प्रभु श्री राम के चरण बड़े जोर से सागर ने पकड़ लिए और भयभीत स्वर में कहा कि हे परमपिता मेरे से जन्म जन्म में जो भी जाने अनजाने में अपराध हुए हों उन्हें आप दया पूर्वक क्षमा करें ,मैं आपकी शरणागति में हूँ, हे प्रभु आपकी ही रचना है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल व भूमी का स्वभाव व बुद्धि स्थिर व जड़ होती है, ये अपना पराया नही देखते, आपने ही अपनी मर्जी से हम पांचों को यह आज्ञा, ऐसा जड़ स्वभाव प्रदान कर रखा है।
।। राम राम ।।
##सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