#जय श्री कृष्ण
रसखान की कथा
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एक खान साहब रोज पान की दुकान पर पान खाने जाते थे । एक दिन उसकी नजर वहाँ लगी हुई कन्हैया की तस्वीर पर पड़ी तो पान वाले से पूछा भाई ये बालक किसका है और इसका क्या नाम है?पान वाला बोला ये श्याम है। खान साहब बोले ये बालक बहुत सुन्दर है, घुंघराले बाल हैं, हाथ में मुरली भी मनोहर लगती है मगर ये जिस जमीन पर खड़ा है वो खुरदरी है, इसके पैरों में छाले पड़ जायेंगे, इसको चप्पल क्यों नहीं पहनाते हो।
पान वाला बोला तुझे दया आ रही है तो तू ही पहना दे।
ये बात खान भाई के दिल में उतर गई और दूसरे दिन कन्हैया के लिए चप्पल खरीदकर ले आये और बोले लो भाई मैं चप्पल ले आया बुलाओ बालक को। पान वाला बोला कि ये बालक यहाँ नहीं रहता है ये वृंदावन रहता है, वृंदावन ही जाओ। खान साहब ने पूछा की इसका पता तो बताओ कि वृंदावन में कहाँ रहता है?पान वाला बोला इसका नाम श्याम है और वृंदावन के बांके बिहारी मन्दिर में रहता है।
खान साहब वृंदावन के लिए चल दिए। वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में जैसे ही प्रवेश करने लगे तो मंदिर के पुजारी ने बाहर ही रोक दिया और कहा कि तुम दूसरे समाज के हो इसलिए मंदिर में तुम प्रवेश नहीं कर सकते। खान भाई यह सोचकर कि श्याम कभी तो घर से बाहर आयेगा मन्दिर के गेट पर ही बैठकर इन्तजार करने लगे
इन्तजार करते-करते पूरा दिन निकल गया, रात भी निकल गई भोर का समय था तो उसके कानों में घुंघरूओं की आवाज आई,चारों तरफ देखा कुछ दिखाई नहीं दिया फिर अपने चरणों की तरफ देखा तो श्याम उनके चरणों में बैठे हुए दिखते हैं। श्याम को देखकर खान भाई की खुशी का ठिकाना नहीं रहा मगर बहुत दुःख हुआ जब कन्हैया के चरणों से खून निकलता हुआ देखा।
खान भाई नें कन्हैया को गोद में उठाकर प्यार से उनके चरणों से खून पोछते हुए पूछा बेटे तुम तो मंदिर से आये हो फिर ये खून क्यों निकल रहा हैं?
कन्हैया बोले नहीं मैं मन्दिर से नहीं गोकुल से पैदल चलकर आया हूँ क्योंकि तुमने मेरी जैसी मूरत दिल में बसाई मै उसी मूरत में तुम्हारे पास आया हूँ इसलिए मुझे गोकुल से पैदल आना पड़ा है और पैरों में काँटे लग गये हैं।
खान भाई भगवान को पहचान गये और वादा किया कि हे कन्हैया, हे मेरे मालिक, मै तेरा हूँ और तेरे गुण गाया करुँगा और तेरे ही पद लिखा करूँगा।
इस तरह एक मुसलमान खान भाई से रसखान बनकर भगवान का पक्का भक्त बना।
जय बांके बिहारी जी की👏🏻
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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यह मनुष्य कितना भोला है । आती मृत्यु से आँख मींच लेना चाहता है! आज का काम कल के लिए टालता है! कल किसने देखा है? कल क्या, अगले ही क्षण का मनुष्य को कुछ पता नहीं है ।
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान
शतपथब्राह्मण में कहा है―
न श्वः श्व इत्युपासीत् को हि मनुष्यस्य श्वो वेद।
कल-कल की बात मत करो ! मनुष्य के कल (आगामी) को कौन जानता है ?
