‼️दो बातें मूर्खता से होती हैं ‼️
1- दुःख तो दूसरे ने दे दिया‒
परो ददातीति और
2- सुख मैं अपने उद्योग से कर लेता हूँ ‒अहं करोमीति।
👩❤️👩अगर अपने उद्योग से सुख होता तो आज कोई दुःखी नहीं होता । दूसरे को दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता‒यह सिद्धान्त है । जो दुःख देने के लिये पीछे पड़ा है, उसको भयंकर पाप लगेगा और भयंकर दुःख भोगना पड़ेगा । परन्तु जिसको दुःख मिलता है, उसका तो *प्रारब्ध* है । सर्वसमर्थ और परम सुहृद् परमात्मा के जीते-जी कोई दुःख दे सकता है ? मैंने पहले भी एक बात सुनायी थी कि एक नगर के किनारे जंगल में एक बाबाजी बैठे भजन कर रहे थे । वहाँ से कई आदमी धन लूट करके भाग रहे थे । पुलिस पीछे पड़ी थी । उन्होंने देखा कि मारे जायँगे तो बाबजी के पास धन रखकर छिप गये । पुलिस वहाँ आयी और धन देखकर बाबाजी को मारने लगी । बाबाजी बोले‒ ‘बधूं तू जाणे छे’ ‘हे नाथ ! सब आप जानते हो’ । इसका अर्थ यह हुआ कि मैंने अपनी जानकारी में किसी को दुःख दिया नहीं और मार पड़ रही है तो मैं जानता नहीं कि किस कर्म का फल है । हे भगवन् ! आप ही जानो, हमारे को इसका पता नहीं है । बिना कसूर मार पड़ती है, इतने पर भी उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया । अतः जिसको मार पड़ती है, उसमें ऐसा धैर्य चाहिये । दूसरा बेचारा दुःख दे नहीं सकता, हम अपनी मूर्खता से दुःख पा रहे हैं । एक बात मैं और कहता हूँ । दुःख देने वाला दुःख दे नहीं सकेगा, प्रत्युत सुख देगा ! मैंने ऐसा देखा है । दूसरा करना चाहता है अनिष्ट और हमारा होता है इष्ट । यह मेरे अनुभव की बात है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि सुख-दुःख देने के लिये परिस्थिति के पास समय ही नहीं है ! वह बेचारी तो अपनी धुन में जा रही है, आपको छूती ही नहीं, फिर वह आपको सुख-दुःख कैसे दे सकती है । इसीलिये सत्संग से, सद्विचारों से, सद्भावों से आदमी सदा मस्त, मौज में रह सकता है; क्योंकि परिस्थिति दुःख देती है नहीं ।👩❤️👩 🧘दुःख तो उसको पकड़ करके आप कर रहे हो । अनुकूल परिस्थिति मिले तो उसमें आप सुख मान लेते हो और प्रतिकूल परिस्थिति मिले तो उसमें आप दुःख मान लेते हो, यह गलती होती है आपकी। वास्तव में परिस्थिति तो जा रही है बेचारी ! दिन-रात की तरह यह सुखदायी- दुःखदायी परिस्थिति आती रहेगी। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता रहता है, ऐसे ही सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता रहेगा।🧘
🛐मनुष्य के लिये कल्याण की बात खुली है। मनुष्य-शरीर केवल अपना कल्याण करने के लिये है, भोग भोगने के लिये नहीं‒ 🛐
*एहि तन कर फल बिषय न भाई।*( मानस ७/४४/१ )
🤹हमारे पास धन, सम्पत्ति, वैभव, बेटा, पोता, मकान आदि अनुकूल सामग्री है, तो इसको देखकर लोग कहते हैं कि यह बहुत सुखी है। हमारे पास सामग्री नहीं है; खाने को अन्न नहीं, पहनने को वस्त्र नहीं, रहने को मकान नहीं‒ऐसी दशा है तो इसको देखकर लोग कहते हैं कि यह बहुत दुःखी है। एक तो सुख-दुःख की यह परिभाषा है । 🤹
🧘दूसरी, जो मन में हरदम प्रसन्न रहता है, कभी दुःखी नहीं होता, उसको सुखी कहते हैं और जो मन में दुःखी रहता है, उसको दुःखी कहते हैं। *इस प्रकार एक तो सुख-सामग्री का नाम सुख है और दुःख-सामग्री का नाम दुःख है तथा एक हृदय में प्रसन्नता का नाम सुख है और हृदय में जलन का नाम दुःख है।* इनमें सामग्री वाला सुख-दुःख तो परिस्थिति का है और हृदय का सुख-दुःख मूर्खता का है। इस मूर्खता को मिटाने की खास जिम्मेवारी मनुष्य के ऊपर है। जैसे किसी भाषा का ज्ञान न हो तो उस अज्ञान को दूर करने के लिये हम वह भाषा सीख सकते हैं, ऐसे ही सुख-दुःख हमारे में है ही नहीं‒इस विद्या को मनुष्य मात्र सीख सकता है। इस ज्ञान के लिये ही मानव शरीर मिला है। अतः मानव शरीर में आकर सुखी-दुःखी नहीं होना है, प्रत्युत सुख-दुःख दोनों से ऊँचा उठना है। ऊँचा उठना क्या होता है ? कि न सुख ही पहुँचता और न दुःख ही पहुँचता है। पातञ्जलयोग दर्शन के व्यासभाष्य में एक श्लोक आया है :‒🧘
*प्रज्ञाप्रासादमारुह्याऽशोच्यः शोचतो जनान् ।*
*भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान्प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥*
( १/४७ का व्यासभाष्य )
✍️अर्थात् जैसे पर्वत पर खड़ा हुआ मनुष्य नीचे पृथ्वी पर खड़े लोगों को देखता है, ऐसे ही प्रज्ञा रूपी प्रासाद-( महल ) पर खड़ा हुआ अशोच्य पुरुष शोक करने वाले लोगों को देखता है।✍️
🧘समाधि-अवस्था में योगी की बुद्धि ऋतम्भरा अर्थात् सत्य को धारण करने वाली हो जाती है‒ *ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।* 🧘
( योगदर्शन १/४८ )
❣️विवेक-विचार से भी ऐसी बुद्धि प्राप्त हो जाती है। जैसे पृथ्वी पर कभी बाढ़ आती है, कभी आग लगती ही, कभी सुखदायी परिस्थिति आती है, कभी दुःखदायी परिस्थिति आती है, तरह-तरह की परिस्थितियाँ आती हैं, पर पर्वत पर खड़े हुए मनुष्य के पास उनमें से कोई भी परिस्थिति नहीं पहुँचती। वह केवल देखता है, सुखी-दुःखी नहीं होता। इसको सुख-दुःख से ऊँचा उठना कहते हैं और ऐसी स्थिति आपकी, हमारी सबकी हो सकती है।❣️
👩❤️👩हम जो सुखी-दुःखी होते हैं, यह हमारी गलती है। इसमें गलती क्या है ? लक्ष्मणजी ने अध्यात्म रामायण में निषादराज गुह से कहा है :‒👩❤️👩
*सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा ।*
*अहं करोमीति वृथाभिमानः स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोकः ॥*
( २/६/६ )
✍️सुख-दुःख को देने वाला दूसरा कोई नहीं है। दूसरा सुख-दुःख देता है‒यह समझना कुबुद्धि है । मैं करता हूँ‒यह वृथा अभिमान है। सब लोग अपने-अपने कर्मों की डोरी से बँधे हुए हैं। यही बात तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में भी आयी है :‒✍️
*काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।*
*निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥*
( मानस २/९२/२ )
🌷सुख-दुःख देने वाला दूसरा कोई नहीं है‒यह खास सूत्र है ! दूसरा दुःख देता है‒यह कुबुद्धि है, कुत्सित बुद्धि है, खोटी बुद्धि है । अमुक आदमी ने मेरे को दुःख दे दिया‒यह सिद्धान्त की दृष्टि से गलत है। इस विषय में एक बात तो यह है कि परमात्मा परम दयालु हैं, परम हितैषी हैं, अन्तर्यामी हैं और सर्वसमर्थ हैं। ऐसे परमात्मा के रहते हुए, उनकी जानकारी में कोई भी किसी को दुःख दे सकता है क्या ? दूसरी बात यह है कि अगर दूसरा दुःख देता है तो दुःख कभी मिटने का है ही नहीं; क्योंकि दूसरा तो कोई- न-कोई रहेगा ही। कहीं जाओ, किसी भी योनि में जाओ, देवता बन जाओ, राक्षस बन जाओ, असुर बन जाओ, भूत-प्रेत-पिशाच बन जाओ, मनुष्य बन जाओ, दूसरा रहेगा ही। फिर दुःख कैसे मिटेगा ? ये दोनों बातें बड़ी प्रबल हैं ।🌷
🪴हमारे सामने सुख और दुःख दोनों आते हैं। सुख-दुःख देने वाला दूसरा कोई नहीं है, प्रत्युत सब अपने किये हुए कर्मों के फल को भोगते हैं । पातञ्जलयोगदर्शन में लिखा है :‒🪴
*सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः।*
( २/१३ )
✍️अर्थात् पहले किये हुए कर्मों के फल से जन्म, आयु और भोग होता है। ✍️
⁉️भोग नाम किसका है ?⁉️ *अनुकूलवेदनीयं सुखम्, प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् और सुखदुःख अन्यतरः साक्षात्कारो भोगः।*
🧘अथात् सुखदायी और दुःखदायी परिस्थिति सामने आ जाय और उस परिस्थिति का अनुभव हो जाय, उसमें अनुकूल- प्रतिकूल की मान्यता हो जाय, इसका नाम ‘भोग’ है। अब एक बात बड़े रहस्य की, बहुत मार्मिक और काम की है। आप ध्यान दें । आपने अच्छा काम किया है तो सुखदायी परिस्थिति आपके सामने आयेगी और बुरा काम किया है तो दुःखदायी परिस्थिति आपके सामने आयेगी। यह तो है कर्मों की बात। 🧘
♦️अब परिस्थिति को लेकर सुखी-दुःखी होना केवल मूर्खता है। वह परमात्मा का विधान है, जो हमारे कर्मों का नाश करके हमें शुद्ध करने के लिये हुआ है । ♦️
🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀
#☝अनमोल ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
#जय श्री राम
।। श्री राम चालीसा ।।
आज मंगलवार का दिन दिन है। यह दिन राम भक्त हनुमान को समर्पित होता है, इसलिए इस दिन संकटमोचन हनुमान का पूजन और व्रत करने का विधान है। मान्यतानुसार जो साधक मंगलवार के दिन प्रभु श्रीराम और संकटमोचन का एक साथ पूजन करते हैं, उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ऐसे में अगर आप भी संकटमोचन हनुमान की कृपा पाना चाहते हैं तो मंगलवार के दिन विशेष तौर पर भगवान राम का पूजन, आरती और राम चालीसा का पाठ अवश्य करें। इससे हनुमान जी आपसे बेहद प्रसन्न होते हैं जिससे आपके जीवन के सारे कष्ट नष्ट हो जाते हैं और जीवन खुशहाली में बीतता है। अतः प्रस्तुत है पूरी राम चालीसा-
।। श्रीराम चालीसा ।।
दोहा-
आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं
बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्
पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणम्।।
चौपाई-
श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।
ता सम भक्त और नहिं होई।।
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।
ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं।।
जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।
सदा करो सन्तन प्रतिपाला।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।
जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना।।
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।
रावण मारि सुरन प्रतिपाला।।
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।
दीनन के हो सदा सहाई।।
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।
सदा ईश तुम्हरो यश गावैं।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी ।
तुम भक्तन की लज्जा राखी।।
गुण गावत शारद मन माहीं ।
सुरपति ताको पार न पाहीं।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई ।
ता सम धन्य और नहिं होई।।
राम नाम है अपरम्पारा ।
चारिहु वेदन जाहि पुकारा।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों।
तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों।।
शेष रटत नित नाम तुम्हारा।
महि को भार शीश पर धारा।।
फूल समान रहत सो भारा ।
पावत कोउ न तुम्हरो पारा।।
भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।
तासों कबहुँ न रण में हारो।।
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।
सुमिरत होत शत्रु कर नाशा।।
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।
सदा करत सन्तन रखवारी।।
ताते रण जीते नहिं कोई ।
युद्ध जुरे यमहूँ किन होई।।
महा लक्ष्मी धर अवतारा ।
सब विधि करत पाप को छारा।।
सीता राम पुनीता गायो ।
भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो।।
घट सों प्रकट भई सो आई ।
जाको देखत चन्द्र लजाई।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत ।
नवो निद्धि चरणन में लोटत।।
सिद्धि अठारह मंगल कारी ।
सो तुम पर जावै बलिहारी।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई ।
सो सीतापति तुमहिं बनाई।।
इच्छा ते कोटिन संसारा ।
रचत न लागत पल की बारा।।
जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।
ताको मुक्ति अवसि हो जावै।।
सुनहु राम तुम तात हमारे ।
तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे ।
तुम गुरु देव प्राण के प्यारे।।
जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।
जय जय जय प्रभु राखो लाजा।।
