वरदान मिला। कुछ समय बाद कार्तिकेय भी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे, लेकिन उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले ही विजेता बन चुके हैं। पहले तो वे निराश हुए, लेकिन फिर उन्हें समझ में आ गया कि सच्ची भक्ति ज्ञान और प्रेम में होती है। तब से, गणेश जी को सभी पूजा-पाठ में सबसे पहले पूजा जाता है, और कार्तिकेय को युद्ध और शक्ति का देवता मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि बुद्धि और सच्चे प्रेम से हम किसी भी प्रतियोगिता को जीत सकते हैं और ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति का प्रमाण दे सकते हैं
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कैसे आते हैं श्रीराम! #जय श्री राम अपने युग की सबसे सुन्दर स्त्री थीं वे! जितनी सुन्दर, उतनी ही विदुषी! आस पड़ोस की स्त्रियां कहतीं, "इसे ब्रह्मा ने अपने हाथों से बनाया है। ये ब्रह्मा की पुत्री हैं।" वे सब ठीक ही कहती थीं। उन्होंने जिस ऋषि का वरण किया वे अपने युग के श्रेष्ठ विद्वानों में एक थे। दोनों में बहुत प्रेम था। न्योछावर थे एक दूसरे पर... जीवन के हर पथ पर संग चलने का वचन निभाते लोग, तपस्या के लिए बैठते तब भी संग ही बैठते थे। प्रेम का चरम छू लेने पर या तो वैराग्य मिलता है, या वियोग! नियति की ओर से उन्हें वियोग मिलना था। ऋषि एक दिन भोर में गङ्गास्नान को गए थे। देवी को एकांत में पा कर एक महापुरुष अनैतिक याचना लिए आये। यहाँ तक कि वेश बदल कर ऋषि का ही रूप ले लिया। काम पुरुष का प्राथमिक दुर्गुण है, वह किसी को नहीं छोड़ता। बड़े बड़े महापुरुषों की मति हर लेने वाला काम तब इंद्र की मति हर चुका था। देवी पहचान गयीं पति के रूप में आये छली को। स्वर्ग के अधिपति को तिरस्कार के साथ वापस तो लौटा दिया, पर उतने महान व्यक्ति को भी अनैतिक प्रयत्न करते देख वैराग्य भाव से मुस्कुरा दिया। दुर्भाग्य! कि बस उसी क्षण पति लौट आये। राह में उन्होंने देखा था अपने ही भेष में आश्रम से निकलते इंद्र को... प्रेम या तो अति विश्वासी बना देता है, या अति भयभीत! महर्षि गौतम के हिस्से में भय आया था। इसमें होता यह है कि प्रेम जितना ही गहरा हो, उतना ही भयभीत कर देता है। हर समय यही भय, कि कहीं मेरा साथी मुझे त्याग तो नहीं देगा? उसे कोई और प्रिय तो नहीं...? ऋषि का भय क्रोध में बदल गया। क्रोध सबसे पहले हर लेता है बुद्धि। क्रोध के वश में उस महाज्ञानी ऋषि ने एक क्षण में ही इंद्र को शाप दिया और अगले ही क्षण पत्नी को त्याग देने का प्रण ले लिया। पर ज्ञानियों का क्रोध क्षणिक होता है। ऋषि को सत्य का भान हुआ तो उपजा अपराधबोध... पत्नी से क्षमा याचना की। पर पत्नी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार के लिए स्वयं को भी दंडित करना था न! तो स्वयं के लिए दण्ड निश्चित किया कि प्रेयसी से दूर रहेंगे। तबतक, कि जबतक राम न आ जाएं... राम का आना ही क्यों? महापुरुषों के आगमन से युग के पाप धुल जाते हैं मित्र! वे तो राम थे। मर्यादापुरुषोत्तम! करुणासिंधु! उधर पति से तिरस्कार पा कर जड़ हो गयी थीं अहिल्या! विश्वास ही नहीं होता था कि इतने अविश्वासी हो जाएंगे पति! एक निर्दोष को ऐसा दण्ड? एकाएक जैसे पत्थर हो गईं। दोनों के तप का स्वरूप बदल