#राधे राधे
चन्द सो आनन कंचन-सौ तन,
हौं लखि कैं बिनमोल बिकानी।
औ अरविन्द-सी आँखिन कों "हठी"
देखत मेरियै आँखि सिरानी॥
राजति हैं मनमोहन के संग
वारौं मैं कोटि रमारति बानी।
जीवनमूरि सबैं ब्रज की,
ठकुरानी हमारी है राधिका रानी॥
श्री हठी जी
श्री राधा के मुख कमल की आभा, चंद्र के समान है एवं उनके अंग का वर्ण, स्वर्ण के समान है, जिसके दर्शन मात्र से मैं बिना किसी मोल के बिक गया हूँ। जब मैं उनके नेत्र कमलों की तरफ दृष्टि करता हूँ तो मेरे नेत्र पलक गिराना भूल जाते हैं। जब श्री राधा मनमोहन के संग विराजती हैं तो इस छवी पर मैं कोटि कोटि लक्ष्मी एवं रति को वार दूँ। श्री राधा ठकुरानी समस्त ब्रजमण्डल के निवासियों की जीवन प्राण संजीवनी है एवं मेरी महारानी है..
#राधे कृष्ण
खेलत दोऊ कुंजन होरी।
मूठ गुलाल उडावत सजनी,ढोरत रंग कमोरी।
बाजत चंग मृदंग सारंगी,गावत हैं मिल गौरी॥
पिचकारी बोछारन बरसत,फेंकत बूकन झोरी।
रामसखी मेरे नैनन बसोरी,नवल किशोर की जोरी॥
चिरजीवो मेरे दोउ कुंजबिहारी॥
नित्य केलि वृन्दावन वीथिन,करियें बलि लालन अरु प्यारी।
नित्य सुहाग भाग आलिन को,तुम सुख सुखी रहत सब नारी॥
नित्य खेल होरी हिंडोल को,नित विहार सुखकारी।
नित्य रहै आनंद घन वर्षा,रामसखी मनुहारी॥
होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई।
अबीर गुलाल लिएँ नैननि में, आजु करत मन भाई॥
बाजे बजत दुहुँ दिसि नीके, मनमथ मोद बढ़ाई।
छबि तरंग छूटत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई॥
गावत गीत रस-रीति जीति के, पुलकि किलकि सुखदाई।
श्रीरसिकबिहारिनि की छवि निरखत, ज्यों दामिनि घन छाई॥
#राधे कृष्ण
पकरे हैं प्यारी पिया आली आज फाग में।
मचि रही होरी गोरी बृंदाबन बाग में॥
घेर लिये लाल मुख मसली गुलाल बाल।
गुलचे हैं गाल बस कीने अनुराग में॥
नांच लै नचाये अंग अंग छिरकाये साज।
बाजहू बजाये रंग छायो अति राग में॥
सरसबिहारी लिये निज उरधारी नारी।
यह सुख भारी लिख्यो सखियन के भाग में॥🌹
देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी।
गीत विचित्र कोलाहल कौतुक संग सखा लख कोरी॥
आई झूमि झूमि झुंडन जुरि अगनित गोकुल गोरी।
तिनमें जुवती कदम्ब शिरोमणि राधा नवल किसोरी॥
छिरकत ग्वालबाल अबलन पर बूका वदन रोरी।
अरुन अकास देखि संध्या भ्रम पुनि मनसा भई बौरी॥
रपटत चरन कीच अरगजा की केसरी कुंकुम घोरी।
कही न जाय ‘गदाधर’ पै कछु बुधिबल मति भई थोरी॥🌹🌹
मेरी चुँदरी में पड़ गयो दाग री,
ऐसो चटक रंग डारो श्याम।
मोहू सी केतिक ब्रज सुन्दरि,
उनसों न खेलै फाग री॥
औरन को अचरा न छुए,
याकी मोही सो पड़ रही लाग री।
'बलिदास' वास ब्रज छोड़ो,
ऐसी होरी में लग जाये आग री॥🌹🌹🌹
🙏 #शिव_भक्ति_महिमा
📖 पराशरपुराण
#अर्थे_धर्मे_च_कामे_च_मोक्षसिद्ध्यर्थमेव_च।
#शिवपूजां_प्रकुर्वीत_सर्वकामफलप्रदाम्॥१॥
हिन्दी अर्थ:
मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की सिद्धि के लिए शिवजी की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि शिवपूजा सभी कामनाओं को फल देने वाली है।
#अश्वमेधसहस्राणि_राजसूयशतानि_च।
#न_तुल्यं_षोडशीं_कलाṁ_महेश्वरपदार्चने॥२॥
हिन्दी अर्थ:
हजारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ भी महेश्वर (भगवान शिव) के चरणों की पूजा की षोडशी (सोलहवीं) कला के समान भी नहीं होते।
स्रोत:
📜 पराशरपुराण, अध्याय (चित्रानुसार), श्लोक १–२
📖 भविष्यपुराण
#यावत्स्तिष्ठति_देहेऽस्मिन्_जीवो_यावज्जीवितं_नरः।