रामा आत्मा पोषण हारे ।
जय जय जय दशरथ के प्यारे।।
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।
निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा।।
सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।
सत्य सनातन अन्तर्यामी।।
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।
सो निश्चय चारों फल पावै।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।
तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं।।
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।
नमो नमो जय जापति भूपा।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।
नाम तुम्हार हरत संतापा।।
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।
बजी दुन्दुभी शंख बजाया।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।
तुमहीं हो हमरे तन मन धन।।
याको पाठ करे जो कोई ।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई।।
आवागमन मिटै तिहि केरा ।
सत्य वचन माने शिव मेरा।।
और आस मन में जो ल्यावै ।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै।।
साग पत्र सो भोग लगावै ।
सो नर सकल सिद्धता पावै।।
अन्त समय रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई।।
श्री हरि दास कहै अरु गावै ।
सो वैकुण्ठ धाम को पावै।।
दोहा-
सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ।।
राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय।।
।। जय भगवान श्री सीताराम
#👉 लोगों के लिए सीख👈 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
।। सुखों की परछाई ।।
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एक रानी अपने गले का हीरों का हार निकाल कर खूंटी पर टांगने वाली ही थी कि एक बाज आया और झपटा मारकर हार ले उड़ा.
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चमकते हीरे देखकर बाज ने सोचा कि खाने की कोई चीज हो. वह एक पेड़ पर जा बैठा और खाने की कोशिश करने लगा.
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हीरे तो कठोर होते हैं. उसने चोंच मारा तो दर्द से कराह उठा. उसे समझ में आ गया कि यह उसके काम की चीज नहीं. वह हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ उड़ गया.
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रानी को वह हार प्राणों सा प्यारा था. उसने राजा से कह दिया कि हार का तुरंत पता लगवाइए वरना वह खाना-पीना छोड़ देगी. राजा ने कहा कि दूसरा हार बनवा देगा लेकिन उसने जिद पकड़ ली कि उसे वही हार चाहिए.
सब ढूंढने लगे पर किसी को हार मिला ही नहीं. रानी तो कोप भवन में चली गई थी. हारकर राजा ने यहां तक कह दिया कि जो भी वह हार खोज निकालेगा उसे वह आधे राज्य का अधिकारी बना देगा.
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अब तो होड़ लग गई. राजा के अधिकारी और प्रजा सब आधे राज्य के लालच में हार ढूंढने लगे.
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अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा. हार दिखाई दे रहा था, पर उसमें से बदबू आ रही थी लेकिन राज्य के लोभ में एक सिपाही कूद गया.
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बहुत हाथ-पांव मारा, पर हार नहीं मिला. फिर सेनापति ने देखा और वह भी कूद गया. दोनों को देख कुछ उत्साही प्रजा जन भी कूद गए. फिर मंत्री कूदा.
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इस तरह जितने नाले से बाहर थे उससे ज्यादा नाले के भीतर खड़े उसका मंथन कर रहे थे. लोग आते रहे और कूदते रहे लेकिन हार मिला किसी को नहीं.
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जैसे ही कोई नाले में कूदता वह हार दिखना बंद हो जाता. थककर वह बाहर आकर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता.
आधे राज्य का लालच ऐसा कि बड़े-बड़े ज्ञानी, राजा के प्रधानमंत्री सब कूदने को तैयार बैठे थे. सब लड़ रहे थे कि पहले मैं नाले में कूदूंगा तो पहले मैं. अजीब सी होड़ थी.
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इतने में राजा को खबर लगी. राजा को भय हुआ कि आधा राज्य हाथ से निकल जाए, क्यों न मैं ही कूद जाऊं उसमें ? राजा भी कूद गया.
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एक संत गुजरे उधर से. उन्होंने राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही सबको कीचड़ में सना देखा तो चकित हुए.
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वह पूछ बैठे- क्या इस राज्य में नाले में कूदने की कोई परंपरा है ? लोगों ने सारी बात कह सुनाई.
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संत हंसने लगे, भाई ! किसी ने ऊपर भी देखा ? ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है. नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है. राजा बड़ा शर्मिंदा हुआ.
हम सब भी उस राज्य के लोगों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. हम जिस सांसारिक चीज में सुख-शांति और आनंद देखते हैं दरअसल वह उसी हार की तरह है जो क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है।
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*हम भ्रम में रहते हैं कि यदि अमुक चीज मिल जाए तो जीवन बदल जाए, सब अच्छा हो जाएगा. लेकिन यह सिलसिला तो अंतहीन है.
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सांसारिक चीजें संपूर्ण सुख दे ही नहीं सकतीं. सुख शांति हीरों का हार तो है लेकिन वह परमात्मा में लीन होने से मिलेगा. बाकी तो सब उसकी परछाई है।
#तीर्थ स्थल
प्रश्न:मनुष्य तीर्थ पर जाकर भी लड़ाई झगड़ा करता है और नशे करता है तो क्या उसे तीर्थ स्थल पर जाने का लाभ मिलता है???
