#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
माण्डव्य का धर्मराज को शाप देना...(दिन 330)
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धर्म उवाच
पतङ्गिकानां पुच्छेषु त्वयेषीका प्रवेशिता । कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत् तपोधन ।। ११ ।।
धर्मराज बोले-तपोधन! तुमने फर्तिगोंके पुच्छ-भागमें सींक घुसेड़ दी थी। उसी कर्मका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ है ।। ११ ।।
स्वल्पमेव यथा दत्तं दानं बहुगुणं भवेत् ।
अधर्म एवं विप्रर्षे बहुदुःखफलप्रदः ।। १२ ।।
विप्रर्षे! जैसे थोड़ा-सा भी किया हुआ दान कई गुना फल देनेवाला होता है, वैसे ही अधर्म भी बहुत दुःखरूपी फल देनेवाला होता है ।। १२ ।।
अणीमाण्डव्य उवाच
कस्मिन् काले मया तत् तु कृतं ब्रूहि यथातथम् । तेनोक्तो धर्मराजेन बालभावे त्वया कृतम् ।। १३ ।।
अणीमाण्डव्यने पूछा- अच्छा, तो ठीक-ठीक बताओ, मैंने किस समय-किस आयु में वह पाप किया था?
धर्मराज ने उत्तर दिया- 'बाल्यावस्थामें तुम्हारे द्वारा यह पाप हुआ था' ।। १३ ।।
अणीमाण्डव्य उवाच
बालो हि द्वादशाद् वर्षाज्जन्मतो यत् करिष्यति । न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यन्ति वै दिशः ।। १४ ।।
अणीमाण्डव्यने कहा- धर्मशास्त्रके अनुसार जन्मसे लेकर बारह वर्षकी आयुतक बालक जो कुछ भी करेगा, उसमें अधर्म नहीं होगा; क्योंकि उस समयतक बालकको धर्मशास्त्रके आदेशका ज्ञान नहीं हो सकेगा ।।
अल्पेऽपराधेऽपि महान् मम दण्डस्त्वया कृतः । गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ।। १५ ।।
धर्मराज ! तुमने थोड़े-से अपराध के लिये मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। ब्राह्मण का वध सम्पूर्ण प्राणियों के वध से भी अधिक भयंकर है ।। १५ ।।
शूद्रयोनावतो धर्म मानुषः सम्भविष्यसि । मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके धर्मफलोदयाम् ।। १६ ।।
अतः धर्म! तुम मनुष्य होकर शूद्रयोनिमें जन्म लोगे। आजसे संसारमें मैं धर्मके फलको प्रकट करनेवाली मर्यादा स्थापित करता हूँ।। १६ ।।
आ चतुर्दशकाद् वर्षान्न भविष्यति पातकम् । परतः कुर्वतामेवं दोष एव भविष्यति ।। १७ ।।
चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा। उससे अधिककी आयुमें पाप करनेवालोंको ही दोष लगेगा ।। १७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मनः । धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ।। १८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! इसी अपराधके कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ।। १८ ।।
धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः । दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ।। १९ ।।
वे धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्रके पण्डित, लोभ और क्रोधसे रहित, दीर्घदर्शी, शान्तिपरायण तथा कौरवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ।। १०७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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