जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १०☀️ पृष्ठ ११☀️
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तवसिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी ।
सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥१॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीव नसे हाथ धोना पड़ेगा॥१॥
स्यामसरोज दामसम सुंदर। प्रभुभुज करिकर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा ।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥२॥
[सीताजी ने कहा- हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की माला के समान सुन्दर और हाथी की सूँड़ के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।
चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा ।
कह सीता हरु मम दुख भारा ॥३॥
सीताजी कहती हैं- हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजी के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले।
सुनत बचन पुनि मारन धावा।मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई ।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥४॥
सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरी ने नीति कह कर उसे समझाया। तब रावण ने सब राक्षसियों को बुला कर कहा कि जा कर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ ॥४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
यदि महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकाल कर मार डालूँगा ॥५॥
दो०- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥१०॥
[यों कह कर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत-से बुरे रूप धर कर सीताजी को भय दिखलाने लगे।
#सीताराम भजन