गया। ऋषि अपने आश्रम को छोड़ कर सुदूर वन में तप कर के प्रायश्चित कर रहे थे, और पत्नी उसी आश्रम में एकांत वास कर अपने प्रेम का साथ निभा रही थीं। दोनों की साझी प्रार्थना बस इतनी ही थी कि राम आएं... राम आएं कि उनके आने से मुक्त हो जाएं हम... उनका रोम रोम राम के लिए रो रहा था जैसे... जाने कितने बरस बीत गए। जाने कितने युग बीत गए। राम को ढूंढते ढूंढते गौतम और अहिल्या बृद्ध हो गए थे। और एक दिन... उन दो राजकुमारों को लेकर अनायास ही उस परित्यक्त कुटिया की ओर मुड़ गए महर्षि विश्वामित्र! जैसे कह रहे हों, "मुक्त होवो देवी! तुम्हारी तपस्या अंततः खींच लाई उस युगपुरुष को..." राम यूँ ही नहीं आते मित्र! उनके पीछे किसी अहिल्या की लंबी तपस्या होती है। 🙏🙏
जय श्री राम - ShareChat
#श्रीरामचरितमानस राजा दशरथ की आज्ञा से जब श्री राम को चौदह वर्षों का वनवास मिला, तब सीता ने राजमहल का सुख त्याग कर कहा, “जहाँ आप, वहीं मेरा संसार।” काँटों भरे पथ, घने वन और कठिनाइयाँ—सब सीता ने मुस्कान के साथ स्वीकार कीं, क्योंकि उनके लिए राम ही धर्म थे। वन में दोनों ने साधु-संतों की सेवा की, राक्षसों के अत्याचार से रक्षा की और प्रेम के साथ कर्तव्य निभाया। पंचवटी की शांत छाया में उनका प्रेम और भी पवित्र हुआ। पर विधि ने परीक्षा ली—रावण द्वारा सीता का हरण। यह केवल अपहरण नहीं, अधर्म की चुनौती थी। श्री राम ने धैर्य और साहस से वानर सेना संगठित की, समुद्र पर सेतु बाँधा और लंका में अधर्म का अंत किया। युद्ध के बाद सीता की पवित्रता सत्य की अग्नि-सी उज्ज्वल हुई, और धर्म की विजय हुई। अंततः अयोध्या लौटकर राम-सीता का राज्याभिषेक हुआ। रामराज्य में न्याय, करुणा और समता का प्रकाश फैला। यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग माँगता है, धर्म साहस देता है और सत्य अंततः विजयी होता है।
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#👫 हमारी ज़िन्दगी ⁉️प्रश्न: जब भगवान ने ही क्रोध काम मोह लोभ बनाए है तो हम क्यों न करे ?⁉️ ✍️उत्तर: हमने तो चाकू भी बनाया है तो क्या हम उससे अपना गला काट लेते हैं कि हमने बनाया है तो हम क्यों न काटें ??? हम तो मल मूत्र भी बनाते हैं , उसको तो नहीं खाया जा सकता न । सरकार ही बंदूक बनाकर देती है , तोप और Missiles बना कर देती है । तो इसका मतलब थोड़ी है कि अपने ही देश के नागरिकों को भूनना शुरू कर दो , या अपने ही देश पर missile छोड़ दो । एक जगह वही बंदूक चलाकर असंख्य लोगों को मारने पर सरकार परमवीर चक्र से शुशोभित करती है और वहीं उसी बंदूक को चलाकर बस एक हत्या मात्र करने पर वह जेल में बन्दकर पिछवाड़ा लाल कर मृत्यु दंड भी देती है । यह हमारे बुद्धि पर और सरकार द्वारा आदेशित Manual पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे , कब और क्यों करना है !! ✍️ 🤹एक मुख्यमंत्री का Sign से विकास की बहुत बहुत बड़ी योजनाओं को गति मिल जाती है और वहीं दूसरे paper पर उसी मुख्यमंत्री के sign करने से वह केजरीवाल और लालू की तरह जेल में भी जा सकता है । यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने Sign का प्रयोग कहाँ कर रहे हैं । अधिकार सब मिला है , सब जनता जनार्दन का ही है लेकिन उसको कैसे प्रयोग करना है , यह आपके विवेक पर निर्भर करता है ।🤹 💢वही दारू आप किसी Bar में जाकर पीते हैं , तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन वही दारू आप मन्दिर या संसद भवन में पीएंगे तो क्या हश्र होगा , यह मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है । Sex का अधिकार सबको है । वह अगर आप अपनी धर्मपत्नी या धर्मपति से करते हैं तो सब ढोल नगाड़े , बड़ी बड़ी दावत देकर , लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर सबको बुलाकर बताते हैं कि अमुक दिन यह दोनों यह करने जा रहे हैं और बकायदा लोग Gift और आशीर्वाद से आपको लाद देते हैं । सब प्रसन्न रहते हैं , जिसे आप लोग विवाह कहते हैं । लेकिन इसी का प्रयोग अगर आप पर पुरुष और पर नारी से करते हैं या बलात करते हैं तो कोई भी ताली नहीं बजाता बल्कि थू थू हर जगह होकर जेल में ठूस दिया जाता है । तब यह कहने से काम नहीं चलेगा कि यह तो सबका प्राकृतिक अधिकार है ।💢 ‼️तो हमें कब क्या और क्यों प्रयोग करना है , यह हमें भली भांति आना चाहिए । किसी ने नहीं कहा कि यह काम , क्रोध , लोभ , मोह का प्रयोग करना नहीं चाहिए ।‼️ 🛐यह कहा गया है कि सब कार्य धर्मानुकूल करो । उससे अंतःकरण न खराब हो , उसके गुलाम न बन जाओ । उस पर अधिकार कर उसका निर्लिप्त भाव से प्रयोग करो । उसमें आसक्ति नहीं । संसार को चलाने के लिए यह सब आवश्यक है लेकिन ऐसा प्रयोग हो कि उससे हमें किसी भी प्रकार की हानि न हो । वह हमें अपनी ओर से न चलाये बल्कि हम उस पर नियंत्रण कर उसे अपने अनुसार चलायें ।। और इनका प्रयोग भगवद क्षेत्र में करेंगे तो बहुत तेजी से स्वविकास होगा । मान लीजिये यह तोप के समान है । बस हमने तोप की दिशा पाकिस्तान की ओर न कर अपने ही देश पर किया हुआ है । बस इसकी दिशा दुश्मन देश की ओर जो हमें नुकसान पहुँचाते हैं , उनकी तरफ मोड़ना है । ऐसे ही बस इनकी भी दिशा सही जगह मोड़नी है । और संसार में इनका उपयोग बस व्यवहार मात्र । और अब मूल सिद्धांत पर आईये । भगवान ने यह सब नहीं बनाया है । यह सब हमारे अज्ञान ने बनाया है । और हम अपनी अज्ञानता का नाम भगवान पर डालकर बचना चाहते हैं । अज्ञान से ही कामनायें पैदा होती है । कामनाओं से यह काम क्रोध लोभ मोह इत्यादि पैदा होते हैं । काम - कामना अज्ञान से पैदा होती है कि अमुक तत्त्व में सुख है । यह कामनायें पाँच प्रकार की होती हैं ।🛐 💢इन्हीं पाँचों इन्द्रियों से सम्बंधित । रस , रूप , शब्द , गन्ध और स्पर्श । इन्हीं Five sensory organs से सम्बंधित ही कामनाएं पैदा होती हैं । इन पांचों के अलावा कोई कामनायें नहीं पैदा हो सकती हैं । इन्हीं कामनाओं की जब पूर्ति नहीं होती तो क्रोध पैदा होता है , क्रोध से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से जीव का पतन हो जाता है । इसे ही पँचक्लेश कहते हैं । 💢 🚩1. अविद्या - इसके 4 प्रकार होते हैं । अनित्य , अशुचि , दुःख में सुख बुद्धि जिसे विपर्यय भी कहते हैं , और अनात्मा । 🚩2. अस्मिता 🚩3. राग 🚩4. द्वेष 🚩5. अभिनिवेश इन सभी क्लेशों की पाँच अवस्थायें हैं । 🍀1. प्रसुप्त - कई जन्मों के संस्कार जो सोए हैं । 🍀2. तनु - जो सत्संग और तत्त्वज्ञान से कमजोर पड़ गए हैं । 🍀3. विछिन्न - द्वेष की स्थिति में प्रेम उभरना 🍀4. उदार - प्रकट होना अपने समय पर , जैसे युवास्था के प्रेम 🍀5. दग्धबीजभाव - जो चित्तवृत्ति निरोध से जल गए हैं । 