#जय श्री कृष्ण #श्री हरि विष्णु
भगवान विष्णु और श्री कृष्ण का संबंध अंश और अंशी का है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार, इनका संबंध निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
* अवतार और अवतारी: भगवान विष्णु 'अंशी' (मूल स्रोत) हैं और श्री कृष्ण उनके 'अंश' या अवतार हैं। श्री कृष्ण को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है— "एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयम्" अर्थात् अन्य सभी अवतार विष्णु जी की कलाएं या अंश हैं, परंतु कृष्ण स्वयं पूर्ण भगवान हैं।
* पूर्ण अवतार की मान्यता: भगवान विष्णु के अन्य अवतारों (जैसे राम, वामन, परशुराम) की तुलना में श्री कृष्ण को 'पूर्ण अवतार' माना जाता है। इसका अर्थ है कि श्री कृष्ण में विष्णु जी की सभी 16 कलाएं विद्यमान थीं।
* अध्यात्मिक एकात्मकता: तत्व की दृष्टि से विष्णु और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। जैसे एक ही व्यक्ति अलग-अलग समय पर अलग-अलग वेशभूषा धारण करता है, वैसे ही विष्णु जी ने द्वापर युग में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए कृष्ण रूप धारण किया था।
* ब्रह्म और लीला पुरुषोत्तम: विष्णु जी को जगत का पालनहार और 'वैकुंठ' का स्वामी माना जाता है, जबकि श्री कृष्ण को 'लीला पुरुषोत्तम' कहा गया है। विष्णु जी अपनी मर्यादा और ऐश्वर्य के लिए जाने जाते हैं, जबकि कृष्ण अपनी बाल-लीलाओं, प्रेम और गीता के ज्ञान के माध्यम से मानवीय भावनाओं के करीब माने जाते हैं।
* सायुज्य संबंध: महाभारत के युद्ध के दौरान जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना 'विश्वरूप' दिखाया, तो उसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे। यह इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण और विष्णु एक ही परम तत्व के दो रूप हैं।
हिंदू दर्शन के अनुसार, विष्णु जी का हृदय कृष्ण है और कृष्ण का आधार विष्णु हैं। इनके बीच का संबंध सागर और उसकी लहर जैसा है—लहर सागर से अलग नहीं होती, बल्कि उसी का एक गतिशील रूप होती है।