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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) शततमोऽध्यायः शान्तनु के रूप, गुण और सदाचार की प्रशंसा, गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति तथा देवव्रत की भीष्म-प्रतिज्ञा...(दिन 313) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा । न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ।। ८३ ।। परंतप ! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।। एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।। ८४ ।। पृथ्वीनाथ ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप ! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।। ८५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया - ।। ८५ ।। इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर । नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।। 'सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज ! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।। एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे । योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।। ८७ ।। 'लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा' ।। ८७ ।। इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत । चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ।। ८८ 11 भरतवंशावतंस जनमेजय ! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला। वह राज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ।। ८८ ।। त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते। कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वरः ।। ८९ ।। उसने कहा- 'अमित तेजस्वी युवराज ! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिक बनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन् ! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है। आप जिसे चाहें, इसे दे सकते हैं। आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ।। ८९ ।। इदं तु वचनं सौम्य कार्य चैव निबोध मे । कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ।। ९० ।। 'परंतु सौम्य ! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है; अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये। शत्रुदमन ! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ।। ९० ।। यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण । राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ।। ९१ ।। 'सत्यधर्मपरायण राजकुमार ! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ।। ९१ ।। नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन। तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ।। ९२ ।। 'महाबाहो ! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है' ।। ९२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभाखतमू श्रीमहाभाखतमू - ShareChat
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 शिव और शंकर में भेद 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ आप शिव के उपासक हैं या शंकर के ? चौंक गए ना ये सवाल सुनकर… नोट:-यदि लेख पूरा पढ़ सकते हैं तभी आगे बढ़े अन्यथा यह लेख आपके लिए नहीं है। वैसे भी कौन मानेगा कि शिव और शंकर अलग अलग है. हमें तो बचपन से यही बताया गया है ना कि शिवशंकर एक ही है. यहाँ तक की दोनों नाम हम अक्सर साथ में ही लेते है। अगर हम आपको ये कहे कि शिव और शंकर ना सिर्फ अलग अलग है बल्कि शंकर की उत्त्पति भी शिव से ही हुई है. शिव ही प्रारंभ है और शिव ही अंत है। शिव और शंकर में सबसे बड़ा और समझने में आसान अंतर दोनों की प्रतिमा में है। शंकर की प्रतिमा जहाँ पूर्ण आकार में होती है वही शिव की प्रतिमा लिंगम रूप में होती है या अंडाकार अथवा अंगूठे के आकार की होती है. महादेव शंकर 〰️〰️〰️〰️ शंकर भी ब्रह्मा और विष्णु के तरह देव है और सूक्ष्म शरीरधारी है. ब्रम्हा और विष्णु की तरह शंकर भी सूक्ष्म लोक में रहते है. शंकर भी विष्णु और ब्रम्हा की तरह ही परमात्मा शिव की ही रचना है. शंकर को महादेव भी कहा जाता है परन्तु शंकर को परमात्मा नहीं कहा जाता क्योंकि शंकर का कार्य केवल संहार है. पालन एवं निर्माण शंकर का कर्तव्य नहीं है. शिव 〰️〰️ शंकर से अलग शिव परमात्मा है. शिव का कोई शरीर नहीं कोई रूप नहीं है. शिव, शंकर, ब्रम्हा और विष्णु की तरह सूक्ष्मलोक में नहीं रहते. उनका निवास तो सूक्ष्म लोक से परे है. शिव ही ब्रम्हा विष्णु शंकर त्रिदेवों के रचियेता है. शिव ही विश्व का निर्माण, कल्याण और विनाश करते है जिसका माध्यम ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते है। देखा आपने की कैसे एक दुसरे से भिन्न है शिव और शंकर. अब आपको आसानी होगी ये जानने की कि किसकी उपासना करते है आप बात को आगे बढ़ाते हुए आपको एक और जानकारी देते है। सबका जन्म दिन होता है क्या आपने कभी सोचा है कि शिव ही एक मात्र ऐसे है जिनके जन्मदिन को शिवरात्रि कहा जाता है. इसका भी एक कारण है रात्रि का मतलब शाब्दिक नहीं है यहाँ रात्रि का अर्थ कुछ और है। यहाँ रात्रि से अभिप्राय ये है कि पाप, अन्याय, बुराइयाँ. जब काल के साथ साथ मनुष्य नीचता की और बढ़ता चला गया उस समय की तुलना रात्रि से की गयी है और उस गहरी रात्रि को शिव प्रकट होते है अर्थात जन्म लेते है। शिव के जन्म की रात्रि के बाद रात्रि अर्थात अन्धकार का अंत हो जाता है और मनुष्यता एक बार फिर उन्नत हो जाती है। ये था शिव और शंकर में अंतर और शिव जन्म को शिव रात्रि कहने का भेद। सती और पार्वती के पति भगवान शंकर को सदाशिव के कारण शिव भी कहा जाता है। हम इन्हीं भगवान शंकर की बात करेंगे जिन्हें महादेव भी कहा गया है। भगवान शंकर के बारे में कुछ इस तरह की भ्रंतियां फैली हैं जो कि अपमानजनक है। वे लोग इसके दोषी हैं, जो जाने-अनजाने भगवान शिव का अपमान करते रहते हैं। यदि आप भगवान शंकर के भक्त हैं तो आपको यह जान और सुन कर धक्का लगना चाहिये, क्योंकि भगवान शंकर हिन्दू धर्म का मूल तना है, रीढ़ है। रामचरित मानस में भगवान राम कहते हैं कि 'शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।'... अपराधियों का साथी या उसे नजरअंदाज करने वाला भी अपराधी होता है। शिव के मंदिर में जाने और वहां पूजा, प्रार्थना करने के कुछ नियम होते है। यह सही है कि भगवान शंकर भोलेनाथ है। वे बड़े दयालु हैं, आपको क्षमा कर देंगे। लेकिन आपने उनके मंदिर में जाकर किसी भी तरह से नियम विरूद्ध कार्य किया या अपमान किया है तो आपको माता कालिका देख रही है। भगवान भैरव और शनिदेव भी देख रहे हैं। शैव पंथ पर चलाना या शिव की पूजा करना कठिन है। यह अग्निपथ है। आओ हम आपको बताते हैं कि भगवान शिव के बारे में समाज में किस तरह की भ्रांतियां फैला रखी और उस भ्रांति को अभी तक बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या शिवलिंग का अर्थ शिव का शिश्न है? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह दुख की बात है कि बहुत से लोगों ने कालांतर में योनि और शिश्न की तरह शिवलिंग की आकृति को गढ़ा और वे उसके चित्र भी फेसबुक और व्हाट्सऐप पर पोस्ट करते रहते हैं। वे इसके लिए कुतर्क भी देते रहते हैं। उक्त सभी लोगों को मरने के बाद इसका जवाब देना होगा, क्योंकि शिव का अपमान करने वाला किसी भी परिस्थिति में बच नहीं सकता। शिव से ही सभी धर्म है और शिव से ही प्रलय भी। दरअसल, शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्मांड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। जिस तरह भगवान विष्णु का प्रतीक चिन्ह शालिग्राम है उसी तरह भगवान शंकर का प्रतीक चिन्ह शिवलिंग है। इस पींड की आकृति हमारी आत्मा की ज्योति की तरह होती है। वायुपुराण👉 के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना की जाती है। स्कन्दपुराण👉 में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्मांड (ब्रह्मांड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्धकाल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है। ब्रह्मांड का प्रतीक ज्योतिर्लिंग 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है, कुछ लोग इसे यौनांगों के अर्थ में लेते हैं और उन लोगों ने शिव की इसी रूप में पूजा की और उनके बड़े-बड़े पंथ भी बन गए हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने धर्म को सही अर्थों में नहीं समझा और अपने स्वार्थ के अनुसार धर्म को अपने सांचे में ढाला। शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्धकाल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है। शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न। ज्योतिर्लिंग : 〰️〰️〰️〰️ ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है। क्या भांग और गांजा पीते हैं भगवान शंकर? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इसका जवाब है नहीं। शिव पुराण सहित किसी भी ग्रंथ में ऐसा नहीं लिखा है कि भगवान शिव या शंकर भांग, गांजा आदि का सेवन करते थे। बहुत से लोगों ने भगवान शिव के ऐसे ‍भी चित्र बना लिए हैं जिसमें वे चिलम पीते हुए नजर आते हैं। यह दोनों की कृत्य भगवान शंकर का अपमान करने जैसा है। यह भगवान शंकर की छवि खराब किए जाने की साजिश है। यदि आपके घर, मंदिर या अन्य किसी भी स्थान पर भगवान शंकर का ऐसा चित्र या मूर्ति लगा है जिसमें वे चिलम पीते या भांग का सेवन करते हुए नजर आ रहे हैं तो उसे आप तुरंत ही हटा दें तो अच्‍छा है। यह भगवान शंकर का घोर अपमान है। यह भी कितना दुखभरा है कि कई लोगों ने भगवान शंकर पर ऐसे गीत और गाने बनाएं हैं जिसमें उन्हें भांग का सेवन करने का उल्लेख किया गया है। कोई गीतकार या गायक यह जानने का प्रयास नहीं करता है कि इस बारे में सच क्या है। मैं जो गाना गा रहा हूं या गीत लिख रहा हूं उसका आधार क्या है? यह तो छोड़िये बड़े बड़े पंडित भी शिव के मंदिरों में जब भांग का अभिषेक करते हैं तो फिर अन्य किसी पर दोष देने का कोई मतलब नहीं। ये सभी पंडित नर्क की आग में जलने वाले हैं। यह तो अब आम हो चला है कि शिवरात्रि या महाशिवरात्रि के दिन लोग भांग घोटकर पीते हैं। किसी को भांग पीने की मनाही नहीं हैं लेकिन शिव के नाम पर पीना उनका अपमान ही है। प्रश्न :👉 क्या भगवान शंकर को नहीं मालूम था कि गणेशजी पार्वती के पुत्र हैं? फिर उन्होंने अनजाने में उनकी गर्दन काट दी और फिर जब उन्हें मालूम पड़ा तो उन्होंने उस पर हाथी की गर्दन जोड़ दी? जब शिव यह नहीं जान सके कि यह मेरा पुत्र है तो फिर वह कैसे भगवान? उत्तर :👉 भगवान शिव के संपूर्ण चरित्र को पढ़ना जरूरी है। उनके जीवन को लीला क्यों कहा जाता है? लीला उसे कहते हैं जिसमें उन्हें सबकुछ मालूम रहता है फिर भी वे अनजान बनकर जीवन के इस खेल को सामान्य मानव की तरह खेलते हैं। लीला का अर्थ नाटक या कहानी नहीं। एक ऐसा घटनाक्रम जिसकी रचना स्वयं प्रभु ही करते हैं और फिर उसमें इन्वॉल्व होते हैं। वे अपने भविष्य के घटनाक्रमों को खुद ही संचालित करते हैं। दरअसल, भविष्य में होने वाली घटनाओं को अपने तरह से घटाने की कला ही लीला है। यदि भगवान शिव ऐसा नहीं करते तो आज गणेश प्रथम पूज्जनीय देव न होते और न उनकी गणना देवों में होती। विशेष दार्शनिक क्षेत्रों में माना जाता है कि लीला ऐसी वृत्ति है जिसका आनन्द प्राप्ति के सिवा और कोई अभिप्राय नहीं। इसीलिए कहते हैं सृष्टि और प्रलय सब ईश्वर की लीला ही है। अवतार धारण करने पर इस लोक में आकर भगवान् जो कृत्य करते हैं, उन सब की गिनती भी लीलाओं में ही होती है। लोक व्यवहार में वे सब कृत्य जो भगवान् के किसी अवतार के कार्यों के अनुकरण पर अभिनय या नाटक के रूप में लोगों को दिखाए जाते हैं। भगवान राम को सभी कुछ मालूम था कि क्या घटनाक्रम होने वाला है। उन्हें मालूम था कि मृग के रूप में आया यह राक्षस कौन है। लेकिन सीता ने उनकी नहीं मानी और तब उन्होंने लक्ष्मण को सीता के पहरे के लिए छोड़ कर मृग के पीछे चले गए। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू किसी को नहीं मार रहा है। यह सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। अब तो यह बस खेल है। बर्बरिक से जब महाभारत का वर्णन पूछा गया तो उसने कहा कि मुझे तो दोनों ही ओर से श्रीकृष्ण ही यौद्धाओं को मारते हुए नजर आ रहे थे। इसी तरह कहा जाता है क सहदेव को महाभारत का परिणाम मालूम था लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें चुप रहने के लिए कहा था। यही तो लीला है। क्या शिव-पार्वती हैं 'आदम और ईव'? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान शंकर को आदिदेव भी कहा जाता है। शंकर के दो पुत्र थे, गणेश और कार्तिकेय। जैसा कि कहा गया है कि आदम के दो पुत्र कैन और हाबिल थे। कैन बुरा और हाबिल अच्छा। पार्वती ही क्या ईव है। कुछ विद्वानों का मानना है कि स्वायंभुव मनु और शतरूपा ही आदम और हव्वा थे। शिव का पहला विवाह राजा दक्ष की पुत्री सती से हुआ था जो आग में कूद कर भस्म हो गई थी। उनका दूसरा विवाह पर्वतराज हिमालय की पुत्री उमा से हुआ जिन्हें पार्वती कहा जाता है। पार्वती से उनको एक पुत्र मिला। प्रमुख रूप से शिव के दो पुत्र थे, गणेश और कार्तिकेय। गणेशजी की उत्पत्ति कैसे हुई यह सभी जानते हैं। यह शिव और पर्वती के मिलन से नहीं जन्में। शिव के दूसरे पुत्र कार्तिकेय का जन्म शिव-पार्वती मिलन से हुआ। शिव का एक तीसरा पुत्र था जिसका नाम विद्युत्केश था। विद्युत्केश अनाथ बालक था जिसे शिव और पार्वती ने पालपोस कर बड़ा किया था। इसका नाम उन्होंने सुकेश रखा था। शिवजी का एक चौथा पुत्र था जिसका नाम था जलंधर। भगवान शिव ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया इससे जलंधर उत्पन्न हुआ। जलंधर शिव का सबसे बड़ा दुश्मन बना। इस तरह शिव के और भी कई पुत्र थे। जैसे अंधक, सास्तव, भूमा और खुजा। शिव की कथा और आदम की कथा में जरा भी मेल नहीं है। शिव और पार्वती को आदम और हव्वा सिद्ध करने वाले मानते हैं कि ईडन गार्डन श्रीलंका में था। श्रीलंका आज जैसा द्वीप नजर आता है यह पहले ऐसा नहीं था। यह इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा और भारत से जुड़ा हुआ था। वे कहते हैं कि शिव और पार्वती भी कैलाश पर्वत से श्रीलंका रहने चले गए थे जबकि कुबेर ने उन्हें सोने की लंका बनवाकर दी थी। हजरत आदम जब आसमान की जन्नत (ईडन उद्यान) से निकाले गए तो सबसे पहले 'हिंदुस्तान की जमीं' पर ही उतारे गए, जहां उन्होंने सबसे पहले कदम रखे उसे आदम चोटी कहते हैं। माना जाता है कि ह. आदम अलै. का 'तनूर' हिंद में था। माना जाता है कि कश्मीर ही उस दौर का स्वर्ग (जन्नत) था। वहां आज भी सेबफल की खेती होती है। शोध से बता चला कि सेब फल को मनुष्य ने 8 हजार वर्ष पहले ही खाना शुरू किया था। इससे पहले मनुष्य सेबफल के बारे में जानता तक नहीं था। माना जाता है कि सेबफल की उत्पत्ति मध्य एशिया के देश कजाखिस्ता के जंगलों में हुई थी और वहीं से सेब बाकी की दुनिया में पहुंचे। प्रश्न : 👉 क्या भगवान शिव ही शंकर, महेष, रुद्र, महाकाल, भैरव आदि हैं? उत्तर👉 पहली बात को यह कि हिन्दू धर्म का संबंध वेदों से है पुराणों से नहीं। त्रिदेवों में से एक महेष को ही भगवान शिव या शंकर भी कहा जाता है। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। उक्त सभी की कहानियों को पुराणों में विस्तार मिला और सभी को एक ही शिव से जोड़ देने से भ्रांतियों का भी विस्तार हुआ। औघड़ या तंत्रिकों के मत में जो शिव या शंकर का वर्णन किया गया है वह दरअसल, शिव के भैरव रूप का वर्णन है। यह भी हो सकता है कि यह उनके मन की व्याख्या हो या यह कि वे तंत्र के घोर मार्ग को अपनाने के लिए शिव की आड़ लेते हों। उक्त मत को रामचरित मानस में कोल मत का कहा गया है जो कि वेद विरुद्ध है। वर्तमान में कुछ लोग साई बाबा को ही शिव का अवतार घोषित करने में लगे हैं तो अब क्या करें ऐसे लोगों का। इसी तरह कालांतर में ऐसे कई लोग, संत या ऋषि हुए हैं जिनको शिव से जोड़ कर देखा गया और उनकी कथाएं लिखकर कर समाज में भ्रम फैलाया गया। माना जाता है कि प्रत्येक काल में अलग-अलग रुद्र हुए हैं। इस तरह 12 रुद्र हुए। शिव निकारार सत्य है तो शंकर साकार। पुराणों में ऐसी कई बातों का उल्लेख है जिसको शंकर से जोड़ दिया गया है। जैसे भैरव पीते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि शंकर भी पीते हैं। शिव, शंकर, महादेव : शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं– शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विलय के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है। 12 रुद्र :👉 पहले महाकाल, दूसरे तारा, तीसरे बाल भुवनेश, चौथे षोडश श्रीविद्येश, पांचवें भैरव, छठें छिन्नमस्तक, सातवें द्यूमवान, आठवें बगलामुख, नौवें मातंग, दसवें कमल। अन्य जगह पर रुद्रों के नाम:- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव का उल्लेख मिलता है। अन्य रुद्र या शंकर के अंशावतार- इन अवतारों के अतिरिक्त शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है। हनुमान ग्यारहवें रुद्रावतार माने जाते हैं। भैरव :👉 भैरव भी कई हुए हैं जिसमें से काल भैरव और बटुक भैरव दो प्रमुख हैं। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शिव की पंचायत के सदस्य हैं। वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। शिव के द्वारपाल:-👉 नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल। शिव पंचायत के देवता:- 1.सूर्य, 2.गणपति, 3.देवी, 4.रुद्र और 5.विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं। शिव पार्षद:-👉 जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी। शिव गण:-👉 भगवान शिव के गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से ‘वीरभद्र’ नामक गण उत्पन्न किया। इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे-👉 भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं। सप्तऋषि गण शिव के शिष्य हैं:-👉 शिव ने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। अब यदि उक्त ऋषियों या उनके परंपरा के किसी महान ऋषि को हम शिव या उनका अवतार ही मानने लगे और उनका गुणगान करने लगे तो यह उचित नहीं होगा। इस तरह भ्रम का विस्तार ही होता है। अंगिरा ऋषि को शिव का सक्षात् रूप माना जाता है। उसी तरह हम यदि भैरव को भी शिव माने तो यह पुराणिक विस्तार ही है। देवों के देव महादेव :👉 देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। ~ संकलित🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏शिव पार्वती अर्धनारीश्वर अवतार की कथा 〰〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शीश गंग अर्धंग पार्वती नंदी भृंगी नृत्य करत है” शिव स्तुति में आये इस भृंगी नाम को आप सब ने जरुर ही सुना होगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार ये एक ऋषि थे जो महादेव के परम भक्त थे किन्तु इनकी भक्ति कुछ ज्यादा ही कट्टर किस्म की थी। कट्टर से तात्पर्य है कि ये भगवान शिव की तो आराधना करते थे किन्तु बाकि भक्तो की भांति माता पार्वती को नहीं पूजते थे। उनकी भक्ति पवित्र और अदम्य थी लेकिन वो माता पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या फिर ऐसा भी कह सकते है कि वो माता को कुछ समझते ही नही थे। वैसे ये कोई उनका घमंड नही अपितु शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और नजर ही नही आता था। एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे। ऋषि के इस कृत्य पर माता पार्वती ने ऐतराज प्रकट किया और कहा कि हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते। पर शिव भक्ति की कट्टरता देखिये भृंगी ऋषि ने पार्वती जी को अनसुना कर दिया और भगवान शिव की परिक्रमा लगाने बढे। किन्तु ऐसा देखकर माता पार्वती शिव से सट कर बैठ गई। इस किस्से में और नया मोड़ तब आता है जब भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही। तब भगवान शिव ने माता पार्वती का साथ दिया और संसार में महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का जन्म हुआ। अब भृंगी ऋषि क्या करते किन्तु गुस्से में आकर उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे। ऋषि के इस कृत्य पर आदिशक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी ऋषि को श्राप दिया कि जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तत्काल प्रभाव से तुम्हारी देह छोड़ देगा। हमारी तंत्र साधना कहती है कि मनुष्य को अपने शरीर में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की देन होती है जबकि खून और मांस माता की देन होते है l श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया। भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े भी होने की भी क्षमता खो चुके थे l तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। हालाँकि तब पार्वती ने द्रवित होकर अपना श्राप वापस लेना चाहा किन्तु अपराध बोध से भृंगी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया l ऋषि को खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके तो भक्त भृंगी के कारण ऐसे हुआ था महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का उदय। जय शिव शक्ति महादेव साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
