#जय श्री कृष्ण
मोरपंख का महत्त्व
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ज्योतिष में मोरपंख को सभी नौ ग्रहों का प्रतिनिधि माना गया है, विशेष तौर पर मोरपंख के कुछ ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें किसी शुभ मुहूर्त में करने से सभी समस्याओं से तुरंत छुटकारा मिल जाता है।
श्रीकृष्ण का श्रृंगार मोर पंख के बिना अधूरा ही लगता है। वे अपने मुकुट में मोर पंख भी विशेष रूप से धारण करते हैं।
मोर पंख का संबंध केवल श्रीकृष्ण से नहीं, बल्कि अन्य देवी-देवताओं से भी है। शास्त्रों के अनुसार मोर के पंखों में सभी देवी-देवताओं और सभी नौ ग्रहों का वास होता है।
प्राचीन काल में एक मोर के माध्यम से देवताओं ने संध्या नाम के असुर का वध किया था। पक्षी शास्त्र में मोर और गरुड़ के पंखों का विशेष महत्व बताया गया है।
आइये जानते हैं मोर पंख आपके जीवन को किस तरह सुख- समृद्धि से भर देता है-
* मोर का शत्रु सर्प है. अत: ज्योतिष में जिन लोगों को राहू की स्थिति शुभ नहीं हो उन्हें मोर पंख सदैव अपने साथ रखना चाहिए।
* आयुर्वेद में मोर पंख से तपेदिक, दमा, लकवा, नजला और बांझपन जैसे दुसाध्य रोगों में सफलता पूर्वक चिकित्सा बताई गई है।
* जीवन में मोर पंख से कई तरह के संकट दूर किये जा सकते हैं. अचानक कष्ट या विपत्ति आने पर घर अथवा शयनकक्ष के अग्नि कोण में मोर पंख लगाना चाहिए. थोड़े ही समय में सकारात्मक असर होगा।
* धन-वैभव में वृद्धि की कामना से निवेदन पूर्वक नित्य पूजित मन्दिर में श्रीराधा-कृष्ण के मुकुट में मोर पंख की स्थापना करके/करवाकर 40वें दिन उस मोर पंख को लाकर अपनी तिजोरी या लॉकर में रख दें. धन-संपत्ति में वृद्धि होना प्रारम्भ हो जायेगी। सभी प्रकार के रुके हुए कार्य भी इस प्रयोग से बन जाते हैं।
* जिन लोगों की कुण्डली में राहू-केतु कालसर्प योग का निर्माण कर रहे हों उन्हें अपने तकिये के खोल में 7 मोर पंख सोमवार की रात्रि में डालकर उस तकिये का उपयोग करना चाहिए साथ ही शयनकक्ष की पश्चिम दिशा की दीवार पर मोर पंखों का पंखा जिसमें कम से कम 11 मोर पंख लगे हों लगा देना चाहिए।
इससे कुण्डली में अच्छे ग्रह अपनी शुभ प्रभाव देने लगेंगे और राहू-केतु का अशुभत्व कम हो जायेगा।
* अगर बच्चा जिद्दी होता जा रहा हो तो उसे नित्य मोर पंखों से बने पंखे से हवा करनी चाहिए या अपने सीलिंग फैन पर ही मोर पंख पंखुड़ियों पर चिपका देना चाहिए।
* नवजात शिशु के सिरहाने चांदी के तावीज में एक मोर पंख भरकर रखने शिशु को डर नहीं लगेगा नजर इत्यादि का डर भी नहीं रहेगा।
* कोई शत्रु ज्यादा तंग कर रहा हो मोर के पंख पर हनुमान जी के मस्तक के सिंदूर से मंगलवार या शनिवार रात्रि में उस शत्रु का नाम लिखकर के अपने घर के मन्दिर में रात भर रखें।
प्रात:काल उठकर बिना नहाये-धोये बहते पानी में बहा देने से शत्रु-शत्रुता छोड़कर मित्रवत् व्यवहार करने लगता है. इस तरह मोर पंख से हम अपने जीवन के अमंगलों को हटाकर मंगलमय स्थिति को ला सकते हैं।श्री राधे।।।गुरु कृपा केवलं।।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#अपना काशी बनारस🏝🏝🏡
तिलभांडेश्वर महादेव, काशी
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भगवान शिव की नगरी काशी में कई प्रसिद्ध शिव मंदिर है, इनमें एक है बाबा तिल भांडेश्वर। कहते हैं यह सतयुग में प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है। कलयुग से पहले तक यह शिवलिंग हर दिन तिल आकार में बढ़ता था। लेकिन कलयुग के आगमन पर लोगों को यह चिंता सताने लगी कि यह इसी आकार में हर दिन बढ़ता रहा तो पूरी दुनिया इस शिवलिंग में समा जाएगी।
भगवान शिव की आराधना करने पर भगवान शिव ने प्रकट होकर साल में केवल संक्रांति पर ही इसके बढ़ने का वरदान दिया। कहते हैं उस समय से हर साल मकर संक्रांति पर इस शिवलिंग का आकार बढ़ता है।
इस मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहां विशालकाय शिवलिंग हर रोज तिल के बराबर बढ़ता है, जिसके कारण से इस मंदिर को तिलभांडेश्वर के नाम से जाना जाता है। जिसका बखान शिव पुराण में भी है। वर्तमान में इस लिंग का आधार कहां है, ये तो पता नहीं पता लेकिन जमीन से सौ मीटर ऊंचाई पर भी यह विशाल शिवलिंग भक्तों की हर मनोकामना पूरी करता है। महाशिवरात्रि में इस जागृत शिवलिंग की आराधना का विशेष महत्व है।
इस शिवलिंग के दर्शन से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस मंदिर के साथ अनेक मान्यताएं जुडी हैं, जिनमें से एक है विभाण्ड ऋषि के तप की कथा-
कथा के अनुसार वर्षों पहले इसी स्थान पर विभाण्ड ऋषि ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। इसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में बाबा ने उन्हें दर्शन दिया था और कहा था कि कलयुग में ये शिवलिंग रोज तिल के सामान बढे़गा और इसके दर्शन मात्र से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।
