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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
क्या शंकराचार्य हिंदू धर्म के एकमात्र रक्षक हैं❔ #🕉️सनातन धर्म🚩 बहुत-से हिंदू मानते हैं कि शंकराचार्य हिंदू धर्म, अर्थात् सनातन धर्म, के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता हैं और उन्हें लगभग भगवान के समान सम्मान दिया जाता है। आज शंकराचार्य पद के एक से अधिक धारक हैं। मूल शंकराचार्य को आदि शंकराचार्य कहा जाता है, और उन्हीं से चार प्रतिनिधि परंपरा में आए, जो चार अलग-अलग मठों (मठ संस्थानों) के अधिष्ठाता हैं। ये प्रतिनिधि भी शंकराचार्य कहलाते हैं। हिंदू धर्म, अर्थात् सनातन धर्म, का संरक्षण या प्रचार कभी किसी एक व्यक्ति या संस्था के द्वारा ही नहीं हुआ। इसकी शक्ति इसकी बहुलता में है—अनेक परंपराएँ, दर्शन और आध्यात्मिक मार्ग एक साथ रहते हुए भी उन्हीं शाश्वत सत्यों को मानते और स्थापित करते हैं। यद्यपि आदि शंकराचार्य का हिंदू इतिहास में अत्यंत ऊँचा स्थान है, फिर भी उन्हें हिंदू धर्म का सर्वोच्च और एकमात्र संरक्षक मानना ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से सही नहीं है। उनके साथ-साथ चार अधिकृत संप्रदायों के चार महान वैष्णव आचार्य भी हैं, जिनका योगदान उतना ही मूलभूत और स्थायी रहा है। अद्वैत वेदांत के समानांतर, चार वैष्णव परंपराओं ने भक्ति, धर्मशास्त्रीय विवेचन, मंदिर-संस्कृति और जीवन में आचरण के माध्यम से हिंदू धर्म का संरक्षण, प्रतिरक्षण और विस्तार किया। *आदि शंकराचार्य की भूमिका: पुनर्जागरण, एकाधिकार नहीं* आदि शंकराचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से भगवान शिव का अवतार माना जाता है, ने बौद्धिक पतन के समय में वैदिक प्रामाण्य को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अद्वैत वेदांत, मठ संस्थाएँ (चार मठ), तथा उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर सशक्त भाष्यों के माध्यम से उन्होंने वेदों की केंद्रीयता को पुनः स्थापित किया। उनका योगदान अत्यंत महान था—पर वह अनेक योगदानों में से एक था, हिंदू धर्म पर उनका कोई एकाधिकार या विशिष्ट आदेश नहीं था। हिंदू परंपरा ने कभी भी आध्यात्मिक अधिकार को किसी एक दार्शनिक मत-प्रणाली में सीमित नहीं किया। स्वयं अद्वैत वेदांत भी शंकर के पहले और बाद में अन्य वेदांतिक व्याख्याओं के साथ सह-अस्तित्व में रहा है। श्री आदि शंकराचार्य ने वेदों की सत्ता को पुनः स्थापित करके प्रारंभिक कार्य किया और शुद्ध भक्ति—सर्वोच्च भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा—को स्थापित करने का कार्य आगे चलकर वैष्णव आचार्यों जैसे विष्णुस्वामी, निम्बार्क, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य के द्वारा विशेष रूप से प्रकट हुआ। आगे की शताब्दियों में रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे महान आचार्यों ने वेदों को उनके मूल, निर्मल रूप में पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने द्वैत दर्शन का प्रचार किया: कि जीव भगवान से सदा भिन्न है, कि भगवान का एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वरूप है, और मुक्ति की सर्वोच्च अवस्था उस परमेश्वर की सेवा में है। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों जैसे वैदिक ग्रंथों पर प्रभावशाली भाष्य भी लिखे और वेदों में वर्णित अनुसार सर्वकारण-कारण भगवान हरि की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित किया: आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥ “समस्त वैदिक शास्त्रों का बार-बार सूक्ष्म परीक्षण और विवेचन करने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि भगवान नारायण परम परब्रह्म हैं, अतः उनकी ही उपासना करनी चाहिए।” (पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, लिंग पुराण) वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा आदौ अन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते “वैदिक साहित्य में—जिसमें रामायण, पुराण और महाभारत भी सम्मिलित हैं—आरम्भ से अंत तक तथा मध्य में भी सर्वत्र केवल हरि, परम पुरुषोत्तम भगवान, का ही वर्णन और गुणगान है।” (हरिवंश पुराण) *चार वैष्णव आचार्य* *1. निम्बार्काचार्य – कुमार संप्रदाय के आचार्य* कहा जाता है कि श्री निम्बार्काचार्य 5,000 वर्ष से भी अधिक पहले, 3096 ईसा-पूर्व में, अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के राज्यकाल में प्रकट हुए। निम्बार्क ने द्वैताद्वैत (द्वैत-अद्वैत) का उपदेश दिया, जो राधा-कृष्ण भक्ति में निहित संतुलित तत्त्व-दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनके संप्रदाय ने वैदिक धर्मशास्त्र की रक्षा की और उन्मत्त/उत्कट भक्ति-परंपरा को पोषित किया। *2. आदि विष्णुस्वामी – रुद्र संप्रदाय के आचार्य* कहा जाता है कि श्री आदि विष्णुस्वामी लगभग 3री शताब्दी ईसा-पूर्व में, कलियुग के प्रारंभ के निकट, राजा जनमेजय के यज्ञ के पूर्ण होने के बाद प्रकट हुए। उन्होंने शुद्धाद्वैत वेदांत की