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#सत्यं शिवम् सुंदरम सत्यम, शिवम और सुंदरम का रहस्य ! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सत्यम, शिवम और सुंदरम के बारे में सभी ने सुना और पढ़ा होगा लेकिन अधिकतर लोग इसका अर्थ या इसका भावार्थ नहीं जानते होंगे। वे सत्य का अर्थ ईश्वर, शिवम का अर्थ भगवान शिव से और सुंदरम का अर्थ कला आदि सुंदरता से लगाते होंगे, लेकिन अब हम आपको बताएंगे कि आखिर में हिन्दू धर्म और दर्शन का इस बारे में मत क्या है। हालांकि वेद, उपनिषद और पुराणों में इस संबंध में अलग अलग मत मिलते हैं, लेकिन सभी उसके एक मूल अर्थ पर एकमत हैं। धर्म और दर्शन की धारणा इस संबंध में क्या हो सकती है यह भी बहुत गहन गंभीर मामला है। दर्शन में भी विचारधाएं भिन्न-भिन्न मिल जाएगी, लेकिन आखिर सत्य क्या है इस पर सभी के मत भिन्न हो सकते हैं। सत्यम👉 योग में यम का दूसरा अंग है सत्य। हिन्दू धर्म में ब्रह्म को ही सत्य माना गया है। जो ब्रह्म (परमेश्वर) को छोड़कर सबकुछ जाने का प्रयास करता है वह व्यक्ति जीवन पर्यन्त भ्रम में ही अपना जीवन गुजार देता है। यह ब्रह्म निराकार, निर्विकार और निर्गुण है। उसे जानने का विकल्प है स्वयं को जानना। अर्थात आत्मा ही सत्य है, जो अजर अमर, निर्विकार और निर्गुण है। शरीर में रहकर वह खुद को जन्मा हुआ मानती है जो कि एक भ्रम है। इस भ्रम को जानना ही सत्य है। 'सत (ईश्वर) एक ही है। कवि उसे इंद्र, वरुण व अग्नि आदि भिन्न नामों से पुकारते हैं।'-ऋग्वेद 'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।'-कठोपनिषद-।।10।। सत्य का अलौकिक अर्थ👉 सत्य को समझना मुश्किल है, लेकिन उनके लिए नहीं जो धर्म और दर्शन को भलिभांति जानते हैं। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन यह सही नहीं है। सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। परमात्मा से परिपूर्ण यह जगत आत्माओं का जाल है। जीवन, संसार और मन यह सभी विरोधाभासी है। इसी विरोधाभास में ही छुपा है वह जो स्थितप्रज्ञ आत्मा और ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक और बोधपूर्ण दोनों ही बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। शास्त्रों में आत्मा, परमात्मा, प्रेम और धर्म को सत्य माना गया है। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। सत्य के साथ रहने से मन हल्का और प्रसन्न चित्त रहता है। मन के हल्का और प्रसंन्न चित्त रहने से शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। सत्य की उपयोगिता और क्षमता को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं। सत्य बोलने से व्यक्ति को सद्गति मिलती है। गति का अर्थ सभी जानते हैं। ‘सत चित आनन्द’👉 सत् अर्थात मूल कण या तत्व, चित्त अर्थात आत्मा और आनंद अर्थात प्रकृति और आत्मा के मिलन से उत्पन्न अनुभूति और इसके विपरित शुद्ध आत्म अनुभव करना।... परामात्मा और आत्मा का होना ही सत्य है बाकी सभी उसी के होने से है। आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है। यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है। सत्य का लौकिक अर्थ👉 सत्य को जानना कठिन है। ईश्वर ही सत्य है। सत्य बोलना भी सत्य है। सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है। जब व्यक्ति सत्य की राह से दूर रहता है तो वह अपने जीवन में संकट खड़े कर लेता है। असत्यभाषी व्यक्ति के मन में भ्रम और द्वंद्व रहता है, जिसके कारण मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोगों का शरीर पर घातक असर पड़ता है। ऐसे में सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। रस्सी को देखकर सर्प मान लेना सत्य नहीं है, किंतु उसे देखकर जो प्रतीति और भय उत्पन हुआ, वह सत्य है। अर्थात रस्सी सर्प नहीं है, लेकिन भय का होना सत्य है। दरअसल हमने कोई झूठ नहीं देखा, लेकिन हम गफलत में एक झूठ को सत्य मान बैठे और उससे हमने स्वयं को रोगग्रस्त कर लिया। तो सत्य को समझने के लिए जरूरी है तार्किक बुद्धि, सत्य वचन बोलना और होशो-हवास में जीना। जीवन के दुख और सुख सत्य नहीं है, लेकिन उनकी प्रतीति होना सत्य है। उनकी प्रतीति अर्थात अनुभव भी तभी तक होता है जब तक कि आप दुख और सुख को सत्य मानकर जी रहे हैं। सत्य के लाभ👉 सत्य बोलने और हमेशा सत्य आचरण करते रहने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है। मन स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस करता है। डिप्रेशन और टेंडन भरे जीवन से मुक्ति मिलती है। शरीर में किसी भी प्रकार के रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। सुख और दुख में व्यक्ति सम भाव रहकर निश्चिंत और खुशहाल जीवन को आमंत्रित कर लेता है। सभी तरह के रोग और शोक का निदान होता है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। सुंदरम् : - यह संपूर्ण प्रकृति सुंदरम कही गई है। इस दिखाई देने वाले जगत को प्रकृति का रूप कहा गया है। प्रकृति हमारे स्वभाव और गुण को प्रकट करती है। पंच कोष वाली यह प्रकृति आठ तत्वों में विभाजित है। त्रिगुणी प्रकृति👉 परम तत्व से प्रकृति में तीन गुणों की उत्पत्ति हुई सत्व, रज और तम। ये गुण सूक्ष्म तथा अतिंद्रिय हैं, इसलिए इनका प्रत्यक्ष नहीं होता। इन तीन गुणों के भी गुण हैं- प्रकाशत्व, चलत्व, लघुत्व, गुरुत्व आदि इन गुणों के भी गुण हैं, अत: स्पष्ट है कि यह गुण द्रव्यरूप हैं। द्रव्य अर्थात पदार्थ। पदार्थ अर्थात जो दिखाई दे रहा है और जिसे किसी भी प्रकार के सूक्ष्म यंत्र से देखा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है या अनुभूत किया जा सकता है। ये ब्रहांड या प्रकृति के निर्माणक तत्व हैं। प्रकृति से ही महत् उत्पन्न हुआ जिसमें उक्त गुणों की साम्यता और प्रधानता थी। सत्व शांत और स्थिर है। रज क्रियाशील है और तम विस्फोटक है। उस एक परमतत्व के प्रकृति तत्व में ही उक्त तीनों के टकराव से सृष्टि होती गई। सर्वप्रथम महत् उत्पन्न हुआ, जिसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि प्रकृति का अचेतन या सूक्ष्म तत्व है। महत् या बुद्ध‍ि से अहंकार। अहंकार के भी कई उप भाग है। यह व्यक्ति का तत्व है। व्यक्ति अर्थात जो व्यक्त हो रहा है सत्व, रज और तम में। सत्व से मनस, पाँच इंद्रियाँ, पाँच कार्मेंद्रियाँ जन्मीं। तम से पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत (आकाश, अग्न‍ि, वायु, जल और ग्रह-नक्षत्र) जन्मे। पंचकोष👉 जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस ही अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कहते हैं। दरअसल, आप एक शरीर में रहते हैं जो कि जड़ जगत का हिस्सा है। आपके शरीर के भीतर प्राणमय अर्थात प्राण है जो कि वायुतत्व से भरा है। यह तत्व आपके जिंदा रहने को संचालित करता है। यदि आप देखे और सुने गए अनुसार संचालित होते हैं तो आपम प्राणों में जीते हैं अर्थात आप एक प्राणी से ज्यादा कुछ नहीं। मनोमय का अर्थ आपके शरीर में प्राण के अलावा मन भी है जिसे चित्त कहते हैं। पांचों इंद्रियों का जिस पर प्रभाव पड़ता है और समझने की क्षमता भी रखता है। इस मन के अलावा आपके ‍भीतर विज्ञानमन अर्थात एक ऐसी बुद्धि भी है जो विश्लेषण और विभाजन करना जानती है। इसके गहरे होने से मन का लोप हो जाता है और व्यक्ति बोध में जीता है। इस बोध के गहरे होने जाने पर ही व्यक्ति खुद के स्वरूप अर्थात आनंदमय स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। अर्थात जो आत्मा पांचों इंद्रियों के बगैर खुद के होने के भलिभांति जानती है। आठ तत्व👉 अनंत-महत्-अंधकार-आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी। अनंत जिसे आत्मा कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। अत: हम एक सुंदर प्रकृति और जगत के घेरे से घिरे हुए हैं। इस घेरे से अलग होकर जो व्यक्ति खुद को प्राप्त कर लेता है वही सत्य को प्राप्त कर लेता है। संसार में तीन ही तत्व है सत्य, शिव और सुंदरम। ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इसे ही सत्य, चित्त और आनंद कहते हैं। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
सत्यं शिवम् सुंदरम - शशिवम 9 सत्यम सत्यम  शिवम् gsH का रहस्य शशिवम 9 सत्यम सत्यम  शिवम् gsH का रहस्य - ShareChat
महादेव ने सिंहचर्म का वस्त्र क्यों धारण किया ? #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🔱रुद्राभिषेक🙏 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान शिव स्वयं परब्रह्म हैं। इसलिए वे अपने वास्तविक स्वरुप में यानी नग्न रहना पसंद करते हैं। लेकिन उन्होंने श्रीहरि की विनती स्वीकार करके बाघंबर या सिंहचर्म को वस्त्र के रुप में स्वीकार किया। ये कहानी भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी हुई है। प्रह्लाद की रक्षा के लिए श्रीहरि ने नरसिंह अवतार धारण करके हिरण्यकशिपु का वध अपने पंजे से कर दिया। लेकिन भक्त पर हुए अत्याचार से नाराज नरसिंह पूरी सृष्टि के विनाश के लिए उतारु हो गए। उन्होंने समस्त देवताओं यहां तक कि ब्रह्माजी और लक्ष्मी की प्रार्थना भी अस्वीकार कर दी। तब सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने अपने गण वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने नरसिंह रुपी विष्णु को उनका असली स्वरुप याद दिलाने का प्रयास किया। लेकिन मोहग्रस्त नरसिंह ने एक न सुनी। तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए शरभ अवतार धारण किया। जो वीरभद्र, गरुड़ और भैरव का सम्मिलित स्वरुप था। उसके आठ शक्तिशाली पंजे और शक्तिशाली पंख थे। शरभरूप में एक पंख में वीरभद्र एवं दूसरे पंख में महाकाली स्थित हुये, भगवान शरभ के मस्तक में भैरव एवं चोंच में सदाशिव स्थित हुये और शरभ रूपी शिव ने भगवान नृसिंह को अपने पंजों में जकड़ लिया और आकाश में उड़ गये। शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर छाती में चोंच का प्रहार करने लगे। फिर पंजों से उसकी नाभि को चीर दिया। नरसिंह का मोह नष्ट हो गया। उसका तेज अलग होकर महाविष्णु के रुप में प्रकट हुआ। उन्होंने महादेव से अनुरोध किया कि नरसिंह के चर्म को अपने वस्त्र के रुप में स्वीकार करके सम्मानित करें। इसके बाद महान पशुपति शिव ने उस चर्म को अपने वस्त्र और आसन के रुप में धारण किया और भक्तजनों के हृदय में अपना मोहक स्वरुप प्रकाशित किया। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 - मह्ादैवदे सिंहचर्मक्योधारणकियो 2 मह्ादैवदे सिंहचर्मक्योधारणकियो 2 - ShareChat
