sn vyas
455 views
10 hours ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) दशाधिकशततमोऽध्यायः कुन्ती को दुर्वासा से मन्त्र की प्राप्ति, सूर्यदेव का आवाहन तथा उनके संयोग से कर्ण का जन्म एवं कर्ण के द्वारा इन्द्र को कवच और कुण्डलों का दान...(दिन 336) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूर्य उवाच यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति । शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशस्त्रविबाधिनीम् ।। सूर्य बोले-वीर ! यदि ऐसी बात है तो सुनो, बदलेमें इन्द्र भी तुम्हें वर देंगे। उस समय तुम उनसे सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका निराकरण करनेवाली बरछी माँग लेना। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ते तत्रैवान्तरधीयत । कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत् तदा ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं- स्वप्नमें यों कहकर ब्राह्मण-वेषधारी सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये। तब कर्ण जाग गया और स्वप्नकी बातोंका चिन्तन करने लगा। तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थी समुपागमत् । कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः ।। २७ ।। तत्पश्चात् एक दिन महातेजस्वी देवराज इन्द्र ब्राह्मण बनकर भिक्षाके लिये कर्णके पास आये और उससे उन्होंने कवच और कुण्डलोंको माँगा ।। २७ ।। स्वशरीरात् समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम् । कर्णस्तु कुण्डले छित्त्वा प्रायच्छत् कृताञ्जलिः ।। २८ ।। तब कर्णने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रको अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवचको शरीरसे उधेड़कर एवं दोनों कुण्डलोंको भी काटकर दे दिया ।। २८ ।। प्रतिग्रह तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा । (अहो साहसमित्येवं मनसा वासवो हसन् । देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।। न तं पश्यामि को ह्येतत् कर्म कर्ता भविष्यति । प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं वृणु यमिच्छसि ।। कवच और कुण्डलोंको लेकर उसके इस कर्मसे संतुष्ट हो इन्द्रने मन-ही-मन हँसते हुए कहा- 'अहो! यह तो बड़े साहसका काम है। देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस - इनमेंसे किसीको भी मैं ऐसा साहसी नहीं देखता। भला, कौन ऐसा कार्य कर सकता है।' यों कहकर वे स्पष्ट वाणीमें बोले- 'वीर! मैं तुम्हारे इस कर्मसे प्रसन्न हूँ, इसलिये तुम जो चाहो, वही वर मुझसे माँग लो।' कर्ण उवाच इच्छामि भगवहत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम् ।) कर्ण ने कहा- भगवन्! मैं आपकी दी हुई वह अमोघ बरछी चाहता हूँ, जो शत्रुओं का संहार करने वाली है। वैशम्पायन उवाच ददौ शक्ति सुरपतिर्वाक्यं चेदमुवाच ह ।। २९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- तब देवराज इन्द्रने बदलेमें उसे अपनी ओरसे एक बरछी प्रदान की और कहा- ।। २९ ।। देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यमेकं जेतुमिच्छेथाः सोऽनया न भविष्यति ।। ३० ।। 'वीरवर ! तुम देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसोंमेंसे जिस एकको जीतना चाहोगे, वही इस शक्तिके प्रहारसे नष्ट हो जायगा' ।। ३० ।। प्राङ् नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ । कणों वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ।। ३१ ।। पहले इस पृथ्वीपर उसका नाम वसुषेण कहा जाता था। तत्पश्चात् अपने शरीरसे कवचको कतर डालनेके कारण वह कर्ण और वैकर्तन नामसे भी प्रसिद्ध हुआ ।। ३१ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णसम्भवे दशाधिकशततमोऽध्यायः।। ११० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्व के अन्तर्गत सम्भवपर्व में कर्ण की उत्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाला एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️