जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १८☀️ पृष्ठ १९☀️
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरें लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे ।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥१॥
वे सीताजी को सिर नवा कर चले और बाग में घुस गये। फल खाये और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की ॥१॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फलअरु बिटपउपारे।रच्छक मर्दिमर्दि महिडारे॥२॥
[और कहा-] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को मसल मसल कर जमीन पर डाल दिया ॥२॥
सुनि रावन पठए भट नाना।तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछुअधमारे॥३॥
यह सुन कर रावण ने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देख कर हनुमान् जी ने गर्जना की। हनुमान् जी ने सब राक्षसों को मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये ॥३॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभटअपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा ।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥४॥
फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान् जी ने एक वृक्ष [हाथ में] ले कर ललकारा और उसे मार कर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की ॥४॥
दो०- कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥१८॥
उन्होंने सेना में कुछ को मार डाला और कुछ को मसल डाला और कुछ को पकड़-पकड़ कर धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है।
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १७☀️ पृष्ठ १८☀️
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना ।
होहु तात बल सील निधाना ॥१॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान्जी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजी के प्रिय जान कर हनुमान्जी को आशीर्वाद दिया कि हे तात ! तुम बल और शील के निधान होओ ॥१॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना ।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥२॥
हे पुत्र ! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये ॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥३॥
हनुमान्जी ने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़ कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है।
सुनहुमातु मोहि अतिसय भूखा।लागिदेखि सुंदरफल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी ।
परम सुभट रजनीचर भारी ॥४॥
हे माता ! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षों को देख कर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजी ने कहा- हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं ॥४॥
तिन्हकर भय माता मोहिनाहीं।जौं तुम्हसुख मानहु मनमाहीं॥
[हनुमान्जी ने कहा-] हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न हो कर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥५॥
दो०- देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७॥
हनुमान् जी को बुद्धि और बल में निपुण देख कर जानकीजी ने कहा- जाओ। हे तात ! श्रीरघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ ॥१७॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १६☀️ पृष्ठ १७☀️
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥
राम बान रबि उएँ जानकी ।
तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥
श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ॥१॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा ।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥२॥
हे माता ! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्र जी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥२॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना ।
जातुधान अति भट बलवाना ॥३॥
और राक्षसों को मार कर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। [सीताजी ने कहा- हे पुत्र ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥
अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४॥
सीता मन भरोस तब भयऊ ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५॥
दो०- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥
हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान् को मार सकता है)॥१६॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १५☀️ पृष्ठ १६☀️
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू ।
कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥१॥
[हनुमान् जी बोले-] श्रीरामचन्द्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षों के नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान ॥१॥
कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा ।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हितरहे करत तेइपीरा।उरग स्वाससम त्रिबिधसमीरा॥२॥
और कमलों के वन भालों के वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँप के श्वास के समान (जहरीली और गरम) हो गयी है ॥२॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥३॥
मन का दुःख कह डालने से भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेम का तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है ॥३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तनसुधि नहिं तेही॥४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले। प्रभु का सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गयीं। उन्हें शरीर की सुध न रही ॥४॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उरआनहु रघुपति प्रभुताई।सुनि ममबचन तजहु कदराई॥५॥
हनुमान् जी ने कहा- हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्रीरामजी का स्मरण करो। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुन कर कायरता छोड़ दो ॥५॥
दो०- निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥१५॥
राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्रीरघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो ॥१५॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १४☀️ पृष्ठ १५☀️
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी ।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना ।
भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥१॥
भगवान् का जन (सेवक) जान कर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा- हे तात हनुमान् ! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए ॥१॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी ।
अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।कपि केहिहेतु धरी निठुराई॥२॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान् ! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ॥२॥
सहज बानि सेवक सुखदायक ।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता ।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥३॥
सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथ जी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात ! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गों को देख कर मेरे नेत्र शीतल होंगे॥३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी।अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥४॥
[मुँह से] वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओं का] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं-] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देख कर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले-॥४॥
मातु कुसलप्रभु अनुज समेता।तवदुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।तुम्ह ते प्रेमु राम के दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित [शरीर से] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मन में ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है ॥५॥
दो०- रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥१४॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजी का संदेश सुनिये। ऐसा कह कर हनुमान्जी प्रेम से गद्गद हो गये। उनके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया ॥१४॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १३☀️ पृष्ठ १४☀️
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥१॥
तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगुठी को पहचान कर सीताजी आश्चर्य चकित हो कर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं ॥१॥