उत्तर:मेरे उत्तर ऐसे होते हैं कि उससे बड़ा विरोधाभास उत्पन्न होने की संभावना रहती है क्योंकि मन को अच्छा लगने वाले उत्तर दे पाना बड़ा कठिन होता है क्योंकि ऐसा करने के लिए सत्य को अंतर्ध्यान करना पड़ता है।।
ये तीर्थ पर जाते धार्मिक स्थलों पर घूमते मंदिरों में भीड़ किए हुए कहीं से भी धार्मिक नहीं है अपितु देखा देखी जाने के प्रचलन को अपनाए हुए हैं।।अब कोई कपटी श्रीकाशी में जाएगा तो भी वह कपटी ही रहेगा।।
मान लीजिए कि आप ही दुष्ट प्रवृत्ति के हैं और हरिद्वार चले गए हैं तो भी आप तो आप ही रहेंगे न कुछ और तो नहीं हो जाएंगे।।
श्री काशी अथवा अयोध्या में जाने पर भी आपको कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि यदि वहां जाने मात्र से कुछ मिल रहा होता तो श्री अयोध्या के मंदिर के कर्मचारी चोर नहीं होते और समस्त स्थान पर इनकी खिल्ली न उड़ रही होती।।चोर वैश्यालय में रहे कि मंदिर में चोर तो चोर ही रहेगा।।
इसीलिए जीवन में सदगुरू की आवश्यकता होती है क्योंकि परिवर्तन पहले अंदर करना होता है उसके पश्चात बाहर परिवर्तन होता है।।
यदि अपने अंदर मर्यादा पुरुषोत्तम को अनुभव न कर पाए तो बाहर कहीं भी चले जाओ कोई मिलने वाला नहीं है क्योंकि जो श्री काशी में है वह तो हमारे अंदर भी है।।
आपके अंदर एक आप रहते हैं और एक आप का बाप रहता है।।
कोई ऐसा मनुष्य जो अपने अंदर झांक पाया हो और वह जब अयोध्या में जाता है तो उसको अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम साक्षात विराजमान मिलते हैं और यह बड़ी गहरी बात है और जितनी गहरी है उतनी ही सत्य भी है।।
नशा करने वाला किसी स्थान पर जाए तो नशे की दुकान ढूंढ लेता है और भक्त किसी स्थान पर जाए तो मंदिर ढूंढ लेता है क्योंकि एक के भीतर नशा है और एक के अंदर मंदिर है।।
जो भीतर होता है न वही बाहर होता है।।
संसार बाहर नहीं अपितु भीतर होता है।।वेद का प्रमाण है चित एव ही संसारा।।
अतः भावनाओं में बहकर और देखा देखी कहीं जाओ तो वहां जाकर बड़े ध्यान से देखो तो पाओगे कि वहां रहने वाले भी इसी तरह के कपटी और दुष्ट हैं।।
जिसके भीतर प्रकाश है उससे मिलोगे तो पाओगे कि वह जहां जा रहा है वहां भी उसे प्रकाश ही दिखाई दे रहा है।।
जिसके मन में राम हो उसे बाहर भी राम ही दिखाई देते हैं।।
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कहा है न
सिया राम मय सब जग जानी
चूंकि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के अंदर रोम रोम में राम है अतः गोस्वामी जी को हर स्थान पर राम ही दिखाई दे रहे हैं।।
चोर और दुष्ट के मन में कपट और दुष्टता है अतः हर स्थान पर कपट और दुष्टता ही देखेगा और अवसर मिलने पर ऐसा ही करेगा।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है किसी की भावना आहत हुई हो तो मैं अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूं किन्तु किसी की भावना आहत न हो इसके लिए असत्य लिखना मेरे वश में नहीं है।।
यही तत्व ज्ञान का प्रथम अध्याय भी है।।
जान सके तो जान।।
जय भोलेनाथ 🙏 जय जगन्नाथ 🙏
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक२३४
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अरण्यकाण्ड
चौंतीसवाँ सर्ग
रावणके पूछनेपर शूर्पणखाका उससे राम, लक्ष्मण और सीताका परिचय देते हुए सीताको भार्या बनानेके लिये उसे प्रेरित करना
शूर्पणखाको इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—॥१॥
'राम कौन है? उसका बल कैसा है? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्यमें उसने किस लिये प्रवेश किया है?॥२॥
'रामके पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्धमें खर, दूषण और त्रिशिराका भी संहार हो गया॥३॥
'मनोहर अङ्गोंवाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?' राक्षसराज रावणके इस प्रकार पूछनेपर वह राक्षसी क्रोधसे अचेत-सी हो उठी॥४॥
तदनन्तर उसने श्रीरामका यथावत् परिचय देना आरम्भ किया—'भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथके पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी-बड़ी और रूप कामदेवके समान है। वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं॥५½॥
'श्रीराम इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल धनुषको, जिसमें सोनेके छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पोके समान तेजस्वी नाराचोंकी वर्षा करते हैं॥६½॥
'वे महाबली राम युद्धस्थलमें कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथमें लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं—यह मैं नहीं देख पाती थी॥७½॥
'उनके बाणोंकी वर्षासे राक्षसोंकी सेना मर रही है—इतना ही मुझे दिखायी देता था। जैसे इन्द्र (मेघ) द्वारा बरसाये गये ओलोंकी वृष्टिसे अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार रामके बाणोंसे राक्षसोंका विनाश हो गया॥८½॥
'श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त (तीन घड़ी) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसोंका तीखे बाणोंसे संहार कर डाला, ऋषियोंको अभय दे दिया और समस्त दण्डकवनको राक्षसोंकी विघ्न-बाधासे रहित कर दिया॥९-११॥
'आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामने स्त्रीका वध हो जानेके भयसे एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया॥१२॥
'उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रममें उन्हींके समान है। उसका नाम है लक्ष्मण। वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाईका प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल-विक्रमसे सम्पन्न है। श्रीरामका वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरनेवाला प्राण है॥१३-१४॥
'श्रीरामकी धर्मपत्नी भी उनके साथ है। वह पतिको बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामीका प्रिय तथा हित करनेमें ही लगी रहती है। उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्रके समान मनोरम है॥१५॥
'उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं। वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डकवनकी देवी-सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मीके समान शोभा पाती है॥१६॥
'उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्णकी कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं। वह शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है। वह विदेहराज जनककी कन्या है और सीता उसका नाम है॥१७॥
'देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरोंकी स्त्रियोंमें भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है। इस भूतलपर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी॥१८॥
'सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्षमें भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकोंमें उसीका जीवन इन्द्रसे भी अधिक भाग्यशाली है॥१९॥
'उसका शील-स्वभाव बड़ा ही उत्तम है। उसका एक-एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है। उसके रूपकी समानता करनेवाली भूमण्डलमें दूसरी कोई स्त्री नहीं है। वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे॥२०॥
'महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचोंवाली उस सुमुखी स्त्रीको जब मैं तुम्हारी भार्या बनानेके लिये ले आनेको उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मणने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया॥२१½॥
'पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीताको देखते ही तुम कामदेवके बाणोंके लक्ष्य बन जाओगे॥२२½॥
'यदि तुम्हें सीताको अपनी भार्या बनानेकी इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीरामको जीतनेके लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ॥२३॥
'राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो निःशङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो॥२४॥
'महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदिकी असमर्थता और अपनी शक्तिका विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीताको अपनी भार्या बनानेका प्रयत्न करो (उसे हर लाओ)॥२५॥
'श्रीरामने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरोंको मार डाला और खर तथा दूषणको भी मौतके घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये'॥२६॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३४॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
#भक्ति
🌹 भावपूर्ण चिंतन 🌹
🛐भगवान् चेत कराते हैं..🛐
"प्रिय! यह सोने का समय नहीं, यह तो मेरे स्मरण का समय है।"
एक बड़े विरक्त सन्त थे। वे नाम जपते थे। कौड़ी-पैसा लेते नहीं थे, रखते नहीं थे, छूते ही नहीं थे। वे कहते थे कि बहुत बार ऐसा होता है, जब मैं सोता हूँ तो भगवान मुझे ऐसे प्यार से उठाते हैं, जैसे कोई माँ उठाती हो। गरदन के नीचे हाथ देकर चट उठा देते हैं। मेरे को पता ही नहीं लगता कि न जाने किसने मेरे को बैठा दिया। तो नाम महाराज भगवान् की याद दिलाते हैं। मैं खुद अनुमान करता हूँ, आपमें भी कोई नाम-प्रेमी है,उसके साथ भी ऐसा होता होगा। इसमें कोई गृहस्थ का कारण नहीं है, कोई साधु का कारण नहीं है, कोई भाई का कारण नहीं, कोई बहिन का कारण नहीं। कोई भी भाई- बहिन इसका जप करेंगे, उसके भी यह बात हो जायगी। 🛐
🙏कभी भगवान् की आवाज आ जाती है। आप कभी पाठ, जप करते हैं। भगवान् के भजन में लगे हैं, मन में जपने की लगन है और आपको कहीं नींद आने लगेगी तो किवाड़ जोर से पड़ाक से पटकेगा, जैसे कोई हवा आ गयी हो अथवा कोई हल्ला करेगा तो आपकी नींद खुल जायगी। कोई अचानक ऐसा शब्द होगा तो चट नींद खुल जायगी। यह तो नाम महाराज चेताते हैं, भगवान् चेत कराते हैं कि सोते कैसे हो ?
नाम जपते हो कि नींद ले रहे हो ? भगवान् बड़ी भारी मेहनत करके, आपके ऊपर कृपा करके आपकी निगरानी रखते हैं, आप शरण हो तो जाओ।🙏
🧘नाम जपते-जपते यदि आँखें झुकने लगें और अचानक कोई आवाज़ आकर जगा दे, तो यह भी सोचो—
"कहीं मेरे श्यामसुन्दर ने ही तो नहीं पुकारा? कहीं मेरे ठाकुर जी ने ही तो नहीं कहा— 'अभी सो मत, थोड़ी देर और मेरा नाम ले ले।'"🧘
🕉️भगवान् की कृपा केवल बड़े-बड़े चमत्कारों में नहीं होती, बल्कि ऐसे सूक्ष्म संकेतों में भी होती है। जो शरणागत हो जाता है, उसके लिए भगवान् स्वयं प्रहरी बन जाते हैं।🕉️
🙏 राम नाम का पहरा लगा है, फिर डर कैसा? जो नाम के हो गए, उनकी चिंता स्वयं भगवान् करते हैं। 🙏
*राम ! राम !! राम !!!