महाभारत (शान्तिपर्व) में महर्षि व्यास का भी यही अनुभव है―
न कश्चिदपि जानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः.करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्।।
श्वकार्यमद्य कुर्वीत् पूर्वाह्ने चापराहिनकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम्।।
भावार्थ―कोई नहीं जानता कल क्या होने वाला है, अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को कल का कार्य आज ही निपटा देना चाहिए, शाम के लिए कुछ भी न छोड़े, क्योंकि जब मौत आएगी तो वह प्रतिक्षा नहीं करेगी कि इसने कुछ किया है अथवा नहीं।
महामुनि व्यास कहते हैं―
आयुषः क्षण एकोऽपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः।
स वृथा नीयते येन तस्मै नृपशवे नमः।
भावार्थ―उस 'नरपशु' को मेरा नमस्कार है जो आयु के उस एक-एक क्षण को व्यर्थ खो रहा है जो क्षण करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के द्वारा भी पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता।
अतः कुशलता इसी में है―
यावत् स्वस्थो ह्ययं देहो, यावत् मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्, प्राणान्ते किं करिष्यति।।
अनित्यानि शरीराणि, विभवो नैव शाश्वतः।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः।।
भावार्थ―जब तक यह शरीर स्वस्थ बना हुआ है, जब तक बुढ़ापा नहीं आया है, तभी तक आत्म-कल्याण के लिए कुछ कार्य कर डालो। प्राणान्त होने पर क्या कर सकोगे? शरीर नश्वर है, वैभव अस्थायी है, मृत्यु सदा निकट है, अतः धर्मसंग्रह और भगवद्भजन में शीघ्र क्यों नहीं लगते ????
समय बिल्कुल नहीं है , एक एक क्षण को अमूल्य जानकर तुरंत अपने कल्याण में लग जाओ अन्यथा समय बीतने पर सिवाय पश्चात्ताप के अलावा कुछ नहीं रह जाएगा , अतः जितनी जल्दी हो बुद्धि में यह भाव पुष्ट कर कि - "सब मोह माया है " , बस एक बात सदैव स्मरण रखना है , वह क्या है ??
वह यही है -
भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते ।। 💐💐
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६५
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
पचासीवाँ सर्ग
गुह और भरतकी बातचीत तथा भरतका शोक
निषादराज गुहके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् भरतने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनोंमें उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥१॥
'भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीरामके सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेनाका सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो—तुम्हारी श्रद्धासे ही हम सब लोगोंका सत्कार हो गया'॥२॥
यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरतने गन्तव्य मार्गको हाथके संकेतसे दिखाते हुए पुनः गुहसे उत्तम वाणीमें पूछा—॥३॥
'निषादराज! इन दो मार्गोंमेंसे किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाना होगा? गङ्गाके किनारेका यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है'॥४॥
बुद्धिमान् राजकुमार भरतका यह वचन सुनकर वनमें विचरनेवाले गुहने हाथ जोड़कर कहा—॥५॥
'महाबली राजकुमार! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेशसे पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा॥६॥
'परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है'॥७॥
ऐसी बात कहते हुए गुहसे आकाशके समान निर्मल भरतने मधुर वाणीमें कहा—॥८॥
'निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिताके समान मानता हूँ॥९॥
'ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वनमें निवास करते हैं, अतः उन्हें लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये'॥१०॥
भरतकी बात सुनकर निषादराजका मुँह प्रसन्नतासे खिल उठा। वह हर्षसे भरकर पुनः भरतसे बोला—॥११॥
'आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्नके हाथमें आये हुए राज्यको त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डलमें कोई नहीं दिखायी देता॥१२॥
'कष्टप्रद वनमें निवास करनेवाले श्रीरामको जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकोंमें आपकी अक्षय कीर्तिका प्रसार होगा॥१३॥
जब गुह भरतसे इस प्रकारकी बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेवकी प्रभा अदृश्य हो गयी और रातका अन्धकार सब ओर फैल गया॥१४॥