यह शिवलिंग शनि की महादशा से पीड़ित लोगों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कष्टों से मुक्ति के लिए शनि ने स्वयं यहां ढाई वर्ष तपस्या की थी। यही कारण है कि शिवभक्त यहां महाशिवरात्रि में विशेष तौर पर पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर का शिवलिंग तिल-तिल बढ़ने और शनि के तिल प्रिय होने का कारण तिलभांडेश्वर पड़ा।
इतना विशाल शिवलिंग और उस पर जल अर्पण के साथ बेलपत्र और फूलों का श्रृंगार का महत्व है। शिव पुराण के ही अनुसार इस मंदिर में बाबा को भांग और बेल पत्र के साथ-साथ तिल और तिल का तेल चढ़ाया जाता है। मान्यता यह भी है कि जिस पर भी शनि की महादशा चलती है। वह इस मंदिर में स्थापित बाबा के शिवलिंग के साथ ही शनि का दीपक जला कर शनि के कोप से बच सकता है।
इसके अलावा मंदिर में उपस्थित कुछ पुराने लोगों ने बताया कि मुस्लिम शासन के दौरान मंदिरों को ध्वस्त करने के क्रम में तिलभांडेश्वर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई थी। मंदिर को तीन बार मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त कराने के लिए सैनिकों को भेजा, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट गया कि सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी। अंगेजी शासन के दौरान एक बार ब्रिटिश अधिकारियों ने शिवलिंग के आकार में बढ़ोत्तरी को नापने के लिए उसके चारों ओर धागा बांध दिया, जो अगले दिन टूटा मिला।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#चंद्रमा
चंद्रमा की सुन्दरता व राजा दक्ष प्रजापति का चंद्रमा को श्राप
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चंद्रमा की सुंदरता पर राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां मोहित हो गईं. वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थी दक्ष ने समझाया सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां जिद पर अड़ी रहीं.
अश्विनी सबसे बड़ी थी. उसने कहा कि पिताजी हम आपस में मेलजोल से मित्रवत रहेंगे. आपको शिकायत नहीं मिलेगी. दक्ष ने सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया.
विवाह से चंद्रमा और उनकी पत्नियां दोनों बहुत प्रसन्न थे लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही. जल्द ही चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे.
यह बात दक्ष को पता चली और उन्होंने चंद्रमा को समझाया. कुछ दिनों तक तो चंद्रमा ठीक रहे लेकिन जल्द ही वापस रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से भी ज्यादा तेज हो गई.
अन्य पुत्रियों के विलाप से दुखी दक्ष ने फिर चंद्रमा से बात की लेकिन उन्होंने इसे अपना निजी मामला बताकर दक्ष का अपमान कर दिया.
दक्ष प्रजापति थे. कोई देवता भी उनका अनादर नहीं करता था. क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दिया कि तुम क्षय रोग के मरीज हो जाओ.
दक्ष के शाप से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए. उनकी चमक समाप्त हो गई. पृथ्वी की गति बिगड़ने लगी. परेशान ऋषि-मुनि और देवता भगवान ब्रह्मा की शरण में गए.
ब्रह्मा, दक्ष के पिता थे लेकिन दक्ष के शाप को समाप्त कर पाना उनके वश में नहीं था. उन्होंने देवताओं को शिवजी की शरण में जाने का सुझाव दिया.
ब्रह्मा ने कहा- चंद्रदेव भगवान शिव को तप से प्रसन्न करें. दक्ष पर उनके अलावा किसी का वश नहीं चल सकता. ब्रह्मा की सलाह पर चंद्रमा ने शिवलिंग बनाकर घोर तप आरंभ किया.
महादेव प्रसन्न हुए और चंद्रमा से वरदान मांगने को कहा. चंद्रमा ने शिवजी से अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगते हुए क्षय रोग से मुक्ति का वरदान मांगा.
भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें जिसने शाप दिया है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है. उसके शाप को समाप्त करना संभव नहीं फिर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ न कुछ करूंगा जरूर.
शिवजी बोले- एक माह में जो दो पक्ष होते हैं, उसमें से एक पक्ष में तुम मेरे वरदान से निखरते जाओगे, लेकिन दक्ष के शाप के प्रभाव से दूसरे पक्ष में क्षीण होते जाओगे. शिव के वरदान से चंद्रमा शुक्लपक्ष में तेजस्वी रहते हैं और कृष्ण पक्ष में धूमिल हो जाते हैं.
चंद्रमा की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हो गए थे उस स्थान की देवों ने पूजा की और वह स्थान सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ. चंद्रमा की वे सताइस पत्नियां ही सताइस विभिन्न नक्षत्र हैं.
