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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞? ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *इस संसार में जन्म लेने के बाद एक मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनने के लिए उसके हृदय में दया , करुणा , आर्जव , मार्दव ,सरलता , शील , प्रतिभा , न्याय , ज्ञान , परोपकार , सहिष्णुता , प्रीति , रचनाधर्मिता , सहकार , प्रकृतिप्रेम , राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि के प्रति अगाध श्रद्धा का होना परम आवश्यक है | यह सारे सद्गुण जिस मनुष्य में होते हैं वही पूर्ण मानव कहा जा सकता है | यही सारे सद्गुण मिलकर एक सुंदर समाज की रचना करते हैं | इनका आरोपण मनुष्य में किस प्रकार हो ? इस पर गहन चिंतन हमारे ऋषि महर्षियों ने सृष्टि के आदिकाल में ही कर लिया था | इन सारे उत्तम गुणों का आवाहन एक-एक व्यक्ति में करने के लिए ही सनातन धर्म में संस्कार की व्यवस्था बनाई गई थी क्योंकि हमारे सद्ग्रंथों में लिखा है :- "संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते" अर्थात संस्कार का प्रभाव अलग होता है | मनुष्य के दुर्गुणों को निकालकर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया को ही संस्कार कहा जाता है | यदि देखा जाय तो मानव जीवन को परिष्कृत करने वाली आध्यात्मिक विद्या का नाम ही संस्कार है | संस्कारों से संपन्न होने वाला मानव सुसंस्कृत , चरित्रवान , सदाचारी और भक्तिपरायण हो सकता है अन्यथा कुसंस्कार से प्रेरित एवं पीड़ित होकर मनुष्य पतित हो जाता है | अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य में संस्कार का होना परम आवश्यक है | हमारी भारतीय संस्कृति में संस्कारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है इसी क्रम में गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यंत अनेकों सांस्कारिक प्रयोग बताए जाते रहे हैं | संस्कार विहीन मनुष्य पशु की भांति ही जीवन यापन करता रहता है और वह अपने लक्ष्य को निर्धारित नहीं कर पाता , जबकि संस्कारी व्यक्ति की क्रिया सत्य सनातन को खोजने की यात्रा बन जाती है इस सत्य को खोजने का प्रयास करने वाला ही समाज एवं मानवता के लिए सर्वस्व निछावर कर सकता है | समस्त विश्व में भारत देश एक आदर्श संस्कृति एवं संस्कार के लिए जाना जाता रहा है हमारे संस्कारों ने ही हम को विश्व गुरु का दर्जा दिया था | विश्व के समस्त देशों ने हमारे संस्कारों को ग्रहण करने का प्रयास किया है | संस्कारों से संस्कृत होकर सामान्य मनुष्य भी ऋषियों के समान पूज्य हो जाता है | जो सम्मान समाज एवं देश में एक संस्कारी व्यक्ति पा जाता है वह सम्मान किसी अन्य को प्राप्त होना दुर्लभ है | संस्कारों का ही महत्व था कि परिवार व्यवस्था हमारे भारत देश में आज तक चल रही है अन्यथा अन्य देशों में तो एकल परिवार प्रारंभ से ही देखे जा सकते हैं | संस्कार विहीन होकर मनुष्य ना तो अपना कल्याण कर सकता है ना ही समाज एवं देश का |* *आज संस्कारी कहा जाने वाला हमारा देश भारत भी आधुनिकता की चपेट में दिख रहा है | संस्कारों की कमी आज हमारे देश में भी स्पष्ट दिखाई पड़ने लगी है | संस्कार की प्रथम पाठशाला परिवार को कहा गया है | सनातन धर्म में बताए जाने वाले सोलह संस्कार आज कहने भर को रह गए है | इन दिव्य संस्कारों की बात छोड़ दिया जाय आज तो सामान्य संस्कार भी देखने को नहीं मिल रहे है | परिवार में माता पिता एवं समाज में सद्गुरु , महापुरुषों का सम्मान आज की युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती है | इसका एक ही कारण है कि उनमें संस्कारों का आरोपण नहीं किया गया है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि किसी भी परिवार एवं समाज को चिरस्थाई प्रगतशील एवं उन्नतशील बनाने के लिए बनाने के लिए संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है परंतु आज हम अपने ही बच्चों को संस्कारित नहीं कर पा रहे हैं | इसका कारण यह है कि स्वयं हमने भी संस्कारों से मुंह मोड़ लिया है | जब संस्कार स्वयं हम मे नहीं बचे हैं तो हम अपने बच्चों को संस्कारी कैसे बना सकते हैं | एकल परिवारों को बढ़ावा देने में इन संस्कारों का ना होना भी एक महत्वपूर्ण कारण कहा जा सकता है क्योंकि कोई भी परिवार एवं समाज तभी श्रेष्ठ आचरण का पालन कर सकता है जब उनमें संस्कार आरोपित किए गए हो | संस्कार एवं आचार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म कहे गये हैं | संस्कार अर्थात आचार से विहीन मनुष्य पवित्रात्मा भी हो तो उसका इहलोक एवं परलोक दोनों ही नष्ट हो जाता है इसलिए मनुष्य में संस्कार का होना परम आवश्यक बताया गया है |* *एक मनुष्य में मानवीय संस्कार एवं सनातन संस्कारों का होना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार जीवित रहने के लिए प्राणवायु | बिना प्राणवायु के मनुष्य एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता है उसी प्रकार बिना संस्कारों के मनुष्य का जीवन सुव्यवस्थित नहीं हो सकता |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🕉️सनातन धर्म🚩 - 3 s 3 s - ShareChat
