sn vyas
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14 days ago
#जय श्री कृष्ण #🙏गीता ज्ञान🛕 मानवीय स्वभाव की गहरी व्याख्या भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं कि तुम्हीं तुम्हारे मित्र हो और तुम्हीं तुम्हारे शत्रु। *आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।* जब तक कोई हमारा अनुगमन करता है, हमारी हां में हां मिलाता है, हमारी बात मानता है, तभी तक वह प्रिय होता है। परंतु जिस क्षण से उसने हमारी बात माननी बंद किया, या असहमति दिखाया, अनुगमन बंद किया, उसी क्षण वह अप्रिय होना शुरू हो जाता है, शत्रु हो जाता है। कुछ दिन पहले एक घटना घटी- आपलोगों ने भी देखा और सुना होगा न्यूज चैनलों के माध्यम से - किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने अपनी प्रिय पत्नी ( प्रिय रही होगी तभी तो ) पढ़ा लिखा कर एसडीएम बनवा दिया। या यों कहिए कि एक महिला अपने पति के सहयोग के कारण पढ़ लिख कर एसडीएम हो गई। क्योंकि उसके अंदर प्रतिभा थी, तभी वह बनी, वरना तो उसका पति भी एसडीएम बन सकता था। तब तो कोई लफड़ा ही न होता। अब एसडीएम बनने के उपरांत उसने अपने पति का अनुगमन बंद कर दिया। अब वह उसकी शत्रु हो गई। उसने सोशल मीडिया पर अपना दुखड़ा रोया तो पूरा सोशल मीडिया नैतिकता का डंडा लेकर उसके पीछे पड़ गया। सोशल मीडिया के बाद अब मेन स्ट्रीम मीडिया उसके पीछे पड़ गया। उसके पति की जलन अभी भी शांत न हुई, क्योंकि उसको लगता है कि वह उसे फर्श से अर्श पर ले जा सकता है तो वही उसको अर्श से फर्श पर भी ला सकता है, तो उसने उसके व्हाट्सएप्प मैसेज लीक करना शुरू कर दिया। अब आगे आ गए ब्यूरोक्रेसी के माठाधीश, वे उस के ऊपर जांच बिठाने की अपील कर रहे हैं। इसी संसार को कोई माया कहता है, लेकिन कृष्ण कहते हैं दैवी: *दैवी हि एशा गुणवती मम माया दुरत्या।* अब आप दैवी का जो भी अर्थ लगाएं। लेकिन मेरे अनुसार इसका अर्थ है प्रकृति और उसके नियम, जिसे समझना अत्यंत दुष्कर है। कबीर कहते हैं:- माया महा ठगिन हम जानी। तिरगुन फांस लिए कर डाले। बोले मधुरी बानी। कबीर कहते हैं — “भाई, मैं समझ गया हूँ कि यह माया एक महान ठगिन है। वह तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) की फाँसी लेकर घूमती है और लोगों को फँसाती है, परंतु उसके मुँह से बहुत मीठे और आकर्षक बोल निकलते हैं माया केवल धन-दौलत या सांसारिक सुख नहीं है। यह मन की सारी लालसाएँ, मोह, भ्रम और इच्छाएँ हैं जो त्रिगुणों के माध्यम से जीव को संसार में फँसाए रखती हैं। वह मीठी-मीठी बातों (सुख-भोग की आशा) से मनुष्य को फंदे में फँसा लेती है।कबीर जी हमें चेतावनी देते हैं कि माया से सावधान रहो, क्योंकि वह कितनी भी मीठी और आकर्षक लगे, अंत में ठगने वाली ही है। सच्ची मुक्ति केवल माया से ऊपर उठकर, परमात्मा की भक्ति में है।