(शिवपुराण की कथा🙏🏻💐)
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🙏शिव पार्वती #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
भृंगी की कथा
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महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है।
भृंगी की कथा
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महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। कहते हैं जहां शिव होंगे वहां गणेश, नंदी, श्रृंगी, भृंगी, वीरभद्र का वास स्वयं ही होगा। शिव-शिवा के साथ उनके ये गण अवश्य चलते हैं। इनमें से सभी प्रमुख गणों के बारे में तो कहानियां प्रचलित हैं। जैसे दक्ष यज्ञध्वंस के लिए वीरभद्र उत्पन्न हुए।
मां पार्वती ने श्रीगणेश को उत्पन्न किया। नंदी तो शिव के वाहन हैं जो धर्म के अवतार हैं। शिलाद मुनि के पुत्र के रूप में जन्म लेकर शिवजीके वाहन बने नंदी। आपने यह सब कथाएं खूब सुनी होंगी पर क्या प्रमुख शिवगण भृंगी की कथा सुनी है?भृंगी की खास बात यह हैं कि उनके तीन पैर हैं। शिव विवाह के लिए चलीबारात में उनका जिक्र मिलता हैं बिनु पद होए कोई.. बहुपद बाहू” (यानी शिवगणों में कई बिना पैरों के थे और किसी के पास कई पैर थे) ये पद तुलसीदासजी ने भृंगी के लिए ही लिखा है।भृंगी के तीन पैर कैसे हुए? इसके पीछे एक कथा है जो हमें बताती है कि उमा-शंकर के बीच का प्रेम कितना गहरा है।
ये दोनों वस्तुत: एक ही हैं। दरअसल भृंगी की एक अनुचित जिद ही वजह से सदाशिव और जगदंबा को अर्द्धनारीश्वर रुप धारण करना पड़ा।भृंगी महान शिवभक्त थे। सदाशिव के चरणों में उनकी अत्य़धिक प्रीति थी। उन्होंने स्वप्न में भी शिव के अतिरिक्त किसी का ध्यान नहीं किया था। यहां तक कि वह जगद्जननी मां पार्वती को भी सदाशिव से अलग मानते थे। शिवस्य चरणम् केवलम्” के भाव में हमेशा रहते थे। उनकी बुद्धि यह स्वीकार ही नहीं करती थी कि शिव और पार्वती में कोई भेद नहीं है।
एक बार सदाशिव के परम भक्त श्रृंगी ऋषि कैलाश पर अपने आराध्य की परिक्रमा करने पहुंचे। सदैव की तरह महादेव के बाईं जंघा पर आदिशक्तिजगदंबा विराजमान थीं। महादेव समाधि में थे और जगदंबा चैतन्य थीं। जगदंबा के नेत्र खुले थे।
भृंगी तो आए थे शिवजी की परिक्रमा करने। शिवजी तो ध्यानमग्न थे। शिवप्रेम में भृंगी मतवाले हो रहे थे। वह सिर्फ शिवजी की परिक्रमा करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य की उनकी परिभाषा अलग थी। पर क्या करें, पार्वतीजी तो शिवजी के वामांग में विराजमान हैं। भृंगी अपना उतावनापन रोक ही नहीं पाए। साहस इतना बढ़ गया कि उन्होंने जगदंबा से अनुरोध कर दिया कि वह शिवजी से अलग होकर बैठें ताकि मैं शिवजी की परिक्रमा कर सकूं।
जगदंबा समझ गईं कि यह है तो तपस्वी लेकिन इसे ज्ञान नहीं हुआ है। अभी यह अधूरा ज्ञान का है इसलिए उन्होंने भृंगी की बात को अनसुना किया। भृंगी तो हठ में थे, कुछ भी सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। फिर से पार्वतीजी से कहा कि आपकुछ देर के लिए हट जाएं, मैं परिक्रमा कर लूं।मां पार्वती ने इसपर आपत्ति जताई और कहा कि अनुचित बात बंद करो.
जगदंबा महादेव की शक्ति हैं. वह सदाशिव से पृथक होने को कैसे तैयार होतीं! माता ने भृंगी को कई तरह से समझाया, प्रकृति और पुरुष के संबंधों की व्याख्या की। वेदों का उदाहरण दिया परंतु भृंगी भी वैसे ही हठी। हठी की बुद्धि तो वैसे भी आधी हो जाती है।माता द्वारा दिए ज्ञान-उपदेश उनके विवेक में उतरे ही नहीं। उनकी बुद्धि सृष्टि के इस रहस्य को समझने के लिए तैयार ही नहीं हुई। उन्होंने सिर्फ शिव की परिक्रमा करने की ठान रखी थी। माता ने सोचा इस अज्ञानी को कुछ भी समझाने का लाभ नहीं। इसे अनदेखा ही कर देना चाहिए। माता शिवजी से अलग न हुईं।
भृंगी ने भी हठ ही पाल रखा था। अपने मन की करने के लिए एक योजना बना ली। भृंगी ने सर्प का रुप धारण किया और शिवजी की परिक्रमा करने लगे।
सरकते हुए वह जगदंबा और महादेव के बीच से निकलने का यत्न करने लगे। उनकी इस धृष्टता का परिणाम हुआ कि शिवजी की समाधि भंग हो गई। उन्होंने समझ लिया कि मूर्ख जगदंबा को मेरे वाम अंग पर देखकर विचलित है। वह दोनों में भेद कर रहा है। इसे सांकेतिक रूप से समझाने के लिए शिवजी ने तत्काल अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण कर लिया। जगदंबा अब उन्हीं में विलीन हो गईं थी।
शिवजी दाहिने भाग से पुरुष रूप में और बाएं भाग से स्त्रीरूप में दिखने लगे।अब तो भृंगी की योजना पर पानी फिरने लगा। हठी का हठ तो भगवान से भी ऊपर जाने लगता है। भृंगी ने इतने पर भी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें तो बस शिवजी की ही परिक्रमा करनी थी। अपनी जिद पूरी करने की लिए एक और मूर्खतापूर्ण प्रयास किया। अब भृंगी ने चूहे का रुप धारण कर लिया।
चूहे के रूप में प्रभु के अर्द्धनारीश्वर रुप को कुतरकर एक दूसरे से अलग करने की कोशिश में जुट गए। अब यह तो अति थी। शिवभक्त भृंगी की धृष्टता को लगातार सहन करती आ रही जगदंबा का धैर्य चूक गयी|
उन्होंने भृंगी को श्राप दिया- “हे भृंगी तू सृष्टि के आदि नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यदि तू मातृशक्ति का सम्मान करने में अपनी हेठी समझता है तो अभी इसी समय तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाएगा।
यह श्राप सुनकर स्वयं महादेव भी व्याकुल हो उठे। भृंगी की बुद्धि भले ही हर गई थी पर महादेव जानते थे कि इस श्राप का मतलब कितना गंभीर है।
*शरीर विज्ञान की तंत्रोक्त व्याख्या के मुताबिक इंसान के शरीर में हड्डियां और पेशियां पिता से मिलती हैं, जबकि रक्त और मांसमाता के अंश से प्राप्त होता है।*
