#हर हर महादेव
भगवान शिव (महादेव) के उपदेशों और धर्मग्रंथों के अनुसार, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके स्वयं के भीतर स्थित 'अहंकार' (Ego) है। महादेव के अनुसार अहंकार ही वह मूल कारण है जिससे अन्य सभी विकार उत्पन्न होते हैं।
महादेव के अनुसार मनुष्य के मुख्य आंतरिक शत्रु इस प्रकार हैं:
अहंकार (अहंकार ही मूल शत्रु)
महादेव सिखाते हैं कि 'मैं' की भावना ही मनुष्य के पतन का कारण बनती है। जब व्यक्ति स्वयं को कर्ता मान लेता है और अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने लगता है, तो वह सत्य के मार्ग से भटक जाता है। अहंकार ही मनुष्य को ईश्वर और उसकी अपनी आत्मा से दूर कर देता है।
अज्ञान (माया)
सत्य को न जान पाना और इस नश्वर संसार को ही सत्य मान लेना सबसे बड़ा अज्ञान है। महादेव के अनुसार, अज्ञानता वह अंधकार है जो मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटका देता है। जब तक मनुष्य अज्ञान रूपी शत्रु को नहीं हराता, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।
क्रोध (विनाश का द्वार)
क्रोध मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। शिव जी का तीसरा नेत्र इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने भीतर के क्रोध और नकारात्मकता को ज्ञान की अग्नि से भस्म कर देना चाहिए। क्रोध में किया गया कोई भी कार्य अंततः दुःख का कारण बनता है।
मोह और आसक्ति
सांसारिक वस्तुओं और नश्वर रिश्तों के प्रति अत्यधिक लगाव (मोह) मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाता है। महादेव, जो स्वयं वैरागी हैं, यह संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए भी अनासक्त रहना ही श्रेष्ठ है। मोह ही मनुष्य को बंधनों में जकड़ कर रखता है।
काम (वासना)
अनियंत्रित इच्छाएं और वासनाएं मनुष्य के मन को कभी शांत नहीं होने देतीं। महादेव ने कामदेव को भस्म कर यह सिखाया था कि यदि मनुष्य अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखता, तो वह अपने ही विनाश का कारण बनता है।
# श्रीमद्भागवत - महापुराण
श्रीमद्भागवत महापुराण में एक बहुत ही सुंदर और गहरी शिक्षा देने वाली कथा आती है — भक्ति महारानी और उनके दो पुत्र ज्ञान व वैराग्य की कथा। यह कथा बताती है कि कलियुग में भक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है।
🌼 भक्ति महारानी, ज्ञान और वैराग्य की कथा
एक समय की बात है। देवर्षि नारद मुनि पृथ्वी पर घूम रहे थे। वे यह देखने निकले थे कि कलियुग में धर्म की क्या स्थिति है और लोग भगवान का स्मरण कितना करते हैं।
घूमते-घूमते वे पवित्र भूमि वृन्दावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा।
एक सुंदर, तेजस्वी और युवा स्त्री बैठी थी, लेकिन उसके पास दो बहुत ही बूढ़े और दुर्बल पुरुष पड़े हुए थे। वे इतने कमजोर थे कि उठ भी नहीं पा रहे थे। उस स्त्री के आसपास कई पवित्र नदियाँ उसकी सेवा कर रही थीं।
नारद मुनि यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने उस स्त्री से पूछा—
“हे देवी! आप कौन हैं? और ये दोनों बूढ़े पुरुष कौन हैं?”
🌺 भक्ति महारानी का परिचय
वह स्त्री बोली—
“हे नारद जी! मेरा नाम भक्ति है। ये मेरे दो पुत्र हैं — ज्ञान और वैराग्य।
कलियुग के प्रभाव से ये दोनों बहुत कमजोर और बूढ़े हो गए हैं।”
फिर भक्ति देवी ने अपनी जीवन यात्रा बताई।
उन्होंने कहा—
मेरा जन्म द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) में हुआ।
कर्नाटक में मैं बड़ी हुई।
महाराष्ट्र में मुझे बहुत सम्मान मिला।
लेकिन गुजरात पहुँचते-पहुँचते कलियुग के प्रभाव से मैं बूढ़ी और कमजोर हो गई।
भक्ति ने आगे कहा—
“जब मैं यहाँ वृन्दावन आई, तो इस पवित्र भूमि के प्रभाव से मैं फिर से युवा और सुंदर हो गई।
लेकिन मेरे दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य अभी भी बूढ़े और निर्बल ही पड़े हैं।”
😔 कलियुग का प्रभाव
भक्ति महारानी ने दुःखी होकर कहा—
“कलियुग में लोग धन, भोग, अहंकार और विषय-वासनाओं में डूबे हुए हैं।
उन्हें न ज्ञान की परवाह है और न वैराग्य की।
इस कारण मेरे पुत्र बहुत कमजोर हो गए हैं।”
नारद मुनि यह सुनकर बहुत दुखी हुए।
📖 नारद जी का प्रयास
नारद मुनि ने सोचा कि इन दोनों को ठीक करना चाहिए।
उन्होंने वेद, वेदांत और भगवद्गीता का उपदेश सुनाया।
लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि ज्ञान और वैराग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
वे वैसे ही कमजोर पड़े रहे।
नारद मुनि चिंतित हो गए।
👼 सनकादिक ऋषियों का उपाय
तभी वहाँ चार महान ऋषि आए—
सनक
सनंदन
सनातन
सनत्कुमार
इन ऋषियों को सनकादिक कहा जाता है।
उन्होंने नारद जी से कहा—
“कलियुग में केवल एक ही उपाय है —
भागवत कथा का श्रवण।”
📜 भागवत सप्ताह का आयोजन
सनकादिक ऋषियों के कहने पर नारद मुनि ने श्रीमद्भागवत की सप्ताह कथा (भागवत सप्ताह) का आयोजन किया।
जब ज्ञान और वैराग्य ने श्रद्धा से भागवत कथा सुनी, तो एक अद्भुत चमत्कार हुआ।
उनका शरीर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा
उनका बुढ़ापा समाप्त हो गया
वे फिर से युवा और शक्तिशाली बन गए
भक्ति महारानी भी अत्यंत प्रसन्न हो गईं।
🌟 कथा की शिक्षा