स्थापना की। आगे चलकर उनकी परंपरा में वल्लभाचार्य प्रकट हुए और पुष्टिमार्ग परंपरा की स्थापना की। इस दर्शन ने भगवान की कृपा, आनंदमय भक्ति और गृहस्थ-जीवन की आध्यात्मिकता पर बल दिया, जिससे हिंदू धर्म केवल संन्यास तक सीमित न रहकर दैनिक जीवन में भी जीवंत रहा। *3. रामानुजाचार्य – श्री संप्रदाय के आचार्य* श्री रामानुजाचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से अनंत शेष का अवतार माना जाता है, 1188 ईस्वी (12वीं शताब्दी) में प्रकट हुए। उन्होंने विशिष्टाद्वैत वेदांत को व्यवस्थित रूप से स्थापित किया, जिसमें भक्ति और तर्कसंगत दर्शन का सुंदर समन्वय है। उन्होंने मंदिर-उपासना को पुनः सुदृढ़ किया, भक्ति की पहुँच को जातिगत सीमाओं से परे विस्तृत किया, और नारायण के प्रति शरणागति पर विशेष बल दिया। उनकी परंपरा आज भी हिंदू धर्म की सबसे सशक्त जीवंत परंपराओं में से एक है। *4. मध्वाचार्य – ब्रह्मा संप्रदाय के आचार्य* श्री मध्वाचार्य, जिन्हें परंपरागत रूप से वायुदेव का अवतार माना जाता है, 1238 ईस्वी (13वीं शताब्दी) में प्रकट हुए। उन्होंने द्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया और जीव तथा भगवान के बीच शाश्वत भेद को दृढ़ता से स्थापित किया। उनकी दृढ़ ईश्वरवादी दृष्टि ने निर्गुण/निराकारवादी व्याख्याओं के विरुद्ध व्यक्तिगत भक्ति का समर्थन किया और उत्तर भारत सहित अनेक भक्ति आंदोलनों पर गहरा प्रभाव डाला। आगे चलकर उनकी परंपरा में कृष्ण स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए और संकीर्तन आंदोलन का शुभारंभ किया। पद्म पुराण से शास्त्रीय साक्ष्य चार वैष्णव आचार्यों की महिमा पद्म-पुराण में इस प्रकार वर्णित है: सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः । अतः कलौ भविष्यन्ति चत्वारः सम्प्रदायिनः ॥ श्री-ब्रह्म-रुद्र-सनकाः वैष्णवाः क्षितिपावनाः । चत्वारस्ते कलौ भाव्या ह्युत्कले पुरुषोत्तमात् ॥ रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्यं चतुर्मुखः । श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः ॥ “यदि किसी को किसी मान्य, प्रामाणिक संप्रदाय (शिष्य-परंपरा) के गुरु द्वारा दीक्षा नहीं मिलती, तो जो मंत्र वह प्राप्त करेगा उसमें शक्ति नहीं होगी और उसका फल निष्फल होगा। अतः कलियुग में चार संप्रदायों के चार संस्थापक/प्रवर्तक (आचार्य) प्रकट होंगे। वे चारों वैष्णव होंगे—श्री, ब्रह्मा, रुद्र और सनक संप्रदाय से सम्बद्ध—और पृथ्वी को पवित्र करने वाले होंगे। कलियुग में वे चारों अवश्य प्रकट होंगे और उत्कल (जगन्नाथ पुरी) में पुरुषोत्तम भगवान से उद्भूत होंगे। श्री (लक्ष्मी देवी) रामानुजाचार्य को स्वीकार करेंगी, चतुर्मुख ब्रह्मा मध्वाचार्य को स्वीकार करेंगे। रुद्र (शिवजी) श्री विष्णुस्वामी को स्वीकार करेंगे, और चतु:सन (चार कुमार) निम्बादित्य (निम्बार्काचार्य) को स्वीकार करेंगे।” *धर्म विविधता के माध्यम से फलता-फूलता है* सनातन धर्म किसी केंद्रीकृत धर्म की तरह कार्य नहीं करता, जहाँ एक ही “पोप” जैसी सर्वोच्च सत्ता हो। किसी एक आचार्य को हिंदू धर्म का एकमात्र संरक्षक मानना हिंदू इतिहास को न समझना है। चार वैष्णव आचार्यों के प्रतिनिधि भी शंकराचार्यों के समान स्तर पर हैं और उनका सदैव सम्मान किया जाना चाहिए। मिलकर, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हिंदू धर्म आक्रमणों, बौद्धिक चुनौतियों और सामाजिक उथल-पुथल के बावजूद सुरक्षित और जीवंत बना रहे। वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रणाली निगमनात्मक है और मान्य प्राधिकारों से शिष्य-परंपरा के माध्यम से प्राप्त होती है। ऐसा ज्ञान कभी भी डॉग्मैटिक नहीं होता—जैसा कि कभी-कभी गलत समझ लिया जाता है। जैसे पिता की पहचान बताने में माता प्राधिकारी होती है, वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करने में प्रामाणिक प्राधिकारी आवश्यक है। यह सिद्धांत भगवद्गीता 4.2 में भी प्रमाणित है, जहाँ अधिकृत परंपरा के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने पर बल दिया गया है। आदि शंकराचार्य एक महान व्यक्तित्व हैं, किंतु उनके प्रतिनिधि हिंदू धर्म के एकमात्र संरक्षक नहीं हैं। चार वैष्णव आचार्य—रामानुज, मध्व, निम्बार्क और विष्णुस्वामी—और उनके प्रतिनिधि भी समान रूप से सर्वोच्च नेता हैं, जिनकी जीवंत परंपराएँ आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन करती हैं। हिंदू धर्म एक स्तंभ के कारण नहीं, बल्कि अनेक स्तंभों के कारण स्थिर है—और हर स्तंभ सनातन धर्म की शाश्वत संरचना को संभाले हुए है। नारायण 🪷🌷🪷
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निषाद पुरुष यदि ५ पीढ़ियों तक निषाद स्त्री से विवाह करके पुत्र उत्पन्न करे तो ५वीं पीढ़ी उपनयन योग्य होती है , छठी यज्ञ योग्य तथा ७वीं पीढ़ी दोषमुक्त । #🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान नारायण 🪷🌷🪷