#☝अनमोल ज्ञान
वेदवती की कहानी
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वेदवती की कहानी रामायण के उत्तर कांड में वर्णित है। वे माँ सीता का पूर्व जन्म मानी जाती हैं। उनकी कहानी त्याग, तपस्या और प्रतिशोध की एक अद्भुत गाथा है।
1. जन्म और पृष्ठभूमि
वेदवती ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री थीं। उनका नाम 'वेदवती' इसलिए पड़ा क्योंकि वे जन्म के समय ही वेदों का पाठ कर रही थीं। उनके पिता चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह केवल भगवान विष्णु से हो, क्योंकि वे उन्हें ही साक्षात लक्ष्मी का रूप मानते थे।
2. कठोर तपस्या
वेदवती के पिता की हत्या एक दैत्य (शंभु) ने कर दी थी। अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए, वेदवती ने सांसारिक मोह त्याग दिया और भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए हिमालय में घोर तपस्या करने लगीं। वे जटाधारी बन गईं और केवल तप में लीन रहने लगीं।
3. रावण से सामना
एक दिन लंकापति रावण वहां से गुजर रहा था। तपस्या में लीन वेदवती के अनुपम सौंदर्य को देखकर वह उन पर मोहित हो गया। रावण ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और उनके तप का उपहास उड़ाया।
जब वेदवती ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया, तो अहंकारी रावण ने बलपूर्वक उनके बाल पकड़ लिए और उनके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की।
4. वेदवती का शाप और आत्मदाह
रावण के स्पर्श से वेदवती स्वयं को अपवित्र महसूस करने लगीं। उन्होंने अपने योग बल से अपने बाल काट दिए और क्रोध में आकर रावण को शाप दिया:
"हे दुष्ट! तूने मेरा अपमान किया है। अब इस शरीर को रखने का कोई अर्थ नहीं है, लेकिन मैं फिर से जन्म लूंगी और तेरे विनाश का कारण बनूंगी।"
इतना कहकर उन्होंने अपने योग की शक्ति से अग्नि प्रज्ज्वलित की और उसमें समाहित हो गईं (आत्मदाह कर लिया)।
5. सीता के रूप में पुनर्जन्म
यही वेदवती अगले जन्म में सीता के रूप में प्रकट हुईं। वे राजा जनक को हल चलाते समय भूमि से प्राप्त हुईं। अंततः, रावण द्वारा माता सीता का अपहरण ही उसके और उसके पूरे साम्राज्य के विनाश का मुख्य कारण बना। इस प्रकार वेदवती ने अपना वचन और शाप पूरा किया।
एक रोचक तथ्य: 'माया सीता' की कथा
कुछ पुराणों (जैसे अद्भुत रामायण) में यह भी कहा गया है कि रावण जिस सीता का अपहरण करके ले गया था, वह असल में माया सीता (वेदवती की आत्मा) थीं। अग्नि देव ने असली सीता की रक्षा की थी और वेदवती को उनके स्थान पर भेज दिया था ताकि वे रावण से अपना बदला ले सकें।
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#🪔ज्येष्ठ माह का आज आखिरी बड़ा मंगल📿 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
⁉️शरीर बीमार रहता है । यदि शरीर को ठीक करने की कामना न करें तो न भजन होगा, न सेवा होगी ?⁉️
🛐*यह बिल्कुल गलत बात है ! भजन शरीर के अधीन नहीं है । केवल नाम जप ही भजन नहीं है । भगवान् मेरे हैं‒यह भी भजन है । सेवा भाव के अधीन है, पदार्थ के अधीन नहीं । असली भजन है‒भगवान् प्यारे लगें, मीठे लगें ।🛐
*पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन ।*
*अस बिचारि मुनि पुनि पुनि करत राम गुन गान ॥*
(मानस, अरण्य॰ १० में पाठभेद)
⁉️इसमें बीमारी क्या बाधा देगी ? माँ मेरी है तो क्या शरीर बीमार होने पर माँ मेरी नहीं है ?
परमात्मा को याद मात्र करने से पूर्णता हो जाती है‒‘यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते........’ (महाभारत, अनुशासन॰ १४९) ! इतनी सस्ती कोई चीज नहीं है ! एक परमात्मा ही इतने सस्ते हैं कि याद करने मात्र से मिल जायँ । उनको हरदम याद रखो । परमात्मा के अंश होने के कारण सब जीवों का परमात्मा पर समान अधिकार है । सबको परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है । हरदम एक ही बात कहो कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’ । याद रखने की शक्ति भी भगवान् से ही मिलेगी । एक भगवान् को याद करने से आपके लौकिक और पारमार्थिक सब काम स्वतः- स्वाभाविक सिद्ध हो जायँगे । भागवत में साफ आया है‒⁉️
*अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।*
*तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥*
(श्रीमद्भा॰ २ । ३ । १०)
👩❤️👩‘जो बुद्धिमान् मनुष्य है, वह चाहे सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हो, चाहे सम्पूर्ण कामनाओं से युक्त हो, चाहे मोक्ष की कामना वाला हो, उसे तो केवल तीव्र भक्तियोग के द्वारा परमपुरुष भगवान् का ही भजन करना चाहिये ।’👩❤️👩
🧘*अगर आप कुछ नहीं चाहते हो तो भगवान् को याद करो । अगर आप मुक्ति, कल्याण चाहते हो तो भगवान् को याद करो । अगर आप सब कुछ चाहते हो तो भगवान् को याद करो । एक भगवान् में लग जाओ तो सब काम सिद्ध हो जायगा‒‘एकै साधे सब सधै !’ भगवान् को याद करने से कुछ बाकी नहीं रहेगा । आपकी सब तरह की अशुद्धि, अशान्ति सदा के लिये मिट जायगी ।* 🧘
#पौराणिक कथा #☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩
पुराणों में १६ मुख्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। किसी एक व्यक्ति में सभी १६ सिद्धियों का होना दुर्लभ है। केवल अवतारी पुरुष, जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि अथवा बहुत सिद्ध ऋषियों जैसे सप्तर्षियों में ये सारी सिद्धियाँ हो सकती है। इसे १६ कलाओं से भी जोड़ कर देखा जाता है। आइये इन सिद्धियों के विषय में कुछ जानते हैं:
वाक् सिद्धि: ऐसी सिद्धि जिससे वो व्यक्ति जो कुछ भी कहे वो घटित हो जाये। पुराने काल में सिद्ध ऋषि-मुनियों में ये सिद्धि होती थी और इसी कारण वे श्राप या वरदान देने में सक्षम थे। सिर्फ सिद्ध ऋषि ही नहीं, कुछ असाधारण व्यक्तियों में भी ऐसी शक्तियां होती थी। जैसे शांतनु ने अपने पुत्र भीष्म को इच्छा मृत्यु और और द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को चिरंजीवी होने का वरदान दिया। कई बार जब व्यक्ति अपने चरम आवेग में होता है तब भी उसके मुख से निकली हुई बात सच हो जाती है।
दिव्य दृष्टि: दिव्य दृष्टि उस शक्ति को कहते हैं जिससे आप किसी भी व्यक्ति के भूत, वर्तमान एवं भविष्य का ज्ञान हो जाये। दिव्य दृष्टि और त्रिकालदर्शी होने में अंतर है। दिव्य दृष्टि में सभी कुछ आँखों के सामने होता दीखता है चाहे वो कही भी घटित हो रहा हो। पुराने ज़माने में सिद्ध ऋषियों के पास ये सिद्धि होती थी। श्रीकृष्ण ने गीताज्ञान के लिए अर्जुन को और महर्षि व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। सभी प्रमुख देवताओं और सप्तर्षियों में ये सिद्धि स्वाभाविक रूप से होती है।
प्रज्ञा सिद्धि: इस सिद्धि के साधक के पास संसार का सारा ज्ञान होता है। वो ज्ञान, प्रज्ञा, स्मरणशक्ति, बुद्धि इत्यादि को अपनी बुद्धि में समेत लेता है। इसका एक उदाहरण महर्षि व्यास हैं जिन्होंने महाभारत जैसे महान ग्रन्थ की रचना की जिसके बारे में ये कहा गया है कि जो कुछ भी यहाँ है वो संसार में है और जो यहाँ नहीं वो संसार में कही नहीं है। इसके अतिरिक्त श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी इस संसार के सभी चीजों का ज्ञान था। उनके अतिरिक्त पितामह भीष्म का ज्ञान भी अथाह था।
दूरश्रवण: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक कही भी हो रहे किसी भी वार्तालाप को सुन सकता है। इसके अतिरिक्त तो वार्तालाप भूतकाल में हो चुका हो उसे भी अगर पुनः सुनना चाहे तो वो सुन सकता है। सिद्ध ऋषियों में ये सिद्धि हुआ करती थी। महावीर हनुमान के पास भी ये सिद्धि थी। कुछ मायावी राक्षसों के पास भी ऐसी सिद्धियाँ होती थी।
जलगमन: इस सिद्धि को प्राप्त साधक जल पर ऐसे ही विचरण कर सकता है जैसे वो भूमि पर विचरण करता है। सिद्ध ऋषियों के पास ये सिद्धि होती थी। महर्षि अगस्त्य ने तो समुद्र पर खड़े होकर उसका पान कर लिया था। अधिक दूर क्यों जाएँ, आज से १०० वर्ष पहले भी ऐसे कई सिद्ध पुरुष थे जिनके पास ये सिद्धियाँ हुआ करती थी और वे जल में स्वच्छद विचरण कर सकते थे।
वायुगमन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक वायुमार्ग से कही भी जा सकता है। वे अपने रूप को सूक्ष्म बना कर एक लोक से दूसरे लोक में भी गमन कर सकता है। उनकी गति इतनी तीव्र होती है कि वे तत्काल ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं। बजरंगबली इस सिद्धि के एक जीवंत उदाहरण हैं। उनके अतिरिक्त मायावी राक्षसों में भी ये सिद्धि हुआ करती थी। मेघनाद ने इस सिद्धि के बल पर आकाश में रह कर लक्ष्मण से युद्ध किया था।
अदृश्यकरण: जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपने आप को अदृश्य कर सकता है और उसी रूप में किसी भी स्थान पर जा सकता था। मायावी राक्षसों के पास ये सिद्धि हुआ करती थी। इसी सिद्धि के बल पर रावण के पुत्र मेघनाद ने अदृश्य होकर लक्ष्मण से युद्ध किया था और श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था। इसके अतिरिक्त कई सिद्ध ऋषि अदृश्य होकर विभिन्न स्थानों पर विचरण कर सकते थे।
विषोका: इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपने आप को अनेक रूप में परिवर्तित कर सकता है। ऐसा व्यक्ति एक स्थान पर किसी एक रूप में और दूसरे स्थान पर किसी अन्य रूप में उपस्थित रह सकते हैं। आधुनिक काल में ऐसे व्यक्तियों को ऐय्यार कहा जाता है। राक्षसों में ये सिद्धि हुआ करती थी। श्रीकृष्ण ने अपनी माया से ऐसा कई बार किया था जब वे एक ही समय पर कई स्थानों पर उपस्थित रहते थे। इस सिद्धि के बल पर श्रीकृष्ण एक साथ अपनी १६१०८ रानियों के साथ उपस्थित रहते थे।
देवक्रियानुदर्शन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक विभिन्न देवताओं का सानिध्य प्राप्त कर सकता है। यही नहीं वो देवताओं को अपने अनुकूल बना कर उनसे उचित सहयोग ले सकता है। हमारे पुराणों में कई महान ऋषि हुए हैं जो अपनी इच्छा अनुसार देवताओं से मिल सकते हैं। दुर्वासा, भृगु, वशिष्ठ इत्यादि ऐसे कई ऋषि इसके उदाहरण हैं।
कायाकल्प: कायाकल्प का अर्थ होता है "शरीर परिवर्तन"। इस सिद्धि को पूर्ण रूप से प्राप्त करने के बाद सहक कभी बूढा नहीं होता। यदि उसका शरीर वृद्ध एवं जर्जर भी है तब भी इस सिद्धि के बल पर वो पुनः अपने आप को युवा बना सकता है। ऐसे कई ऋषि थे जिन्होंने अपने वृद्ध आयु को छोड़ कर यौवन को पुनः प्राप्त किया। कई ऐसे ऋषि हैं जो अजर हैं, अर्थात जिनपर बुढ़ापे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
सम्मोहन: ये बहुत प्रसिद्ध सिद्धि है जिससे साधक किसी को भी अपने अनुकूल कर सकता है और उनसे जो भी चाहे वो करवा सकता है। मनुष्य तो मनुष्य, इस सिद्धि को प्राप्त साधक पशु-पक्षियों को भी अपने अनुकूल कर सकता था। इसे वशीकरण विद्या भी कहते हैं। रावण वशीकरण विद्या में माहिर था। नाग जाति के लोगों में स्वाभाविक रूप से समोहन की सिद्धि होती थी। यहाँ तक कि आधुनिक काल में भी ऐसे कई कई सिद्ध पुरुष हुए हैं जो किसी को भी सम्मोहित कर सकते थे।
