sn vyas
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25 days ago
#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣7️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाशीतितमोऽध्यायः ययाति का स्वर्ग से पतन और अष्टक का उनसे प्रश्न करना...(दिन 273) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ इन्द्र उवाच सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन् गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि । तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र केनासि तुल्यस्तपसा ययाते ।। १ ।। इन्द्रने कहा- राजन् ! तुम सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे। अतः नहुषपुत्र ययाते ! मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम तपस्यामें किसके समान हो ।। १ ।। ययातिरुवाच नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु । आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव ।। २ ।। ययातिने कहा- इन्द्र ! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धवों और महर्षियोंमेंसे किसीको भी तपस्यामें अपनी बराबरी करनेवाला नहीं देखता हूँ ।। २ ।। इन्द्र उवाच यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च अल्पीयसश्चाविदितप्रभावः । तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमे क्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन् ।। ३ ।। इन्द्र बोले- राजन् ! तुमने अपने समान, अपनेसे बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारे इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब तुम यहाँसे नीचे गिरोगे ।। ३ ।। ययातिरुवाच सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात् क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः । इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः सतां मध्ये पतितुं देवराज ।। ४ ।। ययातिने कहा- देवराज इन्द्र ! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ ।। ४ ।। इन्द्र उवाच सतां सकाशे पतितासि राजं- श्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः । एतद् विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं मावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च ।। ५ ।। इन्द्र बोले- राजा ययाति ! तुम यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके समीप गिरोगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लोगे। यह सब जानकर तुम फिर कभी अपने बराबर तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान न करना ।। ५ ।। वैशम्पायन उवाच ततः प्रहायामरराजजुष्टान् पुण्यॉल्लोकान् पतमानं ययातिम् । सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त-मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ।। ६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग करके राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ अष्टकने उन्हें गिरते देखा। वे उत्तम धर्म-विधिके पालक थे। उन्होंने ययातिसे कहा ।। ६ ।। अष्टक उवाच कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः । पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात् खात् खेचराणां प्रवरो यथार्कः ।। ७ ।। अष्टकने पूछा-इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान तुम कैसे गिर रहे हो? ।। ७ ।। दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम् । किं नु स्विदेतत् पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ।। ८ ।। तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हें सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि 'यह क्या गिर रहा है?' ।। ८ ।। दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् । अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः ।। ९ ।। तुम इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हो। तुम्हें आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये तुम्हारे निकट आये हैं कि तुम्हारे पतनका यथार्थ कारण क्या है? ।। ९ ।। न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे न च त्वमस्मान् पृच्छसि ये वयं स्मः । तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ।। १० ।। हम पहले तुमसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और तुम भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते हो; कि हम कौन हैं? इसलिये मैं ही तुमसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! तुम किसके पुत्र हो? और किसलिये यहाँ आये हो ? ।। १० ।। भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव । त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्रः ।। ११ ।। इन्द्र के तुल्य शक्तिशाली पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। अब तुम्हें विषाद और मोहको भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय तुम संतोंके समीप विद्यमान हो। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब तुम्हारा तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं ।। ११ ।। सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प । ते संगताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ।। १२ ।। देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव ! सुखसे वंचित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जंगम सब प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। तुम अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हो ।। १२ ।। प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः । प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः ।। १३ ।। जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, इसी प्रकार संतोंपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिमें है ।। १३ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते अष्टाशीतितमोऽध्यायः ।।८८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत