जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २३☀️ पृष्ठ २४☀️
राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका ।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥१॥
तुम श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो॥१॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥
रामनाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोह को छोड़, विचार कर देखो। हे देवताओं के शत्रु ! सब गहनों से सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ों के बिना शोभा नहीं पाती॥२॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं ।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं ॥३॥
रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुईभी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही ।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥४॥
हे रावण ! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजी के साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥४॥
दो०- मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥२३॥
मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देने वाले, तमरूप अभिमानका त्याग करदो और रघुकुलके स्वामी, कृपा के समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का भजन करो ॥२३॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २२☀️ पृष्ठ २३☀️
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा ।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥१॥
मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से युद्ध कर के तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान् जी के [मार्मिक] वचन सुनकर रावण ने हँस कर बात टाल दी ॥१॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सबकें देह परमप्रिय स्वामी।मारहिं मोहि कुमारग गामी॥२॥
हे [राक्षसों के] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरों के) मालिक ! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्ग पर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे ॥२॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा ।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥३॥
तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे पुत्र ने मुझ को बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभु का कार्य किया चाहता हूँ।
बिनती करउँ जोरिकर रावन।सुनहु मानतजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी ।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥४॥
हे रावण ! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़ कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़ कर भक्त भयहारी भगवान् को भजो ॥४॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥
जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहने से जानकीजी को दे दो॥५॥
दो०- प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥२२॥
खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे ॥२२॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २१☀️ पृष्ठ २२☀️
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि के बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही ।
देखउँ अति असंक सठ तोही ॥१॥
लंकापति रावणने कहा- रे वानर ! तू कौन है? किसके बलपर तूने वन को उजाड़ कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानों से नहीं सुना? रे शठ ! मैं तुझे अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ ॥१॥
मारे निसिचर केहिंअपराधा।कहु सठ तोहि न प्रानकइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया ।
पाइ जासु बल बिरचति माया ॥२॥
तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? रे मूर्ख ! बता, क्या तुझे प्राण जाने का भय नहीं है? [हनुमान्जी ने कहा- हे रावण ! सुन; जिनका बल पा कर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के समूहों की रचना करती है ॥२॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन ।
अंडकोस समेत गिरि कानन ॥३॥
जिनके बल से हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्र- मुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वन सहित समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर धारण करते हैं; ॥३॥
धरइ जो बिबिधदेह सुरत्राता।तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा ।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥४॥
जो देवताओं की रक्षा के लिये नाना प्रकार की देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खा को शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजी के कठोर धनुष को तोड़ डाला और उसी के साथ राजाओं के समूह का गर्व चूर्ण कर दिया ॥४॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली ।
बधे सकल अतुलित बल साली ॥५॥
जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि को मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थेः ॥५॥
दो०- जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥२१॥
जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत् को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम [चोरी से] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ ॥२१॥
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा २०☀️ पृष्ठ २१☀️
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ ॥१॥
उसने हनुमान्जी को ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्ष से नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाश से बाँध कर ले गया ॥१॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भवबंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा ।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥२॥
[शिवजी कहते हैं-] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धन में आ सकता है? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमान्जी ने स्वयं अपने को बँधा लिया॥२॥
कपि बंधनसुनि निसिचर धाए।कौतुक लागि सभाँ सबआए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई ।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥३॥
बंदर का बाँधा जाना सुन कर राक्षस दौड़े और कौतुक के लिये (तमाशा देखने के लिये) सब सभा में आये। हनुमान्जी ने जा कर रावण की सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥३॥
करजोरें सुर दिसिप बिनीता ।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका ।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥४॥
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जी के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं ॥४॥
दो०- कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥२०॥
हनुमान्जी को देख कर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वध का स्मरण किया तो उसके हृदय में विषाद उत्पन्न हो गया ॥२०॥ #सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १९☀️ पृष्ठ २०☀️
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही ।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥१॥
पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनाद को भेजा। (उससे कहा कि-) हे पुत्र ! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदर को देखा जाय कि कहाँ का है ॥१॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा।बंधु निधनसुनि उपजाक्रोधा॥
कपि देखा दारुन भटआवा।कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥
इन्द्र को जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाई का माराजाना सुन उसे क्रोध होआया। हनुमान् जीने देखा कि अब की भयानक योद्धाआया है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहिगहि कपि मर्दइ निजअंगा॥३॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहार से] लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ का कर दिया (रथ को तोड़ कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़ कर हनुमान् जी अपने शरीर से मसलने लगे ॥३॥
तिन्हहि निपाति ताहिसन बाजा।भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एकछन मुरुछा आई॥४॥
उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमान् जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े। उसको क्षण भर के लिये मूर्च्छा आ गयी ॥४॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहुमाया।जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥
फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवन के पुत्र उससे जीते नहीं जाते ॥५॥
दो०- ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार ।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥१९॥
अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्र का सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमान् जी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी ॥१९॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १८☀️ पृष्ठ १९☀️
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरें लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे ।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥१॥
वे सीताजी को सिर नवा कर चले और बाग में घुस गये। फल खाये और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की ॥१॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फलअरु बिटपउपारे।रच्छक मर्दिमर्दि महिडारे॥२॥
[और कहा-] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को मसल मसल कर जमीन पर डाल दिया ॥२॥
सुनि रावन पठए भट नाना।तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछुअधमारे॥३॥
यह सुन कर रावण ने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देख कर हनुमान् जी ने गर्जना की। हनुमान् जी ने सब राक्षसों को मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये ॥३॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभटअपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा ।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥४॥
फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान् जी ने एक वृक्ष [हाथ में] ले कर ललकारा और उसे मार कर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की ॥४॥
दो०- कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥१८॥
उन्होंने सेना में कुछ को मार डाला और कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़-पकड़ कर धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है।
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १७☀️ पृष्ठ १८☀️
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना ।
होहु तात बल सील निधाना ॥१॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान्जी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजी के प्रिय जान कर हनुमान्जी को आशीर्वाद दिया कि हे तात ! तुम बल और शील के निधान होओ ॥१॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना ।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥२॥
हे पुत्र ! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये ॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥३॥
हनुमान्जी ने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़ कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है।
सुनहुमातु मोहि अतिसय भूखा।लागिदेखि सुंदरफल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी ।
परम सुभट रजनीचर भारी ॥४॥
हे माता ! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षों को देख कर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजी ने कहा- हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं ॥४॥
तिन्हकर भय माता मोहिनाहीं।जौं तुम्हसुख मानहु मनमाहीं॥
[हनुमान्जी ने कहा-] हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न हो कर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥५॥
दो०- देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७॥
हनुमान् जी को बुद्धि और बल में निपुण देख कर जानकीजी ने कहा- जाओ। हे तात ! श्रीरघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ ॥१७॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १६☀️ पृष्ठ १७☀️
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥
राम बान रबि उएँ जानकी ।
तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ॥१॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा ।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥२॥
हे माता ! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्र जी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥२॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना ।
जातुधान अति भट बलवाना ॥३॥
और राक्षसों को मार कर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। [सीताजी ने कहा- हे पुत्र ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥
अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४॥
सीता मन भरोस तब भयऊ ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५॥
दो०- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥
हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान् को मार सकता है)॥१६॥
#सीताराम भजन
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १५☀️ पृष्ठ १६☀️
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू ।
कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥१॥
[हनुमान् जी बोले-] श्रीरामचन्द्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षों के नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान ॥१॥
कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा ।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हितरहे करत तेइपीरा।उरग स्वाससम त्रिबिधसमीरा॥२॥
और कमलों के वन भालों के वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गयी है ॥२॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥३॥
मन का दुःख कह डालने से भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ॥३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तनसुधि नहिं तेही॥४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गयीं। उन्हें शरीर की सुध न रही ॥४॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उरआनहु रघुपति प्रभुताई।सुनि ममबचन तजहु कदराई॥५॥
हनुमान् जी ने कहा- हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्रीरामजी का स्मरण करो। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुन कर कायरता छोड़ दो ॥५॥
दो०- निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥१५॥
राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्रीरघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो ॥१५॥
#सीताराम भजन
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १४☀️ पृष्ठ १५☀️
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी ।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना ।
भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥१॥
भगवान् का जन (सेवक) जान कर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा- हे तात हनुमान् ! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए ॥१॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी ।
अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।कपि केहिहेतु धरी निठुराई॥२॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान् ! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ॥२॥
सहज बानि सेवक सुखदायक ।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता ।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥३॥
सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथ जी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात ! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गों को देख कर मेरे नेत्र शीतल होंगे॥३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी।अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥४॥
[मुँह से] वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओं का] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं-] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देख कर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले-॥४॥
मातु कुसलप्रभु अनुज समेता।तवदुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित [शरीर से] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है ॥५॥
दो०- रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजी का संदेश सुनिये। ऐसा कह कर हनुमान्जी प्रेम से गद्गद हो गये। उनके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया ॥१४॥
#सीताराम भजन








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