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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#पौराणिक कथा राजा चित्रकेतु और भगवान के दर्शन — संपूर्ण कथा स्रोत: भागवत पुराण, छठा स्कंध, अध्याय 16 (पौराणिक कथा – मुक्त रूप में सुनाई गई) बहुत समय पहले राजा चित्रकेतु विशाल साम्राज्य के नरेश थे। वैभव, सेना, महल—सब कुछ था, मगर एक ही अभाव उन्हें भीतर से तोड़ता था—संतान का न होना। रानी कृतद्युति भी इसी कारण उदासी में दिन बिताती थीं। दोनों के जीवन में आनंद होते हुए भी एक गहरी खाली जगह थी। ऋषि का आगमन एक दिन राजमहल में तेजस्वी ऋषि अंगिरा ऋषि पधारे। राजा ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और अपनी पीड़ा प्रकट की। ऋषि ने उनकी तड़प को समझा और बोले— "राजन्, समय आ गया है। तुम पर कृपा होगी।" ऋषि ने एक विशेष यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रसाद को रानी कृतद्युति ने ग्रहण किया, और कुछ समय बाद एक सुन्दर पुत्र ने जन्म लिया। महल में उत्सव छा गया—संगीत, नृत्य, दान, हर्ष—सब कुछ। प्रसन्नता से शोक तक परंतु सुख का यह दीप जल्द ही हवा से बुझ गया। राजकुमार की अचानक मृत्यु हो गई। महल का आनंद पल में राख हो गया। राजा बिखर गए, रानी निराशा में डूब गईं। सबको लगा जैसे जीवन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया हो। उसी समय दो महान संत आए— नारद मुनि और अंगिरा ऋषि (फिर से)। उन्होंने राजा से कहा— "जिसे तुम अपना मानते हो, वह कभी स्थायी नहीं होता। जीवन में मिलने-विछोह दोनों ही निश्चित हैं। दुख में डूबने से सत्य छूट जाता है।" उनके वचनों ने चित्रकेतु के भीतर सोए विवेक को जगा दिया। वे समझ गए कि संसार परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा शाश्वत है। वैराग्य और भक्ति का मार्ग राजा ने राज्य की हलचलों से मन हटाकर ईश्वर-चिन्तन में मन लगाया। शोक धीरे-धीरे शांति में बदलने लगा। ध्यान, जप और भक्ति—इन सबमें उनका हृदय डूब गया। भक्ति की अग्नि इतनी प्रबल हुई कि उनका जीवन जैसे तेज से चमकने लगा। उन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को आत्मसात कर लिया और आत्मज्ञान में स्थित हो गए। भगवान का दर्शन एक दिन, ध्यान में बैठे राजा को दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उनके सम्मुख प्रकट हुए— भगवान विष्णु, अपनी मनोहारी रूप-छवि और शांति प्रदान करने वाले तेज के साथ। उनके साथ उपस्थित थे चार महान बाल-संत— सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार, जो सदैव भगवान के निकट रहते हैं। चित्र में दिखाया गया दृश्य इसी क्षण को दर्शाता है— राजा चित्रकेतु भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठे हैं, उनकी आँखों में कृतज्ञता और भक्ति है। भगवान विष्णु उन्हें वरदान, आशीर्वाद और आध्यात्मिक मार्ग का प्रकाश दे रहे हैं। कुमार शांत भाव से इस दिव्य मिलन के साक्षी बने हुए हैं। कथा का संदेश यह कथा हमें सिखाती है: सुख-दुख जीवन के स्वाभाविक प्रवाह हैं। जो मिलता है, वह कभी स्थायी नहीं होता। विरक्ति, भक्ति और ज्ञान से जीवन का सच खुलता है। सच्चा संतोष परमात्मा के स्मरण में है।
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 319) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः । शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ।। ४२ ।। तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व शान्तनुनन्दन भीष्मपर सैकड़ों और हजारों शीघ्रगामी बाणोंकी बौछार करने लगा ।। ४२ ।। पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः । विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाब्रुवन् ।। ४३ ।। शाल्वने पहले ही भीष्मको पीड़ित कर दिया। यह देखकर सभी राजा आश्चर्यचकित हो गये और 'वाह-वाह' करने लगे ।। ४३ ।। लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः । अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ।। ४४ ।। युद्धमें उसकी फुर्ती देख सब राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपनी वाणीद्वारा शाल्वनरेशकी प्रशंसा करने लगे ।। ४४ ।। क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः । क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ।। ४५ ।। शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने क्षत्रियोंकी वे बातें सुनकर कुपित हो शाल्वसे कहा- 'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ४५ ।। सारथिं चाब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः । यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ।। ४६ ।। फिर सारथिसे कहा- 'जहाँ यह राजा शाल्व है, उधर ही रथ ले चलो। जैसे पक्षिराज गरुड सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार मैं इसे अभी मार डालता हूँ' ।। ४६ ।। ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग योजयामास कौरवः । तेनाश्वांश्चतुरोऽमृ‌द्माच्छाल्वराजस्य भूपते ।। ४७ ।। जनमेजय! तदनन्तर कुरुनन्दन भीष्मने धनुषपर उचित रीतिसे वारुणास्त्रका संधान किया और उसके द्वारा शाल्वराजके चारों घोड़ोंको रौंद डाला ।। ४७ ।। अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः । भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत् तस्य सारथिम् ।। ४८ ।। नृपश्रेष्ठ ! फिर अपने अस्त्रोंसे राजा शाल्वके अस्त्रोंका निवारण करके कुरुवंशी भीष्मने उसके सारथिको भी मार डाला ।। ४८ ।। अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत् तुरगोत्तमान् । कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ।। ४९ ।। जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् । ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ।। ५० ।। स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा । राजानो ये च तत्रासन् स्वयंवरदिदृक्षवः ।। ५१ ।। स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः । एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ।। ५२ ।। प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ।। ५३ ।। तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया। नरश्रेष्ठ ! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कन्याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड दिया। जनमेजय ! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा। इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो-जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने-अपने देशको चले गये। प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे ।। ४९-५३ ।। यथा पितास्य कौख्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः । सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ।। ५४ ।। वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान् । अक्षतः क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रमः ।। ५५ ।। उनके पिता कुरुश्रेष्ठ नृपशिरोमणि शान्तनु जिस प्रकार राज्य करते थे, वैसा ही वे भी करते थे। जनमेजय ! भीष्मजी थोड़े ही समयमें वन, नदी, पर्वतोंको लाँघते और नाना प्रकारके वृक्षोंको लाँघते और पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गये। युद्धमें उनका पराक्रम अवर्णनीय था। उन्होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओंको ही क्षति पहुँचायी थी ।। ५४-५५ ।। आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः । स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ।। ५६ ।। यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् । आनिन्ये स महाबाहुर्भातुः प्रियचिकीर्षया ।। ५७ ।। धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्म काशिराजकी कन्याओंको पुत्रवधू, छोटी बहिन एवं पुत्रीकी भाँति साथ रखकर कुरुदेशमें