गुहके बर्तावसे श्रीमान् भरतको बड़ा संतोष हुआ और वे सेनाको विश्राम करनेकी आज्ञा दे शत्रुघ्नके साथ शयन करनेके लिये गये॥१५॥
धर्मपर दृष्टि रखनेवाले महात्मा भरत शोकके योग्य नहीं थे तथापि उनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके लिये चिन्ताके कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥१६॥
जैसे वनमें फैले हुए दावानलसे संतप्त हुए वृक्षको उसके खोखलेमें छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ताकी आगसे संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरतको वह राम-वियोगसे उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी॥१७॥
जैसे सूर्यकी किरणोंसे तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फको बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्निसे संतप्त होनेके कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गोंसे पसीना बहाने लगे॥१८॥
उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःखके विशाल पर्वतसे आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओंका समूह था। दुःखपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातुका स्थान ले रहा था। दीनता (इन्द्रियोंकी अपने विषयोंसे विमुखता) ही वृक्षसमूहोंके रूपमें प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वतके ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर-भीतरकी इन्द्रियोंमें होनेवाले संताप ही उस पर्वतकी ओषधियाँ तथा बाँसके वृक्ष थे॥१९-२०॥
उनका मन बहुत दुःखी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्तिमें पड़ गये। मानसिक चिन्तासे पीड़ित होनेके कारण नरश्रेष्ठ भरतको शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंडसे बिछुड़े हुए वृषभकी-सी हो रही थी॥२१॥
परिवारसहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुहसे मिले, उस समय उनके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाईके लिये चिन्तित थे, अतः गुहने उन्हें पुनः आश्वासन दिया॥२२॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८५॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*इस संपूर्ण सृष्टि में यदि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बनकर उभरा है तो मनुष्य को गलतियों का पुतला भी कहा गया है | भूल हो जाना मनुष्य का स्वभाव है | कोई भी ऐसा मनुष्य ना हुआ होगा जिससे कि अपने जीवन में कभी कोई भूल ना हुई है | कभी - कभी मनुष्य की एक भूल उसके जीवन की दिशा और दशा परिवर्तित कर देती है | प्राचीन काल में जब मनुष्य के ऊपर सामाजिक दबाव होता था तब मनुष्य कुछ भी करने या कुछ भी बोलने से पहले सोचता था कहीं ऐसा ना हो जाए कि हमसे कुछ गलत हो जाए और हमको सामाजिक दंड का भागी बनना पड़े | मनुष्य के अंदर व्याप्त यह भय उसे गलतियां करने से रोकता था और यदि मनुष्य से कोई भूल हो भी जाती थी तो वह समाज के सामने अपनी गलती मान कर के उसका प्रायश्चित करने के लिए भी तैयार हो जाता था | जब मनुष्य प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो जाता है तो वह अपने सबसे बड़े वैरी अपने अहं को मारता है , क्योंकि जब तक मनुष्य में अहंभाव रहेगा तब तक वह अपनी भूल कदापि स्वीकार नहीं कर सकता है , और जब तक मनुष्य भूल नहीं स्वीकार करेगा तब तक प्रायश्चित का प्रश्न ही नहीं उठ़ता है | अनेकों ऐसे उदाहरण इतिहास पढ़ने को मिलते हैं जहां मनुष्य ने अपनी भूल को मान करके समाज व सम्पूर्ण सभ्यता को भी नष्ट होने से बचाया है | जहां मनुष्य अपनी भूल को न स्वीकार करके अपनी गलत बात पर अड़ा रहता है वहाँ आपस में वैमनस्यता तो फैलती ही है और समाज में बिखराव भी आ जाता है |*
*आज समाज बदला , लोग बदले हैं और बदल गई है मनुष्य की सोंच | मनुष्य को यह लगता है कि मैं जो कर रहा हूं या मैं जो कह रहा हूं वही सत्य है बाकी सब झूठ है | अपनी बात को सही साबित करने के लिए मनुष्य अनेकों तर्क कुतर्क करते हुए गलत तथ्यों को प्रस्तुत करता रहता है | आज के तथाकथित कुछ विद्वानों एवं राजनैतिक प्रवक्ताओं के व्यवहार को देखकर मुझे "आचार्य अर्जुन तिवारी" को बड़ा आश्चर्य होता है की जिसे हम विद्वान मानते हैं वह भला ऐसा वक्तव्य कैसे दे सकता है जो कि लोगों के हृदय में चुभने वाला हो | क्या यही विद्वता है ?? आज मनुष्य के ऊपर किसी प्रकार का सामाजिक बन्धन नहीं रह गया है और न ही मनुष्य किसी के दबाव को मानना चाहता है यही कारण है कि मनुष्य उचित - अनुचित कार्य