#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣2️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
षडधिकशततमोऽध्यायः
महर्षि माण्डव्य का शूली पर चढ़ाया जाना...(दिन 328)
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जनमेजय उवाच
किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् । कस्य शापाच्च ब्रह्मर्षेः शूद्रयोनावजायत ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन् ! धर्मराज ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप प्राप्त हुआ? किस ब्रह्मर्षि के शापसे वे शूद्रयोनि में उत्पन्न हुए ।। १ ।।
वैशम्पायन उवाच
बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः । धृतिमान् सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ।। २ ।।
वैशम्पायनजी ने कहा- राजन् ! पूर्वकाल में माण्डव्य नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो धैर्यवान्, सब धर्मों के ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तपस्वी थे ।। २ ।।
स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः । ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ।। ३ ।।
वे अपने आश्रमके द्वार पर एक वृक्ष के नीचे दोनों बाँहें ऊपर को उठाये हुए मौनव्रत धारण करके खड़े रहकर बड़ी भारी तपस्या करते थे। माण्डव्यजी बहुत बड़े योगी थे ।। ३ ।।
तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः । तमाश्रममनुप्राप्ता दस्यवो लोप्त्रहारिणः ।। ४ ।।
उस कठोर तपस्या में लगे हुए महर्षि के बहुत दिन व्यतीत हो गये। एक दिन उनके आश्रम पर चोरी का माल लिये हुए बहुत-से लुटेरे आये ।। ४ ।।
अनुसार्यमाणा बहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ । ते तस्यावसथे लोप्त्रं दस्यवः कुरुसत्तम ।। ५ ।।
निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते बले । तेषु लीनेष्वथो शीघ्रं ततस्तद् रक्षिणां बलम् ।। ६ ।।
आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृषिं तस्करानुगाः । तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ।। ७ ।।
कतमेन पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम । तेन गच्छामहे ब्रह्मन् यथा शीघ्रतरं वयम् ।। ८ ।।
जनमेजय ! उन चोरों का बहुत-से सैनिक पीछा कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ ! वे दस्यु वह चोरीका माल महर्षिके आश्रममें रखकर भयके मारे प्रजा-रक्षक सेनाके आनेके पहले वहीं कहीं छिप गये। उनके छिप जानेपर रक्षकोंकी सेना शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँची। राजन् ! चोरोंका पीछा करनेवाले लोगोंने इस प्रकार तपस्यामें लगे हुए उन महर्षिको जब वहाँ देखा, तो पूछा कि 'द्विजश्रेष्ठ ! बताइये, चोर किस रास्तेसे भगे हैं? जिससे वही मार्ग पकड़कर हम तीव्र गतिसे उनका पीछा करें' ।। ५-८ ।।
तथा तु रक्षिणां तेषां ब्रुवतां स तपोधनः । न किंचिद् वचनं राजन्नब्रवीत् साध्वसाधु वा ।। ९ ।।
राजन्! उन रक्षकोंके इस प्रकार पूछनेपर तपस्याके धनी उन महर्षिने भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा ।। ९ ।।
ततस्ते राजपुरुषा विचिन्वानास्तमाश्रमम् । ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चौरांस्तद् द्रव्यमेव च ।। १० ।।
तब उन राजपुरुषोंने उस आश्रममें ही चोरोंको खोजना आरम्भ किया और वहीं छिपे हुए चोरों तथा चोरी के माल को भी देख लिया ।। १० ।।
ततः शङ्का समभवद् रक्षिणां तं मुनिं प्रति । संयम्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ।। ११ ।।
फिर तो रक्षकोंको मुनिके प्रति मनमें संदेह उत्पन्न हो गया और वे उन्हें बाँधकर राजाके पास ले गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजासे सब बातें बतायीं और उन चोरोंको भी राजाके हवाले कर दिया ।। ११ ।।
तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाद् वध्यतामिति । स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ।। १२ ।।
राजाने उन चोरोंके साथ महर्षिको भी प्राणदण्डकी आज्ञा दे दी। रक्षकोंने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया ।। १२ ।।
ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनिं रक्षिणस्तदा । प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ।। १३ ।।
इस प्रकार वे रक्षक माण्डव्य मुनिको शूलीपर चढ़ाकर वह सारा धन साथ ले राजाके पास लौट गये ।। १३ ।।
शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः । निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ।। १४ ।।
धर्मात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य दीर्घकालतक उस शूलके अग्रभागपर बैठे रहे। वहाँ भोजन न मिलनेपर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई ।। १४ ।।
धारयामास च प्राणानृषींश्च समुपानयत् । शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ।। १५ ।।
संतापं परमं जग्मुर्मुनयस्तपसान्विताः । ते रात्रौ शकुना भूत्वा संनिपत्य तु भारत । दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन् द्विजोत्तमम् ।। १६ ।।
वे प्राण धारण किये रहे और स्मरणमात्र करके ऋषियोंको अपने पास बुलाने लगे। शूलीकी नोकपर तपस्या करनेवाले उन महात्मासे प्रभावित होकर सभी तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप हुआ। वे रातमें पक्षियोंका रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आये और अपनी शक्तिके अनुसार स्वरूपको प्रकाशित करते हुए उन विप्रवर माण्डव्य मुनिसे पूछने लगे ।। १५-१६ ।।
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् किं पापं कृतवानसि । येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ।। १७ ।।
'ब्रह्मन्! हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन-सा पाप किया है, जिससे यहाँ शूलपर बैठनेका यह महान् कष्ट आपको प्राप्त हुआ है?' ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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