#पौराणिक कथा
राजा चित्रकेतु और भगवान के दर्शन — संपूर्ण कथा
स्रोत: भागवत पुराण, छठा स्कंध, अध्याय 16
(पौराणिक कथा – मुक्त रूप में सुनाई गई)
बहुत समय पहले राजा चित्रकेतु विशाल साम्राज्य के नरेश थे। वैभव, सेना, महल—सब कुछ था, मगर एक ही अभाव उन्हें भीतर से तोड़ता था—संतान का न होना। रानी कृतद्युति भी इसी कारण उदासी में दिन बिताती थीं। दोनों के जीवन में आनंद होते हुए भी एक गहरी खाली जगह थी।
ऋषि का आगमन
एक दिन राजमहल में तेजस्वी ऋषि अंगिरा ऋषि पधारे। राजा ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और अपनी पीड़ा प्रकट की। ऋषि ने उनकी तड़प को समझा और बोले—
"राजन्, समय आ गया है। तुम पर कृपा होगी।"
ऋषि ने एक विशेष यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रसाद को रानी कृतद्युति ने ग्रहण किया, और कुछ समय बाद एक सुन्दर पुत्र ने जन्म लिया। महल में उत्सव छा गया—संगीत, नृत्य, दान, हर्ष—सब कुछ।
प्रसन्नता से शोक तक
परंतु सुख का यह दीप जल्द ही हवा से बुझ गया। राजकुमार की अचानक मृत्यु हो गई।
महल का आनंद पल में राख हो गया। राजा बिखर गए, रानी निराशा में डूब गईं। सबको लगा जैसे जीवन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया हो।
उसी समय दो महान संत आए—
नारद मुनि
और
अंगिरा ऋषि (फिर से)।
उन्होंने राजा से कहा—
"जिसे तुम अपना मानते हो, वह कभी स्थायी नहीं होता। जीवन में मिलने-विछोह दोनों ही निश्चित हैं। दुख में डूबने से सत्य छूट जाता है।"
उनके वचनों ने चित्रकेतु के भीतर सोए विवेक को जगा दिया। वे समझ गए कि संसार परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा शाश्वत है।
वैराग्य और भक्ति का मार्ग
राजा ने राज्य की हलचलों से मन हटाकर ईश्वर-चिन्तन में मन लगाया।
शोक धीरे-धीरे शांति में बदलने लगा। ध्यान, जप और भक्ति—इन सबमें उनका हृदय डूब गया।
भक्ति की अग्नि इतनी प्रबल हुई कि उनका जीवन जैसे तेज से चमकने लगा। उन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को आत्मसात कर लिया और आत्मज्ञान में स्थित हो गए।
भगवान का दर्शन
एक दिन, ध्यान में बैठे राजा को दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ।
उनके सम्मुख प्रकट हुए—
भगवान विष्णु,
अपनी मनोहारी रूप-छवि और शांति प्रदान करने वाले तेज के साथ।
उनके साथ उपस्थित थे चार महान बाल-संत—
सनक,
सनंदन,
सनातन,
सनत्कुमार,
जो सदैव भगवान के निकट रहते हैं।
चित्र में दिखाया गया दृश्य इसी क्षण को दर्शाता है—
राजा चित्रकेतु भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठे हैं, उनकी आँखों में कृतज्ञता और भक्ति है।
भगवान विष्णु उन्हें वरदान, आशीर्वाद और आध्यात्मिक मार्ग का प्रकाश दे रहे हैं।
कुमार शांत भाव से इस दिव्य मिलन के साक्षी बने हुए हैं।
कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है:
सुख-दुख जीवन के स्वाभाविक प्रवाह हैं।
जो मिलता है, वह कभी स्थायी नहीं होता।
विरक्ति, भक्ति और ज्ञान से जीवन का सच खुलता है।
सच्चा संतोष परमात्मा के स्मरण में है।