व्यवहार कर रहा है | आज परिवारों के विखरने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोग जाने - अन्जाने या फिर क्रोध में आकर कुछ अनचाहे कृत्य कर देते हैं , ऐसे लोगों को यह आभास भी होता है कि उन्होंने गल्ती की है परंतु वे अपनी गल्ती को मानना नहीं चाहते हैं जिसका परिणाम होता है कि परिवार का विखण्डन हो जाता है | कभी - कभी मनुष्य न चाहते हुए भी परिस्थितवश अपने किसी प्रिय को अनचाहे शब्द भी कह देता है परंतु समय रहते उसका प्रायश्चित कर लेने वाला ही महान बनता है | परंतु आज ऐसा करने वाले गिनती के लोग बचे हैं शेष तो सभी अपने ही भाव में रहकर अपनी कही गयी गलत बात को ही सही सिद्ध करने पर अडिग रहते हुए समाज में विघटन का कारण बनते रहते हैं | जबकि मनुष्य को आत्ममंथन करते हुए अपनी भूल को स्वीकार करके प्रायश्चित कर लेना चाहिए इससे मनुष्य का सम्मान बढ़ जाता है |*
*भूल हो जाना मानव स्वभाव है परंतु प्रत्येक मनुष्य को समय रहते हुए अपनी भूल को स्वीकार करके प्रायश्चित कर लेना चाहिए | इससे उसका सम्मान तो बढता ही रहेगा साथ ही उसकी अंतरात्मा पर भी कोई बोझ नहीं रहेगा |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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#❤️जीवन की सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी
#☝आज का ज्ञान
🌟 || चिंता नहीं, चिंतन करें || 🌟
किसी का चिंतन ही उसके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करता है। जीवन के प्रति हमारा चिंतन जितना नकारात्मक होगा हमारी चिंताएं भी उतनी ही अधिक होंगी। ऐसे ही हमारा चिंतन जितना सकारात्मक होगा, हमारे कार्य करने का स्तर उतना ही श्रेष्ठ एवं जीवन उतना ही प्रसन्नता से भरपूर रहेगा। जीवन में हमें इसलिए पराजय नहीं मिलती कि कार्य बहुत बड़ा था अपितु हम इसलिए परास्त हो जाते हैं कि हमारे प्रयास बहुत छोटे थे।
नकारात्मक दृष्टि आसान से आसान कार्य को भी चिंतायुक्त एवं जटिल बना देती है तो जटिल से जटिल कार्य को सकारात्मक चिंतन बड़ा आसान बना देता है। प्रभु में विश्वास से बढ़कर कोई श्रेष्ठ चिंतन नहीं और हमारी चिंताओं का निवारण करने वाला साधन भी नहीं है। जीवन को चिंता में नहीं चिंतन में जिया जाना चाहिए। सकारात्मक चिंतन ही किसी भी चिंता का एकमात्र समाधान है।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् ।
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥
[ महाभारत, शान्ति पर्व - १५/५० ]
☝🏻 यह प्रसिद्ध श्लोक गुण एवं दोष के महत्व को दर्शाता है । आइए इसे विस्तार से समझते हैं—
नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम्
- नात्यन्तं गुणवत्— कोई भी वस्तु अत्यधिक गुणवान नहीं होती
- किञ्चित् — कोई भी वस्तु
- न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् — तथा न ही अत्यधिक दोषपूर्ण होती है
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा
- उभयं— दोनों ( गुण एवं दोष )
- सर्वकार्येषु— सभी कार्यों में
- दृश्यते— देखे जाते हैं
- साध्वसाधु वा— अच्छे अथवा बुरे रूप में
-
अर्थात् 👉🏻 कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण ही गुण हों । ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणों से वंचित ही हो । सभी कार्यों में अच्छाई तथा बुराई दोनों ही देखने में आती है ।
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
#सुभाषित
भगवान विष्णु , शिव , ब्रह्मा , सूर्य , गणेश , दुर्गाजी एवं लक्ष्मीजी आदि के मन्दिर बनवाने से दान तथा कीर्ति से भी अधिक फल प्राप्त होता है ।
नारायण
🪷🌷🪷
#☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩
किसी और के द्वारा बनवाए जाते हुए देवालय के कार्य का अनुमोदन मात्र ही पापों से मुक्त कर देता है - तदोपरांत स्वयं मन्दिर बनवाने के पुण्य का क्या कहें !
नारायण
🪷🌷🪷
#☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म की सम्मति से सत्यवती द्वारा व्यास का आवाहन और व्यासजी का माता की आज्ञा से कुरुवंश-की वृद्धि के लिये विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से संतानोत्पादन करने की स्वीकृति देना...(दिन 322)
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भीष्म उवाच
पुनर्भरतवंशस्य हेतुं संतानवृद्धये ।
वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ।। १ ।।
ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद् धनेनोपनिमन्त्र्यताम् ।
विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत् प्रजाः ।। २ ।।
भीष्मजी कहते हैं- मातः ! भरतवंशकी संतानपरम्पराको बढ़ाने और सुरक्षित रखनेके लिये जो नियत उपाय है, उसे मैं बता रहा हूँ; सुनो। किसी गुणवान् ब्राह्मणको धन देकर बुलाओ, जो विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंके गर्भसे संतान उत्पन्न कर सके ।। १-२ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत् ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब सत्यवती कुछ हँसती और साथ ही लजाती हुई भीष्मजीसे इस प्रकार बोली। बोलते समय उसकी वाणी संकोचसे कुछ अस्पष्ट-सी हो जाती थी ।। ३ ।।
सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
विश्वासात् ते प्रवक्ष्यामि संतानाय कुलस्य नः ।। ४ ।।
उसने कहा- 'महाबाहु भीष्म ! तुम जैसा कहते हो वही ठीक है। तुमपर विश्वास होनेसे अपने कुलकी संततिकी रक्षाके लिये तुम्हें मैं एक बात बतलाती हूँ ।। ४ ।।
न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्म तथाविधम् ।
त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः ।। ५ ।।
'ऐसे आपद्धर्मको देखकर वह बात तुम्हें बताये बिना मैं नहीं रह सकती। तुम्हीं हमारे कुलमें मूर्तिमान् धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो और तुम्हीं परम गति हो ।। ५ ।।
तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । (यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ । तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृता कुक्षौ पुरा किल ।।
मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित् । मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् ।।) धर्मयुक्तस्य धर्मार्थ पितुरासीत् तरी मम ।। ६ ।।
'अतः मेरी सच्ची बात सुनकर उसके बाद जो कर्तव्य हो, उसे करो। 'भरतश्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसुका नाम सुना होगा। पूर्वकालमें मैं उन्हींके वीर्यसे उत्पन्न हुई थी। मुझे एक मछलीने अपने पेटमें धारण किया था। एक परम धर्मज्ञ मल्लाहने जलमेंसे मेरी माताको पकड़ा, उसके पेटसे मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा। मेरे उन धर्मपरायण पिताके पास एक नौका थी, जो (धनके लिये नहीं) धर्मार्थ चलायी जाती थी ।। ६ ।।
सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् । अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः ।। ७ ।। आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन् यमुनां नदीम् । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत् तदा ।। ८ ।।
सान्त्वपूर्व मुनिश्रेष्ठः कामार्तों मधुरं वचः ।
उक्तं जन्म कुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ।। ९ ।।
'एक दिन मैं उसी नावपर गयी हुई थी। उन दिनों मेरे यौवनका प्रारम्भ था। उसी समय धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् महर्षि पराशर यमुना नदी पार करनेके लिये मेरी नावपर आये। मैं उन्हें पार ले जा रही थी, तबतक वे मुनिश्रेष्ठ काम-पीड़ित हो मेरे पास आ मुझे समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले और उन्होंने मुझसे अपने जन्म और कुलका परिचय दिया। इसपर मैंने कहा- 'भगवन्! मैं तो निषाद की पुत्री हूँ' ।। ७-९ ।।
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत ।
वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे ।। १० ।।
'भारत! एक ओर में पिताजीसे डरती थी और दूसरी ओर मुझे मुनिके शापका भी डर था। उस समय महर्षिने मुझे दुर्लभ वर देकर उत्साहित किया, जिससे मैं उनके अनुरोधको टाल न सकी ।। १० ।।
अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ।। ११ ।।
मत्स्यगन्धो महानासीत् पुरा मम जुगुप्सितः ।
तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात् स मे मुनिः ।। १२ ।।
'यद्यपि मैं चाहती नहीं थी, तो भी उन्होंने मुझ अबलाको अपने तेजसे तिरस्कृत करके नौकापर ही मुझे अपने वशमें कर लिया। उस समय उन्होंने कुहरा उत्पन्न करके सम्पूर्ण लोकको अन्धकारसे आवृत कर दिया था। भारत ! पहले मेरे शरीरसे अत्यन्त घृणित मछलीकी-सी बड़ी तीव्र दुर्गन्ध आती थी। उसको मिटाकर मुनिने मुझे यह उत्तम गन्ध प्रदान की थी ।। ११-१२ ।।
ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् ।
द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ।। १३ ।।