ले आये। वे महाबाहु अपने भाई विचित्रवीर्यका प्रिय करनेकी इच्छासे उन सबको लाये थे ।। ५६-५७ ।। ताः सर्वगुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ।। ५८ ।। भाई भीष्मने अपने पराक्रमद्वारा हरकर लायी हुई उन सर्वसद्‌गुणसम्पन्न कन्याओंको अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यके हाथमें दे दिया ।। ५८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतमू श्रीमहाभारतमू - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 भगवत् - गीता आइए ! आज हम इस पर मनन करें कि भगवान श्री कृष्ण ने भगवत्-वाणी को प्रकट करने के लिए अर्जुन को ही निमित्त के रूप में क्यों चुना ? एक बार एक नन्हा बालक अपने निर्धन पिता के साथ मेला देखने के लिए गया था। वह अपने पिता की उंगली पकड़े हुए था । जैसे-जैसे मेला में वह प्रवेश करने लगा , रंग - बिरंगी वस्तुओं को देखकर उसका मन ललचाने लगा। वह अपने पिता से मनपसन्द वस्तुओं की मांग करने लगा। पिता के पास अधिक पैसे नहीं थे , अतः वह कहते थे कि पहले मेला घूम लें , फिर लौटते समय हम खरीदेंगे । भीड़ बढ़ती जा रही थी । अचानक मेले में एक भीड़ का रेला आया और बालक का हाथ अपने पिता के हाथ से छूट गया। बालक ' बापू - बापू ' कहकर चिल्लाने लगा । अपने पिता को न देखकर एवं न पाकर वह रोने लगा । तभी वहां कई लोगों की नजर इस बालक पर गई । रोते बालक को चुप कराने के लिए किसी ने गुब्बारा दिया , किसी ने उसे खिलौने लाकर दिया , किसी ने मिठाई लाकर दी । बालक कुछ भी नहीं ले रहा था , वह केवल अपने बापू की रट लगा रहा था । वह कहता था कि मुझे बापू चाहिए। जिन वस्तुओं की मांग वह अपने पिता से कर रहा था , वे सारी वस्तुएं उसको उपलब्ध थीं , लेकिन वह नन्हा बालक बार-बार क्रंदन - स्वर में केवल अपने पिता की मांग कर रहा था। साथ में पिता रहे तो यह सब सारा सामान ठीक है अन्यथा व्यर्थ है। - यह भाव उस छोटे से बालक को भी समझ में आ रहा था। ठीक यही दशा अर्जुन की भी थी। महाभारत युद्ध की तैयारी अपने चरम पर थी। अंतिम समय में अर्जुन एवं दुर्योधन दोनों भगवान श्री कृष्ण के पास सहायता मांगने पहुंचे थे । भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि एक ओर मेरी एक अक्षौहिणी नारायणी सेना है तथा दूसरी ओर निहत्था मैं हूं । इन दोनों में से किसी एक को तुम लोगों को चुनना है। अर्जुन की बारी पहले आई क्योंकि अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने पहले देखा था। इसका कारण यह था कि वह भगवान श्री कृष्ण के चरण तले खड़ा था। अर्जुन ने उस नन्हे बालक की भांति पदार्थ नहीं , परमेश्वर श्री कृष्ण को ही मांगा । दुर्योधन इस निर्णय को जानकर बड़ा प्रसन्न हुआ और वह एक अक्षौहिणी नारायणी सेना प्राप्त कर वापस चला गया। घटना बस इतनी ही है। इसकी गहराई पर जाकर विचार करने पर हम देखते हैं कि एक ओर साक्षात् परमात्मा हैं, दूसरी ओर परमेश्वर-प्रदत्त पदार्थ हैं। दोनों में से चयन किसका करना है ? - यह हमें तय करना है । अधिकतर लोग परमात्मा को नहीं चाहते ,परमात्मा से चाहते हैं। दुर्योधन ने प्रभु से चाहा । अर्जुन ने प्रभु को चाहा । केवल ' से ' तथा ' को ' का अंतर है ,पर यह अंतर बहुत गहरा है । अर्जुन की प्रभु के प्रति तड़प को दर्शाती है और दुर्योधन की वस्तु के प्रति ललक को प्रदर्शित करती है । हमें तो केवल यह दिखाई देता है कि अर्जुन ने अपने रथ की बागडोर सारथी श्रीकृष्ण को सौंप दी थी , लेकिन वास्तव में अर्जुन ने अपने समग्र जीवन की बागडोर परमात्मा के हाथों सौंप दिया था । यही कारण है कि धर्म-धुरंधर भीष्म , धर्मप्राण संजय , धर्मात्मा विदुर , धर्मराज युधिष्ठिर ,धर्मज्ञाता द्रोणाचार्य , धर्मप्रवीण कृपाचार्य एवं धर्मशीला द्रौपदी के रहते हुए भी भगवान ने भगवत्-गीता के प्राक्ट्य हेतु अर्जुन का ही चयन किया था। अर्जुन पूर्ण शरणागति में था । अब हमें यह तय करना है कि हम दुर्योधन की भांति प्रभु से मांगें या अर्जुन की भांति प्रभु को ही मांगें । आज बस इतना ही। आपने इसे मनोयोग पूर्वक पढ़ा , इस हेतु आपको नमन एवं वंदन।