यह कथा हमें बहुत गहरी शिक्षा देती है—
कलियुग में भक्ति सबसे बड़ी शक्ति है।
जहाँ भगवान की कथा और नाम-स्मरण होता है, वहाँ ज्ञान और वैराग्य अपने-आप जाग जाते हैं।
भागवत कथा सुनना और भगवान का भजन करना मनुष्य को पवित्र और जागृत बनाता है।
इसलिए संत कहते हैं—
“कलियुग में भगवान की भक्ति ही सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।”
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१७७
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्ड
छियानबेवाँ सर्ग
वन-जन्तुओंके भागनेका कारण जाननेके लिये श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका शाल-वृक्षपर चढ़कर भरतकी सेनाको देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना
इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीताको मन्दाकिनी नदीका दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वतके समतल प्रदेशमें उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनोंके उपभोगमें आने योग्य फल मूलके गूदेसे उनकी मानसिक प्रसन्नताको बढ़ाने—उनका लालन करने लगे॥१॥
धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजीके साथ इस प्रकारकी बातें कर रहे थे—'प्रिये! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्दको अच्छी तरह आगपर सेका गया है'॥२॥
इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेशमें बैठे हुए ही थे कि उनके पास आनेवाली भरतकी सेनाकी धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाशमें फैलने लगे॥३॥
इसी बीचमें सेनाके महान् कोलाहलसे भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियोंके कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथोंके साथ सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे॥४॥
श्रीरामचन्द्रजीने सेनासे प्रकट हुए उस महान् कोलाहलको सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियोंको भी देखा॥५॥
उन भागे हुए हाथियोंको देखकर और उस महाभयंकर शब्दको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेजवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले—॥६॥
'लक्ष्मण! इस जगत्में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्रवाली हुई हैं। देखो तो सही—यह भयंकर गर्जनाके साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है॥७॥
'सुमित्रानन्दन। पता तो लगाओ, इस विशाल वनमें ये जो हाथियोंके झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है? इन्हें सिंहोंने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वनमें आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है?॥८-९॥
'लक्ष्मण! इस पर्वतपर अपरिचित पक्षियोंका आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है (फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु वा राजाका आक्रमण कैसे सम्भव है)। अतः इन सारी बातोंकी ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो'॥१०॥
भगवान् श्रीरामकी आज्ञा पाकर लक्ष्मण तुरंत ही फूलोंसे भरे हुए एक शाल-वृक्षपर चढ़ गये और सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए उन्होंने पूर्व दिशाकी ओर दृष्टिपात किया॥११॥
तत्पश्चात् उत्तरकी ओर मुँह करके देखनेपर उन्हें एक विशाल सेना दिखायी दी, जो हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण तथा प्रयत्नशील पैदल सैनिकोंसे संयुक्त थी॥१२॥
घोड़ों और रथोंसे भरी हुई तथा रथकी ध्वजासे विभूषित उस सेनाकी सूचना उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको दी और यह बात कही—॥१३॥
'आर्य! अब आप आग बुझा दे (अन्यथा धुआँ देखकर यह सेना यहीं चली आयगी); देवी सीता गुफामें जा बैठें। आप अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा लें और बाण तथा कवच धारण कर लें'॥१४॥
यह सुनकर पुरुषसिंह श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—'प्रिय सुमित्राकुमार! अच्छी तरह देखो तो सही, तुम्हारी समझमें यह किसकी सेना हो सकती है?'॥१५॥-
श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण रोषसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवकी भाँति उस सेनाकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हों और इस प्रकार बोले—॥१६॥
'भैया! निश्चय ही यह कैकेयीका पुत्र भरत है, जो अयोध्यामें अभिषिक्त होकर अपने राज्यको निष्कण्टक बनानेकी इच्छासे हम दोनोंको मार डालनेके लिये यहाँ आ रहा है॥१७॥
'सामनेकी ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपर उज्ज्वल तनेसे युक्त कोविदार वृक्षसे चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है॥१८॥
'ये घुड़सवार सैनिक इच्छानुसार शीघ्रगामी घोड़ोंपर आरूढ़ हो इधर ही आ रहे हैं और ये हाथीसवार भी बड़े हर्षसे हाथियोंपर चढ़कर आते हुए प्रकाशित हो रहे हैं॥१९॥
'वीर! हम दोनोंको धनुष लेकर पर्वतके शिखरपर चलना चाहिये अथवा कवच बाँधकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये यहीं डटे रहना चाहिये॥२०॥
'रघुनन्दन! आज यह कोविदारके चिह्नसे युक्त ध्वजवाला रथ रणभूमिमें हम दोनोंके अधिकारमें आ जायगा और आज मैं अपनी इच्छाके अनुसार उस भरतको भी सामने देखूँगा कि जिसके कारण आपको, सीताको और मुझे भी महान् संकटका सामना करना पड़ा है तथा जिसके कारण आप अपने सनातन राज्याधिकारसे वञ्चित किये गये हैं॥२१-२२॥
