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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
. ꧁ श्री राम भुजंग प्रयात स्तोत्रम् ꧂ पोस्ट- ०१ आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री राम भुजंगप्रयात स्तोत्र भगवान राम की स्तुति में गाया जाने वाला एक अत्यंत सुंदर, ऊर्जावान और भावपूर्ण स्तोत्र है। भुजंगप्रयात छंद में रचित इस २९ श्लोकों के स्तोत्र में राम के सगुण और निर्गुण, दोनों स्वरूपों की महिमा गाई गई है, जो जीवन में बाधाओं को दूर करने और आत्म-ज्ञान प्राप्ति में सहायक माना जाता है। *स्तोत्र में श्री राम के अपरिवर्तनीय स्वरूप का उल्लेख है, जो ब्रह्म है, असीम सत्ता है, श्री राम भगवान के रूप में हैं और श्री राम धर्म के एक संबंधपरक, अत्यंत प्रिय और पूजनीय स्वरूप हैं।* श्लोकों को लयबद्ध और स्मरणीय बनाने के लिए, स्तोत्रों की रचना विभिन्न छंदों में की जाती है। इस स्तोत्र का नाम *“भुजंग प्रयात"* छंद पर आधारित है। “भुजंग प्रयात” एक छंद शैली है जो एक सर्प के चलने के समान लय में होती है, अर्थात् एक लयबद्ध गति जो काव्य में अद्वितीय सौंदर्य और प्रवाह उत्पन्न करती है। इस स्तोत्र में भगवान राम के दिव्य गुणों, उनकी लीलाओं, और उनकी महानता का वर्णन किया गया है, जो भक्तों के हृदय में भगवान के प्रति असीम श्रद्धा और भक्ति को जागृत करता है। *विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपं गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम् ।* *महान्तं विभान्तं गुहान्तं गुणान्तं सुखान्तं स्वयं धाम रामं प्रपद्ये ॥१॥* शिवं नित्यमेकं विभुं तारकाख्यं सुखाकारमाकारशून्यं सुमान्यम् । महेशं कलेशं सुरेशं परेशं नरेशं निरीशं महीशं प्रपद्ये ॥२॥ *यदावर्णयत्कर्णमूलेऽन्तकाले शिवो राम रामेति रामेति काश्याम् ।* *तदेकं परं तारकब्रह्मरूपं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहम् ॥३॥* महारत्नपीठे शुभे कल्पमूले सुखासीनमादित्यकोटिप्रकाशम् । सदा जानकीलक्ष्मणोपेतमेकं सदा रामचन्द्रं भजेऽहं भजेऽहम् ॥४॥ *क्वणद्रत्नमञ्जीरपादारविन्दं लसन्मेखलाचारुपीताम्बराढ्यम् ।* *महारत्नहारोल्लसत्कौस्तुभाङ्गं नदच्चञ्चरीमञ्जरीलोलमालम् ॥५॥* लसच्चन्द्रिकास्मेरशोणाधराभं समुद्यत्पतङ्गेन्दुकोटिप्रकाशम् । नमद्ब्रह्मरुद्रादिकोटीररत्न- स्फुरत्कान्तिनीराजनाराधिताङ्घ्रिम् ॥६॥ *पुरः प्राञ्जलीनाञ्जनेयादिभक्तान् स्वचिन्मुद्रया भद्रया बोधयन्तम् ।* *भजेऽहं भजेऽहं सदा रामचन्द्रं त्वदन्यं न मन्ये न मन्ये न मन्ये ॥७॥* यदा मत्समीपं कृतान्तः समेत्य प्रचण्डप्रकोपैर्भटैर्भीषयेन्माम् । तदाविष्करोषि त्वदीयं स्वरूपं तदापत्प्रणाशं सकोदण्डबाणम् ॥८॥ *निजे मानसे मन्दिरे सन्निधेहि प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र ।* *ससौमित्रिणा कैकयीनन्दनेन स्वशक्त्यानुभक्त्या च संसेव्यमान ॥९॥* स्वभक्ताग्रगण्यैः कपीशैर्महीशै-रनीकैरनेकैश्च राम प्रसीद । नमस्ते नमोऽस्त्वीश राम प्रसीद प्रशाधि प्रशाधि प्रकाशं प्रभो माम् ॥१०॥ *त्वमेवासि दैवं परं मे यदेकं सुचैतन्यमेतत्त्वदन्यं न मन्ये ।* *यतोऽभूदमेयं वियद्वायुतेजो-जलोर्व्यादिकार्यं चरं चाचरं च ॥११॥* नमः सच्चिदानन्दरूपाय तस्मै नमो देवदेवाय रामाय तुभ्यम् । क्षनमो जानकीजीवितेशाय तुभ्यं नमः पुण्डरीकायताक्षाय तुभ्यम् ॥१२॥ *नमो भक्तियुक्तानुरक्ताय तुभ्यं नमः पुण्यपुञ्जैकलभ्याय तुभ्यम् ।* *नमो वेदवेद्याय चाद्याय पुंसे नमः सुन्दरायेन्दिरावल्लभाय ॥१३॥* नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वभोक्त्रे नमो विश्वमात्रे । नमो विश्वनेत्रे नमो विश्वजेत्रे नमो विश्वपित्रे नमो विश्वमात्रे ॥१४॥ *नमस्ते नमस्ते समस्तप्रपञ्च- प्रभोगप्रयोगप्रमाणप्रवीण ।* *मदीयं मनस्त्वत्पदद्वन्द्वसेवां विधातुं प्रवृत्तं सुचैतन्यसिद्ध्यै ॥ १५॥* शिलापि त्वदङ्घ्रिक्षमासङ्गिरेणु-प्रसादाद्धि चैतन्यमाधत्त राम । नरस्त्वत्पदद्वन्द्वसेवाविधानात् सुचैतन्यमेतीति किं चित्रमत्र ॥१६॥ *पवित्रं चरित्रं विचित्रं त्वदीयं नरा ये स्मरन्त्यन्वहं रामचन्द्र ।* *भवन्तं भवान्तं भरन्तं भजन्तो लभन्ते कृतान्तं न पश्यन्त्यतोऽन्ते ॥१७॥* स पुण्यः स गण्यः शरण्यो ममायं नरो वेद यो देवचूडामणिं त्वाम् । सदाकारमेकं चिदानन्दरूपं मनोवागगम्यं परं धाम राम ॥१८॥ *प्रचण्डप्रतापप्रभावाभिभूत-प्रभूतारिवीर प्रभो रामचन्द्र ।* *बलं ते कथं वर्ण्यतेऽतीव बाल्ये यतोऽखण्डि चण्डीशकोदण्डदण्डः ॥१९॥* दशग्रीवमुग्रं सपुत्रं समित्रं सरिद्दुर्गमध्यस्थरक्षोगणेशम् । भवन्तं विना राम वीरो नरो वाऽसुरो वाऽमरो वा जयेत्कस्त्रिलोक्याम् ॥२०॥ *सदा राम रामेति रामामृतं ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् ।* *पिबन्तं नमन्तं सुदन्तं हसन्तं हनूमन्तमन्तर्भजे तं नितान्तम् ॥२१॥* सदा राम रामेति रामामृतं ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् । पिबन्नन्वहं नन्वहं नैव मृत्यो-र्बिभेमि प्रसादादसादात्तवैव ॥२२॥ *असीतासमेतैरकोदण्डभूषै - रसौमित्रिवन्द्यैरचण्डप्रतापैः ।* *अलङ्केशकालैरसुग्रीवमित्रै – ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥२३॥* अवीरासनस्थैरचिन्मुद्रिकाढ्यै- रभक्ताञ्जनेयादितत्त्वप्रकाशैः । अमन्दारमूलैरमन्दारमालै- ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥२४॥ *असिन्धुप्रकोपैरवन्द्यप्रतापै- रबन्धुप्रयाणैरमन्दस्मिताढ्यैः ।* *अदण्डप्रवासैरखण्डप्रबोधै- ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥२५॥* हरे राम सीतापते रावणारे खरारे मुरारेऽसुरारे परेति । लपन्तं नयन्तं सदा कालमेवं समालोकयालोकयाशेषबन्धो ॥२६॥ *नमस्ते सुमित्रासुपुत्राभिवन्द्य नमस्ते सदा कैकयीनन्दनेड्य ।* *नमस्ते सदा वानराधीशवन्द्य नमस्ते नमस्ते सदा रामचन्द्र ॥२७॥* प्रसीद प्रसीद प्रचण्डप्रताप प्रसीद प्रसीद प्रचण्डारिकाल । प्रसीद प्रसीद प्रपन्नानुकम्पिन् प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र ॥२८॥ *भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारं मुदा रामचन्द्रस्य भक्त्या च नित्यम् ।* *पठन्सन्ततं चिन्तयन्स्वान्तरङ्गे स एव स्वयं रामचन्द्रः स धन्यः ॥२९॥* *“श्री राम भुजंग प्रयात स्तोत्रम् ”* एक अत्यंत प्रभावशाली और भक्तिमय स्तोत्र है जो भगवान श्रीराम की महिमा का गान करता है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। *आदिशंकराचार्य जी द्वारा रचित यह स्तोत्र भगवान राम के प्रति गहन भक्ति का प्रतीक है और भक्तों के लिए आशीर्वाद स्वरूप है।* कल से श्लोक अर्थ सहित... *┈┉❀꧁ जय जय सियाराम ꧂❀┉┈* #🙏🏻सीता राम #🎶जय श्री राम🚩 #🙏रामायण🕉
🙏🏻सीता राम - ।I श्री राम भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम ಊ rnc unmuta Lrautlaee V 2aal Pnall0e पोस्ट ०१ ।I श्री राम भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम ಊ rnc unmuta Lrautlaee V 2aal Pnall0e पोस्ट ०१ - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #☝अनमोल ज्ञान "गंदा गंदा दे दो, बढ़िया बढ़िया ले लो। क्या बढ़िया सौदा है।" श्याम सुंदर ने उसी का सब कुछ लुटा है, जिसने उनसे कहा है हमारा सब कुछ लूट लो। अपने घर में बुलाया है बाकायदा आओ लूटो। देखो हम लोगों ने नहीं बुलाया तो उनकी हिम्मत नहीं है कि हमारा कुछ लूट ले। और लूटा भी तो क्या लूटा? ये और आश्चर्य सुनो! जीव के पास क्या है? सब गंदी गंदी चीज चीजें हैं। पंचक्लेश; अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पांच क्लेश होते हैं। इनसे हम दुखी हैं। वो लूट ले जाते हैं। अब तुम्हारे पास यह पांचों नहीं रहेंगे। हम ले जा रहे हैं। अविद्या माने अज्ञान, अस्मिता माने अहंकार, राग संसार से अटैचमेंट, द्वेष संसार में कहीं ना कहीं दुश्मनी, अभिनिवेश माने मृत्यु का डर हम मर ना जाए, हम मर ना जाए। बुखार आया हम मर ना जाए। हर जगह हर समय हम मर ना जाए। देखो बड़े-बड़े आदमियों के पीछे 500 आदमियों की लाइन लगी रहती है पुलिस और मिलिट्री की। कोई मार ना दे, हम मर ना जाए। यह पांच क्लेश हैं। भगवान कहते हैं हम ले जा रहे हैं। अरे ये तो अच्छी बात है। ये कोई बुरी बात थोड़े ही है। पंचकोष इनसे भी हम दुखी हैं। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनंदमय कोष। भगवान कहते हैं मैं ले जा रहा हूं उसको भी। तीन प्रकार का शरीर। यह पंच महाभूत का शरीर। सूक्ष्म शरीर जो मरने के बाद साथ जाता है। और कारण शरीर जो महाप्रलय में भगवान के महोदर में रहता है। ये तीन शरीरों का बंधन है हमारा। भगवान कहते हैं ले जा रहा हूं लूट के। अब तुमको यह गंदा शरीर नहीं मिलेगा, 84 लाख में घुमाने वाला। रोज बीमार है, रोज डॉक्टरों के शरणागत हो रहा है। और फिर ये स्थूल शरीर को छोड़ दो। यह कम बीमार हो ना हो मान लिया। यह मन की बीमारी। यह सूक्ष्म शरीर का रोग तो बड़ा भयानक है। कामनाएं पैदा होती हैं। नहीं पूरी हुई तो क्रोध आया। पूरी हो गई तो लोभ आया। फिर आगे बढ़ो। फिर अरबपति बनो। फिर और आगे चलो। भगवान कहते हैं मैं ले जा रहा हूं। और सबसे बड़ी बात हमारे अनंत जन्मों के पाप पुण्य वो अनलिमिटेड अनंत हैं। अरे हम एक जन्म में हजारों अच्छे बुरे कर्म करते हैं और जन्म ही अनंत हो चुके, तो फिर कर्म की क्या गिनती है? और हमने दोनों प्रकार के कर्म किए हैं। अच्छे भी किए हैं बुरे भी किए हैं। याद नहीं हैं यह बात अलग है। यह पाप और पुण्य इन्हीं दोनों से प्रारब्ध बन के आता है, संचित कर्म से। जो सबको भोगना पड़ता है। भगवत्प्राप्ति कर लेने वाले महापुरुष को भी भोगना पड़ता है। उसको भी कैंसर होगा। वो भी रोगग्रस्त होगा। वो भी मरेगा। उसको भी बुढ़ापा आएगा। तो भगवान कहते हैं हम ये सब ले जा रहे हैं। माफ कर दिया तुम्हारा सब फाइल जला दी। *अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।* तुमने अपने घर में बुला लिया लूटो बस हम सब ले जा रहे हैं। और आगे भी तुम कोई अच्छा बुरा कर्म ना कर पाओगे, यह भी हम ठेका ले रहे हैं। भूत भूतकाल के तो सब माफ कर दिए और भविष्य में कोई कर्म तुम कर ही नहीं सकते। क्यों? हमारे शरीर, इंद्रिय, मन, बुद्धि नहीं रहेंगे क्या? रहेंगे लेकिन तुम्हारे कर्म का फल नहीं मिलेगा। चाहे जो करो तुम आजाद हो। स्वयं चरती मुनयो करोड़ों मर्डर करो अर्जुन हनुमान जी जला दो लंका। हमारे देखो देश में प्रेसिडेंट की गाड़ी का चालान नहीं होता। कोई मर जाए मर जाओ। तो ऐसे ही भगवत्प्राप्ति के बाद किसी महापुरुष को ना पाप छू सकता है ना पुण्य छू सकता है। वैसे अलग हो गए। तो हम ये सब ले जा रहे हैं। यानी आगे का भी मामला साफ। पिछला भी साफ। और ये हम जबरदस्ती नहीं कर रहे हैं। तुमने बुलाया है कंप्लीट सरेंडर पूर्ण शरणागति वाले का लूटता हूं मैं। जो लुटाने को तैयार हो जाए सेंट परसेंट। आओ लूटो। और अगर कोई कहे मेरे पास जो है मैं नहीं दूंगा। *सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।* एक कुत्ता सूखी हड्डी मुंह में चबा रहा था। चबाते चबाते उसी के गले एक खून निकलने लगा अपने खून लपेट के हड्डा में और चूस रहा है और समझ रहा है कि हड्डी से खून मिल रहा है। और जब शेर को आते देखता है तो अपनी हड्डी ले भागता है ये छीन लेगा इस डर से। अरे भला शेर कुत्ते के मुख की हड्डी क्या करेगा ? वो तो हाथी वगैरह का शिकार करता है। ऐसे ऐसे ही हम लोग हैं भगवान के अवतार मिले अनंत बार संत महात्मा मिल अनत बार लेकिन सब जगह गंदी भावना की। हे ये हमसे कुछ लेने आया है। [हंसी] हमारे पास 4 लाख है ना उसी पे निगाह है इसकी। [हंसी] तो ये हमारी जो शंका इससे भगवान का लाभ आज तक नहीं मिला। भगवान ने हमारा कुछ भी नहीं लूटा हमारे कर्म का फल दे दिया। तुमने जो कमाया है लो। और जिसने ये जान लिया अरे गंदा गंदा दे दो, बढ़िया बढ़िया ले लो। क्या बढ़िया सौदा है। तन गंदा, मन गंदा सब गड़बड़ यही भगवान मांग रहे हैं दे दो और उनके यहां से फिर अनंत आनंद अनंत ज्ञान और उनका लोक और सदा को यानी लुटाने के लिए जिसने प्रार्थना पत्र दिया और सचमुच से थ्योरिटिकल नहीं वो तो हम लोग रोज करते हैं - *त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।* मंदिर में बोलते हैं ऐसे यानी तुम ही मेरे सब कुछ हो लेकिन एक हिदायत एक सूचना मकान के पर लगी है। तुम्हारा सब कुछ है लेकिन ले जाने की परमिशन नहीं है, बस देख लो। ये हम लोग करते हैं। तो शरणागत जो हो गया उसी का हृदय शुद्ध होगा। जिसका हृदय शुद्ध होगा उसी के हृदय में भगवान आएंगे। और उसी के लिए ये सब कृपाएं करते हैं। जिसको हम कह रहे हैं लुटेरा। तूने सब कुछ लूट लिया। *- जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज*
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#🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #😍हनुमान जी के रोचक किस्से📖 #🙏हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🚩 हनुमान जी वानरराज सुग्रीव के साथ पहले किष्किंधा रहते थे पर प्रभु राम के साथ बाद में अयोध्या आ गए, वह कुछ समय मकरध्वज के पास आज के दक्षिण अमेरिका के होंडूरास (पूर्व माया सभ्यता ) में भी रहे, कुछ समय तक अफ्रीका के कुछ जगहों पर भी उनका निवास हुआ। त्रेता युग के समापन के बाद हनुमान जी किम्पुरुष वर्ष में निवास करने लगे। किम्पुरुष वर्ष हिमालय के उत्तर में हेमकीता के निकट का क्षेत्र है जिसका वर्णन पौराणिक आख्यायनों किया गया है। ऐसा माना जाता है यहाँ के लोगों की आयु सामान्यत: दस हजार वर्ष की होती है। यहाँ यति, नरसिंघ, रीछ, वानर गण के लोग रहते हैं। एशिया के अतिरिक्त हनुमान जी की आज भी लैटिन अमेरिका अफ्रीका के देशों में उपासना होती है। उनकी मूर्तियां जो हजारों बरस पुरानी हैं, प्रायः पुरानी सभ्यता वाली जगहों पर मिलती हैं। हनुमान जी व्याकरण (शब्द शास्त्र) के आचार्य हैं, क्योंकि बातचीत के समय उनके मुख से कोई त्रुटि नहीं होती है। सुर, नर, नाग, गन्धर्व से भी बढ़कर हनुमान जी ने अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण किया हुआ है। कर्नाटक में एक जगह हनुमान जी की पत्नी के साथ पूजा होती है किंतु वह विवाह प्रतीकात्मक था जो उन्होंने सूर्य की पुत्री के साथ किया था। हनुमान जी शैव और वैष्णव के मध्य सेतु हैं। वह एकादश रूद्र हैं जो विष्णु अवतार भगवान राम के अनन्य भक्त हैं।हनुमान जी की पूजा के बिना भगवान श्रीराम की पूजा पूर्ण फलदाई नहीं होती है। हनुमान जी तेज एवं बल में श्रीराम और लक्ष्मण के समान है। हनुमान जी ऐसा कोई पराक्रम प्रकट नहीं करते हैं, जिससे प्रभु श्रीराम के यश - कीर्ति का क्षय हो। हनुमान जी ऐसे एकमात्र राम के सेवक हैं जिन्हें माता सीता ने अपना पुत्र कहा था। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के समय हनुमान जी चार समुद्र और 500 नदियों से जल लाए थे। यह उनकी असाधारण शक्ति का द्योतक है। हनुमान जी की कृपा से समस्त व्याधियों से छुटकारा प्राप्त होता है। हनुमान जी बुद्धि, विवेक, धैर्य और विनम्रता के स्रोत हैं। छोटे बालक से लेकर वयोवृद्ध के हृदय में एक समान भाव के साथ विद्यमान बजरंग बली हर उस स्थान पर रहते हैं जहाँ राम कथा का पारायण होता है। राम कथा कहने से पहले बजरंगी का आह्वाहन किया जाता है और उनके लिए अलग चौकी रखी जाती है जिस पर बैठ कर वह कथा सुनते हैं। हर सनातनी के कंठ और घर में हनुमान चालीसा स्थापित है। हर भय से अभय होने का राम बाण उपाय हनुमान चालीसा का पाठ है। कुबेर से प्राप्त कौमोदकी गदा से समस्त बाधाओं का नाश करने वाले बजरंगी का आज जन्मोत्सव है, आज के दिन माता अंजनी की गोद में हनुमान जी बालरूप में प्रकट हुए थे, सभी सनातनियों को इस मंगल वेला की बधाई। बजरंगी का आशीर्वाद और कृपा इस देश और हम सनातनियों पर बनी रहे। जय बजरंग बली 🙏