#तावत्_शिवस्य_पूजां_तु_कुर्यात्_नास्ति_विचारणम्॥३॥
हिन्दी अर्थ:
जब तक इस शरीर में जीव स्थित है और मनुष्य जीवित है, तब तक उसे शिव की पूजा करनी चाहिए; इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।
#वरं_प्राणपरित्यागः_शिरसो_वापि_कर्तनम्।
#न_तुष्येत्_क्षणमपि_शिवपूजाविवर्जितः॥४॥
हिन्दी अर्थ:
प्राणों का त्याग कर देना अथवा सिर कट जाना भी उत्तम है; किन्तु शिवपूजा से रहित रहकर एक क्षण भी रहना उचित नहीं है।
स्रोत:
📜 भविष्यपुराण (शैवप्रशंसा प्रसंग), चित्रानुसार पृष्ठ १५–१६, श्लोक ३–४
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#🙏शिव पार्वती #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
#🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #✡️महाशिवरात्रि मुहूर्त ⏳ #🙏शिव पार्वती
महाशिवरात्रि 15 फरवरी विशेष
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महाशिवरात्रि शिव और शक्ति के अभिसरण का विशेष पर्व है। फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ माह की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं। परन्तु पुर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार फाल्गुन माह की मासिक शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहते हैं। दोनों पञ्चाङ्गों में यह चन्द्र मास की नामाकरण प्रथा है जो इसे अलग-अलग करती है। हालाँकि दोनों, पूर्णिमांत और अमांत पञ्चाङ्ग एक ही दिन महा शिवरात्रि के साथ सभी शिवरात्रियों को मानते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध की ज्वाला से समस्त संसार जलकर भस्म होने वाला था किन्तु माता पार्वती ने महादेव का क्रोध शांत कर उन्हें प्रसन्न किया इसलिए हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भोलेनाथ ही उपासना की जाती है और इस दिन को मासिक शिवरात्रि कहा जाता है।
माना जाता है कि महाशिवरात्रि के बाद अगर प्रत्येक माह शिवरात्रि पर भी मोक्ष प्राप्ति के चार संकल्पों भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग का नियम से पालन किया जाए तो मोक्ष अवश्य ही प्राप्त होता है। इस पावन अवसर पर शिवलिंग की विधि पूर्वक पूजा और अभिषेक करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है।
अन्य भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन मध्य रात्रि में भगवान शिव लिङ्ग के रूप में प्रकट हुए थे। पहली बार शिव लिङ्ग की पूजा भगवान विष्णु और ब्रह्माजी द्वारा की गयी थी। इसीलिए महा शिवरात्रि को भगवान शिव के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है और श्रद्धालु लोग शिवरात्रि के दिन शिव लिङ्ग की पूजा करते हैं। शिवरात्रि व्रत प्राचीन काल से प्रचलित है। हिन्दु पुराणों में हमें शिवरात्रि व्रत का उल्लेख मिलता हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी, इन्द्राणी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री, सीता, पार्वती और रति ने भी शिवरात्रि का व्रत किया था।जो श्रद्धालु मासिक शिवरात्रि का व्रत करना चाहते है, वह इसे महा शिवरात्रि से आरम्भ कर सकते हैं और एक साल तक कायम रख सकते हैं। यह माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि के व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा द्वारा कोई भी मुश्किल और असम्भव कार्य पूरे किये जा सकते हैं। श्रद्धालुओं को शिवरात्रि के दौरान जागी रहना चाहिए और रात्रि के दौरान भगवान शिव की पूजा करना चाहिए। अविवाहित महिलाएँ इस व्रत को विवाहित होने हेतु एवं विवाहित महिलाएँ अपने विवाहित जीवन में सुख और शान्ति बनाये रखने के लिए इस व्रत को करती है।