#🔱रुद्राभिषेक🙏 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 शिव सहस्त्रनामावली 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 ऊँ स्थिराय नमः, ऊँ स्थाणवे नमः, ऊँ प्रभवे नमः, ऊँ भीमाय नमः, ऊँ प्रवराय नमः, ऊँ वरदाय नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ सर्वात्मने नमः, ऊँ सर्वविख्याताय नमः, ऊँ सर्वस्मै नमः ऊँ सर्वकाराय नमः, ऊँ भवाय नमः, ऊँ जटिने नमः, ऊँ चर्मिणे नमः,ऊँ शिखण्डिने नमः, ऊँ सर्वांङ्गाय नमः, ऊँ सर्वभावाय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ हरिणाक्षाय नमः, ऊँ सर्वभूतहराय नमः ऊँ प्रभवे नमः, ऊँ प्रवृत्तये नमः, ऊँ निवृत्तये नमः, ऊँ नियताय नमः, ऊँ शाश्वताय नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः, ऊँ श्मशानवासिने नमः, ऊँ भगवते नमः, ऊँ खेचराय नमः, ऊँ गोचराय नमः ऊँ अर्दनाय नमः, ऊँ अभिवाद्याय नमः, ऊँ महाकर्मणे नमः, ऊँ तपस्विने नमः, ऊँ भूतभावनाय नमः, ऊँ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नाय नमः, ऊँ सर्वलोकप्रजापतये नमः, ऊँ महारूपाय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ वृषरूपाय नमः ऊँ महायशसे नमः, ऊँ महात्मने नमः, ऊँ सर्वभूतात्मने नमः, ऊँ विश्वरूपाय नमः, ऊँ महाहनवे नमः, ऊँ लोकपालाय नमः, ऊँ अंतर्हितात्मने नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ हयगर्दभाय नमः, ऊँ पवित्राय नमः(५०) ऊँ महते नमः, ऊँ नियमाय नमः, ऊँ नियमाश्रिताय नमः, ऊँ सर्वकर्मणे नमः, ऊँ स्वयंभूताय नमः, ऊँ आदये नमः, ऊँ आदिकराय नमः, ऊँ निधये नमः, ऊँ सहस्राक्षाय नमः, ऊँ विशालाक्षाय नमः, ऊँ सोमाय नमः, ऊँ नक्षत्रसाधकाय नमः, ऊँ चंद्राय नमः, ऊँ सूर्याय नमः, ऊँ शनये नमः, ऊँ केतवे नमः, ऊँ ग्रहाय नमः, ऊँ ग्रहपतये नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ अत्रये नमः, ऊँ अत्र्यानमस्कर्त्रे नमः, ऊँ मृगबाणार्पणाय नमः, ऊँ अनघाय नमः,ऊँ महातपसे नमः, ऊँ घोरतपसे नमः, ऊँ अदीनाय नमः, ऊँ दीनसाधककराय नमः, ऊँ संवत्सरकराय नमः, ऊँ मंत्राय नमः, ऊँ प्रमाणाय नमः, ऊँ परमन्तपाय नमः, ऊँ योगिने नमः, ऊँ योज्याय नमः, ऊँ महाबीजाय नमः, ऊँ महारेतसे नमः, ऊँ महाबलाय नमः, ऊँ सुवर्णरेतसे नमः, ऊँ सर्वज्ञाय नमः, ऊँ सुबीजाय नमः, ऊँ बीजवाहनाय नमः, ऊँ दशबाहवे नमः, ऊँ अनिमिषाय नमः, ऊँ नीलकण्ठाय नमः, ऊँ उमापतये नमः, ऊँ विश्वरूपाय नमः, ऊँ स्वयंश्रेष्ठाय नमः, ऊँ बलवीराय नमः, ऊँ अबलोगणाय नमः, ऊँ गणकर्त्रे नमः, ऊँ गणपतये नमः (१००) ऊँ दिग्वाससे नमः, ऊँ कामाय नमः, ऊँ मंत्रविदे नमः, ऊँ परममन्त्राय नमः, ऊँ सर्वभावकराय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ कमण्डलुधराय नमः, ऊँ धन्विते नमः, ऊँ बाणहस्ताय नमः, ऊँ कपालवते नमः, ऊँ अशनिने नमः, ऊँ शतघ्निने नमः, ऊँ खड्गिने नमः, ऊँ पट्टिशिने नमः, ऊँ आयुधिने नमः, ऊँ महते नमः, ऊँ स्रुवहस्ताय नमः, ऊँ सुरूपाय नमः, ऊँ तेजसे नमः, ऊँ तेजस्करनिधये नमः ऊँ उष्णीषिणे नमः, ऊँ सुवक्त्राय नमः, ऊँ उदग्राय नमः, ऊँ विनताय नमः, ऊँ दीर्घाय नमः, ऊँ हरिकेशाय नमः, ऊँ सुतीर्थाय नमः, ऊँ कृष्णाय नमः, ऊँ श्रृगालरूपाय नमः,ऊँ सिद्धार्थाय नमः ऊँ मुण्डाय नमः, ऊँ सर्वशुभंकराय नमः, ऊँ अजाय नमः, ऊँ बहुरूपाय नमः, ऊँ गन्धधारिणे नमः, ऊँ कपर्दिने नमः, ऊँ उर्ध्वरेतसे नमः, ऊँ उर्ध्वलिंगाय नमः, ऊँ उर्ध्वशायिने नमः, ऊँ नभस्थलाय नमः, ऊँ त्रिजटाय नमः, ऊँ चीरवाससे नमः,ऊँ रूद्राय नमः, ऊँ सेनापतये नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ अहश्चराय नमः, ऊँ नक्तंचराय नमः, ऊँ तिग्ममन्यवे नमः, ऊँ सुवर्चसाय नमः, ऊँ गजघ्ने नमः (१५०) ऊँ दैत्यघ्ने नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ लोकधात्रे नमः, ऊँ गुणाकराय नमः, ऊँ सिंहसार्दूलरूपाय नमः, ऊँ आर्द्रचर्माम्बराय नमः, ऊँ कालयोगिने नमः, ऊँ महानादाय नमः, ऊँ सर्वकामाय नमः, ऊँ चतुष्पथाय नमः, ऊँ निशाचराय नमः, ऊँ प्रेतचारिणे नमः, ऊँ भूतचारिणे नमः, ऊँ महेश्वराय नमः, ऊँ बहुभूताय नमः,ऊँ बहुधराय नमः, ऊँ स्वर्भानवे नमः, ऊँ अमिताय नमः, ऊँ गतये नमः, ऊँ नृत्यप्रियाय नमः, ऊँ नृत्यनर्ताय नमः, ऊँ नर्तकाय नमः, ऊँ सर्वलालसाय नमः, ऊँ घोराय नमः, ऊँ महातपसे नमः,ऊँ पाशाय नमः, ऊँ नित्याय नमः, ऊँ गिरिरूहाय नमः, ऊँ नभसे नमः, ऊँ सहस्रहस्ताय नमः, ऊँ विजयाय नमः, ऊँ व्यवसायाय नमः, ऊँ अतन्द्रियाय नमः, ऊँ अधर्षणाय नमः, ऊँ धर्षणात्मने नमः, ऊँ यज्ञघ्ने नमः, ऊँ कामनाशकाय नमः, ऊँ दक्षयागापहारिणे नमः, ऊँ सुसहाय नमः, ऊँ मध्यमाय नमः, ऊँ तेजोपहारिणे नमः, ऊँ बलघ्ने नमः, ऊँ मुदिताय नमः, ऊँ अर्थाय नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ अवराय नमः, ऊँ गम्भीरघोषाय नमः, ऊँ गम्भीराय नमः, ऊँ गंभीरबलवाहनाय नमः, ऊँ न्यग्रोधरूपाय नमः (२००) ऊँ न्यग्रोधाय नमः, ऊँ वृक्षकर्णस्थितये नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ सुतीक्ष्णदशनाय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ महाननाय नमः,ऊँ विश्वकसेनाय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ संयुगापीडवाहनाय नमः, ऊँ तीक्ष्णतापाय नमः, ऊँ हर्यश्वाय नमः, ऊँ सहायाय नमः, ऊँ कर्मकालविदे नमः, ऊँ विष्णुप्रसादिताय नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ समुद्राय नमः, ऊँ वडमुखाय नमः, ऊँ हुताशनसहायाय नमः, ऊँ प्रशान्तात्मने नमः,ऊँ हुताशनाय नमः, ऊँ उग्रतेजसे नमः, ऊँ महातेजसे नमः, ऊँ जन्याय नमः, ऊँ विजयकालविदे नमः, ऊँ ज्योतिषामयनाय नमः, ऊँ सिद्धये नमः, ऊँ सर्वविग्रहाय नमः, ऊँ शिखिने नमः, ऊँ मुण्डिने नमः, ऊँ जटिने नमः, ऊँ ज्वालिने नमः, ऊँ मूर्तिजाय नमः, ऊँ मूर्ध्दगाय नमः, ऊँ बलिने नमः, ऊँ वेणविने नमः, ऊँ पणविने नमः, ऊँ तालिने नमः, ऊँ खलिने नमः, ऊँ कालकंटकाय नमः, ऊँ नक्षत्रविग्रहमतये नमः, ऊँ गुणबुद्धये नमः, ऊँ लयाय नमः, ऊँ अगमाय नमः, ऊँ प्रजापतये नमः, ऊँ विश्वबाहवे नमः,ऊँ विभागाय नमः, ऊँ सर्वगाय नमः, ऊँ अमुखाय नमः, ऊँ विमोचनाय नमः (२५०) ऊँ सुसरणाय नमः, ऊँ हिरण्यकवचोद्भाय नमः, ऊँ मेढ्रजाय नमः,ऊँ बलचारिणे नमः, ऊँ महीचारिणे नमः, ऊँ स्रुत्याय नमः, ऊँ सर्वतूर्यनिनादिने नमः, ऊँ सर्वतोद्यपरिग्रहाय नमः, ऊँ व्यालरूपाय नमः, ऊँ गुहावासिने नमः, ऊँ गुहाय नमः, ऊँ मालिने नमः, ऊँ तरंगविदे नमः, ऊँ त्रिदशाय नमः, ऊँ त्रिकालधृगे नमः,ऊँ कर्मसर्वबन्ध–विमोचनाय नमः, ऊँ असुरेन्द्राणां बन्धनाय नमः, ऊँ युधि शत्रुवानाशिने नमः, ऊँ सांख्यप्रसादाय नमः, ऊँ दुर्वाससे नमः, ऊँ सर्वसाधुनिषेविताय नमः, ऊँ प्रस्कन्दनाय नमः, ऊँ विभागज्ञाय नमः, ऊँ अतुल्याय नमः, ऊँ यज्ञविभागविदे नमः, ऊँ सर्वचारिणे नमः, ऊँ सर्ववासाय नमः, ऊँ दुर्वाससे नमः,ऊँ वासवाय नमः, ऊँ अमराय नमः, ऊँ हैमाय नमः, ऊँ हेमकराय नमः, ऊँ अयज्ञसर्वधारिणे नमः, ऊँ धरोत्तमाय नमः, ऊँ लोहिताक्षाय नमः, ऊँ महाक्षाय नमः, ऊँ विजयाक्षाय नमः, ऊँ विशारदाय नमः, ऊँ संग्रहाय नमः, ऊँ निग्रहाय नमः, ऊँ कर्त्रे नमः, ऊँ सर्पचीरनिवसनाय नमः, ऊँ मुख्याय नमः, ऊँ अमुख्याय नमः, ऊँ देहाय नमः, ऊँ काहलये नमः, ऊँ सर्वकामदाय नमः, ऊँ सर्वकालप्रसादाय नमः, ऊँ सुबलाय नमः, ऊँ बलरूपधृगे नमः(३००) ऊँ सर्वकामवराय नमः, ऊँ सर्वदाय नमः, ऊँ सर्वतोमुखाय नमः,ऊँ आकाशनिर्विरूपाय नमः, ऊँ निपातिने नमः, ऊँ अवशाय नमः,ऊँ खगाय नमः, ऊँ रौद्ररूपाय नमः, ऊँ अंशवे नमः, ऊँ आदित्याय नमः, ऊँ बहुरश्मये नमः, ऊँ सुवर्चसिने नमः, ऊँ वसुवेगाय नमः,ऊँ महावेगाय नमः, ऊँ मनोवेगाय नमः, ऊँ निशाचराय नमः, ऊँ सर्ववासिने नमः, ऊँ श्रियावासिने नमः, ऊँ उपदेशकराय नमः, ऊँ अकराय नमः, ऊँ मुनये नमः, ऊँ आत्मनिरालोकाय नमः, ऊँ संभग्नाय नमः, ऊँ सहस्रदाय नमः, ऊँ पक्षिणे नमः, ऊँ पक्षरूपाय नमः, ऊँ अतिदीप्ताय नमः, ऊँ विशाम्पतये नमः, ऊँ उन्मादाय नमः, ऊँ मदनाय नमः, ऊँ कामाय नमः, ऊँ अश्वत्थाय नमः, ऊँ अर्थकराय नमः, ऊँ यशसे नमः, ऊँ वामदेवाय नमः, ऊँ वामाय नमः, ऊँ प्राचे नमः, ऊँ दक्षिणाय नमः, ऊँ वामनाय नमः, ऊँ सिद्धयोगिने नमः, ऊँ महर्षये नमः, ऊँ सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिद्धसाधकाय नमः, ऊँ भिक्षवे नमः, ऊँ भिक्षुरूपाय नमः, ऊँ विपणाय नमः, ऊँ मृदवे नमः, ऊँ अव्ययाय नमः, ऊँ महासेनाय नमः, ऊँ विशाखाय नमः (३५०) ऊँ षष्टिभागाय नमः, ऊँ गवाम्पतये नमः, ऊँ वज्रहस्ताय नमः,ऊँ विष्कम्भिने नमः, ऊँ चमुस्तंभनाय नमः, ऊँ वृत्तावृत्तकराय नमः, ऊँ तालाय नमः, ऊँ मधवे नमः, ऊँ मधुकलोचनाय नमः, ऊँ वाचस्पतये नमः, ऊँ वाजसनाय नमः, ऊँ नित्यमाश्रमपूजिताय नमः, ऊँ ब्रह्मचारिणे नमः, ऊँ लोकचारिणे नमः, ऊँ सर्वचारिणे नमः, ऊँ विचारविदे नमः, ऊँ ईशानाय नमः, ऊँ ईश्वराय नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ निशाचारिणे नमः, ऊँ पिनाकधृगे नमः, ऊँ निमितस्थाय नमः, ऊँ निमित्ताय नमः, ऊँ नन्दये नमः, ऊँ नन्दिकराय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ नन्दीश्वराय नमः, ऊँ नन्दिने नमः, ऊँ नन्दनाय नमः, ऊँ नंन्दीवर्धनाय नमः, ऊँ भगहारिणे नमः, ऊँ निहन्त्रे नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ ब्रह्मणे नमः, ऊँ पितामहाय नमः, ऊँ चतुर्मुखाय नमः, ऊँ महालिंगाय नमः, ऊँ चारूलिंगाय नमः, ऊँ लिंगाध्यक्षाय नमः, ऊँ सुराध्यक्षाय नमः,ऊँ योगाध्यक्षाय नमः, ऊँ युगावहाय नमः, ऊँ बीजाध्यक्षाय नमः,ऊँ बीजकर्त्रे नमः, ऊँ अध्यात्मानुगताय नमः, ऊँ बलाय नमः, ऊँ इतिहासाय नमः, ऊँ सकल्पाय नमः, ऊँ गौतमाय नमः, ऊँ निशाकराय नमः (४००) ऊँ दम्भाय नमः, ऊँ अदम्भाय नमः, ऊँ वैदम्भाय नमः, ऊँ वश्याय नमः, ऊँ वशकराय नमः, ऊँ कलये नमः, ऊँ लोककर्त्रे नमः, ऊँ पशुपतये नमः, ऊँ महाकर्त्रे नमः, ऊँ अनौषधाय नमः, ऊँ अक्षराय नमः, ऊँ परब्रह्मणे नमः, ऊँ बलवते नमः, ऊँ शक्राय नमः, ऊँ नीतये नमः, ऊँ अनीतये नमः, ऊँ शुद्धात्मने नमः, ऊँ मान्याय नमः, ऊँ शुद्धाय नमः, ऊँ गतागताय नमः, ऊँ बहुप्रसादाय नमः, ऊँ सुस्पप्नाय नमः, ऊँ दर्पणाय नमः,ऊँ अमित्रजिते नमः, ऊँ वेदकराय नमः, ऊँ मंत्रकराय नमः, ऊँ विदुषे नमः, ऊँ समरमर्दनाय नमः, ऊँ महामेघनिवासिने नमः, ऊँ महाघोराय नमः, ऊँ वशिने नमः, ऊँ कराय नमः, ऊँ अग्निज्वालाय नमः, ऊँ महाज्वालाय नमः, ऊँ अतिधूम्राय नमः,ऊँ हुताय नमः, ऊँ हविषे नमः, ऊँ वृषणाय नमः, ऊँ शंकराय नमः,ऊँ नित्यंवर्चस्विने नमः, ऊँ धूमकेताय नमः, ऊँ नीलाय नमः, ऊँ अंगलुब्धाय नमः, ऊँ शोभनाय नमः, ऊँ निरवग्रहाय नमः, ऊँ स्वस्तिदायकाय नमः, ऊँ स्वस्तिभावाय नमः, ऊँ भागिने नमः,ऊँ भागकराय नमः, ऊँ लघवे नमः(४५०) ऊँ उत्संगाय नमः, ऊँ महांगाय नमः, ऊँ महागर्भपरायणाय नमः, ऊँ कृष्णवर्णाय नमः,ऊँ सुवर्णाय नमः, ऊँ सर्वदेहिनामिनिन्द्राय नमः, ऊँ महापादाय नमः, ऊँ महाहस्ताय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ महायशसे नमः, ऊँ महामूर्धने नमः, ऊँ महामात्राय नमः, ऊँ महानेत्राय नमः, ऊँ निशालयाय नमः, ऊँ महान्तकाय नमः, ऊँ महाकर्णाय नमः, ऊँ महोष्ठाय नमः, ऊँ महाहनवे नमः, ऊँ महानासाय नमः,ऊँ महाकम्बवे नमः, ऊँ महाग्रीवाय नमः, ऊँ श्मशानभाजे नमः,ऊँ महावक्षसे नमः, ऊँ महोरस्काय नमः, ऊँ अंतरात्मने नमः, ऊँ मृगालयाय नमः, ऊँ लंबनाय नमः, ऊँ लम्बितोष्ठाय नमः, ऊँ महामायाय नमः, ऊँ पयोनिधये नमः, ऊँ महादन्ताय नमः, ऊँ महाद्रष्टाय नमः, ऊँ महाजिह्वाय नमः, ऊँ महामुखाय नमः, ऊँ महारोम्णे नमः, ऊँ महाकोशाय नमः, ऊँ महाजटाय नमः, ऊँ प्रसन्नाय नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ प्रत्ययाय नमः, ऊँ गिरिसाधनाय नमः, ऊँ स्नेहनाय नमः, ऊँ अस्नेहनाय नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ महामुनये नमः, ऊँ वृक्षाकाराय नमः, ऊँ वृक्षकेतवे नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ वायुवाहनाय नमः (५००) ऊँ गण्डलिने नमः, ऊँ मेरूधाम्ने नमः, ऊँ देवाधिपतये नमः, ऊँ अथर्वशीर्षाय नमः, ऊँ सामास्या नमः, ऊँ ऋक्सहस्रामितेक्षणाय नमः, ऊँ यजुः पादभुजाय नमः, ऊँ गुह्याय नमः, ऊँ प्रकाशाय नमः, ऊँ जंगमाय नमः, ऊँ अमोघार्थाय नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ अभिगम्याय नमः, ऊँ सुदर्शनाय नमः, ऊँ उपकाराय नमः, ऊँ प्रियाय नमः, ऊँ सर्वाय नमः, ऊँ कनकाय नमः, ऊँ काञ्चनवच्छये नमः, ऊँ नाभये नमः, ऊँ नन्दिकराय नमः, ऊँ भावाय नमः, ऊँ पुष्करथपतये नमः, ऊँ स्थिराय नमः, ऊँ द्वादशाय नमः, ऊँ त्रासनाय नमः, ऊँ आद्याय नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ यज्ञसमाहिताय नमः, ऊँ नक्तंस्वरूपाय नमः, ऊँ कलये नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ मकराय नमः, ऊँ कालपूजिताय नमः, ऊँ सगणाय नमः, ऊँ गणकराय नमः, ऊँ भूतवाहनसारथये नमः, ऊँ भस्मशयाय नमः, ऊँ भस्मगोप्त्रे नमः, ऊँ भस्मभूताय नमः, ऊँ तरवे नमः, ऊँ गणाय नमः, ऊँ लोकपालाय नमः, ऊँ आलोकाय नमः, ऊँ महात्मने नमः, ऊँ सर्वपूजिताय नमः, ऊँ शुक्लाय नमः, ऊँ त्रिशुक्लाय नमः, ऊँ संपन्नाय नमः, ऊँ शुचये नमः (५५०) ऊँ भूतनिशेविताय नमः, ऊँ आश्रमस्थाय नमः, ऊँ क्रियावस्थाय नमः, ऊँ विश्वकर्ममतये नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ विशालशाखाय नमः, ऊँ ताम्रोष्ठाय नमः, ऊँ अम्बुजालाय नमः, ऊँ सुनिश्चलाय नमः, ऊँ कपिलाय नमः, ऊँ कपिशाय नमः, ऊँ शुक्लाय नमः, ऊँ आयुषे नमः, ऊँ पराय नमः, ऊँ अपराय नमः, ऊँ गंधर्वाय नमः, ऊँ अदितये नमः, ऊँ ताक्ष्याय नमः, ऊँ सुविज्ञेयाय नमः, ऊँ सुशारदाय नमः, ऊँ परश्वधायुधाय नमः, ऊँ देवाय नमः, ऊँ अनुकारिणे नमः, ऊँ सुबान्धवाय नमः, ऊँ तुम्बवीणाय नमः, ऊँ महाक्रोधाय नमः, ऊँ ऊर्ध्वरेतसे नमः, ऊँ जलेशयाय नमः, ऊँ उग्राय नमः, ऊँ वंशकराय नमः, ऊँ वंशाय नमः, ऊँ वंशानादाय नमः, ऊँ अनिन्दिताय नमः, ऊँ सर्वांगरूपाय नमः, ऊँ मायाविने नमः, ऊँ सुहृदे नमः, ऊँ अनिलाय नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ बन्धनाय नमः, ऊँ बन्धकर्त्रे नमः, ऊँ सुवन्धनविमोचनाय नमः, ऊँ सयज्ञयारये नमः, ऊँ सकामारये नमः, ऊँ महाद्रष्टाय नमः, ऊँ महायुधाय नमः, ऊँ बहुधानिन्दिताय नमः, ऊँ शर्वाय नमः, ऊँ शंकराय नमः, ऊँ शं कराय नमः, ऊँ अधनाय नमः (६००) ऊँ अमरेशाय नमः, ऊँ महादेवाय नमः, ऊँ विश्वदेवाय नमः, ऊँ सुरारिघ्ने नमः, ऊँ अहिर्बुद्धिन्याय नमः, ऊँ अनिलाभाय नमः, ऊँ चेकितानाय नमः, ऊँ हविषे नमः, ऊँ अजैकपादे नमः, ऊँ कापालिने नमः, ऊँ त्रिशंकवे नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ शिवाय नमः, ऊँ धन्वन्तरये नमः, ऊँ धूमकेतवे नमः, ऊँ स्कन्दाय नमः, ऊँ वैश्रवणाय नमः, ऊँ धात्रे नमः, ऊँ शक्राय नमः, ऊँ विष्णवे नमः, ऊँ मित्राय नमः, ऊँ त्वष्ट्रे नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः, ऊँ धराय नमः, ऊँ प्रभावाय नमः, ऊँ सर्वगोवायवे नमः, ऊँ अर्यम्णे नमः, ऊँ सवित्रे नमः, ऊँ रवये नमः, ऊँ उषंगवे नमः, ऊँ विधात्रे नमः, ऊँ मानधात्रे नमः, ऊँ भूतवाहनाय नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ वर्णविभाविने नमः, ऊँ सर्वकामगुणवाहनाय नमः, ऊँ पद्मनाभाय नमः, ऊँ महागर्भाय नमः, चन्द्रवक्त्राय नमः, ऊँ अनिलाय नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ बलवते नमः, ऊँ उपशान्ताय नमः, ऊँ पुराणाय नमः, ऊँ पुण्यचञ्चवे नमः, ऊँ ईरूपाय नमः, ऊँ कुरूकर्त्रे नमः, ऊँ कुरूवासिने नमः, ऊँ कुरूभूताय नमः, ऊँ गुणौषधाय नमः (६५०) ऊँ सर्वाशयाय नमः, ऊँ दर्भचारिणे नमः, ऊँ सर्वप्राणिपतये नमः, ऊँ देवदेवाय नमः, ऊँ सुखासक्ताय नमः, ऊँ सत स्वरूपाय नमः, ऊँ असत् रूपाय नमः, ऊँ सर्वरत्नविदे नमः, ऊँ कैलाशगिरिवासने नमः, ऊँ हिमवद्गिरिसंश्रयाय नमः, ऊँ कूलहारिणे नमः, ऊँ कुलकर्त्रे नमः, ऊँ बहुविद्याय नमः, ऊँ बहुप्रदाय नमः, ऊँ वणिजाय नमः, ऊँ वर्धकिने नमः, ऊँ वृक्षाय नमः, ऊँ बकुलाय नमः, ऊँ चंदनाय नमः, ऊँ छदाय नमः, ऊँ सारग्रीवाय नमः, ऊँ महाजत्रवे नमः, ऊँ अलोलाय नमः, ऊँ महौषधाय नमः, ऊँ सिद्धार्थकारिणे नमः, ऊँ छन्दोव्याकरणोत्तर-सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिंहनादाय नमः, ऊँ सिंहद्रंष्टाय नमः, ऊँ सिंहगाय नमः, ऊँ सिंहवाहनाय नमः, ऊँ प्रभावात्मने नमः, ऊँ जगतकालस्थालाय नमः, ऊँ लोकहिताय नमः, ऊँ तरवे नमः, ऊँ सारंगाय नमः, ऊँ नवचक्रांगाय नमः, ऊँ केतुमालिने नमः, ऊँ सभावनाय नमः, ऊँ भूतालयाय नमः, ऊँ भूतपतये नमः, ऊँ अहोरात्राय नमः, ऊँ अनिन्दिताय नमः, ऊँ सर्वभूतवाहित्रे नमः, ऊँ सर्वभूतनिलयाय नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ भवाय नमः, ऊँ अमोघाय नमः, ऊँ संयताय नमः, ऊँ अश्वाय नमः, ऊँ भोजनाय नमः, (७००) ऊँ प्राणधारणाय नमः, ऊँ धृतिमते नमः, ऊँ मतिमते नमः, ऊँ दक्षाय नमःऊँ सत्कृयाय नमः, ऊँ युगाधिपाय नमः, ऊँ गोपाल्यै नमः, ऊँ गोपतये नमः, ऊँ ग्रामाय नमः, ऊँ गोचर्मवसनाय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ हिरण्यबाहवे नमः, ऊँ प्रवेशिनांगुहापालाय नमः, ऊँ प्रकृष्टारये नमः, ऊँ महाहर्षाय नमः, ऊँ जितकामाय नमः, ऊँ जितेन्द्रियाय नमः, ऊँ गांधाराय नमः, ऊँ सुवासाय नमः, ऊँ तपःसक्ताय नमः, ऊँ रतये नमः, ऊँ नराय नमः, ऊँ महागीताय नमः, ऊँ महानृत्याय नमः, ऊँ अप्सरोगणसेविताय नमः, ऊँ महाकेतवे नमः, ऊँ महाधातवे नमः, ऊँ नैकसानुचराय नमः, ऊँ चलाय नमः, ऊँ आवेदनीयाय नमः, ऊँ आदेशाय नमः, ऊँ सर्वगंधसुखावहाय नमः, ऊँ तोरणाय नमः, ऊँ तारणाय नमः, ऊँ वाताय नमः, ऊँ परिधये नमः, ऊँ पतिखेचराय नमः, ऊँ संयोगवर्धनाय नमः, ऊँ वृद्धाय नमः, ऊँ गुणाधिकाय नमः, ऊँ अतिवृद्धाय नमः, ऊँ नित्यात्मसहायाय नमः, ऊँ देवासुरपतये नमः, ऊँ पत्ये नमः, ऊँ युक्ताय नमः, ऊँ युक्तबाहवे नमः, ऊँ दिविसुपर्वदेवाय नमः, ऊँ आषाढाय नमः, ऊँ सुषाढ़ाय नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः (७५०) ऊँ हरिणाय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ आवर्तमानवपुषे नमः, ऊँ वसुश्रेष्ठाय नमः, ऊँ महापथाय नमः, ऊँ विमर्षशिरोहारिणे नमः, ऊँ सर्वलक्षणलक्षिताय नमः, ऊँ अक्षरथयोगिने नमः, ऊँ सर्वयोगिने नमः, ऊँ महाबलाय नमः, ऊँ समाम्नायाय नमः, ऊँ असाम्नायाय नमः, ऊँ तीर्थदेवाय नमः, ऊँ महारथाय नमः, ऊँ निर्जीवाय नमः, ऊँ जीवनाय नमः, ऊँ मंत्राय नमः, ऊँ शुभाक्षाय नमः, ऊँ बहुकर्कशाय नमः, ऊँ रत्नप्रभूताय नमः, ऊँ रत्नांगाय नमः, ऊँ महार्णवनिपानविदे नमः, ऊँ मूलाय नमः, ऊँ विशालाय नमः, ऊँ अमृताय नमः, ऊँ व्यक्ताव्यवक्ताय नमः, ऊँ तपोनिधये नमः, ऊँ आरोहणाय नमः, ऊँ अधिरोहाय नमः, ऊँ शीलधारिणे नमः, ऊँ महायशसे नमः, ऊँ सेनाकल्पाय नमः, ऊँ महाकल्पाय नमः, ऊँ योगाय नमः, ऊँ युगकराय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ युगरूपाय नमः, ऊँ महारूपाय नमः, ऊँ महानागहतकाय नमः, ऊँ अवधाय नमः, ऊँ न्यायनिर्वपणाय नमः, ऊँ पादाय नमः, ऊँ पण्डिताय नमः, ऊँ अचलोपमाय नमः, ऊँ बहुमालाय नमः, ऊँ महामालाय नमः, ऊँ शशिहरसुलोचनाय नमः, ऊँ विस्तारलवणकूपाय नमः, ऊँ त्रिगुणाय नमः, ऊँ सफलोदयाय नमः (८००) ऊँ त्रिलोचनाय नमः, ऊँ विषण्डागाय नमः, ऊँ मणिविद्धाय नमः, ऊँ जटाधराय नमः, ऊँ बिन्दवे नमः, ऊँ विसर्गाय नमः, ऊँ सुमुखाय नमः, ऊँ शराय नमः, ऊँ सर्वायुधाय नमः, ऊँ सहाय नमः, ऊँ सहाय नमः, ऊँ निवेदनाय नमः, ऊँ सुखाजाताय नमः, ऊँ सुगन्धराय नमः, ऊँ महाधनुषे नमः, ऊँ गंधपालिभगवते नमः, ऊँ सर्वकर्मोत्थानाय नमः, ऊँ मन्थानबहुलवायवे नमः, ऊँ सकलाय नमः, ऊँ सर्वलोचनाय नमः, ऊँ तलस्तालाय नमः, ऊँ करस्थालिने नमः, ऊँ ऊर्ध्वसंहननाय नमः, ऊँ महते नमः, ऊँ छात्राय नमः, ऊँ सुच्छत्राय नमः, ऊँ विख्यातलोकाय नमः, ऊँ सर्वाश्रयक्रमाय नमः, ऊँ मुण्डाय नमः, ऊँ विरूपाय नमः, ऊँ विकृताय नमः, ऊँ दण्डिने नमः, ऊँ कुदण्डिने नमः, ऊँ विकुर्वणाय नमः, ऊँ हर्यक्षाय नमः, ऊँ ककुभाय नमः, ऊँ वज्रिणे नमः, ऊँ शतजिह्वाय नमः, ऊँ सहस्रपदे नमः, ऊँ देवेन्द्राय नमः, ऊँ सर्वदेवमयाय नमः, ऊँ गुरवे नमः, ऊँ सहस्रबाहवे नमः, ऊँ सर्वांगाय नमः, ऊँ शरण्याय नमः, ऊँ सर्वलोककृते नमः, ऊँ पवित्राय नमः, ऊँ त्रिककुन्मंत्राय नमः, ऊँ कनिष्ठाय नमः, ऊँ कृष्णपिंगलाय नमः (८५०) ऊँ ब्रह्मदण्डविनिर्मात्रे नमः, ऊँ शतघ्नीपाशशक्तिमते नमः, ऊँ पद्मगर्भाय नमः, ऊँ महागर्भाय नमः, ऊँ ब्रह्मगर्भाय नमः, ऊँ जलोद्भावाय नमः, ऊँ गभस्तये नमः, ऊँ ब्रह्मकृते नमः, ऊँ ब्रह्मिणे नमः, ऊँ ब्रह्मविदे नमः, ऊँ ब्राह्मणाय नमः, ऊँ गतये नमः, ऊँ अनंतरूपाय नमः, ऊँ नैकात्मने नमः, ऊँ स्वयंभुवतिग्मतेजसे नमः, ऊँ उर्ध्वगात्मने नमः, ऊँ पशुपतये नमः, ऊँ वातरंहसे नमः, ऊँ मनोजवाय नमः, ऊँ चंदनिने नमः, ऊँ पद्मनालाग्राय नमः, ऊँ सुरभ्युत्तारणाय नमः, ऊँ नराय नमः, ऊँ कर्णिकारमहास्रग्विणमे नमः, ऊँ नीलमौलये नमः, ऊँ पिनाकधृषे नमः, ऊँ उमापतये नमः, ऊँ उमाकान्ताय नमः, ऊँ जाह्नवीधृषे नमः, ऊँ उमादवाय नमः, ऊँ वरवराहाय नमः, ऊँ वरदाय नमः, ऊँ वरेण्याय नमः, ऊँ सुमहास्वनाय नमः, ऊँ महाप्रसादाय नमः, ऊँ दमनाय नमः, ऊँ शत्रुघ्ने नमः, ऊँ श्वेतपिंगलाय नमः, ऊँ पीतात्मने नमः, ऊँ परमात्मने नमः, ऊँ प्रयतात्मने नमः, ऊँ प्रधानधृषे नमः, ऊँ सर्वपार्श्वमुखाय नमः, ऊँ त्रक्षाय नमः, ऊँ धर्मसाधारणवराय नमः, ऊँ चराचरात्मने नमः, ऊँ सूक्ष्मात्मने नमः, ऊँ अमृतगोवृषेश्वराय नमः, ऊँ साध्यर्षये नमः, ऊँ आदित्यवसवे नमः (९००) ऊँ विवस्वत्सवित्रमृताय नमः, ऊँ व्यासाय नमः, ऊँ सर्गसुसंक्षेपविस्तराय नमः, ऊँ पर्ययोनराय नमः, ऊँ ऋतवे नमः, ऊँ संवत्सराय नमः, ऊँ मासाय नमः, ऊँ पक्षाय नमः, ऊँ संख्यासमापनाय नमः, ऊँ कलायै नमः, ऊँ काष्ठायै नमः, ऊँ लवेभ्यो नमः, ऊँ मात्रेभ्यो नमः, ऊँ मुहूर्ताहःक्षपाभ्यो नमः, ऊँ क्षणेभ्यो नमः, ऊँ विश्वक्षेत्राय नमः, ऊँ प्रजाबीजाय नमः, ऊँ लिंगाय नमः, ऊँ आद्यनिर्गमाय नमः, ऊँ सत् स्वरूपाय नमः, ऊँ असत् रूपाय नमः, ऊँ व्यक्ताय नमः, ऊँ अव्यक्ताय नमः, ऊँ पित्रे नमः, ऊँ मात्रे नमः, ऊँ पितामहाय नमः, ऊँ स्वर्गद्वाराय नमः, ऊँ प्रजाद्वाराय नमः, ऊँ मोक्षद्वाराय नमः, ऊँ त्रिविष्टपाय नमः, ऊँ निर्वाणाय नमः, ऊँ ह्लादनाय नमः, ऊँ ब्रह्मलोकाय नमः, ऊँ परागतये नमः, ऊँ देवासुरविनिर्मात्रे नमः, ऊँ देवासुरपरायणाय नमः, ऊँ देवासुरगुरूवे नमः, ऊँ देवाय नमः, ऊँ देवासुरनमस्कृताय नमः, ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः, ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः, ऊँ देवासुरगणाश्रयाय नमः, ऊँ देवासुरगणाध्यक्षाय नमः, ऊँ देवासुरगणाग्रण्ये नमः, ऊँ देवातिदेवाय नमः, ऊँ देवर्षये नमः, ऊँ देवासुरवरप्रदाय नमः, ऊँ विश्वाय नमः, ऊँ देवासुरमहेश्वराय नमः, ऊँ सर्वदेवमयाय नमः(९५०) ऊँ अचिंत्याय नमः, ऊँ देवात्मने नमः, ऊँ आत्मसंबवाय नमः, ऊँ उद्भिदे नमः, ऊँ त्रिविक्रमाय नमः, ऊँ वैद्याय नमः, ऊँ विरजाय नमः, ऊँ नीरजाय नमः, ऊँ अमराय नमः, ऊँ इड्याय नमः, ऊँ हस्तीश्वराय नमः, ऊँ व्याघ्राय नमः, ऊँ देवसिंहाय नमः, ऊँ नरर्षभाय नमः, ऊँ विभुदाय नमः, ऊँ अग्रवराय नमः, ऊँ सूक्ष्माय नमः, ऊँ सर्वदेवाय नमः, ऊँ तपोमयाय नमः, ऊँ सुयुक्ताय नमः, ऊँ शोभनाय नमः, ऊँ वज्रिणे नमः, ऊँ प्रासानाम्प्रभवाय नमः, ऊँ अव्ययाय नमः, ऊँ गुहाय नमः, ऊँ कान्ताय नमः, ऊँ निजसर्गाय नमः, ऊँ पवित्राय नमः, ऊँ सर्वपावनाय नमः, ऊँ श्रृंगिणे नमः, ऊँ श्रृंगप्रियाय नमः, ऊँ बभ्रवे नमः, ऊँ राजराजाय नमः, ऊँ निरामयाय नमः, ऊँ अभिरामाय नमः, ऊँ सुरगणाय नमः, ऊँ विरामाय नमः, ऊँ सर्वसाधनाय नमः, ऊँ ललाटाक्षाय नमः, ऊँ विश्वदेवाय नमः, ऊँ हरिणाय नमः, ऊँ ब्रह्मवर्चसे नमः, ऊँ स्थावरपतये नमः, ऊँ नियमेन्द्रियवर्धनाय नमः, ऊँ सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिद्धभूतार्थाय नमः, ऊँ अचिन्ताय नमः, ऊँ सत्यव्रताय नमः, ऊँ शुचये नमः, ऊँ व्रताधिपाय नमः, ऊँ पराय नमः, ऊँ ब्रह्मणे नमः, ऊँ भक्तानांपरमागतये नमः, ऊँ विमुक्ताय नमः, ऊँ मुक्ततेजसे नमः, ऊँ श्रीमते नमः, ऊँ श्रीवर्धनाय नमः, ऊँ श्री जगते नमः (१००८) ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः साभार~ पं देव शर्मा🔥 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