#☝आज का ज्ञान #❤️जीवन की सीख 🌟 || संघर्ष से सफलता || 🌟 बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष भी बड़ा ही होगा और संघर्ष बड़ा होगा तो निश्चित ही जीत भी आपकी ही होगी। अंधेरे से लड़ने से कालिमा दूर नहीं होगी उसके लिए तो बस एक दीपक जलाना पड़ेगा। कुछ भी अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं है, बस दीपक का जलना ही अंधेरे का भागना है। ऐसे ही कुछ भी अतिरिक्त नहीं बस निरंतर सामर्थ्य के साथ उचित दिशा में संघर्ष ही सफलता की एक मात्र माँग है। संघर्ष से डरना सफलता से दूर होते चले जाना है। मोबाइल हाथ में रहने पर भी सही पासवर्ड के बिना वो खुलने वाला नहीं है। ऐसे ही लक्ष्य निकट होते हुए भी संघर्ष के बिना वो मिलने वाला नहीं है। संघर्ष ही वो पासवर्ड है, जिससे सफलता के द्वार खुल पाते हैं और लक्ष्य की प्राप्ति संभव हो पाती है। जिनके हाथों में संघर्ष का पासवर्ड है, उनके कदम सफलता के शिखर तक अवश्य पहुँच जाते हैं।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
☝आज का ज्ञान - श्रीनाथजी श्रीनाथजी ६ பனி ہلآ {্নেখঞ্ুডী  जय श्री कृष्ण सुप्रभात श्रीनाथजी श्रीनाथजी ६ பனி ہلآ {্নেখঞ্ুডী  जय श्री कृष्ण सुप्रभात - ShareChat
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 सुप्रभातम् उत्साहो बलवानार्य, नास्त्युत्साहात्परं बलम्, सोत्साहस्य च लोकेषु" न किंचिदपि दुर्लभम्॥ भावार्थः- उत्साह श्रेष्ठ पुरुषों का बल है, उत्साह से बढ़कर और कोई बल नहीं है। उत्साहित व्यक्ति के लिए इस लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 🙏🌹जय जय श्री राम जी🌹🙏 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 #🌞सुप्रभात सन्देश
🌞सुप्रभात सन्देश - सुप्रभात ऊँ नमो नारायण वासुदेवाय नमः सुप्रभात ऊँ नमो नारायण वासुदेवाय नमः - ShareChat
#महाभारत #श्रीमहिभारतकथा-3️⃣8️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 388) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! प्रतापी द्रोण राजा द्रुपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले- 'राजन् ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ' ।। १ ।। इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वरः । भारद्वाजेन पाञ्चालो नामृष्यत वचोऽस्य तत् ।। २ ।। मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश द्रुपद उनकी इस बातको सह न सके ।। २ ।। सक्रोधामर्षजिह्मभूः कषायीकृतलोचनः । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम् ।। ३ ।। क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले ।। ३ ।। द्रुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ।। ४ ।। द्रुपदने कहा- ब्रह्मन् ! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य- अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है। तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि 'राजन् ! मैं तुम्हारा सखा हूँ' ।। ४ ।। न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतैः ।। ५ ।। ओ मूढ़ ! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती ।। ५ ।। सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ।। ६ ।। समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी-उस समय में और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे ।। ६ ।। न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो होनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत ।। ७ ।। लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है ।। ७ ।। मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ।। ८ ।। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे-इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी ।। ८ ।। न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुषः सखा । न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्व किमिष्यते ।। ९ ।। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो ।। ९ ।। ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ।। १० ।। जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान् और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती ।। १० ।। नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते ।। ११ ।। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो? ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमह्ाभाखतमू श्रीमह्ाभाखतमू - ShareChat