महाशिवरात्रि अगर शनिवार के दिन पड़ती है तो वह बहुत ही शुभ होती है। शिवरात्रि पूजन मध्य रात्रि के दौरान किया जाता है। मध्य रात्रि को निशिता काल के नाम से जाना जाता है और यह दो घटी के लिए प्रबल होती है।
महाशिवरात्रि पूजा विधि
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इस दिन सुबह सूर्योंदय से पहले उठकर स्नान आदि कार्यों से निवृत हो जाएं। अपने पास के मंदिर में जाकर भगवान शिव परिवार की धूप, दीप, नेवैद्य, फल और फूलों आदि से पूजा करनी चाहिए। सच्चे भाव से पूरा दिन उपवास करना चाहिए। इस दिन शिवलिंग पर बेलपत्र जरूर चढ़ाने चाहिए और रुद्राभिषेक करना चाहिए। इस दिन शिव जी रुद्राभिषेक से बहुत ही जयादा खुश हो जाते हैं. शिवलिंग के अभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी इत्यादि का उपयोग किया जाता है। शाम के समय आप मीठा भोजन कर सकते हैं, वहीं अगले दिन भगवान शिव के पूजा के बाद दान आदि कर के ही अपने व्रत का पारण करें। अपने किए गए संकल्प के अनुसार व्रत करके ही उसका विधिवत तरीके से उद्यापन करना चाहिए। शिवरात्रि पूजन मध्य रात्रि के दौरान किया जाता है। रात को चार पहाड़ जागकर यदि संभव ना हो तो कम से कम रात्रि 12 बजें के बाद थोड़ी देर जाग कर भगवान शिव की आराधना करें और श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें, इससे आर्थिक परेशानी दूर होती हैं। इस दिन सफेद वस्तुओं के दान की अधिक महिमा होती है, इससे कभी भी आपके घर में धन की कमी नहीं होगी। अगर आप सच्चे मन से मासिक शिवरात्रि का व्रत रखते हैं तो आपका कोई भी मुश्किल कार्य आसानी से हो जायेगा. इस दिन शिव पार्वती की पूजा करने से सभी कर्जों से मुक्ति मिलने की भी मान्यता हैं।
शिवरात्रि तीन पहर अभिषेक, पूजन एवं जागरण मुहूर्त
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चतुर्दशी तिथि प्रारंभ👉 15 फरवरी को सायं 05:05 से
चतुर्दशी तिथि समाप्त - 16 फरवरी, सायं 05:33 पर।
निशिथकाल पूजन समय👉 15 फरवरी मध्यरात्रि 12:05 से 12:55 तक।
कुल अवधि - 50 मिनट
रात्रि प्रथम प्रहर पूजन समय👉 सायं 06:05 से रात्रि 09:17 तक।
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजन समय👉 रात्रि 09:17 से 12:30 तक।
रात्रि तृतीय प्रहर पूजन समय👉 रात्रि 12:30 से 03:42 तक।
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजन समय👉 अंत:रात्रि 03:42 से 16 फरवरी प्रातः 06:55 तक।
पारण समय👉 16 फरवरी को प्रातः 06:55 से दिन 03:15 तक।
शिवरात्रि पर रात्रि जागरण और पूजन का महत्त्व
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माना जाता है कि आध्यात्मिक साधना के लिए उपवास करना अति आवश्यक है। इस दिन रात्रि को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हर एक उपवास रखने वाले का धर्म माना गया है। इस अवसर पर रात्रि जागरण करने वाले भक्तों को शिव नाम, पंचाक्षर मंत्र अथवा शिव स्रोत का आश्रय लेकर अपने जागरण को सफल करना चाहिए।
उपवास के साथ रात्रि जागरण के महत्व पर संतों का कहना है कि पांचों इंद्रियों द्वारा आत्मा पर जो विकार छा गया है उसके प्रति जाग्रत हो जाना ही जागरण है। यही नहीं रात्रि प्रिय महादेव से भेंट करने का सबसे उपयुक्त समय भी यही होता है। इसी कारण भक्त उपवास के साथ रात्रि में जागकर भोलेनाथ की पूजा करते है।