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🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *̊सनातन धर्म बहुत ही विस्तृत एवं ज्ञानप्रद है ! सनातन धर्म की सबसे बड़ी पूंजी उसके धर्मग्रंथ हैं ! चार वेद , चार उपवेद , अनेकों संहितायें , १८ महापुराण , १८ उपपुराण , १८ औपपुराण , छह शास्त्र एवं अनगिनत उपनिषद हमारे महान ऋषियों के द्वारा लिखे गए ! इन धर्मग्रंथो का आधार रहा है सत्संग ! सत्संग के माध्यम से ऋषियों को जिज्ञासा हुई और उन्हीं जिज्ञासाओं के समाधान में सनातन धर्म के धर्मग्रंथ बनते चले गए ! जीवन की कोई ऐसी समस्या नहीं है , कोई ऐसी जिज्ञासा नहीं है जिसका समाधान हमारे इन धर्मग्रंथो में न हो ! नवधा भक्ति में प्रथम भक्ति सत्संग को बताया गया क्योंकि सत्संग के माध्यम से ही जिज्ञासा उत्पन्न होती है , जिसे अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ के सामने रखकर उसका समाधान प्राप्त किया जाता है ! पुराणों में यह देखने को मिलता है कि ऋषियों ने सूतजी से अपनी जिज्ञासा रखी और उन्हीं जिज्ञासाओं का आधार लेकर के भगवत लीलाओं का वर्णन इन पुराणों में किया गया है ! सबसे विशेष बात यह है कि हमारे महान ऋषियों की जिज्ञासाएं भगवान के प्रति , उनकी लीलाओं के प्रति , जीवन के प्रति कि जीवन को कैसे सुंदर बनाया जाय , मृत्योपरांत आत्मा का कल्याण कैसे हो ? इस विषय पर होती थी ! हमारे धर्मग्रंथो में जीवन में क्या करना चाहिए , क्या करने के बाद भगवत्प्राप्ति हो सकती है यह सब कुछ वर्णित है ! इसीलिए सनातन धर्म के अनुयायियों को अपने धर्म ग्रंथो का अध्ययन अवश्य करना चाहिए ! जो भी मनुष्य अपने धर्म ग्रंथो का गहनता से अध्ययन करता है उसके लिए कोई भी जिज्ञासा अनुत्तरित नहीं रह जाती है , परंतु आज शायद समय परिवर्तित हो गया क्योंकि आज प्राय: लोग धर्म ग्रंथो से दूर होते चले जा रहे हैं यह चिंतनीय विषय है !* *आज अनेकों प्रकार के सत्संग सोशल मीडिया पर विद्वानों के द्वारा किए जा रहे हैं ! व्हाट्सएप एवं अन्य माध्यमों से नित्य सत्संग की सभाएं सज रही है परंतु कई बार तो विषय इतना हास्यास्पद होता है की बड़ा कष्ट होता है क्योंकि आज इन सत्संगों में आत्म कल्याण के लिए कोई जिज्ञासा आ ही नहीं रही है ! मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह देखकर कभी-कभी हंसता हूं और कभी-कभी बड़ा कष्ट होता है कि आज के धर्मावलंबी आत्म कल्याण विषयक कोई भी जिज्ञासा नहीं रखना चाहते ! आज कोई यह जानना चाहता है कि हनुमान जी के कितने पिता थे और कोई यह जानना चाहता है कि कौशल्या कैकेयी और सुमित्रा इन तीनों रानियों की आयु में कितना अंतर था ? विचारणीय विषय है यह है कि इन जिज्ञासाओं के माध्यम से आत्म कल्याण कैसे हो सकता है ? परंतु आज हम अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन करना ही नहीं चाह रहे है ! सब कुछ गूगल पर प्राप्त कर लेने वाला मनुष्य अपने मस्तिष्क में अनेकों प्रकार की जिज्ञासाएं लिए घूमता है ! यदि यही व्यक्ति अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन करने लगे तो शायद कोई जिज्ञासा ही ना बचे ! सत्संग होना अच्छी बात है , जिज्ञासा प्रस्तुत करना भी बहुत अच्छी बात है परंतु जिज्ञासाएं ऐसी होनी चाहिए जिससे आत्मकल्याण हो और साथ ही मृत्युोपरांत भी जीवन कैसे सुधार सकते हैं परंतु आज ऐसा होता दिख नहीं रहा है !* *यदि जीवन को सुंदर बनाना है और जीवन के बाद अपनी आत्मा का कल्याण करना है तो आत्मकल्याण विषयक जिज्ञासाएं रखकर उनका समाधान प्राप्त करना चाहिए और अपने धर्मग्रंथो का अध्ययन अवश्य करना चाहिए जिससे कि अनेक जिज्ञासाएं स्वमेव शांत हो जाएंगी !* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🎶जय श्री राम🚩
🙏 प्रेरणादायक विचार - ऊँ श्री परमात्मने नमः उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध | निज प्रभुमय देखहिं जगत् केहि सन करहिं बिरोध II भावार्थ- (शिव जी कहते हैं-) हे उमा! जो श्रीराम जी के चरणों के प्रेमी हैं और काम , अभिमान तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत् को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें।। @LUCKY VERMA LIKE SHARE FOLLOW ऊँ श्री परमात्मने नमः उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध | निज प्रभुमय देखहिं जगत् केहि सन करहिं बिरोध II भावार्थ- (शिव जी कहते हैं-) हे उमा! जो श्रीराम जी के चरणों के प्रेमी हैं और काम , अभिमान तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत् को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें।। @LUCKY VERMA LIKE SHARE FOLLOW - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #☝अनमोल ज्ञान #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏सुविचार📿 🌟 || समाधान खोजना सीखें || 🌟 जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं इस प्रकृति के पास जिसका समाधान ही न हो। समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो लेकिन उसका कोई न कोई समाधान अवश्य होता है। हमें समस्या का डटकर सामना करना आना चाहिए क्योंकि समस्या मुकाबला करने से दूर होती है, मुकरने से नहीं। इस प्रकृति का एक नियम यह भी है, कि यहाँ सदैव एक दूसरे द्वारा अपने से दुर्बल को ही सताया जाता है। जहाँ हमारा मनोबल कमजोर पड़ जाता है, वहीं समस्याओं द्वारा हमें घेर लिया जाता है। दुःखों के साथ भी ठीक ऐसा ही होता है। जितना हम दुःखों से भागने का प्रयास करेंगे, उतना दुःख हमारे ऊपर हावी होते जायेंगे। स्वामी विवेकानंद जी कहा करते थे कि दुःख बंदरों की तरह होते हैं, जो पीठ दिखाने पर पीछा किया करते हैं और सामना करने पर भाग जाते हैं। हताश एवं निराश बैठने की अपेक्षा समाधान खोजना सीखें। समस्या का डटकर मुकाबला करना ही समस्या को दूर भगाने का सर्वोत्तम उपाय है।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - Good morning Good morning - ShareChat
#संस्कृत सुभाषित प्रीणाति य: सुचरितै: पितरं स पुत्रो यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् । तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद् एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥ [ किरातर्जुनीयम , सर्ग- ११ , श्लोक- ४० ] अर्थात् 👉🏻 जो अपने सदाचरण से पिता को प्रसन्न/संतुष्ट रखे , वही वास्तव में पुत्र है । जो सदैव अपने पति की शुभेच्छु हो , वही पत्नी है । जो सुख-दुख में सदैव समान भाव रखे , वही वास्तविक मित्र है तथा ये तीनों उसी को प्राप्त होते हैं जिसने संसार में पुण्यकर्म किए हों । 🌄🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌄
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का अनुताप, संन्यास लेने का निश्चय तथा पत्नियों के अनुरोध से वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश...(दिन 349) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् । सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई-बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ।। १ ।। पाण्डुरुवाच सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ।। २ ।। पाण्डु बोले-खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते हैं और अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ।। २ ।। शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ।। ३ ।। हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ।। ३ ।। तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् ।। ४ ।। उन्हीं कामासक्त नरेश की पत्नी से वाणी पर संयम रखने वाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन ने मुझे उत्पन्न किया ।। ४ ।। तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ।। ५ ।। मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी ।। ५ ।। मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् । सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ।। ६ ।। अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याण है। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पिता वेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहीं होता ।। ६ ।। अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ।। ७ ।। चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ।। ८ ।। मैं अपने शरीर और मनको निःसंदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अब अकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचे फलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमें विचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवास होगा ।। ७-८ ।। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। ९ ।। अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकी वस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति या संयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी ।। ९ ।। निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भुकुटीं क्वचित् ।। १० ।। न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित और संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपर भौंहें टेढ़ी करूँगा ।। १० ।। प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः । जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ।। ११ ।। मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा। (स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे किसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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#🙏हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🚩 #😍हनुमान जी के रोचक किस्से📖 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🎶जय श्री राम🚩 श्रीहनुमान जन्मोत्सव 02 अप्रैल विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पवन पुत्र हनुमान के जन्म की कहानी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 1 करोड़ 85 लाख 58 हजार 118 वर्ष पहले चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 06:03 बजे हुआ था। वाल्मीकि रचित रामायण (मतान्तर से) के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (छोटी दीपावली) मंगलवार के दिन हनुमान का जन्म हुआ था। हनुमान जयंती वर्ष में दो बार मनाई जाती है। पहली हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र शुक्‍ल पूर्णिमा को अर्थात ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक मार्च या अप्रैल के बीच और दूसरी कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी अर्थात नरक चतुर्दशी को अर्थात सितंबर-अक्टूबर के बीच। इसके अलावा तमिलनाडु और केरल में हनुमान जयंती मार्गशीर्ष माह की अमावस्या को तथा उड़ीसा में वैशाख महीने के पहले दिन मनाई जाती है। आखिर सही क्या है? चैत्र पूर्णिमा को मेष लग्न और चित्रा नक्षत्र में प्रातः 6:03 बजे हनुमानजी का जन्म एक गुफा में हुआ था। मतलब यह कि चैत्र माह में उनका जन्म हुआ था। फिर चतुर्दर्शी क्यों मनाते हैं? वाल्मिकी रचित रामायण के अनुसार हनुमानजी का जन्म कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मंगलवार के दिन, स्वाति नक्षत्र और मेष लग्न में हुआ था। हनुमान जी जन्म को लेकर मतभेद 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक तिथि को विजय अभिनन्दन महोत्सव के रूप में जबकि दूसरी तिथि को जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पहली तिथि के अनुसार इस दिन हनुमानजी सूर्य को फल समझ कर खाने के लिए दौड़े थे, उसी दिन राहु भी सूर्य को अपना ग्रास बनाने के लिए आया हुआ था लेकिन हनुमानजी को देखकर सूर्यदेव ने उन्हें दूसरा राहु समझ लिया। इस दिन चैत्र माह की पूर्णिमा थी जबकि कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी को उनका जन्म हुआ हुआ था। एक अन्य मान्यता के अनुसार माता सीता ने हनुमानजी की भक्ति और समर्पण को देखकर उनको अमरता का वरदान दिया था। यह दिन नरक चतुर्दशी का दिन था। हालांकि वाल्मिकीजी ने जो लिखा है उसे सही माना जा सकता है। हनुमान जी की माता अंजनि के पूर्व जन्म की कहानी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कहते हैं कि माता अंजनि पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। ‘बालपन में वो अत्यंत सुंदर और स्वभाव से चंचल थी एक बार अपनी चंचलता में ही उन्होंने तपस्या करते एक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी थी। गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला। श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ऋषि के श्राप से त्रेता युग मे अंजना मे नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा इंद्र जिनके हाथ में पृथ्वी के सृजन की कमान है, स्वर्ग में स्थित इंद्र के दरबार (महल) में हजारों अप्सरा (सेविकाएं) थीं, जिनमें से एक थीं अंजना (अप्सरा पुंजिकस्थला) अंजना की सेवा से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा, अंजना ने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि उन पर एक तपस्वी साधु का श्राप है, अगर हो सके तो उन्हें उससे मुक्ति दिलवा दें। इंद्र ने उनसे कहा कि वह उस श्राप के बारे में बताएं, क्या पता वह उस श्राप से उन्हें मुक्ति दिलवा दें। अंजना ने उन्हें अपनी कहानी सुनानी शुरू की, अंजना ने कहा ‘बालपन में जब मैं खेल रही थी तो मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा, मेरे लिए यह एक बड़ी आश्चर्य वाली घटना थी, इसलिए मैंने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए, बस यही मेरी गलती थी क्योंकि वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु थे। मैंने उनकी तपस्या भंग कर दी और क्रोधित होकर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी। मेरे बहुत गिड़गिड़ाने और माफी मांगने पर उस साधु ने कहा कि मेरा चेहरा वानर होने के बावजूद उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा’। अपनी कहानी सुनाने के बाद अंजना ने कहा कि अगर इंद्र देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी। इंद्र देव ने उन्हें कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए अंजना को धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजना को इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर आईं और केसरी से विवाह - इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर चली आईं, एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। और एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित होने लगीं, जैसे ही उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं, अंजना का चेहरा वानर जैसा हो गया। अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, जब वह युवक उनके पास आया और उनकी पीड़ा का कारण पूछा तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए उसे बताया कि वह बदसूरत हो गई हैं। अंजना ने उस बलशाली युवक को दूर से देखा था लेकिन जब उसने उस व्यक्ति को अपने समीप देखा तो पाया कि उसका चेहरा भी वानर जैसा था। अपना परिचय बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा कि वह कोई और नहीं वानर राज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं। अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जंगल में केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया। केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, "केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है। पंपा सरोवर 〰️〰️〰️〰️ अंजना और मतंग ऋषि - पुराणों में कथा है कि केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया पर संतान सुख से वंचित थे । अंजना अपनी इस पीड़ा को लेकर मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा (कई लोग इसे पंपा सरोवर भी कहते हैं) सरोवर के पूर्व में नरसिंह आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहाँ जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करने पर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी। अंजना को पवन देव का वरदान 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मतंग रामायण कालीन एक ऋषि थे, जो शबरी के गुरु थे। अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु पर ही जीवित रही, एक बार अंजना ने “शुचिस्नान” करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर उसे वरदान दिया, कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा। अंजना