फिर क्या था, भृंगी की तो दुर्गति हो गई। उनके शरीर से तत्काल रक्त और मांस अलग हो गया। शरीर में बची रह गईं तो सिर्फ हड्डियां और मांसपेशियां। मृत्यु तो हो नहीं सकती थी क्योंकि वो अविमुक्त कैलाश के क्षेत्र में थे और स्वयं सदाशिव और महामाया उनके सामने थे।
उनके प्राण हरने के लिए यमदूत वहां पहुंचने का साहस ही नहीं कर सकते थे। असह्य पीड़ा से भृंगी बेचैन होने लगे। ये शाप भी आदिशक्ति जगदंबा का दिया हुआ था। उन्होंने ये शाप भृंगी की भेदबुद्धि को सही रास्ते पर लाने के लिए दिया था। इसलिए महादेव भी बीच में नहीं पड़े।
इस शाप का लाभ यह हुआ कि भृंगी असहनीय पीड़ा में पड़कर समझ गए कि पितृशक्ति किसी भी सूरत में मातृशक्ति से परे नहीं है। माता और पितामिलकर ही इस शरीर का निर्माण करते हैं। इसलिए दोनों ही पूज्य हैं।इसके बाद भृंगी ने असह्य पीड़ा से तड़पते हुए जगदंबा की अभ्यर्थना की। माता तो माता होती है। उन्होंने तुरंत उनपर कृपा की और पीड़ा समाप्त कर दी। माता ने अपना शाप वापस लेने का उपक्रम शुरू किया लेकिन धन्य थे भक्त भृंगी भी। उन्होंने माता को शाप वापस लेने से रोका।
भृंगी ने कहा- माता मेरी पीड़ा दूर करके आपने मेरे उपर बड़ी कृपा की है। परंतु मुझे इसी स्वरुप में रहने दीजिए। मेरा यह स्वरूप संसार के लिए एक उदाहरण होगा। इस सृष्टि में फिर से कोई मेरी तरह भ्रम का शिकार होकर माता और पिता को एक दूसरे से अलग समझने की भूल न करेगा। मैंने इतना अपराध किया फिर भी आपने मेरे ऊपर अनुग्रह किया। अब मैं एक जीवंत उदाहरण बनकर सदैव आपके आसपास ही रहूंगा।
भक्त की यह बात सुनकर महादेव और जगदंबा दोनों पुलकित हो गए। अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण किए हुए मां जगदंबा और पिता महादेव ने तुरंत भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया। भृंगी चलने-फिरने में समर्थ हो सकें इसलिए उन्हें तीसरा पैर भी दिया। तीसरे पैर से वह अपने भार को संभालकर शिव-पार्वती के साथ चलते हैं।अर्धनारीश्वर भगवान ने कहा- हे भृंगी तुम सदा हमारे साथ रहोगे।
तुम्हारी उपस्थिति इस जगत को संदेश होगी कि हर जीव में जितना अंश पुरूष है उतनी ही अंश है नारी। नारी और पुरुष में भेद करने वाले की गति तुम्हारे जैसे हो जाती है। पुरुष और स्त्री मिलकर संसार को आगे बढ़ाएं, दोनों बराबर अंश के योगी हैं यही सिद्ध करने को मैंने अर्धनारीश्वर रूप धरा है। स्त्री-पुरुष दोनों का अपना स्थान, अपना अस्तित्व है। इसे नकारने वाले को शिव-शिवा दोनों में से किसी की भी कृपा प्राप्त नहीं होती। वह जीव मृत्युलोक में सदा शिव-शिवा की कृपा के लिए तरसता ही विदा हो जाएगा।
भृंगी को वो पद प्राप्त हुआ, जिसे हासिल करने के लिए इंद्रादि बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं। संसार को मैथुनी सृष्टि की व्यवस्था शिवजी ने दी है।
इसके लिए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को अपना अर्धनारीश्वर स्वरूप दिखाया। उसे देखकर ही ब्रह्मा ने नारी की कल्पना की। नारी और पुरुष के संयोग से सृष्टि रचना की व्यवस्था दी। अर्थात नर-नारी मिलकर सूक्ष्म ब्रह्मा की तरह सृष्टिकर्ता हो जाते हैं। फिर शिव ने जगदंबा के साथ विवाह व्यवस्था दी। सर्वप्रथम विवाह शिव-जगदंबा का ही है।
जय महाकाल👏🏻🌼
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
शूद्र द्वारा विवाहिता ब्राह्मणी से हुए पुत्र को चाण्डाल कहते हैं ।
🎯स्पष्ट है कि प्रतिलोम विवाह प्राचीन काल से हो रहे हैं तथा ऐसे दंपति को मारा नहीं गया ।
नारायण
🪷🌷🪷
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मनुस्मृति-मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं:👇
#🕉️सनातन धर्म🚩
धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है । साधारण लोग इसे नही समझ पाते । इसलिए शास्त्र और सन्त जो बतलावे उसे ही ठीक रास्ता समझना चाहिए । भिन्न भिन्न देश और जातियों मे जो जो महात्मा हो गए है उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर रचे हुये अपने ग्रंथों मे जो जो बातें बताये है उन्हीं का हमें यथायोग्य पालन करना चाहिए । धर्म क्या ही अधर्म क्या है इस बात का फैसला वेद करते है । समस्त स्मृतियोंमे मनुस्मृति सबसे प्राचीन और अधिक प्रामाणिक मानी जाती है । उसमें मनुजीने धर्म के दस मुख्य अंग बताये है । वे कहते है -
धृति ,क्षमा ,दम ,अस्तेय ,शौच ,इन्द्रियनिग्रह ,धी, विद्या, सत्य, और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है ।
धृति 👉 धैर्य धारण संतोष अथवा सहनशीलताका नाम धृति है । धैर्यकी ही धर्म नींव है । जिसे धैर्य नही वह धर्म का आचरण कैसे कर सकेगा ? बिना नींव का मकान नहीं होता । इसी प्रकार बिना धैर्य के धर्म नही होता । तुम एकांत मे बैठकर भगवान से प्राथना करो कि हमारी चाहे जो भी दशा हो जाए परन्तु धैर्य न छूटे ।
क्षमा 👉 दूसरा धर्म क्षमा है । अपनेमे पूरी शक्ति होनेपर भी अपना अपकार करनेवालेसे किसी प्रकार का बदला न लेना तथा उस अपकारको प्रसन्नता से सहन करना क्षमा कहलाता है । इसलिए इस जीवन संग्राममे हमें सर्वदा क्षमा का कवच पहने हुए ही सारे काम करने चाहिए।
दम 👉 तीसरा धर्म दम है । दमका साधारण अर्थ तो इन्द्रियनिग्रह है परंतु यहां दम का अर्थ मनको वश मे करना है । मन को वशमे कर लेने पर सभी इन्द्रियनिग्रह अपने अधिन हो जाती है ।
अस्तेय 👉 अस्तेय चोरी न करने का नाम ही है । इसका अर्थ बहुत व्यापक है । साधारणतः दुसरे की चीज को बिना पुछे ले लेना ही चोरी समझी जाती है ।