जीति को सकइ अजय रघुराई।माया तें असिरचि नहिंजाई॥
सीता मन बिचार करनाना। मधुरबचन बोलेउ हनुमाना॥२॥
[वे सोचने लगीं] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान् जी मधुर वचन बोले ॥२॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगा कर उन्हें सुनने लगीं हनुमान् जी ने आदि से लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किनभाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥४॥
[सीताजी बोलीं-] जिसने कानों के लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देख कर सीताजी फिर कर (मुख फेर कर) बैठ गयीं; उनके मन में आश्चर्य हुआ ॥४॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।दीन्हि राम तुम्हकहँ सहिदानी॥५॥
[हनुमान् जी ने कहा- हे माता जानकी! मैं श्रीरामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
[सीताजी ने पूछा-] नर और वानर का सङ्ग कहो कैसे हुआ? तब हनुमान्जी ने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही।
दो०- कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥
हनुमान् जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है ॥१३॥ #सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १२☀️ पृष्ठ १३☀️
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई ।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥१॥
सीताजी हाथ जोड़ कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥१॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी ।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥२॥
काठ ला कर चिता बना कर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे। रावण की शूल के समान दुःख देनेवाली वाणी कानों से कौन सुने॥२॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि ।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। ।
अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥३॥
सीताजी के वचन सुन कर त्रिजटा ने चरण पकड़ कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। उसने कहा- हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कह कर वह अपने घर चली गयी ॥३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला ।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा ।
अवनि न आवत एकउ तारा ॥४॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं- [क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाश में अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता ॥४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहिजानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका ।
सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥५॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जान कर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष ! मेरी विनती सुन ! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर ॥५॥
नूतन किसलय अनल समाना ।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥६॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोग को बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा)। सीताजी को विरह से परम व्याकुल देख कर वह क्षण हनुमान् जी को कल्प के समान बीता ॥६॥
दो०-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥१२॥
तब हनुमान्जी ने हृदय में विचार कर [सीताजी के सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अङ्गारा दे दिया। [यह समझ कर] सीताजी ने हर्षित हो कर उठ कर उसे हाथ में ले लिया।
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा ११☀️ पृष्ठ १२☀️
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना ।
सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥१॥
उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबों को बुला कर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो ॥१॥
सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा ।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥२॥
स्वप्न में [मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी। रावण नङ्गा है और गदहे पर सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं।
एहिबिधि सो दच्छिन दिसिजाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
इसप्रकार से वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशा को जारहा है और मानो लंका विभीषण ने पायी है। नगर में श्रीरामचन्द्रजी की दुहाई फिर गयी। तब प्रभु ने सीताजी को बुला भेजा ॥३॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचनसुनि ते सब डरीं।जनकसुताके चरनन्हि परीं॥४॥
मैं पुकार कर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजी के चरणों में गिर पड़ीं।
दो०- जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥११॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ॥११॥
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १०☀️ पृष्ठ ११☀️
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तवसिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी ।
सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥१॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीव नसे हाथ धोना पड़ेगा॥१॥
स्यामसरोज दामसम सुंदर। प्रभुभुज करिकर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा ।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥२॥
[सीताजी ने कहा- हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की माला के समान सुन्दर और हाथी की सूँड़ के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है।
चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा ।
कह सीता हरु मम दुख भारा ॥३॥
सीताजी कहती हैं- हे चन्द्रहास (तलवार)! श्रीरघुनाथजी के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले।
सुनत बचन पुनि मारन धावा।मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई ।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥४॥
सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरी ने नीति कह कर उसे समझाया। तब रावण ने सब राक्षसियों को बुला कर कहा कि जा कर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ ॥४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
यदि महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकाल कर मार डालूँगा ॥५॥
दो०- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥१०॥
[यों कह कर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत-से बुरे रूप धर कर सीताजी को भय दिखलाने लगे।
#सीताराम भजन
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☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा ९☀️ पृष्ठ १०☀️
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा ।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥१॥
हनुमान् जी वृक्ष के पत्तों में छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय बहुत-सी स्त्रियों को साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया।
बहुबिधि खल सीतहि समुझावा।साम दान भयभेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।मंदोदरी आदि सबरानी॥२॥
उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया । साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावण ने कहा- हे सुमुखि ! हे सयानी ! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियों को ॥२॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही ।
सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥३॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही ! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण कर के जानकीजी तिनके की आड़ (परदा) कर के कहने लगीं ॥३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा ।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझ कहति जानकी ।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥४॥
हे दशमुख ! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं-तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीर के बाणकी खबर नहीं है ॥४॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥
रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम ! निर्लज्ज ! तुझे लज्जा नहीं आती ॥५॥
दो०- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥९॥
अपने को जुगनू के समान और रामचन्द्रजी को सूर्य के समान सुन कर और सीताजी के कठोर वचनों को सुन कर रावण तलवार निकाल कर बड़े गुस्से में आ कर बोला ॥९॥
#सीताराम भजन