को भगवान शिव का वरदान 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ के पास, अपने आराध्य शिव की तपस्या में मग्न थीं । शिव की आराधना कर रही थीं तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, अंजना ने शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें। (कर्नाटक राज्य के दो जिले कोप्पल और बेल्लारी में रामायण काल का प्रसिद्ध किष्किंधा) ‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए। इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और दूसरी तरफ अयोध्या में, इक्ष्वाकु वंशी महाराज अज के पुत्र और अयोध्या के महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए, श्रृंगी ऋषि को बुलाकर 'पुत्र कामेष्टि यज्ञ' के साथ यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर श्रृंगी को खीर का एक स्वर्ण पात्र (कटोरी) दिया और कहा "ऋषिवर! यह खीर राजा की तीनों रानियों को खिला दो। राजा की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।" जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस खीर की कटोरी में थोड़ा सा खीर अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया। अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया। हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना के पुत्र के रूप मे, चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा की महानिशा में हुआ। अन्य कथा अनुसार हनुमान अवतार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सामान्यत: लंकादहन के संबंध में यही माना जाता है कि सीता की खोज करते हुए लंका पहुंचे और रावण के पुत्र सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया। तब रावण के पुत्र मेघनाद ने श्री हनुमान को ब्रह्मास्त्र छोड़कर काबू किया और रावण ने श्री हनुमान की पूंछ में आग लगाने का दण्ड दिया। तब उसी जलती पूंछ से श्री हनुमान ने लंका में आग लगा रावण का दंभ चूर किया। किंतु पुराणों में लंकादहन के पीछे भी एक ओर रोचक कथा जुड़ी है, जिसके कारण श्री हनुमान ने पूंछ से लंका में आग लगाई। श्री हनुमान शिव अवतार है। शिव से ही जुड़ा है यह रोचक प्रसंग। एक बार माता पार्वती की इच्छा पर शिव ने कुबेर से सोने का सुंदर महल का निर्माण करवाया। किंतु रावण इस महल की सुंदरता पर मोहित हो गया। वह ब्राह्मण का वेश रखकर शिव के पास गया। उसने महल में प्रवेश के लिए शिव-पार्वती से पूजा कराकर दक्षिणा के रूप में वह महल ही मांग लिया। भक्त को पहचान शिव ने प्रसन्न होकर वह महल दान दे दिया। दान में महल प्राप्त करने के बाद रावण के मन में विचार आया कि यह महल असल में माता पार्वती के कहने पर बनाया गया। इसलिए उनकी सहमति के बिना यह शुभ नहीं होगा। तब उसने शिवजी से माता पार्वती को भी मांग लिया और भोलेभंडारी शिव ने इसे भी स्वीकार कर लिया। जब रावण उस सोने के महल सहित मां पार्वती को ले जाना लगा। तब अचंभित और दुखी माता पार्वती ने विष्णु को स्मरण किया और उन्होंने आकर माता की रक्षा की। जब माता पार्वती अप्रसन्न हो गई तो शिव ने अपनी गलती को मानते हुए मां पार्वती को वचन दिया कि त्रेतायुग में मैं वानर रूप हनुमान का अवतार लूंगा उस समय तुम मेरी पूंछ बन जाना। जब मैं माता सीता की खोज में इसी सोने के महल यानी लंका जाऊंगा तो तुम पूंछ के रूप में लंका को आग लगाकर रावण को दण्डित करना। हनुमान जी की प्रसिद्धि कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'। माता श्री अंजनी और कपिराज श्री केसरी हनुमानजी को अतिशय प्रेम करते थे। श्री हनुमानजी को सुलाकर वो फल-फूल लेने गये थे इसी समय बाल हनुमान भूख एवं अपनी माता की अनुपस्थिति में भूख के कारण आक्रन्द करने लगे। इसी दौरान उनकी नजर क्षितिज पर पड़ी। सूर्योदय हो रहा था। बाल हनुमान को लगा की यह कोई लाल फल है। (तेज और पराक्रम के लिए कोई अवस्था नहीं होती)। यहां पर तो श्री हनुमान जी के रुप में माताश्री अंजनी के गर्भ से प्रत्यक्ष शिवशंकर अपने ग्यारहवें रुद्र में लीला कर रहे थे और श्री पवनदेव ने उनके उड़ने की शक्ति भी प्रदान की थी। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने लगे। उस लाल फल को लेने के लिए हनुमानजी वायुवेग से आकाश में उड़ने लगे। उनको देखकर देव, दानव सभी विस्मयतापूर्वक कहने लगे कि बाल्यावस्था में एसे पराक्रम दिखाने वाला यौवनकाल में क्या नहीं करेगा। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था।हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की "देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।" राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और उसे साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक दिया। इससे संसार की कोई भी प्राणी साँस न ले सकी और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मूर्छत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें सचेत किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की। तभी श्री ब्रह्माजी ने श्री हनुमानजी को वरदान दिया कि इस बालक को कभी ब्रह्मशाप नहीं लगेगा, कभी भी उनका एक भी अंग शस्तर नहीं होगा, ब्रह्माजीने अन्य देवताओं से भी कहा कि इस बालक को आप सभी वरदान दें तब देवराज इंन्द्रदेव ने हनुमानजी के गले में कमल की माला पहनाते हुए कहा की मेरे वज्रप्रहार के कारण इस बालक की हनु (दाढ़ी) टूट गई है इसीलिए इन कपिश्रेष्ठ का नाम आज से हनुमान रहेगा और मेरा वज्र भी इस बालक को नुकसान न पहुंचा सके ऐसा वज्र से कठोर होगा। श्री सूर्यदेव ने भी कहा कि इस बालक को में अपना तेज प्रदान करता हूं और मैं इसको शस्त्र-समर्थ मर्मज्ञ बनाता हुं । हनुमानजी के कुछ नाम एवं उनका अर्थ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमानजी को मारुति, बजरंगबली इत्यादि नामों से भी जानते हैं। मरुत शब्द से ही मारुति शब्द की उत्पत्ति हुई है। महाभारत में हनुमानजी का उल्लेख मारुतात्मज के नाम से किया गया है। हनुमानजी का अन्य एक नाम है, बजरंगबली। बजरंगबली यह शब्द व्रजांगबली के अपभ्रंश से बना है। जिनमें वज्र के समान कठोर अस्त्र का सामना करनेकी शक्ति है, वे व्रजांगबली है। जिस प्रकार लक्ष्मण से लखन, कृष्ण से किशन ऐसे सरल नाम लोगों ने अपभ्रंश कर उपयोगमें लाए, उसी प्रकार व्रजांगबली का अपभ्रंश बजरंगबली हो गया। हनुमानजी की विशेषताएं 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अनेक संतों ने समाज में हनुमानजी की उपासना को प्रचलित किया है। ऐसे हनुमान जी के संदर्भ में समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं, ‘हनुमानजी हमारे देवता हैं ।’ हनुमानजी शक्ति, युक्ति एवं भक्ति का प्रतीक हैं। इसलिए समर्थ रामदासस् वामी ने हनुमानजी की उपासना की प्रथा आरंभ की। महाराष्ट्र में उनके द्वारा स्थापित ग्यारह मारुति प्रसिद्ध हैं। साथ ही संत तुलसीदास ने उत्तर भारत में मारुति के अनेक मंदिर स्थापित किए तथा उनकी उपासना दृढ की। दक्षिण भारत में मध्वाचार्य को मारुति का अवतार माना जाता है। इनके साथ ही अन्य कई संतों ने अपनी विविध रचनाओं द्वारा समाज के समक्ष मारुति का आदर्श रखा है। 1. शक्तिमानता 〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमानजी सर्वशक्तिमान देवता हैं। जन्म लेते ही हनुमानजी ने सूर्यको निगलनेके लिए उडान भरी। इससे यह स्पष्ट होता है कि, वायुपुत्र अर्थात वायुतत्त्वसे उत्पन्न हनुमानजी, सूर्यपर अर्थात तेजतत्त्वपर विजय प्राप्त करनेमें सक्षम थे। पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश तत्त्वोंमेंसे तेजतत्त्वकी तुलनामें वायुतत्त्व अधिक सूक्ष्म है अर्थात अधिक शक्तिमान है। सर्व देवताओंमें केवल हनुमानजीको ही अनिष्ट शक्तियां कष्ट नहीं दे सकतीं। लंकामें लाखों राक्षस थे, तब भी वे हनुमानजीका कुछ नहीं बिगाड पाएं। इससे हम हनुमानजीकी शक्तिका अनुमान लगा सकते हैं। 