'वीर रघुनाथजी! यह भरत हमारा शत्रु है और सामने आ गया है; अतः वधके ही योग्य है। भरतका वध करनेमें मुझे कोई दोष नहीं दिखायी देता॥२३॥
'रघुनन्दन! जो पहलेका अपकारी रहा हो, उसको मारकर कोई अधर्मका भागी नहीं होता है। भरतने पहले हमलोगोंका अपकार किया है, अतः उसे मारनेमें नहीं, जीवित छोड़ देनेमें ही अधर्म है॥२४॥
'इस भरतके मारे जानेपर आप समस्त वसुधाका शासन करें। जैसे हाथी किसी वृक्षको तोड़ डालता है, उसी प्रकार राज्यका लोभ करनेवाली कैकेयी आज अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इसे मेरे द्वारा युद्धमें मारा गया देखे॥२५॥
'मैं कैकेयीका भी उसके सगे-सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवाओंसहित वध कर डालूँगा। आज यह पृथ्वी कैकेयीरूप महान् पापसे मुक्त हो जाय॥२६½॥
'मानद! आज मैं अपने रोके हुए क्रोध और तिरस्कारको शत्रुकी सेनाओंपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे सूखे घास-फूँसके ढेरमें आग लगा दी जाय॥२७॥
'अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े करके मैं अभी चित्रकूटके इस वनको रक्तसे सींच दूँगा॥२८½॥
'मेरे बाणोंसे विदीर्ण हुए हृदयवाले हाथियों और घोड़ोंको तथा मेरे हाथसे मारे गये मनुष्योंको भी गीदड़ आदि मांसभक्षी जन्तु इधर-उधर घसीटें॥२९½॥
'इस महान् वनमें सेनासहित भरतका वध करके मैं धनुष और बाणके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा—इसमें संशय नहीं है'॥३०॥
*इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९६॥*
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*धरा धाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य के द्वारा अनेकों प्रकार के कर्म संपादित होते हैं | अपने संपूर्ण जीवन काल में अपने कर्मों के अनुसार मानव महामानव बन जाता है | मानव मात्र की आकांक्षा , अभिलाषा एवं आवश्यकता आदि की पूर्ति के लिए हमारे महापुरुषों ने तीन प्रकार के साधन बताये हैं :- १- कर्म , २- चिन्तन एवं ३- प्रार्थना | इन तीनों के समन्वित प्रयासों से ही जीवनलक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है | ईश्वर की स्तुति या प्रार्थना से सनातन धर्म के समस्त धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं | जितने भी महापुरुष हुए हैं उनके जीवन का अनिवार्य अंग रही है प्रार्थना , क्योंकि प्रार्थना के बिना आत्मबल की उपलब्धि नहीं हो सकती | प्रार्थना मानव जीवन का सबसे सशक्त एवं सूक्ष्म एक ऐसा ऊर्जा स्रोत है जिसे प्रत्येक मनुष्य उत्पादित करके स्वयं को उत्कृष्ट व्यक्तित्व में सम्मिलित कर सकता है | कर्म चिंतन एवं प्रार्थना तीनों के सहयोग से ही मनुष्य किसी भी कार्य में सफल हो सकता है | प्रार्थना के महत्व को हमारे पूर्वजों ने समझा और उसे अपने दैनिक जीवन का अंग बनाया | ईश्वर कण-कण में व्याप्त है और प्रत्येक रूप में उसकी प्रार्थना हमारे पूर्वजों के द्वारा की गई है | इसी का परिणाम है कि जो कार्य मनुष्य अपनी शक्ति से नहीं कर सकता वह कार्य ईश्वर की प्रार्थना से संपन्न हो जाता है | प्रार्थना को सफल बनाने के लिए ईश्वर पर विश्वास रखते हुए स्वयं को उन से जोड़ना होता है साथ ही कोई भी प्रार्थना हृदय के अंतस्थल से निकलनी चाहिए | करुणभाव से हृदय से निकलने वाली प्रार्थना ईश्वर अवश्य सुनता है और उसका परिणाम भी मनुष्य के पक्ष में आता है | हमारे पुराणों में वर्णन है कि भक्तों की पुकार पर भगवान नंगे पांव दौड़े चले आते हैं | प्रार्थना की शक्ति को शब्दों में नहीं वर्णित किया जा सकता है क्योंकि यह कहने का नहीं बल्कि एहसास करने का विषय है | पूर्वकाल से लेकर के मध्यकाल तक यहां तक कि आधुनिक काल में भी अनेक ऐसे उदाहरण प्राप्त होते हैं जहां संसार के सारे साधन निष्फल हो गये हैं वहां मनुष्य की प्रार्थना ने उसके बिगड़े हुए कार्य संपन्न किए हैं , परंतु समय के साथ मनुष्य की भावना परिवर्तित हो गई और आज की जाने वाली प्रार्थनाएं निष्फल होने लगी |*
*आज का आधुनिक मनुष्य जीवन के सूत्र को भूलता चला जा रहा है | सफल जीवन के सूत्र कर्म , चिंतन एवं प्रार्थना मे से मनुष्य कर्म एवं चिंतन तो कर रहा है परंतु प्रार्थना से दूर होता चला जा रहा है | प्राय: लोग कहते हैं कि ईश्वर की प्रार्थना क्यों किया जाय ? क्योंकि यहां सब कुछ कर्म के द्वारा प्राप्त होता है | यद्यपि यह सत्य है कि सब कुछ कर्म के द्वारा प्राप्त होता है परंतु इसके बाद भी मनुष्य को ईश्वर को अनदेखा न करते हुए उसकी दैनिक प्रार्थना अवश्य करते रहना चाहिए | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज मन्दिरों में भगवान के समक्ष लोगों को रोते हुए देखता हूं जिंदगी की समस्याओं को भगवान से सुनाते हुए लोगों को देखा जा सकता है | इसे लोग प्रार्थना मांनते हैं , जबकि यह प्रार्थना नहीं बल्कि का स्वार्थ होता है | यदि प्रार्थना को सफल बनाना है तो सर्वप्रथम ईश्वर पर विश्वास रखते हुए कण-कण में उसके व्याप्त होने की अनुभूति होने के साथ प्रार्थना लोक कल्याण की होनी चाहिए | किसी दूसरे का अहित करने के लिए प्रार्थना न की जाय | अपने साथ साथ समस्त विश्व के कल्याण की भावना हृदय में रखकर यदि प्रार्थना की जाती है वह प्रार्थना कभी निष्फल नहीं हो सकती , क्योंकि ईश्वर समदर्शी है वह सबको एक समान पुत्रवत मानता है | आज की जा रही प्रार्थना यदि सफल नहीं हो रही है तो उसका कारण यही है कि आज का मनुष्य जो कुछ भी मांगता है अपने लिए मांगता है किसी दूसरे की कल्याण की भावना के लिए उसके ह्रदय से प्रार्थना नहीं निकलती है | प्रार्थना को दैनिक जीवन का अंग बनाते हुए लोक कल्याण की भावना बनाए रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है |*
