#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-2️⃣9️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
दक्ष प्रजापति से लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंश की परम्परा का वर्णन...(दिन 294)
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देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहो नाम ।। २३
देवातिथिने विदेहराजकुमारी मर्यादासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अरिह नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। २३ ।।
अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम। तस्यां पुत्रमजीजनक्षम् ।। २४ ।।
अरिहने अंगराजकुमारी सुदेवाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया ।। २४ ।।
ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम । तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादयामास ।। २५ ।।
ऋक्षने तक्षककी पुत्री ज्वालाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे मतिनार नामक पुत्रको उत्पन्न किया ।। २५ ।।
मतिनारः खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत् । समाप्ते च सत्रे सरस्वत्य-भिगम्य तं भर्तारं वरयामास । तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम ।। २६ ।।
मतिनारने सरस्वतीके तटपर उत्तम गुणोंसे युक्त द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान किया। उसके समाप्त होनेपर सरस्वतीने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया। मतिनारने उसके गर्भसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया ।। २६ ।।
अत्रानुवंशश्लोको भवति -
तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् ।
ईलिनं जनयामास कालिंग्यां तंसुरात्मजम् ।। २७ ।।
यहाँ वंशपरम्पराका सूचक श्लोक इस प्रकार है-सरस्वती ने मतिनार से तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया और तंसु ने कलिंगराज कुमारी के गर्भ से ईलिन नामक पुत्र को जन्म दिया ।। २७ ।।
ईलिनस्तु रथन्तर्यां दुष्यन्ताद्यान् पञ्च पुत्रानजीजनत् ।। २८ ।।
ईलिनने रथन्तरीके गर्भसे दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किये ।। २८ ।।२९ ।।
दुष्यन्तः खलु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे भरतः ।।
दुष्यन्तने विश्वामित्रकी पुत्री शकुन्तलाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे उनके पुत्र भरत का जन्म हुआ ।। २९ ।।
अत्रानुवंशश्लोकौ भवतः -
भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ।। ३० ।।
यहाँ वंशपरम्परा के सूचक दो श्लोक हैं-
'माता तो भाथी (धौंकनी) के समान है। वास्तवमें पुत्र पिताका ही होता है; जिससे उसका जन्म होता है, वही उस बालकके रूपमें प्रकट होता है। दुष्यन्त ! तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो; शकुन्तलाका अपमान न करो ।। ३० ।।
रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।। ३१ ।।
'गर्भाधान करनेवाला पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है। नरदेव! पुत्र यमलोकसे पिताका उद्धार कर देता है। तुम्हीं इस गर्भके आधान करनेवाले हो। शकुन्तलाका कथन सत्य है' ।। ३१ ।।
ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतः खलु काशेयीमुपयेमे सार्वसेनीं सुनन्दां नाम ।
तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ।। ३२ ।।
आकाशवाणीने भरण-पोषणके लिये कहा था, इसलिये उस बालकका नाम भरत हुआ। भरतने राजा सर्वसेनकी पुत्री सुनन्दासे विवाह किया। वह काशीकी राजकुमारी थी। उसके गर्भसे भरतके भुमन्यु नामक पुत्र हुआ ।। ३२ ।।
भुमन्युः खलु दाशार्हीमुपयेमे विजयां नाम । तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ।। ३३ ।।
भुमन्युने दशार्हकन्या विजयासे विवाह किया; जिसके गर्भसे सुहोत्रका जन्म हुआ ।। ३३ ।।
सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णा नाम । तस्यामस्य जज्ञे हस्ती; य इदं हास्तिनपुरं स्थापयामास । एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ।। ३४ ।।
सुहोत्रने इक्ष्वाकुकुलकी कन्या सुवर्णासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें हस्ती नामक पुत्र हुआ; जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था। हस्तीके बसानेसे ही यह नगर 'हास्तिनपुर' कहलाया ।। ३४ ।।
हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयेमे यशोधरां नाम । तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ।। ३५
हस्तीने त्रिगर्तराजकी पुत्री यशोधराके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे विकुण्ठन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ३५ ।।
विकुण्ठनः खलु दाशार्हीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अजमीढो नाम ।। ३६ ।।
विकुण्ठनने दशार्हकुलकी कन्या सुदेवासे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें अजमीढ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। ३६ ।।
अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यां गान्धार्या विशालायामृक्षायां चेति । पृथक् पृथक् वंशधरा नृपतयः । तत्र वंशकरः संवरणः ।। ३७ ।।
अजमीढके कैकेयी, गान्धारी, विशाला तथा ऋक्षासे एक सौ चौबीस पुत्र हुए। वे सब पृथक् पृथक् वंशप्रवर्तक राजा हुए। इनमें राजा संवरण कुरुवंशके प्रवर्तक हुए ।। ३७ ।।
संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ।। ३८ ।।
संवरणने सूर्यकन्या तपतीसे विवाह किया; जिसके गर्भसे कुरुका जन्म हुआ ।। ३८ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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