'तदनन्तर मुनिने मुझसे कहा- 'तुम इस यमुनाके ही द्वीपमें मेरे द्वारा स्थापित इस गर्भको त्यागकर फिर कन्या ही हो जाओगी' ।। १३ ।।
पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ।। १४ ।।
'उस गर्भसे पराशरजीके पुत्र महान् योगी महर्षि व्यास प्रकट हुए। वे ही द्वैपायन नामसे विख्यात हैं। वे मेरे कन्यावस्थाके पुत्र हैं ।। १४ ।।
यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः ।
लोके व्यासत्वमापेदे कार्य्यात् कृष्णत्वमेव च ।। १५ ।।
'वे भगवान् द्वैपायन मुनि अपने तपोबलसे चारों वेदोंका पृथक् पृथक् विस्तार करके लोकमें 'व्यास' पदवीको प्राप्त हुए हैं। शरीरका रंग साँवला होनेसे उन्हें लोग 'कृष्ण' भी कहते हैं ।। १५ ।।
सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः।
समुत्पन्नः स तु महान् सह पित्रा ततो गतः ।। १६ ।।
'वे सत्यवादी, शान्त, तपस्वी और पापशून्य हैं। वे उत्पन्न होते ही बड़े होकर उस द्वीपसे अपने पिताके साथ चले गये थे ।। १६ ।।
स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः ।
भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ।। १७ ।।
'मेरे और तुम्हारे आग्रह करने पर वे अनुपम तेजस्वी व्यास अवश्य ही अपने
भाई के क्षेत्र में कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेंगे ।। १७ ।।
स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति ।
तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि ।। १८ ।।
'उन्होंने जाते समय मुझसे कहा था कि संकटके समय मुझे याद करना। महाबाहु भीष्म ! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं उन्हींका स्मरण करूँ ।। १८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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#श्रीरामचरितमानस चोपाई
राम नाम की महिमा: #रामायण #🙏रामायण🕉
रामचरितमानस से 25 दोहे
राम नाम
नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥
अर्थ:
कलियुग में यह राम नाम कल्पवृक्ष के समान है, जो मनवांछित फल देने वाला है, और सभी प्रकार के कल्याणों का निवास स्थान है। इसी नाम का स्मरण करने से ही भाँग के समान नीच (निकृष्ट) तुलसीदास, पवित्र तुलसी के समान हो गए। यह नाम इतना परम पवित्र और मंगलकारी है कि इसके स्मरण से निकृष्ट जीव भी श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेता है, और भवसागर से पार हो जाता है।
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
अर्थ:
यह राम नाम इस भयानक कलियुग के काल में कल्पवृक्ष के समान है, जिसके स्मरण मात्र से ही संसार के सारे जंजाल (माया-मोह के बंधन और दुःख) शांत हो जाते हैं। यह राम नाम कलियुग में सभी मनोवांछित फल देने वाला है और परलोक में हितैषी (परम धाम देने वाला) तथा इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करने वाला है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
अर्थ:
जिस राम नाम को महादेव (शिवजी) निरंतर जपते रहते हैं और काशी में मुत्यु को प्राप्त होने वाले जीवों को मुक्ति के लिए उपदेश देते हैं, उस नाम की महिमा को गणेशजी भी जानते हैं, जिनकी सर्वप्रथम पूजा भी इसी नाम के प्रभाव से होती है। यह नाम ही समस्त सिद्धियों का मूल और परम पावन है, और शिवजी का तारक मंत्र है।
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम नाम गुन गाना॥
राम नाम जपिए सदा हियँ धरि दृढ़ बिस्वास।
भवसागर तरि जाइहौ प्रभु करि हैं उर बास॥
अर्थ:
कलियुग में न तो योग का, न यज्ञ का और न ही ज्ञान का वह महत्व है। केवल एक ही आधार है, और वह है राम नाम के गुणों का गान करना। अतः, हृदय में दृढ़ विश्वास धारण करके सदा राम नाम का जप करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य सहज ही भवसागर को पार कर जाता है और प्रभु स्वयं उसके हृदय में वास करते हैं, जिससे परम शांति मिलती है।
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥
राम नाम जपि सफल भए, जे सकल सिद्धि पावहिं।
करम धरम नहिं साधना, नामहिं ते पार जावहिं॥
अर्थ:
हे तात! संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो आपसे न हो सके? (यहाँ नाम की महिमा कही गई है कि नाम सब कुछ कर सकता है)। जिस राम नाम का जप करके सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हुईं और सभी कार्य सिद्ध हुए। कलियुग में कर्म, धर्म, और अन्य साधनाओं के बिना भी केवल राम नाम के आश्रय से ही मनुष्य भवसागर के पार चला जाता है।
