#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣1️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वयधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशिराज की कन्याओं का हरण, युद्ध में सब राजाओं तथा शाल्व की पराजय, अम्बिका और अम्बालिका के साथ विचित्रवीर्य का विवाह तथा निधन...(दिन 316)
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वैशम्पायन उवाच
हते चित्राङ्गदे भीष्मो बाले भ्रातरि कौरव । पालयामास तद् राज्यं सत्यवत्या मते स्थितः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! चित्रांगदके मारे जानेपर दूसरे भाई विचित्रवीर्य अभी बहुत छोटे थे, अतः सत्यवतीकी रायसे भीष्मजीने ही उस राज्यका पालन किया ।। १ ।।
सम्प्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां वरः । भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ।। २ ।।
जब विचित्रवीर्य धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँचे, तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीने उनकी वह अवस्था देख विचित्रवीर्यके विवाहका विचार किया ।। २ ।।
अथ काशिपतेर्भीष्मः कन्यास्तिस्रोऽप्सरोपमाः ।
शुश्राव सहिता राजन् वृण्वाना वै स्वयंवरम् ।। ३ ।।
राजन् ! उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं, जो अप्सराओंके समान सुन्दर थीं। भीष्मजीने सुना, वे तीनों कन्याएँ साथ ही स्वयंवर सभामें पतिका वरण करनेवाली हैं ।। ३ ।।
ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन शत्रुजित् ।
जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रभुः ।। ४ ।।
तब माता सत्यवतीकी आज्ञा ले रथियोंमें श्रेष्ठ शत्रुविजयी भीष्म एकमात्र रथके साथ वाराणसीपुरीको गये ।। ४ ।।
तत्र राज्ञः समुदितान् सर्वतः समुपागतान् । ददर्श कन्यास्ताश्चैव भीष्मः शान्तनुनन्दनः ।। ५ ।।
वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मने देखा, सब ओरसे आये हुए राजाओंका समुदाय स्वयंवर-सभामें जुटा हुआ है और वे कन्याएँ भी स्वयंवरमें उपस्थित हैं ।। ५ ।।
कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु तदा नामसु सर्वशः । एकाकिनं तदा भीष्मं वृद्धं शान्तनुनन्दनम् ।। ६ ।।
सोद्वेगा इव तं दृष्ट्वा कन्याः परमशोभनाः ।
अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया ।। ७ ।।
उस समय सब ओर राजाओंके नाम ले-लेकर उन सबका परिचय दिया जा रहा था। इतनेमें ही शान्तनुनन्दन भीष्म, जो अब वृद्ध हो चले थे, वहाँ अकेले ही आ पहुँचे। उन्हें देखकर वे सब परम सुन्दरी कन्याएँ उद्विग्न-सी होकर, ये बूढ़े हैं, ऐसा सोचती हुई वहाँसे दूर भाग गयीं ।। ६-७ ।।
वृद्धः परमधर्मात्मा वलीपलितधारणः । किं कारणमिहायातो निर्लज्जो भरतर्षभः ।। ८ ।।
मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यति भारत ।
ब्रह्मचारीति भीष्मो हि वृथैव प्रथितो भुवि ।। ९ ।।
इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः ।
वहाँ जो नीच स्वभावके नरेश एकत्र थे, वे आपसमें ये बातें कहते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे- 'भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीष्म तो बड़े धर्मात्मा सुने जाते थे। ये बूढ़े हो गये हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो चुके हैं; फिर क्या कारण है कि यहाँ आये हैं? ये तो बड़े निर्लज्ज जान पड़ते हैं। अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके ये लोगोंमें क्या कहेंगे-कैसे मुँह दिखायेंगे? भूमण्डलमें व्यर्थ ही यह बात फैल गयी है कि भीष्मजी ब्रह्मचारी हैं' ।। ८-९ ।।
वैशम्पायन उवाच
क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चक्रोध भारत ।। १० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! क्षत्रियोंकी ये बातें सुनकर भीष्म अत्यन्त कुपित हो उठे ।। १० ।।
भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः ।
उवाच च महीपालान् राजञ्जलदनिःस्वनः ।। ११ ।।
रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः।
आहूय दानं कन्यानां गुणवद्भ्यः स्मृतं बुधः ।। १२ ।।
अलंकृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि ।
प्रयच्छन्त्यपरे कन्या मिथुनेन गवामपि ।। १३ ।।
राजन् ! वे शक्तिशाली तो थे ही, उन्होंने उस समय स्वयं ही समस्त कन्याओंका वरण किया। इतना ही नहीं, प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीष्मने उन कन्याओंको उठाकर रथपर चढ़ा लिया और समस्त राजाओंको ललकारते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा - 'विद्वानोंने कन्याको यथाशक्ति वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके गुणवान् वरको बुलाकर उसे कुछ धन देनेके साथ ही कन्यादान करना उत्तम (ब्राह्म विवाह) बताया है। कुछ लोग एक जोड़ा गाय और बैल लेकर कन्यादान करते हैं (यह आर्ष विवाह है) ।। ११-१३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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