#🪔अपरा एकादशी🌺🌟 #एकादशी के महत्त्व के बारे में शास्त्र-प्रमाण 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥ अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव । भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥ मन में भौतिक इच्छा रखने वाले लोगों ने मोक्ष प्राप्त करने के लिए अथवा अपनी उद्देश्य-पूर्ति के लिए प्रत्येक एकादशी को उपवास रखना चाहिए। परंतु एकादशी का सच्चा उद्देश्य हैं भगवान्‌ को आनंद प्रदान करना। शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष हो, भरणी नक्षत्र हो या अन्य कोई भी कारण हो, भगवान्‌ श्री हरि का प्रेम और उनके धाम की प्राप्ति करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकादशी को उपवास रखना आवश्यक हैं। हज़ारों अश्वमेध यज्ञ करके और सैकडों वाजपेय यज्ञ करके जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्य की तुलना एकादशी के उपवास द्वारा प्राप्त होनेवाले पुण्य के सोलहवे हिस्से के साथ भी नहीं हो सकती। इस पृथ्वी पर भगवान्‌ पद्मनाभ के दिन के समान (अर्थात्‌ एकादशी के समान) शुद्धि प्रदान करने वाला और पाप दूर कर सकने में समर्थ अन्य कोई भी दिन नहीं हैं। ग्यारह इन्द्रियों के द्वारा (आँखें, कान, नाक, जीभ और त्वचा यह पाँच ज्ञानेंद्रिय; मुँह, हाथों , पैर, गुदद्वार और जननेंद्रिय यह पाँच कर्मेद्रिय और मन–इन के द्वारा) किये गये सर्व पाप कर्म हर एक पक्ष की ग्यारहवे दिन को (एकादशी को) उपवास करने से नष्ट हो जाते हैं। अपना पाप नष्ट करने के लिए एकादशी के समान प्रभावी उपाय दूसरा कोई नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल दिखावे के लिए एकादशी करता है, तो भी उस व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत यम का दर्शन नहीं होता हैं। भगवान्‌ श्रीकृष्ण के अवतार महर्षि वेद व्यास ने कहा है–"मेरे दिन (एकादशी को) यदि कोई व्यक्ति मुझे थोड़ा भी अन्न अर्पण करता है, तो वह नरक में जायेगा। तो कोई व्यक्ति स्वयं अन्न खाने से उस की क्या गति होगी, ये कहने की आवश्यकता नहीं हैं।" ब्राह्मण की हत्या करना, शराब पीना–ये सब पाप एकादशी को अन्न खाने के पापों से क्षुद्र हैं। जो मनुष्य एकादशी के पवित्र दिन अन्न खाता हैं तो वह सब मनुष्यों में हीन हैं। यदि कोई ऐसे मनुष्यों का अशुभ चेहरा देखता हैं, उसने सूर्य के तरफ़ देखकर अपने आप को पवित्र कर लेना चाहिए। एकादशी के दिन (श्री हरि के दिन) इस पृथ्वी के उपर की सब बडे बडे पाप जैसे ब्रह्म-हत्या (ब्राह्मण को मारने का पाप) अन्न का आश्रय लेते है आनी वहाँ रहते हैं। यदि अपने पिता, पुत्र, पत्नी या मित्र भी भगवान्‌ पद्मनाभ के दिन यदि अन्न खायेंगे तो भी वे बडे पापियों में गिने जायेंगे। दशमी के दिन एक ही बार खाना खायें। एकादशी के दिन पूर्ण उपवास रखना चाहिए। एकादशी के दिन श्राद्ध, तिलोदक, पिंड-प्रदान, जल-तर्पण इत्यादि कार्य नहीं करना चाहिए। कोई भी महिला मासिक धर्म के समय भी (रजस्वला अवस्था में भी) एकादशी के दिन अन्न न खायें। विधवा स्त्री यदि एकादशी के दिन अन्न भोजन करती हैं तो वह सब पुण्यों से रहित होती है आनी प्रति दिन एक गर्भपात करने का पाप उसे लगता हैं। द्वादशी को तुलसी-पत्तों का चयन वर्जित 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ न छिन्द्यात्‌ तुलसीं विप्र द्वादश्यां वैष्णवः क्वचित्। (हरिभक्तिविलास, 7/354, विष्णु-धर्मोत्तर पुराण) हे ब्राह्मणों! एक वैष्णव द्वादशी के दिन कभी भी तुलसी पत्तों का चयन नहीं करना। भानुवारं विना दुर्वां तुलसीं द्वादशीं विना। जिवितस्य अविनाशाय न विचिन्वित धर्मवित्‌॥ (हरिभक्तिविलास, 7/355, गरुड-पुराण) शास्त्र का भली भाँति अध्ययन किया हुए व्यक्ति यदि अपनी आयु को कम नहीं करना चाहता हो तो उसे रविवार के दिन दुर्वा घास और द्वादशी के दिन तुलसी के पत्तों का चयन नहीं करना चाहिए। द्वादश्यां तुलसी पत्रं धात्री पत्रश्च कार्त्तिके। लुनति स नरो गच्छेत्‌ निरयं अति गर्हितम्‌॥ (हरिभक्तिविलास 7/356, पद्म-पुराण, कृष्ण और सत्यभामा के बीच का संवाद) यदि कोई मनुष्य द्वादशी के दिन तुलसी-पत्तों का चयन करता है या कार्तिक महीने में आंवले के वृक्ष के पत्तों का चयन करता है तो उसे अत्यंत गर्हित नरक-लोक की प्राप्ति होकर दुःख का अनुभव करना पड़ता है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
🪔अपरा एकादशी🌺🌟 - एकादशी #6< के बारे में शास्त्र- प्रमाण एकादशी #6< के बारे में शास्त्र- प्रमाण - ShareChat
#राधे-राधे #राधे #जय श्री राधे #जय श्री कृष्ण #जय श्री राधे कृष्ण श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियाँ “अष्टभार्या” कहलाती हैं। पुराणों में इन्हें केवल रानियाँ नहीं, बल्कि भगवान की विभिन्न दिव्य शक्तियों और गुणों का प्रतीक माना गया है। 1. रुक्मिणी 2. सत्यभामा 3. जाम्बवती 4. कालिंदी 5. मित्रविंदा 6. नाग्नजिति (सत्या) 7. भद्रा 8. लक्ष्मणा 1. रुक्मिणी — लक्ष्मी और परम भक्ति का स्वरूप रुक्मिणी जी को माता लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। वे “अनन्य भक्ति” की प्रतीक हैं। उन्होंने मन से पहले ही कृष्ण को पति स्वीकार कर लिया था। उनका विवाह दिखाता है कि सच्चा प्रेम बाधाओं से नहीं रुकता। 2. सत्यभामा — शक्ति और स्वाभिमान सत्यभामा तेजस्वी और साहसी थीं। वे पृथ्वी शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। तुलाभार कथा सिखाती है कि भक्ति, धन से श्रेष्ठ है। उनमें प्रेम के साथ स्वाभिमान भी था। 3. जाम्बवती — धैर्य और पहचान जाम्बवती, जाम्बवान की पुत्री थीं। यह विवाह राम और कृष्ण अवतार के संबंध का संकेत देता है। जाम्बवान ने कृष्ण में राम का दर्शन किया। 4. कालिंदी — तपस्या और समर्पण कालिंदी यमुना से जुड़ी दिव्य शक्ति मानी जाती हैं। उन्होंने कठोर तप करके कृष्ण को प्राप्त किया। वे पवित्रता और साधना का प्रतीक हैं। 5. मित्रविंदा — प्रेम का साहस मित्रविंदा कृष्ण से प्रेम करती थीं, लेकिन परिवार विरोध में था। उनका जीवन सिखाता है कि सत्य प्रेम में साहस आवश्यक है। 6. नाग्नजिति (सत्या) — धर्म और पराक्रम सत्या के स्वयंवर में सात उग्र बैलों को वश में करना था। कृष्ण ने यह कार्य कर धर्मयुक्त वीरता का परिचय दिया। यह मन और इंद्रियों पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है। 7. भद्रा — सरलता और शुभता भद्रा को शांत, सौम्य और मंगलमयी माना गया है। वे पारिवारिक प्रेम और संतुलन की प्रतीक हैं। 8. लक्ष्मणा — कौशल और निष्ठा लक्ष्मणा का स्वयंवर वीरता परीक्षा पर आधारित था। वे समर्पण, प्रतिभा और दृढ़ निष्ठा की प्रतीक मानी जाती हैं। अष्टभार्या का आध्यात्मिक अर्थ:: भक्ति परंपराओं में कहा जाता है कि: कृष्ण परमात्मा हैं। अष्टभार्या उनकी आठ दिव्य शक्तियाँ हैं। ये आठ प्रकार की भक्ति, शक्ति, प्रेम, धैर्य, तप, धर्म और समर्पण का प्रतीक हैं। ~जय श्री कृष्ण~
राधे-राधे - ASHTABHARYA THE EIGHT WIVES OF LORD KRISHNA 3. JAMBAWATI 1 RUKMINI 2 SATYABHAMA KALINDI Daughter of Jambavan | Goddess of Lakshmi | [mhodimunt of [irth Goddess of Yamuna | Praonification 0 Symbol of pride; | Symbol of patience;| Symhol 0f pcnance; loyalty and humility duvotion and [ovc. courage and devotion;| purity and devotion 6. NAGNIITI 5. MITRAVINDA 7 BHADRA 8. LAKSHMANA (SATYA) Kaikeya Princess of Avanti | Princess ofMadra| ೊrincess 01 Dutyhter of Kins Natnajit [oue; Symbol of auspiciousness;| Symbol ofskill;| Symbol or ` Symbol of rightcousness | CouraBe and sicrifice: kindness amd hartonys dudicntion and loyaltys strcnsth and Vcton. They are not just queens but divine manifestations of love devotion, strength wisdom and virtue श्रीकृष्णः शरणं माम ASHTABHARYA THE EIGHT WIVES OF LORD KRISHNA 3. JAMBAWATI 1 RUKMINI 2 SATYABHAMA KALINDI Daughter of Jambavan | Goddess of Lakshmi | [mhodimunt of [irth Goddess of Yamuna | Praonification 0 Symbol of pride; | Symbol of patience;| Symhol 0f pcnance; loyalty and humility duvotion and [ovc. courage and devotion;| purity and devotion 6. NAGNIITI 5. MITRAVINDA 7 BHADRA 8. LAKSHMANA (SATYA) Kaikeya Princess of Avanti | Princess ofMadra| ೊrincess 01 Dutyhter of Kins Natnajit [oue; Symbol of auspiciousness;| Symbol ofskill;| Symbol or ` Symbol of rightcousness | CouraBe and sicrifice: kindness amd hartonys dudicntion and loyaltys strcnsth and Vcton. They are not just queens but divine manifestations of love devotion, strength wisdom and virtue श्रीकृष्णः शरणं माम - ShareChat