शास्त्रों में शिवरात्रि के पूजन को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। कहते हैं महाशिवरात्रि के बाद शिव जी को प्रसन्न करने के लिए हर मासिक शिवरात्रि पर विधिपूर्वक व्रत और पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि इस दिन महादेव की आराधना करने से मनुष्य के जीवन से सभी कष्ट दूर होते हैं। साथ ही उसे आर्थिक परेशनियों से भी छुटकारा मिलता है। अगर आप पुराने कर्ज़ों से परेशान हैं तो इस दिन भोलेनाथ की उपासना कर आप अपनी समस्या से निजात पा सकते हैं। इसके अलावा भोलेनाथ की कृपा से कोई भी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाता है।
शिवपुराण कथा में छः वस्तुओं का महत्व
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बेलपत्र से शिवलिंग पर पानी छिड़कने का अर्थ है कि महादेव की क्रोध की ज्वाला को शान्त करने के लिए उन्हें ठंडे जल से स्नान कराया जाता है।
शिवलिंग पर चन्दन का टीका लगाना शुभ जाग्रत करने का प्रतीक है। फल, फूल चढ़ाना इसका अर्थ है भगवान का धन्यवाद करना।
धूप जलाना, इसका अर्थ है सारे कष्ट और दुःख दूर रहे।
दिया जलाना इसका अर्थ है कि भगवान अज्ञानता के अंधेरे को मिटा कर हमें शिक्षा की रौशनी प्रदान करें जिससे हम अपने जीवन में उन्नति कर सकें।
पान का पत्ता, इसका अर्थ है कि आपने हमें जो दिया जितना दिया हम उसमें संतुष्ट है और आपके आभारी हैं।
समुद्र मंथन की कथा
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समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित थी, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनंद लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है
शिकारी की कथा
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एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'
शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।
पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।
भगवान गंगाधर की आरती
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ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर...॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर...॥
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम् ॥ हर...॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर...॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर...॥
कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम् ॥ हर...॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर...॥
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर...॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर...॥
त्रिगुण शिवजी की आरती
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ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव...॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।
पार्वती अर्धांगनी, शिवलहरी गंगा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
पर्वत सौहे पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
जटा में गंगा बहत है, गल मुंडल माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव....।।...