शौच 👉 अब शौच के विषय मे सुनो । शौच का अर्थ है सफाई या पवित्रता । यह दो प्रकार की होती है बाहरी और भीतरी । आजकल इस बाहरी सफाई के विषय मे बड़ा भ्रम फैला हुआ है l
इन्द्रियनिग्रह 👉 अच्छा अब इन्द्रियनिग्रह पर आता हू । जीव की सारी अशान्ति का कारण इन्द्रियो का असंयम ही है । इस शरीर रुप रथ का रथी जीव है । बुध्दि सारथी है और मन लगाम है और इन्द्रिया घोड़े है । जिसके इन्द्रिय रुप घोड़े बुद्धि रुप सारथी के अधीन होते है । वही सुख पूर्वक अपने लक्ष्य तक जा सकता है ।
धी 👉 धी बुद्धि को कहते है । मनुष्य के सारे आचार और विचार का रास्ता बुद्धि ही बतलाती है । बुद्धि जिस ओर ले जाती है उसी ओर पुरुष को जाना होता है । जैसा करना चाहती है वैसा ही करता है । इसलिए जीवन मे सफलता प्राप्त करने के लिए सद् बुद्धि की बहुत बड़ी आवश्यकता है ।
विद्या 👉 विद्या का अर्थ knowledge है । किन्तु सभी प्रकार का knowledge धर्म की कोटि मे नही आ सकता । इसलिए इसे अध्यात्म विद्या ही समझना चाहिएl
सत्य 👉 सत्य के साधारण स्वरूपसे सभी परिचित है । यही धर्म का वास्तविक स्वरूप है । धर्म का ही नही यदि सूक्ष्मतासे विचारा जाय तो यही स्वयं भगवान का स्वरूप है । वास्तव मे सत्य ही भगवान है ।
अक्रोध 👉 मनुष्य से जितने पाप बनते है । उनमें से अधिकांश परिणाम मे दूषित संस्कार पैदा करने वाले होने से भी हेय है । किन्तु यह क्रोध तो आरम्भ मे ही उद्वेग पैदा कर देता है । यह पहले जलन पैदा करता है । और पहले उसीको जलाता है जिसे होता है ।
महर्षि याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं:
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अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। दानं दमो दया शान्ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्।।
(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति)
श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में सनातन धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं :
सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:।
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।।
संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:।
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।।
अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:। तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।।
श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:। सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।।
नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:।
त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।।
महात्मा विदुर-महाभारत के महान यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं -
इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ।
उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है।
तुलसीदास द्वारा वर्णित धर्मरथ
सुनहु सखा, कह कृपानिधाना,
जेहिं जय होई सो स्यन्दन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका,
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।
बल बिबेक दम पर-हित घोरे,
छमा कृपा समता रजु जोरे।
ईस भजनु सारथी सुजाना,
बिरति चर्म संतोष कृपाना।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा,
बर बिग्यान कठिन कोदंडा।
अमल अचल मन त्रोन सामना,
सम जम नियम सिलीमुख नाना।
कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा,
एहि सम बिजय उपाय न दूजा।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें,
जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें।
महा अजय संसार रिपु,
जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होई दृढ़,
सुनहु सखा मति-धीर।। (लंकाकांड)
पद्मपुराण-ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते।
दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।।
अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते।
एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।।
अर्थात ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है।
धर्मसर्वस्वम् -जिस नैतिक नियम को आजकल 'गोल्डेन रूल' या 'एथिक आफ रेसिप्रोसिटी' कहते हैं उसे भारत में प्राचीन काल से मान्यता है। सनातन धर्म में इसे 'धर्मसर्वस्वम्" (धर्म का सब कुछ) कहा गया है:
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
--- पद्मपुराण, शृष्टि 19/357-358
अर्थ: धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।
साभार~ पं देव शर्मा💐
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#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६१
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
अस्सीवाँ सर्ग
अयोध्यासे गङ्गातटतक सुरम्य शिविर और कूप आदिसे युक्त सुखद राजमार्गका निर्माण
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमिका ज्ञान रखनेवाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनानेके लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्गकी रक्षा आदि अपने कर्ममें सदा सावधान रहनेवाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनानेवाले, नदी आदि पार करनेके लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जलके प्रवाहको रोकनेवाले वेतनभोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनानेवाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटनेवाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदिका काम करनेवाले, बाँसकी चटाई और सूप आदि बनानेवाले, चमड़ेका चारजामा आदि बनानेवाले तथा रास्तेकी विशेष जानकारी रखनेवाले सामर्थ्यशाली पुरुषोंने पहले प्रस्थान किया॥१-३॥