🕉️सनातन धर्म🚩 - निषादेन निषाद्यामा पञ्चमाज्जातोउपहन्ति शूद्रताम् 93 | | Opunc अत्र  गौतमीयम् ~ वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमेन  "ಾಗಯಾ7f:' कृत्वोच्यते ।। १३।। इति। आङ्तत्राउभिविधौ | निषादो वैश्याच्छूद्रायां जात इति अनु॰- निषाद पुरुष निषाद स्त्री से विवाह करे तो उसके वंश की पांचवीं  Opunc पीढ़ी में शूद्रत्व की समाप्ति हो जाती है। Qpunohtonru [ a याजयेत्सप्तमोउविकृतो   भवति  98 | | तमुपनयेत्षष्ठं एवं तावच्छूद्रायां वैश्याज्जातस्याञ @punchtantrun आवेकृतः नैजमेव वर्णं प्रतिपद्यत इत्यर्यः वैश्यायां जातस्य क्षत्त्रियत्वापत्तिः . तया क्षत्रियायां सप्तमाद्वैश्यत्वापत्तिरुक्ता एवमेव ब्राह्मण्यापत्तिरुच्यते - सवर्णत्यागादपि वर्णसङ्करो जायत इतीदं प्रदर्शयितुम्। जातस्य आह च मनुः @punehtantrum व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च। Qpunch स्वकर्मणां च त्यागेन जायते वर्णसङ्करः।। इति।। @punchtantrum @punC स्वकर्मणां त्याग उपनयनादिसंस्कारहयनिरधिकृते | अतो वर्णसङ्करप्रदर्शनार्थत्वा- दुपपन्नमिहाभिधानम्। । | 98 | / पीढ़ी से उत्पन्न पुरुष का उपनयन करना चाहिए छठी पीढ़ी a अनु॰-पांचवीं  से यज्ञ कराने पर सातवां दोष मुक्त हो जाता है।ntum डॉ नरेन्द्र कुमार आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली सन् १९९९, मृष्ठ ८५ बौधायन धर्मसूत्रम अध्याय खण्ड १६, व्याख्या निषादेन निषाद्यामा पञ्चमाज्जातोउपहन्ति शूद्रताम् 93 | | Opunc अत्र  गौतमीयम् ~ वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमेन  "ಾಗಯಾ7f:' कृत्वोच्यते ।। १३।। इति। आङ्तत्राउभिविधौ | निषादो वैश्याच्छूद्रायां जात इति अनु॰- निषाद पुरुष निषाद स्त्री से विवाह करे तो उसके वंश की पांचवीं  Opunc पीढ़ी में शूद्रत्व की समाप्ति हो जाती है। Qpunohtonru [ a याजयेत्सप्तमोउविकृतो   भवति  98 | | तमुपनयेत्षष्ठं एवं तावच्छूद्रायां वैश्याज्जातस्याञ @punchtantrun आवेकृतः नैजमेव वर्णं प्रतिपद्यत इत्यर्यः वैश्यायां जातस्य क्षत्त्रियत्वापत्तिः . तया क्षत्रियायां सप्तमाद्वैश्यत्वापत्तिरुक्ता एवमेव ब्राह्मण्यापत्तिरुच्यते - सवर्णत्यागादपि वर्णसङ्करो जायत इतीदं प्रदर्शयितुम्। जातस्य आह च मनुः @punehtantrum व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च। Qpunch स्वकर्मणां च त्यागेन जायते वर्णसङ्करः।। इति।। @punchtantrum @punC स्वकर्मणां त्याग उपनयनादिसंस्कारहयनिरधिकृते | अतो वर्णसङ्करप्रदर्शनार्थत्वा- दुपपन्नमिहाभिधानम्। । | 98 | / पीढ़ी से उत्पन्न पुरुष का उपनयन करना चाहिए छठी पीढ़ी a अनु॰-पांचवीं  से यज्ञ कराने पर सातवां दोष मुक्त हो जाता है।ntum डॉ नरेन्द्र कुमार आचार्य, विद्यानिधि प्रकाशन , दिल्ली सन् १९९९, मृष्ठ ८५ बौधायन धर्मसूत्रम अध्याय खण्ड १६, व्याख्या - ShareChat
#श्री हरि मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ॥ पद्मनाभं सहस्राक्षं वनमालिं हलायुधम् । गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ॥ विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् । दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्गं गरुडध्वजम् ॥ अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् । गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ॥ कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानवः । अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ॥ सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातःकाले तथैव च । मध्याह्ने च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ अर्थ = हे पार्थ ! मत्स्य , कूर्म , वराह , वामन , जनार्दन , गोविन्द , पुण्डरीकाक्ष , माधव , मधुसूदन , पद्मनाभ , सहस्त्राक्ष , वनमाली , हलायुध , गोवर्धन , हृषीकेश , वैकुण्ठ , पुरुषोत्तम , विश्वरूप , वासुदेव , राम , नारायण , हरि , दामोदर , श्रीधर , वेदाङ्ग , गरुडध्वज , अनन्त और कृष्णगोपाल इन नामोंका जप करनेवाले मनुष्यके भीतर पाप नहीं रहता । वह एक करोड गो - दान , एक सौ अश्वमेधयज्ञ और एक हजार कन्यादानका फल प्राप्त करता है । अमावस्या , पूर्णिमा तथा एकादशी तिथिको और प्रतिदिन सायं प्रातः एवं मध्याह्नके समय इन नामोंका स्मरणपूर्वक जप करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ नारायण 🪷🌷🪷
श्री हरि - ShareChat
#जय श्री कृष्ण गोलोक और किम्वर्ष का रहस्य 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ गोलोक 〰️〰️〰️ कहा जाता है कि गोलोक हमारी धरती और अन्य लोकों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से बहुत ही दूर है गोलोक के बारे में एक कथा है कि एक बार नारद को अपनी भक्ति पर अभिमान हो गया और वो विचरते विचरते गोलोक जा रहे थे, परन्तु कुछ समय बाद उन्हें अनुभव हुआ कि गोलोक का मार्ग अत्यधिक ज्यादा लंबा हो गया है वो चकित विचलित हो उठे, क्योंकि उन्हें इतना चलने के बाद भी गोलोक का ना ओर मिल रहा था ना छोर, उन्होंने अथक प्रयत्न किया किन्तु वहीं के वहीं पहुँच जाते थे जहां से चले थे परन्तु मंजिल का कोई अता-पता ही नहीं था ! वो निराश हो कर भगवान श्री कृष्ण और श्री हरी नारायण को भजने लगे तब भगवान प्रकट हुए, अब तक नारद को अनुभव हो चुका था कि