🌷तो यह सभी क्लेश इन पाँच अवस्थाओं में जीव में रहते हैं और अज्ञानता के वशीभूत होकर जीव इनसे ही कार्य करता है । चित्त की पाँच वृत्तियों ( प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा और स्मृति ) से वशीभूत रहने के कारण जीव इस अज्ञान से ग्रसित होकर कार्य करता है । तो यह सब मात्र हमारी अज्ञानता ही जन्म देती है लेकिन हम नाम भगवान का लगा देते हैं ताकि हम साफ साफ बच जाएं और भोग भोगने का एक मौका मिल जाये या भगवद मार्ग पर जाने से छुट्टी मिल जाये । तो चलिए कोई बात नहीं यही मान लीजिए कि यह सब भगवान ने दिया है , चलिए आपकी ही बात मान ली । लेकिन अब उसको कैसे उपयोग करना है और कहाँ किस तरह करना है , यह विवेक हम लोगों के पास होना चाहिए । उसमें आसक्ति न हो और न ही वह हमारे अंतःकरण को दूषित करे या हमारा विनाश करे , अगर इस तरह करेंगे तो समझिये फिर तो हमारा कल्याण करने से कोई नहीं रोक सकता ।🌷
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#जय श्री माँ नैना देवी जी #जय माँ नैना देवी 👁️ जहाँ गिरे थे माता सती के नेत्र: जय माँ नैना देवी! 🚩 नैना देवी मंदिर की दो प्रमुख कहानियाँ प्रचलित हैं। एक पौराणिक (शक्तिपीठ से जुड़ी) और दूसरी ऐतिहासिक (मंदिर निर्माण से जुड़ी)। यहाँ विस्तार से दोनों कहानियाँ दी गई हैं: 1. शक्तिपीठ बनने की पौराणिक कथा (माता सती के नयन) यह कथा भगवान शिव और माता सती से जुड़ी है, जो सभी शक्तिपीठों का आधार है: दक्ष का अपमान: जब प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में विशाल यज्ञ किया, तो उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के घर बिना बुलाए गईं, लेकिन वहाँ शिवजी का अपमान देखकर उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। शिव का तांडव: भगवान शिव सती के जलते हुए शरीर को कंधे पर उठाकर ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। नयनों का गिरना: मान्यता है कि माता सती के शरीर के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। हिमाचल के इस स्थान पर माता सती के 'नयन' (आंखें) गिरे थे। नामकरण: चूँकि यहाँ माता के 'नयन' गिरे थे, इसलिए इस शक्तिपीठ का नाम 'नैना देवी' पड़ा। यहाँ पिंडी रूप में माता के नयनों की ही पूजा की जाती है। 2. मंदिर निर्माण की लोककथा (ग्वाला नैना गुर्जर) मंदिर की खोज और निर्माण को लेकर एक बहुत प्रसिद्ध लोककथा है, जो एक गुर्जर (ग्वाले) से जुड़ी है: बहुत समय पहले, इस पहाड़ी इलाके में 'नैना' नाम का एक गुर्जर अपनी गायें चराने आता था। उसने देखा कि उसकी गायों में से एक 'कपिला' गाय रोज एक विशेष जगह (एक पेड़ के नीचे या पत्थर पर) जाकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से अपने आप दूध की धारा बहने लगती है। यह दृश्य कई दिनों तक चलता रहा। नैना गुर्जर को लगा कि शायद कोई जानवर गाय का दूध पी जाता है, लेकिन जब उसने छिपकर देखा तो पाया कि गाय एक पत्थर (पिंडी) पर दूध का अभिषेक कर रही थी। उसी रात, नैना गुर्जर को सपने में माँ दुर्गा दिखाई दीं। माता ने उससे कहा, "मैं उसी स्थान पर पिंडी रूप में विराजमान हूँ, जहाँ तुम्हारी गाय दूध चढ़ाती है। वहाँ मेरा मंदिर बनवाओ।" नैना गुर्जर ने यह बात उस समय के राजा बीर चंद (बिलासपुर के राजा) को बताई। राजा ने जब उस स्थान की खुदाई करवाई, तो वहाँ वास्तव में एक पिंडी मिली (जो माता के नेत्रों का प्रतीक थी)। राजा ने वहाँ एक भव्य मंदिर बनवाया। माता ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि "यह स्थान मेरे नाम से पहले तुम्हारे नाम से जाना जाएगा।" इसीलिए इस धाम का नाम 'नैना' गुर्जर के नाम पर 'नैना देवी' पड़ा। 