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भाग्य, कर्म और भगवान #☝आज का ज्ञान #❤️जीवन की सीख ➖➖➖➖➖➖ एक आदमी एक दिन लोटा लेकर जल भरने निकला। वह कुएं पर पहुँचा, पर उसे लगा कि तालाब कुएं से बड़ा होता है। वह तालाब गया, फिर सोचा नदी तालाब से भी बड़ी होती है। नदी पहुँचा, तो विचार आया कि समुद्र में तो अनगिनत पानी है – चलो वहीं चला जाएं, जहाँ सबसे अधिक जल हो। वह समुद्र के पास पहुँचा। वहाँ सचमुच जल ही जल था, किन्तु जब लोटा भरने की बारी आई, तो पाया कि चाहे समुद्र कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसके लोटे में उतना ही पानी आएगा, जितना उसमें समा सके। यह लोटा भाग्य का प्रतीक था। चाहे हम कितनी भी बड़ी जगह क्यों न पहुँचें, हमारे भाग्य का पात्र उतना ही ले सकता है, जितना उसमें समाने की क्षमता है। तुलसीदास जी भी कहते हैं: "जहाँ-जहाँ जाए तुलसी, सरिता, कूप, समुद्र। जल बूंद न अधिक समाय, मिलि ही रहै दुर्बुद्ध।" अब सवाल उठता है – जब हमें उतना ही मिलेगा जितना भाग्य में लिखा है, तो फिर भगवान को मानने की जरूरत क्या है? तर्क कहता है – जब कर्म से ही भाग्य बनता है और भाग्य से ही फल मिलता है, तो फिर भगवान क्यों? इसका उत्तर महापुरुषों ने बहुत सुंदर ढंग से दिया है। उत्तर यह है कि कर्म का फल तो अवश्य मिलता है, पर कर्म स्वयं फल देने में सक्षम नहीं है। उदाहरण लो – एक छात्र ने मेहनत से पढ़ाई की, डिग्रियाँ लीं। पर क्या सिर्फ डिग्री से नौकरी मिलती है? नहीं। जब कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार करती है, तभी उसे नौकरी मिलती है। यानि पढ़ाई तो कर्म है, पर फल तभी मिलता है जब कोई उसका मूल्य स्वीकार करे। ठीक वैसे ही, भगवान हमारे कर्मों को स्वीकार कर के ही हमें उनका फल देते हैं। अब सोचो – दुनिया का मालिक, ईश्वर, जिसे हमारे कर्म की कोई आवश्यकता नहीं है, वह फिर भी हमारे छोटे-छोटे कर्मों को स्वीकार कर हमें उसका फल देता है। यही उसका अनंत करुणा और कृपा है। इसीलिए हमें भगवान को मानना चाहिए। अब एक और घटना सुनो – संत तुकाराम जी को एक व्यक्ति ने अपने खेत की रखवाली का जिम्मा सौंपा। पर फसल के समय देखा गया कि खेत में कुछ बचा ही नहीं। गुस्से में वह व्यक्ति तुकाराम जी से फसल की भरपाई मांगने लगा। तुकाराम जी ने शांत स्वर में कहा– "कटवाओ खेत।" लोगों ने हँसी उड़ाई– "अब इसमें तिनका भी नहीं है, देंगे कहां से?" पर जब खेत कटा, तो आश्चर्य! खेत के अंदर ढेर सारी फसल निकली। सबने देखा कि जहां कुछ भी न था, वहाँ भगवान की कृपा से भरपूर अनाज था "पूरे 25 मन"। ऐसी ही एक घटना और– तुकाराम जी एक बार गन्ने बेचने निकले। सारे गन्ने रास्ते में गोपाल को खिला दिए। जब घर पहुँचे, सिर्फ एक गन्ना बचा। पत्नी को क्रोध आया और वही गन्ना तुकाराम जी की पीठ पर मार दिया। दो टुकड़े हो गए। तुकाराम जी मुस्कराए और बोले – "अब हमारे पास दो गन्ने हैं, एक तुम खाओ, एक मैं।" किसी ने पूछा- "आप नाराज़ क्यों नहीं हुए?" तुकाराम बोले: "अगर पत्नी अनुकूल होती, तो मन संसार में लग जाता। प्रतिकूल मिली है, इसलिए मन भगवान में लगा है।" नरसी मेहता की पत्नी का निधन हुआ, तो वे बोले – "भगवान की बड़ी कृपा है।" इन सब संतों ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान की कृपा देखी। तो हम क्यों नहीं देख सकते? हर रोज सोचो- मिला क्या है? और जो भी मिला है, सोचो– किसने दिया है? परिवार, शरीर, धन, स्वास्थ्य- यह सब हमारा नहीं, ईश्वर की ही देन है। इसलिए भगवान को मानो- सिर्फ इसलिए नहीं कि डर है, बल्कि इसलिए कि वो बिना जरूरत हमारे कर्मों को स्वीकार करता है- और हमें फल देता है। यही उसकी सच्ची कृपा है। जय जय श्री राधे