#महाभारत महाभारत की कथा में कुंती का जीवन अत्यंत रहस्यमयी, त्यागमय और दुःखों से भरा हुआ था। वे केवल पांडवों की माता ही नहीं थीं, बल्कि धर्म, धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं। उनके जीवन की सबसे रहस्यमयी और भावुक घटना थी — सूर्यदेव के आह्वान से कर्ण का जन्म। कुंती का वास्तविक नाम और बचपन कुंती का वास्तविक नाम पृथा था। वे यादव वंश के राजा शूरसेन की पुत्री थीं और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ लगती थीं। बाद में उन्हें उनके पिता ने अपने मित्र राजा कुंतिभोज को गोद दे दिया। तभी से उनका नाम “कुंती” पड़ गया। राजा कुंतिभोज के महल में कुंती का पालन-पोषण राजकुमारी की तरह हुआ। वे अत्यंत विनम्र, सेवा-भावी और बुद्धिमान थीं। ऋषि दुर्वासा का आगमन एक बार महान तपस्वी ऋषि दुर्वासा राजा कुंतिभोज के महल में पधारे। उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी माना जाता था। छोटी-सी गलती पर भी वे श्राप दे देते थे। इसलिए सभी उनसे भयभीत रहते थे। राजा ने उनकी सेवा का दायित्व कुंती को सौंपा। कुंती ने पूरे मन, श्रद्धा और धैर्य से ऋषि की सेवा की। वे समय पर भोजन देतीं, उनके विश्राम का ध्यान रखतीं और कभी शिकायत नहीं करतीं। कई महीनों तक सेवा करने के बाद दुर्वासा ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— “हे पुत्री, मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक दिव्य मंत्र देता हूँ। इस मंत्र से तुम जिस देवता का स्मरण करोगी, वह तुरंत प्रकट होकर तुम्हें अपने समान तेजस्वी पुत्र प्रदान करेगा।” कुंती ने विनम्रता से वह मंत्र स्वीकार कर लिया। जिज्ञासा जिसने इतिहास बदल दिया उस समय कुंती अभी बहुत छोटी और अविवाहित थीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि कोई मंत्र इतना शक्तिशाली भी हो सकता है। एक सुबह उन्होंने पूर्व दिशा में उगते हुए सूर्य को देखा। पूरा आकाश सुनहरी रोशनी से चमक रहा था। उनके मन में विचार आया— “क्या सचमुच यह मंत्र काम करता है?” बस जिज्ञासावश उन्होंने मंत्र का जाप करते हुए सूर्यदेव का आह्वान कर दिया। सूर्यदेव का प्रकट होना मंत्र पूरा होते ही अचानक तेज प्रकाश फैल गया। पूरा कक्ष दिव्य आभा से भर गया। उसी प्रकाश के बीच सूर्यदेव प्रकट हुए। उनके शरीर से अग्नि जैसा तेज निकल रहा था। कुंती भयभीत हो गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा— “हे देव! मैंने तो केवल मंत्र की शक्ति परखने के लिए आपका आह्वान किया था। कृपया वापस लौट जाइए।” लेकिन सूर्यदेव बोले— “ऋषि का मंत्र व्यर्थ नहीं हो सकता। मुझे तुम्हें वरदान देना ही होगा।” कुंती रोने लगीं। वे लोक-लाज और समाज के भय से काँप रही थीं। तब सूर्यदेव ने उन्हें आश्वासन दिया— तुम्हारा कौमार्य नष्ट नहीं होगा। तुम्हारी पवित्रता बनी रहेगी। तुम्हें एक दिव्य पुत्र प्राप्त होगा। कर्ण का दिव्य जन्म कुछ समय बाद कुंती ने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया। वह बालक साधारण नहीं था— उसके शरीर पर जन्मजात दिव्य कवच था। कानों में स्वर्णिम कुंडल चमक रहे थे। उसके चेहरे पर सूर्य जैसा तेज था। यह बालक आगे चलकर महान धनुर्धर कर्ण कहलाया। कुंती का सबसे बड़ा दुःख कुंती अविवाहित थीं। उस युग में बिना विवाह संतान होना बहुत बड़ा कलंक माना जाता था। वे जानती थीं कि यदि यह बात लोगों को पता चली तो— उनका अपमान होगा, उनके पिता की प्रतिष्ठा नष्ट होगी, समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने भारी मन से एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने नवजात शिशु को एक सुंदर टोकरी में रखा, उसके साथ कुछ वस्त्र और आभूषण रखे, और गंगा नदी में बहा दिया। वह क्षण कुंती के जीवन का सबसे बड़ा दुःख था। कहा जाता है कि जब टोकरी नदी में दूर जा रही थी, तब कुंती फूट-फूटकर रो रही थीं। अधिरथ और राधा द्वारा पालन वह टोकरी हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ को मिली। उनकी पत्नी राधा निःसंतान थीं। उन्होंने उस बालक को भगवान का उपहार मानकर अपना पुत्र बना लिया। इसी कारण कर्ण को “राधेय” भी कहा गया। कर्ण और कुंती का रहस्य कुंती ने वर्षों तक यह रहस्य छिपाए रखा। जब महाभारत युद्ध होने वाला था, तब उन्होंने कर्ण को सच्चाई बताई कि— “तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो। तुम पांडवों के बड़े भाई हो।” लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कर्ण ने कहा— “माता, आपने मुझे जन्म तो दिया, परंतु