1. भूतों के स्वामी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमानजी भूतों के स्वामी माने जाते हैं। किसी को भूत बाधा हो, तो उस व्यक्ति को हनुमानजी के मंदिर ले जाते हैं। साथ ही हनुमानजी से संबंधित स्तोत्र जैसे हनुमत्कवच, भीमरूपी स्तोत्र अथवा हनुमानचालीसा का पाठ करनेके लिए कहते हैं । 2. भक्ति 〰️〰️〰️ साधना में जिज्ञासु, मुमुक्षु, साधक, शिष्य एवं भक्त ऐसे उन्नति के चरण होते हैं। इसमें भक्त यह अंतिम चरण है। भक्त अर्थात वह जो भगवानसे विभक्त नहीं है। हनुमानजी भगवान श्रीराम से पूर्णतया एकरूप हैं। जब भी नवविधा भक्ति में से दास्य भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देना होता है, तब हनुमानजी का उदाहरण दिया जाता है। वे अपने प्रभु राम के लिए प्राण अर्पण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । प्रभु श्रीराम की सेवा की तुलना में उन्हें सब कुछ कौडी के मोल लगता है। हनुमान सेवक एवं सैनिक का एक सुंदर सम्मिश्रण हैं। स्वयं सर्वशक्तिमान होते हुए भी वे, अपने-आपको श्रीरामजीका दास कहलवाते थ। उनकी भावना थी कि उनकी शक्ति भी श्रीरामजी की ही शक्ति है। मान अर्थात शक्ति एवं भक्तिका संगम। 3. मनोविज्ञान में निपुण एवं राजनीति में कुशल 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अनेक प्रसंगों में सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, वरन् राम भी हनुमानजी से परामर्श करते थे। लंका में प्रथम ही भेंट में हनुमानजी ने सीता के मन में अपने प्रति विश्वास निर्माण किया। इन प्रसंगों से हनुमानजी की बुद्धिमानता एवं मनोविज्ञान में निपुणता स्पष्ट होती है। लंकादहन कर हनुमानजी ने रावण की प्रजा में रावणके सामर्थ्य के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। इस बातसे उनकी राजनीति-कुशलता स्पष्ट होती है। 4. जितेंद्रिय 〰️〰️〰️〰️ सीता को ढूंढने जब हनुमानजी रावण के अंतःपुर में गए, तो उस समय की उनकी मनः स्थिति थी, उनके उच्च चरित्र का सूचक है। इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं, ‘सर्व रावण पत्नियों को निःशंक लेटे हुए मैंने देखा; परंतु उन्हें देखने से मेरे मन में विकार उत्पन्न नहीं हुआ।’ वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड 11.42-43 इंद्रियजीत होने के कारण हनुमानजी रावणपुत्र इंद्रजीत को भी पराजित कर सके। तभी से इंद्रियों पर विजय पाने हेतु हनुमानजी की उपासना बतायी गई। 5. भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमानजी को इच्छा पूर्ण करने वाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत रखने वाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमानजी की मूर्ति की श्रद्धापूर्वक निर्धारित परिक्रमा करते हैं। कई लोगों को आश्चर्य होता है कि, जब किसी कन्या का विवाह निश्चित न हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानजी की उपासना करने के लिए कहा जाता है। वास्तव में अत्युच्च स्तर के देवताओं में ‘ब्रह्मचारी’ या ‘विवाहित’ जैसा कोई भेद नहीं होता। ऐसा अंतर मानव-निर्मित है। मनोविज्ञान के आधार पर कुछ लोगों की यह गलत धारणा होती है कि, सुंदर, बलवान पुरुष से विवाह की कामना से कन्याएं हनुमानजी की उपासना करती हैं। परंतु वास्तविक कारण कुछ इस प्रकार है। लगभग 30 प्रतिशत व्यक्तियों का विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियों के प्रभावके कारण नहीं हो पाता। हनुमानजी की उपासना करने से ये कष्ट दूर हो जाते हैं एवं उनका विवाह संभव हो जाता है। 6. हनुमान जन्मोत्सव कैसे मनाया जाता है ? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जयंती का उत्सव कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन संपूर्ण उत्तर भारत में विविध स्थानों पर धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन प्रात: 4 बजे से ही भक्तजन स्नान कर हनुमान जी के देवालयों में दर्शन के लिए आने लगते हैं। प्रात: 5 बजे से देवालयों में पूजा विधि आरंभ होती हैं । हनुमानजी की मूर्ति को पंचामृत स्नान करवा कर उनका विधिवत पूजन किया जाता है। सुबह ६ बजे तक अर्थात हनुमान जन्म के समय तक हनुमान जन्म की कथा, भजन, कीर्तन आदि का आयोजन किया जाता है। हनुमानजी की मूर्ति को हिंडोले में रख हिंडोला गीत गाया जाता है। हनुमानजी की मूर्ति हाथ में लेकर देवालय की परिक्रमा करते हैं। हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में कुछ जगह यज्ञ का आयोजन भी करते हैं। तत्पश्चात हनुमानजी की आरती उतारी जाती है। आरती के उपरांत कुछ स्थानों पर सौंठ अर्थात सूखे अदरक का चूर्ण एवं पीसी हुई चीनी तथा सूखे नारियल का चूरा मिलाकर उस मिश्रणको या कुछ स्थानों पर छुहारा, बादाम, काजू, सूखा अंगूर एवं मिश्री, इस पंचखाद्य को प्रसाद के रूप में बांटते हैं । कुछ स्थानों पर पोहे तथा चने की भीगी हुई दाल में दही, शक्कर, मिर्ची के टुकडे, निम्ब का अचार मिलाकर गोपाल काला बनाकर प्रसाद के रूप में बाटते है। कुछ जगह महाप्रसाद का आयोजन किया जाता है। संकलन~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
🙏हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🚩 - श्रीहनुमान जन्मोत्सव 02 3< विशेष श्रीहनुमान जन्मोत्सव 02 3< विशेष - ShareChat
#🙏हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #🙏🏻सीता राम #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 क्या आप को पता है चारो युगों में थे हनुमान जी और क्यों आज भी जीवित हैं !! 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥ संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई॥ और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥ चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है। हनुमान को छोड़कर और किसी देवी-देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आज भी हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं।हनुमान इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमान की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम है। बहुत से लोग किसी बाबा, देवी-देवता, ज्योतिष और तांत्रिकों के चक्कर में भटकते रहते हैं, क्योंकि वे हनुमान की भक्ति-शक्ति को नहीं पहचानते। ऐसे भटके हुए लोगों का राम ही भला करे। मारुति नंदन सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग में कब-कब कहां-कहां और किस-किस स्वरूप में किन लोगों के समक्ष प्रकट हुए, यह जानते हैं ! सतयुग :=आप सोच रहे होंगे हनुमान तो त्रेतायुग में हुए फिर सतयुग में वे कैसे हो सकते हैं? इसका जवाब है कि इस युग में पवनपुत्र भगवान श्रीशंकर के स्वरूप से विश्व में स्थित थे, तभी तो उन्हें शिवस्वरूप (आठ रुद्रावतारों में से एक) लिखा और कहा गया है। तभी तो गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा में उन्हें शंकर सुवन केसरी नंदन कहकर संबोधित किया है। में जब-जब श्रीराम ने हनुमानजी को गले से लगाया, तब-तब भगवान शंकर अति प्रसन्न हुए हैं। सतयुग में भोलेनाथ पार्वती से उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं और वे उसी युग में पार्वती से दूर रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं। अत: यह प्रमाणित है कि श्रीहनुमानजी सतयुग में शिवरूप में थे और शिव तो अजर-अमर हैं। त्रेतायुग :=त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरी नंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे। वाल्मीकि 'रामायण' में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है। हनुमानजी के त्रेतायुग में होने के हजारों प्रमाण मिलते हैं। सभी हैं हनुमान के ऋणी : श्रीराम, भरत, सीता, सुग्रीव, विभीषण और संपूर्ण कपि मंडल, कोई भी उनके ऋण से मुक्त अर्थात उऋण नहीं हो सकता। इस प्रकार त्रेतायुग में तो हनुमानजी साक्षात विराजमान हैं। इनके बिना संपूर्ण चरित्र पूर्ण होता ही नहीं। ऐतिहासिक प्रमाण👉 वानर समान एक विलक्षण जाति हनुमान विषयक रामायण के समस्त वर्णन को मनन करने पर यह सिद्घांत स्थिर होता है कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भी भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 हजार वर्ष पूर्व लुप्त हो गई। बच गए बस हनुमान!वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के चालीसवें अध्याय में इस बारे में प्रकाश डाला गया है। लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं- यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।अर्थात : 'हे वीर श्रीराम। इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहे।' इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- 'एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।'अर्थात् : 'हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी।' द्वापर :=द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं। इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है। महाभारत में प्रसंग हैं कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूछ नहीं हटा पाते हैं।दूसरा प्रसंग अर्जुन से जुड़ा है। अर्जुन के रथ पर हनुमान के विराजित होने के पीछे भी कारण है। एक बार किसी तीर्थ में अर्जुन का हनुमानजी से मिलन हो जाता है। इस पहली मुलाकात में हनुमानजी से अर्जुन ने कहा- अरे राम और रावण के युद्घ के समय तो आप थे? हनुमानजी- हां। तभी अर्जुन ने कहा- आपके स्वामी श्रीराम तो बड़े ही श्रेष्ठ धनुषधारी थे तो फिर उन्होंने समुद्र पार जाने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी? यदि मैं वहां उपस्थित होता तो समुद्र पर बाणों का सेतु बना देता जिस पर चढ़कर आपका पूरा वानर दल समुद्र पार कर लेता।इस पर हनुमानजी ने कहा- असंभव, बाणों का सेतु वहां पर कोई काम नहीं कर पाता। हमारा यदि एक भी वानर चढ़ता तो बाणों का सेतु छिन्न-भिन्न हो जाता। अर्जुन ने कहा- नहीं, देखो ये सामने सरोवर है, मैं उस पर बाणों का एक सेतु बनाता हूं। आप इस पर चढ़कर सरोवर को आसानी से पार कर लेंगे। हनुमानजी ने कहा- असंभव। तब अर्जुन ने कहा- यदि आपके चलने से सेतु टूट जाएगा तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा और यदि नहीं टूटता है तो आपको अग्नि में प्रवेश करना पड़ेगा। हनुमान ने कहा- मुझे स्वीकार है। मेरे दो चरण ही इसने झेल लिए तो मैं हार स्वीकार कर लूंगा।तब अर्जुन ने अपने प्रचंड बाणों से सेतु तैयार कर दिया। जब तक सेतु बनकर तैयार नहीं हुआ तब तक तो हनुमान अपने लघु रूप में ही रहे, लेकिन जैसे ही सेतु तैयार हुआ हनुमान ने विराट रूप धारण कर लिया। हनुमान राम का स्मरण करते हुए उस बाणों के सेतु पर चढ़ गए। पहला पग रखते ही सेतु सारा का सारा डगमगाने लगा, दूसरा पैर रखते ही चरमराया और तीसरा पैर रखते ही सरोवर के जल में खून ही खून हो गया।तभी श्रीहनुमानजी सेतु से नीचे उतर आए और अर्जुन से कहा कि अग्नि तैयार करो। अग्नि प्रज्वलित हुई और जैसे ही हनुमान अग्नि में कूदने चले वैसे भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए और बोले ठहरो! तभी अर्जुन और हनुमान ने उन्हें प्रणाम किया।भगवान ने सारा प्रसंग जानने के बाद कहा- हे हनुमान, आपका तीसरा पग सेतु पर पड़ा, उस समय मैं कछुआ बनकर सेतु के नीचे लेटा हुआ था। आपकी शक्ति से आपके पैर रखते ही मेरे कछुआ रूप से रक्त निकल गया। यह सेतु टूट तो पहले ही पग में जाता यदि में कछुआ रूप में नहीं होता तो।यह सुनकर हनुमान को काफी कष्ट हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी। मैं तो बड़ा अपराधी निकला आपकी पीठ पर मैंने पैर रख दिया। मेरा ये अपराध कैसे दूर होगा भगवन्? तब कृष्ण ने कहा, ये सब मेरी इच्छा से हुआ है। आप मन खिन्न मत करो और मेरी इच्छा है कि तुम अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थान ग्रहण करो।इसलिए द्वापर में श्रीहनुमान महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ के ऊपर ध्वजा लिए बैठे रहते हैं। ये द्वापर का प्रसंग था। कलियुग👉 हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है! ''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि। वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥'' अर्थात: कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥ यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से इनका आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगती।हनुमानजी के जीवित होने के प्रमाण समय-समय पर प्राप्त होते रहे हैं, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि हनुमानजी आज भी जीवित हैं। 16वीं सदी के महान संत कवि तुलसीदासजी को हनुमान की कृपा से रामजी के दर्शन प्राप्त हुए। कथा है कि हनुमानजी ने तुलसीदासजी से कहा था कि राम और लक्ष्मण चित्रकूट नियमित आते रहते हैं। मैं वृक्ष पर तोता बनकर बैठा रहूंगा, जब राम और लक्ष्मण आएंगे मैं आपको संकेत दे दूंगा।हनुमानजी की आज्ञा के अनुसार तुलसीदासजी चित्रकूट घाट पर बैठ गए और सभी आने- जाने वालों को चंदन लगाने लगे। राम और लक्ष्मण जब आए तो हनुमानजी गाने लगे 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।' हनुमान के यह वचन सुनते ही तुलसीदास प्रभु राम और लक्ष्मण को निहारने लगे।' इस प्रकार तुलसीदासजी को रामजी के दर्शन हुए। साभार~ पं देव शर्मा🔥 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
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#🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #🙏🏻सीता राम श्री हनुमानजी पूजन की प्राचीन वैदिक विधि 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री हनुमानजी पूजन का कलयुग मैं अत्यंत ही महत्त्व है। श्री हनुमानजी शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले एवं फल देने वाले भगवानो में से एक हैं | यदि कोई साधक सच्ची श्रद्धा से मंगलवार के दिन श्री हनुमानजी का पूजा विधि विधान पूर्वक करे तो निःसंदेह श्री हनुमानजी शीघ्र ही साधक के समस्त कष्ट व विघ्न हर कर साधक का जीवन सुख - समृद्धि धन - धान्य से भर देते हैं। पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व निम्नवत दी जा रही आवश्यक पूजन सामग्री का संग्रह सुनिश्चित कर लें :- • लाल कपडा/लंगोट • जल कलश • गंगाजल • अक्षत ( साबुत चावल ) • लाल पुष्प • लाल पुष्पों का हार • पंचामृत • जनेऊ • सिन्दूर • चांदी का वर्क • भुने चने • गुड़ • बनारसी पान का बीड़ा • तुलसी के पत्ते • इत्र • सरसो का तेल • चमेली का तेल • घी • दीपक • धूप • अगरबत्ती • कपूर • नारियल • केले हनुमान जी की पूजन विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यूँ तो पूजन आरम्भ विधि लम्बी है व सामान्य साधक के लिए सरल नहीं है किन्तु यहां हम पूजन विधि का सरलतम रूप प्रस्तुत कर रहे हैं। हनुमानजी का पूजन करते समय सबसे पहले कंबल या ऊन के आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। एक घी का एवं एक सरसो के तेल का दीपक जलाये, अगरबत्ती एवं धूपबत्ती जलाये। पवित्रीकरण 〰️〰️〰️〰️ साधक बाएं हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लें एवं मन्त्रोच्चारण के साथ जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें। पवित्रता की भावना करें। ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः ॥ ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।। सकंल्प : 〰️〰️〰️ पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों में जल, पुष्प एवं अक्षत ( साबुत चावल ) लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस स्थान और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। संकल्प का उदाहरण 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जैसे 21/07/2020 को श्री हनुमान का पूजन किया जाना है। तो इस प्रकार संकल्प लें। मैं ( अपना नाम बोलें ) ( अपना गोत्र बोलें ) भारत देश के ( पूजन के स्थान का पूरा पता बोलें ) विक्रम संवत् 2077 को, ( हिंदी मास का नाम बोलें ) के ( तिथि का नाम बोलें ) को, ( दिवस का नाम बोलें ) को, ( नक्षत्र का नाम बोलें ) में, मैं (मनोकामना बोलें ) इस मनोकामना से श्री हनुमानजी का पूजन कर रहा हूं। अब हाथों में लिए गए जल, पुष्प एवं अक्षत को जमीन पर छोड़ दें। सर्वप्रथम गणेश जी का स्मरण करें व धूप दीप दिखाएं । कलश जी का स्मरण करें व धूप दीप दिखाएं । ध्यान : 〰️〰️〰️ तत्पश्चात अपने दाहिने हाथ में अक्षत ( साबुत चावल ) व लाल पुष्प लेकर इस मंत्र से हनुमानजी का ध्यान करें - अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यं। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।। ऊँ हनुमते नम: ध्यानार्थे पुष्पाणि सर्मपयामि।। इसके बाद हाथ में लिए हुए अक्षत एवं पुष्प श्री हनुमानजी को अर्पित कर दें। आवाह्न : 〰️〰️〰️ तत्पश्चात हाथ में कुछ पुष्प लेकर इस मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री हनुमानजी का आवाह्न करें - उद्यत्कोट्यर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम्। श्रीरामड्घ्रिध्याननिष्ठं सुग्रीवप्रमुखार्चितम्।। विन्नासयन्तं नादेन राक्षसान् मारुतिं भजेत्।। ऊँ हनुमते नम: आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।। अब हाथ में लिए हुए पुष्प श्री हनुमानजी को अर्पित कर दें। आसन : 〰️〰️〰️ श्री हनुमानजी का आवाह्न करने के पश्चात उनको आसन अर्पित करने हेतु कमल अथवा गुलाब का लाल पुष्प अर्पित करें। आसन प्रदान करने के लिए अक्षत का भी उपयोग किया जा सकता हो | इस मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री हनुमानजी को आसन अर्पित करें - तप्तकांचनवर्णाभं मुक्तामणिविराजितम्। अमलं कमलं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्।। आसन अर्पित करने के पश्चात इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए श्री हनुमानजी के सम्मुख किसी बर्तन अथवा भूमि पर तीन बार जल छोड़ें। ऊँ हनुमते नम:, पाद्यं समर्पयामि।। अध्र्यं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि।। स्नान एवं श्रृंगार : 〰️〰️〰️〰️〰️ अब सिंदूर में चमेली का तेल मिलाकर मूर्ति पर लेप करे। लेप पाँव से शुरू कर सर तक ले जाएँ, चांदी का वर्क मूर्ति पर लगाए, अब हनुमान जी को लाल लंगोट पहनाये, इत्र छिड़के, हनुमानजी के सर पर अक्षत सहित तिलक लगाए, लाल गुलाब और माला हनुमान जी को चढ़ाये, भुने चने एवं गुड़ का नैवेद्य लगाए, नैवेद्य पर तुलसी पत्र अवश्य रखे, केले चढ़ाये, हनुमान जी को बनारसी पान का बीड़ा अर्पित करे, इसके बाद हनुमानजी को इत्र, सिंदूर, कुमकुम, अक्षत, पुष्प व पुष्प हार अर्पित करें। श्री हनुमानजी के स्नान एवं श्रृंगार के समय "ऊँ ऐं हनुमते रामदूताय नमः" मंत्र का जप करते रहें। श्रृंगार के समय चोला चढ़ाने की विधि नीचे दी जा रही है। हनुमान जी को चोला चढ़ाने की विधि और लाभ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने के लाभ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमान जी को चोला चढाने से साधक को श्री हनुमान जी कृपा प्राप्त होती हैं ! ऐसा करने से श्री हनुमान जी प्रसन्न होते हैं ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने से जातक के उपाय चल रही शनि की साढ़े साती, ढैया, दशा या अंतरदशा या राहू या केतु की दशा या अंतरदशा में हो रहे कष्ट समाप्त हो जाते हैं। साथ ही साधक के संकट और रोग दूर हो जाते हैं ! जातक की दीर्घायु होती है। यह तो आप सब जानते है की भगवान श्री हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हैं ! हमारे हिन्दू धर्म में सिंदूर का महत्व बताया गया हैं ! ऐसे ही हमारे हिन्दू धर्म में की भी मान्यता हैं ! साधक श्री हनुमान जी को ख़ास कर सिंदूर का चोला चढाने से श्री राम जी की भी कृपा प्राप्त होती हैं यह आपको रामायण में वर्णित मिल जायेगा। इस लेख को पढ़ने के बाद आप हनुमान जी चोला चढ़ाने में आगे से कोई भी गलती नही होगी। हनुमान जी को चोला चढ़ाने की सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने के लिए श्री हनुमान जी वाला सिंदूर, गाय का घी या चमेली का तेल, शुद्ध गंगाजल मिश्रित जल, चांदी या सोने का वर्क या माली पन्ना (चमकीला कागज), धुप व् दीप , श्री हनुमान चालीसा। चोला चढ़ाने की विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराना चोला उतारकर साफ़ गंगाजल से मिश्रित जल से स्नान करना चाहिये। स्नान के बाद प्रतिमा को साफ कपड़े से पोछने के बाद सिंदूर में घी या चमेली का तेल मिलाकर गाढ़ा लेप बना ले इसके बाद सीधे हाथ से हनुमान जी के सर से आरम्भ करके सम्पूर्ण शरीर पर लेपन करें। सावधानियां 〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमान जी को चोला मंगलवार, शनिवार या विशेष पर्व जैसे की श्री हनुमान जंयती, रामनवमी, दीपवाली, व् होली के दिन चढ़ा सकते है ! इसके अलावा अन्य दिन चढ़ाना निषेध माना गया हैं ! श्री हनुमान जी के लिए लगाने वाला सिंदूर सवा के हिसाब से लगाना चाहिए ! जैसे की सवा पाव ,सवा किलो आदि । सिंदूर में मंगलवार के दिन देसी गाय का घी एवं शनिवार के दिन केवल चमेली के तेल का ही प्रयोग करना चाहिए। हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक को पवित्र यानी साफ़ लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए ! श्री हनुमान जी चोला चढाते समय सिंदूर में गाय का घी या चमेली का तेल ही मिलाना चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराने छोले को उतारा जरुर चाहिए और उसके बाद उस चोले को बहते हुए जल में बहा देना चाहिए ! श्री हनुमान जी की प्रतिमा पर चोला का लेपन अच्‍छी तरह मलकर, रगड़कर चढ़ाना चाहिए उसके बाद चांदी या सोने का वर्क चढ़ाना चाहिए ! चोला चढ़ाते समय दिए गये मंत्र का जाप करते रहना चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने का मन्त्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये । भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम ।। श्री हनुमान जी को स्त्री द्वारा चोला नही चढ़ाना चाहिए और ना ही चोला चढ़ाते समय स्त्री मंदिर में होनी चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक की श्वास प्रतिमा पर नही लगनी चाहिए ! श्री हनुमान जी को चोला सृष्टि क्रम ( पैरों से मस्तक तक चढ़ाने में देवता सौम्य रहते हैं ) में चढ़ाना चाहिए ! संहार क्रम ( मस्तक से पैरों तक चढ़ाने में देवता उग्र हो जाते हैं ) ! यदि आपको कोई मनोकामना पूरी करनी है तो पहले उग्र क्रम से चढ़ाये मनोकामना पूरी होने के बाद सोम्य क्रम में चढ़ाये ! चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाकर नीचे दिए क्रम से धूप दीप के बाद क्षमा याचना करें। धूप-दीप : 〰️〰️〰️ अब इस मंत्र के साथ हनुमानजी को धूप-दीप दिखाएं - साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्।। भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।। त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोस्तु ते।। ऊँ हनुमते नम:, दीपं दर्शयामि।। पूजन वंदन : 〰️〰️〰️〰️ इसके पश्चात एक थाली में कर्पूर एवं घी का दीपक जलाकर 11 बार श्री हनुमान चालीसा का पाठ करे व अंत में श्री हनुमानजी की आरती करें। इस प्रकार पूजन करने से हनुमानजी अति प्रसन्न होते हैं तथा साधक की हर मनोकामना पूरी करते हैं। क्षमा याचना : 〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमानजी पूजन के पश्चात अज्ञानतावश पूजन में कुछ कमी रह जाने या गलतियों के लिए भगवान् श्री हनुमानजी के सामने हाथ जोड़कर निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए क्षमा याचना करे। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव ल आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं l नोट👉 यदि साधक मंदिर में श्री हनुमानजी का पूजन कर रहे हों तब ऐसी स्थिति में संकल्प करने के पश्चात श्री हनुमानजी को स्नान करा उनका श्रृंगार करें। मंदिर में चूंकि समस्त देवी - देवताओं की मूर्ती उनका आवाह्न, पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा एवं पूजन अर्चन कर ही स्थापित की जाती हैं, अतः बार बार इनका आवाह्न अथवा आसान अर्पित करने अथव प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 - हनुमान कूीजन प्राचीन वैदिक ffq हनुमान कूीजन प्राचीन वैदिक ffq - ShareChat