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#Annapurna_Muhim_SantRampalJi
, राजा अम्बरीष और ऋषि दुर्वासा
गरीब, दुर्बासा काली शिला, बज्र बली तिहूं लोक।
अम्बरीष दरबार में, तिन्ह भी खाया धोख।।
गरीब, चक्र सुदर्शन शीश परि, अम्बरीष कूं घालि।
तीन लोक भागे फिरे, ऐसी अबिगत चाल।।1
गरीब, कल्प किसी नहीं कीजिये, जो चाहे सो होय।
दुर्बासा के छिपन कूं, कहीं न पाई खोहि।।
गरीब, स्वर्ग मृत पाताल में, चक्र सुदर्शन डीक।
दुर्बासा के चक्र सैं, जरे नहीं अम्बरीष।।
गरीब, चक्र अपूठा फिर गया, चरण कंवल कूं छूहि।
भक्ति बिश्वंभर नाथ की, देखि दूह बर दूह।।
गरीब, कोटि बज्र कूं फूक दे, चक्र सुदर्शन चूर।
भक्ति बछल भगवान सैं, रहै पैंड दस दूर।।
गरीब, दुर्बासा के दहन कूं, रती न जग में भेट।
छप्पन कोटि जादौं गये, देखि हेठ दर हेठ।।
गरीब, साग पत्र सें छिक गये, देखि भक्ति की रीति।
जरै मरै नहीं तास तैं, सतगुरु शब्द अतीत।।
गरीब, अम्बरीष असलां असल, भक्ति मुक्ति का रूप।
निश बासर पद में रहै, जहां छाया नहीं धूप।।
गरीब, राजा कै जोगी गये, दुर्बासा ऋषि देव।
चक्र चलाया घूरि करि, नहीं लई ऋषि सेव।।
गरीब, दुर्बासा के शीश कूं, चाल्या चक्र अचान।
त्रिलोकी में तास गमि, कहीं न देऊं जान।।
गरीब, सेत लोक बिष्णु पुरी, दुर्बासा चलि जाय।
तहां बिश्बंभर नाथ को, कीन्हीं देखि सहाय।
गरीब, कृष्ण गुरू कसनी हुई, और बचैगा कौन।
तीन लोक भागे फिरे, भरमें चौदह भौन।।
गरीब, भक्ति द्रोह न कीजिये, भक्ति द्रोह मम दोष।
शिब ब्रह्मा नारद मुनी, जिन्है जरावैं ठोक।।
गरीब, भक्ति द्रोह रावण किया, हिरनाकुश हिरनाछ।
नारायण नरसिंह भये, मम भगता है साच।।
गरीब, मम भगता मम रूप है, मम भगता मम प्राण।
पंड सताये कौरवां, दुर्योधन छ्यो मान।।
गरीब, मम भगता मम प्राण है, मम भगता मम देह।
हिरनाकुश के उदर कूं, पारत नहीं संदेह।।
गरीब, मम भगता मम प्रिय है, नहीं दुनी सें काम।
राजा परजा रीति सब, यह नहीं जानैं राम।।
गरीब, मम भगता कै कारनै, रचे सकल भंडार।
बाल्मीक ब्रह्म लोक में, संख कला उदगार।।
गरीब, रावण बाली बिहंडिया, मम द्रोही मम जार।
सीता सती कलंक क्या, पदम अठारा भार।
गरीब, मम द्रोही सें ना बचूं, छलि बल हनूं प्राण।
बावन हो बलि कै गये, रह्या दोहूं का मान।।
गरीब, मम द्रोही मम साल है, मेरे जन का दूत।
कोटि जुगन काटौं तिसैं, करूं जंगल का भूत।
गरीब, खान पान पावै नहीं, जल तिरषा बोह अंत।
बस्ती में बिचरैं नहीं, शूल फील गज दंत।।
गरीब, मम द्रोही मम साल है, मारौं रज रज बीन।
भवन सकल अरु लोक सब, करौं प्राण तिस क्षीण।।
गरीब, अर्ध मुखी गर्भ बास में, हरदम बारमबार।
जुनि पिशाची तास कूं, तब लग सष्टि संघार।।
गरीब, गर्भ जुनि में त्रास द्यौं, जब लग धरणि अकाश।
मारौं तुस तुस बीन करि, नहीं मिटै गर्भबास।।
गरीब, प्राण निकंदू तास कै, छ्यासी सष्टि सिंजोग।
संत संतावन कल्प युग, ता शिर दीर्घ रोग।।
गरीब, बिष्णु ब्रह्मा शिब सुनौं, और सनकादिक च्यारि।
अठासी सहंस जलेब में, याह मति मूढ गंवार।।