*कर्म चिंतन एवं प्रार्थना तीनों नित्य प्रति करते रहने से मनुष्य अपने जीवन में सफलता की सीढ़ियां चढ़ता चला जाता है और अंततोगत्वा वह महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाने लगता है , इसलिए जीवन में प्रार्थना के महत्व को कभी भूलना नहीं चाहिए |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹
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*सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----*
*‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---*
आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇
#👌 आत्मविश्वास
🌟 || अहम नहीं अहोभाव में जियें || 🌟
अहम से सोऽहम् की यात्रा ही जीवन की सबसे कठिन यात्रा है। स्वयं को कर्ता मान बैठना ही जीवन का सबसे बड़ा वहम और अहम भी है। मैं से मुक्त हो जाना जीवन में बहुत बड़ी अशांति एवं कष्टों से मुक्त हो जाना भी है। मैं के कारण ही बहुत सारी समस्याएं जन्म लेती हैं एवं जीवन अशांत हो जाता है। समस्त हिंसा और अशांति के मूल में भी मैं का ही भाव छुपा है। जीवन में जहाँ-जहाँ मैं भाव आपके आगे आयेगा वहाँ-वहाँ आप पाओगे कि प्रसन्नता आपके जीवन से धीरे-धीरे पीछे हट रही है।
यदि मन में अहमता की दीवार न हो तो जीवन स्वतः आनंदपूर्ण बन जाता है। मैं का भाव हृदय की उदारता को नष्ट कर देता है। जहाँ मैं है वहीं से अहम की यात्रा का प्रारंभ भी है। जीवन का वास्तविक सौंदर्य तो उदारता, विनम्रता, प्रेम और संवेदना में ही खिलता है। मैं अर्थात स्वयं में सिमट कर रह जाना, असीमता, अनंतता के आकाश से वंचित रह जाना। एक बात सदैव याद रखें कि मैं की मुक्ति में ही तुम्हारी समस्याओं की मुक्ति भी है। मैं नहीं, मेरे प्रभु सब कर रहे हैं, यही कृतज्ञता ही जीवन का अहोभाव है। 🖋️
जय श्री राधे कृष्णा जी
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🎯ईश्वर की बनाई यह सृष्टि बेशक कीमती खज़ानों से भरी हुई है,
और एक भी चौकीदार नहीं है व्यवस्था ऐसी की गई है कि,
दुनिया में करोड़ों व्यक्तियों का आवागमन प्रतिवर्ष होता है किन्तु,
यहाँ से कोई एक तीली तक नहीं ले जा सकता.🎯
जय श्री कृष्ण
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#👫 हमारी ज़िन्दगी #👌 आत्मविश्वास
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍
सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में)
“एकादशाहविधिनिरूपण” नामक
{बारहवां अध्याय}
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एकादशाहकृत्य-निरुपण, मृत-शय्यादान, गोदान, घटदान, अष्टमहादान, वृषोत्सर्ग, मध्यमषोडशी, उत्तमषोडशी एवं नारायणबलि गरुड़ उवाच गरुड़जी ने कहा –
हे सुरेश्वर ! ग्यारहवें दिन के कृत्य-विधान को भी बताइए और हे जगदीश्वर!
वृषोत्सर्ग की विधि भी बताइये।
श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – ग्यारहवें दिन प्रात:काल ही जलाशय पर जाकर प्रयत्नपूर्वक सभी और्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिए। वेद और शास्त्रों का अभ्यास करने वाले ब्राह्मणों को निमंत्रित करें और हाथ जोड़कर नमस्कार करके उनसे प्रेत की मुक्ति के लिये प्रार्थना करें। आचार्य भी स्नान-संध्या आदि करके पवित्र हो जाएँ और ग्यारहवें दिन के लिये उचित कृत्यों का विधिवत विधान आरम्भ करें।
दस दिन तक मृतक के नाम-गोत्र का उच्चारण मन्त्रोच्चारण के बिना करना चाहिए।
ग्यारहवें दिन प्रेत का पिण्डदान समन्त्रक (मन्त्रों सहित) करना चाहिए। हे गरुड़ ! सुवर्ण से विष्णु की, रजत से ब्रह्मा की, ताम्र से रुद्र की और लौह से यम की प्रतिमा बनवानी चाहिए। पश्चिम भाग में गंगाजल से परिपूर्ण विष्णुकलश स्थापित करके उसके ऊपर पीतवस्त्र से वेष्टित विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। पूर्व-दिशा में दूध और जल से भरा ब्रह्मकलश स्थापित करके उस पर श्वेत वस्त्र से वेष्टित ब्रह्मा की स्थापना करें। उत्तर की दिशा में मधु और घृत से परिपूर्ण रुद्रकुम्भ की स्थापना करके रक्त-वस्त्रवेष्टित श्रीरुद्र की प्रतिमा को उस पर स्थापित करें। दक्षिण-दिशा में इन्द्रोदक (वर्षा के जल) से परिपूर्ण यमघट की स्थापना करें और काले वस्त्र से वेष्टित करके उस पर यम की प्रतिमा स्थापित करें। उनके मध्य में एक मण्डल बनाकर उस पर पुत्र कुश से निर्मित कुशमयी प्रेत की प्रतिमा स्थापित करें और दक्षिणाभिमुख एवं अपसव्य होकर तर्पण करें। विष्णु, ब्रह्मा, शिव और धर्मराज (यम) का वेदमन्त्रों से तर्पण करें तब होम करने के अनन्तर श्राद्ध और दस घट आदि का दान करे। तदनन्तर पितरों को तारने के लिए गोदान करें। गोदान के समय “हे माधव ! यह गौ मेरे द्वारा आपकी प्रसन्नता के लिए दी जा रही है, इस गोदान से आप प्रसन्न होएँ” – ऎसा कहे। प्रेत के द्वारा उपभुक्त आभूषण, वस्त्र, वाहन तथा घृतपूर्ण कांस्यपात्र, सप्तधान्य और प्रेत को प्रिय लगने वाली वस्तुएँ एवं तिलादि अष्टमहादान जो अन्तकाल में न किये जा सकें हो, शय्या के समीप रखकर शय्या के साथ इन सबका भी दान करें।