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#🔱हर हर महादेव #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🔱बम बम भोले🙏 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱रुद्राभिषेक🙏
🕉️ शिवरात्रि व्रत कथा🕉️
प्राचीन काल में, किसी जंगल में एक गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार करता तथा अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था।
एक बार शिव-रात्रि के दिन जब वह शिकार के लिए निकला, पर संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई शिकार न मिला। उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा इस बात से वह चिंतित हो गया।
सूर्यास्त होने पर वह एक जलाशय के समीप गया, और वहाँ एक घाट के किनारे एक पेड़ पर थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ़ गया। उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ जरूर आयेगा।
वह पेड़ ‘बेल-पत्र’ का था और उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढके होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था।
रात का पहला प्रहर बीतने से पहले एक हिरणी वहाँ पर पानी पीने के लिए आई। उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा।
ऐसा करने में, उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूँदे नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की
#पहलेप्रहर की पूजा हो गयी।
हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा, और भयभीत हो कर, शिकारी से, काँपते हुए स्वर में बोली–मुझे मत मारो।’
शिकारी ने कहा–‘‘वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड़ सकता।’
हिरणी ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी। तब वह उसका शिकार कर ले।
शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था।
उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे #सत्य पर ही #धरती टिकी है; समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है। क्रूर होने के बावजूद भी, शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने ‘जल्दी लौटना’ कहकर, उस हिरनी को जाने दिया।
थोड़ी ही देर बाद एक और हिरनी वहाँ पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो गया, तीर साधने लगा और ऐसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की #दूसरेप्रहर की पूजा भी हो गयी।
इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर, हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया।
अब तो वह इसी चिन्ता से व्याकुल हो रहा था कि उनमें से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा।
इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर शिकारी बड़ा प्रसन्न हुआ। अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वतः ही सम्पन्न हो गयी लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज से वह हिरन सावधान हो गया।
उसने शिकारी को देखा और पूछा–‘तुम क्या करना चाहते हो ?’
शिकारी बोला–‘अपने कुटुम्ब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूँगा।’
वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा–‘मैं धन्य हूँ कि मेरा यह शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा पर कृपया कर अभी मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बँधा कर यहाँ लौट आऊँ।’
#शिकारी का हृदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह विनय पूर्वक बोला–‘जो-जो यहाँ आये, सभी बातें बनाकर चले गये और अभी तक नहीं लौटे, यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे, तो मेरे परिजनों का क्या होगा ?’
अब #हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने #सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता। शिकारी ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि ‘शीघ्र लौट आना।’
#रात्रि का अन्तिम प्रहर शुरू होते ही उस शिकारी के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था।
उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी #चौथेप्रहर की भी शिव-पूजा सम्पन्न हो गयी।
अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा–‘ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने परिवार का पालन करता रहा।’
अब उसने अपना #बाण रोक लिया तथा मृगों से कहा की वे सब धन्य है तथा उन्हें वापिस जाने दिया। उसके ऐसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर ‘#गुह’ नाम प्रदान किया।
शिवजी जटाओं में गंगाजी को धारण करने वाले, सिर पर चन्द्रमा को सजाने वाले, मस्तक पर त्रिपुण्ड तथा तीसरे नेत्र वाले, कण्ठ में कालपाश (नागराज) तथा रुद्राक्ष-माला से सुशोभित, हाथ में डमरू और त्रिशूल है।
भक्तगण बड़ी श्रद्धा से जिन्हें शिवशंकर, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, भगवान् आशुतोष, उमापति, गौरीशंकर, सोमेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नीलकण्ठ, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से सम्बोधित कर उनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं।
ऐसे भगवान् शिव एवं शिवा हम सबके चिन्तन को सदा-सदैव सकारात्मक बनायें एवं सबकी मनोकामनाएँ पूरी करें।
॥ॐ नमः शिवाय्॥
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
शततमोऽध्यायः
शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 312)
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(सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ।। सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया । तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ।।
उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा।
भीष्म उवाच
त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः । अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ।।
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।
भीष्म बोले-सारथे ! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो। क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा।