उनके अभिमान का ही ये दंड है वो प्रभु से क्षमा मांगने लगे ! भगवान ने भी क्षमा कर दिया वो अपने भक्तों के अवगुण हर कर उसे निश्छल मन करने में कहाँ पीछे रहते ! गोलोक में आज भी भगवान श्री कृष्ण समस्त गोपिकाओं और राधा जी के साथ आज भी निवास करते हैं ! गोलोक वास्तव में 51वें डायमेंशन में है, पुराणों और वेदों के अनुसार, और आधुनिक साइंस के अनुसार भी सृष्टि में 31 डायमेंशन संभावित हैं, परन्तु वहां तक पहुंचना दुष्कर और असंभव कार्य है तो गोलोक तो 51वें डायमेंशन में है, जहां का पता तो स्वयं इंद्र और अन्य देवताओं को भी नहीं है ! बस भगवान की इच्छा से ही वहां पहुंचा जा सकता है ! किम्वर्ष 〰️〰️〰️ राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ किम्वर्ष कहाँ है यह वास्तव में अज्ञात है ये सृष्टि के सभी डायमेंशन से पार है इस राम-लोक का पता हनुमान जी, विभीषण और जामवंत जी के अतिरिक्त किसी को भी नहीं है, नारद भी अभी तक वहां नहीं पहुँच सके हैं मन से पूर्ण समर्पित राम भक्त ही वहां जाने का अधिकारी हो सकता है ! किम्वर्ष भी गोलोक जैसा है किन्तु इसका आकार और प्रकार अज्ञात है ! धरती पर अयोध्या नगरी, ओरछा नगरी और साकते धाम को ही राम धाम माना और जाना जाता है परन्तु सृष्टि के पार राम का मुख्य धाम किम्वर्ष है जहां हनुमान जी, विभीषण जी और जामवंत जी सतत उनकी सेवा में रहते हैं, हनुमान जी से भी पहले माता शबरी को इस लोक में निवास मिला था ! राम का परम धाम किम्पुरुष वर्ष और भारतवर्ष का वर्णन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मण जी के बड़े भाई, आदिपुरुष सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परमभागवत श्रीहनुमान जी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं। वहाँ अन्य गन्धर्वों के सहित आर्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं- ‘हम ॐकारस्वरूप पवित्र कीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधन तत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मण भक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः-पुनः प्रणाम है’। ‘भगवन्! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परमशान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जाने योग्य, नाम-रूप से रहित और अहंकार शून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ। प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है। अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीता जी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था। आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीता जी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मण जी का त्याग ही कर सकते हैं। आपके ये व्यापार केवल लोक शिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाकचातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि-इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य-कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नर रूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तर कोसलवासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे’। भारतवर्ष में भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये अव्यक्त रूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। हाँ भगवान् नारद जी स्वयं श्रीभगवान् के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्र के सहित भगवन्महिमा को प्रकट करने वाले पांचरात्र दर्शन का सावर्णी मुनि को उपदेश करने के लिये भारतवर्ष की वर्णाश्रम-धर्मावलम्बिनी प्रजा के सहित अत्यन्त भक्तिभाव से भगवान् श्रीनर-नारायण की उपासना करते और इस मन्त्र का जप तथा स्तोत्र को गाकर उनकी स्तुति करते हैं। ( टिप्पणी 👉 यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभी के आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् (धीर) पुरुषों के ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूप से अनुभव करते हैं-अन्य पुरुष नहीं। श्रुति में जहाँ-कहीं आत्मसाक्षात्कार की बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ता के लिये ‘धीर’ शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत’ इति ‘नः शुश्रुम धीराणाम्’ इत्यादि। इसीलिये यहाँ भी भगवान् को आत्मवान् या धीर पुरुष का आत्मा बताया है। ऊपर जायें एक बार भगवान् श्रीराम एकान्त में देवदूत से बात कर रहे थे। उस समय लक्ष्मण जी पहरे पर थे और भगवान् की आज्ञा थी कि कि यदि इस समय कोई भीतर आवेगा तो वह मेरे हाथ से मारा जायेगा। इतने में ही दुर्वासा मुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मण जी को अपने आने की सूचना देने के लिये भीतर जाने को विवश किया। इससे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भगवान् बड़े असमंजन में पड़ गये। तब वसिष्ठ जी ने कहा कि लक्ष्मण जी के प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजन का त्याग मृत्युदण्ड के समान ही है। इसी से भगवान् ने उन्हें त्याग दिया। गोलोक धाम की तरह ही श्री राम का परम धाम वैकुण्ठ के साथ किम्पुरुष वर्ष भी है ) साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