ब्राह्मण के चरणों को धोकर वस्त्र आदि से उनकी पूजा करें और मोदक, पूआ, दूध आदि पकवान उन्हें प्रदान करें तब पुत्र शय्या के ऊपर प्रेत की स्वर्णमयी प्रतिमा (कांचन पुरुष को) स्थापित करें और उसकी पूजा करके यथाविधि मृतशय्या का दान करें। शय्यादान के समय इस मन्त्र को पढ़े – “हे विप्र ! प्रेत की प्रतिमा से युक्त और सभी प्रकार के उपकरणों से समन्वित यह प्रेतशय्या (मृतशय्या) मैंने आपको निवेदित की है” – इस प्रकार पढ़कर कुटुम्बी ब्राह्मण आचार्य को वह शय्या प्रदान करनी चाहिए।
इसके बाद प्रदक्षिणा और प्रणाम करके विसर्जन करना चाहिए। इस प्रकार शय्यादान, नवक आदि श्राद्ध और वृषोत्सर्ग का विधान करने से प्रेत परम गति को प्राप्त होता है। ग्यारहवें दिन विधिपूर्वक हीन अंगावले, रोगी, अत्यन्त छोटे बछड़े को छोड़कर सभी शुभ लक्षणों से युक्त वृष का विधिपूर्वक उत्सर्ग (वृषोत्सर्ग) करना चाहिए।
ब्राह्मण के उद्देश्य से लाल आँख वाले, पिंगलवर्ण वाले, लाल सींग, लाल गला और लाल खुर वाले, सफेद पेट तथा काली पीठ वाले वृषभ का उत्सर्जन करना चाहिए। क्षत्रिय के लिये चिकना और रक्तवर्ण वाला, वैश्य के लिये पीतवर्ण वाला और शूद्र के लिए कृष्ण वर्ण का वृषभ (वृषोत्सर्ग के लिये) प्रशस्त माना जाता है।
जिस वृषभ का सर्वांग पिंगल वर्ण का हो तथा पूँछ और पैर सफेद हो, वह पिंगल वर्ण का वृषभ – पितरों की प्रसन्नता बढ़ाने वाला होता है, ऎसा कहा गया है। जिस वृषभ के पैर, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीर लाख के समान वर्ण का हो, वह नीलवृष कहा जाता है।
जो वृषभ रक्तवर्ण का हो तथा जिसका मुख और पूँछ पाण्डुर वर्ण का हो तथा खुर और सींग पिंगल वर्ण के हों उसे रक्तनील वृष कहते हैं।
जिस साँड के समस्त अंग एक रंग के हों तथा पूँछ व खुर पिंगलवर्ण् का हो, उसे नीलपिंग कहा गया है, वह पूर्वजों का उद्धार करने वाला होता है। जो कबूतर के समान रंगवाला हो, जिसके ललाट पर तिलक-सी आकृति हो और सर्वांग सुन्दर हो, वह बभ्रुनील वृषभ कहा जाता है। जिसका सम्पूर्ण शरीर नीलवर्ण का हो और दोनों नेत्र रक्तवर्ण के हों, उसे महानील वृषभ कहते हैं – इस प्रकार नीलवृषभ पाँच प्रकार के होते हैं। (वृष का संस्कार करके) उसे अवश्य मुक्त कर देना चाहिए, घर में नहीं रखना चाहिए। इसी विषय में लोक में एक पुरानी गाथा प्रचलित है – बहुत से पुत्रों की कामना करनी चाहिए ताकि उनमें से कोई एक गया जाए अथवा गौरी (‘अष्टवर्षा भवेद्गौरी’ – आठ वर्ष की कन्या ‘गौरी’ कहलाती है) कन्या का विवाह करे या नील वृष का उत्सर्ग करे।
जो पुत्र वृषोत्सर्ग करता है और गया में श्राद्ध करता है वही पुत्र है, अन्य पुत्र विष्ठा के समान है।
जिसके कोई पूर्वज रौरव आदि नरकों में यातना पा रहे हों, इक्कीस पीढ़ी के पुरुषों के सहित वृषोत्सर्ग करने वाला पुत्र उनको तार देता है। स्वर्ग में गये हुए पितर भी इस प्रकार वृषोत्सर्ग की कामना करते हैं “हमारे वंश में कोई पुत्र होगा, जो वृषोत्सर्ग करेगा”। उसके द्वारा किये गये वृषोत्सर्ग से हम सब परम गति को प्राप्त होगें। हम लोगों को सभी यज्ञों में श्रेष्ठ वृष यज्ञ मोक्ष देने वाला है। इसलिए पितरों की मुक्ति के लिए यथोक्त विधान से सभी प्रयत्नपूर्वक वृषयज्ञ अर्थात वृषोत्सर्ग करना चाहिए। वृषोत्सर्ग करने वाला ग्रहों की तत्तद मन्त्रों से स्थापना और पूजा करके होम करें तथा शास्त्रानुसार वृषभ की माता गौओं की पूजा करें।
बछड़ा और बछड़ी को ले जाकर उन्हें कंकण बाँधे और वैवाहिक विधान की विधि के अनुसार स्तम्भ में उन्हें बाँध दे।
फिर बछड़ा और बछड़ी को रुद्रकुम्भ के जल से स्नान कराए, गन्ध और माल्य से सम्यक पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करे। तदनन्तर वृष के दक्षिण भाग में त्रिशूल और वामपार्श्व में चक्र चिन्हित करे तब उसे छोड़ते हुए हाथ जोड़कर पुत्र इस मन्त्र को पढ़े।
पूर्वकाल में ब्रह्मा के द्वारा निर्मित तुम वृषरूपी धर्म हो, तुम्हारे उत्सर्ग करने से तुम भवार्णव से पार लगाओ। इस मन्त्र से नमस्कार करके बछड़ा और बछड़ी को छोड़ दे।
भगवान विष्णु ने कहा – इस प्रकार जो वृषोत्सर्ग करता है, मैं सदा उसे वर प्रदान करता हूँ और प्रेत को मोक्ष प्रदान करता हूँ। अत: वृषोत्सर्ग कर्म अवश्य करना अचहिए। अपनी जीवितावस्था में भी वृषोत्सर्ग करने पर वही फल प्राप्त होता है।
पुत्रहीन मनुष्य तो स्वयं अपने उद्देश्य से वृषोत्सर्ग करके सुक्गपूर्वक परम गति को प्राप्त करता है।
कार्तिक आदि शुभ महीनों में, सूर्य के उत्तरायण होने पर, शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की द्वादशी आदि तिथियों में, सूर्य-चन्द्र के ग्रहणकाल में, पवित्र तीर्थ में, दोनों अयन-संक्रांतियों (मकर-कर्क) में और विषुवत-संक्रांतियों (मेष-तुला) में वृषोत्सर्ग करना चाहिए।
शुभ लग्न और मुहूर्त में पवित्र स्थान में समाहित चित्त होकर विधि जानने वाले शुभ लक्षणों से युक्त ब्राह्मण को बुलाकर जप-होम तथा दान से अपनी देह को पवित्र करके पूर्वोक्त रीति से सभी होमादि कृत्यों का सम्पादन करना चाहिए।
शालग्राम की स्थापना करके वैष्णव श्राद्ध करना चाहिए।
तदनन्तर अपना श्राद्ध करें और ब्राह्मणों को दान दे\ हे पक्षिन ! अपुत्रवान अथवा पुत्रवान जो भी इस प्रकार वृषोत्सर्ग करता है, उस वृषोत्सर्ग से उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है।
अग्निहोत्रादि यज्ञों से और विविध दानों से भी वह गति नहीं होती जो वृषोत्सर्ग से प्राप्त होती है। बाल्यावस्था, कौमार, पौगण्ड, यौवन और वृद्धावस्था में किया गया जो पाप है, वह सब वृषोत्सर्ग से नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, सुरापान करने वाला, गुरुपत्नीगामी, ब्रह्महत्यारा और स्वर्ण की चोरी करने वाला भी वृशोत्सर्ग से पापमुक्त हो जाता है।
(ये लोग महापापी कहे गये हैं) इसलिए हे तार्क्ष्य ! सभी प्रयत्न करके वृषोत्सर्ग करना चाहिए।
तीनों लोक में वृषोत्सर्ग के समान कोई पुण्यकार्य नहीं है। पति और पुत्रवाली स्त्री यदि उन दोनों के सामने मर जाये तो उसके उद्देश्य से वृषोत्सर्ग नहीं करना चाहिए, अपितु दूध देने वाली गाय का दान करना चाहिए।
हे गरुड़ ! जो व्यक्ति वृषोत्सर्ग वाले वृषभ को कन्धे अथवा पीठ पर भार ढोने के काम में प्रयोग करता है, वह प्रलयपर्यन्त घोर नरक में निवास करता है।
जो निर्दयी व्यक्ति मुठ्ठी अर्थात मुक्के अथवा लकड़ी से वृषभ को मारता है, वह एक कल्प तक यम यातना को भोगता है। इस प्रकार वृषोत्सर्ग करके सपिण्डीकरण के पूर्व षोडश श्राद्धों को करना चाहिए। वह मैं तुमसे कहता हूँ। मृत स्थान में, द्वार पर, अर्धमार्ग में, चिता में, शव के हाथ में और अस्थि संचय में – इस प्रकार छ: पिण्ड प्रदान करके दस दिन तक दशगात्र के दस पिण्डों को देना चाहिए। यह प्रथम मलिनषोडशी श्राद्ध कहा जाता है और दूसरा मध्य में किया जाने वाला मध्यमषोडशी कहा जाता है उसके विषय में तुमसे कहता हूँ।
मध्यमषोडशी में (मलिनषोडशी की भाँति ही सोलह पिण्ड होते हैं) पहला पिण्ड भगवान विष्णु को, दूसरा शिव तथा तीसरा सपरिवार यम को प्रदान करें।
चौथा पिण्ड सोमराज, पाँचवां हव्यवाह (हव्य को वहन करने वाले अग्नि) छठा कव्यवाह (कव्य वहन करने वाले अग्नि) तथा सातवाँ पिण्ड काल को प्रदान करें। आठवाँ पिण्ड रुद्र को, नवाँ पुरुष को, दसवाँ प्रेत को और ग्यारहवाँ पिण्ड तत्पुरुष के उद्देश्य से देना चाहिए।
हे खग! तत्त्वविद लोग इसे मध्यमषोडशी कहते हैं। तदनन्तर प्रतिमास के बारह, पाक्षिक, त्रिपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक – इन श्राद्धों को उत्तमषोडशी कहा जाता है।
इनके विषय में मैंने तुम्हें बताया।
हे तार्क्ष्य ! इनको ग्यारहवें दिन चरु बनाकर करना चाहिए। ये अड़तालीस श्राद्ध प्रेतत्व को नष्ट करने वाले हैं। जिस मृतक के उद्देश्य से ये अड़तालीस श्राद्ध किये जाते हैं, वह पितरों की पंक्ति के योग्य हो जाता है। इसलिए पितरों की पंक्ति में प्रवेश दिलाने के लिए षोडशत्रयी (मलिन, मध्यम तथा उत्तमषोडशी) करनी चाहिए\ इन श्राद्धों से विहीन मृतक का प्रेतत्व सुस्थिर हो जाता है और जब तक षोडशत्रयसंज्ञक श्राद्ध नहीं किये जाते, तब तक वह प्रेत अपने द्वारा अथवा दूसरे के द्वारा दी गई कोई वस्तु प्राप्त नहीं करता। इसलिए पुत्र को विधानपूर्वक षोडशत्रयी का अनुष्ठान करना चाहिए।
पत्नी यदि अपने पति के उद्देश्य से इन श्राद्धों को करती है तो उसे अनन्त श्रेय की प्राप्ति होती है।
जो स्त्री अपने मृत पति की और्ध्वदैहिक क्रिया – क्षयाह-श्राद्ध (वार्षिक श्राद्ध) तथा पाक्षिक श्राद्ध (महालय-श्राद्ध) करती है, वह मेरे द्वारा सती कही गई है।
जो स्त्री पति के उपकारार्थ पूर्वोक्त श्राद्धों का अनुष्ठान करने के लिए जीवन धारण करती है और मरे हुए अपने पति की श्राद्धादिरूप से सेवा करती है, वह पतिव्रता है और उसका जीवन सफल है। यदि कोई प्रमाद से, आग से जलकर अथवा जल में डूबकर मरता है, उसके सभी संस्कार यथाविधि करने चाहिए। यदि प्रमाद से, स्वेच्छा से अथवा सर्प के द्वारा मृत्यु हो जाए तो दोनों पक्षों की पंचमी तिथि को नाग की पूजा करनी चाहिए। पृथ्वी पर पीठी से फण की आकृति वाले नाग की रचना करके श्वेत पुष्पों तथा सुगन्धित चन्दन से उसकी पूजा करनी चाहिए। धूप और दीप देना चाहिए तथा तण्डुल और तिल चढ़ाना चाहिए। कच्चे आटे का नैवेद्य और दूध अर्पित करना चाहिए। शक्ति के अनुसार सुवर्न का नाग और गौ ब्राह्मण को दान करना चाहिए।
तदनन्तर हाथ जोड़ करके “नागराज प्रसन्न हों” – इस प्रकार कहना चाहिए।
पुन: उन जीवों के उद्देश्य से नारायण बलि की क्रिया करनी चाहिए। ऎसा करने से मृत व्यक्ति सभी पातकों मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार सम्पूर्ण क्रिया करके एक वर्ष तक अन्न और जल के सहित घट का दान करना चाहिए अथवा संख्यानुसार जल के सहित पिण्डदान करना चाहिए।
इस प्रकार ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके सपिण्डीकरण करना चाहिए और सूतक बीत जाने पर शय्यादान और पददान करना चाहिए। ।।
इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “एकादशाहविधिनिरूपण” नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।।
क्रमश...