माँ का प्रेम नहीं दिया। जिन्होंने मुझे पाला-पोसा, मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता।” फिर भी उसने वचन दिया कि वह अर्जुन के अलावा किसी पांडव को नहीं मारेगा। कुंती ने श्रीकृष्ण से दुःख क्यों माँगा? महाभारत के बाद एक बार कुंती ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की— “हे कृष्ण! हमारे जीवन में दुःख आते रहें।” सभी यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। तब कुंती ने कहा— “जब-जब दुःख आया, तब-तब आपने हमारा साथ दिया। दुःख में मनुष्य भगवान को सबसे अधिक याद करता है। यदि सुख ही सुख मिल जाए, तो मनुष्य आपको भूल जाता है।” यह महाभारत की सबसे गहरी आध्यात्मिक शिक्षाओं में से एक मानी जाती है। कुंती के जीवन से मिलने वाली सीख 1. जिज्ञासा भी जीवन बदल सकती है कुंती की एक छोटी जिज्ञासा ने महाभारत के पूरे इतिहास की दिशा बदल दी। 2. समाज का भय कितना भारी हो सकता है कर्ण का त्याग केवल एक माँ का दुःख नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था का कठोर सत्य भी था। 3. दुःख मनुष्य को भगवान के निकट लाता है कुंती का जीवन सिखाता है कि कठिनाइयाँ कभी-कभी आत्मा को मजबूत बनाती हैं। 4. त्याग और धैर्य उन्होंने जीवनभर अनेक दुःख सहे, लेकिन कभी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। कुंती की कथा केवल एक रानी की कहानी नहीं, बल्कि एक माँ के दर्द, त्याग, भय, धर्म और भक्ति की अमर गाथा है।
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#❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान राजा चंद्रपाल राजस्थान के करौली के शासक थे, लेकिन उनका मन सदैव श्रीधाम वृंदावन में रमा रहता था। वे 'नाम संकीर्तन' के इतने आश्रित थे कि शरीर से करौली में रहते हुए भी मानसिक रूप से हमेशा वृंदावन का ही अनुभव करते थे। उनकी भक्ति का सबसे मुख्य अंग 'वैष्णव सेवा' था। उन्होंने अपने राज्य में यह नियम बना रखा था कि महल से चार-चार कोस दूर तक सैनिक तैनात रहते थे, लेकिन उनके हाथों में शस्त्रों के बजाय माला, पुष्प और गुलाब जल होता था। उनका कार्य केवल यह था कि कहीं से भी कोई तिलकधारी या कंठी-माला पहने वैष्णव आता दिखे, तो उसे सम्मानपूर्वक राजा के पास आमंत्रित करें। वैष्णव सत्कार और भाव जब भी कोई वैष्णव राजा के महल में आता, तो राजा और रानी स्वयं उनके चरण धोते, उस चरणामृत का पान करते और पूरे नगर में छिड़कवाते थे। वे वैष्णव को अपनी राज-गद्दी पर बिठाते और स्वयं उनके सामने निर्लज्ज होकर नृत्य करते थे। विदा करते समय राजा-रानी इतने भावुक हो जाते थे कि वे बिलख-बिलख कर रोने लगते थे। राजा का मानना था कि ठाकुर जी ने हमें स्वीकार किया है या नहीं, इसका प्रमाण यही है कि हमें उनके भक्तों को देखकर हृदय में प्रेम और सम्मान का भाव जागृत हो। परीक्षा और फूटी कौड़ी का प्रसंग राजा चंद्रपाल की इस अटूट श्रद्धा की चर्चा सुनकर एक अन्य राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही। उसने एक ऐसे व्यक्ति को भेजा जो भक्ति से विहीन था। वह व्यक्ति जब वैष्णव वेश बनाकर गया, तो चंद्रपाल ने उसे भी वही सम्मान दिया। अंत में जब उसने दक्षिणा मांगी, तो राजा ने उसे अपने खजाने से मनचाहा धन ले जाने दिया, लेकिन अंत में एक रेशमी कपड़े में लिपटी 'फूटी कौड़ी' भी दी। विद्वानों ने इसका अर्थ यह बताया कि उसे अपार धन तो इसलिए मिला क्योंकि उसने वैष्णव वेश धारण किया था, लेकिन 'फूटी कौड़ी' उस राजा की संकीर्ण मानसिकता और परीक्षा लेने के प्रयास का परिणाम थी। तोता-मैना का उदाहरण और निष्कर्ष बाद में जब एक वास्तविक विद्वान ब्राह्मण उस दूसरे राजा के पास चंद्रपाल के महल से लौटे, तो वे अपने साथ वहां की एक मैना (पक्षी) लेकर आए। वह मैना भी निरंतर भगवत नाम का जाप करती थी और सांसारिक चर्चा करने वालों को टोकती थी। यह देखकर वह अभिमानी राजा भी नतमस्तक हो गया और समझ गया कि जिस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी हरि नाम लेते हैं, वहां की भक्ति कितनी महान होगी। 🙏राधे राधे 🙏