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🌷नारायण नारायण🌷 #श्री हरि 🌱आत्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ जो अपने योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुःख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है। 🌾निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥ जो व्यक्ति किसी भी कार्य-व्यवहार को निश्चयपूर्वक आरंभ करता है, उसे बीच में नहीं रोकता, समय को बरबाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है । 🌷आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ॥ ज्ञानीजन श्रेष्ट कार्य करते हैं । कल्याणकारी व राज्य की उन्नति के कार्य करते हैं । ऐसे लोग अपने हितौषी मैं दोष नही निकालते । 🍁न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते। गाङ्गो ह्रद ईवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥ जो व्यक्ति न तो सम्मान पाकर अहंकार करता है और न अपमान से पीड़ित होता है । जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभरहित और शांत रहता है, वही ज्ञानी है। 🌻प्रवृत्तवाक् विचित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्। आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥ जो व्यक्ति बोलने की कला में निपुण हो, जिसकी वाणी लोगों को आकर्षित करे, जो किसी भी ग्रंथ की मूल बातों को शीघ्र ग्रहण करके बता सकता हो, जो तर्क-वितर्क में निपुण हो, वही ज्ञानी है । 🌳श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा। असम्भित्रायेमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥ जो व्यक्ति गंथों-शास्त्रों से विद्या ग्रहण कर उसी के अनुरूप अपनी बुद्धि को ढलता है और अपनी बुद्धि का प्रयोग उसी प्राप्त विद्या के अनुरूप ही करता है तथा जो सज्जन पुरुषों की मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं करता, वही ज्ञानी है । 🌸अश्रुतश्च समुत्रद्धो दरिद्रश्य महामनाः। अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥ बिना पढ़े ही स्वयं को ज्ञानी समझकर अहंकार करने वाला, दरिद्र होकर भी बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने वाला तथा बैठे-बिठाए धन पाने की कामना करने वाला व्यक्ति मूर्ख कहलाता है । 🌿स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति। मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥ जो व्यक्ति अपना काम छोड़कर दूसरों के काम में हाथ डालता है तथा मित्र के कहने पर उसके गलत कार्यो में उसका साथ देता है, वह मूर्ख कहलाता है । 🍂अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्। बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ जो व्यक्ति अपने हितैषियों को त्याग देता है तथा अपने शत्रुओं को गले लगाता है और जो अपने से शक्तिशाली लोगों से शत्रुता रखता है, उसे महामूर्ख कहते हैं। 💐निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते । अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम् ॥ सद्गुण, शुभ कर्म, भगवान् के प्रति श्रद्धा और विश्वास, यज्ञ, दान, जनकल्याण आदि, ये सब ज्ञानीजन के शुभ- लक्षण होते हैं । 🌴क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता। यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं । 🍀यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः । समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥ जो व्यक्ति सरदी-गरमी, अमीरी-गरीबी, प्रेम-धृणा इत्यादि विषय परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता और तटस्थ भाव से अपना राजधर्म निभाता है, वही सच्चा ज्ञानी है । 🌹क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थ भते न कामात्। नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥ 🌲ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं । किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते । 🥀 बोल हरि बोल हरि हरि हरि बोल केशव माधव गोविंद बोल।🥀