सूत उवाच
दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः । वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ।।
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् । नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ।।
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा । एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ।।)
सूत बोला- नरश्रेष्ठ ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि 'इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।
ततो देवव्रतो वृद्धेः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वने पितुः स्वयम् ।। ७५ ।।
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ।। ७५ ।।
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ।। ७६ ।।
भारत ! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ।। ७६ ।।
दाश उवाच
(राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर । अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ।।)
दाशराज बोला- याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है। इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो।
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।
पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ।। ७७ ।।
भरतर्षभ ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं। शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा ।। ७७ ।।
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ।। ७८ ।।
ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह-सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ।। ७८ ।।
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः।
यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ।। ७९ ।।
यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ।। ७९ ।।
तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।
अर्हः सत्यवतीं बोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ।। ८० ।।
तात ! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी। वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ।। ८० ।।
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया । स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ।। ८१ ।।
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ।। ८२ ।।
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज ! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही। आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान्के साथ शत्रुता ।। ८१-८२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🛐*॥ श्रीहरि: ॥*🛐
*⚜️ परमात्म-तत्त्व की प्राप्ति का बढ़िया साधन क्या है⁉️ इस संबंध में एक बात बताई जाती है। संसार से विमुखता पूर्वक परमात्मा की तरफ चलने को हम बढ़िया समझते हैं, लेकिन बात थोड़ी अलग है, परमात्मा से हमने जो दूरी मान रखी है, इस दूरी की मान्यता को हटाने की आवश्यकता है। मानो परमात्मा की प्राप्ति नहीं करना है, परमात्मा के अप्राप्ति की जो मान्यता की हुई है, इस मान्यता को हटाना है। जैसे किसी को सत्यका पालन करना हो, तो उसे सत्य बोलने की अपेक्षा झूठ नहीं बोलने की सावधानी रखने की ज्यादा आवश्यकता है। असाधन के त्याग से स्वत: साध्य तत्त्व का अनुभव होता है।*
*⚜️ अवगुणों की स्वतंन्त्र सत्ता नहीं है, किसी में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि अवगुण दिखते हैं, तो गुणों की कमी का नाम ही अवगुण है। परमात्मा का और हमारा नित्य संबंध है, इस तरफ प्रायः दृष्टि कम है, इस कमी की पूर्ति करना साधन है। परमात्मप्राप्ति के लिए साधन करने की अपेक्षा परमात्मा को जो अप्राप्त मान रखा है, इस अप्राप्ति की मान्यता को हटाना बढ़िया है।**⚜️ परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है, ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ परमात्मा नहीं हो। परमात्मा सर्वव्यापक है, सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थों में, घटनाओं में मौजूद है। हमने परमात्मा की सर्व व्यापकता में जो कमी मान रखी है, संसार को जो सत्ता और महत्ता दी हुई है, इसको हटाना है। संसार की सत्ता और महत्ता के हटते ही सर्व व्यापक परमात्मा प्रकट हो जाएंगे। जिसका भाव विद्यमान ही नहीं है, उन शरीर-संसार को प्राप्त मान लिया और नित्य प्राप्त, सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा को अप्राप्त मान लिया, इस अप्राप्ति की मान्यता को हटाना है।*
*⚜️ 'सब जग ईश्वर रूप है, भलो बुरो नहिं कोय। जैसी जाकी भावना, तैसो ही फल होय॥' वास्तव में परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है, संसार का ज्ञान होता है; संसार का ज्ञान होते ही संसार की सत्ता और महत्ता मिट जाती है। इसलिए विध्यात्मक और निषेधात्मक साधन में निषेधात्मक साधन तेज है, क्योंकि संसार का निषेध ही करना है। आप नित्य हैं, शरीर-संसार अनित्य हैं, आपका और शरीर-संसार का संबंध हो ही नहीं सकता। इनके संबंध की जो मान्यता बनी हुई है, इस मान्यता का त्याग करना है। शरीर-संसार नित्य है अथवा अनित्य है, लेकिन शरीर-संसार का और हमारा (स्वरूप का) संबंध अनित्य है। नित्य को कहीं से लाना नहीं है, अनित्य का त्याग करना है, अनित्य का त्याग होते ही नित्य तत्त्व का अनुभव हो जाएगा।*
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#महाभारत
महाभारत की कथा में जब कर्ण ने श्रीकृष्ण से भावुक होकर पूछा—
“मेरा क्या दोष था?”
तो श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया, उसका सार बहुत गहरा और कर्म-प्रधान है।
श्रीकृष्ण का उत्तर (भावार्थ)
“कर्ण, तुम्हारा जन्म नहीं, तुम्हारे कर्म तुम्हारे बंधन बने।
तुमने सत्य को पहचाना, फिर भी अधर्म का साथ चुना।
सामर्थ्य होते हुए भी अन्याय के विरुद्ध खड़े नहीं हुए—
यही तुम्हारा दोष है।”
श्रीकृष्ण ने कर्ण को क्या समझाया?