भायँ कुभायँ अनख आलस हू। नाम जपत मंगल दिसि दस हूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
अर्थ:
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से— किसी भी तरह से राम नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण ही कल्याण होता है। उसी परम कल्याणकारी राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ। नाम जप का महत्व भाव पर निर्भर नहीं करता, वह हर हाल में मंगलकारी है।
जान आदि कबि नाम प्रतापू। भएउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि शिव बानी। जपि जेईं सँग गिरिजा भवानी॥
अर्थ:
आदिकवि श्री वाल्मीकिजी राम नाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। इस प्रकार राम नाम का प्रभाव जान लेने के कारण, श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम एक हजार नामों के समान है, पार्वतीजी (भवानी) सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं।
राम नाम कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥
अर्थ:
राम नाम कलियुग में सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु गौ है और सज्जनों के लिए सुंदर संजीवनी जड़ी है। पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है, जो जन्म-मरणरूपी भय का नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेंढकों को खाने के लिए सर्पिणी के समान है। यह नाम ही परम कल्याणकारी और जीवन का आधार है।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
सोइ नाम राम कहँ जपहिं संत, तजि सकल काम अरु रोप॥
अर्थ:
निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं, जो दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। संतजन समस्त कामनाओं और क्रोध को त्यागकर उसी राम नाम का जप करते हैं, क्योंकि यह नाम ही दोनों स्वरूपों का मूल है। नाम के माध्यम से ही निर्गुण और सगुण दोनों की प्राप्ति सहज हो जाती है।
राम नाम नृसिंह तनु भयऊ। कलिजुग हिरनकसिपु सोइ रयऊ॥
जापक जन प्रहलाद जिमि पाल ही। दलि सुरसाल राम नाम रखवाल ही॥
अर्थ:
राम नाम नृसिंह भगवान के शरीर जैसा है, कलियुग ही वह हिरण्यकशिपु है। राम नाम जपने वाले मनुष्य प्रहलाद के समान हैं। यह राम नाम ही देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी असुर) को मारकर जप करने वालों की सदैव रक्षा करता है। राम नाम की शक्ति भक्तों के लिए परम रक्षक है।
राम नाम मनि दीप धरू जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥
अर्थ:
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तुम भीतर (हृदय) और बाहर (संसार) दोनों ओर उजाला (ज्ञान का प्रकाश और मंगल) चाहते हो, तो राम नाम रूपी मणि दीपक को अपनी जीभ रूपी देहरी के द्वार पर धर लो। यह नाम ही ज्ञान का प्रकाश देने वाला और समस्त अंधकार को दूर करने वाला है।
दोउ अक्षर मधुर मनोहर जान। लोचन जगत जीव के प्रान॥
सुगम सुसाहिब सुमिरत सुखदाता। हितकारी, राम नाम जगत्राता॥
अर्थ:
राम नाम के दोनों अक्षर ('रा' और 'म') मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं। यह नाम ही परम हितकारी है और समस्त जगत का उद्धार करने वाला है। यह नाम जपने में अत्यंत सरल और सहज है।
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
जिन्ह कछु कीन्ह जान तिन्ह जाना। राम नाम सब साधन माना॥
अर्थ:
राम नाम और रूप की गति (महिमा) अकथनीय और अनूठी है। उसे समझने पर सुख मिलता है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन्होंने कुछ भी साधन किया है, उन्होंने यही जाना है कि राम नाम ही समस्त साधनों में श्रेष्ठ है। यह नाम सभी रहस्यों का सार और अनुभव का विषय है।
गिरिजा जाहि सहस मुख गावहिं। सोइ नाम तुम कहुँ सुनावाहिं॥
सहस नाम सम राम नाम। यह जानहिं शिव, भवानी धाम॥
अर्थ:
हे पार्वती! जिसका सहस्र मुख वाले (शेषनाग) भी गान करते हैं, वही परम पवित्र राम नाम मैंने तुमको सुनाया है। एक राम नाम सहस्र (हजारों) नामों के समान है, यह रहस्य श्री शिवजी जानते हैं, क्योंकि उनके हृदय में भवानी (पार्वती) वास करती हैं और वे दोनों इस नाम का नित्य जप करते हैं।
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। आपु सहित बस कीन्हे रामू॥
नाम प्रताप सिंधु सुकाइ। सहजहि कपि दल पार गइ॥
अर्थ:
पवनसुत हनुमानजी ने इसी राम नाम का स्मरण करके स्वयं को तो पवित्र किया ही, साथ ही श्री रामजी को भी अपने वश में कर लिया (उनके परम प्रिय बन गए)। इसी नाम के प्रताप से समुद्र सूख गया और वानरों की सेना सहज ही पार चली गई। नाम की शक्ति भगवान की शक्ति से भी बढ़कर मानी गई है।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
