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सीताराम भजन
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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १६☀️ पृष्ठ १७☀️ जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥ राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ॥१॥ अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा । कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥२॥ हे माता ! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्र जी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥२॥ निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥३॥ और राक्षसों को मार कर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। [सीताजी ने कहा- हे पुत्र ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३॥ मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥ अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४॥ सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥५॥ तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५॥ दो०- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥ हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्‌ को मार सकता है)॥१६॥ #सीताराम भजन
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🙏🌹 जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ श्लोक ☀️ पृष्ठ १☀️ शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥१॥ शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले,ब्रह्मा,शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दीखनेवाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरो- मणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वर की मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥२॥ हे रघुनाथजी ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये ॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥३॥ अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु)के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥३॥ #सीताराम भजन
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