उस समय मार्ग ठीक करनेके लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्षके साथ वनप्रदेशकी ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमाके दिन उमड़े हुए समुद्रके महान् वेगकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ४॥
वे मार्ग-निर्माणमें निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकारके औजारोंके साथ आगे चल दिये॥५॥
वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूँठे वृक्ष तथा पत्थरोंको हटाते और नाना प्रकारके वृक्षोंको काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे॥६॥
जिन स्थानोंमें वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगोंने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरोंने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़नेके औजारों) तथा हँसियोंसे कहीं-कहीं वृक्षों और घासोंको काट-काटकर रास्ता साफ किया॥७॥
अन्य प्रबल मनुष्योंने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदिके झुरमुटोंको हाथोंसे ही उखाड़ फेंका। वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानोंको खोद-खोदकर बराबर कर देते थे। दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढोंको धूलोंसे ही पाट देते थे। जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओरसे मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे॥८-९॥
उन्होंने जहाँ पुल बाँधनेके योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहनेके लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा, वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशोंमें वहाँकी आवश्यकताके अनुसार कार्य किया॥१०॥
छोटे-छोटे सोतोंको, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओरसे बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समयमें उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारके बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जलसे भरे होनेके कारण समुद्रके समान जान पड़ते थे॥११॥
निर्जल स्थानोंमें नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओंसे अलंकृत थे॥१२॥
इस प्रकार सेनाका वह मार्ग देवताओंके मार्गकी भाँति अधिक शोभा पाने लगा। उसकी भूमिपर चूना-सुर्खी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था। उसके किनारे-किनारे फूलोंसे सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँके वृक्षोंपर मतवाले पक्षी चहक रहे थे। सारे मार्गको पताकाओंसे सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकारके फूलोंसे वह सड़क सजायी गयी थी॥१३-१४॥
मार्ग बन जानेपर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनानेके लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्यमें दत्त-चित्त रहनेवाले उन लोगोंने भरतकी आज्ञाके अनुसार सेवकोंको काम करनेका आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलोंकी अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशोंमें छावनियाँ बनवायी और जो भरतको अभीष्ट था, मार्गके भूषणरूप उस शिविरको नाना प्रकारके अलंकारोंसे और भी सजा दिया॥१५-१६॥
वास्तु-कर्मके ज्ञाता विद्वानोंने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तोंमें महात्मा भरतके ठहरनेके लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी॥१७॥
मार्गमें बने हुए वे निवेश (विश्राम-स्थान) इन्द्रपुरीके समान शोभा पाते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं, धूल-मिट्टीके ऊँचे ढेर लगाये गये थे। खेमोंके भीतर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं। गलियों और सड़कोंसे उनकी विशेष शोभा होती थी। राजकीय गृहों और देवस्थानोंसे युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों (चहारदीवारियों) से घिरे थे। सभी विश्रामस्थान पताकाओंसे सुशोभित थे। सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कोंका सुन्दर ढंगसे निर्माण किया गया था। विटङ्कों (कबूतरोंके रहनेके स्थानों- कावकों) और ऊँचे-ऊँचे श्रेष्ठ विमानोंके कारण उन सभी शिविरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी॥१८-२०॥
नाना प्रकारके वृक्षों और वनोंसे सुशोभित, शीतल निर्मल जलसे भरी हुई और बड़े-बड़े मत्स्योंसे व्याप्त गङ्गाके किनारेतक बना हुआ वह रमणीय राजमार्ग उस समय बड़ी शोभा पा रहा था। अच्छे कारीगरोंने उसका निर्माण किया था। रात्रिके समय वह चन्द्रमा और तारागणोंसे मण्डित निर्मल आकाशके समान सुशोभित होता था॥२१-२२॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८०॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकाधिकशततमोऽध्यायः
सत्यवती के गर्भ से चित्रांगद और विचित्रवीर्य की उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगद का निधन तथा विचित्रवीर्य का राज्याभिषेक...(दिन 315)
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वैशम्पायन उवाच
(चेदिराजसुतां ज्ञात्वा दाशराजेन वर्धिताम् । विवाहं कारयामास शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।।)