गुरुत्व: गुरुत्व सिद्धि प्राप्त होने पर मनुष्य गरिमावान हो जाता है। प्राचीन का काल में गुरु का पद अत्यंत महान माना जाता था। यहाँ तक कि ये कहा गया है कि गुरु ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर के सामान है। देवताओं के गुरु बृहस्पति एवं दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को सर्वश्रेष्ठ गुरु के रूप में मान्यता प्राप्त है। उनके अतिरिक्त वशिष्ठ, परशुराम एवं द्रोण के गुरुत्व की भी बहुत ख्याति है। भगवान शंकर को जगतगुरु कहा गया है।
पूर्ण पुरुषत्व: इस सिद्धि को प्राप्त कर साधक बचपन में भी अपने पूर्ण पुरुषत्व एवं शक्ति को प्राप्त कर सकता है। श्रीराम एवं श्रीकृष्ण में ये सिद्धि बाल्यकाल से ही विद्यमान थी। इसी सिद्धि के बल पर श्रीकृष्ण ने बचपन में ही पूतना, भौमासुर इत्यादि कई दैत्यों का वध कर दिया। १६ वर्ष की आयु में ही उन्होंने चाणूर, मुष्टिक एवं कंस जैसे महावीरों का वध कर दिया। पांडवों में भीम के पास भी ये सिद्धि थी। यही कारण था कि वे अपने बाल्यकाल में भी अपराजेय थे। श्रीराम के पुत्र लव और कुश ने भी इसी सिद्धि के बल पर अपने बचपन में ही पूरी अयोध्या की सेना को परास्त कर दिया।
सर्वगुणसंपन्न: कुछ ऐसे उत्तम पुरुष होते हैं जिनमे संसार के सभी उत्कृष गुण समाहित होते हैं। ऐसे व्यक्ति को सर्वगुणसम्पन्न कहा जाता है। श्रीराम इस के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। संसार में ऐसा कोई भी उत्तम गुण नहीं था जो उनमे नाम हो। इसीलिए श्रीराम को "पुरुषोत्तम" कहा जाता है। कई ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जिनमे ये सिद्धि थी। सीता एवं द्रौपदी ऐसी ही स्त्रियाँ थी जो सर्वगुणसम्पन्न थी। इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक की प्रसिद्धि पूरे विश्व में फ़ैल जाती है और वो अपने इन गुणों का प्रयोग लोक कल्याण के लिए करते हैं।
इच्छा मृत्यु: जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपनी इच्छानुसार अपनी मृत्यु का चुनाव कर सकता है। अर्थात उनकी इच्छा के बिना स्वयं काल भी उन्हें छू नहीं सकता है। यही नहीं, वो अपनी इच्छा अनुसार एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर सकता है। इच्छा मृत्यु की सिद्धि प्राप्त व्यक्तियों में सबसे प्रसिद्ध पितामह भीष्म हैं। उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था। वे वैसे ही एक अजेय योद्धा थे और उनकी इच्छा मृत्यु की सिद्धि के कारण उनकी मृत्यु और पराजय असंभव थी। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को स्वयं पितामह से उनकी मृत्यु का उपाय पूछने को कहा। जब अर्जुन ने उन्हें अपने बाणों की शैय्या पर बांध दिया तब अपनी इसी सिद्धि के बल पर भीष्म युद्ध के पश्चात भी उसी शर-शैय्या पर ५८ दिनों तक जीवित रहे थे। उसके बाद जब भगवान सूर्य नारायण उत्तरायण को आये, भीष्म ने अपनी इच्छा अनुसार अपने शरीर का त्याग कर दिया।
अनुर्मि: इस सिद्धि को प्राप्त व्यक्ति पर सृष्टि की किसी भी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा व्यक्ति भूक-प्यास, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, भावना-दुर्भावना इत्यादि से परे होता है। उसके लिए जीवन एवं मृत्यु सामान होती है और संसार के सभी योनि के जीव उनके लिए सामान होते हैं। जो सिद्ध पुरुष ईश्वर का वास्तविक स्वरुप जान लेते हैं वो स्वाभाविक रूप से इस सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ने भी गीता में अर्जुन को इस ज्ञान को देने का प्रयास किया है।
#🪔ज्येष्ठ माह का आज आखिरी बड़ा मंगल📿
🛐नाम लेना लिखा नहीं है।🛐 👩❤️👩सज्जनो ! अभी नाम जप कर के नाम लिखा लो, इसमें देरी का काम नहीं है। इसका दफ्तर हर समय खुला है, कभी करो। दिन में, रात में, सुबह में, शाम में, सम्पत्ति में, विपत्ति में, सुख में, दुःख में आप भगवान् का नाम लें तो अभी आपका नाम लिखा जायगा और नाम की पूँजी हो जायगी। अब नाम को भूल न जायँ, इसका खयाल रखना है। उसके लिये एक उपाय बतायें। आप लोग ध्यान देकर सुनें। आप लोग मन-ही-मन भगवान् को प्रणाम करके उनसे यह प्रार्थना करें- 'हे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं, हे प्रभो! आपको मैं भूलूँ नहीं' - ऐसा मिनट मिनट, आधे- आधे मिनट में आप कहते रहो। नींद खुले तब से लेकर गाढ़ी नींद न आ जाय तब तक 'हे प्रभो ! आपको मैं भूलूँ नहीं।' ऐसा कहते रहो। राम-राम- राम कहते हुए साथ में कह दें- 'हे नाथ! मैं भूलूँ नहीं।'👩❤️👩
🧘जब आप राम-राम-राम कह रहे हैं, राम-राम-राम कहते हुए भी मन से दूसरी बात याद आ जाती है, उस समय हम भगवान् को भूल जाते हैं तो भगवान् से कहो- ' हे नाथ! मैं भूलूँ नहीं, हे प्रभो! भूलूँ नहीं। हे नाथ! मैं आपका नाम लेता रहूँ और आपको भूलूँ नहीं।' भगवान् से ऐसी प्रार्थना करते रहो तो भगवान् की कृपा से यह भूल मिट जायगी। भजन होने लगेगा। फिर अखण्ड भजन होगा, अखण्ड ! *'ताली लागी नाम से और पड्यो समँद से सीर'* भगवान् के नाम की धुन लग जायगी। फिर आपको भीतर स्मरण करने का उद्योग नहीं करना पड़ेगा। स्वतः ही भगवान् की कृपा से भजन चलेगा। परन्तु पहले आप नाम लेने की चेष्टा करो और भगवान् से प्रार्थना करो।🧘
🙏*राम ! राम !! राम !!!*🙏