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#जय श्री राम ‼️'जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि — राम चरणों में प्रीति और मन में सिया की स्मृति" 💛‼️ ⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️ 🌺🙏ॐ नमो नारायणाय🙏🌺 सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ॥ तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥ ⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️ ✍️सब लोग अपने-अपने कर्म करते हुए अंत में केवल एक ही फल की कामना करते हैं — श्रीराम के चरणों में प्रेम। जिनके हृदय में प्रभु के प्रति सच्ची भक्ति और अनुराग होता है, उनके मन रूपी मंदिर में सीताजी और रघुनंदन श्रीराम स्वयं निवास करते हैं।✍️ ⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️ ✨ संदेश: 🍀जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि धन, यश या वैभव नहीं… बल्कि राम चरणों में प्रेम और मन मंदिर में सिया-राम का वास है।🍀 बोलो सियावर राम चन्द्र जी की जय 🙏
जय श्री राम - 888 ೆ೪ ೯  888 888 ೆ೪ ೯  888 - ShareChat
#महाभारत 📕महाभारत को देखें तो भगवान् ने पाण्डवों के अनुकूल भी बहुत बातें कीं और प्रतिकूल भी बहुत बातें कीं | पर पाण्डवों में यह विलक्षणता थी कि उन्होंने भगवान् पर अश्रद्धा नहीं की | पाण्डवों में भीमसेन मुँहफट था, पर उसने भी भगवान् के विरुद्ध बात नहीं की | भगवान् पर श्रद्धा हो तो ऐसी हो! परन्तु दुर्योधन की भगवान् पर श्रद्धा नहीं हुई | वह भगवान् को एक चालाक, चतुर आदमी मानता था |📕 👩‍❤️‍👩पाण्डवों में यह विशेषता थी कि वे मन के विरुद्ध बात होने पर भी समझते थे कि भगवान् अपने हैं | इसी तरह हमारे मन के विरुद्ध घटना होने पर भी भगवान् अपने दीखने चाहिये |👩‍❤️‍👩 🛐* हम भगवान् के विधान को समझते नहीं | हमारे प्रतिकूल बहुत-सी बातें होती हैं, उनके पीछे भगवान् का विधान होता है, जो हमारे लिये सदा मंगलमय होता है | जैसे माँ पर विश्वास होता है, ऐसे ही भगवान् पर विश्वास होना चाहिये | माँ को भी हम मानते हैं, जानते नहीं |* भगवान् को हम मान ही सकते हैं, जान नहीं सकते | उनको मानना ही उनको जानना है | भगवान् को न मानने पर भी भगवान् में कुछ फर्क नहीं पड़ता | फर्क न मानने वाले पर पड़ता है | वह भगवान् से लाभ नहीं उठा सकता, जबकि भगवान् को मानने वाले को विशेष लाभ होता है | कोई भगवान को माने चाहे न माने, भगवान सब पर समान कृपा करते हैं |🛐 🌍* संसार का काम करते हुए भगवान को याद रखना---इसमें संसार का काम मुख्य है, भगवान की याद गौण है | भगवान को याद रखते हुए संसार का काम करना ---इसमें भगवान की याद मुख्य है, संसार का काम गौण है |🌍 🌷इन दोनों से श्रेष्ठ बात है ---भगवान् का ही काम करना अर्थात् काम को भगवान् का ही काम समझकर करना | भगवान् का काम समझकर करने से सब समय भगवान् की याद ही मुख्य रहेगी | --- :: x :: --- --- :: x :: --- ---
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#❤️जीवन की सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ एक बार एक शिकारी का जहरीला तीर निशाना चूक कर एक हरे-भरे, विशाल वृक्ष में जा लगा। जहर के प्रभाव से वह पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा। उस पेड़ पर रहने वाले सभी पक्षी, जो कल तक उसके फलों का आनंद लेते थे, उसे मरता देख एक-एक कर छोड़ गए। लेकिन, उस पेड़ के कोटर में रहने वाला एक बूढ़ा, धर्मात्मा तोता वहीं डटा रहा। दाना-पानी के अभाव में वह भी पेड़ के साथ-साथ सूखकर कांटा होता जा रहा था, पर उसने अपना घर नहीं छोड़ा। यह बात देवराज इंद्र तक पहुंची। एक मरते हुए वृक्ष के लिए अपने प्राण त्यागने वाले इस तोते को देखने वे स्वयं धरती पर आए। इंद्र ने तोते से कहा, अरे भाई! यह पेड़ अब सूख चुका है। न इस पर पत्ते हैं, न फल। इसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में फलों से लदे अनेकों पेड़ हैं, सुंदर