#महाभारत
पुण्यमयी भारत-भूमि के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को आज से 5127 वर्ष पहले पूर्णावतार लीला पुरुषोत्तम योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्म-भाव में स्थित होकर जिस अमृतमयी भगवत्-वाणी द्वारा भक्त अर्जुन को शाश्वत अध्यात्म-रस से आप्लावित किया था , वही " भगवत् गीता " के नाम से जगत-विख्यात है।
विश्व के मूर्धन्य विचारकों / दार्शनिकों को भगवद्गीता ने अपनी ओर आकृष्ट किया है। केवल चार उदाहरण ही पर्याप्त हैं।
1. नोबेल पुरस्कृत भौतिकीविद आइंस्टाइन कहते हैं -
जब मैं भगवत् गीता पढ़ता हूं एवं ईश्वर ने किस प्रकार विश्व ब्रह्मांड की सृष्टि की है ? - इस पर गंभीर मनन करता हूं , तब अन्य सभी कुछ मेरे लिए अप्रयोजनीय मालूम पड़ता है।
2. जर्मन दार्शनिक विलहेल्म वॉन हम्बोल्ट कहते हैं -
भगवत् गीता अति सुंदर , शायद अस्तित्व में रहे ज्ञात भाषाओं में एकमात्र सच्चा दार्शनिक गीत है।
3. श्रीयुक्त एफ०टी० ब्रुक्स अपने गीता विषयक निबंध में लिखते हैं - भगवत् गीता के अंदर वे सारी विशेषताएं मौजूद हैं , जो भारत की एक जातीय धर्म - पुस्तक के अंदर होनी चाहिए। हिंदू धर्म के भिन्न-भिन्न संप्रदायों को एकता के सूत्र में बांधनेवाला यह एक अनुपम ग्रंथ है और भारत की भावी राष्ट्रीय जीवन के लिए एक अमूल्य संपत्ति है। यही नहीं , भावी सार्वभौम धर्म का सूत्रग्रंथ बनने के लिए भी यही सर्वथा उपयुक्त है। भारत के गौरवपूर्ण प्राचीन काल के इस अमूल्य रत्न से मानव जाति के और भी गौरवपूर्ण समुज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अनुपम सहायता मिलेगी।
4. विश्व में 16 जुलाई 1945 को प्रथम बार परमाणु-शक्ति का परीक्षण किया गया था। उसके महा-विस्फोट से परीक्षण-स्थल से मीलों दूर रखे शक्ति एवं ऊर्जा मापने के सारे यंत्र टूट गए थे। उससे निकले प्रकाश से आंखें चौंधिया गई थीं। ऐसी अवस्था में परमाणु-बम के जनक एवं गीता के अध्येता जुलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर के मुख से भगवत् गीता के विश्वरूप दर्शनयोग के निम्नलिखित श्लोक
" दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन:।। "
अपने देश में तो भगवत् गीता का अद्भुत प्रभाव पड़ा है। भारतीय संविधान में जो चित्र जोड़े गए हैं , उनमें भगवान श्री कृष्ण द्वारा भक्त अर्जुन को गीता ज्ञान देनेवाली छवि अंकित है। आज भी भारतीय न्यायालयों में भगवत् गीता पर हाथ रखकर शपथ ली जाती है।
भारत के कई संस्थानों के ध्येय-वाक्य (Motto) गीता से ही लिए गए हैं। उनमें से कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं -
आर०पी०एस०एफ० - यशोलभस्व।
RPSF
इंडियन एयर फोर्स - नभ: स्पर्शमदीप्तम्।
AIF
एल०आई०सी० - योगक्षेमं वहाम्यहम्।
LIC
आई०आई० टी०, खड़गपुर - योग: कर्मसु कौशलम्।
IIT , Kharagpur
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अंग्रेज कवि सर एडमिन अर्नाल्ड की गीता के प्रसिद्ध अनुवाद " दिव्य संगीत को लंदन में पढ़कर ही गांधी जी का गीता से प्रथम परिचय हुआ था।
भगवत् गीता जहां संसार का सर्वोच्च त्याग करनेवाले संन्यासियों की झोली में मिलती है , वहीं दूसरी ओर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नौजवान क्रांतिकारियों की जेब में भी गीता रहती थी। भगवत् गीता के " आत्मा की अमरता " के संदेश से अनुप्राणित होकर भारत माता के लिए क्रांतिकारी फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूमा करते थे।
भगवत् गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं -
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यंं संवादमावयो:।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: शस्यामिति मे मति:।।
अर्थ - जो व्यक्ति इस धर्ममय हम दोनों के संवादरूप गीता का अध्ययन करेगा , उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा - ऐसा मेरा मत है।
च इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:।।
अर्थ - जो पुरुष मुझ में परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीता-शास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा , वह मुझको ही प्राप्त होगा - इसमें कोई संदेह नहीं है।
भला ! ऐसी भगवत् वाणी (भगवद्गीता) का अध्ययन करना कौन नहीं चाहेगा तथा अन्य भक्तों के बीच इसका प्रचार-प्रसार करना नहीं चाहेगा ?
हम सभी को गर्व है कि ऐसी अमूल्य कालजयी अलौकिक दिव्य कृति हमें विरासत में मिली है।
।। भगवत् गीता की जय ।।
।। पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण की जय ।।