राम नाम जपि ते सुख लहहिं। जे जन काहू भाँति न चहहिं॥
अर्थ:
जब अतिशय दुःखी और संकटग्रस्त मनुष्य राम नाम का जप करते हैं, तो उनके सभी बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जो मनुष्य किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं रखते, वे भी राम नाम का जप करके ही परम सुख को प्राप्त होते हैं। यह नाम आर्त और अर्थार्थी दोनों को ही सुख प्रदान करता है।
हरन अमंगल अखिल कल्यान। राम नाम जप सब जग जान॥
सोइ नाम जेहि कर सुमिरन कीन्हा। पार भयो सब जगत अतीन्हा॥
अर्थ:
समस्त अमंगलों को हरने वाला और संपूर्ण कल्याणों को करने वाला राम नाम का जप है, यह बात सारा संसार जानता है। यह वही नाम है जिसका स्मरण करके, जिसने भी इसे जपा है, वह इस अपार संसार सागर से पार हो गया है। यह नाम ही समस्त पापों का नाशक और मंगल का दाता है।
नाम प्रभाउ बिचित्र अति, कहउँ कछुक समुझाई।
राम नाम बिनु जे नर करहीं, ते भव न तरहिं जाई॥
अर्थ:
राम नाम का प्रभाव अत्यंत ही विचित्र है, मैं उसे कुछ समझाकर कहता हूँ। जो मनुष्य राम नाम का आश्रय लिए बिना अन्य साधन करते हैं, वे इस संसार रूपी भवसागर को पार करके नहीं जा सकते। नाम ही एक मात्र सरल और सुगम मार्ग है, जो पार लगाता है।
कलि केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥
राम नाम ते पाप सबै जरि। भवसागर में मन नहिं डरि॥
अर्थ:
कलियुग में केवल राम नाम ही एक मात्र आधार है। मनुष्य उसी नाम का बार-बार स्मरण करके भवसागर के पार उतर जाते हैं। राम नाम के प्रभाव से सारे पाप जलकर भस्म हो जाते हैं, और मनुष्य के मन में संसार रूपी सागर से डर नहीं लगता।
नाम प्रताप महा बल भारी। पाप पुंज जाहिं छन हारी॥
राम नाम सोई जानहिं, जा पर कृपा करहिं।
करम धरम नहिं साधना, नामहिं ते भव तरहिं॥
अर्थ:
राम नाम का प्रताप बहुत बड़ा और महान बलशाली है, जिसके प्रभाव से पापों के समूह भी एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं। उस राम नाम की महिमा को वही जानता है जिस पर श्री रामजी की विशेष कृपा होती है। इस कलियुग में कर्म, धर्म और अन्य साधनाओं की आवश्यकता नहीं, केवल नाम के बल पर ही जीव संसार सागर से पार हो जाता है।
अगुन सगुन कहँ नहिं भेदू, राम नाम दुइ रूपु।
नाम रूप दुइ एक सम, यहि विधि सहज अनूपु॥
अर्थ:
निर्गुण और सगुण ब्रह्म में कोई भेद नहीं है, राम नाम ही उनके दो स्वरूप हैं। नाम और रूप दोनों ही एक समान हैं, इस प्रकार यह नाम सहज ही अनुपम है। यह नाम दोनों ही ब्रह्म स्वरूपों को अपने में समाहित किए हुए है, और नाम का जप करने वाला दोनों को प्राप्त करता है।
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी॥
राम नाम महिमा अमित, तुलसी सोइ गावहिं।
जेहि कर कृपा राम की, ते भवसिंधु पावहिं॥
अर्थ:
जो मंगल के धाम और अमंगल को हरने वाले हैं, दशरथ के आँगन में विहार करने वाले उन श्री राम पर मेरी भक्ति से द्रवित हों। राम नाम की महिमा अपार है, तुलसीदास तो केवल वही गाते हैं। जिस पर राम नाम की कृपा होती है, वे ही इस संसार रूपी सागर को पार कर पाते हैं।
राम नामु सब कोउ कहै, दसरथ सुत कोउ कोउ।
जनम जनम के पाप कटै, राम नाम कहि लोउ॥
अर्थ:
राम नाम तो सभी कहते हैं, परन्तु दशरथ के पुत्र (सगुण स्वरूप) को कोई-कोई ही जान पाता है। अतः तुम अपने जन्म-जन्म के पापों को काटने के लिए केवल राम नाम को लेकर जपो। नाम की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह नाम लेने वाले के समस्त संचित पापों का नाश कर देती है।
जो सुमिरत सिधि होइ, गनि सकल कल्यान।
राम नाम जपिए सदा, हियँ धरि दृढ़ ग्यान॥
अर्थ:
जिस राम नाम का स्मरण करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और समस्त कल्याणों की गिनती हो जाती है, ऐसे राम नाम को सदा हृदय में दृढ़ ज्ञान धारण करके जपना चाहिए। यह नाम ही सफलता का दाता, कल्याण का मूल और समस्त ज्ञानों का सार है।
राम नाम की महिमा, अगम निगम कहुँ गान।
तुलसीदास आस करहिं, बस राम नाम हियँ जान॥
अर्थ:
राम नाम की महिमा तो अगम्य है, जिसका वर्णन वेद और शास्त्र भी करते हैं। तुलसीदास तो बस यही आशा करते हैं कि उनके हृदय में केवल राम नाम ही वास करे। यह नाम ही जीवन की अंतिम सत्य और परम आश्रय है, जिससे बढ़कर कोई और सत्य नहीं है।