सरोवर हैं। तुम वहां क्यों नहीं चले जाते? यहां व्यर्थ प्राण क्यों दे रहे हो? तोते ने जो जवाब दिया, उसने देवराज को भी निरुत्तर कर दिया। वह बोला: देवराज! मैं इसी पेड़ पर जन्मा, इसी की गोद में पला-ब बढ़ा। इसके मीठे फल खाए और इसने मुझे अनेकों बार दुश्मनों से बचाया। जब इसके अच्छे दिन थे, मैंने इसके साथ सुख भोगे। आज जब इस पर बुरा वक्त आया है, तो मैं अपने स्वार्थ के लिए इसे कैसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुःख में उसका साथ छोड़ देना तो अधर्म है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी स्वार्थी सलाह क्यों दे रहे हैं? तोते की निस्वार्थ भक्ति और त्याग देखकर इंद्र प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "मांगो, क्या वर मांगते हो?" तोते ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने कहा, "प्रभु, मेरे इस प्यारे आश्रयदाता वृक्ष को पहले की तरह हरा-भरा कर दीजिए।" इंद्र ने अमृत वर्षा करके उस सूखे पेड़ को पुनर्जीवित कर दिया। पेड़ फिर से लहलहा उठा।
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#हनुमान हनुमान जी की भक्ति का सबसे बड़ा नियम यह है कि उनकी पूजा बिना भगवान श्री राम और माता सीता के नाम के अधूरी मानी जाती है। सुबह उनकी ऐसी आराधना करने के लिए आप इन चरणों का पालन कर सकते हैं: 1. राम-नाम का संकीर्तन हनुमान जी वहीं वास करते हैं जहाँ श्री राम का गुणगान होता है। बिस्तर से उठते ही या स्नान के बाद सबसे पहले 'श्री राम जय राम जय जय राम' मंत्र का कम से कम 11 बार जाप करें। इससे हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं क्योंकि वे राम-नाम के ऋणी हैं। 2. पंचोपचार पूजन स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें (संभव हो तो लाल या पीले रंग के)। हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं और लाल फूल अर्पित करें। उन्हें गुड़ और चने का भोग लगाना अति उत्तम माना जाता है। 3. हनुमान चालीसा और विशेष पंक्तियाँ हनुमान चालीसा का पाठ करें, लेकिन सीता माता और राम जी की कृपा पाने के लिए इन पंक्तियों पर विशेष ध्यान दें: > "राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा।" > "अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।" > इन पंक्तियों का अर्थ ही यही है कि उनके पास राम नाम की औषधि है और उन्हें माता जानकी (सीता) से सिद्धियों का वरदान प्राप्त है। 4. 'सीता-राम' मंत्र का सम्पुट हनुमान जी की आरती या पाठ के अंत में "सियावर रामचंद्र की जय" का उद्घोष करें। हनुमान जी को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका उनके प्रभु की स्तुति करना है। यदि आप रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों का पाठ करते हैं, तो हनुमान जी स्वयं पहरेदार बनकर आपके घर की रक्षा करते हैं। 5. सुंदरकांड या हनुमान अष्टक यदि समय हो, तो हनुमान अष्टक का पाठ करें। इसमें उनके द्वारा श्री राम और माता सीता के लिए किए गए कार्यों का वर्णन है। यह याद दिलाना कि उन्होंने कैसे माता सीता की सुध ली थी, आपकी भक्ति को सीधा बजरंगबली के हृदय तक पहुँचाता है। 6. सात्विकता और सेवा दिन भर अपनी वाणी में संयम रखें और किसी का अपमान न करें। हनुमान जी 'सेवा' के प्रतीक हैं, इसलिए दिन की शुरुआत में किसी जीव (जैसे बंदर या कुत्ते) को भोजन कराना भी उनकी और श्री राम की संयुक्त कृपा दिलाने वाला होता है।