गरीब, चक्र चले दुर्बासा परि, में बखशौं नहीं तोहि।
मम द्रोही तूं दूसरा, चरण कंवल ऋषि जोहि।।
गरीब, दुर्बासा बोले तहां, सुनौ भक्ति के ईश।
स्वर्ग रिसातल लोक सब, तूं पूरण जगदीश।।
गरीब, तुह्मरे दर छूटे नहीं, चक्र सुदर्शन चोट।
कहां खंदाओ ईश जी, बचौं कौन की ओट।।1
गरीब, अम्बरीष दरबार में, जाओ निर संदेह।
काल घटा पूठी पडै, मम द्रोही मुख खेह।।
गरीब, दुर्बासा मतलोक कूं, तुम जाओ ततकाल।
ज्ञान ध्यान शास्त्रर्थ तजो, बाद बिद्या जंजाल।।
गरीब, जप तप करनी काल है, बिना भक्ति बंधान।
एक ही केवल नाम है, सो देवैंगे दान।।
गरीब, मान बड़ाई कूकरी, डिंभ डफान करंत।
जिन कै उर में ना बसौं, जम छाती तोरंत।।
गरीब बूझे विसंभर नाथ चक्र क्यों चोट चलाई।
क्या गुस्ताकी कीन्हीं कथा मोहे बेग सुनाई।।
गरीब, बनजारे के बैल ज्यौं, फिरैं देश परदेश।
जिन कै संग न साथ हूं, जगत दिखावैं भेष।
गरीब, आजिज मेरे आशरै, मैं आजिज के पास।
गैल गैल लाग्या फिरौं, जब लगि धरणि आकास।
गरीब, नारद से साधू सती, अति ज्ञाता प्रबीन।
एक पलक में बह गये, मन में बांकि मलीन।।
गरीब, दुर्बासा अम्बरीष कै, गये ज्ञान गुण डार।
चरण कंवल शिक्षा लई, तुम ईश्वर प्राण उधार।।
गरीब, बखशो प्राण दया करो, पीठ लगाओ हाथ।
उर मेरे में ठंडि होय, शीतल कीजै गात।।
गरीब, अम्बरीष महके तहां, बिहंसे बदन खुलास।
तुम रिषि मेरे प्राण हो, मैं हूं तुमरा दास।।
गरीब, चक्र सुदर्शन शीश धरि, दिजो भगति की आन।
मैं चेरा चरणां रहूं, बखशो मेरे प्राण।।
गरीब, चक्र सुदर्शन पकरि करि, अम्बरीष बैठाय।
दुर्बासा पर मेहर करि, चलो भक्ति कै भाय।।
गरीब, अंबरीस मत लोक, बसे एक राजा सूचा।
करै एकादस ब्रत, ज्ञान कछु अधिका ऊंचा।।
गरीब, हम कीन्हा ब्रह्मज्ञान, ऊन्हैं सिरगुण उपदेसा।
छांड एकादस बरत, कह्या हम लग्या अंदेसा।।
गरीब, हम दीना चक्र चलाई, काटि सिर इसका लीजै।
औह चक्र पग छूहि, उलट करि दिगबिजै किजै।।
गरीब, हम भागे भय खाइ, चक्र छूटे गैंनारा।
तीन लोक में गवन किये, राखे नहिं किन्हैं अधारा।
गरीब, अब आये तुम पास, जानराइ जानत सोई।
हम कूं ल्यौ छिपाइ, चक्र मारे नहिं मोहि।
गरीब, हंसे विसंभर नाथ, ऋषिन तूं ज्ञानहि हीना।
अंबरीस दरबार तुम्हों, क्यूं दिगबिजै कीना।।
गरीब, अंबरीस रनधीर, सती सूरा सतबादी।
तुम दुर्बासा देव, फिरौ ज्ञानन के बादी।।
गरीब, निरगुण सिरगुण भगति, सबै उनके हैं देवा।
उर में रहै छिपाइ, कहै कौनन सें भेवा।।
गरीब, तुम ऋषि जावो बेगि, अंबरीस दरबारा।
दुंदबाद मिटि जांहि, होत तुम्हरा निस्तारा।।
गरीब, चरन कमल चित्त लाइ, पड़ौं उनके दरबारा।
। वे कल्पवक्ष सरूप, कष्ट के मोचन हारा।।
गरीब, जब ऋषि चलै बिचारि, चूक हमरी ही निकसी।
चक्र सुदर्शन गैल, जान अंबरीषहि बकसी।।
गरीब, बोले राजा बैंन, सुनो दुर्बासा देवा।
ना कछु हमरे दोष, तुम्हारा तुमको लेवा।
गरीब, राजा द्यौह आसीस, पीठ पर हाथ लगावौ।
चक्र सुदर्शन पकडि धरो मेरे मस्तक लावौ।।
गरीब, अंबरीष कूं चक्र, पकडि़ सीतल चक्र कीना।
जब ऋषि दई असीस, सही राजा प्रबीना।।
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