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#महाभारत की कथा #महाभारत कथा को पूरा जरूर पढ़े.. ❤️🙏 महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों के वंश में राजा परीक्षित का जन्म हुआ। वे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और माता उत्तरा के पुत्र थे। बचपन से ही वे अत्यंत वीर, धर्मप्रिय और प्रजा का ध्यान रखने वाले राजा बने। उनके शासन में राज्य सुख और समृद्धि से भर गया।🚩 लेकिन एक दिन एक छोटी सी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।🚩 एक बार राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए। कई घंटों तक भटकने के बाद वे अत्यंत थक गए और उन्हें बहुत प्यास लगी। उसी समय उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया। वहाँ महर्षि शमीक गहरे ध्यान में लीन बैठे थे।🚩 राजा ने उनके पास जाकर पानी माँगा, लेकिन ऋषि ध्यान में इतने मग्न थे कि उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि जानबूझकर उनका अपमान कर रहे हैं। क्रोध में आकर राजा ने पास में पड़ा एक मृत साँप उठाया और उसे ऋषि शमीक के गले में डाल दिया। फिर वे वहाँ से चले गए।🚩 कुछ समय बाद ऋषि के पुत्र श्रृंगी को यह बात पता चली। वह अपने पिता का अपमान सहन नहीं कर पाया। क्रोधित होकर उसने श्राप दिया—🚩 “जिस राजा ने मेरे पिता का अपमान किया है, उसे सातवें दिन तक्षक नामक नाग डसेगा और उसकी मृत्यु हो जाएगी।” जब महर्षि शमीक को यह ज्ञात हुआ, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा— “राजा से भूल हुई थी, लेकिन क्रोध में दिया गया श्राप उचित नहीं था।” उधर जब राजा परीक्षित को श्राप के बारे में पता चला, तो उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप हुआ। उन्होंने राज्य अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और गंगा तट पर जाकर भगवान का स्मरण करने लगे।🚩 सात दिनों तक महान ऋषि शुकदेव जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई। राजा पूरी श्रद्धा से कथा सुनते रहे और उनका मन सांसारिक मोह से दूर होता गया। सातवें दिन तक्षक नाग ने राजा तक पहुँचने का उपाय खोज लिया। कहते हैं कि वह ब्राह्मण का रूप धारण करके महल में प्रवेश कर गया। फिर एक फल के भीतर छोटे कीड़े का रूप लेकर राजा के पास पहुँचा।🚩 जैसे ही समय पूरा हुआ, वह कीड़ा अचानक विशाल तक्षक नाग बन गया और उसने राजा परीक्षित को डस लिया। विष इतना प्रचंड था कि उसी क्षण राजा का शरीर अग्नि के समान जल उठा।🚩 लेकिन उस समय तक राजा परीक्षित का मन भगवान भक्ति में पूरी तरह लीन हो चुका था। इसलिए उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त हुआ। राजा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने क्रोध में आकर “सर्प यज्ञ” किया, जिसमें सभी नागों को अग्नि में भस्म करने का प्रयास किया गया। तब आस्तिक मुनि ने आकर यह यज्ञ रुकवाया और नागवंश की रक्षा की।🚩 🌼 कथा से शिक्षा 🌼 क्रोध में किया गया छोटा सा अपमान भी बड़े विनाश का कारण बन सकता है। साथ ही यह कथा सिखाती है कि मृत्यु निकट होने पर भी भगवान का स्मरण और ज्ञान मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जा सकता है।
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#महाभारत #महाभारत🏹 #महाभारत की कथा #महाभारत एवं गीता ज्ञान शास्त्र कहते हैं कि अठारह दिनों के महाभारत युद्ध में उस समय की पुरुष जनसंख्या का 80% सफाया हो गया था। युद्ध के अंत में, संजय कुरुक्षेत्र के उस स्थान पर गए जहां संसार का सबसे महानतम युद्ध हुआ था। उसने इधर-उधर देखा और सोचने लगा कि क्या वास्तव में यहीं युद्ध हुआ था? यदि यहां युद्ध हुआ था तो जहां वो खड़ा है, वहां की जमीन रक्त से सराबोर होनी चाहिए। क्या वो आज उसी जगह पर खड़ा है जहां महान पांडव और कृष्ण खड़े थे? तभी एक वृद्ध व्यक्ति ने वहां आकर धीमे और शांत स्वर में कहा, "आप उस बारे में सच्चाई कभी नहीं जान पाएंगे!" संजय ने धूल के बड़े से गुबार के बीच दिखाई देने वाले भगवा वस्त्रधारी एक वृद्ध व्यक्ति को देखने के लिए उस ओर सिर को घुमाया। "मुझे पता है कि आप कुरुक्षेत्र युद्ध के बारे में पता लगाने के लिए यहां हैं, लेकिन आप उस युद्ध के बारे में तब तक नहीं जान सकते, जब तक आप ये नहीं जान लेते हैं कि असली युद्ध है क्या?" बूढ़े आदमी ने रहस्यमय ढंग से कहा। "तुम महाभारत का क्या अर्थ जानते हो?" तब संजय ने उस रहस्यमय व्यक्ति से पूछा। वह कहने लगा, *"महाभारत एक महाकाव्य है, एक गाथा है, एक वास्तविकता भी है, लेकिन निश्चित रूप से एक दर्शन भी है।"* वृद्ध व्यक्ति संजय को और अधिक सवालों के चक्कर में फसा कर मुस्कुरा रहा था। "क्या आप मुझे बता सकते हैं कि दर्शन क्या है?" संजय ने निवेदन किया। अवश्य जानता हूं, बूढ़े आदमी ने कहना शुरू किया। *पांडव कुछ और नहीं, बल्कि आपकी पाँच इंद्रियाँ हैं -* दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और श्रवण - और क्या आप जानते हैं कि *कौरव क्या हैं?* उसने अपनी आँखें संकीर्ण करते हुए पूछा। *कौरव ऐसे सौ तरह के विकार हैं, जो आपकी इंद्रियों पर प्रतिदिन हमला करते हैं लेकिन आप उनसे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते है।