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शान्तनुर्नृपः । तां कन्यां रूपसम्पन्नां स्वगृहे संन्यवेशयत् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- सत्यवती चेदिराज वसुकी पुत्री है और निषादराजने इसका पालन-पोषण किया है- यह जानकर राजा शान्तनुने उसके साथ शास्त्रीय विधिसे विवाह किया। तदनन्तर विवाह सम्पन्न हो जानेपर राजा शान्तनुने उस रूपवती कन्याको अपने महलमें रखा ।। १ ।।
ततः शान्तनवो धीमान् सत्यवत्यामजायत । वीरश्चित्राङ्गदो नाम वीर्यवान् पुरुषेश्वरः ।। २ ।।
कुछ कालके पश्चात् सत्यवतीके गर्भसे शान्तनुका बुद्धिमान् पुत्र वीर चित्रांगद उत्पन्न हुआ, जो बड़ा ही पराक्रमी तथा समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ था ।। २ ।।
अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः । विचित्रवीर्य राजानं जनयामास वीर्यवान् ।। ३ ।।
इसके बाद महापराक्रमी और शक्तिशाली राजा शान्तनुने दूसरे पुत्र महान् धनुर्धर राजा विचित्रवीर्यको जन्म दिया ।। ३ ।।
अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे । स राजा शान्तनुर्धीमान् कालधर्ममुपेयिवान् ।। ४ ।।
नरश्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी यौवनको प्राप्त भी नहीं हुए थे कि बुद्धिमान् महाराज शान्तनुकी मृत्यु हो गयी ।। ४ ।।
स्वर्गते शान्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गदमरिंदमम् । स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः ।। ५ ।।
शान्तनु के स्वर्गवासी हो जाने पर भीष्मने सत्यवती की सम्मति से शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर चित्रांगदको राज्यपर बिठाया ।। ५ ।।
मनुष्यं न हि मेने स कञ्चित् सदृशमात्मनः ।। ६ ।।
चित्रांगद अपने शौर्यके घमंडमें आकर सब राजाओंका तिरस्कार करने लगे। वे किसी भी मनुष्यको अपने समान नहीं मानते थे ।। ६ ।।
तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा । गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाभ्ययात् तदा ।। ७ ।।
मनुष्योंपर ही नहीं, वे देवताओं तथा असुरोंपर भी आक्षेप करते थे। तब एक दिन उन्हींके समान नामवाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया ।। ७ ।।
(गन्धर्व उवाच
त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज । नाम चान्यत् प्रगृणीष्व यदि युद्धं न दास्यसि ।।
त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशात् तु नामतः ।
आगतोऽस्मि वृथाभाष्यो न गच्छेन्नामतो यथा ।।)
गन्धर्वने कहा- राजकुमार ! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, अतः मुझे युद्धका अवसर दो और यदि यह न कर सको तो अपना दूसरा नाम रख लो। मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। नामकी एकताके कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूँ। मेरे नामद्वारा व्यर्थ पुकारा जानेवाला मनुष्य मेरे सामनेसे सकुशल नहीं जा सकता।
तेनास्य सुमहद् युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह।
तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः । नद्यास्तीरे सरस्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद् रणः ।। ८ ।।
तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले ।
मायाधिकोऽवधीद् वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ।। ९ ।।
तदनन्तर उसके साथ कुरुक्षेत्रमें राजा चित्रांगदका बड़ा भारी युद्ध हुआ। गन्धर्वराज और कुरुराज दोनों ही बड़े बलवान् थे। उनमें सरस्वती नदीके तटपर तीन वर्षोंतक युद्ध होता रहा। अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त उस घमासान युद्धमें मायामें बढ़े-चढ़े हुए गन्धर्वने कुरुश्रेष्ठ वीर चित्रांगदका वध कर डाला ।। ८-९ ।।
स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिंदमम् ।
अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ।। १० ।।
शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ चित्रांगदको मारकर युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोकमें चला गया ।। १० ।।
तस्मिन् पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि ।
भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत् ।। ११ ।।
उन महान् तेजस्वी पुरुषसिंह चित्रांगदके मारे जानेपर शान्तनुनन्दन भीष्मने उनके प्रेतकर्म करवाये ।। ११ ।।
विचित्रवीर्य च तदा बालमप्राप्तयौवनम् ।
कुरुराज्ये महाबाहुरभ्यषिञ्चदनन्तरम् ।। १२ ।।
विचित्रवीर्य अभी बालक थे, युवावस्थामें नहीं पहुँचे थे तो भी महाबाहु भीष्मने उन्हें कुरुदेश के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया ।। १२ ।।
विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः ।
अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ।। १३ ।।
महाराज जनमेजय ! तब विचित्रवीर्य भीष्मजीकी आज्ञाके अधीन रहकर अपने बाप-दादों के राज्य का शासन करने लगे ।। १३ ।।
स धर्मशास्त्रकुशलं भीष्मं शान्तनवं नृपः।
पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत् ।। १४ ।।
शान्तनुनन्दन भीष्म धर्म एवं राजनीति आदि शास्त्रोंमें कुशल थे; अतः राजा विचित्रवीर्य धर्मपूर्वक उनका सम्मान करते थे और भीष्मजी भी इन अल्पवयस्क नरेशकी सब प्रकारसे रक्षा करते थे ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि चित्राङ्गदोपाख्याने
एकाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें चित्रांगदोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव #महाभारत शर्मा🔥
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#रामायण #🙏रामायण🕉
रामायण के सात काण्ड मानव की उन्नति के सात सोपान
*1* *बालकाण्ड –*
बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल , कपट , नही होता विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है ,उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक
जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने
पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है।बालक की भाँति अपने
मान अपमान को भूलने से
जीवन मेँ सरलता आती है बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा ।जहाँ युद्ध,वैर ,ईर्ष्या नहीँ है ,वही अयोध्या है
*2* *अयोध्याकाण्ड –*
यह काण्ड मनुष्य
को निर्विकार बनाता है।जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है,तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है।भक्ति अर्थात् प्रेम ,अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । रामका भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम
आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है।राम
की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है ।अयोध्याकाण्ड का पाठ
करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है ।उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते ।उसका घर अयोध्या बनता है ।कलह का मूल कारण धन एवं
प्रतिष्ठा है ।अयोध्याकाण्ड का फल निर्वैरता है ।सबसे पहले
अपने घर की ही सभी प्राणियोँ मेँभगवद् भाव रखना चाहिए।
*3.* *अरण्यकाण्ड –*
यह निर्वासन प्रदान
करता है ।इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी ।बिना अरण्यवास(जंगल) के जीवन मेँ
दिव्यता नहीँ आती ।रामचन्द्र राजा होकर भी सीता के साथ वनवास किया ।वनवास मनुष्य
हृदय को कोमल बनाता है।तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध
होगा । इसमेँ सूपर्णखा(मोह )एवं
शबरी (भक्ति)दोनो ही है।भगवान राम सन्देश देते हैँ कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ ।
*किष्किन्धाकाण्ड –*
जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा तभी जीव की ईश्वर से मैत्री होगी ।इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है।जब जीव सुग्रीव की भाँति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा तभी उसे राम मिलेँगे। जिसका कण्ठ सुन्दर है वही सुग्रीव है।कण्ठ की शोभा आभूषण से नही बल्कि राम नाम का जप करने से है।जिसका कण्ठ सुन्दर है ,उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी
*5.* *सुन्दरकाण्ड –*
जब जीव की मैत्री राम से
हो जाती है तो वह सुन्दर हो जाता है ।इस काण्ड मेँ हनुमान को सीता के दर्शन होते है।सीताजी पराभक्ति है ,जिसका जीवन सुन्दर होता है उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है ।संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते है ।ब्रह्मचर्य एवं रामनाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है ।संसार सागर को पार करते समय
मार्ग मेँ सुरसा बाधा डालने आ जाती है , अच्छे रस ही सुरसा है , नये नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश मे
रखना होगा ।जहाँ पराभक्ति सीता है वहाँ शोक नही रहता ,जहाँ सीता है वहाँ अशोकवन है।
*6.* *लंकाकाण्ड –*
जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसो का संहार होता है काम क्रोधादि ही राक्षस हैँ ।जो इन्हेँ मार
सकता है ,वही काल को भी मार सकता है ।जिसे काम मारता है उसे काल भी मारता है ,लंका शब्द के अक्षरो को इधर उधर करने पर होगा कालं ।काल सभी को मारता है किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैँ ।क्योँकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैँ पराभक्ति का दर्शन करते है ।
*7* *उत्तरकाण्ड –*
इस काण्ड मेँ काकभुसुण्डि एवं गरुड संवाद को बार बार पढना चाहिए । इसमेँ सब कुछ है ।जब तक राक्षस ,काल का विनाश
नहीँ होगा तब तक उत्तरकाण्ड मे प्रवेश नही मिलेगा ।इसमेँ भक्ति की कथा है । भक्त कौन है ? जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता वही भक्त है पूर्वार्ध मे जो काम रुपी रावण को मारता है उसी का उत्तरकाण्ड
सुन्दर बनता है ,वृद्धावस्था मे
राज्य करता है ।जब जीवन के पूर्वार्ध मे युवावस्था मे काम
को मारने का प्रयत्न होगा तभी उत्तरार्ध –उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा । अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए ।
*भावार्थ रामायण से*
#❤️जीवन की सीख
🌟 || सकारात्मक बनें-प्रसन्न रहें || 🌟
प्रसन्नता ही जीवन का सौंदर्य है। चित्त की अप्रसन्नता में चेहरे का सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता है। सुखमय जीवन के लिए चेहरा सुन्दर हो अथवा न हो लेकिन हृदय में प्रसन्नता अवश्य होनी चाहिए। महत्वपूर्ण ये नहीं कि आप कितने सुंदर हैं अपितु महत्वपूर्ण ये है, कि आप कितने प्रसन्न हैं। प्रसन्नचित्त व्यक्ति सकारात्मकता का भी पर्याय है। व्यक्ति की सोच जितनी सकारात्मक होगी उसका मन उतना ही प्रसन्न भी रहेगा।
सकारात्मक विचारों से ही जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण संभव हो पाता है और सकारात्मक विचार सदैव श्रेष्ठ संग से प्राप्त होते हैं। जिनके पास श्रेष्ठ विचार वाले व्यक्तियों का संग रहा वो पाण्डवों की तरह विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्नता पूर्वक जी सके। जीवन में सदैव श्रेष्ठ का संग करें ताकि उनसे प्राप्त प्रेरक विचार आपके जीवन परिवर्तन का कारण बन सकें और सुविचारों की महक से पुष्प की तरह आपका जीवन भी प्रसन्न एवं सौंदर्यपूर्ण बन सके।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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