जन्म नहीं, कर्म निर्णायक होते हैं — सूतपुत्र कहलाना दोष नहीं था।
दुर्योधन का साथ — मित्रता के नाम पर अधर्म का समर्थन किया।
द्रौपदी का अपमान — सभा में मौन (और समर्थन) सबसे बड़ा पाप बना।
शक्ति होते हुए भी विवेक का त्याग — सत्य जानते हुए गलत का साथ।
“धर्म का ज्ञान होते हुए भी अधर्म चुनना—
यही मनुष्य का वास्तविक पतन है।”
यह संवाद हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ नहीं, हमारे चुनाव हमारा भाग्य तय करते हैं।
#🏠घर-परिवार
👩❤️👩संबंध👩❤️👩
🎇इस जीवन में जो भी संबंध हमें मिलते हैं, जिन लोगों से हमारा सामना होता है, वे अचानक या संयोग मात्र नहीं होते। ये सब पहले से बनी हुई एक सूक्ष्म व्यवस्था का परिणाम होते हैं। हर आत्मा अपने साथ पूर्व कर्मों का संस्कार लेकर आती है और वही संस्कार तय करते हैं कि हमें किससे मिलना है, किससे जुड़ना है, और किस रूप में जुड़ना है। हम अक्सर सोचते हैं कि हम स्वतंत्र रूप से जीवन जी रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हम उसी जीवन को जी रहे होते हैं जिसे हम स्वयं अपने कर्मों से लगातार गढ़ रहे हैं।
आज जिन लोगों के प्रति हमारे मन में ईर्ष्या है, द्वेष है, छल है, उनसे भी हम अनजाने में एक संबंध बना रहे होते हैं। वह संबंध कटु हो सकता है, संघर्षपूर्ण हो सकता है, पर वह भी उतना ही वास्तविक है जितना प्रेम या करुणा से बना हुआ संबंध। कर्म केवल क्रिया नहीं है, कर्म एक बंधन है—जो हमें दूसरे जीवों से जोड़ देता है। जिस भाव से किया गया कर्म होता है, वही भाव उस बंधन का स्वरूप तय करता है।🎇
🌷इसी प्रकार जिनसे हम प्रेम करते हैं, जिनके लिए निस्वार्थ भाव से अच्छा करते हैं, जिनके दुःख में सहभागी बनते हैं, उनके साथ भी एक गहरा ऋण–अनुबंध बनता है। वह संबंध हल्का नहीं होता, वह आत्मा के स्तर पर अंकित हो जाता है। समय बीत जाता है, शरीर बदल जाते हैं, नाम और रूप बदल जाते हैं, लेकिन वह संबंध संस्कार बनकर आगे की यात्रा में साथ चलता है।🌷
🧑🍼हम जो आज बो रहे हैं, वही भविष्य में संबंधों के रूप में हमें वापस मिलता है। कोई माता बनकर आता है, कोई पुत्र, कोई मित्र, कोई शत्रु—सब हमारे ही कर्मों की प्रतिध्वनि होते हैं। जो आज हमें पीड़ा देता है, वह भी कहीं न कहीं हमारे ही अतीत का विस्तार होता है और जो आज हमें सहारा देता है, वह भी हमारे ही किसी शुभ कर्म का फल होता है।🧑🍼
🛐इसलिए जीवन केवल वर्तमान का खेल नहीं है, यह अनेक जन्मों में फैली हुई एक निरंतर यात्रा है। हर भाव, हर विचार, हर व्यवहार अगले जीवन की नींव रख रहा होता है। हम चाहे इसे समझें या न समझें, लेकिन प्रत्येक क्षण हम अपने आने वाले संबंधों की रचना कर रहे होते हैं। यही कारण है कि सजग व्यक्ति कर्म करते समय केवल आज नहीं देखता, वह उस अदृश्य कल को भी ध्यान में रखता है जो अवश्य आने वाला है।🛐