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#🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🔱रुद्राभिषेक🙏 #🔱हर हर महादेव #✡️महाशिवरात्र के ज्योतिषीय उपाय 🌟 सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षड़क्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है। भगवान शिव को नमस्कार करने का मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। शनि या राहु आदि ग्रह पीड़ा शांति के लिए शिव गायत्री मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। महामृत्युंजय प्रभावशाली मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। सः जूं ह्रौं ॐ ॥ इस मंत्र से शिव पूजा कर दूर करें पैसों की परेशानी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मन्दारमालाङ्कुलितालकायै कपालमालांकितशेखराय। दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।। श्री अखण्डानन्दबोधाय शोकसन्तापहा​रिणे। सच्चिदानन्दस्वरूपाय शंकराय नमो नम:॥ शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है। इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए। 👉 वंश की वृद्धि के लिए शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें। 👉 शिव पर जलधारा से अभिषेक मन की शांति के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। 👉 भौतिक सुखों को पाने के लिए इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें। 👉 बीमारियों से छुटकारे के लिए शहद की धारा से शिव पूजा करें। 👉 गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर सुख और आनंद मिलता है। 👉 सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए। शिव पंचाक्षर स्त्रोत 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय| नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥ हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार। मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय। मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥ चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है। शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥ हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है। वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय। चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥ देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है। यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय| दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥ हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है। पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ| शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥ जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है। लिंगाष्टकम 〰️🌼〰️ ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग | जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाति है, जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पुजित हैं तथा जो लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है (मोक्ष प्रदान करता है) देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं| रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ देवताओं और मुनियों द्वारा पुजित लिंग, जो काम का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का स्वरूप है, जिसने रावण के अभिमान का भी नाश किया, उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं। सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ सभी प्रकार के सुगंधित पदार्थों द्वारा सुलेपित लिंग, जो कि बुद्धि का विकास करने वाल है तथा, सिद्ध- सुर (देवताओं) एवं असुरों सबों के लिए वन्दित है, उन सदाशिव लिंक को प्रणाम। कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं। दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ स्वर्ण एवं महामणियों से विभूषित, एवं सर्पों के स्वामी से शोभित सदाशिव लिंग जो कि दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाल है ; आपको प्रणाम। कुंकुमचंदनलेपित लिंगं, पंङ्कजहारसुशोभित लिंगं। संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ कुंकुम एवं चन्दन से शोभायमान, कमल हार से शोभायमान सदाशिव लिंग जो कि सारे संञ्चित पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है, उन सदाशिव लिंग को प्रणाम। देवगणार्चितसेवित लिंग, भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं। दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ आप सदाशिव लिंग को प्रणाम जो कि सभी देवों एवं गणों द्वारा शुद्ध विचार एवं भावों द्वारा पुजित है तथा जो करोडों सूर्य सामान प्रकाशित हैं। अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, सर्वसमुद्भवकारण लिंगं| अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥ आठों दलों में मान्य, एवं आठों प्रकार के दरिद्रता का नाश करने वाले सदाशिव लिंग सभी प्रकार के सृजन के परम कारण हैं आप सदाशिव लिंग को प्रणाम। सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं। परात्परं परमात्मक लिंगं, ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं।। दवताओं एवं देव गुरू द्वारा स्वर्ग के वाटिका के पुष्पों से पुजित परमात्मा स्वरूप जो कि सभी व्याख्याओं से परे है उन सदाशिव लिंग को प्रणाम। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 - सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक - ShareChat
#🔱रुद्राभिषेक🙏 #✡️महाशिवरात्र के ज्योतिषीय उपाय 🌟 #🙏शिव पार्वती #🔱बम बम भोले🙏 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 पुराणोक्तनमक पाठ॥ महाशिवरात्रि पर चारों पहर में इस पुराणोक्त नमक के पाठ से अविराम जल/दुग्ध धारा से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें॥ ब्रह्मोवाच :- ह्रीं नमस्ते निर्विकाराय नमस्तेऽनन्तचक्षुषे । नमस्तेऽनन्तहस्ताय नमस्तेऽनन्तरूपिणे ॥०१॥ नमस्ते देवदेवाय नमस्तेऽनन्तमूर्तये । नमो लोकैकनाथाय नमस्ते सर्वसाक्षिणे ॥०२॥ नमस्ते निर्गुणानन्त नमस्ते निर्गुणात्मने । नमस्ते जगदाधार नमस्ते विश्वभानवे॥०३॥ नमस्ते सत्त्वरूपाय नमस्ते लोकरूपिणे । नमस्ते सर्वरूपाय रूपातीताय ते नमः ॥०४॥ नमस्ते शु(बु(ाय नमस्ते परमात्मने । नमस्ते लिंगरूपाय नमस्ते विड्वराय च॥०५॥ नमो वेदान्तवेद्याय नमस्ते वेदरूपिणे । नमस्ते ज्ञानरूपाय नमस्ते ज्ञानदायिने ॥०६॥ नमस्ते निष्प्रपञ्चाय निरीहाय नमोऽस्तु ते । निर्द्वन्द्वाय नमस्तेऽस्तु निर्मूलाय च ते नमः ॥०७॥ निरवद्य नमस्तेऽस्तु निरामय नमोऽस्तु ते । निष्कलंक नमस्तेऽस्तु व्यापकाय नमोऽस्तु ते ॥०८॥ नमस्ते यज्ञरूपाय यज्ञकर्त्रे नमोऽस्तु ते । नमस्ते भूरि रूपाय नमस्ते शर्मदायिने ॥०९॥ नमो हिरण्यहस्ताय सेनान्ये ते नमो नमः । नमो दिक्पतये नित्यं दक्षिणापतये नमः ॥१०॥ नमः शष्पाभदेहाय नमस्तेऽस्तु त्विषीमते । नम ऋषीणां पतये बभ्रूषाय नमोऽस्तु ते ॥११॥ विव्याधिने नमोऽन्नानां पतये ते नमो नमः । नमस्ते हरिकेशाय नमो भव्योपवीतिने ॥१२॥ पुष्टानां पतये तुभ्यं नमस्ते पुष्टिदायिने । जगतां पतये नित्यं नमो रुद्राय ते नमः ॥१३॥ पराततायिने नित्यं नमस्ते गूढरूपिणे । । नमोऽहन्त्रेऽथ सूताय क्षेत्राणां पतये नमः ॥१४॥ नमस्ते दीर्घरूपाय विश्वगुप्ताय ते नमः ॥ वनानां पतये नित्यं रोहिताय नमोऽस्तु ते ॥१५॥ नमः स्थपतये नित्यं वृक्षाणां पतये नमः । नमस्ते मन्त्रिणे नित्यं वाणिज्याय नमोऽस्तु ते ॥१६॥ कक्षाणां पतये नित्यं नमस्तेऽस्तु भुवंतये । नमो वारिकृतायेश नमस्ते वारिरूपिणे ॥१७॥ उच्चैर्घोषाय वीराय नित्याक्रन्दाय ते नमः । पत्तीनां पतये नित्यं कृत्स्न वीताय ते नमः ॥१८॥ नमस्ते धावते नित्यं पशूनां पतये नमः । नमस्ते सहमानाय मानातीताय ते नमः ॥१९॥ नमो हर व्याधिनीनां पतये ज्ञानचक्षुषे । नमस्ते ककुभायेश कामरूपाय ते नमः ॥२०॥ निषंगिणे नमस्तेऽस्तु दिव्यबुद्धिमते नमः ॥ नमस्ते तस्कराणां च पतये नीतिदायिने ॥२१॥ नमस्ते वंचते नित्यं नमस्ते परि वंचते। स्तायूनां पतये नित्यं नमस्तेऽस्तु निचेरवे ॥२२॥ नमः परिचरायेति परात्पर नमोऽस्तु ते । अरण्यानांच पतये नमो विश्वात्मकाय ते ॥२३॥ मुष्णतां पतये नित्यं नमस्ते पापनाशक । प्रकृतीनां च पतये नीलोष्णीषाय ते नमः ॥२४॥ नमो गिरिचरायेश गिरिवर्य प्रियाय ते । कुलुंचानां च पतये नमस्ते सिंहरूपिणे ॥२५॥ नमो विचित्रवेशाय वेदवषट्कृते नमः । वेदमार्गाय दुर्गाय नमस्ते पाशधारिणे ॥२६॥ नमः परशुहस्ताय नमस्ते शूलधारिणे । नमस्ते मृग हस्ताय नमस्ते मृगरूपिणे ॥२७॥ नमो भवाय रुद्राय नमः शर्वाय सर्वदा । पशुपाशहरायेश नमः पशुपतीश ते ॥२८॥ नम उग्राय ते नित्यं भीमाय भयदायिने । अग्रेवधाय भूताय नमो दूरेवधाय च ॥२९॥ हंत्रे हनीयसे नित्यं नमस्ताराय ते नमः । नमस्ते शंभवे नित्यं नमस्तेऽस्तु मयोभवे ॥३०॥ शंकराय नमस्तेऽस्तु सर्वज्ञाय नमोऽस्तु ते । नमो मयस्करायेश नमो मेषाय ते नमः ॥३१॥ नमः शिवाय देवाय नमः शिवतराय ते । नमस्तीर्थ्याय कुल्याय नमः पार्याय ते नमः ॥३२॥ नमोऽवार्याय देवाय नमः प्रतरणाय च । नम उत्तरणायेश तीर्थ्याय च नमो नमः ॥३३॥ कूल्याय च नमस्तेऽस्तु नमः शष्प्याय ते तथा । नमः फेन्याय देवाय सिकत्याय च ते नमः ॥३४॥ प्रवाह्याय नमस्तेऽस्तु इरिण्याय नमो नमः । प्रपथ्याय नमस्तेऽस्तु किं शिलाय नमो नमः ॥३५॥ नमस्तेऽस्तु सदादेव क्षयणाय कपर्दिने । पुलस्त्याय नमस्तेऽस्तु नमो गोष्ठ्याय ते सदा ॥३६॥ नमो गुह्याय तल्प्याय गेह्याय च नमोऽस्तु ते । काष्ठाय गह्नरेष्ठाय हृदय्याय च ते नमः ॥३७॥ निवेष्याय नमो नित्यं पांसव्याय च ते नमः । रजस्याय नमो नित्यं शुष्क्याय च नमोऽस्तु ते ॥३८॥ हरित्याय नमो देव नमो लोप्याय ते सदा । उलप्याय नमस्तेऽस्तु नम ऊर्व्याय ते नमः ॥३९॥ नम सूर्व्याय पर्णाय नमः पर्णशदाय ते । नम उद्गुरमाणाय नमस्तेऽभिघ्नते सदा ॥४०॥ नम आखिद्यमानाय अघं मे खेदपते नमः । नमो विश्वस्वरूपाय गुणातीताय ते नमः ॥४१॥ नीलग्रीवाय नित्याय शितिकण्ठाय ते नमः । गुप्तकेशाय ते नित्यं सहस्राक्षाय ते नमः ॥४२॥ नमस्ते घोररूपाय नमस्ते शत धन्वने। गिरिशाय नमस्तेऽस्तु शिपिविष्टाय ते नमः ॥४३॥ मेढ्रसेक्तृतमायास्तु भवायेषुमते नमः । नमो ट्ठस्वाय देवाय वामनाय नमो नमः ॥४४॥ नमोऽस्तु बृहते नित्यं नमो वर्षीयसे सदा । नमो वृद्धाय देवाय नमः संवर्धनाय च ॥४५॥ नमो ग्रीवाय शूराय प्रथमाय नमो नमः । आशवे ते नमो नित्यमजिराय नमो नमः ॥४६॥ शीघ््रयाय च नमो नित्यं शीभ्याय महते नमः । नम ऊर्म्याय भव्याय वस्वन्याय नमो नमः ॥४७॥ स्रोतस्याय नमो नित्यं द्वीप्याय च नमो नमः । नमो ज्येष्ठाय शूराय कनिष्ठाय च ते नमः ॥४८॥ पूर्वजाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते परजाय च । मध्यमाय नमस्तेऽस्तु कूष्मांडाय च ते नमः ॥४९॥ नमः परंपरायेश ताराय सकलात्मने । जघन्याय नमस्तेऽस्त बुघ्न्याय च नमो नमः ॥५०॥ सोभ्याय प्रतिसर्याय नमो याम्याय ते नमः । नमः क्षेम्याय वर्याय उर्वर्याय नमो नमः ॥५१॥ श्लोक्याय चा वसान्याय नमो मंगलरूपिणे । नमो वन्याय कक्ष्याय श्रवाय च नमो नमः ॥५२॥ प्रतिश्रवाय शान्ताय शरण्याय नमो नमः । नमो सदाशुषेणाय नमश्चाशुरयाय च ॥५३॥ नमः शूरस्वरूपाय भेत्रे चाभयदायिने । नमोऽस्तु वर्मिणे तुभ्यं नमो नित्यं वरूथिने ॥५४॥ बिल्मिने ते नमो नित्यं नमः कवचिने सदा । श्रुताय श्रुतसेनाय दुन्दुभ्याय च ते नमः ॥५५॥ नमस्ते आहनन्याय धृष्णवे प्रमृशाय च । तीक्ष्णेशवे नमस्तुभ्यं नम आयुधिने सदा ॥५६॥ नमो गोप्त्रे विश्वहंत्रे स्वायुधाय सुधन्वने । नमः स्रुत्याय पथ्याय नमः शुद्धाय ते नमः ॥५७॥ सरस्याय नमो नित्यं नादेयाय नमो नमः । वैशन्ताय नमस्तुभ्यमग्रगण्याय ते नमः ॥५८॥ नमस्त्वभयरूपाय नमः कूप्याय ते सदा । नमो वट्यायावर्ष्याय वर्ष्यायामृतरूपिणे ॥५९॥ नमो मेघ्याय भौमाय विद्युताय नमो नमः । नमो वीद्ध््रयाय ते नित्यमातप्याय नमो नमः ॥६०॥ नमो वात्याय रेष्म्याय वास्तव्याय नमो नमः । वास्तुपाय नमस्तेऽस्तु नमः साम्बाय सर्वदा ॥६१॥ नमश्चंद्र किरीटाय नियताय नमोऽस्तु ते । नमो ब्रह्मण्यदेवाय देवेशाय नमो नमः ॥६२॥ नमो विश्वैकवन्द्याय सर्वाधारायते नमः । नमोनन्तगुणोपेत सोम सर्वोत्तम प्रभो ॥६३॥ नमस्ते त्र्यम्बक श्रीमन्नामस्ताम्राय ते नमः । नमो विश्वैकनिलय नमो विश्वैकसंस्तुते ॥६४॥ नमो विधूतपापाय महादेवाय ते नमः । नमस्ते पार्वतीनाथ नमस्ते त्रिपुरान्तक ॥६५॥ नमस्ते करुणासिन्धो नमस्ते भक्तवत्सल । नमस्त्रिकाग्निकालाय कालकालाय ते सदा ॥६६॥ नमस्ते कालरूपाय नमस्ते वरदायक । नमः सर्वोत्तम श्रीमन् सदाशिव नमोऽस्तु ते ॥६७॥ नमो भवाय भीमाय भर्गायाभयदायिने । देवतासार्वभौमाय शंभवे प्रभवे नमः ॥६८॥ न त्वदन्यो महादेव लोकनाथ जगन्मयः । न त्वदन्यः सुराराघ्यो न त्वदन्यो जगत्प्रभुः ॥६९॥ न त्वदन्यो वेदवेद्यो न त्वदन्यः सुरेष्टदः । न त्वदन्यः सदा सेव्यो न त्वदन्यो जगत्पिता ॥७०॥ त्वमेव भूषणं रम्यं त्वमेव मम जीवनम् । त्वमेव मम माताऽसि त्वमेव हि पिता मम ॥७१॥ त्वमाराध्यो नमः शंभो मम देवोत्तम प्रभो । न त्ववन्यपदद्वन्द्वमर्चयामि कृपानिधे ॥७२॥ न शृणोमि कथां रम्यामन्यां शिवविवर्जिताम् । शिवनामान्यनामानि न वदामि महेश्वर ॥७३॥ शिव लिंगं विहायान्यद् ध्यानं च न कदाचन ॥७४॥ अपराधान् क्षमस्वेश मम शंकर सर्वग । स्वरूपं तव विज्ञातुं शक्यमेव न सर्वथा ॥७५॥ वेदैः सर्व रपि श्रीमत्तव रूपं सदाशिव । न ज्ञातं तादृशं रूपं मया ज्ञेयं कथं प्रभो ॥७६॥ लिंगस्याग्रं मया ज्ञातमन्या त्वं गतिरीश्वर । अपराधं क्षमस्वाद्य प्रमादादम्बिकापते ॥७७॥ अन्येऽपि मत्कृताः सर्वे क्षन्तव्याः परमेश्वर । अपराधाः कृपासिन्धो दीनवत्सल शंकर ॥७८॥ प्रणतं पाहि मां शंभो करुणारसवारिधे । मां नु मंच महादेव पाहि पाहि सदाशिव ॥७९॥ इति स्तुत्वा महादेवं प्रणम्य बहुधा तथा । कृताष्लिपुटो भूत्वा न्यवसन्ना तकन्धरः ॥८०॥ शिलाद उवाच :- नमो नमस्ते गिरिजासहाय नमो नमस्तेऽस्तु महास्वरूप । नमो नमस्तेऽन्नपते महेश नमो नमस्तेऽस्तु नमो नमस्ते ॥०१॥ त्वत्पादाम्बुजभक्तिर्मे निश्चला भवतु प्रभो । त्वमेव शरणं शंभो गतिस्त्वं जगतां प्रभो ॥०२॥ कर्माण्यद्य फलोन्मुखानि भगवन् त्वत्पादपद्मं यतो दृष्टं दोषविवर्जितं सुखयुतं यावत्करोति स्वतः । यत्तावन्मुनिवृन्दमानसमनः पद्म प्रविष्टं प्रभो तन्मे मानसपप्रजं क्षणमपि स्वामिन्मुदे जायताम् ॥०३॥ ॥ इति शिवरहस्ये नमकः संपूर्णः॥ 🍁🔱#श्रीशिवायनमस्तुभ्यं🔱🍁
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#🔱रुद्राभिषेक🙏 #🛕महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं🚩 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 महाशिवरात्रि पर दुर्भाग्य नाशक कुछ उपाय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है उन्हें महाशिवरात्रि के दिन 3 मुखी रुद्राक्ष की पूजा करके, उसे गले में धारण करना चाहिए। आप चाहें तो उसका ब्रेसलेट बनावाकर हाथ में भी धारण कर सकते हैं। इससे धन लाभ होगा। 👉 कई बार ग्रहों की खराब हालत के चलते भी धन का नाश होता है। इससे बचने के लिए शिवरात्रि के दिन शिव मन्दिर में जाकर भगवान को चावल अर्पित करने चाहिए और चरण छूकर भगवान का आशीर्वाद लें, इससे समस्या दूर होगी। 👉 जिन लोगों की कुंडली में मृत्यु योग है या बुरा समय है तो आप महाशिवरात्रि के दिन घर में महामृत्युंजय यंत्र की स्थापना करें और इसके मंत्र का जाप करें। 👉 महाशिवरात्रि को सुबह स्नान आदि के बाद शिवलिंग पर 5 बेल पत्र चढ़ाएं और हर बार बेलपत्र चढ़ाते समय "ऊँ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें। इससे आपको हर कार्य में सफलता मिलेगी। 👉 अगर व्यापार में नुकसान हो रहा है तो काली गुंजा के 11 दाने लेकर, उन्हें भगवान शिव को अर्पण करके अपनी दुकान में रख दें। इससे हालात सुधर जाएंगे। 👉 अगर वैवाहिक जीवन में दिक्कतें आ रही हैं तो महाशिवरात्रि के दिन किसी सुहागन स्त्री को लाल साड़ी और श्रृंगार की वस्तुएं दान दें। इससे समस्या हल हो जाएगी। 👉 मोक्ष की प्राप्ति के लिए एक मुखी रुद्राक्ष में गंगाजल छिड़ककर इसे शुद्ध कर लें। अब रोजाना ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मृत्यु के बाद आपको मोक्ष मिलेगा। 👉 शिव जी की कृपा पाने के लिए उन्हें खीर समेत दूसरी सफेद वस्तुओं का भोग लगाएं। इससे आपके जीवन में भी खुशियों की मिठास बढ़ेगी। 👉 अगर आपके शत्रु आप पर हावी हो जाते हैं तो महाशिवरात्रि के दिन से रुद्राष्टक का पाठ करें। अब ये प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रखें। इससे आपके दुश्मन घुटने टेक देंगे। 👉 महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार के दिन शिवलिंग का पंचामृत से स्नान और जलाभिषेक करने से व्यक्ति को सफलता की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति घोर आर्थिक संकट से जूझ रहे हों, कर्ज में डूबे हों, व्यापार व्यवसाय की पूंजी बार-बार फंस जाती हो उन्हें दारिद्रय दहन स्तोत्र से शिवजी की आराधना करनी चाहिए. महर्षि वशिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र बहुत असरदायक है. यदि संकट बहुत ज्यादा है तो शिवमंदिर में या शिव की प्रतिमा के सामने प्रतिदिन तीन बार इसका पाठ करें तो विशेष लाभ होगा. जो व्यक्ति कष्ट में हैं अगर वह स्वयं पाठ करें तो सर्वोत्तम फलदायी होता है लेकिन परिजन जैसे पत्नी या माता-पिता भी उसके बदले पाठ करें तो लाभ होता है. शिवजी का ध्यान कर मन में संकल्प करें. जो मनोकामना हो उसका ध्यान करें फिर पाठ आरंभ करें. श्लोकों को गाकर पढ़े तो बहुत अच्छा, अन्यथा मन में भी पाठ कर सकते हैं. आर्थिक संकटों के साथ-साथ परिवार में सुख शांति के लिए भी इस मंत्र का जप बताया गया है. ।।दारिद्रय दहन स्तोत्रम्।। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विश्वेशराय नरकार्ण अवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय। कर्पूर कान्ति धवलाय, जटाधराय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।1 गौरी प्रियाय रजनीश कलाधराय, कलांतकाय भुजगाधिप कंकणाय। गंगाधराय गजराज विमर्दनाय द्रारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।2 भक्तिप्रियाय भवरोग भयापहाय उग्राय दुर्ग भवसागर तारणाय। ज्योतिर्मयाय गुणनाम सुनृत्यकाय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।3 चर्माम्बराय शवभस्म विलेपनाय, भालेक्षणाय मणिकुंडल-मण्डिताय। मँजीर पादयुगलाय जटाधराय दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।4 पंचाननाय फणिराज विभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रय मंडिताय। आनंद भूमि वरदाय तमोमयाय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।5 भानुप्रियाय भवसागर तारणाय, कालान्तकाय कमलासन पूजिताय। नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।6 रामप्रियाय रधुनाथ वरप्रदाय नाग प्रियाय नरकार्ण अवताराणाय। पुण्येषु पुण्य भरिताय सुरार्चिताय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।7 मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वर वाहनाय। मातंग चर्म वसनाय महेश्वराय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।8 वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्व रोग निवारणम् सर्व संपत् करं शीघ्रं पुत्र पौत्रादि वर्धनम्।। शुभदं कामदं ह्दयं धनधान्य प्रवर्धनम् त्रिसंध्यं यः पठेन् नित्यम् स हि स्वर्गम् वाप्युन्यात्।।9 ।।इति श्रीवशिष्ठरचितं दारिद्रयुदुखदहन शिवस्तोत्रम संपूर्णम्।। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️🔸
🔱रुद्राभिषेक🙏 - महा शिवरात्रि ৯ दुर्भाग्य नाशक उपाय महा शिवरात्रि ৯ दुर्भाग्य नाशक उपाय - ShareChat