* पर क्या आप जानते हैं कैसे? संजय ने फिर से न में सर हिला दिया। "जब कृष्ण आपके रथ की सवारी करते हैं!" यह कह वह वृद्ध व्यक्ति बड़े प्यार से मुस्कुराया और संजय अंतर्दृष्टि खुलने पर जो नवीन रत्न प्राप्त हुआ उस पर विचार करने लगा.. "कृष्ण आपकी आंतरिक आवाज, आपकी आत्मा, आपका मार्गदर्शक प्रकाश हैं और यदि आप अपने जीवन को उनके हाथों में सौप देते हैं तो आपको फिर चिंता करने की कोई आवश्कता नहीं है।" वृद्ध आदमी ने कहा। संजय अब तक लगभग चेतन अवस्था में पहुंच गया था, लेकिन जल्दी से एक और सवाल लेकर आया। फिर कौरवों के लिए द्रोणाचार्य और भीष्म क्यों लड़ रहे हैं? भीष्म हमारे अहंकार का प्रतीक हैं, अश्वत्थामा हमारी वासनाएं, इच्छाएं हैं, जो कि जल्दी नहीं मरतीं। दुर्योधन हमारी सांसारिक वासनाओं, इच्छाओं का प्रतीक है। द्रोणाचार्य हमारे संस्कार हैं। जयद्रथ हमारे शरीर के प्रति राग का प्रतीक है कि 'मैं ये देह हूं' का भाव। द्रुपद वैराग्य का प्रतीक हैं। अर्जुन मेरी आत्मा हैं, मैं ही अर्जुन हूं और स्वनियंत्रित भी हूं। कृष्ण हमारे परमात्मा हैं। पांच पांडव पांच नीचे वाले चक्र भी हैं, मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक। द्रोपदी कुंडलिनी शक्ति है, वह जागृत शक्ति है, जिसके ५ पति ५ चक्र हैं। ओम शब्द ही कृष्ण का पांचजन्य शंखनाद है, जो मुझ और आप आत्मा को ढ़ाढ़स बंधाता है कि चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं, अपनी बुराइयों पर विजय पा, अपने निम्न विचारों, निम्न इच्छाओं, सांसारिक इच्छाओं, अपने आंतरिक शत्रुओं यानि कौरवों से लड़ाई कर अर्थात अपनी मेटेरियलिस्टिक वासनाओं को त्याग कर और चैतन्य पाठ पर आरूढ़ हो जा, विकार रूपी कौरव अधर्मी एवं दुष्ट प्रकृति के हैं। श्री कृष्ण का साथ होते ही ७२००० नाड़ियों में भगवान की चैतन्य शक्ति भर जाती है, और हमें पता चल जाता है कि मैं चैतन्यता, आत्मा, जागृति हूं, मैं अन्न से बना शरीर नहीं हूं, इसलिए उठो जागो और अपने आपको, अपनी आत्मा को, अपने स्वयं सच को जानो, भगवान को पाओ, यही भगवद प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार है, यही इस मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। ये शरीर ही धर्म क्षेत्र, कुरुक्षेत्र है। धृतराष्ट्र अज्ञान से अंधा हुआ मन है। अर्जुन आप हो, संजय आपके आध्यात्मिक गुरु हैं। वृद्ध आदमी ने दुःखी भाव के साथ सिर हिलाया और कहा, "जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, अपने बड़ों के प्रति आपकी धारणा बदल जाती है। जिन बुजुर्गों के बारे में आपने सोचा था कि आपके बढ़ते वर्षों में वे संपूर्ण थे, अब आपको लगता है वे सभी परिपूर्ण नहीं हैं। उनमें दोष हैं। और एक दिन आपको यह तय करना होगा कि उनका व्यवहार आपके लिए अच्छा या बुरा है। तब आपको यह भी अहसास हो सकता है कि आपको अपनी भलाई के लिए उनका विरोध करना या लड़ना भी पड़ सकता है। यह बड़ा होने का सबसे कठिन हिस्सा है और यही वजह है कि गीता महत्वपूर्ण है।" संजय धरती पर बैठ गया, इसलिए नहीं कि वह थका हुआ था, तक गया था, बल्कि इसलिए कि वह जो समझ लेकर यहां आया था, वो एक-एक कर धराशाई हो रही थी। लेकिन फिर भी उसने लगभग फुसफुसाते हुए एक और प्रश्न पूछा, *तब कर्ण के बारे में आपका क्या कहना है?* "आह!" वृद्ध ने कहा। आपने अंत के लिए सबसे अच्छा प्रश्न बचाकर रखा हुआ है। "कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है। वह इच्छा है। वह सांसारिक सुख के प्रति आपके राग का प्रतीक है। वह आप का ही एक हिस्सा है, लेकिन वह अपने प्रति अन्याय महसूस करता है और आपके विरोधी विकारों के साथ खड़ा दिखता है। और हर समय विकारों के विचारों के साथ खड़े रहने के कोई न कोई कारण और बहाना बनाता रहता है।" "क्या आपकी इच्छा; आपको विकारों के वशीभूत होकर उनमें बह जाने या अपनाने के लिए प्रेरित नहीं करती रहती है?" वृद्ध ने संजय से पूछा। संजय ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया और भूमि की तरफ सिर करके सारी विचार श्रंखलाओं को क्रमबद्ध कर मस्तिष्क में बैठाने का प्रयास करने लगा। और जब उसने अपने सिर को ऊपर उठाया, वह वृद्ध व्यक्ति धूल के गुबारों के मध्य कहीं विलीन हो चुका था। लेकिन जाने से पहले वह जीवन की वो दिशा एवं दर्शन दे गया था, जिसे आत्मसात करने के अतिरिक्त संजय के सामने अब कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था। 🙏 *!! जय श्रीकृष्ण !!* 🙏
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