जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १७☀️ पृष्ठ १८☀️
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना ।
होहु तात बल सील निधाना ॥१॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान्जी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजी के प्रिय जान कर हनुमान्जी को आशीर्वाद दिया कि हे तात ! तुम बल और शील के निधान होओ ॥१॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना ।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥२॥
हे पुत्र ! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये ॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥३॥
हनुमान्जी ने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़ कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है।
सुनहुमातु मोहि अतिसय भूखा।लागिदेखि सुंदरफल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी ।
परम सुभट रजनीचर भारी ॥४॥
हे माता ! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षों को देख कर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजी ने कहा- हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं ॥४॥
तिन्हकर भय माता मोहिनाहीं।जौं तुम्हसुख मानहु मनमाहीं॥
[हनुमान्जी ने कहा-] हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न हो कर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥५॥
दो०- देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥१७॥
हनुमान् जी को बुद्धि और बल में निपुण देख कर जानकीजी ने कहा- जाओ। हे तात ! श्रीरघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ ॥१७॥
#सीताराम भजन