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#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 ⁉️भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश युद्धभूमि में क्यों दिया ?⁉️ भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में दिया और वह भी तब,जब युद्ध की घोषणा हो चुकी थी,दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने आ गईं थीं। रणभेरी बज चुकी थी। क्यों ? भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश किसी ऋषि-मुनियों और विद्वानों की सभा या गुरुकुल में नहीं दिया,बल्कि उस युग के सबसे बड़े युद्ध ‘महाभारत’ की रणभूमि में किया। युद्ध अनिश्चितता का प्रतीक है, जिसमें दोनों पक्षों के प्राण और प्रतिष्ठा दाँव पर लगते हैं। युद्ध के ऐसे अनिश्चित वातावरण में मनुष्य को शोक,मोह व भय रूपी मानसिक दुर्बलता व अवसाद से बाहर निकालने के लिए एक उच्चकोटि के ज्ञान-दर्शन की आवश्यकता होती है; इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान वहीं दिया,जहां उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। 🛐श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं।🛐 गीता के उपदेश द्वारा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मन से मजबूत बना दिया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सामने कई बार ऐसे क्षण आए भी। अभिमन्यु की मृत्यु के समाचार से जब अर्जुन शोक और विषाद से भर गए, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्मरण कराया— ‘’यह युद्ध है, यह अपना मूल्य लेगा ही। युद्ध में सब कुछ संभव है।’ यह गीता के ज्ञान का ही परिणाम था कि अर्जुन दूसरे दिन एक महान लक्ष्य के संकल्प के साथ युद्धभूमि में आते हैं। महाभारत का युद्ध द्वापर के अंत में लड़ा गया था और कलियुग आने वाला था। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि कलियुग में मानव मानसिक रूप से बहुत दुर्बल होगा क्योंकि धर्म के तीनपैर-सत्य, तप और दान का कलियुग में लोप हो जाएगा। मनुष्य के पास सत्य, तप और दान का बल कम होगा। मनुष्य शोक और मोह से ग्रस्त होकर ऊहापोह की स्थिति-‘क्या करें,क्या न करें’ में भ्रमित रहेगा। उस समय गीता का ज्ञान ही जीवन-संग्राम में मनुष्य का पथ- प्रदर्शक होगा। ‼️जीवन-संग्राम में मनुष्य का सबसे बड़ा पथ-प्रदर्शक है गीता का ज्ञान!!!!!!‼️ आज मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही एक संग्राम है। मानव जीवन में छोटे-छोटे युद्ध (धन का अभाव, पारिवारिक कलह, बीमारी,बच्चों की अच्छी परवरिश,शिक्षा व विवाह आदि की चिंता, ऋण-भार आदि) नित्य ही चलते रहते हैं। जीवन का गणित ही कुछ ऐसा है कि जीवन सदा एक-सा नहीं रहता है। यहां जय-पराजय, लाभ-हानि, सुख-दु:ख का क्रम चलता ही रहता है। समय और परिस्थिति के थपेड़े हमें डांवाडोल करते ही रहते हैं। इस युद्ध में मनुष्य बुरी तरह से टूट कर आत्म हत्या जैसे गलत कदम भी उठा लेता है। गीता का ज्ञान मनुष्य यदि हृदय में उतार ले, तो फिर हर परिस्थिति का वह अर्जुन की तरह डट कर सामनाvकर सकता है- ▪️‘सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ अर्थात् सुख-दु:ख,लाभ-हानि, जय-पराजय-हर परिस्थिति में सम रह कर जीवन युद्ध लड़ो, समता का दृष्टिकोण अपना कर कर्तव्य पालन करो। ▪️‘जो पैदा हुआ है, वह मरेगा अवश्य।’ अत: मृत्यु के प्रति हमें स्वागत की दृष्टि विकसित कर लेनी चाहिए।’ यह जीवन-दर्शन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में जीकर भी दिखाया। जन्म से पूर्व ही मृत्यु उनका पीछा कर रही थी। कौन-से उपाय कंस ने श्रीकृष्ण को मरवाने के लिए नही किए ? परंतु हर बार मृत्यु उनसे हार गई। जब वे इस धराधाम को छोड़कर गए,तब भी संसार को यह सिखा दिया कि मृत्यु का स्वागत किस तरह करना चाहिए ? महाभारत युद्ध में बड़े-बड़े ब्रह्मास्त्रों और दिव्य अस्त्रों की काट अर्जुन को बताने वाले श्रीकृष्ण मृत्यु के वरण के लिए एक वृक्ष के नीचे जाकर लेट गए और पूरी प्रसन्नता और तटस्थता के साथ जरा व्याध के तीर का स्वागत किया और अपनी संसार- लीला को समेट लिया। ऐसा अद्भुत श्रीकृष्ण का चरित्र और वैसा ही उनका अलौकिक गीता का ज्ञान; जो सच्चे मन से हृदयंगम करने पर मनुष्य को जीवन-संग्राम में पग-पग पर राह दिखाता है और कर्तव्य-बोध कराता है। 🙏ॐ नमो नारायणाय★🙏
🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 - ShareChat