3. गुरु गोबिंद सिंह जी और नैना देवी सिख इतिहास में भी इस स्थान का महत्व है। कहा जाता है कि सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों से युद्ध करने से पहले इसी स्थान पर (या इसके निकट) एक महायज्ञ किया था और माँ भगवती (चंडी) से आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसके बाद ही उन्होंने 'खालसा पंथ' की स्थापना की और अत्याचारी मुगलों का सामना किया। मंदिर की विशेषताएँ स्थान: यह मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से नीचे गोबिंद सागर झील (भाखड़ा नांगल बांध का जलाशय) का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। पूजा: यहाँ माता की तीन पिंडियों की पूजा होती है—दाहिनी ओर माँ काली, मध्य में नैना देवी (शक्ति) और बाईं ओर भगवान गणेश। त्योहार: नवरात्रों के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। सार: नैना देवी मंदिर श्रद्धा और शक्ति का केंद्र है। जहाँ माता के नेत्र गिरे, वहाँ भक्तों को "दिव्य दृष्टि" और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता है। जय माँ नैना देवी! 🙏🚩
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🌞🕉️🌞 📖📖 🎪 *🔹गृहस्थ-जीवनोपयोगी बातें🔹* *🔹महाभारत में आता है :* *१] जो धर्म एवं कल्याण-मार्ग में तत्पर हैं और मोक्ष के विषय में जिनका निरंतर अनुराग है वे विवेकी हैं।* *२] जो अपने घर पर आ जाय उसे आत्मीयताभरी दृष्टी से देखें, उठकर उसके लिए आसन दें, मन से उसके प्रति उत्तम भाव रखें, मधुर वचन बोले। यह गृहस्थियों का सनातन धर्म है। अतिथि को आते देख उठकर उसकी अगवानी और यथोचित रीति से आदर-सत्कार करें।* *३] प्यासे को पानी, भूखे को भोजन, थके-माँदे को बैठने के लिए आसन और रोग आदि से पीड़ित मनुष्य के लिए सोने हेतु शय्या देनी चाहिए।* *४] गृहस्थ के भोजन में देवता, पितर, मनुष्य एवं समस्त प्राणियों का हिस्सा रखा जाता हैं।* *५] नित्य प्रात: एवं सायंकाल कुत्तों और कौओं के लिए पृथ्वी पर अन्न डाल दें।* *६] निकम्मे पशुओं की भी हिंसा न करें और जिस वस्तु को विधिपूर्वक देवता आदि के लिए अर्पित न करें, उसे स्वयं भी न खायें।* *७] यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम तथा लोभ का परित्याग – ये धर्म के ८ मार्ग हैं।* *🔸पूर्णतया संकल्पों को एक ध्येय में लगा देने से, इद्रियों को भली प्रकार वश में कर लेने से, अहिंसा आदि व्रतों का अच्छी प्रकार पालन करने से, भली प्रकार सदगुरु की सेवा करने से, कर्मों को भलीभाँति भगवतसमर्पण करने से और चित्त का भली प्रकार निरोध करने से मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त होता हैं।* 🚩🚩👏👏 *सदैव प्रसन्न रहिये!!* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है* #👍मोटिवेशनल कोट्स✌