जय श्री कृष्ण - गोलोक और किम्वर्ष का रहस्य गोलोक और किम्वर्ष का रहस्य - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 शिखा सभी वर्णों और अन्त्यजों के लिए है - हिन्दुत्व की पहचान है । ईसाई स्कूलों में मिलने वाले विधर्मी संस्कारों के कारण हिन्दुओं ने चोटी त्याग दी है । नारायण 🪷🌷🪷
🕉️सनातन धर्म🚩 - बुद्धिमत्तासे | मुसलमान तो तलवारके जोरसे जबर्दस्ती हिन्दुत्वकी  पहचान   है। शिखा  आपको 46 जातिकी रक्षा करनेवाली है। जनेऊ तो सबके लिये धर्मपरिवर्तन करते हैं ईसाई बाहरसे सेवा करके रीतिसे ) नहीं है॰ केवल ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यके लिये -| भीतर ही धर्म परिवर्तन करते ( गुप्त पर शिखा हिन्दूमात्रके लिये है। चाहे द्विजाति हो, हैं।वे स्कूल खोलते हैं और उनमें बालकोंपर अपने शिखा   सबके लिये है। जैसे धर्मके संस्कार डालते हैं।इसोका परिणाम है कि॰घर ٩٤ अन्त्यज  हो मुसलमानोंके लिये सुन्नत है॰ ऐसे ही हिन्दुओंके लिये बैठे- बैठे हिन्दुओंने अपनी चोटीका त्याग নিমা ch1 सुन्नतके   बिना   कोई इस काममें ईसाई सफल हो गये! मुसलमानों और नहीं शिखा ೯ मुसलमान मिलेगा, पर शिखाके बिना आज हिन्दुओंका समुदाय  ईसाइयोंका उद्देश्य मनुष्यमात्रका कल्याण  नहीं फरना समुदाय मिल जायगा  मुसलमान और ईसाई बड़े है, प्रत्युत अपनी संख्या बढ़ाना है॰ जिससे chly 8-chl जोरोंसे अपने धर्मका प्रचार कर रहे हैं और हिन्दुओंका कलियुगका प्रभाव प्रतिवर्ष, प्रतिमास राज्य हा जाय। धर्म- परिवर्तन करनेकी नयी-्नयी योजनाएँ बना रहे प्रतिदिन जोरोंसे बढ़ रहा है। लोगोंकी बुद्धि भ्रष्ट हो हें! आपने अपनी चोटी रही है। मनुष्यमात्रका कल्याण चाहनेवालो हिन्दू कटवाकर   उनके प्रचार दिया है! इसलिये समय रहते संस्कृति नष्ट होे रही है। हिन्दू स्वयं हो अपनी कार्यको सुगम ಚal हिन्दुओंको सावधान हो जाना चाहिये। मुसलमान संस्कृतिका नाश करेंगे तो रक्षा कौन करेगा ? अपने धर्मका प्रचार मूर्खतासे करते हैं और ईसाई साधन सुधा निधि, पृष्ठ २७७ ८२, स्वामी रामसुखदास जी, गीताप्रेस गोरखपुर , #२१९७, सन् २००० बुद्धिमत्तासे | मुसलमान तो तलवारके जोरसे जबर्दस्ती हिन्दुत्वकी  पहचान   है। शिखा  आपको 46 जातिकी रक्षा करनेवाली है। जनेऊ तो सबके लिये धर्मपरिवर्तन करते हैं ईसाई बाहरसे सेवा करके रीतिसे ) नहीं है॰ केवल ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यके लिये -| भीतर ही धर्म परिवर्तन करते ( गुप्त पर शिखा हिन्दूमात्रके लिये है। चाहे द्विजाति हो, हैं।वे स्कूल खोलते हैं और उनमें बालकोंपर अपने शिखा   सबके लिये है। जैसे धर्मके संस्कार डालते हैं।इसोका परिणाम है कि॰घर ٩٤ अन्त्यज  हो मुसलमानोंके लिये सुन्नत है॰ ऐसे ही हिन्दुओंके लिये बैठे- बैठे हिन्दुओंने अपनी चोटीका त्याग নিমা ch1 सुन्नतके   बिना   कोई इस काममें ईसाई सफल हो गये! मुसलमानों और नहीं शिखा ೯ मुसलमान मिलेगा, पर शिखाके बिना आज हिन्दुओंका समुदाय  ईसाइयोंका उद्देश्य मनुष्यमात्रका कल्याण  नहीं फरना समुदाय मिल जायगा  मुसलमान और ईसाई बड़े है, प्रत्युत अपनी संख्या बढ़ाना है॰ जिससे chly 8-chl जोरोंसे अपने धर्मका प्रचार कर रहे हैं और हिन्दुओंका कलियुगका प्रभाव प्रतिवर्ष, प्रतिमास राज्य हा जाय। धर्म- परिवर्तन करनेकी नयी-्नयी योजनाएँ बना रहे प्रतिदिन जोरोंसे बढ़ रहा है। लोगोंकी बुद्धि भ्रष्ट हो हें! आपने अपनी चोटी रही है। मनुष्यमात्रका कल्याण चाहनेवालो हिन्दू कटवाकर   उनके प्रचार दिया है! इसलिये समय रहते संस्कृति नष्ट होे रही है। हिन्दू स्वयं हो अपनी कार्यको सुगम ಚal हिन्दुओंको सावधान हो जाना चाहिये। मुसलमान संस्कृतिका नाश करेंगे तो रक्षा कौन करेगा ? अपने धर्मका प्रचार मूर्खतासे करते हैं और ईसाई साधन सुधा निधि, पृष्ठ २७७ ८२, स्वामी रामसुखदास जी, गीताप्रेस गोरखपुर , #२१९७, सन् २००० - ShareChat
#महाभारत 🧘कृपाचार्य — एक अमर साक्षी की मौन पीड़ा🧘 🛐महाभारत के विराट और हृदय विदारक इतिहास में जहाँ भीष्म की प्रतिज्ञा गूँजती है, अर्जुन का गांडीव चमकता है और श्रीकृष्ण का गीता उपदेश अमर हो जाता है—वहीं एक मौन छाया भी है। वह छाया है — कृपाचार्य। न वे सर्वाधिक प्रशंसित थे, न वे सर्वाधिक निंदित। वे केवल साक्षी थे — एक ऐसे युग के, जो स्वयं अपने ही हाथों नष्ट हो गया।🛐 🧍जन्म से ही विरक्त, नियति से बँधे कृपाचार्य का जन्म साधारण नहीं था। वे महर्षि शरद्वान के पुत्र थे, जिन्हें राजा शंतनु ने आश्रय दिया। राजमहल में पले-बढ़े, पर मन में सदैव ऋषित्व की गंभीरता थी। वे कुरुवंश के राजगुरु बने। उन्होंने कौरवों और पांडवों — दोनों को धनुर्विद्या और शस्त्रविद्या का ज्ञान दिया। सोचिए उस गुरु का हृदय कैसा रहा होगा, जो जानता था कि उसके शिष्य एक दिन एक-दूसरे का रक्त बहाएँगे। गुरु, जो किसी एक का नहीं था कृपाचार्य ने अर्जुन की एकाग्रता देखी, भीम की शक्ति को दिशा दी, दुर्योधन की महत्वाकांक्षा को भी प्रशिक्षित किया। उनके लिए सभी शिष्य थे। पर जब अधर्म और अहंकार की ज्वाला बढ़ी, तो वे राजधर्म से बँध गए।