अगले लेख में श्री गरुड़ पुराण का तेरहवां अध्याय
साभार~ पं देव शर्मा💐
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#☝आज का ज्ञान
अपनी अपनी समझ ------ एक राजाने सोचा की श्रीमदभागवत कथा को सुनकर राजा परीक्षित का उध्दार हुआ था । यदि मै भी कथा को सुनु तो मेरा भी उध्दार हो जायगा। राजाने कथा सुनाने के लिये एक पण्डित जी को राजी किया। पण्डितजी ने राजाको कथा सुनाई सातवे दिन कथा की पुर्णाहुति हो गयी। राजाने पण्डितजी से आज्ञा लेकर प्रश्न किया की आप मुझे एक बात बताओ कथा सुनाने मे न तो आपने कोई कमी की और न ही सुननेमे मैने कोई कसर छोडी फिर भी मेरा मन अशान्त क्यो है मेरा कल्याण क्यो नही हुआ? पण्डित जी बोले यह मेरी समझसे बाहर की बात है। मेरे गुरुजी ही इस प्रश्नका उत्तर दे सकते है। राजाको लेकर पण्डितजी अपने गुरुजीके पास पहुचे और अपना प्रश्न पूछा। गुरुजीने राजा से कहाँ राजन थोडी देरके लिये आप मुझे राजा मान लो और मेरी आज्ञाका पालन करो।राजा बोले जैसी आपकी आज्ञा।फिर गुरु सैनिकोँ से बोले राजा को और पण्डित जीको खम्भेसे बाँध दो।जब सैनिको ने दोनोँको बाँध दिया| तब गुरु जी पण्डितजीसे बोले की आप राजा के बन्धन खोल दो| तब पण्डित जी बोले मै खुद बधाँ हुँ मैँ राजाको कैसे छुडाऊ। फिर गुरुजीने राजासे कहा की आपही पण्डितजीके बन्धनोँको खोल दो। राजाने भी अपनी असमर्थता जताते हुये कहाँ कि जब मैँ स्वयं बधाँ हुआ हुँ फिर पण्डितजी को कैसे छुडाऊ। गुरुजी बोले कि राजन मैने आपके प्रश्नका उत्तर दे दिया। जो मनुष्य स्वयं संसारके बन्धनो मे अच्छी तरह बँधा हुआ है वह किसी और को कैसे मुक्त करा सकता है।
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🙏*॥ श्रीहरि: ॥*🙏
⚜️ 'देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥'
(गीता-3/11)
प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करके प्रधानतया मनुष्यों से कहा कि आप देवताओं की वृद्धि करें देवता आप की वृद्धि करें; ऐसे परस्पर एक-दूसरे की वृद्धि करते हुए परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।*
*⚜️ इस श्लोक का तात्पर्य है कि घर में जहाँ आप रहते हैं, वहाँ घर का एक-एक सदस्य एक-दूसरे की सेवा करे— सबका भला कैसे हो? सबका कल्याण कैसे हो? सबका लोक-परलोक कैसे सुधरे, आदि- आदि; और बदले में चाहें कुछ भी नहीं, तो हम सभी परम श्रेय को प्राप्त हो जायेंगे। अपने कर्म में जो अभिरत होता है, वह परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। हम सबकी सेवा करें और बदले में दूसरे हमारी सेवा न करके हमें दुःख दें, फिर तो समझो कि निहाल ही हो गये। दुःख भोगने से पाप नष्ट होते हैं और सुख भोगने से पुण्य नष्ट होते हैं। दूसरे हमें दुःख देकर हमारे पाप नष्ट कर रहें हैं, इस रूप में वे हमारा हित ही कर रहे हैं; निष्काम भाव का बड़ा माहात्म्य है।*
*⚜️ एक सत्संग सुनना होता है और एक सत्संग की बातों को काम में लाना होता है, तो सत्संग सुन तो लिया, अब सत्संग की बातें काम में लाना है। ऐसा कोई मनुष्य मिलेगा ही नहीं, जिसमें सब अवगुण ही अवगुण हों, गुण कोई हो ही नहीं, क्योंकि मूल में सभी भगवान् के अंश हैं, तो भगवान् के नाते सबकी सेवा करना है। हमारे में अवगुणों की सत्ता होने पर ही हमारी दृष्टि दूसरों के अवगुणों की तरफ खिंचती है, दूसरों में अवगुण दिखें, तो अपनी निर्दोषता में कमी समझनी चाहिए। 'बाना॰ पूज नफो ले भाई! उणरा औगुण उणरे माहीं॥४०२॥' ॰- साधूवेश।*
*⚜️ देवता सृष्टि की सब व्यवस्था चलाते हैं, वे तो भगवान् की ड्यूटी बजाते हैं; सेवा करने का अधिकार तो मनुष्यों को ही है। भगवान् को याद रखना और संसार की सेवा करना— ये दो खास काम हैं, इसी में मनुष्यता है। किसी कारण से सेवा करने में असमर्थता-निर्बलता मालूम देती हो तो मन से सबका हित चाहने में तो परतन्त्रता है ही नहीं, इसमें सभी स्वतंत्र हैं। हमें जो कुछ मिला है संसार से ही मिला है, संसार से मिले हुए बल, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य आदि अपने हैं ही नहीं। ये संसार के ही हैं और संसार के लिए ही हैं; इन्हें अपने लिए मानना बन्धन है और इन्हें अपना नहीं मानकर, संसार की सेवा में लगा देना मुक्ति है।*
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#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
माद्री के साथ पाण्डु का विवाह तथा राजा पाण्डु की दिग्विजय...(दिन 338)
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वैशम्पायन उवाच
ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः ।
विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान् मतिम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर शान्तनुनन्दन परम बुद्धिमान् भीष्मजीने यशस्वी राजा पाण्डुके द्वितीय विवाहके लिये विचार किया ।। १ ।।
सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्थ ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम ।। २ ।।
वे बूढ़े मन्त्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों तथा चतुरंगिणी सेनाके साथ मद्रराजकी राजधानीमें गये ।। २ ।।
तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं बाह्लीकपुङ्गवः ।
प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ।। ३ ।।
बाह्लीकशिरोमणि राजा शल्य भीष्मजीका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये नगरसे बाहर आये और यथोचित स्वागत सत्कार करके उन्हें राजधानीके भीतर ले गये ।। ३ ।।
दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्य तथैव च ।
मधुपर्क च महेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ।। ४ ।।
वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा मधुपर्क अर्पण करके मद्रराज ने भीष्मजी से उनके आगमन का प्रयोजन पूछा ।। ४ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः ।
आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ।। ५ ।।
तब कुरुकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजीने मद्रराजसे इस प्रकार कहा