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#❤️जीवन की सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ 🌸 नाम की महिमा – श्रद्धा की सच्ची कहानी 🌸 वृंदावन की एक सरल हृदय गोपी प्रतिदिन दूध और दही बेचने के लिए मथुरा जाया करती थी। एक दिन व्रज में एक संत पधारे। गोपी भी उनकी कथा सुनने पहुँची। संत कथा में समझा रहे थे— “भगवान के नाम की महिमा अपार है। उनका नाम बड़े से बड़े संकट को दूर कर देता है। यह नाम ही तो इस जन्म-मरण रूपी भवसागर से पार लगाने वाली नौका है। यदि जीवन सफल करना है, तो भगवान का नाम कभी मत छोड़ना।” कथा समाप्त हुई, पर संत के शब्द गोपी के हृदय में बस गए। अगले दिन जब वह दूध-दही लेकर मथुरा की ओर चली, तो मार्ग में यमुना जी आईं। उसे संत की बात याद आई— “जब भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है, तो क्या यह साधारण सी नदी पार नहीं करा सकता?” भोली-भाली गोपी ने मन में दृढ़ विश्वास के साथ प्रभु का नाम लिया और यमुना जी में कदम रख दिया। आश्चर्य! उसे लगा जैसे वह जल पर नहीं, ठोस भूमि पर चल रही हो। देखते ही देखते वह नदी पार कर गई। अब उसके मन में आनंद और विश्वास दोनों बढ़ गए। उसने सोचा— “संत ने तो अद्भुत उपाय बताया! अब नाविक को रोज पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे।” कुछ दिन बाद गोपी ने सोचा— “संत ने मेरा इतना भला किया है, उन्हें घर भोजन पर अवश्य बुलाना चाहिए।” अगले दिन उसने संत को निमंत्रण दिया, और संत तैयार हो गए। दोनों यमुना किनारे पहुँचे। संत नाविक को पुकारने लगे। गोपी ने आश्चर्य से पूछा— “बाबा! नाविक को क्यों बुला रहे हैं? हम तो ऐसे ही पार चलेंगे।” संत बोले— “अरे गोपी! यह कैसी बात? नदी ऐसे कैसे पार होगी?” गोपी ने सरल भाव से कहा— “बाबा! आपने ही तो बताया था कि भगवान के नाम का आश्रय लेकर भवसागर पार हो सकता है। मैंने वही किया… और मुझे नाव की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।” संत को विश्वास न हुआ। बोले— “तू पहले चल, मैं पीछे-पीछे आता हूँ।” गोपी ने फिर श्रद्धा से नाम स्मरण किया और सहज भाव से नदी पार कर गई। पर जैसे ही संत ने कदम रखा, वे सीधे जल में गिर पड़े। गोपी तुरंत लौट आई, संत का हाथ पकड़ा और नाम का स्मरण करते हुए आगे बढ़ी। इस बार संत भी ऐसे चलने लगे जैसे भूमि पर चल रहे हों। संत भाव-विह्वल होकर गोपी के चरणों में गिर पड़े— “धन्य हो गोपी! नाम का सच्चा आश्रय तो तुमने लिया है। मैंने केवल उसकी महिमा कही, पर पूर्ण विश्वास नहीं किया।” 🌺 संदेश: हम सब भगवान का नाम तो लेते हैं, परंतु उसमें अटल श्रद्धा और पूर्ण विश्वास नहीं रखते। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम इतने पापों को मिटा सकता है, जितने पाप मनुष्य जीवन भर में भी नहीं कर सकता। जब हम नाम जपते समय वही भाव रखें— जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ को पुकारता है— तब नाम अपना पूर्ण प्रभाव दिखाता है। ✨ कलियुग में केवल नाम ही आधार है— “कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहि पारा।” 📿 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 📿 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे जय श्री राधे कृष्ण 🙏
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