🧍 👩‍❤️‍👩उन्होंने कौरवों की ओर से युद्ध किया। क्या वे अधर्म के पक्षधर थे? नहीं। वे केवल अपने कर्तव्य से बँधे थे। और कभी-कभी कर्तव्य भी मनुष्य को भीतर से तोड़ देता है।👩‍❤️‍👩 🌍कुरुक्षेत्र — जहाँ शिष्य शत्रु बने। जब कुरुक्षेत्र में शंखनाद हुआ, कृपाचार्य ने भी शस्त्र उठाया। उन्होंने देखा—भीष्म पितामह का पतन। द्रोणाचार्य का छलपूर्वक वध। कर्ण का सूर्यास्त। अपने ही शिष्यों का एक-दूसरे के हाथों अंत। हर दिन युद्धभूमि में रक्त बहता था, और हर रात एक गुरु का हृदय रोता था। वे जीवित रहे। और कभी-कभी जीवित रह जाना ही सबसे बड़ा दंड होता है। तीन बचे हुए योद्धाओं में एक महायुद्ध के पश्चात कौरव पक्ष से केवल तीन योद्धा जीवित बचे— अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य।🌍 ⁉️पर क्या यह विजय थी? नहीं। यह केवल शेष रह गई शून्यता थी। बाद में उन्होंने पांडवों के वंशज परीक्षित को शिक्षा दी।⁉️ 🎇कल्पना कीजिए—जिस गुरु ने पांडवों के विरुद्ध युद्ध किया, वही उनके वंश का आचार्य बना। समय ने मानो उन्हें यह सिखाया कि युद्ध किसी का स्थायी नहीं होता।🎇 ⁉️अमरता — वरदान या अभिशाप?⁉️ 🕉️कहा जाता है कि कृपाचार्य चिरंजीवी हैं। पर क्या अमर रहना सुख है, जब स्मृतियाँ ही घाव बन जाएँ? उन्होंने देखा— भाई-भाई का वध, धर्म का भ्रम, राज्य का पतन। वे इतिहास के अमर साक्षी हैं —पर उनके हृदय की पीड़ा भी अमर है।🕉️ 🍀मौन में छिपा हुआ करुण राग कृपाचार्य की कथा में न अत्यधिक वीर रस है, न स्पष्ट खलनायक का अंधकार। उनकी कथा करुणा की है। एक गुरु की, जो अपने ही शिक्षित शिष्यों को मरते देखता रहा। एक योद्धा की, जो कर्तव्य और अंतर्मन के बीच झूलता रहा। एक अमर की, जो युगों से इतिहास का भार उठाए चल रहा है। यदि कभी कुरुक्षेत्र की मिट्टी को हाथ में लेकर आप आँखें बंद करें, तो शायद आपको तलवारों की टकराहट नहीं— बल्कि कृपाचार्य की मौन आह सुनाई दे।
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गंगा स्नान का मर्म: विश्वास की परीक्षा ----- #🙏हर की पौड़ी हरिद्वार 🙏गंगा नदी 🙏👌हर हर गंगे🙏 #जय माँ गंगे हर हर गंगे हरिद्वार का पावन तट। पतित पावनी माँ गंगा अपने पूरे वेग और कल-कल निनाद के साथ बह रही थीं। घाटों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा था। "हर-हर गंगे" और "हर-हर महादेव" के जयकारों से आकाश गूंज रहा था। स्वयं देवाधिदेव महादेव और जगत जननी माँ पार्वती मानवीय रूप धारण कर इस कोलाहल के बीच भ्रमण कर रहे थे। माँ पार्वती की दृष्टि उन हजारों लोगों पर पड़ी जो गंगा में डुबकी लगाकर बाहर आ रहे थे। उनके शरीर गीले थे, माथे पर चंदन था, और मुख पर मंत्र। किन्तु, माँ पार्वती तो अंतर्यामी थीं; वे मनुष्यों के भीतर झाँक सकती थीं। उन्होंने बड़े आश्चर्य और वेदना के साथ महादेव से पूछा, "हे प्राणनाथ! देखिये, सहस्त्रों मनुष्य गंगा में स्नान करके निकल रहे हैं। शास्त्रों में तो गंगा को पापनाशिनी कहा गया है, फिर भी इनके चेहरों पर वो तेज क्यों नहीं है? इनके चित्त अब भी काम, क्रोध, लोभ और पाप से मलिन क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या कलयुग में गंगा का सामर्थ्य क्षीण हो गया है?" शिवजी मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, "प्रिये! गंगा का सामर्थ्य आज भी वही है और अनंत काल तक वही रहेगा। समस्या गंगा में नहीं, स्नान करने वालों में है। इनमें से किसी ने भी वास्तव में 'गंगा स्नान' किया ही नहीं है, तो भला पाप कैसे धुलें?" पार्वती जी ने विस्मित होकर कहा, "आप यह कैसी पहेली बुझा रहे हैं प्रभु? अभी तक इनके वस्त्रों से जल टपक रहा है, शरीर भी नहीं सूखे हैं, और आप कहते हैं इन्होंने स्नान नहीं किया?" महादेव ने गम्भीर स्वर में कहा, "ये केवल जल में शरीर भिगोकर आए हैं, मन को नहीं डुबोया। चलो, तुम्हें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देता हूँ।" अगले दिन, महादेव की लीला से आकाश में घने काले बादल छा गए। मूसलाधार वर्षा होने लगी। हरिद्वार की गलियाँ पानी से लबालब हो गईं और रास्तों पर गहरा, लपटीला कीचड़ जमा हो गया। एक चौड़े रास्ते के बीचों-बीच एक गहरा गड्ढा था। शिवजी ने लीला रची—वे एक अति वृद्ध, जर्जर और असहाय बूढ़े का रूप धारण कर उस कीचड़ भरे गड्ढे में जा गिरे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई राहगीर चलते-चलते गिर पड़ा हो और अब निकलने में असमर्थ हो। माँ पार्वती को उन्होंने एक साधारण, चिंतित स्त्री का रूप दिया और गड्ढे के किनारे बैठा दिया। शिवजी ने उन्हें समझाया, "देवी! तुम्हें केवल इतना करना है कि आने-जाने वालों से सहायता की गुहार लगानी है। कहना कि मेरे वृद्ध पति गिर गए हैं, कोई पुण्यात्मा इन्हें बाहर निकाल दे।" और फिर शिवजी ने वह शर्त बताई जो इस लीला का सार थी: "जब भी कोई मुझे निकालने के लिए हाथ बढ़ाए, तो उसे रोककर कहना— 'भाई! मेरे पति सर्वथा निष्पाप हैं। इन्हें केवल वही व्यक्ति स्पर्श करे जिसने जीवन में कोई पाप न किया हो और जो अभी गंगा स्नान से पूर्णतः पवित्र हो गया हो। यदि कोई