- 'शत्रुदमन ! तुम मुझे कन्या के लिये आया हुआ समझो ।। ५ ।।
श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी ।
तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ।। ६ ।।
'सुना है, तुम्हारी एक यशस्विनी बहिन है, जो बड़े साधु स्वभावकी है; उसका नाम माद्री है। मैं उस यशस्विनी माद्रीका अपने पाण्डुके लिये वरण करता हूँ ।। ६ ।।
युक्तरूपो हि सम्बन्धे त्वं नो राजन् वयं तव ।
एतत् संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान् यथाविधि ।। ७ ।।
'राजन्! तुम हमारे यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा योग्य हो और हम भी तुम्हारे योग्य हैं। मद्रेश्वर ! यों विचारकर तुम हमें विधिपूर्वक अपनाओ' ।। ७ ।।
तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः । न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ।। ८ ।।
भीष्मजीके यों कहनेपर मद्रराजने उत्तर दिया- 'मेरा विश्वास है कि आपलोगोंसे श्रेष्ठ वर मुझे ढूँढ़नेसे भी नहीं मिलेगा' ।। ८ ।।
पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित् कुलेऽस्मिन् नृपसत्तमैः । साधु वा यदि वासाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ।। ९ ।।
'परंतु इस कुलमें पहलेके श्रेष्ठ राजाओंने कुछ शुल्क लेनेका नियम चला दिया है। वह अच्छा हो या बुरा, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ।। ९ ।।
व्यक्तं तद् भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः । न च युक्तं तथा वक्तुं भवान् देहीति सत्तम ।। १० ।।
'यह बात सबपर प्रकट है, निःसंदेह आप भी इसे जानते होंगे। साधुशिरोमणे ! इस दशामें आपके लिये यह कहना उचित नहीं है कि मुझे कन्या दे दो' ।। १० ।।
कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् ।
तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ।। ११ ।।
'वीर! वह हमारा कुलधर्म है और हमारे लिये वही परम प्रमाण है। शत्रुदमन ! इसीलिये मैं आपसे निश्चितरूपसे यह नहीं कह पाता कि कन्या दे दूँगा' ।। ११ ।।
तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः । धर्म एष परो राजन् स्वयमुक्तः स्वयम्भुवा ।। १२ ।।
यह सुनकर जनेश्वर भीष्मजीने मद्रराजको इस प्रकार उत्तर दिया- 'राजन् ! यह उत्तम धर्म है। स्वयं स्वयम्भू ब्रह्माजीने इसे धर्म कहा है' ।। १२ ।।
नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैधिरयं कृतः ।
विदितेय च ते शल्य मर्यादा साधुसम्मता ।। १३ ।।
'यदि तुम्हारे पूर्वजोंने इस विधिको स्वीकार कर लिया है तो इसमें कोई दोष नहीं है। शल्य ! साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम्हारी यह कुलमर्यादा हम सबको विदित है' ।। १३ ।।
इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् । रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात् सहस्रशः ।। १४ ।।
गजानश्वान् रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च।
मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृञ्जच्छूभम् ।। १५ ।।
यह कहकर महातेजस्वी भीष्मजीने राजा शल्यको सोना और उसके बने हुए आभूषण तथा सहस्रों विचित्र प्रकारके रत्न भेंट किये। बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, अलंकार तथा मणि-मोती और मूँगे भी दिये ।। १४-१५ ।।
तत् प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः सम्प्रीतमानसः।
ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ।। १६ ।।
वह सारा धन लेकर शल्य का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपनी बहिन को वस्त्राभूषणों से विभूषित करके राजा पाण्डुके लिये कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी को सौंप दिया ।। १६ ।।
स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः।
आजगाम पुरीं धीमान् प्रविष्टो गजसाह्वयम् ।। १७ ।।
परम बुद्धिमान् गंगानन्दन भीष्म माद्री को लेकर हस्तिनापुर में आये ।। १७ ।।
तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसम्मते ।
जग्राह विधिवत् पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ।। १८ ।।
तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा अनुमोदित शुभ दिन और सुन्दर मुहूर्त आने पर राजा पाण्डुने माद्री का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ।। १८ ।।
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः ।
स्थापयामास तां भार्या शुभे वेश्मनि भाविनीम् ।। १९ ।।
इस प्रकार विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर कुरुनन्दन राजा पाण्डुने अपनी कल्याणमयी भार्याको सुन्दर महलमें ठहराया ।। १९ ।।
स ताभ्यां व्यचरत् सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः ।
कुन्त्या माद्रया च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ।। २० ।।
राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुन्ती और माद्रीके साथ आनन्दपूर्वक यथेष्ट विहार करने लगे ।। २० ।।
ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः ।
जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत् पुरात् प्रभो ।। २१ ।।
जनमेजय ! कुरुवंशी राजा पाण्डु तीस रात्रियोंतक विहार करके समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा लेकर राजधानीसे बाहर निकले ।। २१ ।।
स भीष्मप्रमुखान् वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च ।
धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान् कुरुसत्तमान् । आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ।। २२ ।।
मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः ।
गजवाजिरथीघेन बलेन महतागमत् ।। २३ ।।
उन्होंने भीष्म आदि बड़े-बूढ़ों के चरणों में मस्तक झुकाया। कुशनन्दन धृतराष्ट्र तथा अन्य मिलने पर मंगलाचारयुत्ह आशीर्वादों से अभिनन्दित हो हाथी, घोड़ों तथा रथसमुदाय से युक्त विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया ।। २२-२३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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