#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣4️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डु के द्वारा मृगरूपधारी मुनि का वध तथा उनसे शाप की प्राप्ति...(दिन 346)
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जनमेजय उवाच
कथितो धार्तराष्ट्राणामार्षः सम्भव उत्तमः । अमनुष्यो मनुष्याणां भवता ब्रह्मवादिना ।। १ ।।
जनमेजयने कहा- भगवन्! आपने धृतराष्ट्रके पुत्रोंके जन्मका उत्तम प्रसंग सुनाया है, जो महर्षि व्यासकी कृपासे सम्भव हुआ था। आप ब्रह्मवादी हैं। आपने यद्यपि यह मनुष्योंके जन्मका वृतान्त बताया है, तथापि यह दूसरे मनुष्योंमें कभी नहीं देखा गया ।। १ ।।
नामधेयानि चाप्येषां कथ्यमानानि भागशः । त्वत्तः श्रुतानि मे ब्रह्मन् पाण्डवानां च कीर्तय ।। २ ।।
ब्रह्मन् ! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंके पृथक् पृथक् नाम भी जो आपने कहे हैं, वे मैंने अच्छी तरह सुन लिये। अब पाण्डवोंके जन्मका वर्णन कीजिये ।। २ ।।
ते हि सर्वे महात्मानो देवराजपराक्रमाः । त्वयैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ।। ३ ।।
वे सब महात्मा पाण्डव देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। आपने ही अंशावतरणके प्रसंगमें उन्हें देवताओंका अंश बताया था ।। ३ ।।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमतिमानुषकर्मणाम् । तेषामाजननं सर्वं वैशम्पायन कीर्तय ।। ४ ।।
वैशम्पायनजी! वे ऐसे पराक्रम कर दिखाते थे, जो मनुष्योंकी शक्तिके परे हैं; अतः मैं उनके जन्म-सम्बन्धी वृत्तान्तको सम्पूर्णतासे सुनना चाहता हूँ; कृपा करके कहिये ।। ४ ।।
वैशम्पायन उवाच
राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते । चरन् मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम् ।। ५ ।।
वैशम्पायनजी बोले- जनमेजय! एक समय राजा पाण्डु मृगों और सर्पोंसे सेवित विशाल वनमें विचर रहे थे। उन्होंने मृगोंके एक यूथपतिको देखा, जो मृगीके साथ मैथुन कर रहा था ।। ५ ।।
ततस्तां च मृगीं तं च रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ।। ६ ।।
उसे देखते ही राजा पाण्डुने पाँच सुन्दर एवं सुनहरे पंखोंसे युक्त तीखे तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा, उस मृगी और मृगको भी बींध डाला ।। ६ ।।
स च राजन् महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः
भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ।। ७ ।।
राजन् ! उस मृगके रूपमें एक महातेजस्वी तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी मृगीरूपधारिणी पत्नीके साथ तेजस्वी मृग बनकर समागम कर रहे थे ।। ७ ।।
संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन् गिरम् । क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रियः ।। ८ ।।
वे उस मृगीसे सटे हुए ही मनुष्योंकी-सी बोली बोलते हुए क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे विलाप करने लगे ।। ८ ।।
मृग उवाच
काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि।
वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ।। ९ ।।
न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः ।
विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ।। १० ।।
मृगने कहा- राजन्! जो मनुष्य काम और क्रोधसे घिरे हुए, बुद्धिशून्य तथा पापोंमें संलग्न रहनेवाले हैं, वे भी ऐसे क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग देते हैं। बुद्धि प्रारब्धको नहीं ग्रसती (नहीं लाँघ सकती) प्रारब्ध ही बुद्धिको अपना ग्रास बना लेता है (भ्रष्ट कर देता है)। प्रारब्धसे प्राप्त होनेवाले पदार्थोंको बुद्धिमान् पुरुष भी नहीं जान पाता ।। ९-१० ।।
शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत । कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः ।। ११ ।।
भारत ! सदा धर्ममें मन लगानेवाले क्षत्रियोंके प्रधान कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है, तो भी काम और लोभके वशीभूत होकर तुम्हारी बुद्धि धर्मसे कैसे विचलित हुई? ।। ११ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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