पापी इन्हें छुएगा, तो वह उसी क्षण जलकर भस्म हो जाएगा।'" पार्वती जी 'तथास्तु' कहकर किनारे बैठ गईं। गंगा स्नान करके लौटने वालों की भीड़ आनी शुरू हुई। माँ पार्वती ने करुण स्वर में पुकारना शुरू किया, "हे धर्मपरायण जनों! कोई मेरे वृद्ध पति की रक्षा करो! ये इस कीचड़ में फँस गए हैं, कोई पुण्यात्मा इन्हें सहारा दे!" एक सुंदरी युवती को इस अवस्था में देख कई लोग रुके। * कुछ के मन में दया आई, तो कुछ के मन में पाप। * कुछ कानून के पचड़े के डर से कतरा कर निकल गए। * कुछ ने उपहास किया, "अरे बुढ़िया, मरने दे बुड्ढे को, क्यों रो रही है?" फिर कुछ सज्जन और धर्मभीरु लोग आगे आए। वे वास्तव में सहायता करना चाहते थे। उन्होंने हाथ बढ़ाया, लेकिन जैसे ही पार्वती जी ने अपनी शर्त रखी— "ठहरिये! यदि आप निष्पाप हैं तभी हाथ लगाइएगा, अन्यथा आप भस्म हो जाएंगे!"—वे ठिठक गए। उनके कदम पीछे हट गए। वे मन ही मन सोचने लगे: > "हम गंगा तो नहा आए हैं, पर क्या सच में हमारे पाप धुल गए? मैंने कल ही झूठ बोला था... मैंने किसी का दिल दुखाया था। गंगा स्नान तो रस्म है, पर अंदर तो मैं वही हूँ। कहीं सच में भस्म हो गया तो? कौन रिस्क ले?" सुबह से शाम हो गई। सैकड़ों लोग आए, शर्त सुनी, अपने पापों को याद किया, और मृत्यु के भय से सिर झुकाकर चले गए। किसी को भी अपनी पवित्रता पर, या गंगा की शक्ति पर पूर्ण विश्वास नहीं था। शिवजी ने कीचड़ से ही मुस्कुराते हुए पार्वती जी की ओर देखा, "देखा उमा? आया कोई सच्चे हृदय वाला?" संध्या गहराने लगी थी। तभी एक नौजवान, हाथ में लोटा लिए, मस्ती में झूमता हुआ, "हर-हर गंगे!" गाता हुआ वहां से निकला। उसे देख पार्वती जी ने फिर वही गुहार लगाई। युवक का हृदय करुणा से भर गया। उसने आव देखा न ताव, तुरंत अपना लोटा रखा और वृद्ध को निकालने के लिए गड्ढे में उतरने लगा। पार्वती जी ने उसे तुरंत रोका, "बेटा रुको! यदि तुम सर्वथा निष्पाप नहीं हो, तो मेरे पति को छूते ही तुम जलकर राख हो जाओगे!" यह सुनते ही वह युवक जोर से हँसा। उसके चेहरे पर भय की लकीर तक न थी। उसने दृढ़ता और उत्साह के साथ कहा: "माता! यह आप कैसी शंका कर रही हैं? क्या आपको नहीं दिखता कि मैं अभी-अभी पतित पावनी माँ गंगा की गोद से नहाकर आ रहा हूँ? अरे, गंगा में डुबकी लगाने के बाद भी क्या कोई पाप शेष रह सकता है? गंगाजल का स्पर्श होते ही सारे पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य के निकलते ही अंधकार! आप निश्चिंत रहें, मैं पवित्र हूँ क्योंकि मैं गंगा पुत्र हूँ!" इतना कहकर उस युवक ने पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ वृद्ध रूपी शिवजी को अपनी बांहों में भरकर कीचड़ से बाहर खींच लिया। जैसे ही युवक ने उन्हें बाहर निकाला, शिव और पार्वती ने उसे अपना अधिकारी भक्त समझकर अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में दर्शन दिए। शिवजी ने पार्वती जी की ओर देखा और कहा, "प्रिये! सुबह से जितने लोग गुजरे, उनमें से केवल इसी एक ने वास्तव में 'गंगा स्नान' किया है। बाकी सब तो केवल शरीर धोकर चले गए।" दुख और पाप का नाश केवल पानी में डुबकी लगाने से नहीं होता। वह होता है उस अटूट विश्वास से कि "ईश्वर की शरण में आने के बाद मैं शुद्ध हो गया हूँ।" जो लोग बिना श्रद्धा के, केवल दिखावे या रस्म अदायगी के लिए तीर्थ करते हैं, वे वैसे ही लौटते हैं जैसे गए थे। फल उसी को मिलता है, जिसकी भावना में बल होता है। !! हर हर गंगे, हर हर महादेव !! ---:: ॐ :: ---
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#❤️जीवन की सीख प्रसंशक बने अपने मन का अवलोकन करते हुए श्रेष्ठ के लिए सदैव संकल्पित रहें। पीठ पीछे होने वाली बातों पर ज्यादा ध्यान मत दीजिए, क्योंकि जब लोग बराबरी नहीं कर सकते तो बुराई करने लग जाते हैं। पीठ पीछे आपकी बातें होने लगे तो व्यर्थ की बातों में विचलित होने की अपेक्षा ये समझ जाना कि आप उनसे दो कदम आगे हैं , क्योंकि बातें भी उसी की होती है, जिसमें कोई बात होती है। प्रशंसा आपको अहमता से भर देगी और बुराई आपको सावधान करते हुए स्वयं के जीवन को निहारने का अवसर प्रदान करेगी। छोटी-छोटी बातों को अनदेखा करके ही बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकता है। पीठ पीछे बोलने वालों की परवाह कभी मत करो, लेकिन अपने कर्म की पवित्रता और लक्ष्य की श्रेष्ठता का ध्यान सदैव रखो। आपके प्रयास बुराई करने वालों को चुप कराने के लिए नहीं अपितु स्वयं के जीवन से बुराई मिटाने की दिशा में होने चाहिए। निर्णय आपका स्वयं विचार करें। जय जय श्री राधे 💫🪷💫🪷💫🪷💫🪷💫
❤️जीवन की सीख - @SuVlchnr ೯೯g. कहीं भी रखना इस सृष्टि में, पर रखना अपनी दृष्टि में, ताकि हर साँस तेरा स्मरण हो और हर ' राह तुझ तक ले जाए। @SuVlchnr ೯೯g. कहीं भी रखना इस सृष्टि में, पर रखना अपनी दृष्टि में, ताकि हर साँस तेरा स्मरण हो और हर ' राह तुझ तक ले जाए। - ShareChat
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *इस सकल सृष्टि में समस्त जड़ चेतन के मध्य मनुष्य सिरमौर बना हुआ है | जन्म लेने के बाद मनुष्य को अपने माता - पिता एवं सद्गुरु के द्वारा सत्य की शिक्षा दी जाती है | यह सत्या आखिर है क्या ? तीनो लोक चौदहों भुवन में एक ही सत्य बताया गया है वह है परमात्मा | जिसके लिए लिखा भी गया है :-- "ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या" अर्थात ब्रह्म ही सत्य है बाकी सब संसार झूठा है | सत्य को परिभाषित करते हुए परमात्मा का महिमामण्डन किया गया है :-- "सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये ! सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना: !!" अर्थात :--- जिनका व्रत (संकल्प) सत्य है , सत्य ही जिनकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है , जो तीनों कालों में , सृष्टि के पूर्व में , प्रलय के बाद एवं स्थिति में सत्यरूप से रहते हैं , जो सत्य अर्थात पृथ्वी , जल , तेज , वायु एवं आकाश के कारण हैं | उक्त पाँच महाभूतों में सत्य (अंतर्यामी) रूप से विराजमान हैं और जो इन पाँच महाभूतों के पारमार्थिक रूप हैं क्योंकि इनका नाश होने पर शेष रह जाते हैं | जो सूनृता (मधुर) वाणी और सत्य के प्रवर्तक हैं- हे भगवान्! इस प्रकार सब तरह से सत्यरूप आपकी शरण में हम प्राप्त हुए हैं | इस प्रकार परमात्मा को सत्य बताया गया है | पारलौकिक शक्तियों में यदि ब्रह्म सत्य है तो इस धरा धाम पर अटल सत्य है मृत्यु | जिसका प्राकट्य हुआ है उसका विनाश एक दिन निश्चित है | मृत्यु के लिए लिखा गया है :- "जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य च " अर्थात जो भी प्राणी जन्म ग्रहण करता है उसे समय आने पर मरना ही पड़ता है और जो मरता है उसे जन्म लेना ही पड़ता है | पुनर्जन्म सनातन धर्म की अपनी विशेषता | जीवन की समाप्ति मृत्यु से होती है इसको सभी जानते हैं परंतु मानना कोई नहीं चाहता है | संसार में मृत्यु स्पष्ट दिखाई पड़ती है लोग नित्य किसी न किसी के अंतिम संस्कार में जाते रहते हैं परंतु मृत्यु को कोई भी स्वीकार नहीं कर पाता | जिसने इस सत्य को स्वीकार कर लिया उसके मन की अशांति लुप्त हो जाती और वह मृत्यु की सत्यता को जानकर मान भी लेता है और सुखी रहता है | अनेक सुखभोग के साधन एकत्र कर लेने के बाद भी मनुष्य मृत्युरूपी परम सत्य से स्वयं को बचा नहीं सकता है क्योंकि सत्य सत्य होता है | जो सत्य होता है वह कभी परिवर्तित नहीं हो सकता |* *आज मनुष्य ने बहुत विकास कर लिया है असम्भव कार्य को सम्भव कर लेने में मनुष्य सिद्धहस्त हो गया है | आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य ने जीवन को सुचारुरूप से चालित रखने के लिए अनेकों मशीनों का आविष्कार भी कर लिया है | अस्वस्थ होकर मृत्यु के मुंह में जाने वाले प्राणी को भी इन आधुनिक मशीनों पर रखकर चिकित्सक उनके प्राणों की रक्षा करने का दम भरते हैं परन्तु उनको यह नहीं पता है कि जब जिसकी मृत्यु का समय आ जायेगा तब उसको कोई भी मशीन कोई भी उपचार बचा नहीं पायेगा | सारे प्रयास कर लेने के बाद इस सत्यता को अन्तत: स्वीकार करना ही पड़ता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इस संसार के नियम की अलौकिकता देखकर यह कह सकता हूँ कि आज तक इस मृत्युरूपी सत्य से कोई भी न तो बच पाया है और न ही बच पायेगा | अनेकों चिकित्सक , स्नेही परिजन घेरे रहते हुए प्राण बचाने का सतत् प्रयास करते रहते हैं परंतु जीव शरीर को छोड़कर चला ही जाता है | "पद्मपुराण" में बताया गया है :--- "नौषधं न तपो दानं न माता न च बान्धवा: ! शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडि़तम् !! अर्थात :- कालमृत्यु से आक्रान्त मनुष्य की रक्षा करने में औषधि , तपश्चर्या , दान और माता - पिता एवं बन्धु - बान्धव भी समर्थ नहीं नहीं हैं | क्योंकि जीवात्मा इतना सूक्ष्म है कि उसे शरीर का त्याग करते हुए कोई भी अपने चर्मचक्षुओं से नहीं देख सकता है | परंतु आज असत्य का इतना विस्तार है कि मनुष्य सृष्टि के दोनों सत्य (परमात्मा एवं मृत्यु) को भुलाये बैठा है | मृत्यु को सत्य मानकर जो भी परमात्मा की शरण में रहता है उसका लोक एवं परलोक दोनों ही संवर जाता है | क्योंकि जो सत्य है वह सत्य ही रहेगा इस सत्य को सहर्ष स्वीकार भी करना चाहिए |* *जिस प्रकार सत्य परेशान हो सकता है परन्तु पराजित नहीं उसी प्रकार मृत्यु से बचने का प्रयास तो किया जा सकता है परंतु बचा नहीं जा सकता है क्योंकि मृत्यु ध्रुव सत्य है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #☝आज का ज्ञान
☝आज का ज्ञान - Ao Shi am9n 2Febra Ao Shi am9n 2Febra - ShareChat
#राधे राधे ।। आई ऋतु बसंत की गोपीन किये सिंगार।। कुमकुम बरनी राधिका सो निरखति नंदकुमार।।1।। आई ऋतु बसंत की मौरे सब बनराई।। एकु न फूलै केतकी औ फूली बनजाई।।2।। श्रीगिरिराजधरनधीर लाड़िलौ ललन - बर गाइए।। श्रीनवनीत प्रिय लाडिलौ ललन - बर गाइए।। श्री मदन मोहन पिय लाडिलौ ललन बर गाइए।।3।। कुंज कुंज क्रीड़ा करैं , राजत रूप - नरेस।। रसिक , रसिलौ , रसभर्यो , राजत श्रीमथुरेस।।4।। श्रीगिरिराजधरनधीर लाड़िलौ ललन बर गाइए।। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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