सर्वदोष नाश के लिये रुद्राभिषेक विधि #🔱रुद्राभिषेक🙏 #🙏शिव पार्वती #🔱बम बम भोले🙏 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔸🔸 रुद्राभिषेक अर्थात रूद्र का अभिषेक करना यानि कि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। जैसा की वेदों में वर्णित है शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है। क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। रूद्र शिव जी का ही एक स्वरूप हैं। रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में भी किया गया है। शास्त्र और वेदों में वर्णित हैं की शिव जी का अभिषेक करना परम कल्याणकारी है। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है। रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं। वैसे तो रुद्राभिषेक किसी भी दिन किया जा सकता है परन्तु त्रियोदशी तिथि,प्रदोष काल और सोमवार को इसको करना परम कल्याण कारी है। श्रावण मास में किसी भी दिन किया गया रुद्राभिषेक अद्भुत व् शीघ्र फल प्रदान करने वाला होता है। रुद्राभिषेक क्या है ? 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है – स्नान करना अथवा कराना। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है। वर्तमान समय में अभिषेक रुद्राभिषेक के रुप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिव जी को प्रसंन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक करना अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा कराना। वैसे भी अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना गया है। रुद्राभिषेक क्यों किया जाता हैं? 🔸🔸🔹🔸🔸🔸🔸🔹🔹🔹 रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं। रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ? 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जबअपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है। परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान लिया और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव सपरिवार वृषभ पर बैठकर विहार कर रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने मर्त्यलोक में रुद्राभिषेक कर्म में प्रवृत्त लोगो को देखा तो भगवान शिव से जिज्ञासा कि की हे नाथ मर्त्यलोक में इस इस तरह आपकी पूजा क्यों की जाती है? तथा इसका फल क्या है? भगवान शिव ने कहा – हे प्रिये! जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह आशुतोषस्वरूप मेरा विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे मैं प्रसन्न होकर शीघ्र मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ। जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है अर्थात यदि कोई वाहन प्राप्त करने की इच्छा से रुद्राभिषेक करता है तो उसे दही से अभिषेक करना चाहिए यदि कोई रोग दुःख से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे कुशा के जल से अभिषेक करना या कराना चाहिए। रुद्राभिषेक की पूर्ण विधि 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 गत पोस्ट में हमने भक्तो की सुविधा हेतु महादेव का आसान लौकिक मंत्रो से पूजन विधि बताई थी पूजा समाप्ति के उपरांत शिव अभिषेक का नियम है इसके लिये आवश्यक सामग्री पहले ही एकत्रित करलें। सामग्री👉 बाल्टी अथवा बड़ा पात्र जल के लिये संभव हो तो गंगाजल से अभिषेक करे। श्रृंगी (गाय के सींग से बना अभिषेक का पात्र) श्रृंगी पीतल एवं अन्य धातु की भी बाजार में सहज उपलब्ध हो जाती है।, लोटा आदि। रुद्राष्टाध्यायी के एकादशिनि रुद्री के ग्यारह आवृति पाठ किया जाता है। इसे ही लघु रुद्र कहा जाता है। यह पंचामृत से की जाने वाली पूजा है। इस पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रभावशाली मंत्रो और शास्त्रोक्त विधि से विद्वान ब्राह्मण द्वारा पूजा को संपन्न करवाया जाता है। इस पूजा से जीवन में आने वाले संकटो एवं नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा मिलता है। ब्राह्मण के अभाव में स्वयं भी संस्कृत ज्ञान होने पर रुद्राष्टाध्यायी के पाठ से अथवा अन्य परिस्थितियों में शिवमहिम्न का पाठ करके भी अभिषेक किया जा सकता है। रुद्राभिषेक से लाभ 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा। रुद्राभिषेक अनेक पदार्थों से किया जाता है और हर पदार्थ से किया गया रुद्राभिषेक अलग फल देने में सक्षम है जो की इस प्रकार से हैं । रुद्राभिषेक कैसे करे 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 1 जल से अभिषेक 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 👉 हर तरह के दुखों से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव का जल से अभिषेक करें। सर्वप्रथम भगवान शिव के बाल स्वरूप का मानसिक ध्यान करें तत्पश्चाततांबे को छोड़ अन्य किसी भी पात्र विशेषकर चांदी के पात्र में ‘शुद्ध जल’ भर कर पात्र पर कुमकुम का तिलक करें, ॐ इन्द्राय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर जल की पतली धार बनाते हुए रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करेत हुए ॐ तं त्रिलोकीनाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें, शिवलिंग को वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें 2 दूध से अभिषेक 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 👉 शिव को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद पाने के लिए दूध से अभिषेक करें 👉 भगवान शिव के ‘प्रकाशमय’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें। अभिषेक के लिए तांबे के बर्तन को छोड़कर किसी अन्य धातु के बर्तन का उपयोग करना चाहिए। खासकर तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए। इससे ये सब मदिरा समान हो जाते हैं। तांबे के पात्र में जल का तो अभिषेक हो सकता है लेकिन तांबे के साथ दूध का संपर्क उसे विष बना देता है इसलिए तांबे के पात्र में दूध का अभिषेक बिल्कुल वर्जित होता है। क्योंकि तांबे के पात्र में दूध अर्पित या उससे भगवान शंकर को अभिषेक कर उन्हें अनजाने में आप विष अर्पित करते हैं। पात्र में ‘दूध’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें, ॐ श्री कामधेनवे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर दूध की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करते हुए ॐ सकल लोकैक गुरुर्वै नम: मंत्र का जाप करें, शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें 3👉 फलों का रस 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 👉 अखंड धन लाभ व हर तरह के कर्ज से मुक्ति के लिए भगवान शिव का फलों के रस से अभिषेक करें। भगवान शिव के ‘नील कंठ’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें, ताम्बे के पात्र में ‘गन्ने का रस’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें, ॐ कुबेराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर फलों का रस की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रुं नीलकंठाय स्वाहा मंत्र का जाप करें, शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें 4 सरसों के तेल से अभिषेक 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 👉 ग्रहबाधा नाश हेतु भगवान शिव का सरसों के तेल से अभिषेक करें। भगवान शिव के ‘प्रलयंकर’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें फिर ताम्बे के पात्र में ‘सरसों का तेल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें ॐ भं भैरवाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर सरसों के तेल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करते हुए ॐ नाथ नाथाय नाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें, शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें 5 चने की दाल 🔸🔸🔹🔸🔸 👉 किसी भी शुभ कार्य के आरंभ होने व कार्य में उन्नति के लिए भगवान शिव का चने की दाल से अभिषेक करें। भगवान शिव के ‘समाधी स्थित’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें फिर ताम्बे के पात्र में ‘चने की दाल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें, ॐ यक्षनाथाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर चने की दाल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करते हुए -ॐ शं शम्भवाय नम: मंत्र का जाप करें, शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें 6 काले तिल से अभिषेक 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 👉 तंत्र बाधा नाश हेतु व बुरी नजर से बचाव के लिए काले तिल से अभिषेक करें। इसके लिये सर्वप्रथम भगवान शिव के ‘नीलवर्ण’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें, ताम्बे के पात्र में ‘काले तिल’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें, ॐ हुं कालेश्वराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर काले तिल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें, अभिषेक करते हुए -ॐ क्षौं ह्रौं हुं शिवाय नम: का जाप करें, शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें 7 शहद मिश्रित गंगा जल 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 👉 संतान प्राप्ति व पारिवारिक सुख-शांति हेतु शहद मिश्रित गंगा जल से अभिषेक करें। सबसे पहले भगवान शिव के ‘चंद्रमौलेश्वर’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें, ताम्बे के पात्र में ” शहद मिश्रित गंगा जल” भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें, ॐ चन्द्रमसे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें, पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें, शिवलिंग पर शहद मिश्रित गंगा जल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें अभिषेक करते हुए -ॐ वं चन्द्रमौलेश्वराय स्वाहा’ का जाप करें शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें। 8 घी व शहद 🔸🔸🔹🔸🔸 👉 रोगों के नाश व लम्बी आयु के लिए घी व शहद से अभिषेक करें। इसके लिये सर्वप्रथम भगवान शिव के ‘त्रयम्बक’ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें, ताम्बे के पात्र में ‘घी व शहद’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें फिर ॐ धन्वन्तरयै नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें शिवलिंग पर घी व शहद की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रौं जूं स: त्रयम्बकाय स्वाहा” का जाप करें शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें 9 कुमकुम केसर हल्दी 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 👉 आकर्षक व्यक्तित्व का प्राप्ति हेतु भगवान शिव का कुमकुम केसर हल्दी से अभिषेक करें। सर्वप्रथम भगवान शिव के ‘नीलकंठ’ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें ताम्बे के पात्र में ‘कुमकुम केसर हल्दी और पंचामृत’ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें – ‘ॐ उमायै नम:’ का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें पंचाक्षरी मंत्र ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें पंचाक्षरी मंत्र पढ़ते हुए पात्र में फूलों की कुछ पंखुडियां दाल दें-‘ॐ नम: शिवाय’ फिर शिवलिंग पर पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें. अभिषेक का मंत्र-ॐ ह्रौं ह्रौं ह्रौं नीलकंठाय स्वाहा’ शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें साभार~ पं देव शर्मा🔥 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
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